01 November 2016

आतंकी का समर्थन दुर्भाग्यपूर्ण

जेल से भागे सिमी के आठ आतंकी दस घंटे के भीतर पुलिस द्वारा मार गिराए गए. जिस तेजी से मीडिया ने सिमी के आतंकी जेल से फरार की खबर देकर अपना काम किया उसी तेजी से उन आठों के मारे जाने की खबर नकारात्मक रूप में चलाकर पुलिस विभाग को कटघरे में खड़ा कर दिया. मीडिया के द्वारा उन आठों आतंकवादियों को उनके एनकाउन्टर के बाद मासूम और निरीह साबित किया जाने लगा, जिनको चंद घंटे पहले वो आतंकवादी घोषित किये था. देश भर में मीडिया, सोशल मीडिया पर मध्य प्रदेश पुलिस की इस कार्यवाही को लेकर बहस चलने लगी. अकारण आतंकवादियों के समर्थन में लोग जुटने शुरू हो गए. ऐसा महज इस कारण होने लगा क्योंकि मारे जाने वाले सारे आतंकी मुस्लिम समुदाय से थे और उनको मार गिराने वाली पुलिस भाजपा शासित प्रदेश की है. उन आठों आतंकियों के समर्थन में बुद्धिजीवियों का, नेताओं का, राजनैतिक दलों का इस तरह जुटना चिंताजनक है. ये उसी तरह से घातक है जिस तरह देश में काम करती आतंकियों की स्लीपर सेल घातक हैं. 


आठों आतंकी जिस तरह से जेल से भागे, जिस तरह से उन्होंने वहाँ के हवालदार की हत्या की, जिस तरह से इनमें से कुछ आतंकी इससे पूर्व भी अन्यत्र जेल से भागने में सफल रहे थे उससे स्पष्ट है कि वे न तो निर्दोष थे और न ही मासूम. विगत दिनों उन्हीं की तरफ से खुलेआम देश में तालिबान आने का, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हत्या के नारे लगाये गए उससे भी उनके मंसूबे स्पष्ट हो रहे थे. ये कितना विडम्बनापूर्ण है कि यहाँ एक तरफ पुलिस की कार्यवाही की इस मामले में आलोचना की जाती है कि उसके द्वारा जिम्मेवारी को, दायित्व को सही ढंग से निर्वाह नहीं किया जाता है. अब जबकि किसी तरह से उनके द्वारा आठों फरार आतंकियों को ख़तम कर दिया गया है तो उसे फर्जी एनकाउन्टर का नाम देकर पुलिस का मनोबल गिराया जा रहा है. एक पल को मान लिया जाये कि पुलिस की तरफ से किसी भी तरह की मिली-भगत के बाद उन आठों आतंकियों को मारा गया. ऐसे में यहाँ सवाल उठता है कि यदि उन आठों आतंकियों को पकड़ा न गया होता और वे पुलिस की गिरफ्त से बच गए होते तो क्या देश में, समाज में सौहार्द्र बनाने का काम करते? यदि उनको जिन्दा पकड़ लिया गया होता और वापस जेल में डाल दिया गया होता तब वे किस तरह से कानून की मदद कर रहे होते?

यहाँ विगत में हुई इसी तरह की अन्य घटनाओं के सन्दर्भ में जाने की बजाय इस्मत जहाँ काण्ड को याद कर लेना काफी रहेगा. उसके मारे जाने पर भी संवैधानिक पद पर बैठे एक व्यक्ति ने उसे अपने प्रदेश की बेटी तक बता डाला था. कुछ इसी तरह से इन आठों आतंकियों के साथ हो रहा है. हवालदार को मारना सत्य है. जेल से भागना सत्य है. इनका सिमी से जुड़ा होना सत्य है. इनके द्वारा तालिबान के पक्ष में नारे लगाना सत्य है. इनका मारा जाना भी सत्य है. इस अंतिम सत्य में कथित जनों द्वारा फर्जी होने की शब्दावली जोड़कर इसे विवादित बनाया जा रहा है. एक पार्टी भाजपा, एक व्यक्ति मोदी के विरोध में स्तर इस हद तक नीचे गिर जायेगा ये कभी सोचा नहीं गया था. दुर्भाग्यपूर्ण है कि यहाँ एक आतंकी के मारे जाने पर उसके समर्थन में मानवाधिकार से लेकर सरकार, शासन, बुद्धिजीवी तक खड़े हो जाते हैं किन्तु एक हवालदार के मारे जाने पर, एक पुलिस वाले के मारे जाने पर किसी को उसकी सुधि नहीं होती है. समाज में जिस तरह से ऐसे माहौल का निर्माण किया जा रहा है उससे आने वाले दिनों में आतंकियों को यहाँ के ऐसे कथित लोगों पर गर्व होने लगेगा. ऐसे लोगों की आड़ में ही देश के भीतर सक्रिय स्लीपर सेल वारदातों को अंजाम देती रहती है. देश में शांति की चाह रखने वालों को, आतंकवाद का खात्मा होने की मंशा रखने वालों को ऐसे लोगों का खुलकर विरोध करना ही होगा.  

2 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "जीवन के यक्ष प्रश्न - ब्लॉग बुलेटिन“ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Amrita Tanmay said...

दुर्भाग्यपूर्ण के साथ हास्यास्पद भी है ये विरोध ।