30 December 2020

रिश्ते, सम्बन्ध मिट्टी का घरोंदा नहीं

आए दिन रिश्तों की बदलती परिभाषा देखने को मिलती है। अचानक से सम्बन्धों की प्रगाढ़ता में नकारात्मक परिवर्तन उत्पन्न हो जाते हैं। रिश्तों, सम्बन्धों की ऐसी प्रगाढ़ता के अचानक से समाप्त होने के पीछे की स्थिति का आकलन लोग करने के बजाय सम्बन्धों, रिश्तों को तोड़ने में ज्यादा विश्वास रखते हैं। यह अपने आपमें अबूझ पहेली नहीं है बल्कि एक सीधा सामान्य सा नियम है कि जिन सम्बन्धों में किसी न किसी तरह का व्यावसायिक दृष्टिकोण समाहित रहता है, वह सम्बन्ध उस व्यावसायिकता के समाप्त होते हो खत्म हो जाता है। ऐसे रिश्तों का अतीत भले ही कितना पुराना क्यों न हो, ऐसे रिश्तों का कालखंड कितना ही दीर्घ क्यों न हो पर यदि उनके किसी भी कोने में लाभ लेने की मानसिकता छिपी हो तो समय के प्रवाह में किसी दिन ऐसे सम्बन्ध छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। 




यह मानवीय दुर्बलता कही जाए या किसी व्यक्ति विशेष की अपनी चारित्रिक कमजोरी कि वर्षों के सम्बन्धों को अगला एक झटके में समाप्त कर लेता है। यहाँ समाप्ति ही नहीं होती सम्बन्धों की बल्कि इस तरह की स्थिति बना दी जाती है कि लगता है जैसे वे आपस में कभी परिचित ही न रहे थे। सम्बन्धों, रिश्तों को तोड़ने के प्रति इस प्रवृत्ति के लोगों को इसका भान नहीं होता है कि वे किसी एक व्यक्ति से सम्बन्ध समाप्त नहीं कर रहे हैं बल्कि सामाजिक वातावरण में एक प्रकार की शून्यता भी पैदा कर रहे हैं। 

अकसर सम्बन्धों के समाप्त होने को दो व्यक्तियों की आपसी स्थिति समझ लिया जाता है जबकि स्थिति इसके ठीक उलट है। किसी भी दो जनों के व्यवहार संग बहुत सारे लोगों का जुड़ाव होता है। रिश्तों की टूटन इन सभी जुड़ावों में दरार पैदा कर देती है। यह टूटन, यह चटकन पारिवारिकता को, सामाजिकता को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है। आपसी स्नेह, विश्वास, भरोसे की कमी के पीछे बहुत हद तक इस तरह का व्यवहार जिम्मेवार होता है। समझना चाहिए कि रिश्ते, सम्बन्ध, विश्वास आदि कोई मिट्टी का घरोंदा नहीं जो खेलने के लिए बनाया और मन भर जाने पर बिखेर दिया। सम्बन्ध, रिश्ते प्राणवायु हैं, जिनके सहारे मानव का, मानवता का, समाज का, सामाजिकता का विकास होता है।


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वंदेमातरम्

6 comments:

  1. अनगिनत लोगों द्वारा अक्सर दोस्ती लाभ उठाने के लिए की जाती है. माता पिता भाई बहन के रिश्तों में भी स्वार्थ देखा गया है किंतु पति पत्नी के रिश्तों के बीच कौन सा स्वार्थ होता है भला? सबसे ज्यादा इन रिश्तों की दरारों ने खाइयाँ बनकर सबसे ज्यादा जीवन और रिश्ते लीले हैं. मैं तो आज तक इसी को नही समझ पाई और सबसे ज्यादा छल, धोखा, झूठ भी इसी में देखा. क्षमा करें 🙏😦 वो भी पुरुष वर्ग की तरफ़ से

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 31.12.2020 को चर्चा मंच पर दिया जाएगा| आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी
    धन्यवाद

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  3. सत्य व तर्कसंगत। संबंध मिट्टी का होता तो ज़्यादा अच्छा होता, टूटने पर पुनर्निर्माण तो कर सकते हैं। पर जीवन यही है, कब कहाँ नाता टूट जाए छूट जाए।

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  4. बहुत सुंदर आलेख

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  5. अर्थपूर्ण आलेख - - नूतन वर्ष की असीम शुभकामनाएं।

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