23 April 2011

महिलाओं की प्रस्थिति पर विचार महिलायें भी करें


आजकल बैडमिंटन में महिला खिलाडि़यों के स्कर्ट पहनने को लेकर आये आदेश के बाद से चारों तरफ खींचातानी का माहौल है। इस तरह के आदेशों पर हो-हल्ला ही नहीं मचना चाहिए बल्कि इस तरह के आदेशों के रद्द करवाने के सम्बन्ध में बाकायदा विरोध होना चाहिए।


इस ड्रेस कोड को लेकर हंगामा हो रहा है और इस बात का भी विरोध हो रहा है कि आयोजक मानते हैं कि इससे खेल में ग्लैमर बढ़ेगा और विज्ञापनों की संख्या में भी वृद्धि होगी। जागरूक महिलाओं और इन महिलाओं के शुभचिन्तकों की ओर से इस फैसले का विरोध होना स्वाभाविक था और हुआ भी। (हमें वैसे भी इस इंटरनेट की दुनिया में महिला-विरोधी मानसिकता का बताया जाता रहा है, ऐसे में हम कितना भी इन महिलाओं के पक्ष में लिखें तो भी नतीजा वही रहता है, ढाक के तीन पात वाला)


बहरहाल, विरोध के बीच कुछ बिन्दुओं को भी देखा जाये तो इन झंडा उठाये महिलाओं को कुछ और बिन्दू भी दिखाई देने लगेंगे। स्कर्ट को पहनने का विरोध हुआ उधर आई0पी0एल0 के चैथे संस्करण में चीयर बालाओं ने अपने ठुमके मारने जारी रखे। न्यायालय के आदेश के बाद भी कपड़ों की नाप उनके पूरे शरीर की नहीं ली जा सकी। वैसे भी कितना और क्या पहनना है यह तो वही बतायेगा/निर्धारित करेगा जिसे पहनना है, इस अधिकार से प्रत्येक टीम के लिए, प्रत्येक खिलाड़ी के कारनामें पर ठुमके मारती बालायें कपड़ों की नाप का पूरा ध्यान रखे हैं।

स्कर्ट लागू करने के पीछे आयोजकों की मंशा और आई0पी0एल0 में ठुमकती बालाओं की उपस्थिति के कुतर्क के पीछे से एकसूत्र यह निकलता है कि जो कुछ हो रहा है वह खेल को ग्लैमर प्रदान करने के लिए और दर्शकों के मनोरंजन के लिए। चलिए, अच्छा है किसी ने तो खेल के साथ एक और प्रकार का मनोरंजन तो सोचा पर इस सोच में भी आयोजकों ने अपनी संकुचित सोच दिखा दी। उन्होंने महिला दर्शकों को तो भुला ही दिया। यदि खेल में स्कर्ट का पहनना, चीयर बालाओं का ठुमकना मनोरंजन है, खेल का ग्लैमर है, दर्शकों का मनोरंजन है तो यह सब महिलाओं के लिए क्यों नहीं?


इसके लिए होना यह चाहिए था कि चीयर बालाओं के साथ कुछ अधनंगे से लालाओं को भी मैदान में ठुमकना चाहिए था। होना यह भी चाहिए था कि स्कर्टनुमा कोई पोशाक पुरुष खिलाडि़यों को भी पहननी चाहिए थी। इसका अर्थ यह लगाया जाये कि


महिलायें भी महिलाओं को अर्द्धनग्न रूप में देखना पसंद करती हैं?


महिलाओं को पुरुषों को इस रूप में देखना पसंद नहीं?


मैदान पर महिलायें अपनी उपस्थिति सिर्फ देह के रूप में ही करने जाती हैं?


बाजार में अब महिलायें सिर्फ और सिर्फ उत्पाद के रूप में स्थापित हो चुकी है?


अर्थ तो बहुत से निकाले जा सकते हैं और निकलने भी चाहिए किन्तु इसके पीछे छिपे मन्तव्य को, आयोजकों की मंशा को, कम से कमतर होते जा रहे कपड़ों में बिना बात ठुमकती बालाओं के हितों को, महिलाओं की बाजार के उत्पाद में परिवर्तित होती छवि के बारे में भी विचार करना होगा। विचार महिलायें भी करें और बिना इस पूर्वाग्रह के करें कि यह पोस्ट किसी पुरुष ने लिखी है, कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने लिखी है।


दोनों चित्र गूगल छवियों से साभार

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