उच्च शिक्षा के माध्यम से देश की लोकतांत्रिक चेतना, वैज्ञानिक सोच और सामाजिक न्याय की भावना के प्रति
सकारात्मकता पैदा करने का कार्य करने के साथ-साथ इंसानों में संवेदनशीलता, मानवीयता गुणों का विकास किया जाता
है. इसी उद्देश्य को लेकर ही देश में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी)
की स्थापना की गई थी. अपनी स्थापना से
लेकर अद्यतन यूजीसी द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों लोकतांत्रिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, बौद्धिक,
सांस्कृतिक आधारशिला निर्मित करने का प्रयास किया जाता रहा है. आयोग द्वारा इसी 13
जनवरी को उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए समता के संवर्द्धन हेतु विनिमय 2026 को अधिसूचित
कर दिया गया. ये विनियम 2012 से लागू भेदभाव-रोधी नियमों का अद्यतन रूप है. यूजीसी द्वारा यह अद्यतन रूप भी अचानक से लागू नहीं कर दिया
गया. इसका प्रारूप फरवरी 2025 में जारी हुआ था. लगभग 11 महीने की प्रक्रिया, जिसमें नागरिकों की सहमति, असहमति संसदीय समिति के
विचार आदि के बाद इसे अंतिम रूप दिया गया.
इस अधिनियम के लक्ष्य में स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है कि धर्म, नस्ल, जाति,
लिंग, जन्म-स्थान या दिव्यांगता के आधार पर विशेष रूप से
अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति, सामाजिक एवं शैक्षणिक
रूप से पिछड़े वर्गों, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, दिव्यांगजनों अथवा इनमें से किसी के भी सदस्यों के विरुद्ध भेदभाव का
उन्मूलन करना तथा उच्च शिक्षा संस्थानों के हितधारकों के मध्य पूर्ण समता एवं
समावेशन को संवर्धन देना. यदि इस उद्देश्य पर विचार किया जाये तो यह किसी एक वर्ग
के प्रति भेदभाव जैसी स्थिति नहीं दिखाता है. इसके बाद भी इसे सामान्य वर्ग के
विरुद्ध बताया जा रहा है, जिसके चलते देशभर में यह बिल चर्चा के केन्द्र में है. चर्चा
के दौरान जो बात उभर कर सामने आई है वो दर्शाती है कि अधिनियम में जिस तरह के
प्रावधान किये गए हैं उसके अनुसार इस विचार को मजबूती मिलती है कि सामान्य वर्ग के
लोग भेदभाव के शिकार नहीं हो सकते बल्कि वे सिर्फ भेदभाव ही कर सकते हैं. इस सोच
के पीछे वे तमाम अधिनियम हैं जिनका दुरूपयोग करके सामान्य वर्ग को परेशान किया
जाता रहा है.
यह पूर्णतः सत्य है कि किसी भी समाज में, संस्था में किसी भी तरह के भेदभाव का स्थान नहीं होना चाहिए
और इससे भी किसी को इंकार नहीं होना चाहिए कि समाज से भेदभाव कम करने के प्रयास
ज्यादा से ज्यादा होने चाहिए. इस सन्दर्भ में आयोग द्वारा जारी अधिसूचना को भी
समझना आवश्यक हो जाता है. अधिनियम के बिन्दु 3 के अन्तर्गत विभिन्न सन्दर्भों को
परिभाषित किया गया है, जिसमें 3ख में पीड़ित का सन्दर्भ ऐसे
व्यक्ति से लगाया गया है जिसके पास इन विनियमों के अंतर्गत शिकायतों से सम्बंधित
या जुड़े मामलों में कोई शिकायत है. इसमें भी जातिगत उल्लेख नहीं है अर्थात पीड़ित
व्यक्ति किसी भी वर्ग का हो सकता है. इसके अतिरिक्त 3थ में हितधारक का अर्थ स्पष्ट
किया गया है कि इसमें छात्र, संकाय सदस्यों, कर्मचारी और प्रबंध समिति के सदस्य, जिनमें उच्च
शिक्षा संस्थान का प्रमुख भी शामिल है. एक बिन्दु 3ग अवश्य ऐसा है जो अनुसूचित
जातियों, अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य पिछड़े वर्गों के
सदस्यों के विरुद्ध केवल जाति या जनजाति के आधार पर भेदभाव को परिभाषित करता है. इस
सम्बन्ध में शिकायत मिलने पर 24 घंटे में प्राथमिक कार्रवाई करनी होगी और 15 दिनों
में रिपोर्ट देनी होगी. आरोपी विद्यार्थी पर संस्थागत अनुशासनात्मक कार्रवाई के
रूप में पहले उसे चेतावनी दी जाएगी, इसके पश्चात् जुर्माना भी लगाया जा सकता है. गम्भीर
मामलों में विद्यार्थी को शिक्षण संस्थान से निष्कासित भी किया जा सकता है. इसके अतिरिक्त सामान्य भेदभाव में नस्ल, लिंग, धर्म, दिव्यांगता, जन्म-स्थान
आदि को शामिल किया गया है. सामान्य वर्ग का व्यक्ति इस आधार पर अपने साथ होने वाले
भेदभाव की शिकायत कर सकता है.
अधिनियम के प्रावधानों को लागू करवाने की दृष्टि से प्रत्येक उच्च शिक्षण
संस्थान को समान अवसर केन्द्र की स्थापना करनी होगी. इसका कार्य वंचित समूहों के
लिए नीतियों एवं कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन पर नजर रखना; शैक्षणिक,
वित्तीय, सामाजिक एवं अन्य मामलों में मार्गदर्शन एवं
परामर्श प्रदान करना; तथा परिसर में सामाजिक एवं सांस्कृतिक
विविधता को प्रोत्साहित करना होगा. प्रत्येक समान अवसर केन्द्र एक समता समिति के
माध्यम से कार्य करेगा. यदि इस अधिनियम में बिन्दु 3ग के अलावा बिन्दु 7 खटकता है, जो कहता है कि समिति में अन्य पिछड़ा वर्ग,
दिव्यांगजन, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं का
प्रतिनिधित्व होना चाहिए. यह बिन्दु भी इनके होने की अनिवार्यता की बात नहीं करता
है. इस अधिनियम का दुर्भाग्यपूर्ण बिन्दु यह माना जाना चाहिए कि झूठी शिकायत मिलने
पर सम्बंधित व्यक्ति के लिए किसी भी तरह की सजा, जुर्माना
अथवा कार्यवाही का प्रावधान नहीं किया गया है. यद्यपि मसौदा नियमों में इसका प्रस्ताव
था कि भेदभाव की झूठी शिकायतों को हतोत्साहित किया जाए और इसके लिए जुर्माने का भी
प्रावधान रखा गया था तथापि अंतिम अधिसूचित नियमों में यूजीसी ने इस प्रावधान को
हटा दिया और अन्य पिछड़ा वर्ग को जाति-आधारित भेदभाव के दायरे में शामिल कर लिया. इस
कारण यूजीसी का वर्तमान अधिनियम न केवल बेहद सख्त हो जाता है बल्कि अन्यायपूर्ण भी
समझ आने लगता है.
अतः आवश्यकता इस बात की है कि इस अधिनियम पर जल्दबाजी अथवा उतावलेपन में विरोध
के बजाय व्यापक विमर्श, पारदर्शिता
और हितधारकों से संवाद के साथ इसका स्वरूप निर्धारित किया जाए. शिक्षा सुधार का
लक्ष्य जाति-आधारित भेदभाव नहीं बल्कि स्वतंत्र, समावेशी और
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था का निर्माण होना चाहिए. यूजीसी को भी जनमानस के
विचारों का सम्मान करते हुए इस पर पुनर्विचार करना चाहिए. यह न केवल वर्तमान समय
की माँग है बल्कि देश के शैक्षणिक भविष्य के लिए आवश्यक भी है. ध्यान रखना चाहिए
कि एक वर्ग के साथ सम्भावित भेदभाव को दूर करने के प्रयास में दूसरा वर्ग भेदभाव
का शिकार न हो जाये.





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