08 September 2021

संवेदनहीन इंसान का विनाश निश्चित है

पिछले साल जब कोरोना की पहली दस्तक देश में हुई थी तो उसके बाद लगे लॉकडाउन के समय लोगों के विचार ऐसे बने जैसे अब वे बहुत कुछ सीख चुके हैं. इसके बाद जैसे ही अनलॉक की प्रक्रिया शुरू हुई वैसे ही सब पुराने ढर्रे पर वापस आ गया था. इसके बाद जैसे ही दूसरी खतरनाक, जानलेवा लहर समाज में दिखाई दी तो लगा कि शायद अब इंसान कुछ सीखने की कोशिश करेगा. आपसी संबंधों को लेकर, एक-दूसरे की मदद करने को लेकर, संपत्ति के प्रति तृष्णा को लेकर, धन संग्रह की प्रवृत्ति को लेकर हो सकता है कि इंसान कुछ सीखे. बहुत से लोगों के विचारों को जानने-समझने का अवसर मिला. उससे लगा कि न सही सबके सब मगर कुछ हद तक इंसान अपने आपको बदलने की कोशिश करेगा.




इधर विगत कुछ महीनों से कोरोना से डर-भय जैसी स्थिति जैसे समाप्त ही है. इसी समाप्ति ने बहुत कुछ समाप्त कर दिया है. जिन दिनों आसपास मौत दिख रही थी, अपनों के दूर चले जाने की खबरें आ रही थीं, उस समय बहुतायत लोगों को दार्शनिक की मुद्रा में देखा था, माया-मोह के बंधनों से मुक्त होते देखा था. अब फिर वही कोरोना के पहले की स्थिति दिखाई देने लगी है. इससे एक बात तो समझ आती है कि इंसानी फितरत मूल रूप से अपनी भयावहता को भूल जाने की है. उसके मूल में किसी तरह से न सुधरने की स्थिति छिपी हुई है. देखा जाये तो यह स्थिति खतरनाक है. यदि इंसान सीखने की कोशिश में आगे नहीं बढ़ेगा तो फिर किस तरह से नए-नए मानकों को स्थापित किया जायेगा?


पिछले वर्ष से लेकर अभी तक की जो स्थिति निकली है, जो समय गुजरा है उसमें इंसान ने बहुत कुछ अनुभव किया है. पाया कम है और खोया ज्यादा है. इसके बाद भी ज्यादा से ज्यादा लाभ लेने का लालच, आपदा से गुजर रहे लोगों से भी मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति इस समय देखने को मिली. चिकित्सा से सम्बंधित सामग्री की, दैनिक उपभोग की वस्तुओं की कालाबाजारी देखने को इसी समय मिली. ये सब यह बताने को काफी है कि इंसान दर्द का अनुभव तभी करता है जबकि वह स्वयं उससे गुजरता है. उसके पहले उसके लिए दूसरे का कष्ट अनुभव करने वाला मामला नहीं बल्कि उससे लाभ लेने वाला मसला होता है. समझने वाली बात है कि यदि व्यक्ति इस कष्टकारी दौर में भी नहीं सुधरा है, इस आपत्तिकाल में भी उसके अन्दर का मानव नहीं जाग सका है, आपदा के इस दौर में भी वह संवेदित नहीं हो सका है तो ऐसे इंसान का पल-पल विनाश की तरफ बढ़ना स्वाभाविक है. ऐसी स्थिति के लगातार बने रहने से समाज का भी विनाश निश्चित है, समाज का ध्वंस भी निश्चित है.


.

No comments:

Post a Comment