13 November 2014

नैतिक शिक्षाविहीन व्यवस्था में नैतिकता की उम्मीद बेमानी है



शायद सामाजिक स्थिति वर्तमान में समझने-समझाने वाली मुद्रा से अनियंत्रित होकर सिर्फ देखते रहने की हालत में आ गई है. आधुनिकता के, नई सदी के, इक्कीसवीं सदी के नाम पर बनाये गए विभिन्न वैभवशाली विशेषणों के मध्य संस्कार, संस्कृति, सदाचार, नैतिकता आदि का लगातार पतन देखने को मिल रहा है. सब तरफ सिर्फ देह, हर ओर सिर्फ सेक्स, जिसे देखो वो उन्मुक्त, जिसका व्यवहार देखो वो उन्मादित, ऐसा लग रहा है जैसे समाज अब संबंधों, रिश्तों की मर्यादा पर नहीं वरन खुलेपन की अवधारणा पर विकास कर रहा है. रक्त-सम्बन्धियों के मध्य बनते शारीरिक सम्बन्ध, विवाहपूर्व और विवाहेतर शारीरिक सम्बन्ध, अनेक स्त्री-पुरुषों के सेक्स सम्बन्ध, मासूम बच्चियों से लेकर वृद्ध महिलाओं तक से दुराचार, स्वस्थ महिला से लेकर बीमार-असहाय महिलाओं तक को हवस का शिकार बनाया जाना आदि सामाजिक विकृति को ही दर्शाता है.
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युवा वर्ग पूरी तरह से स्वतंत्रता पाने को लालायित है, अपनी स्वतंत्र अभिव्यक्ति, भले ही किसी भी तरह से हो, किसी भी तरह की हो, को करने के लिए उत्साहित है, पुरानी पीढ़ी संस्कारों को ढोते रहने को विवश है, युवाओं को सीख देने के लिए प्रतिबद्ध है किन्तु सब के सब संज्ञाशून्य से कार्य करने में लगे हैं. युवा अपने प्रेम करने को जन्मसिद्ध अधिकार समझ कर प्रेमालाप में ‘किस ऑफ़ लव’ सरीखा आयोजन करने में मस्त हैं और उनकी पूर्वापर पीढ़ी कुढ़ते-कुढ़ते सामाजिक, नैतिक पतन की चर्चा करके अपनी खीझ निकालने में व्यस्त है. नैतिकता की बात करने के पूर्व इस बात पर भी गौर करना होगा कि आखिर नैतिकता आये कहाँ से? नैतिक शिक्षा कोई उद्योग जगत द्वारा निर्मित उत्पाद नहीं है, किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी द्वारा बनाया जाने वाला मल्टीनेशनल उत्पाद भी नहीं है कि जिसे आयात करवा लिया जाये, देशी-विदेशी कंपनियों से बहुतायत में उत्पादित करवा लिया जाये. नैतिकता एक तरह का व्यवहार है जो शिक्षा के द्वारा, घर-परिवार के संस्कारों से, आपसी सद्भाव आदि से नैसर्गिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होती है. आज विद्यालयों, महाविद्यालयों से नैतिक शिक्षा नाम का कोई भी विषय, कोई भी पाठ्येतर कार्य संपन्न नहीं करवाया जा रहा है. ऐसे में नैतिक शिक्षाविहीन पीढ़ी से किस तरह की नैतिकता की उम्मीद की जा सकती है?
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परिवारों को, माता-पिता को, बुजुर्गों को भी नैतिक शिक्षा प्रदान किये जाने का माध्यम समझा जाता रहा है किन्तु वर्तमान में इन माध्यमों को भी हाशिये पर लगा दिया गया है. आधुनिक माता-पिता आर्थिक चक्र में फँसकर दिन-रात मशीन बने घूम रहे हैं, जिन्हें भौतिकता की चाह ज्यादा है बजाय इस बात को जानने के कि उनके नौनिहाल कौन से और कैसे गुल खिला रहे हैं. बुजुर्गों की स्थिति बहुतायत परिवारों में आउटडेटेड सामान की भांति कर दी गई है, जिनकी बातों को, सीख को नई पीढ़ी न तो सुनना ही चाह रही है और न ही उन पर अमल करना चाह रही है. ऐसे में नैतिकता का प्रवाह बने तो कहाँ से और किसके द्वारा.
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वर्तमान में हालात यह हैं कि संस्कारों, संस्कृति, सभ्यता, ज्ञान, परिवेश आदि के बारे में जानकारी देने के लिए हर हाथ में मोबाइल है, हर हाथ में इंटरनेट है. जहाँ युवा, किशोर, बच्चे आदि अपने मन की शिक्षा भली-भांति ले रहे हैं. और यही कारण है कि जिस उम्र में शैक्षिक ज्ञानार्जन किया जाना चाहिए उस उम्र में बच्चे दैहिक-कुंड में गोते लगा रहे हैं; कम उम्र में लड़कियाँ गर्भपात करवाते देखी जा रही हैं; गोपन को अगोपन बनाकर सबकुछ खुलेआम करने की पुरजोर कोशिश की जा रही है; किताबें-खिलौने थामने वाले हाथ बीयर की बोतलें, शराब के जाम, जलती सिगरेट, तीव्र गति से भागती बाइक-कार, विपरीतलिंगी साथी का हाथ थामे मस्ती में भटक रहे हैं. ऐसे हालातों पर चिंतन नहीं सिर्फ चिंता हो रही है. नैतिक शिक्षाविहीन प्रणाली में नैतिकता की उम्मीद की जा रही है जो सर्वथा गलत, भ्रमपूर्ण है. बिना नैतिक शिक्षा के नैतिकता की उम्मीद करना बच्चों, किशोरों, युवाओं पर ज़ुल्म ढाना ही होगा.  
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