यूजीसी के उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु विनिमय 2026 को कई-कई बार पढ़ने के बाद ऐसा
महसूस हुआ कि इसके विरोध में जो स्वर उठे हैं, वे इसके विरोध
से ज्यादा मोदी-विरोध के हैं. ऐसा लगता है इसका विरोध करने वालों में से बहुतायत
लोगों ने इसे पढ़ा नहीं है. यदि पढ़ा होता तो बिन्दुवार विरोध दर्ज करवाया गया होता
किन्तु ऐसा नहीं हो रहा है. लगभग सभी जगह से एक ही बात निकल कर सामने आ रही है कि
सवर्णों के बच्चे कॉलेज से सीधे जेल जाएँगे; सवर्णों की
बेटियाँ बिस्तरों पर लाई जाएँगी आदि-आदि.
यदि देखा जाये तो ये अधिनियम पूर्व से चले आ रहे 2012 के अधिनियम का संशोधित रूप है. ये विनियम 2012 से लागू भेदभाव-रोधी नियमों का अद्यतन रूप है. यूजीसी द्वारा यह अद्यतन रूप भी अचानक से लागू नहीं कर दिया गया. इसका प्रारूप फरवरी 2025 में जारी हुआ था. लगभग 11 महीने की प्रक्रिया, जिसमें नागरिकों की सहमति, असहमति संसदीय समिति के विचार आदि के बाद इसे अंतिम रूप दिया गया. इस संशोधन में अब अन्य पिछड़ा वर्ग को भी शामिल कर लिया गया है. एक जाति-आधारित भेदभाव वाला बिन्दु ऐसा है जिसे विवादास्पद माना जा सकता है, इसके अतिरिक्त कहीं से भी जाति के आधार पर भेदभाव वाला स्वरूप नहीं दिखाई देता है.
इस अधिनियम के अनुसार प्रत्येक संस्थान में बनाये जाने वाले समान अवसर केन्द्र
के अन्तर्गत समता समिति का गठन किया जाना है. इसके सदस्यों के बारे में अधिनियम
लिखता है कि 'समिति में
अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांगजन, अनुसूचित
जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना
चाहिए.'. यदि इसे भी समग्रता में देखा जाये तो यह बिन्दु भी
इनके होने की अनिवार्यता की बात नहीं करता बल्कि इनके प्रतिनिधित्व की बात करता
है. समिति के गठन के प्रकार में भी जातिगत आधार को वरीयता नहीं दी गई है.
चूँकि वर्तमान अधिनियम 2026 पूर्व से विनियमित अधिनियम 2012 का संशोधित रूप है और यदि विगत बारह-तेरह वर्षों में सामान्य वर्ग के साथ सब कुछ सामान्य रूप से गुजरता रहा है तो अपेक्षा की जानी चाहिए कि आगे भी सामान्य ही गुजरेगा. हाँ, ये न हो कि लगातार उठते विरोधी स्वर सामान्य वर्ग के विरोधियों के हाथों में उस्तरा थमा दें.
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