सोशल मीडिया और फोटो का चस्का.
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बहुतेरे लोगों को इस 'चस्का'
शब्द पर आपत्ति होगी और वे ज्ञान ठेलने
चले आयेंगे. इससे पहले कि ऐसे लोग अपना ज्ञान ठेलें, उनमें इस चस्का की असलियत पेल देते हैं.
हम सब लगभग रोज ही देखते हैं कि किसी न किसी दुखद समाचार पर पीड़ित परिवार से मिलने
नेता बिरादरी पहुँचती है. सांसद-विधायक टाइप लोग भी होते हैं तो पदाधिकारी और कार्यकर्त्ता
टाइप भी. दुखद समाचार कभी किसी के निधन का होता है, कभी त्रयोदशी का, कभी किसी दुर्घटना का..... ऐसे किसी भी दुखद समाचार के
सन्दर्भ में अपनी संवेदना प्रकट करने वाले लोगों के चेहरे पर मुस्कान तैरती ही रहती
है.
इन संवेदनात्मक रूप से भरे बैठे लोगों को कोई ये समझाए कि किसी के निधन पर,
किसी की त्रयोदशी पर शोक-संवेदना प्रकट
की जाती है. ऐसे में पहले तो फोटो सेशन से बचना चाहिए और यदि फोटो खिंचवाने का,
सोशल मीडिया में अपलोड करने का लोभ संवरण
नहीं हो पा रहा है तो कम से कम अपनी हँसी-मुस्कान को अपने काबू में रख लिया करें. हर
जगह फोटो खिंचवाने पर हँसना अनिवार्य नहीं होता है.
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