11 मार्च 2018

निस्वार्थ सामाजिक कार्य करने वालों का सम्मान हो


ज़िन्दगी जितनी नश्वर है, उतनी ही समर्थ सन्देश देने वाली भी. कई बार लगता कि वे लोग भी ज़िन्दगी को बिता रहे हैं जो कुछ विशेष नहीं कर रहे हैं, वे लोग भी ज़िन्दगी को जी रहे हैं जो कुछ न कुछ करते हुए अपनी ज़िन्दगी खपा दे रहे हैं. समझ से बाहर है कि आखिर ज़िन्दगी का असली मजा कौन ले रहा है? वे लोग जो बिना कुछ करे अपनी ज़िन्दगी बिता रहे हैं या वे लोग जो दिन भर किसी न किसी सामाजिक कार्य में खुद को लगाते हुए ज़िन्दगी को बिता रहे हैं? सामाजिक काम करने वालों को, देशहित में सक्रिय रहने वालों को बहुत से लोग बहुत प्रोत्साहित करते देखे जाते हैं. लोगों के कामों के द्वारा उनके सदैव-सदैव जीवित बने रहने की बात की जाती है. सच भी है या कहें कि सच भी हो सकता है कि अपने कामों से कोई भी व्यक्ति बहुत लम्बे समय तक जिंदा बना रहता है. इस सच के साथ यह भी सवाल उठता है कि आखिर खुद के मरने के बाद खुद को जिंदा बनाये रखने का लोभ-लालच इस जीवन में क्यों? क्या वाकई आज वे सभी लोग किसी न किसी रूप में जिंदा हैं जिन्होंने समाज के लिए, देश के लिए अपने जीवन को न्योछावर कर दिया? क्या जिन लोगों ने अपने जीवन को दाँव पर लगा दिया वे सभी आज सम्मान पा रहे हैं?


ये सवाल ऐसे हैं जो मन को व्यथित करते हैं. सामाजिक जीवन के साथ-साथ यदि पारिवारिक जीवन किसी व्यक्ति के साथ जुड़ गया होता है तो समाज के साथ-साथ उसकी जिम्मेवारी परिवार के सञ्चालन की भी होती है. यदि कहा जाए कि समाज से ज्यादा उसकी जिम्मेवारी अपने परिवार के प्रति होनी चाहिए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. इसके बाद भी बहुत से लोग ऐसे हैं जो अपने परिवार को हाशिये पर टिका कर समाज के लिए काम करने में लगे हैं. ऐसे लोगों में बहुत से लोग हमारे मित्र भी हैं और कई बार उनके कार्यों, उनके प्रयासों को देखकर लगता है कि वे जितना समाज के लिए कर रहे हैं, क्या समाज वाकई में उतना वापस करेगा? भले ही उन्हें न करे पर उनके परिवार के प्रति समाज की कुछ न कुछ जिम्मेवारी होनी चाहिए. एक व्यक्ति अपना सम्पूर्ण इसी समाज को दे रहा है तब क्या उस समाज की जिम्मेवारी नहीं बनती कि उसके परिजनों का ख्याल रखे? ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि आये दिन हम किसी न किसी प्रसिद्द व्यक्तित्व के बारे में पढ़ते हैं, जिसका परिवार या परिजन दरिद्र अवस्था में जीवन-यापन कर रहे हैं. बहुत से नामी-गिरामी लोगों के परिजन मजबूरी में, मजदूरी में अपना जीवन गुजार रहे हैं. इसके अलावा ऐसे व्यक्ति भी समाज में असम्मान पा रहे हैं जिन्होंने अपने परिजनों का ध्यान रखे बिना समाज के लिए अपना जीवन कुर्बान कर दिया. आखिर ऐसे जीवन से इन लोगों का क्या मिला?

सोचने वाली बात है कि वे लोग, जो इस संसार से विदा हो चुके हैं वे अपने किये गए कार्यों का लेखा-जोखा किसी से भी माँगने नहीं आ रहे हैं. वे देखने नहीं आ रहे हैं कि आप उनके प्रति कैसा व्यवहार कर रहे हैं. वे यह भी नहीं जानना चाहते कि उनके जाने के बाद समाज ने उनके परिजनों के प्रति कैसा बर्ताव किया. समाज ने देश के लिए अपनी जान लुटा देने वालों को भी लाल, हरे, भगवा रंग के खाँचों में बाँटकर उन पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया है. समाज के लिए काम करने वालों को भी सरकारी एजेंट बता कर उनके कामों को विस्मृत कर दिया गया है. ऐसे में अपने जीवन की, अपने परिवार की क़ुरबानी देकर मरणोपरांत नाम करवाए जाने का क्या निष्कर्ष निकलता है? ये समाज की, समाज के उन लोगों की जो लाभ ले रहे हैं जिम्मेवारी बनती है कि ऐसे लोगों के प्रति अवश्य ही अपनी जिम्मेवारी समझें जो निस्वार्थ भाव से काम करते हुए अपने जीवन का होम कर गए. ऐसे लोगों के प्रति समाज में जागरूकता लाने की आवश्यकता है जो बिना किसी लाभ की लालसा के सिर्फ काम करते रहे और अपने परिवार को भी भुला बैठे. यदि समाज से जुड़े हुए लोग ऐसा नहीं कर सके तो यकीन मानिये भविष्य में निस्वार्थ भाव से कार्य करने वालों की, सामाजिक सेवा देने वालों की जबरदस्त कमी दिखाई देगी. यदि ऐसा हुआ तो समाज में अराजकता बढ़ती दिखाई देगी. वर्तमान में बढ़ती अराजकता का एक कारण यह भी है कि समाज ने वास्तविक निस्वार्थ भावना से काम करने वालों का तिरस्कार करना शुरू कर दिया है, उनको विस्मृत करना शुरू कर दिया है, उनका अपमान करना आरम्भ कर दिया है.



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