अपने रंग-स्वरूप में बसंती मदहोशी ओढ़े रहने वाले मौसम में एक भय भी लिपटा रहता
है. इस भय से समाज के सभी लोग प्रभावित नहीं होते बल्कि एक विशेष आयु-वर्ग के
बालक-बालिका ही प्रभावित होते हैं. मौसमी सुहानेपन में परीक्षाओं का आना बच्चों को
भयभीत ही करता है. इसका एक बहुत बड़ा कारण है कि अब परीक्षाओं को किसी बच्चे के
द्वारा सर्वाधिक अंक लाये जाने का पैमाना मान लिया गया है. ऐसी स्थिति के कारण परीक्षाओं
के नाम पर ही अभिभावकों द्वारा बालमन पर एक तरह का दबाव डाला जाने लगता है. बच्चों
के सामने अनेक तरह के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उन पर सभी से अधिक अंक लाने के लिए
दबाव बनाया जाने लगता है.
वर्तमान शैक्षिक वातावरण जिस तरह से बन गया है उसमें बच्चों की बुद्धिमत्ता से
अधिक चर्चे उसके द्वारा प्राप्त अंकों के होते हैं. यहाँ वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा
के माहौल में ध्यान इसका रखा जाना चाहिए कि बच्चों के अंकों के कारण से उनमें
हीनभावना न पनपने पाए. इसके उलट हो ये रहा है कि स्वयं अभिभावकों द्वारा न केवल
परिवार के बच्चों से बल्कि मोहल्ले के, सोसायटी के, विद्यालय के अन्य बच्चों के साथ अपने
बच्चे की तुलना करते हुए कम अंकों के कारण उसे कमतर महसूस कराया जाता है. सोचने
वाली बात ये है कि अंकों का अधिक या कम आना एक परीक्षा की प्रक्रिया, उसकी पद्धति, मूल्यांकन के वातावरण पर आना निर्भर
करता है. इसके स्थान पर बच्चों की बुद्धिमत्ता, उनके कौशल, उनकी बौद्धिकता का आकलन करते हुए उनको प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. अपने
बच्चों को बेहतर शिक्षा देने का प्रयास प्रत्येक अभिभावक द्वारा किया जाता है किन्तु
बेहतर शिक्षा के नाम पर बच्चों पर दबाव बनाया जाना कदापि उचित नहीं.
अभिभावकों को ये समझना चाहिए कि बेहतर शिक्षा का सम्बन्ध किसी भी रूप में
अंकों से नहीं है. उस पर भी परीक्षा जैसे मानसिक दबाव भरे माहौल में यदि परिवार का
वातावरण भी बोझिल रहेगा,
अभिभावकों द्वारा भी अधिकाधिक अंक लाने के लिए दबाव बनाया जायेगा तो यह स्थिति
बच्चों को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा.
यह एक सामान्य सा मनोविज्ञान है कि कक्षा के, परिवारके वातावरण
में और परीक्षा कक्ष के वातावरण में अंतर होता है. वातावरण का अंतर बच्चों को अलग
तरह से प्रभावित करता है. कक्षा में, परिवार में अपनी पढ़ाई,
अपनी याददाश्त पर शत-प्रतिशत विश्वास करने वाले बहुत से बच्चे परीक्षा कक्ष में
चिन्तित, व्यग्र दिखाई देते हैं. निश्चित समय-सीमा में प्रश्नपत्र को हल करने की
उनकी उलझन में यदि अधिकाधिक अंक लाने का बोझ डाल दिया जाये तो निश्चित ही बच्चे
अपनी ही प्रतिभा के साथ न्याय नहीं कर पाएँगे.
संभव है कि वैश्वीकरण, भूमंडलीकरण
के दौर में बच्चों को उन्नत तकनीक से, उच्चतम शिक्षा से, आधुनिक संसाधनों
से सज्जित करना अभिभावकों की मजबूरी हो; ये भी संभव है कि बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा के चलते बच्चों में अधिकाधिक अंक लाने का
दबाव बनाया जाने लगा हो किन्तु यह बच्चों के भविष्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर
रहा है. अभिभावकों को चाहिए कि परीक्षा के दिनों में वे अपने व्यस्ततम समय में से कुछ
समय निकालकर अपने बच्चों के साथ बिताएँ. आज बच्चों के लिए खेलने को पार्कों,
मैदानों की कमी लगातार होती जा रही है
तो इसका अर्थ ये नहीं कि बच्चों को सिर्फ कंप्यूटर, मोबाइल, टीवी के भरोसे छोड़ दिया जाये. उनकी भावनाओं को समझने के लिए, उनमें विश्वास जगाने के लिए अभिभावकों को बच्चों
के साथ घुलना-मिलना चाहिए.
इसके साथ-साथ अभिभावक इसका ध्यान अवश्य रखें कि बच्चों का वर्तमान यदि सशक्त होगा
तो वे भविष्य की बुलंद इमारत अवश्य बनेंगे और यदि उनका वर्तमान ही भयग्रस्त,
विश्वासरहित हुआ तो सुखद भविष्य की कल्पना
भी नहीं की जा सकती है. बच्चों को विश्वास में लेने की जरूरत है. उनके भीतर से खोखलापन
हटाकर आत्मविश्वास भरने की जरूरत है. उन पर अनावश्यक दवाब बनाकर उनके जीवन को असमय
समाप्त करने के स्थान पर उनको खिलखिलाते रहने के अवसर प्रदान करने की आवश्यकता है.
अंकों की प्रतिस्पर्धा के बजाय उनमें स्वावलंबन की, सहयोग की, समन्वय की भावना का विकास करने की जरूरत है. उनको समझाना चाहिए कि अंकों का
महत्त्व उस उत्तर पुस्तिका के सन्दर्भ में है, जिस पर उनके द्वारा प्रश्नों को हल किया जाता है. जीवन की
प्रतियोगिता में उनके अंकों से कहीं अधिक महत्त्व उनके कौशल का, उनकी बुद्धिमत्ता का, उनकी बौद्धिकता का है. अभिभावकों
को अपने बच्चों को ये विश्वास जगाना चाहिए कि ज़िन्दगी निर्वहन के लिए, पारिवारिक सञ्चालन के लिए सिर्फ नौकरी ही अथवा बड़े-बड़े पैकेज ही एकमात्र
संसाधन नहीं हैं. व्यक्तिगत अवधारणा में भले ही इनको महत्त्व दिया जा रहा हो मगर
समाज की कसौटी पर आज भी ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक है जो अपने कौशल से, अपने श्रम से, अपनी प्रतिभा से खुद को विकसित, सफलतम रूप में स्थापित कर चुके हैं.
घर से लेकर स्कूल तक, अभिभावकों
से लेकर शिक्षकों तक सभी अपनी-अपनी मानसिकता का बोझ बच्चों के मन-मष्तिष्क पर लादना
बंद करना होगा. अपने अतृप्त सपनों को बच्चों के माध्यम से पूरा करने पर जोर देना बंद करना
होगा. बच्चों की शिक्षा की बुनियाद को मजबूत करने के स्थान पर उनके मन में अधिकाधिक
‘पैकेज वाली जॉब’ को पाने का लालच भरने से बचना होगा. परीक्षा के दिनों में ही
नहीं सामान्य दिवसों में भी बच्चों के लिए सकारात्मक वातावरण बनाया जाना चाहिए. संख्यात्मकता
के स्थान पर गुणात्मकता का निर्माण करने पर जोर दिया जाना चाहिए. अपने बच्चों को
मशीन बनाने के स्थान पर इंसान बनाने का प्रयास आज से ही करना होगा.
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