09 February 2018

अश्कों को दिल में छिपाने का हुनर लाया हूँ


दिल के ज़ख़्मों को हरा रखने का फ़न लाया हूँ
कह सके जो न वो कहने को ग़ज़ल लाया हूँ.

चाँदनी रोती रही बढ़ते रहे अँधियारे,
चाँद चमकाने को चंद्रकिरण लाया हूँ.

वो चुराते हैं नज़र मेरी नज़र से देखो,
मिलके जो झुक न सके ऐसी नज़र लाया हूँ.

ख़्वाब में मिलते हैं और चले हैं जाते,
जाने की ज़िद न करें वो दीवनापन लाया हूँ.

आँख में उनकी छवि इसलिए लाए न नमी,
अश्कों को दिल में छिपाने का हुनर लाया हूँ.

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कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र
28-01-2018



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इस ब्लॉग की 1150वीं पोस्ट 

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