11 August 2015

धर्म के नाम पर पाखंड


एक और नाम धर्म-कर्म में उछलकर सामने आया है, साथ में परिपाटी सा बनाये रखा हुआ एक सम्मानित शब्द जोड़कर. कुछ ‘बापू’ जोड़कर सामने आये, कुछ ‘बाबा’ लगाकर, कुछ ‘साध्वी’ के साथ आये तो ये ‘माँ’ जोड़कर भक्तों के सामने प्रकट हुई. जी हाँ, उन्हीं राधे माँ की चर्चा आजकल छिड़ी हुई है जिनपर किसी समय एक महिला पर हिंसा करने का आरोप लगा था और अब अश्लीलता फ़ैलाने का आरोप लगा है. भक्तिमय दरबार की तस्वीरें आने के साथ-साथ अब जो तस्वीरें सामने आई हैं उनमें वे किसी भी कोण से धार्मिक संत, साध्वी तो समझ नहीं आती हाँ, एक अच्छी भली मॉडल का भ्रम पैदा करती हैं. इन तस्वीरों को यदि अश्लीलता का पर्याय माना-समझा जाये तो फिर फ़िल्मी हीरोइन, विज्ञापनों की तमाम मॉडल्स को, टीवी आदि सहित अन्य कार्यक्रमों में प्रस्तुतीकरण देती महिला कलाकारों के खिलाफ भी कार्यवाही की जा सकती है, जो अत्यल्प वस्त्रों में समाज में अश्लीलता फैलाती रहती हैं. राधे माँ के नाम से संत-जगत में प्रसिद्द इस महिला के बारे में कहा जाता है कि वो अपने भक्तों को अनोखे अंदाज़ में आशीर्वाद देती है, उनके साथ घुलमिल कर नाचती है, आशीर्वाद में गले लगाती है, गुलाब का फूल अपने हाथ से देती है. राधे माँ की भक्ति का आनंद उठाने पहुंचे कई भक्तों ने तो यहाँ तक आरोप लगाये हैं कि उनके भक्ति दरबार में अश्लीलता का माहौल रहता है, उनकी और शिष्यों-भक्तों की भाव-भंगिमाएँ भी अश्लील होती हैं. कुछ इसी तरह के अन्य दूसरे आरोपों के चलते कुम्भ मेले में उनके प्रवेश को निषिद्ध कर दिया गया और इधर खबर मिली है कि उनके विरुद्ध सम्मन जारी किया जा रहा है.

सत्यता क्या है, कैसी है, कितनी है इस पर अब देशव्यापी बहस छिड़ी हुई है; सोशल मीडिया में राधे माँ के पक्ष-विपक्ष में अजब-अजब तर्कों-कुतर्कों की भरमार दिख रही है; आरोप-प्रत्यारोप के बादल गहराते, बरसते जा रहे हैं; उनके भक्त अपनी बात रख रहे हैं तो विरोधी अपने आरोपों को सत्य करने में लगे हैं. धार्मिक वातावरण में, धर्म-संसार में, संत-जगत में ये कोई पहला मामला सामने नहीं आया है जबकि किसी संत, साध्वी के चरित्र पर, उसकी हरकतों पर, उसके आश्रम, भक्ति-दरबार आदि के माहौल पर ऊँगली उठाई गई हो. इससे पहले भी कई-कई नाम संदेह के घेरे में आते रहे हैं और कई-कई का कानूनी तरीके से पर्दाफाश भी होता रहा है. अब इन संत महिला को कानूनी रूप से घेरे में लाये जाने की कवायद हो रही है, उसके विरुद्ध वातावरण का निर्माण हो रहा है, आरोपों का सिलसिला चल पड़ा है तब इसकी भी पहल आवश्यक लगती है कि ऐसे संतों-साध्वियों का वास्तविक उद्देश्य आखिर क्या होता है? एक साधारण सा व्यक्ति कैसे रातों-रात लाखों-लाख लोगों के लिए भगवान के रूप में दिखने लगता है? कैसे हजारों-लाखों लोग उसके एक इशारे पर उसकी बात मानने को तैयार हो जाते हैं? कैसे किसी अदना से व्यक्ति के पार धार्मिक कृत्य में संलिप्त होते ही अकूत संपत्ति जमा हो जाती है? इस पर भी चर्चा की जानी चाहिए कि आखिर मात्र हिन्दू धर्म से सम्बंधित संतों-साध्वियों को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा है? मीडिया में, समाज में, जागरूक कहे जाने वाले वर्ग में आलोचनाओं का शिकार आखिर महज हिन्दू धर्म ही क्यों होता है? ये भी गहन शोध का विषय है कि कहीं ऐसे लोगों को हिन्दू धर्म को बदनाम करने के लिए अराजक तत्त्वों की तरफ से धन मुहैया तो नहीं करवाया जाता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि ये व्यक्तियों की धर्म सम्बन्धी कमजोर नस को पकड़ कर पहले उसकी भावनाओं के साथ स्वयं का तादाम्य स्थापित करते हैं और फिर धर्म के उच्च बिन्दु पर बैठने के बाद हिन्दू धर्म को रसातल में ले जाने के लिए संदेहास्पद कृत्यों में संलिप्त हो जाते हैं?

धर्म के नाम पर पाखण्ड फैलाते ये साधु, संत, साध्वियाँ जितने दोषी हैं उनसे कहीं कम वे लोग भी नहीं हैं जो इनके दरबारों को सजाने में लगे रहते हैं; इनके क्रियाकलापों को देव-क्रिया मानकर उनका अनुसरण करने लगते हैं; उन्हीं को भगवान समझकर उनके आगे नतमस्तक हो जाते हैं. जीवन की छोटी से छोटी ख़ुशी, समस्या के लिए ऐसे ढोंगियों का मुँह ताकना, इनके भरोसे अपनी जिन्दगी के फैसले करना, इन्हीं की तथाकथित दयादृष्टि पर अपने आपको निर्भर कर लेना आदि भी इनको समाज में स्थापित करवाता है. ऐसे में जबकि उनको आदर, सम्मान के उच्च पायदान पर बैठा दिया जाता है तब उनके विरुद्ध किसी भी तरह के आरोप समाज में वैमनष्यता को जन्म देते हैं. सामाजिक सौहार्द्र बिगाड़ने वाले प्रदूषकों के रूप में सामने आते हैं. ऐसे लोगों के विरोध के साथ-साथ चर्चा छिड़ जाती है कि गैर-हिन्दू धर्म के पाखंडियों को क्यों नहीं पकड़ा जाता है? क्यों नहीं गैर-हिन्दू धार्मिक व्यक्तियों को कानूनी शिकंजे में जकड़ा जाता है? क्यों नहीं हिन्दू धर्म की कुरीतियों के नाम पर जबरन धर्मान्तरण करवाने वालों के विरुद्ध कार्यवाही की जाती है? ऐसे अन्य दूसरे सवाल भी समाज में विभेद पैदा करते हैं. एक दायित्व सामाजिक रूप से सक्रिय व्यक्तियों का भी बनता है कि वे समाज में अपने क्रियाकलापों, धार्मिक अनुष्ठानों, धर्म के नाम पर लोगों को बहकाने वाले ढोंगियों का पर्दाफाश करें. लोगों को धर्म के नाम पर पाखंड कर रहे व्यक्तियों की वास्तविकता से परिचित करवाकर धर्म के साथ होने वाले खिलवाड़ को रोकने में मददगार बनें. ऐसा सबको समवेत रूप से करना होगा, भले ही वो किसी भी धर्म,जाति का ही क्यों न हो?

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