26 February 2018

भ्रष्टाचार-मुक्ति के लिए नैतिकता चाहिए


शिक्षा समाप्ति के बाद दिमाग में प्रशासनिक सेवा में जाने का कीड़ा कुलबुला रहा था. उसके साथ-साथ खुद को आर्थिक आधार पर खड़ा करने की सोच भी काम कर रही थी. नब्बे के दशक में बहुत सारी स्थितियाँ सहायक सिद्ध होती थीं तो बहुत सी स्थितियाँ विपरीत दिशा में काम करती थीं. उनकी सहायक और असहायक स्थितियों से जूझते हुए प्रशासनिक परीक्षाओं की तैयारी के साथ-साथ अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारियाँ चलती रहतीं. उरई जैसे छोटे शहर में प्रतियोगी परीक्षाओं का माहौल जिस तरह का था उसके अनुसार खुद को सक्षम बनाते हुए आगे बढ़ने की कोशिश चलती रहती. इसी कोशिश के कई प्रतियोगी परीक्षाओं में साक्षात्कार देने की स्थिति भी बनी, ये और बात है कि अंतिम रूप से सफलता उनमें किसी में भी न हाथ लगी.


ऐसी ही एक स्थिति उस समय बनी जबकि बैंकिंग भर्ती बोर्ड के अंतर्गत भारतीय स्टेट बैंक में सेवाएँ देने के लिए साक्षात्कार से सामना करना पड़ा. कई सारे सवालों-जवाबों के आदान-प्रदान के बीच उस साक्षात्कार लेने वाले बोर्ड के अध्यक्ष ने किसी बात पर कहा कि बैंक में कोई अवसर ही नहीं, कोई भ्रष्टाचार करेगा कैसे? उस समय उनकी बात पर सहमति भी व्यक्त की. बैंक को तत्कालीन स्थितियों में इस कारण भी हमको बहुत सहज नौकरी दिखती थी क्योंकि हमारे तीनों चाचा लोग भारतीय स्टेट बैंक में अपनी सेवाएँ दे रहे थे. उनका सहज तरीके से अपनी नौकरी करना, परिवार को समय देना और बाकी के उत्तरदायित्वों का निर्वहन भी सहजता से होता दिखता था. ये और बात है कि समय के साथ-साथ बैंक की नौकरी भी कष्टप्रद साबित होने लगी. बहरहाल, नब्बे के दशक के उस दौर में बैंक में किसी तरह के घोटाले की, भ्रष्टाचार की बात कोई सोचता नहीं था. हालाँकि इसी दौर में देश का सबसे बड़ा शेयर घोटाला हुआ था, जिसे बैंक के नियमों का फायदा उठाकर अंजाम दिया गया था तथापि इसमें भी बैंकों की कार्यप्रणाली पर संदेह नहीं किया गया था.

अभी पिछले दिनों पंजाब नेशनल बैंक और अब ओरिएंटल बैंक और कॉमर्स में 390 करोड़ रुपये का घोटाला सामने आया है. कहा जा रहा है कि इसकी शिकायत लगभग छह महीने पहले ही की जा चुकी है मगर मामला अब दर्ज किया गया. फ़िलहाल इन घोटालों के पूर्व भी जबकि देश नोटबंदी जैसे कड़े सरकारी कदम से खुद को आगे बढ़ाने में लगा था तब कुछ बैंकों की कार्यप्रणाली ने, उनके अधिकारियों के रवैये ने ऐसा माहौल बनाया जिससे आम आदमी को विश्वास हो चला था कि बैंक भी घोटाले कर सकती हैं. नोटबंदी में जिस तरह से बैंकों और उनके अधिकारियों ने मिलीभगत से धन की अदला-बदली की उससे बैंक की निष्पक्ष कार्यप्रणाली पर से भरोसा उठने लगा था. इस उठते भरोसे को उस समय भी हवा मिली जबकि विजय माल्या करोड़ों का कर्ज लेकर देश से फरार हो गया. इसके बाद जैसे ही ये दो घोटाले सामने आये, आम जनमानस में धारणा बन गई कि बैंक और उनके अधिकारियों के सारे नियम-कानून आम आदमी के लिए हैं, सामान्यजन के लिए ही हैं. प्रभावशाली लोगों के लिए, रसूखदार लोगों के लिए बैंकों में भी किसी नियम का कोई मतलब नहीं है.

एक बात स्पष्ट है कि किसी भी संस्थान में तब तक कोई घोटाला, किसी भी तरह का भ्रष्टाचार नहीं हो सकता है जबकि उस सिस्टम में बैठा कोई जिम्मेवार स्वयं ही उसके लिए कोई कार्य न करे. बैंक से लोन का निकलना किसी विजय माल्या, किसी नीरव मोदी की हैसियत से बहुत बाहर की बात है. सरकारी नियमों, कायदों में कमियाँ निकालकर उसी कमी का फायदा दिलाने का काम वही व्यक्ति कर सकता है जो उस सम्बंधित सिस्टम से जुड़ा हुआ है. ऐसे में बैंक हों या फिर कोई भी संस्थान सभी में नियमों-कानूनों की अपनी स्थिति है मगर उसके बीच से सुराख़ खोजने का काम उसी के वर्तमान या पूर्व अधिकारी करते हैं. ऐसे में अपने उसी साक्षात्कार की घटना याद आती है तो लगता है कि संभव है कि नब्बे के दशक में जबकि औद्योगीकरण का दौर आरम्भ हुआ था, नई आर्थिक नीतियां अपना स्वरूप गढ़ने में लगी थीं, वैश्वीकरण की परिभाषा को नया लिबास पहनाया जा रहा था तब व्यक्ति में संस्कार, नैतिक मूल्य किसी न किसी रूप में जीवित बचे थे. आज पूर्ण रूप से खुद को आधुनिक और भौतिकवादी बनाने के साथ-साथ व्यक्तियों ने अपने-अपने नैतिक मूल्यों को तिलांजलि देने का काम भी किया है. यही कारण है कि आज हमारे बीच के लोग ही हमको नकली खाद्य-सामग्री बेचते हैं, जहरीला दूध बच्चों को पिलाते हैं, बिना गुणों की औषधि से इलाज किया जा रहा है, हर तरफ नकली, मिलावटी सामानों की भरमार है.

ये अवगुण अचानक नहीं जन्मे हैं. इनके जन्मने में हमारे आसपास का वातावरण बहुत प्रभावी रहा है. पड़ोसी को आये दिन आर्थिक तरक्की करते देखकर, उसके मकान को बढ़ता देखकर, उसकी कारों का काफिला लम्बा होता देखकर दूसरा इन्सान भी उसी दिशा में कार्य करने लगता है. इसके लिए वो किसी भी कदम को उठाने से नहीं चूकता है. इसी भागमभाग में वह कब घोटालों, रिश्वत, भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने लगता है उसे खुद पता नहीं चलता है. सीधी सी बात है, जब तक कि व्यक्ति स्वयं में नैतिक मूल्यों का विकास नहीं करता है तब तक समाज से किसी भी तरह के घोटाले, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी को दूर करना असंभव ही है. आने वाले समय में शायद ही कोई संस्था ऐसी शेष रहे जो भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, घोटालों की चपेट में न आये. वैसे समाज के हित में यही है भी. आखिर जब तक भ्रष्टाचार का पैमाना पूरी तरह से नहीं भरेगा, जब तक एक-एक आदमी भ्रष्ट नहीं हो जायेगा तब तक समाज से भ्रष्टाचार का खात्मा करना सहज, संभव नहीं.

2 comments:

HARSHVARDHAN said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन वीर सावरकर और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

taknik drashta said...

नैतिकता ही तो नहीं आ रही है