मनमोहन सिंह की जितनी तारीफें, उपलब्धियाँ अब उनके निधन के बाद सुनाई जा रहीं हैं, काश! उनको जीवित रहते सुना दी गईं होतीं.
=>> कम से कम उनको एहसास होता कि वे ही परमाणु सम्बन्धी मामले के अगुआ थे.
=>> कम से कम उनको एहसास तो होता कि उनके कारण ही भारत आर्थिक रूप से सक्षम
हुआ है.
=>> कम से कम उनको एहसास होता कि मौन रहने के बाद भी वही भारतीय राजनीति
की रीढ़ थे.
=>> कम से कम उनको एहसास तो होता कि वे ही एकमात्र विद्वान थे जिन्होंने
आर्थिक नीतियों को सही से देश में लागू करवाया.

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