23 June 2018

वे अपने रंग में हैं, तुम अपने रंग संभालो


लोकसभा चुनावी वर्ष चालू है और राजनैतिक दलों की समस्त गतिविधियाँ अब चुनावी मंशा से संपन्न होंगी. सत्ताधारी दल का प्रयास है कि वह अपनी स्थिति को मजबूत बनाये रहे वहीं विपक्षी इस प्रयास में हैं कि कैसे भी सत्ताधारी दल को हटाया जाये. विपक्षियों का प्रयास सत्ताधारी दल से अधिक जोर मोदी को हटाने को लेकर है और इसके लिए हर तरीके से कार्य, प्रयास उनकी तरफ से किये जाने लगे हैं. गठबंधन, महागठबंधन की रणनीति के साथ-साथ आतंकियों के समर्थन की, मुस्लिम तुष्टिकरण की, गैर-हिन्दू वर्ग, विशेष रूप से मुस्लिमों से सम्बंधित खबरों को अनावश्यक तूल देने के कार्य अभी से किये जाने लगे हैं. कुछ पुराने मुद्दों को उछाला जाने लगा है. धनबल से, बाहुबल से, जुबानीबल से जनता के बीच भ्रम का माहौल पैदा किया जाने लगा है. इस भ्रम के माहौल से ज्यादा विपक्षियों द्वारा नफरत का, हिंसा का, विद्वेष का, भेदभाव का माहौल बनाया जा रहा है. कुछ हालिया घटनाओं को इस सन्दर्भ में देखा-समझा जा सकता है.


जम्मू-कश्मीर से भाजपा द्वारा समर्थन वापस लिया जाना न केवल वहां के राजनैतिक दलों को अचंभित कर गया बल्कि शेष राजनैतिक दलों में भी खलबली मचा गया. केन्द्र सरकार द्वारा जिस तरह से विगत रमजान माह में आतंकियों के विरुद्ध सैन्य कार्यवाही को रोके रखा गया उसका कोई सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आया. आतंकियों द्वारा, पाकिस्तान द्वारा इसका खूनी लाभ लिया गया और इसका खामियाजा हमारी सेना को उठाना पड़ा. हमारे कई जवान सरकारों की जबरिया पाकसाफ दिखने की चाह में शहीद हो गए. ऐसे में देश भर में भाजपा के खिलाफ, केन्द्र सरकार के खिलाफ माहौल बनता जा रहा था. जो लोग भी देश के साथ खड़े दिख रहे थे, जो लोग भी सेना के साथ खड़े दिख रहे थे उनके द्वारा पुरजोर आवाज़ उठाई गई कि आतंकियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जाये, पाकिस्तान के खिलाफ कार्यवाही की जाये. ऐसी विषम स्थिति के बाद भाजपा का जम्मू-कश्मीर की सरकार में बने रहना उसकी बेशर्मी को ही दर्शाता. केन्द्र सरकार और भाजपा का थिंक टैंक इस बात को समझता है कि चुनावी वर्ष में उसके द्वारा बेशर्मी का नुकसान सिर्फ और सिर्फ उसे ही उठाना होगा क्योंकि विपक्षी दल इसी का लाभ लेकर जनता के बीच नकारात्मकता का प्रचार करने लग जायेंगे. जम्मू-कश्मीर में समर्थन वापसी ने उन दलों में भी बौखलाहट भी पैदा की, जो किसी न किसी रूप में मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए आतंकियों का, धारा 370 का, पाकिस्तान का समर्थन करते रहते हैं. खुद महबूबा ने वहां के वोट-बैंक को अपने पक्ष में बनाये रखने के सन्दर्भ में बयान दिया कि केंद्र सरकार द्वारा, भाजपा द्वारा धारा 370 हटाये जाने का उन्होंने विरोध किया. कश्मीर के पत्थरबाजों को उनके प्रयासों से ही सजा नहीं हो पाई. इसी तरह एक वरिष्ठ राजनीतिज्ञ द्वारा बयान दिया जा रहा कि सेना द्वारा निर्दोष लोगों को मारा जा रहा है. विद्रूपता देखिये कि उस बयान के समर्थन में, देश की सबसे पुरानी पार्टी के बयान के समर्थन में एक आतंकी संगठन ने अपनी सहमति व्यक्त की है. इससे बड़ी विडम्बना यह कि उस दल द्वारा अथवा किसी राजनैतिक दल द्वारा आतंकी संगठन के उस समर्थन के विरोध में कोई बयान ज़ारी नहीं किया गया.

ये एकमात्र स्थितियाँ नहीं हैं जो दर्शा रही हैं कि चुनावी वर्ष में गैर-भाजपाई दल अनावश्यक बयानों को जारी करेंगे. उनके द्वारा भाजपा का विरोध कब देश का, सेना का विरोध बन गया, खुद उनको भी नहीं पता. इस तरह की स्थिति को मीडिया द्वारा भी बखूबी हवा दी जाती है. मीडिया को सिर्फ और सिर्फ अपनी टीआरपी से मतलब नहीं होता है वरन उसे मतलब है भाजपा-विरोधी हवा से, उसे मतलब है मोदी-विरोधी लहर से, उसे मतलब है हिन्दू-विरोधी खबरों से. ऐसे में केन्द्र सरकार के मंत्रियों को और ज्यादा सजग रहने की, सतर्क रहने की, संयमित रहने की आवश्यकता है. विपक्षियों द्वारा, मीडिया द्वारा मुद्दे न केवल जन्मे जायेंगे बल्कि पुराने मुद्दों को भी उखाड़ा जायेगा. केन्द्र सरकार को, भाजपा को, उसके संगठन को, पदाधिकारियों को उलझाने के प्रयास भी किये जायेंगे. ऐसे में आवश्यक है कि बजाय भटकने के, स्पष्टीकरण देने के जनता से मिलते-मिलाते रहने का काम किया जाता रहे. बजाय विरोधियों को अनावश्यक जवाब देने में उलझने के जनता के बीच जाकर उनके भ्रम को, उनके सवालों को, उनकी समस्याओं को दूर किया जाये. हाल ही में उत्पन्न मुस्लिम दंपत्ति पासपोर्ट काण्ड को इसी सन्दर्भ में देखे जाने की आवश्यकता है. सम्बंधित महिला द्वारा और मीडिया द्वारा जबरिया मुस्लिम कार्ड बनाकर उछाले गए इस प्रकरण से महज एक दिन में पासपोर्ट बनाकर दिया गया, वो भी बिना किसी दस्तावेजी प्रक्रिया को पूर्ण किये बिना. केंद्र सरकार के मंत्रियों को यही समझने की जरूरत है. जल्दबाजी में, तुष्टिकरण में, खुद को धर्मनिरपेक्ष दिखाने के चक्कर में ऐसे कदम भविष्य में विरोधियों को एक तरह का हथियार उपलब्ध करवाएंगे जो भाजपा के, उनके मंत्रियों के खिलाफ ही जायेगा. यदि केंद्र सरकार के लिए वाकई देशहित सर्वोपरि है तो उनके मंत्रियों को जमीन पर उतर कर कार्य करने की जरूरत है. जनता से संवाद बनाने की जरूरत है. अपनी अतिशय जल्दबाजी पर नियंत्रण लगाने की जरूरत है. खुद को संयमित रखने की जरूरत है. उनका एक गलत कदम देश को फिर उसी स्थिति में लाकर खड़ा कर देगा, जहाँ से बाहर निकालने का प्रयास केन्द्र सरकार द्वारा, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किया जा रहा है.

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