09 May 2018

एक उद्देश्यपरक, समाजोपयोगी परियोजना की भ्रूण हत्या


सुनने-पढ़ने में अवश्य ही आप लोगों को अटपटा लग रहा होगा पर सच यही है. हमें भी उस समय अटपटा सा लगा था जबकि पता चला कि बुन्देलखण्ड लोक मंच को बंद किया जा रहा है. यह सुनने में जितना अटपटा लगा उससे कहीं अधिक झटका सा देने वाला भी लगा. झटका इसलिए भी लगा क्योंकि लोक मंच के द्वारा वरिष्ठजन मिलन केंद्र में दो दिन पहले ही महेश सक्सेना जी से मुलाकात के दौरान भावी योजनाओं पर विस्तार से चर्चा हुई थी. वे आगामी एक-दो माह में ही यहाँ कम्युनिटी रेडियो का शुभारम्भ करवाने वाले थे. इसके साथ-साथ उनके द्वारा जनपद की बेटियों के लिए अत्यंत सस्ते दरों में सेनेटरी पैड की व्यवस्था करवाने के साथ-साथ उरई में ही मशीन स्थापित करवाने की योजना थी. उसी समय उनके सहयोगी सज्जन द्वारा आर्थिक सहायता भी मंच को उपलब्ध कराई गई. ऐसे कदमों के बाद मंच का बंद किया जाना झटका देने वाला ही है.


बुन्देलखण्ड लोक मंच से हमारा कोई जुड़ाव नहीं था. एक तो हमारे पास ऐसी कोई सूचना कभी आई नहीं जो इससे जुड़ने का सन्देश देती दूसरा इसके स्थानीय ट्रस्टियों को हमारी अपनी छवि ने भयाक्रांत कर रखा है. जुड़ाव न होने के बाद भी हमारे मित्रों से इसकी गतिविधियों की जानकारी मिलना और पिछले कुछ माह से डॉ० आदित्य कुमार जी, जो हमारे अभिभावक स्वरूप हैं, के आदेश, निर्देश पर महेश सक्सेना जी से हुई कुछ मुलाकातों के बाद उनके उद्देश्यों, कार्यों, भावी योजनाओं की निस्वार्थ छवि ने बुन्देलखण्ड लोक मंच के प्रति आकर्षण जगाया. पिछले लगभग एक माह से मंच के तत्त्वावधान में संचालित वरिष्ठजन मिलन केन्द्र की व्यवस्था की अघोषित जिम्मेवारी आदित्य अंकल द्वारा हमारे कंधों पर डालने से भी इस तरफ झुकाव हुआ.

ये सच है कि फरवरी 2017 में जिस उत्साह से महेश सक्सेना जी ने समाजोपयोगी उद्देश्य के साथ बुन्देलखण्ड लोक मंच की स्थापना की थी, उनका वह उत्साह बहुत जल्दी ही गायब हो गया. इसके पीछे का कारण उनका उचित व्यक्तियों के चुनाव की कमी होना रहा. आवश्यक नहीं कि अकादमिक, व्यापारिक, राजनैतिक, नौकरीपेशा क्षेत्र में सक्रिय, सफल व्यक्ति सामाजिक जीवन में भी सफल रहे. ये भी आवश्यक नहीं कि व्यावहारिक धरालत पर भी वह कार्यशील निकले. इस मंच के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. उम्र, अनुभव, नाम के आधार पर चयन करके लोक मंच का भव्य शुभारम्भ किया गया. उसके बाद तमाम सारी योजनाओं को अमल में लाने की योजना बनाई गई.

जैसा कि बहुतायत में होता है कि कमरे में बैठकर योजनायें तो बनाई जा सकती हैं मगर उनके क्रियान्वयन के लिए ठोस जमीन पर उतरना पड़ता है. बुजुर्गों के अनुभव योजनाओं में सही-गलत का आकलन भले कर लें मगर युवाओं के जोश के द्वारा ही कोई योजना वास्तविक स्वरूप पाती है. बुन्देलखण्ड लोक मंच के स्थानीय ट्रस्टी किसी भी कीमत पर युवाओं को जोड़ने को तैयार नहीं दिख रहे थे. हम जैसे कई नामों पर इन लोगों की बुलंद असहमति प्रकट की जाती रही. इसके अलावा बहुतायत अवसरों पर उनके द्वारा धन खर्चने में भी कंजूसी दिखाई गई जबकि महेश सक्सेना आरम्भ से ही विश्वास दिलाते रहे कि आर्थिक समस्या नहीं रहने दी जाएगी, बस काम वास्तविक रूप में हो, निस्वार्थ भाव से हो, समाजोपयोगी हो, धरालत पर दिखे. कम्प्यूटर प्रशिक्षण, सिलाई-कढ़ाई प्रशिक्षण, कम्युनिटी रेडियो, अन्नपूर्णा रसोई, वृद्धाश्रम, वरिष्ठजन मिलन केन्द्र आदि जैसी न जाने कितनी योजनायें बुन्देलखण्ड लोक मंच की तरफ से अमली जामा पहनने के लिए बनाई गईं. कुछ योजनायें शुरू हुईं मगर युवा टीम, आपसी विश्वास, समर्पण, भरोसे की कमी के चलते दो-चार महीने में ही वे योजनायें बंद हो गईं.


इस बीच मार्च के पहले सप्ताह में वरिष्ठजन मिलन केंद्र का शुभारम्भ किया गया. इसका भी वैसा ही हाल होने जा रहा था जैसा कि बाकी योजनाओं का हो रहा था मगर डॉ० आदित्य कुमार जी के प्रयासों से पिछले लगभग एक माह से यह मिलन केन्द्र आकार लेने लगा था. वरिष्ठजनों की संख्या में वृद्धि हो रही थी. उनके द्वारा जानकारियों, सूचनाओं, अनुभवों का आदान-प्रदान किया जा रहा था. वरिष्ठजन स्वस्थ मनोरंजन और मुलाकात के भाव से नियमित रूप से यहाँ उपस्थित हो रहे थे. बुन्देलखण्ड लोक मंच के बंद कर देने की खबर ने मिलन केन्द्र से जुड़े इन सभी लोगों को भी झटका सा दिया.

महेश सक्सेना जी नॉएडा में भी पिछले दो दशकों से बिना किसी सरकारी आर्थिक सहयोग के नॉएडा लोक मंच संचालित कर रहे हैं. इस मंच के द्वारा कम्युनिटी रेडियो, विद्यालयों का सञ्चालन, शवदाह गृह की व्यवस्था सहित अनेकानेक प्रकल्प सफलतापूर्वक चलाये जा रहे हैं. ऐसे व्यक्ति द्वारा बिना किसी तरह के आर्थिक लाभ की आशा के एक उद्देश्यपरक परियोजना उरई में शुरू की गई मगर वह यहाँ के नागरिकों की मानसिकता के चलते मूर्त रूप न पा सकी. हालाँकि कुछ माह पूर्व महेश सक्सेना जी को उनकी हताशा-निराशा की स्थिति में डॉ० आदित्य कुमार जी के निर्देशन में हम मित्रों ने उनको सकारात्मक सहयोग का भरोसा दिया था मगर शायद वे स्थानीय मुख्य ट्रस्टियों के व्यवहार और कार्यशैली से जबरदस्त नाराज हो गए थे. तभी उनके द्वारा वरिष्ठजन मिलन केंद्र का सफल सञ्चालन देखने के बाद, स्वयं उनके द्वारा सराहना करने के बाद भी हम लोगों को बुन्देलखण्ड लोक मंच के सञ्चालन की जिम्मेवारी नहीं दी गई.

बहरहाल, बुन्देलखण्ड लोक मंच की स्थापना महेश सक्सेना जी का निर्णय था जिसके क्रियान्वयन के लिए उन्होंने यहाँ के कमरों में सक्रिय रहने वाले कुछ महानुभावों पर विश्वास किया. ऐसे लोगों के स्वभाव, संकुचित कार्यशैली, पूर्वाग्रही मानसिकता के कारण जनपद जालौन एक उद्देश्यपरक, समाजोपयोगी परियोजना को खो बैठा.


1 comment:

Dr.Aditya Kumar said...

सही विवेचना