07 July 2019

ज़िन्दगी और जीवन के बारीक अंतर को समझना होगा


ज़िन्दगी और जीवन भले ही देखने-सुनने में एक जैसे समझ आते हों मगर दोनों के स्वभाव में, प्रवृत्ति में बहुत बारीक सा अंतर है. इस बारे में दार्शनिक रूप में बहुत कुछ कहा जा सकता है, बहुत कुछ लिखा जा सकता है, बहुत कुछ बताया जा सकता है. इसके बाद भी असलियत बहुत बारीक सी रेखा के आसपास ही घूमती रहती है. इसे बहुत दार्शनिक शब्दों में न कहते हुए बहुत ही सरल शब्दों में ऐसे समझा जा सकता है कि जीवन वह है जो हमें मिला है और ज़िन्दगी वह है जो हम गुजारते हैं. इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि इंसानों के अलावा जीवन वनस्पतियों में भी होता है, जानवरों में भी होता है, पक्षियों में भी होता है. इसके उलट ज़िन्दगी कितने लोग बिताते हैं? क्या आपको लगता है कि ज़िन्दगी एक पौधा बिताता है? क्या आप समझते हैं कि एक पेड़ ज़िन्दगी बिताता है? आपको क्या लगता है कि कोई जीव-जंतु, पशु-पक्षी ज़िन्दगी का आनंद उठाता है? बहुसंख्यक लोग इसका जवाब देने के पहले जीवन और ज़िन्दगी में ही भटकते नजर आयेंगे. 

असल में अभी हममें से बहुत से लोग ज़िन्दगी और जीवन में अंतर करना ही नहीं सीख सके हैं. उनके लिए दोनों शब्द एक अर्थ में प्रयुक्त होते हैं जबकि ऐसा नहीं है. जीवन वो है जो हमें जन्म देता है, हमें सांसे देता है और इसके उलट ज़िन्दगी वह है जो हम जन्म के बाद गुजारना शुरू करते हैं, हर एक साँस के सहारे आगे ले जाना शुरू करते हैं. ज़िन्दगी और जीवन का ये दर्शन जिसकी समझ में आ जाता है वही असल में अपने जीवन का भी आनंद लेता है, ज़िन्दगी का भी आनंद लेता है. ऐसे में बहुत से लोगों को जरा सी नाकामी पर अपनी ज़िन्दगी को दोष देते, उसे कोसते हुए देखा जाता है. क्या वाकई ज़िन्दगी के कारण ऐसा हुआ? बहुत से लोग जीवन-शैली के बाहरी आवरण को देखने के साथ ही उसे ज़िन्दगी से परिभाषित करते हैं और किसी भी व्यक्ति के जीवन को ज़िन्दगी से जोड़ते हुए उसे अच्छा या बुरा बनाते हैं. असल में ज़िन्दगी उस व्यक्ति के द्वारा खुद के आकलन का विषय है. एक गरीब से गरीब व्यक्ति भी अपने जीवन को भले ही अभावों में गुजार रहा हो मगर वह अपनी ज़िन्दगी से खुश रहता है. इसी तरह एक बहुत ही धन-संपन्न, सत्ता-संपन्न, अधिकार-संपन्न व्यक्ति अपने जीवन को बहुत ही प्रभावी ढंग से बिता रहा हो मगर आवश्यक नहीं कि वह अपनी ज़िन्दगी को भी उसी खुशनुमा तरीके से बिता रहा हो. ज़िन्दगी और जीवन का यही बारीक अंतर समाज में तमाम सारी बुराइयों, परेशानियों, समस्याओं का कारण बना हुआ है.

No comments: