30 दिसंबर 2020

जाते की विदाई आते का स्वागत, बाकी तो समय के हाथ है

इस वर्ष, 2020 का आज अंतिम दूसरा दिन, सेकेण्ड लास्ट डे है. पिछले कई दिनों से बहुत से मित्रों, परिचितों के सन्देश मिल रहे हैं जिसमें इस साल के बारे में उनके विचार पढ़ने को मिल रहे हैं. ये इंसानी फितरत होती है कि इन्सान अपने मनोभावों को तत्कालीन सन्दर्भों से जोड़कर व्यक्त करता है. कुछ ऐसा ही लगभग सभी के विचारों में देखने को मिला. वर्तमान में कोरोना-कोरोना ही सबके दिल-दिमाग में छाया हुआ है. कहीं की भी बात की जाये वो लौट-फिर कर कोरोना पर आकर टिक जाती है. किसी से मुलाकात हो या फिर फोन से बातचीत हो सबकी बातों का केंद्र सिर्फ कोरोना ही रहता है. ऐसा ही संदेशों में आते विचारों में देखने को मिला.


ये सच है कि वर्ष 2020 को कोरना ने पूरी तरह से अपनी जकड़न में ले रखा है. इसके उलट यदि एक बार समूचे वर्ष को देखें तो ऐसी जकड़ उन दिनों में ज्यादा देखने को मिली जबकि लॉकडाउन लगा हुआ था. अनलॉक की प्रक्रिया शुरू होने के बाद जैसे-जैसे आज़ादी मिलती रही, काम करने की अनुमति मिलती रही, बहुत सी छूटें मिलती रहीं उनके बाद जिस तरह से लोगों की भीड़ सड़क पर देखने को मिल रही है, जिस तरह से लोग बिना किसी भय के अपने-अपने काम पर लगे हुए हैं उसे देखकर लगता नहीं कि अब कोरोना का वह डर लोगों में है. यह भी मानसिकता का खेल है. पिछले दिनों अपने एक परिचित के सामान्य बीमार होने पर उनसे बात करने पर पता चला कि वे कमजोरी महसूस कर रहे हैं. उनको शंका थी कि भले ही उनकी कोरोना टेस्ट रिपोर्ट निगेटिव आई है मगर उनको कोरोना ही है. इसी कारण वे कमजोरी महसूस कर रहे हैं. उनकी सोच से उलट उनकी मेडिकल रिपोर्ट में उनको टायफाइड बताया गया था. क्या कहेंगे आप, क्या इस कोरोना काल के पहले टायफायड होने की दशा में कमजोरी नहीं होती थी? क्या किसी बीमारी में कमजोरी आना इसी साल से हुआ है?




कुछ इसी तरह की मानसिकता ने सबके भीतर एक अज्ञात भय पैदा कर रखा है. किसी भी तरह की शारीरिक समस्या आने पर, कोई भी बीमारी आने पर वे उसे कोरोना से जोड़ दे रहे हैं. इस तरह की सोच, ऐसा मानसिकता अब अपने आपमें एक बीमारी है. अकारण किसी बात के लिए परेशान रहना, सबको परेशान करना कहीं से भी उचित नहीं. हाँ, किसी भी हमले के लिए, किसी भी रोग से बचने के लिए सतर्क रहना, सुरक्षित रहना एक आवश्यक कदम है मगर सिर्फ और सिर्फ किसी एक बीमारी से डर कर किसी भी कदम को उसी से जोड़ देना बुद्धिमानी नहीं.


यह साल सबके लिए अपने-अपने हिसाब से अच्छा गुजरा. किसी के लिए बुरा, किसी के लिए अच्छा. क्या आपने इससे पहले इतना लम्बा समय अपने परिजनों के साथ बिताया था? क्या इससे पहले आपको अपने शौक, जो कहीं दबे हुए थे, पूरे करने का अवसर कभी मिला है? नुकसान बहुत से लोगों को हुआ है, बहुत से लोगों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा, बहुत से लोगों के परिजन सदा-सदा को उनसे दूर हो गए, बहुत से लोगों ने कोरोना बीमारी का हमला झेला है मगर इसके साथ-साथ बहुत से लोगों ने अपने दूर हो चुके परिजनों को भी पाया है, बहुत से लोगों को इसी काल में नौकरी भी मिली है, बहुत से लोगों को इसी कालखंड में अपना नया रोजगार ज़माने का अवसर मिला है. इसी एक साल का नहीं, बीते प्रत्येक साल का हिसाब-किताब करिए और उसमें अच्छे-बुरे का, लाभ-हानि का, सुख-दुःख का आकलन करिए. इसके बाद तय करिए कि क्या ये साल सिर्फ और सिर्फ बुरा ही गुजरा? उसके बाद ही विचार करिए कि इस जाते साल ने सिर्फ और सिर्फ कष्ट ही दिए हैं?


जाने वाले को विदा करिए और आने वाले का स्वागत करिए. बाकी सब तो समय के हाथ में है, भविष्य के गर्भ में है.


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वंदेमातरम्

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