01 अगस्त 2026

जंतर-मंतर की गालियाँ

इधर जंतर-मंतर की गालियों की खूब चर्चा हो रही है. गालियों को लेकर अलग-अलग विचार, बयानबाजी देखने को मिल रही है. सबके सब एक तरह का आदर्श पेलने में लगे हैं. (अब कहो हमसे खार खाए बैठे और गालियाँ बकते कथित मासूम बच्चों के पैरोकार हमारे पहले ही वाक्य के 'पेलने' शब्द पर आपत्ति जताने लगें कि यह अश्लील शब्द है). फिलहाल, जिस तरह की गालियाँ जंतर-मंतर पर हमारे, हम सबके इन बच्चों ने दी क्या वाकई आप उनको सही ठहराते हैं? उचित मानते हैं? यदि हाँ, तो अपने घर में अपने बच्चों को, बड़ों को खुली छूट दीजिये वे सभी शब्द बोलने की. कोई एक राष्ट्राध्यक्ष को किसी दूसरे राष्ट्राध्यक्ष के जननांग में घुसा बता रहा है; कोई प्रधानमंत्री की माँ के साथ ही शारीरिक सम्बन्ध बनाने वाली क्रिया वाले शब्द उच्चारित कर रहा है; कोई उनके लिंग का आकार बता रहा है; कहीं लिंगधारी बच्चियाँ भी हैं जो जोश में कह रही हैं कि मोदी मेरे %%## पे.

 



इस पोस्ट का मंतव्य ये नहीं कि किसने क्या कहा, क्यों कहा इस पोस्ट का सन्दर्भ विशुद्ध गालियाँ देने से है. हमारे समाज में गालियों को बखूबी अलंकृत किया जा चुका है. आदर्श बनाये जाने वाले दो फ़िल्मी कलाकार खुलेआम कैमरे के सामने बताते हैं कि किस माँ की गाली देने में काव्यात्मकता, लयात्मकता है. सोचिये, जब गालियों में लय और काव्य होगा तो फिर उनको कोई भी गाएगा.

 

रही बात हमारे, व्यक्तिगत हमारे गाली देने की तो हमने भी खूब गालियाँ दी हैं, आज भी देते हैं. आज की इस कथित विश्लेषित पीढ़ी ने एक प्रदर्शन देखा और बह गए, हमने अपने विद्यार्थी जीवन का आरम्भ ही किया था दो-दो आन्दोलन से. एक था आरक्षण विरोधी आन्दोलन और दूसरा श्रीराम जन्मभूमि मंदिर से सम्बंधित आन्दोलन. आरक्षण वाले आन्दोलन के दौरान लगभग रोज ही कोई न कोई प्रदर्शन होता, किसी न किसी सीनियर के नेतृत्व में इसे अंजाम दिया जाता. इस प्रदर्शन में एक नारा खुलकर और अनिवार्य रूप से लगाया जाता "चौड़ी छाती वीरों की और माँ की %%$$## फलाने की." इस नारे के बार-बार लगाए जाने के दौरान यह याद रखा जाता कि कहीं से कोई पत्रकार कैमरे से वीडिओ न बना रहा हो. कॉलेज में या कॉलेज के आसपास ऐसा होने पर ध्यान रखा जाता कि कहीं कोई अध्यापक न देख रहे हों.

 

आज के समय में हमारे खुद के गाली देने की बात करें तो हाँ, खूब देते हैं, खुलकर देते हैं मगर किसी बड़े के सामने नहीं. उन शिक्षकों के सामने भी नहीं जिन्होंने प्राथमिक शिक्षा दी. किसी महिला के सामने भी नहीं. आज की इस पीढ़ी की गालियों की जो भी वकालत कर रहे हैं उनके वीडियो को अपने बच्चों को दिखाते हुए उन अंगों के बारे में भी समझा दो, जिनकी चर्चा ये मासूम बच्चे अपनी गालियों में कर रहे हैं.


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