30 December 2015

सुलझाएँ किसानों की समस्याओं को


देश के लगभग हर राज्य में किसान अपनी समस्याओं से पीडि़त हैं और सरकारी तन्त्र द्वारा उनकी समस्याओं के समाधान की बात तो की जाती है किन्तु किसी प्रकार का समाधान उनके द्वारा होता दिखता नहीं है. उत्तर प्रदेश के बुन्देलखण्ड क्षेत्र में भी किसान बुरी तरह से समस्याग्रस्त हैं. विगत कई वर्षों से यहाँ के किसानों की स्थिति बहुत खराब बनी हुई है. कृषि कार्य में अनियमितता, बैंक ऋण की समस्या, बाजार से फसल का सही मूल्य न प्राप्त होना, मजदूरी आदि के अवसरों का लगातार कम होते जाने की अनेकानेक समस्याओं के साथ-साथ सरकार की ओर से किसी तरह की राहत न मिलने, कृषि हेतु पर्याप्त अनुदान न मिलने, बैंक ऋण में रियायत अथवा माफी न होने आदि के कारण भी यहाँ के किसान लगातार गरीबी, बदहाली, भुखमरी की मार सह रहे हैं. इन समस्याओं के निस्तारण न होने से, कोई रास्ता न दिखाई देने से वे आत्महत्या जैसा अमानवीय एवं कठोर कदम उठा रहे हैं. बुन्देलखण्ड के किसानों द्वारा आत्महत्या का सरकारी आँकड़ा अपने आपमें चैंकाने वाला तो है ही साथ ही वीभत्स भी है. सरकारी रूप में जारी आँकड़ों के अनुसार प्रतिवर्ष पाँच सौ की संख्या से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है. इसके बाद भी न तो सरकार का ध्यान बुन्देलखण्ड के किसानों की ओर जा रहा है और न ही किसी राजनैतिक दल ने हताश-निराश किसानों की सहायता के लिए अपने कदम बढ़ाये हैं.
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देखा जाये तो सरकारी अनियमितताओं की तरह ही मौसम भी किसानों के साथ अत्याचार करने लगा है. विगत कई वर्षों के मौसम को देखा जाये तो ऐसा लगता है मानो इंसानी फितरत की तरह ही मौसम अपनी फितरत बदलने में माहिर हो गया है. गर्मी के मौसम में बारिश, सर्दी के मौसम में देर तक सर्दी का एहसास न होने देना, वर्तमान में बुन्देलखण्ड इस सर्दी के मौसम में भी तेज धूप से गुजर रहा है. फसलों को पकने में जिस मौसम की अपेक्षा होती है वैसा न मिलने से फसलों की वृद्धि में गिरावट साफ़-साफ़ देखने को मिल रही है. मौसम के इस तरह असमय अपने अनियमित रंग दिखाने से किसान बुरी तरह से मायूस हैं, हताश हैं और कई किसानों ने विगत दिनों इसी हताशा, निराशा में आत्महत्या तक कर ली है. ऐसे आपदा भरे दौर में जहाँ किसानों को किसी तरह की सरकारी अथवा गैर-सरकारी सहायता मिलना सुलभ नहीं हो रहा था वहाँ राष्ट्रीय स्तर के एक अभियान और एक स्वनामधन्य सामाजिक संस्था द्वारा बुन्देलखण्ड के किसानों के साथ भद्दा मजाक करते हुए उन्हें घास की रोटी खाने को विवश बताया गया. चूँकि विगत कई वर्षों से पृथक बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण की माँग उठती रही है, जिसके चलते विभिन्न राजनैतिक दलों द्वारा, अनेक स्वार्थी स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा इस माँग से अपनी आवाज मिलाने का भरसक नाटक किया जाता है किन्तु मुसीबत में घिरे किसानों के पक्ष में कोई खड़ा नहीं दिखा. घास की रोटी खाने को दिखाना भी कुछ इसी तरह का कदम है जो संभव है कि किसी प्रोजेक्ट के लिए, किसी विदेशी संस्था से फंड प्राप्ति के लिए उठाया गया है न कि किसानों की मदद के लिए. असलियत से दूर ये सर्वे बुन्देलखण्ड क्षेत्र के किसानों के साथ मजाक है, उनकी मजबूरी के साथ खिलवाड़ है, उनकी समस्याओं के समय में जले पर नमक छिड़कने के समान है.
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विद्रूपता ये है कि इन हालातों में सरकार द्वारा किसानों के लिए सार्थक कदम नहीं उठाये जा रहे हैं. मुआवजे के नाम पर खिलवाड़ लगातार चल रहा है. चंद रुपयों के द्वारा सरकारें अपनी सहायता करने का दंभ भरती हैं. इसके अलावा राज्य सरकारों का अपना-अपना रोना है और आरोपों का ठीकरा केंद्र पर फोड़ दिया जाता है. इस तरह के कदमों से किसानों का भला नहीं होने वाला है. सरकारों को चाहिए कि तत्काल मशीनरी को संवेदित करते हुए जमीनी सर्वे करवाकर किसानों को तुरंत राहत और पर्याप्त मुआवजा दिलाया जाये. यहाँ विचारणीय है कि यदि इन किसानों की जगह कोई औद्योगिक आपदा आ गई होती तो सरकारों ने न जाने कौन-कौन से राहतकोष खोल दिए होते. आज भले ही कृषि में उद्योगों की तरह मुनाफा नहीं है किन्तु ये बात सबको याद रखनी होगी कि कृषि देशभर को खाद्यसामग्री उपलब्ध करवाती है, उसे उद्योग अथवा मुनाफाखोरी करने का साधन माना भी नहीं जाना चाहिए. इसके बाद भी सरकार से अपेक्षा की जाती है कि वो किसानों को उद्योगपति समझते हुए, कृषि को उद्योग मानते हुए इस बारे में सजगता से काम करे. ऐसा न होने की दशा में ये किसानों के भविष्य के लिए, उनके परिवार के लिए, उनके जीवन के लिए सही नहीं होगा. वर्तमान हालातों में इन बातों पर चर्चा कर लेने से किसानों की समस्याओं का हल नहीं निकलने वाला है. सरकारों को, चाहे वो केंद्र सरकार हो अथवा राज्य सरकारें, मिलजुलकर किसानों के हितार्थ योजनों को महज बनाने की नहीं वरन उन्हें तत्काल प्रभाव से लागू करने की जरूरत है. हम सबको भी नियंत्रित, निष्पक्ष भाव से एक नागरिक समझकर ही किसानों की मदद को आगे आयें. जिस तरह का राजनैतिक परिदृश्य वर्तमान में दिख रहा है उससे नहीं लगता है कि कोई भी सरकार निष्पक्ष रूप से किसानों की सहायता के लिए मुक्त-हस्त से आगे आएगी. इन सबका असर कहीं न कहीं किसानों को  मिलने वाली मदद, मुआवजे पर ही पड़ेगा. कुछ समय राजनीति न करते हुए किसानों के हितार्थ एकजुट हो लिया जाये; सरकार को जगाने के लिए खड़ा हो लिया जाये.

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