16 December 2018

आम जनमानस समझता है अपनों का दर्द

विगत एक वर्ष से अधिक होने को आया जबकि हम व्यक्तिगत रूप से उरई में संचालित बुन्देलखण्ड के पहले अनाज बैंक से सक्रिय तौर पर जुड़े हुए हैं. वर्ष 2017 में एक नवम्बर को इसका शुभारम्भ डॉ० अमिता सिंह के निर्देशन में हुआ. उनको इसकी प्रेरणा वाराणसी में डॉ० राजीव श्रीवास्तव के निर्देशन में संचालित विश्व के पहले अनाज बैंक से मिली. इसके बाद उन्होंने अपनी छोटी बहिन अनिला राणावत की स्मृति में उनकी पहली पुण्यतिथि पर अनाज बैंक का सञ्चालन उरई में आरम्भ किया. कोई भी भूखा न सोये के उद्देश्य के साथ अनाज बैंक वाराणसी ने अपना पुनीत कार्य आरम्भ किया था. अपनी ईमानदारी, पारदर्शिता, निष्पक्षता के चलते जल्द ही उसने गरीब, मजबूर महिलाओं के बीच अपनी पहचान स्थापित की. अनाज बैंक द्वारा प्रतिमाह पांच किलो अनाज गरीब, मजबूर, असहाय महिलाओं को प्रदान किया जाता है. वाराणसी, प्रधान कार्यालय के अनुसार ही उरई अनाज बैंक संचालित है. प्रतिमाह कुछ गरीब महिलाओं को मदद करके मन में एक सुकून यही मिलता है कि इस बैंक के माध्यम से किसी की सहायता करने का सौभाग्य मिल रहा है. इसके बाद भी बहुत बार ऐसी स्थिति होती है कि मन में उथल-पुथल मच जाती है.


अनाज बैंक द्वारा गरीब, मजबूर महिलाओं को ही अनाज के द्वारा मदद की जाती है. इसमें भी बहुत स्पष्ट कदम उठाकर उनके बारे में जानकारी एकत्र करने के बाद यह मदद उपलब्ध करवाई जाती है. ऐसा करने के पीछे मकसद महज इतना होता है कि जनता से प्राप्त सहयोग का कहीं गलत इस्तेमाल न हो जाये. प्रतिमाह होने वाले वितरण में अनेक बार ऐसी स्थिति आती है जबकि समझ आता है आज़ादी के सत्तर से अधिक वर्षों के बाद भी समाज में ऐसी स्थिति है कि लोगों को दो समय का भोजन नहीं मिल पा रहा है. सम्मानित नागरिकों की सहायता से उपलब्ध अनाज के वितरण द्वारा कुछ महिलाओं की मदद कर पाने के बाद भी दुःख बना रहता है कि सबकी मदद नहीं कर पा रहे हैं. विगत एक वर्ष से अधिक के समय ने उरई अनाज बैंक को अलग ही पहचान दी है. इससे कम से कम उरई की अनेक गरीब महिलाओं में एक तरह का आशा का संचार हुआ है. उनकी आशा कहीं न कहीं हमारे लिए दुःख का कारण बन जाती है. एकाधिक स्थितियाँ ऐसी बनती हैं जबकि अनाज बैंक की टीम चाहकर भी उनकी मदद नहीं कर पाती है. उनकी पारिवारिक स्थिति, उनकी सामाजिक स्थिति, उनकी आर्थिक स्थिति की जानकारी होने के बाद एक स्थिति तक मदद कर दी जाती है मगर लगता है कि समाज में कितना बड़ा विभेद है.

इस विभेद को जातिगत विभेद से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि समाज में आज महज जातिगत विभेद ही नहीं दिखाई दे रहा है बल्कि उसके ऊपर आर्थिक विभेद दिखाई देने लगा है. देखा जाये तो आज समाज में दो तरह के वर्ग बने हुए हैं. एक अमीर और दूसरा गरीब. इन्हों दो वर्गों के हिसाब से ही समाज में बहुतायत स्थितियाँ नियंत्रित हैं, उनका सञ्चालन है. अनाज बैंक के शुभारम्भ होने से लेकर आज के दिन तक हर वितरण में ऐसी स्थिति सामने आती है जबकि आँखें नम होती हैं. समझ नहीं आता है कि आखिर इतने सालों से सरकारें का कर रही हैं, जनप्रतिनिधि क्या कर रहे हैं, प्रशासन क्या कर रहा है जो कि एक व्यक्ति की एक समय की भूख भी नहीं मिटाई जा सकी है? आखिर ऐसे कौन से हालात बने जबकि जो काम सरकार को, शासन को, प्रशासन को करने चाहिए वे काम स्वयंसेवी लोग संचालित कर रहे हैं. आये दिन ऐसी महिलाओं की स्थिति से सामना होता है जिनके परिवार के नाम पर या तो बस वही हैं या फिर कोई नाबालिग संतति. काम करने का, कमाई का, रोजगार का कोई माध्यम नहीं. सरकार अपने आपमें व्यस्त है, जनप्रतिनिधि अपनी कमाई में व्यस्त हैं, प्रशासन प्रमुख लोगों की व्यवस्था में, सुरक्षा में व्यस्त है तब इन गरीब लोगों की तरफ कौन ध्यान दे?

अनाज बैंक आम जनमानस की सहायता से लगातार आगे बढ़ रहा है. आमजनमानस समझता है कि जनता को वास्तविक दर्द किस बात का है. ऐसे में उसके द्वारा उपलब्ध सहायता को जनता के लिए ही उपयोग करने का ध्येय अनाज बैंक द्वारा बनाया गया है. व्यक्तिगत रूप से अपने अनुभव से कह सकते हैं कि जब तक इस देश में आम जनमानस है, तब तक कोई आम जनमानस भूखा नहीं सो सकता, अनाथ नहीं रह सकता.

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