11 March 2014

बाबा के लिए जनभावनाओं को नजरंदाज़ न किया जाये




विगत कुछ समय से बाबा रामदेव योग की शिक्षा देने से ज्यादा राजनीति की पाठशाला लगाने में ज्यादा व्यस्त दिखने लगे हैं. इसमें कोई बुरी बात भी नहीं है क्योंकि राजनीति करना किसी वर्ग विशेष, व्यक्ति विशेष, दल विशेष की थाती नहीं है. योग के चलते बाबा रामदेव ने अपनी प्रतिष्ठा, अपना सम्मान, अपनी सक्रियता सम्पूर्ण देश में कायम कर ली. अपने लाखों-लाख अनुनायियों, योग-प्रेमियों, योग-लाभान्वितों के चलते उनके भीतर भी नेतृत्व करने की आकांक्षा प्रबलता से हिल्लोरें मारने लगी. इसी कड़ी में उनके द्वारा अनेक आन्दोलन भी आरम्भ किये गए जिनमें स्वदेशी का प्रचार-प्रसार, काले-धन की वापसी के प्रस्ताव, भ्रष्टाचार-विरोधी मुहिम प्रमुखता से गिनी जा सकती है. इन्हीं आन्दोलनों के बीच बाबा रामदेव ने राजनैतिक सक्रियता दिखानी आरम्भ कर दी. उनके राजनैतिक कदम को बहुत से लोगों ने नकारने की बात कही तो बहुत से लोगों ने इसकी सराहना की. बात चली तो दूर तलक जायेगी की तर्ज़ पर बाबा रामदेव ने लोकसभा चुनावों में भाजपा-मोदी के पक्ष में खुलकर अपना समर्थन व्यक्त किया.
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आन्दोलनों की सफलता, मुद्दों की गंभीरता और जनहितकारी होना, समर्थकों की संख्या का दिनों-दिन बढ़ना केंद्र सरकार के लिए चिंता का सबब बनता जा रहा था, सो एक रात बाबा और उनके आन्दोलनकारियों पर कहर टूटा किन्तु बाबा का विश्वास न टूटने पाया. उनकी राजनैतिक सक्रियता और भी तेजी से बढ़ने लगी. इसी सक्रियता में बाबा अचानक भाजपा में खलल-बैचेनी-परेशानी पैदा करने वाले तत्त्व के रूप में सामने आने लगे. भाजपा को समर्थन, मोदी को समर्थन के नाम पर वे लोकसभा में अपने लिए कुछ सीटों की मांग करने लगे. ये ठीक उसी तरह की स्थिति कही जा सकती है जैसे कोई एक राजनैतिक दल, क्षेत्रीय दल अपनी शक्ति, अपने समर्थकों, अपने वोट-बैंक को भुनाने के लिए बाहरी समर्थन, गठबंधन सरीखी बात कर रहा हो. बाबा रामदेव और भाजपा की आपसी सहमति पर सात लोकसभा सीटों पर बाबा के पसंदीदा व्यक्ति या कहें कि उनके समर्थक चुनाव मैदान में उतरेंगे. यहाँ समझने की आवश्यकता है कि क्या बाबा नए राजनैतिक दल के रूप में अपना पदार्पण कर रहे हैं? क्या बाबा खुद को एक दबाव समूह के रूप में सिद्ध करना चाहते हैं? माना कि बाबा-समर्थित सातों व्यक्ति लोकसभा चुनाव जीत जाते हैं तो बाबा खुद को किस रूप में स्थापित करेंगे? बाबा जिन व्यक्तियों को चुनावी मैदान में उतारेंगे क्या उनको स्थानीय जन-समर्थन प्राप्त है?
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ये दो-चार प्रश्न नहीं हैं बल्कि वो स्थितियाँ हैं जो कहीं न कहीं भाजपा-मोदी के लिए संकट ही उत्पन्न करती दिखती हैं. यहाँ बाबा और उनके थिंक टैंक (यदि कोई है) को समझना चाहिए कि बाबा रामदेव की जो विचारधारा है वो समूचे राजनैतिक दलों में से सिर्फ भाजपा से ही मेल खाती है. और फिर बाबा के विरोध में, उनके योग-शिविरों के विरोध में, उनके आन्दोलनों के विरोध में भाजपा कभी नहीं रही. ऐसे में बाबा को चाहिए था कि सम्पूर्ण देश में भाजपा का, मोदी का, भाजपा के प्रत्याशियों का प्रचार करना चाहिए था. चुनाव होने तक योग-शिविरों के बजाय विशुद्ध राजनैतिक कार्यक्रमों का सञ्चालन करके भाजपा के लिए समर्थन जुटाना चाहिए था. महज सात सीटों के द्वारा बाबा अपनी किस हनक को दिखाना चाहते हैं, ये तो वे, उनका थिंक टैंक या फिर भाजपा आलाकमान ही बता सकेगी. भले ही बाबा कि मंशा भाजपा को, उसके प्रत्याशियों को नुकसान पहुँचाने की नहीं हो किन्तु स्थानीय जनभावनाओं को नजरंदाज़ करके बाबा-समर्थित प्रत्याशियों को उतारना भाजपा के लिए भितरघात का कारण बन सकता है.

1 comment:

ब्लॉग बुलेटिन said...


ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन वर्ल्ड वाइड वेब को फैले हुये २५ साल - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !