29 अक्टूबर 2008

"पुलिस आपकी मित्र है"

अभी दीपावली की शुभकामनाएं आदान-प्रदान करने का समय भी नहीं बीता है कि कुछ लोगों के साथ ऐसा हो गया कि उनकी सारी की सारी दीपावली का मजा ख़राब हो गया होगा. सड़क पर जा रहे कुछ लोगों को (भले लोग ही रहे होंगे) एक असहाय आदमी दिखा जो किसी वाहन आदि से टकरा कर घायल हो गया था. उन भले लोगों ने उसको उठा कर हॉस्पिटल तक पहुँचाया. यहीं गलती कर दी. तमाम तरह की कार्यवाही करने के बाद (पुलिसिया कार्यवाही पहले की गई, ये आरोप भी लगने की नौबत आ गई कि ये दुर्घटना उन्हीं ने की है) बड़ी जिल्लत सहने के बाद छूट सके. छूटने में सिफारिश ही काम आई।
इसी पुलिसिया आतंक (सहयोग) पर दो शब्द.............
सड़क पर पड़े
घायल को देख कर
कतरा कर,
आँख बचा कर
निकलते लोग.
याद आता
मानवता का संदेश,
पर......
सहायता के लिए
बढ़ते क़दमों को,
विचारों को रोक देते हैं
नगर के किसी
"विशेष इमारत" के सामने
लगे "बोर्डों" के "संदेश",
"पुलिस आपकी मित्र है"
सदैव
"आपकी सेवा को तत्पर".

28 अक्टूबर 2008

इस दीपावली पर करें एक संकल्प

आज दीपावली है, घरों में रंग-बिरंगी रोशनी है, बच्चे खुशी से चहक रहे हैं, बड़े घर में होने वाली पूजा आदि के लिए सामानों की खरीददारी में लगे हैं, घर की महिलायें दीपावली को सुखद, पावन बनाने के लिए प्रयासरत हैं. कुल मिला कर सभी लोग किसी न किसी रूप में व्यस्त हैं. आप-हम भी व्यस्त हैं पर क्या इस व्यस्तता के बीच एक-दो पल को समय निकल कर दीपावली की सार्थकता के बारे में विचार करेंगे?
विचार बस इतना है कि इस दीवाली पर भी हजारों-हजार रुपये के पटाखे फोड़ दिए जायेंगे, अन्य दूसरे तरह की आतिशवाजी में भी पैसे को खर्च किया जायेगा, लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने के नाम पर कुछ लोग जुए में हजारों रुपये की हारा-जीती करेंगे. आपको क्या लगता है ये सब होना चाहिए?........अरे साहब होना ही चाहिए, आख़िर वर्ष-वर्ष का त्यौहार है.......पार्टी, मस्ती, हंगामा, धमाल सब कुछ जो भी हो सकता है वो होना चाहिए।
बिल्कुल सही, आख़िर खुशी का त्यौहार है, खुशी मनाई भी जानी चाहिए पर आतिशबाजी को फोड़ते हुए एक पल को रुक कर सोचिये कि क्या उसको इस समय खुशी मिल रही होगी जिसने अपने बेटे को किसी जातिवाद, क्षेत्रवाद के जहर के कारण खोया है?
  • क्या उस व्यक्ति को खुशी मिल रही होगी जिसके घर में पिछले तीन-चार वर्षों से खाने को कुछ भी हुआ नही है?
  • क्या वे लोग इस त्यौहार को खुशी से मना सकते हैं जिन्हों ने आतंकवाद के धमाके में अपने परिवारीजनों को खोया है?
  • क्या वे लोग खुशी का अनुभव कर सकते है जिन्हों ने किसी न किसी दूषित वातावरण के कारण अपने आपको या अपने ख़ास को बीमार बना दिया है?
  • क्या वो इस समय खुशी मनायेगा जिसका कोई अपना किसी की लापरवाही के कारण मौत का शिकार हो गया है?
ज़रा सोचिये............अरे....अरे.......अरे.......आप तो वाकई इतना सोचने लगे? इतना भी सोचने की जरूरत नहीं क्योंकि इतना सोचने के बाद भी कुछ नहीं होता...........सिवाय सोचने के. यदि वाकई आप इन लोगों के लिए कुछ (कुछ भी) करना चाहते हैं, अपनी खुशियों का सही आनंद उठाना चाहते हैं तो इस दीपावली पर एक छोटा सा संकल्प कर लीजिये और उसको हर वर्ष निभाइए। फ़िर देखिये आपके त्यौहार, आपके उमंग, आपकी खुशी की मात्रा और कितनी अधिक बढ़ जाती है.
  • बस करिए ये कि आप संकल्प करिए हर वर्ष दीपावली के दिन एक पौधा लगाने का।
  • आप तमाम तरह की मिठाई खाते-खिलाते हैं, अनेक व्यंजन आप और आपके महमान खाते हैं प्रतिवर्ष किसी भी भूखे को भरपेट भोजन कराइए.
  • हजारों रुपये की आतिशबाजी को फोड़ने के साथ-साथ कुछ थोड़ी सी आतिशबाजी उस बच्चे-बच्ची को भी दे दे जिसका कोई नहीं है तो आपको अपनी आतिशबाजी में और भी रंग नजर आयेंगे।
  • देवी-देवता किसी भी तरह से जुआ खेलने से प्रसन्न नहीं होते, आप भी जुआ न खेलें, भले ही आप हमेशा जीतते हों बस ये करें कि जितना भी जीतने कि गुंजाईश हो उतने रुपये से किसी गरीब छात्र-छात्रा की स्कूल फीस भर दे, उनको पुस्तक आदि खरीदवा दे, आप पर वाकई लक्ष्मी जी मेहरबान हो जायेंगी।
और भी बहुत कुछ है जो आप कर सकते हैं बस थोड़ा सा इस तरफ़ भी सोचिये. अपनी खुशी को कम न करिए, अपनी आतिशबाजी को कम न करिए, अपने दीयों की रोशनी को कम न करिए पर साथ में उनका भी ख्याल रखिये जो ये सब नहीं कर सकते. करके देखिये ऐसा, वाकई बहुत आनद आएगा.
आप सबको आपके परिवार सहित दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें
ऊपर अपने मन की बात कुछ बस यूँ ही लिख दी है आपको अच्छा लगे तो अवश्य संकल्प करिए अन्यथा आप पटाखे तो फोड़ ही रहे हैं, लोग उनकी धमक और रोशनी तो देख ही रहे हैं................

27 अक्टूबर 2008

कैसे रुकेगी चोरी??????



वर्तमान समय विश्वास-अविश्वास के मध्य अपनी स्वीकार्यता को तलाश कर रहा है. एक व्यक्ति पर भरोसा है तो दूसरे पर भरोसा नहीं. व्यक्ति-व्यक्ति की स्थिति में परिवर्तन आया है. समय का चक्र अनेक परिवर्तन करवाता है और इसी कारण लोगों की सोच में, कार्यशैली में, व्यवहार में परिवर्तन आता है. इसका बहुत सरल उदहारण एक बड़े प्रसिद्द गीत से दिया जा सकता है "बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ, आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ" जिस कालखंड में ये गीत लिखा गया था उस समय इस गीत को लिखने, उसे गुनगुनाने के पीछे निश्चय ही पवित्र धारणा काम कर रही होगी पर आज इस गीत के क्या मायने लगाये जाते हैं (हास्य-व्यंग्य के कार्यक्रमों की देन है ये) कि आदमी होकर आदमी से प्यार.............??????? ये अन्तर सोच का है।



इस पोस्ट के लिखने के पीछे भी एक सोच काम कर रही थी। अपने ब्लॉग विचरण के दौरान एक ब्लॉग पर ताला बना देखा। जो आपके पेज को सुरक्षित रखता है। सुरक्षित इस रूप में कि कोई आपकी पोस्ट के मैटर को चुरा न सके। किसी मायने में तो ये सोच सही है पर किसी रूप में ये कतई सम्भव नहीं है. आख़िर जिसे मैटर चुराना होगा तो वो सीधे-सीधे न चुरा कर उसकी प्रिंट कोपी निकाल कर मैटर चुरा लेगा. ये तो हुई सोच, अब यही सोच पढ़े-लिखे लोगों पर भी लागू होती है. पढ़े-लिखे लोग ही इस तरह की चुरा-चुराई की हरकतें ज्यादा करते हैं. वैसे चुराने की सोच, रोकने की कवायद हमारी समझ से इसलिए भी परे है कि शब्दों के थोड़े से हेर-फेर से समूचा लेख, कविता, कहानी आदि कुछ भी बदल जाता है, अब कहाँ रह गया ताला और कहाँ रह गया सर्वाधिकार का फंदा. शब्द तो उतने ही हैं, विचार अनेक हैं, शब्दों की क्रमबद्धता ज्यादा है तो बस किसी भी लिखे को उठाइये और कर दीजिये कुछ शब्दों को इधर से उधर और कहिये कि क्या खूब लिखा है हमने.



एक दो-चार लाइन का उदाहरण देख लीजिये-



सितारों को जमीन पर सजाने की हसरत है हमारी।
नदियों के रुख को मोड़ने की हसरत है हमारी॥



अब इसी का चोरी किया रूप भी देख लीजिये-



जमीन पर सितारे सजाने की, हसरत है हमारी।
रुख नदियों का मोड़ने की, हसरत है हमारी॥



क्या ये सर्वाधिकार या कोपी राईट का उल्लंघन है? नक़ल तो की ही गई, चोरी तो की ही गई।



वैसे वो ताला हम भी लगाए हैं, जो लोग उसको लगाना चाहें वो वहाँ से उससे सम्बंधित लिंक पर जा सकते हैं।



दीपावली की आपको एवं आपके परिवार को शुभकामनाएं।



करिए कुछ ऐसा की आने वाला समय भयावह न हो कुछ इस तरह हास्यास्पद........और भयावह

वत सावित्री की पूजा करतीं स्त्रियाँ (न संभले तो आने वाले कल की सच्चाई)

ये चित्र उड़नतश्तरी से साभार चुरा कर आपके लिए लाये है.

इन महिलाओं से कुछ सीखना होगा

दीपावली का त्यौहार आ गया है, लक्ष्मी जी की पूजा होगी; इससे पहले नव रात्रि का पावन पर्व भी मनाया गया. इस पर्व पर भी किसी न किसी रूप में नारी शक्ति की पूजा की जाती है, कन्याओं को भोजन करवाया जाता है. इसी के ठीक उलट ये भी सत्य है कि महिलाओं को इसी समाज में अपने अस्तित्व के लिए लडाई करनी पड़ रही है और लड़कियों को जन्म के लिए आन्दोलनों का सहारा लेना पड़ रहा है. इन्हीं सबके बीच कुछ लोग (इनमें महिलायें और पुरूष दोनों शामिल हैं) नारी-शक्ति, स्त्री-विमर्श को पुरजोर हवा दे रहे हैं. अनेक नारे, अनेक गोष्ठियां, अनेक तरह के लेख आदि ये सिद्ध करने में लगे हैं कि नारी-शक्ति कुछ भी कर सकती है. ये सत्य है कि नारी-शक्ति कुछ भी कर सकती है पर आज स्त्री-विमर्श, स्त्री-सशक्तिकरण के नाम पर जो हो रहा है वो स्त्री को कटघरे में ही खडा करता है. कुछ कहे बिना आज की कुछ वस्तविक नारियों के उदहारण आपको बताते हैं, शायद आपको लगे कि ये ही वो नारियां हैं जो सही मायनों में स्त्री-शक्ति का उदहारण हैं।
देश में पुरोहिती, कर्म-कांडों का अपना स्थान रहा है और अभी तक ये सब पुरुषों के द्वारा ही होता आया है। अब कुछ महिलाओं ने इस क्षेत्र में कदम रख कर अपनी शक्ति का अहसास करवा दिया है।
बनारस के तुलसीपुर में स्थित पाणिनी कन्या महाविद्यालय से शास्त्री की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद कुछ लड़कियों ने विवाह करवाने का कार्य शुरू किया। इसके लिए उनका ब्राहमण होना आवश्यक नहीं है। महाविद्यालय की आचार्य नंदिता शास्त्री बड़े ही गर्व से बतातीं हैं कि अब इन छात्राओं को देश के अतिरिक्त विदेश से भी लोग बुला रहे हैं।
यहाँ की पूर्व छात्रा मैत्रेयी का कहना है कि उनके पास अमेरिका तक से आमंत्रण आ रहे हैं। ये छात्राएं विवाह करवाने के साथ-साथ शान्ति-यज्ञ, गृह-प्रवेश, मुंडन, नामकरण, यज्ञोपवीत आदि करवा रहीं हैं।
इसी तरह कानपुर के कानपूर विद्या मन्दिर डिग्री कालिज की प्राचार्य डॉ0 आशारानी राय वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच पुरोहिती का कार्य करतीं हैं। उन्हों ने किसी भी विरोध की परवाह किए बगैर अपनी छात्राओं को वेद पाठ भी करवाया। इसके अतिरिक्त उन्हों ने महिलाओं के लिए सर्वथा निषिद्ध माने गए क्षेत्र श्मशान घाट में जाकर अन्तिम संस्कार भी करवाए हैं और करवा भी रहीं हैं। अपने पिता और श्वसुर का अन्तिम संस्कार भी उन्हीं ने किया था.
इन्हीं की तरह सुनीति गाडगिल ने विवाह के अतिरिक्त श्राद्ध कर्म भी करवाए हैं। बनारस की ही पांडेयपुर की निवासी वन्दना जायसवाल उर्फ़ अनु ने, नगर निगम के सफाई कर्मी मुन्ना की विधवा बीडा देवी और भेलूपुर की महिला चित्रकार और विदेश में कला की प्रोफेसर रहीं डॉ0 अलका मुखर्जी आदि ने अपने परिवार में किसी अन्य पुरूष के न रहने पर माता, पिता, पति आदि का अन्तिम संस्कार विधवत संपन्न किया।
ऐसा नहीं है कि पढ़ी-लिखी महिलाओं द्वारा ऐसा किया जा रहा है। राजस्थान की 72 वर्षीय विधवा की मृत्यु पर उसकी सात बेटियों ने अर्थी को कन्धा दिया और चिता को मुखाग्नि देकर पिंडदान तक किया.
हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले की दलित महिला प्रेमा देवी ने तो अपने पति की मृत्यु पर आपने बेटों को अर्थी को कंधा नहीं लगाने दिया। उसका कहना था कि इन बेटों ने जीते-जी अपने पिता, मेरे पति की सेवा नहीं की इस कारण इनको कोई अधिकार नहीं कि उनकी अर्थी को कन्धा दे या फ़िर अन्तिम संस्कार करें. अंततः उस महिला की जिद के बाद उसकी दोनों बहुओं और पड़ोस की दो अन्य महिलाओं ने उसके पति की अर्थी को कन्धा दिया, मुखाग्नि उसके पोतों ने दी।
इस तरह की घटनाओं के अतिरिक्त कुछ लोग ऐसे भी हैं जो विवाह के अवसर पर होने वाले रस्मों में परिवर्तन तक मात्र इस कारन कर रहे हैं क्योंकि वे लड़के-लड़कियों में किसी तरह का अन्तर नहीं करते हैं.
बनारस के कश्यप फ़िल्म एंड टेलीविसन रिसर्च इंस्टिट्यूट के निदेशक डॉ0 डी0 कश्यप ने अपने तीन बेटों के विवाह में बेटों को नहीं बल्कि अपनी बहुओं को घोडी पर चढ़वाया था. उन्हों ने अपनी बहुओं का द्वारचार संस्कार कर पहले उनको मंच पर महाराज कुर्सी पर बिठवाया उसके बाद उनके लड़कों ने आकर जयमाला डाली। इस विवाह में फेरे, कन्यादान जैसी रस्मों को नहीं निभाया गया. यहाँ सिर्फ़ जयमाल और सिंदूरदान हुआ।
इसी तरह जयपुर की जुड़वां बहनों ने एक साथ विवाह के समय घोडी पर सवार होकर बिन्दौरी नामक परम्परा मे ये क्रांतिकारी कदम उठा कर दिखा दिया कि उनमें और लड़कों मे किसी तरह का अन्तर नहीं है।
शादी-विवाह, मुन्दम, संस्कारों से इतर एक और कार्य में महिलाओं ने अपनी उपस्थिति दर्शाई है और वो है बालाजी के मन्दिर में नाइनों का काम शुरू करके। इस मन्दिर में आने वाले लोग अपने केशों को भगवान् पर चढाते हैं और इनमें महिलाएं भी होतीं हैं। महिलाओं ने अब यहाँ भी बाल काटने का काम शरू किया है जिसे अभी तक यहाँ सिर्फ़ पुरूष ही करते थे।
एक मुस्लिम महिला ने तो क्रन्तिकारी कदम उठा कर पहली महिला काजी होने का गौरव प्राप्त किया है। पश्चिम बंगाल के पूर्वी मिदनापुर जिले के गाँव नंदीग्राम की शबनम आरा ने अपने काजी पिता के लकवा-ग्रस्त हो जाने पर निकाह आदि में उनका सहयोग करना शरू किया। धीरे-धीरे उनको शरीयत का इल्म हो गया। बाद में पिता की मृत्यु के बाद उन्हों ने अपना पंजीयन काजी के रूप में करवाया। मुश्किलों के बीच अंततः वे सफल रहीं और आज काजी के रूप में काम कर रहीं हैं।
ये कुछ उदाहरण हैं जो महिलाओं की हिम्मत को दर्शाते हैं। यही असली महिला-शक्ति है जो विपरीत परिस्थितियों से न घबरा कर अपना मुकाम बना चुकीं हैं। क्या कम कपडों और लचकते बदन को नारी-शक्ति समझने वाली महिलायें इन महिलाओं से कुछ सीखेंगीं? पुरुषों को कुछ सीखने की जरूरत नहीं क्योंकि उसे महिला की जरूरत नहीं, यदि होती तो कन्या-भ्रूण हत्या न हो रहीं होतीं?

{ये जानकारी श्री कृष्ण कुमार यादव, वरिष्ठ डाक अधीक्षक, कानपुर नगर मंडल, कानपुर के लेख "बदलते सरोकारों के बीच स्त्री समाज" द्वारा प्राप्त हुई। ये लेख स्पंदन (साहित्यिक पत्रिका) के मार्च 2008 अंक में प्रकाशित हुआ था।}

24 अक्टूबर 2008

मन का विश्वास भगवान, मन का वहम भूत

हम इक्कीसवीं सदी में खड़े हैं और अंधविश्वास को अभी भी उसी तरह जकडे बैठे हैं जैसे कि कहीं हड़प्पा संस्कृति में निवास कर रहे हों. आए दिन तमाम तरह के आडम्बरों का संचालन, भूत-प्रेतों के किस्से, ओझा-तांत्रिकों की गतिविधियाँ आदि-आदि बतातीं हैं कि हम पढने लिखने के साथ-साथ इन सब बातों पर भी बहुत ज्यादा विश्वास करने लगे हैं. हो सकता है कि ये बात बहुतों को न पचे पर ये व्यक्तिगत रूप से हमारे साथ सत्य है कि हम भूत-प्रेत को नहीं मानते और उसी के साथ भगवान् को भी नहीं मानते; इसके उलट एक शक्ति पर विश्वास है जो अच्छी है तो भगवान् और बुरी है तो भूत.
अपनी मित्र-मंडली में इस बात को लेकर बहुत बहसाबहसी होती है. हमारे कई मित्रों का, जो भगवान्, पूजा-पथ आदि करते हैं उनका कहना है कि भगवान् है और भूत नहीं. वे तर्क देते हैं कि भूत मन का वहम है, हमारा मानना है कि भगवान् मन का विश्वास है. उनका कहना है कि भूत को किसने देखा, हमारा जवाब कि भगवान् को किसने देखा? बहस चलती रहती है, तर्क-वितर्क होते रहते हैं वे अपनी बात पर अडे रहते हैं हम अपनी बात पर. इधर कुछ ऐसा हुआ कि लगा कि इन सब बातों पर आजकल लोगों का ध्यान अपनी आपाधापी की जीवन-शैली के कारण भी बढ़ गया है. मन का विश्वास किसी चीज को भगवान् बना देता है और मन का वहम उसी चीज को भूत बना देता है.
अपने मन की सोच और परिस्थिति भी बहुत हद तक भूत-भगवन की स्थिति का निर्धारण करती है. अपने छात्र जीवन में स्नातक की पढाई के समय होस्टल में रहने का अवसर मिला. ग्वालियर साइंस कॉलेज की बात है. पहला वर्ष, होस्टल में भी आए हुए लगभग एक माह हुआ था. हमारा होस्टल जिस जगह पर बना था वहाँ किसी ज़माने में कब्रिस्तान रहा था (ऐसा वहाँ के बूढे बाबा और पुराने छात्रों, लोगों का कहना था) बहरहाल, होस्टल के शुरू के दिनों में पढाई कम और हुडदंग अधिक होता था. सीनियर छात्रों का एक विशेष अभियान रात को दस-ग्यारह बजे के बाद चलता था नए छात्रों के रूम में जाकर अड्डेबाजी करना और हँसी-मजाक के दौर के बीच भूत-प्रेतों के किस्से सुनाना; होस्टल के अन्दर होने वाली डरावनी बातों, घटनाओं (उनकी ख़ुद की बनाई कहानी) की बड़े डरते हुए अंदाज़ में चर्चा करना. ऐसा लगभग रोज का काम होता था।
इधर घर में कुछ माहौल ऐसा रहा कि डर नहीं लगता था पर होस्टल के नाम का डर किसी भी भूत से अधिक था.नए-नए थे इस कारण रैगिंग का भी डर रहता था पर माहौल बहुत अच्छा रहता था. बहरहाल एक रात को यही कहानी ख़तम हुई और सब अपने-अपने कमरों को चले गए. हमारा रूम-पार्टनर 'राजीव' हमारे शहर उरई का ही था और वो किसी काम से घर आ गया था. रूम में हम अकेले, भूतों-प्रेतों, डरावने किस्सों को लेकर सोने लगे. सोये हुए लगभग एक घंटा हुआ होगा (शायद तीन बजे का समय रहा होगा) खर्र....खर्र....खर्र की आवाज़ सुनाई पडी. पलंग के सिरहाने ही हमारी स्टडी टेबल रहती थी हाथ बढ़ा कर उस पर रखा टेबल-लेम्प जला दिया...आवाज़ आनी बंद हो गई. कमरे में इधर-उधर देखा, कहीं कुछ नहीं............फ़िर लाईट बंद की, आँख बंद की और फ़िर वही खर्र......खर्र.....खर्र की आवाज़.........फ़िर हाथ बढ़ा कर लाईट जलाई, आवाज़ बंद। ऐसा लगभग पाँच-छः बार हुआ. अब न डरने के बाद भी एक अनजाना सा डर लगने लगा.
बड़ी हिम्मत करके बगल में रखी हाकी उठा कर उस खिड़की तरफ़ देखा जहाँ से आवाज़ आ रही थी. नीचे झांक कर देखा (कमरा पहली मंजिल पर था) एक आवारा गाय पेड़ के तने से अपना सींग रगडती है. जब लाईट बंद रहती है तो वो सींग रगड़ने लगती है और लाईट जलने पर बंद कर देती थी. यहाँ हमारे न डरने का एक कारण ये भी रहा था कि हमें लग रहा था कि होस्टल का हमारा कोई साथी हमें डराने की कोशिश कर रहा है पर एक डर ये भी लग रहा था कि ऐसा क्या है जो लाईट जलते ही बंद हो जाता है और लाईट बंद होते ही आवाज़ करना शुरू कर देता है?
आज-कल कुछ इसी तरह की स्थिति हमारी हो गई है.......चैनल हमारे हास्टल के पुराने छात्रों की तरह किस्से-कहानियाँ सुना-दिखा रहे हैं..........हम अपने सोचने-समझने की शक्ति को बंद करे डर रहे हैं. अपने लिए न सही आने वाली पीढी के लिए ही सही, हाथ बढ़ा कर समझ-विश्वास की लाईट को जलाना होगा।

एक सलाम इनके नाम भी

भारत की धरती से चाँद को छूने के लिए उड़ान भरी गई और अनेक लोगों के चेहरे खुशी से चमक उठे. इस शानदार सफलता के बाद भी बहुत सारे लोगों को इस बारे में जानकारी ही नहीं है कि ये उड़ान क्यों भरी गई? इस उड़ान का मकसद क्या है? इसे किस स्टेशन से छोड़ा गया है? ये सब आपको कल्पना का हिस्सा लग रहा होगा पर ऐसा सत्य है। वैसे मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना ये है कि एक ऐसे देश में जहाँ कि एक बहुत बड़ी आबादी अभी भी बेकारी, बीमारी, भुखमरी आदि से जूझ रही हो वहाँ इस तरह के कार्यों का कोई अर्थ नहीं निकलता.
इसके बाद भी मेरा मानना ये है कि इस तरह के कार्यों को सफलता से अंजाम देते वैज्ञानिकों, इंजीनियरों आदि की योग्यता पर किसी तरह का संदेह नहीं होना चाहिए. ये लोग अपनी पूरी क्षमता का उपयोग कर देश को सारे विश्व में स्थान दिला रहे हैं. इसके बाद भी अफ़सोस इस बात का है कि ये लोग किसी भी रूप में हमारे हीरो, आदर्श आदि के रूप में सामने नहीं आ पाते हैं. मैदान पर चौके-छक्के लगाने वाले खिलाड़ियों के पीछे सारा देश पागल सा घूमता है, फिल्मों की दुनिया में कूल्हे मटका कर प्रसिद्धि हासिल करने वाले हीरो-हीरोइनों के करोड़ों-करोड़ लोग दीवाने हैं, इन लोगों को तमाम सारे पुरस्कारों, सम्मानों से लाद दिया जाता है. एक-दो मैच जीत जाने के बाद इनका स्वागत ऐसे होता है जैसे किसी देवता का पदार्पण हो रहा हो, एक फ़िल्म-स्टार को देखने के लिए भीड़ इस कदर आन पड़ती है मानो अब इन्हें न देख पाये तो ये जन्म ही व्यर्थ चला जायेगा।
परदे के पीछे रह कर काम करते इन वास्तविक हीरो लोगों को कितने लोग सम्मान देते हैं ये किसी से छिपा नहीं है। छंद की तरफ़ उड़ता जा रहा राकेट इन प्रतिभा-संपन्न लोगों की कहानी ख़ुद कहता है। हम इनके प्रति अपना आदर तब व्यक्त करते दीखते हैं जब कहीं दूर विदेश में ये सम्मानित हो जाते हैं। तब तक तो हम ठुमके लगाने वालों के पीछे, खेल के नाम पर रुपयों से खेलते लोगों के पीछे पागलपन दिखाते ही रहेंगे।
आइये एक पल को ही सही चंद्रमा को छूने जा रहे भारत को विश्व-शक्ति बनाने वाले इन वैज्ञानिकों के प्रति हम अपना सलाम, अभिवादन, सम्मान आदि तो प्रदर्शित कर ही सकते हैं।

23 अक्टूबर 2008

हल्ला बोल, हल्ला बोल

बहुत वर्ष पहले यहाँ उत्तर प्रदेश में पत्रकारों के ऊपर "हल्ला बोल" के नाम से हमला किया गया था. एक राजनीतिक पार्टी सपा के कुछ कार्यकर्ताओं द्वारा "हल्ला बोल" का कार्यक्रम कई दिन तक चलाया गया था. उस समय एक कविता उन हालातों पर लिखी थी, कविता में हास्य-व्यंग्य का पुट था। आज जब राज ठाकरे ने एक तरह का हल्ला बोल दिया है तो लगा कि वह कविता आज भी प्रासंगिक है.
बहुत थोड़े, लगभग नहीं के बराबर संशोधन के बाद आपके लिए प्रस्तुत है...........
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हे मराठो हमें बचाओ,
कोई मन्त्र तो हमें बताओ।
रही हमारी नैया डोल,
कुछ तो बोल, कुछ तो बोल।
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मेरा कैसा नेता तू,
नाक कटाए मेरी तू।
सुन मेरे मंत्रों के बोल,
हल्ला बोल, हल्ला बोल।
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वाह गुरु क्या बात बताई,
नैया मेरी पार लगाई।
कितने सच्चे मन्त्र के बोल,
हल्ला बोल, हल्ला बोल।
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राज ने अपना मन्त्र चलाया,
बेचारों को बहुत छकाया।
हुई स्थिति सारी डांवाडोल,
हल्ला बोल, हल्ला बोल।
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उत्तरियों से अपना बैर,
अब आयेगी उनकी खैर।
दो खोपडी उनकी खोल,
हल्ला बोल, हल्ला बोल।
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एक-दो दिन की बात नहीं,
सुनना किसी की बात नहीं।
हरदम गूंजेगे ये बोल,
हल्ला बोल, हल्ला बोल।
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21 अक्टूबर 2008

जाना हो विदेश तो राज की मदद करो

खेल चालू है, एक मदारी शेष या तो उसके जमूरे हैं या फ़िर दर्शक. मदारी अपना मजमा हर दो-चार दिन पर लगाता है और उसके जमूरे उसकी हाँ में हाँ मिलाते दीखते हैं. जमूरे मजा आयेगा, हाँ आयेगा. जमूरे, हाँ उस्ताद, हंगामा मचायेगा............मचाऊंगा. जमूरे, खेल दिखायेगा......हाँ दिखायेगा........इस तरह की आपसी जुगलबंदी होती है और फ़िर शुरू हो जाता है मदारी का डमरू पीटना. डमरू की दम-दम-दम पर जमूरा अपनी हरकतों को दिखाता है......लोगों को हंसाता है, करतब दिखाता है और अपने पेट की आग बुझाने का जुगाड़ करता है. जमूरे के करतब, मदारी का कमाल, उसके खेल मिल कर पूरे माहौल को इस कदर संवेदनशील बना देते हैं कि सभी को उनकी भूख में अपनी भूख दिखाती है और हो जाती है पैसे-रुपये की बरसात.

मदारी-जमूरे के इस खेल पर तो हम-आप-सब ताली बजाते हैं, मजा लेते हैं और चल देते हैं अपनी-अपनी राह पर लेकिन इस खेल पर कोई ताली नहीं बजा रहा है, कोई मजा नहीं ले रहा है, कोई पैसों-रुपयों की बरसात नहीं कर रहा है...............बस खेल खेलने वाले खेल रहे हैं.................परेशान होने वाले परेशान हो रहे हैं. महाराष्ट्र में हो रहे इस हंगामे को और क्या नाम दिया जा सकता है? बेक़सूर परीक्षार्थियों की पिटाई सिर्फ़ इस बात पर कि कोई दूसरे प्रान्त का आदमी उनके हक़ को मार रहा है. उत्तर भारतीय मराठा मानुष के हकों को मार रहे हैं. अभी तक तो लड़ाई इस बात की थी कि यहाँ से गए उत्तर भारतीय मराठी भाषा नहीं बोलते पर अब लड़ाई इस बात की शुरू हो गई है कि उत्तर भारतीय उनकी जगहों पर नौकरी भी करने लगे हैं.

अब इस देश में ऎसी व्यवस्था बना दी जाए जिससे व्यक्ति पाने ही प्रांत में नौकरी कर सके, अपने ही प्रांत में व्यवसाय कर सके, यदि किसी दूसरे राज्य में जाना भी पड़े तो उसके लिए पासपोर्ट और वीसा बनवा कर जाए. वैसे ये बुरा विचार नहीं है, देखा जाए तो राज ठाकरे पूरे देश को इस तरह से बाँट देना चाहते हैं कि आदमी आसानी से अपने पासपोर्ट का प्रयोग कर सके। भाई हम जैसे तमाम होंगे जो पासपोर्ट तो बनवा लेते हैं और फ़िर पूरी जिन्दगी विदेश जाने के सपने देखते रहते हैं. कम से कम हम जैसों का तो विदेश जाने, अपने पासपोर्ट पर विदेश की मुहर लगी देखने का तो सपना पूरा होगा.

इसी के साथ-साथ आजकल भारतीय समाज में अपनी बेटियों की शादी के लिए NRI लड़कों को पहली पसंद के रूप में देखा जाता है, अपने बेटे के NRI के रूप में पहचान बनाने को देख कर गर्व होता है..........जो लोग इसके अतिरिक्त भी किसी न किसी रूप में NRI होने की चाह रखते हैं राज ठाकरे उनकी भी हसरत को पूरा कर रहे हैं।

तो फ़िर हंगामा कैसा? शोर कैसा? उपद्रव कैसा? आइये जो लोग सस्ती दरों पर विदेश की सैर करना चाहते हैं........जो लोग ज्यादा खर्च किए बिना NRI होने का मजा लेना चाहते हैं वे लोग भी इस खेल में जुट जाएँ, जुड़ जाएँ. आज नहीं तो कल ये देश कई हिस्सों में बँटा तो हो सकता है कि हमारा-आपका-हम सबका नाम होगा और विदेश का मजा अलग से मिलेगा......पासपोर्ट का भी उपयोग हो सकेगा.

तो जुड़िये इस महाभियान में (महाप्रयोग की तरह) और सफल कीजिए उत्तर भारतीयों और मराठा मानुष के बीच खोदी जा रही खाई के प्रयास को..........ये सब उस समय हो रहा है जबकि इस देश की प्रथम नागरिक (महामहिम राष्ट्रपति जी) भी एक मराठा मानुष हैं...........जय मराठा, जय उत्तर भारतीय, जय भारत (देश तो अब बाद में ही आता है)

20 अक्टूबर 2008

चाँद के पार चलो

चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो. ये पुरानी फ़िल्म पाकीजा का गाना हम नहीं गुनगुना रहे हैं...........ये गाना तो याद आया तब जब देश ने चंद्रयान की तैयारी कर ली. चंद्रमा पर जाने की तैयारी इस हद तक है कि अब चाँद की धरती हमारे क़दमों तले होगी. बेचारा चाँद अब घबरा रहा होगा कि अब यहाँ की शान्ति भी भंग हुई, इस देश में तो अब उपद्रव करने की कोई जगह तो बची ही नहीं है और विदेश में तमाम लोग ऐसे हैं जो उपद्रव मचा रहे हैं तो कहाँ उपद्रव किया जाए, शायद यही सोच कर चाँद पर जाने की तैयारी है.
आप लोग देख रहे हैं अपने देश की तरक्की.........अपने देश में बेघरों को घर नहीं पर जमीन तलाश रहे हैं चाँद पर.........अपने देश का पानी पूरी तरह समाप्ति पर ला दिया और अब तलाश है चाँद-मंगल पर पानी की..............देश के हालत काबू में नहीं हैं पर आतंक काबू करेंगे श्रीलंका में जाकर. आप सोच रहे होंगे कि ये श्रीलंका कहाँ से बीच में आ गया..........बात इस समय ये नहीं कि चाँद की चर्चा हो या श्रीलंका की.......चर्चा हो बस हमारी उपलब्धियों की. इस चर्चा (श्रीलंका वाली) से याद आयी एक कहावत - "अपना फटा सी न पायें, दूजे के फटे में टांग घुसाएँ."
कुछ भी हो बस हौसला न खो जाए ये ध्यान रखना होगा.......कुछ भी हो पर इंसानियत न खोये ये ध्यान रखना होगा. यदि पिछले महीने के वैज्ञानिक परीक्षण "महाप्रयोग" को याद करें तो देश का करोड़ों रुपये इसमें लगा और परिणाम क्या मिला? इसी तरह वर्तमान में देश के हालातों को ध्यान कर इस तरह के प्रयोग होने चाहिए....पर नहीं यहाँ तो शेयर कि गिरावट, मंदी, महंगाई के कारण लोगों के बाल बन रहे है. यदि सरकार न चेती तो चाँद तो दिखने ही लगेगी. तब चंद्रयान परीक्षण शत-प्रतिशत सफल सिद्ध होगा..........

तमाशा घुस के देखें

अभी-अभी कुछ देर पहले ही एक पोस्ट लिख कर उठे थे और फ़िर कुछ देर को समय निकाल कर समाचार देखने बैठे। हंगामा.....हंगामा.....हंगामा................यही सब कुछ हो रहा था. राज ठाकरे का "राज" जिस तरह से टी वी पर दिखाया जा रहा था लग रहा था कि वही क़ानून है, वही प्रशासन है, वही सरकार है. ये है स्थिति क़ानून व्यवस्था की, यही स्थिति है हमारे राजनेताओं की। अपने देश में जहाँ एक स्थिति के लिए दो बातें और एक तरह के कामों के लिए दो कानून.
अब ये तो स्पष्ट सा लग रहा है कि किसी और राज्य में हो या न हो पर महाराष्ट्र में उत्तर भारतीय सुरक्षित नहीं हैं. नौकरी की तलाश में गए उत्तर भारतीयों को टेस्ट देने के समय लाठी-डंडों से मार भगाने की हरकत कतई नजर अंदाज़ करने वाली नहीं है. अब कोई किस मुंह से कहेगा कि सारा जहाँ हमारा. अब तो लगता है कि इस देश में आने-जाने के लिए पासपोर्ट और वीजा कि जरूरत पड़ेगी. एकता, अखण्डता की बड़ी-बड़ी बातें करते नेता और हम सब अब चुप हैं क्योंकि किसके लिए कहें, किससे कहें?
जागो उत्तर भारतीयों, महाराष्ट्र तुम्हारा नहीं है, ये देश एकता-शक्ति को भूल चुका है, इस देश में संविधान के लिए किसी के दिल में इज्जत नहीं रह गई है..........फ़िर क्यों मार खाने जाते हो?
बार-बार पिट कर भी महाराष्ट्र जाने की हरकत पर एक ही कहावत याद आती है "सौ-सौ जूते खाएं, तमाशा घुस के देखें"

19 अक्टूबर 2008

ऐसा कब तक.......??????

आज एक पत्रिका "समकालीन जनमत" पढ़ रहे थे, अच्छी पत्रिका है। देश के जाने-माने साहित्यकार इसमें अपने कलम का जादू बिखेरते हैं. कुछ नामचीन लोग इसके सम्पादक और संरक्षक मंडल में भी शामिल हैं. ये पत्रिका अपने विशेष कलेवर के कारण मेरी पसंदीदा पत्रिकाओं में है. हर अंक मेरे पास आता है. इस बार नया अंक आया, उत्सुकतावश पहले तो पूरी पत्रिका उलट-पुलट डाली. कवर बड़ा ही आकर्षित कर रहा था, लेकिन जैसे ही अन्तिम हिस्सा देखा (कवर का आख़िर) लगा कि यहाँ भी बस कोसने के अलावा कुछ नहीं है. पृष्ठ के ठीक बीचों-बीच एक तस्वीर है और इबारत लिखी है जिसका तात्पर्य निकलता है कि आतंक का गढ़ आजमगढ़ नहीं अमेरिका है।
ये नजरिये की बात है और किसी के लिए एक बात किसी के लिए दोनों बातें और किसी के लिए इनमें से कुछ भी सही नहीं हो सकता है. किसी दो-चार लड़कों के पकड़ जाने के बाद ये कहने लगना कि आजमगढ़ ही आतंकवाद का गढ़ है ग़लत होगा. ये कोशिश उन लोगों की रहती है जो किसी न किसी रूप में किसी भी घटना से अपनी राजनीति को चमकाना चाहते हैं. याद करिए कुछ दिन पुराना बटाला काण्ड, अब क्या हो रहा है इस पर ये कहने की जरूरत नहीं है. जहाँ तक आजमगढ़ का सवाल है तो जो लोग इसे इसकी साहित्यिक धरोहर के कारण जानते हैं वे तो कटाई ये स्वीकार नहीं करेंगे कि ये आतंक का गढ़ है. इसी के साथ हम सबको जो लोग भी आजमगढ़ के पक्ष में हैं उनको ये भिस्वीकारना होगा कि यहाँ आतंकी घटनाओं में बढोत्तरी अब अधिक हो गई है. इसे कैसे भी रोकना होगा.
उत्तर-प्रदेश इस समय आतंकियों के विशेष निशाने पर है. सभी दलों को स्वार्थ छोड़ कर अब इन ताकतों के खात्मे के लिए काम करना होगा. ये बहुत बड़ा सवाल है कि आम जनता कब तक सौहार्द बनाए रखने में सफल होगी? बनारस के बम धमाके किसी को भूले नहीं होंगे तब भी वहाँ के लोगों ने आपसी सामंजस्य दिखा कर आतंकियों के मंसूबों को कुचल दिया था. कुछ इसी तरह का उदहारण आगे भी देना होगा. जनता तो ये सब कर लेगी पर तथाकथित साहित्यकार, राजनेता, धर्म के ठेकेदार, धर्माचार्य, मुल्ला-मौलवी, कथित धर्मनिरपेक्ष ऐसा कब करेंगे?

16 अक्टूबर 2008

किला बना हेरिटेज संपत्ति

आज जालौन जनपद के लिए वाकई खुशी का दिन होना चाहिए। चम्बल, यमुना, सिंध, पहूज और क्वारी नदी के संगम क्षेत्र (यह क्षेत्र पचनदा के नाम से प्रसिद्द है) से 12 किमी दूर रामपुरा स्टेट में बने एक एतिहासिक किले को पर्यटन विभाग ने हैरिटेज किले के रूप में मान्यता दे दी है।

लगभग 700 वर्ष पुराना यह किला कछवाह राजाओं का है जो इतने वर्षों के बाद आज भी ज्यों का त्यों खडा हुआ है. क्षत्रियों (ठाकुरों) की एक उपजाति कछवाह बिरादरी के राजाओं ने रामपुरा जगह को आबाद किया था. राजा राम सिंह के नाम पर ही इस जगह का नाम रामपुर पडा था. 13 वीं शताब्दी में उन्हों ने इस किले का निर्माण करवाया था. सैकड़ों मजदूरों ने इस किले को अथक म्हणत के बाद तीन वर्षों में बनाया था. 18 एकड़ जगह में फैले इस किले के चारों तरफ़ सुरक्षा की दृष्टि से 30 फुट चौडी तथा 35 फुट गहरी खाई खोदी गई थी. इसमें हमेशा पानी भरा रहता था.
राजा राम सिंह की मृत्यु के बाद उनके वंशज अलग-अलग गाँवों में जाकर बस गए थे परन्तु उनके एक उतराधिकारी युवराज केशवेन्द्र सिंह ने इस एतिहासिक किले को हेरिटेज किले के रूप में बनाने के लिए बहुत प्रयास किए. लगभग 12 वर्षों की भागदौड़ के बाद पर्यटन विभाग इस किले को हेरिटेज किले के रूप में स्वीकारने को तैयार हुआ। केशवेन्द्र सिंह ने इस किले में वर्तमान में राजसी ठाठ-बाट से युक्त दो ड्राइंगरूम और पाँच डबल बेद रूम का निर्माण करवाया था.

उनका कहना है कि कोई भी देशी-विदेशी पर्यटक इस किले में पर्यटक के रूप में आकर उनके परिवार के साथ रह सकता है। अभी विगत दो वर्षों के दौरान इस किले में उनके मेहमान के रूप में चार जर्मन, दो फ्रांसीसी, दो ब्रिटिश नागरिकों सहित तमाम देशी-विदेशी पर्यटक परिवार के साथ इस किले का आनद उठा चुके हैं.

राजा राम सिंह की धरोहर अब समूचे बुंदेलखंड की धरोहर बन चुकी है या कहें कि समूचे उत्तर-प्रदेश की धरोहर हो चुकी है।

(इसी के साथ ब्लॉग साथियों के लिए एक खुशखबरी ये कि उरई के मेरे एक साथी सलिल तिवारी ने अपना ब्लॉग बना लिया है। salil in action के नाम से उनके ब्लॉग पर अभी उनके आने की सूचना है पर जल्दी ही वे अपनी क्षमता का प्रदर्शन करेंगे..........उनको भी शुभकामनायें। )

राजनीति का रंग कैसा.......???

मेरा विचार है कि जब राज-काज चलाने के लिए किसी एक सुनियोजित व्यवस्था की जरूरत आन पडी होगी तभी राजनीतिक सिद्धांतों का राजनीति का जन्म हुआ होगा. इस राजनीति के पीछे भावना यकीनन समाज-सेवा, समाज-कल्याण ही रही होगी. धीरे-धीरे इस व्यवस्था को आधुनिकता का रंग चढ़ा होगा और उसी के बाद राजनीति अपनी-व्यक्तिगत मान-मर्यादा के लिए उपयोग में लाई जाने लगी. आज के राजनेताओं को देखकर, उनके लाव-लश्कर को देख कर, उनकी शान को देखा कर, उनके रुतबे को देख कर कोई भी राजनीति की तरफ़ आकृष्ट हो सकता है और लोग आकृष्ट हो भी रहे हैं.
ये शायद राजनीति के लिए अच्छा संकेत होता यदि उसमें भले, पढ़े-लिखे लोगों का आना होता, प्रतिभा-संपन्न लोगों के आने से विचार-शक्ति का निर्माण होता, नए-नए कार्यों को बढ़ावा मिलता, नई-नई परियोजनाओं को मौका मिलता और इस मौके का लाभ सैकड़ों नव युवकों को मिलता।
इधर राजनीति में नए लोगों का आना तो हुआ, प्रतिभाओं का भी आना हुआ पर आने वाले लोग इस तरह के रहे जो समाज से अधिक अपने विकास के लिए, व्यक्तिगत मुद्दों के लिए राजनीतिक दांव-पेंच चलाते रहे. वर्तमान में दो बड़े मुद्दों ने समूचे देश के जागरूक लोगों को सोचने पर मजबूर किया कि क्या अब आने वाली राजनीतिक व्यवस्था में आम आदमी को, समाज के विकास महत्व दिया जाना बंद हो जायेगा? इसका कारण स्पष्ट समझ आ रहा है। आज की राजनीति किंचित मात्र भी समाज हित में होती नहीं दिख रही है. राजनेताओं के आपस की बयानवाजी, एक-दूसरे पर लगाये जाते भ्रष्टाचार के आरोप, स्वार्थ में किए जाते काम, वोट-बैंक को पकड़ने के लिए किसी भी हद तक जाने की स्थिति आदि-आदि बताती है कि वर्तमान राजनीति कहाँ तक जा पहुँची है.
आगे मैं ख़ुद ज्यादा नहीं कहूँगा क्योंकि आप सब लोग भी सीधे-सीधे समाज से जुड़े हैं, ब्लॉग से जुड़े हैं, समाचारों से जुड़े हैं..........इस कारण सब ख़बरों की ख़बर आपको भी होती है. बस दो घटनाएं सब कुछ कहने के लिए काफी हैं.
एक तो सिंगूर का मुद्दा, जिसमें ममता के कारण टाटा को नैनो का रास्ता बदलना पडा और दूसरा काण्ड हुआ अभी उत्तर प्रदेश में जहाँ रायबरेली से रेल कोच वाली परियोजना को लगभग बंद हो जाने की स्थिति में आ जाना पड़ा।
भले ही इन परियोजनाओं में कुछ हद तक परेशानी हो सकती थी (ऐसा भी सम्भव है) पर क्या बड़े और दीर्घ लाभ के लिए, देश के लाभ के लिए कुछ वलिदान नहीं किया जा सकता? ये हम-आपको ही सोचना होगा.......नेता लोग यदि सोचने की स्थिति में होते तो वे भी राजनीति में नहीं यहाँ ब्लॉग में हमारी विचार-मंडली में होते.

13 अक्टूबर 2008

राम की वास्तविकता और काल्पनिकता

अभी एक सिस्टर को संत का दर्जा मिला तो मन में एक ख्याल आया कि इसी बीच हिन्दू धर्म के आराध्य (चुनावी राजनीती में भाजपा के) श्री राम के बारे में भी थोड़ा सा कुछ लिख दिया जाए. स्थिति तो ये है कि आपने हिन्दू या राम पर कुछ कहा नहीं तो तमाम सारे लोग जो सोचने की शक्ति भी खो चुके हैं वे भी चिंतन करके आपके ऊपर शब्द-भेदी वाण चलाने लग जाते हैं. इसी कारण को ध्यान में रख कर लगा कि कुछ कहा जाए. राम की वास्तविकता, उनके अस्तित्व पर हमेशा से प्रश्न चिन्ह लगाये जाते रहे हैं. कभी कहा गया कि ये कोई एतिहासिक पात्र नहीं हैं, कभी कहा गया कि राम जैसा कोई भी भारत में नहीं हुआ, कभी कहा गया कि गोस्वामी तुलसी दास ने अपने महाकाव्य की सफलता के लिए एक पात्र का निर्माण किया आदि-आदि................

देखा जाए तो भगवान् राम का नाम ही ऐसा है कि जिसको देखो वही जुगाली करना शुरू कर देता है. हमारे बुंदेलखंड में कहा जाता है कि मिचकरियन (मेंढकों) को खांसी उठ रही है. आपने देखा होगा कि इस खांसी में काफ तो बहुत आता है और ये छूत का रोग तेजी से बाकियों को भी अपनी गिरफ्त में ले लेता है। भगवान् राम को लेकर अच्छी बातें इस समय कम होतीं हैं उनकी चर्चा बुराई के रूप में अधिक होती है. बुराई करने के लिए भी दो-तीन प्रकरण हैं और घूम-फ़िर कर इनकी सत्यता को जाने बिना ही राम को विवाद का केन्द्र-बिन्दु बना दिया जाता है.

इन प्रकरणों में एक है राम के द्बारा किया गया शम्बूक वध, शम्बूक वध को लेकर दलित समाज में बहुत ही आक्रोश है. वे तो अब दलित-साहित्य के सहारे ये तक साबित करने में लगे हैं कि राम से बड़ा पापी और शम्बूक से ज्यादा पुण्यात्मा कोई था ही नहीं. यहाँ विवाद इस बात का नहीं है कि दलित समाज आज राम को पापी और ग़लत साबित कर रहा है. समस्या तो ये है कि एक तरफ़ तो यही दलित समाज राम के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता. दलित-साहित्य के पुरोधा राम को काल्पनिक पात्र बताते-बताते अपना साहित्य रचे दाल रहे हैं वहीँ दूसरी तरफ़ शम्बूक वध पर राम की छीछालेदर किए जा रहे हैं. ये क्या बात हुई, पात्र काल्पनिक और उसकी घटना को सत्य माना जा रहा है.

अब यदि राम काल्पनिक हैं तो उनके किसी भी कार्य को उसी कल्पना की तरह देखना चाहिए और यदि शम्बूक का वध सही है तो ध्यान रखना होगा कि राम का अस्तित्व था, है, रहेगा. इसी तरह की घटना समाज में विखंडन की स्थिति पैदा करती है.

वैसे आपको याद हो तो भगवान् राम के अस्तित्व पर सवाल तो कांग्रेस पार्टी ने भी उठाये थे और हलफनामा भी अदालत में दिया था। रामसेतु को लेकर. अब यदि राम थे ही नहीं तो किस बात का राम सेतु और किस बात का विवाद पर यदि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी विजयादशमी को राम-लक्ष्मण की आरती उतारतीं हैं तो इसका मतलब कि राम का अस्तित्व आपको स्वीकार है.

अब कहा जायेगा कि ये आस्था का सवाल है, अपनी पसंद का सवाल है तो क्या आपने किसी को मिकी-माउस की, सुपरमैन की, स्पाईडरमैन की किसी हरकत पर विवाद करते देखा है? उसके आसमान में उड़ने पर, इमारतों में चढ़ने पर क्या विवाद करते देखा है? नहीं न......क्योंकि ये काल्पनिक हैं। अब जब राम काल्पनिक हैं तो शम्बूक वध पर विवाद कैसा, उनका नाम लेते लोगों पर साम्प्रदायिकता का शक कैसा, उनकी किसी भी घटना को दलित-विरोधी या समाज विरोधी क्यों मानना?

क्या कुछ और है वास्तविकता या काल्पनिकता का अर्थ?

चमत्कार हो गया सर झुकाओ

आइये मिल कर गर्व करें। अजी पूछ रहे हैं कि किस बात का? आपको नहीं पता कि सिस्टर अलफोंसा अब संत बन गईं हैं. केरल में जन्मीं अलफोंसा को संत की उपाधि वेटिंकन सिटी में प्रदान की गई. खुशी की बात इसलिए है कि गिरजाघरों के दो सौ वर्षों के इतिहास में ये पहली बार है जब किसी महिला को संत का दर्जा दिया गया. इन्हें पॉप जोन पाल द्वितीय द्वारा 1986 में धन्य घोषित किया गया था. आज से लगभग 55 वर्ष पूर्व शुरू हुई संत बनने की प्रक्रिया के बाद वे अब संत बन पाईं.

शायद आपको याद हो कि मदर टेरेसा भी धन्य घोषित हो चुकीं हैं और उनके एक चमत्कार का इन्तजार है और वे भी संत घोषित कर दीं जायेंगी. सिस्टर अलफोंसा ने एक चमत्कार जो विशेष माना गया वो ये किया कि उनकी प्रार्थना से एक लकवे का मरीज पूरी तरह ठीक हो गया था. क्या ऐसा सम्भव है? क्या बिना इलाज के किसी लकवे के मरीज का मात्र दुआओं के असर से ठीक हो जाना वास्तविकता है? ये सवाल इसलिए क्योंकि मदर टेरेसा के नाम पर जो चमत्कार है वो एक महिला के पेट का ट्यूमर उनकी फोटो को पेट पर रखने मात्र से ठीक हो जाना है.

वैसे हिन्दू धर्म में ये बहुत होता है पर सब ढोंग करार दिया जाता है. यही धर्मात्मा और बुद्धिजीवी (मेरी नजर में बुद्धिभोगी) जय-जयकार कर रहे हैं सिस्टर के संत बनने की. यदि ईसाई धर्म में ये चमत्कार सम्भव है तो हिन्दू धर्म में होते चमत्कार ढकोसले कैसे? ज्यादा नहीं लिखेंगे नहीं तो हिदू समर्थक होने के कारण साम्प्रदायिक का लेवल चिपका दिया जायेगा और यहाँ लिखा हुआ बेकार जायेगा।

इस चमत्कार पर चाँद लाईनें

तुम्हारा खून, खून,
हमारा खून पानी.
हम करें तो पाप,
तुम करो तो नादानी.

12 अक्टूबर 2008

अब रावण मारना मुश्किल है

विजयादशमी की सभी को शुभकामनाएं देने के बाद घर पर आने वाले लोगों से बधाइयों-शुभकामनाओं का आदान-प्रदान होता रहा. इसी बीच में अपने शहर उरई में रावण-दहन के बारे में ख़बर भी मिलती रही. इस बार ख़बर थोड़ी ख़ास इस कारण से हो गई थी कि सुबह से ही पानी बरसता रहा. हम सब लोग बार बार यही चर्चा कर रहे थे कि अब रावण का पुतला जलने में दिक्कत आयेगी. हुआ भी कुछ ऐसा ही। चूँकि हम तो रावण-दहन पर जा नहीं पाते, ऐसा नहीं है कि जाते नहीं थे. पहले ख़ुद बहुत गए फ़िर मुहल्ले के, अपने परिचितों के छोटे-छोटे बच्चों को दिखने ले जाते रहे. इधर अब कुछ ऐसे हालत हो गए हैं कि जा नहीं पाते.
रावण-दहन के बारे में जैसा लोगों ने बताया तो लगा कि अब कलयुग आ गया है. हम यार-दोस्त जो एक साथ बैठे थे उन्हों ने कहा कि अब रावण को मारना आसान नहीं है. हुआ ये कि बारिश के कारण पुतला पूरी तरह भीग चुका था. अब बेचारे राम जब तीर मारने चले तो तीर तो रावण को लगा पर उसमें आग नहीं लगी. कई प्रयासों के बाद भी जब रावण के पुतले ने आग नहीं पकडी तो आयोजकों ने, कारीगरों ने मिल कर उस पुतले में डीजल, पेट्रोल जैसे ज्वलनशील पदार्थ डाले. आग तेजी से लगे इसलिए रावण के पुतले के भीतर आग पकड़ने वाले, आवाज वाले पठाखे और अन्य दूसरे पदार्थ भी डाले गए. इतना सब होने के बाद ही रावण के पुतले ने आग पकडी.
अब क्या कहेंगे इसे?
वैसे आज के हालातों को देखने बाद लगता है कि रावण जगह-जगह खड़े हैं। तमाम रूप में तमाम सिरों के साथ। इसी बात पर बहुत पहले पढी एक कविता की कुछ पंक्तियाँ याद आतीं हैं
"जन-जन रावण,
घर-घर लंका,
इतने राम कहाँ से लाऊँ?"
लगता है रावण की आत्मा ने हमारे कंप्यूटर को भी कब्जे में कर लिया है. विजयादशमी से आज पाँच बार इस पोस्ट को लिखने बैठे और बिजली म्हारी ने हर बार धोखा देकर घंटों के लिए विदा ले ली. आज सबकी जय बोल कर लिखने बैठे और............

09 अक्टूबर 2008

विजयादशमी की शुभकामनायें

तीर स्नेह-विश्वास का चलायें,
नफरत-हिंसा को मार गिराएँ।
हर्ष-उमंग के फूटें पटाखे,
विजयादशमी कुछ इस तरह मनाएँ।
बुराई पर अच्छाई की विजय के पावन-पर्व पर हम सब मिल कर अपने भीतर के रावण को मार गिरायें और विजयादशमी को सार्थक बनाएं।

06 अक्टूबर 2008

बातें कैसी-कैसी

आज जिस विषय पर पोस्ट लिखने बैठे तो एकाएक मन में उथल-पुथल सी शुरू हो है. सोच उसे बाद में लिखेंगे पहले अपने मन की उथल-पुथल को शांत कर लें. अब ब्लॉग का चस्का ऐसा लगा कि लग रहा है कि जब तक कुछ पोस्ट न कर दो अधूरा सा रहता है खैर....पहले जिस विषय पर पोस्ट लिखने जा रहे थे उसका विषय दिमाग में था कि ऎसी घटनाओं की चर्चा करेंगे जो एक सी होते हुए भी दो तरह के परिणाम देतीं हैं या एक से लोगों पर दो तरह के निर्णय थोपे जाते हैं या एक सी स्थिति वालों को अलग-अलग तराजू में तौला जाता है।
फिलहाल तो अभी उस पर नहीं पर उसी से मिलता जुलता कुछ हल्का-फुल्का. बात एक सी स्थिति के बाद भी दो तरह की बातें होने की. वो ये कि एक गरीब का लड़का चने खा रहा था तो लोगों ने उसको ताने मारना शुरू कर दिए कि बेचारे को फांके करने पड़ रहे हैं इसी से चने खा कर काम चला रहा है.
इसके ठीक उलट एक अमीर का लड़का भी उन्हीं लोगों को चने खाता दिखाई पडा अब वही लोग इस घटना को दूसरे नजरिये से देखने लगे और बोले (थोड़ा अहंकारी भाव दिखाते हुए) "अरे बड़े आदमी हैं शौक फरमा रहे हैं इसी कारण मुंह का स्वाद बदलने के लिए चना खा रहे हैं."
अब देखा आपने एक सी स्थिति "चना खाने की" और उसका असर, परिणाम दो तरह का हुआ.
इसी तरह कभी-कभी घटनाएं दो अलग-अलग तरह की होती हैं और सामने वाले की हैसियत के अनुसार उसका असर, परिणाम एक सा ही रहता है. इसको चाहे हैसियत कहें या फ़िर तुष्टिकरण या फ़िर चापलूसी. कुछ भी हो पर घटनाओं का अलग-अलग होना भी महत्तव नहीं रखता, महत्तव रखती है सामने वाले की स्थिति.
अब इस पर एक हलकी-फुल्की......एक राजा साहब अपने तमाम नौकरों, मंत्रियों, मातहतों आदि के साथ शिकार के लिए निकलते. शिकार छिटपुट ही रहता था. कभी किसी पक्षी को मार लिया कभी किसी छोटे जानवर को. अब इसे कुछ भी कहें, या तो राजा साहब बड़े जानवरों का शिकार करने से डरते थे
या फ़िर उन्हें अपने निशाने पर भरोसा नहीं था.....कुछ भी हो हर शाम को राजा साहब अपनी बन्दूक थाम कर निकलते और उड़ते हुए पक्षियों के झुंड पर फायर झोंक देते. फायर झोंकना इसी से कहा जायेगा क्योंकि ये सब बिना निशाना लगाए अंदाजे से किया जाता. राजा साहब का फायर करना होता कि झुंड के दर्ज़नों पक्षियों में से एक-दो घायल होकर या मर कर ज़मीन पर आ गिरते. राजा साहब के मातहत राजा साहब की जय-जयकार करने लगते. राजा साहब अपनी गर्दन ताने बापस लौट आते.
ऐसा कई बार होता, झुंड होने के कारण रोज़ ही राजा साहब सफल रहते। अब एक दिन की बात राजा साहब ने बन्दूक से फायर झोंका पर ये क्या...........अबकी निशाने पर कोई भी पक्षी नहीं आया. अब.....अब सारे के सारे नौकर, मातहत, मंत्री शांत किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या कहा जाए?
ऎसी स्थितियों के लिए भी हर सरकार में कुछ प्यादे होते हैं जो जयकारा लगाते रहते हैं बस राजा साहब के प्यादों में एक प्यादा ऐसा भी था वही ताली बजा कर जोर से चलाया-"वाह राजा साहब! क्या बचा कर निशाना मारा, किसी भी पक्षी को बन्दूक की गोली नहीं लगी, वाह राजा साहब..."
सबने अब तारीफ करनी शुरू की और राजा साहब इस बात में अकड़ते रहे कि ऐसा फायर किया कि झुंड के दर्ज़नों पक्षियों में से कोई भी पक्षी नहीं मरा।
अब आप इसे क्या कहेंगे? कुछ ऐसा ही हो रहा है आजकल देश में. किसी बात के लिए कुछ, किसी के लिए कुछ और. क्या करियेगा जनाब........कहते रहिये वाह राजा साहब वाह!

05 अक्टूबर 2008

क्या हो रहा है ये सब?

आज शाम को अपने मित्रों के साथ बैठा गपबाजी कर रहा था. गप्प कम और किसी न किसी विषय पर बहस की तरह का चिंतन अवश्य होता है, ये लगभग नित्य का नियम है. मन को खुराक भी मिलती है, जीभ की खुजली भी मिटती है, किसी न किसी विषय पर एक सार्थक चर्चा हो जाती है. ऎसी ही कई विषयों की मिली-जुली चर्चा के दौरान एक सवाल खडा हुआ की क्या देश में अब शांतिपूर्वक कोई काम नहीं हो सकता है? पिछले कुछ समय के देश के हालत बताते हैं कि देश में अब शान्ति से काम करना सम्भव ही नहीं रह गया है। इसके पीछे आदमी का स्वार्थपूर्ण रवैया और कुछ मतलबपरस्त राजनीति का होना भी शामिल है.
हो सकता है कि राजनीति के नाम पर कुछ लोगों को ये बात हजम न हो पर......... बहरहाल चर्चा चली और अंत में निष्कर्ष निकला कि देश को अब इस तरह की शासन-प्रणाली की जरूरत है जिसमें देश में दो ही पार्टियाँ हों. देश में प्रधानमंत्री का, राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री का चुनाव सीधे-सीधे जनता करे. इससे देश की जनता को मालूम रहेगा कि हमें किसे प्रधानमंत्री बनाना है और किसे मुख्यमंत्री. दो पार्टियों के होने से एक तो गठबंधन की राजनीति समाप्त होगी और इससे उस तरह की खरीद-फरोख्त की राजनीती पर भी रोक लगेगी जो सरकार बनाते समय की जाती है. एक-एक आदमी अपना प्रभुत्व दिखाने के लिए एक पार्टी बना कर खडा हो जाता है और जीतने की दशा में सबको प्रभावित करने की चेष्टा करता है.

एक बात और यहाँ उभर कर आई कि राजनेताओं को अब बेदखल किया जाना चाहिए, चाहे उसे सरकार या संसद या राष्ट्रपति स्वयं करे या ये अधिकार जनता को दिए जाएँ. वोट के लालच में जिस तरह की राजनीती अब हो रही है वह समाज में वैमंश्यता ही बढ़ा रही है. ख़ुद देखिये कि आरक्षण की राजनीति ने किस कदर अगडे-पिछडे का भेद स्पष्ट कर दिया है. अब सरकारी नौकरी के लिए क्रीमी लेयर की सीमा 4.50 लाख रुपये कर दी है, यानी कि एक सवर्ण जिसकी वार्षिक आय कुछ भी हो वह आरक्षण का लाभ नहीं ले सकता (गरीब होने पर भी नहीं) और एक वार्षिक लखपति व्यक्ति सरकारी आरक्षण भी पायेगा और परीक्षा शुल्क में छूट भी पायेगा.

चर्चा तो इस हद तक हुई कि यहाँ लिख दें तो बहुतों को हजम न हो पर सार इतना है कि यदि देश को तरक्की और अमन-पसंद बनाना है तो सभी को स्वार्थ छोड़ कर फिरकापरस्तों को मुँहतोड़ जवाब देना होगा अन्यथा.....

04 अक्टूबर 2008

कविता-प्रेमियों के लिए

आज की यह पोस्ट विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जो साहित्य में रूचि रखते हैं विशेष रूप से साहित्य के कविता भाग से. पहले आपसे अपने कविता-संग्रह "हर शब्द कुछ कहता है" के बारे में बता चुके हैं. अब आज एक और कविता संग्रह "अनुभूति और स्वर" के बारे में आपको थोड़ा सा बताना है.

"अनुभूति और स्वर" कविता संग्रह मेरे पूज्य अंकल डॉ0 ब्रजेश कुमार जी का है। वे सेवानिवृति के बाद घर पर आराम और आनंद से अपने दिन गुजार रहे हैं. मेरी आंटी(डॉ0 ब्रजेश जी की धर्मपत्नी) अपने बेटे-बहू और छोटी सी प्यारी नातिन के साथ रह रहे अंकल के इस कविता-संग्रह में उनकी बहुत पुरानी कवितायें हैं. अंकल पहले यहाँ उरई में ही एक डिग्री कॉलेज में प्राध्यापक थे. अंकल ने अपना बहुत सा समय नाटकों के निर्देशन में दिया और बहुत छोटे से शहर उरई में एक सांस्कृतिक माहौल भी बनाया था. यहाँ तक कि वर्तमान में देश में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए मशहूर उरई की संस्था "वातायन" की स्थापना भी उन्हीं ने की थी. कविताओं को बहुत पुराना इसलिए भी कह सकते हैं क्योंकि हमने विगत कई वर्षों से कविता लेखन करते नहीं देखा था.

बहरहाल कुछ भी हो उनकी कविताओं की डायरी देखने के बाद लगा कि इन कविताओं को प्रकाशित होना चाहिए. बस यही सोच कर कुछ थोड़ी सी कविताओं को उनके ब्लॉग पर पोस्ट कर रहे हैं और इन्हीं कविताओं को किताब के रूप में भी प्रकाशित करवा रहे हैं. अभी तो आप लोग-वे जो कविताओं से प्रेम करते हैं- इनका आनंद उठायें.

मेरा तो एक प्रयास है अंकल की रचनाओं को सामने लाने का, शेष तो उनका ही आशीर्वाद है.

02 अक्टूबर 2008

एक पल को ही सही........

आज एक समाचार देखा, समझ नहीं आया कि रामराज्य स्थापित हो गया है या किसी तरह का दिखावा हो रहा है? टी वी समाचारों पर दिखाया जा रहा था कि राहुल गांधी (मीडिया के युवराज) मजदूरों के साथ मिल कर मिट्टी डाल रहे हैं. बाकायदा एक मजदूर की तरह राहुल गांधी अपने कन्धों पर मिट्टी का तसला उठाये सभी के साथ डाल रहे हैं. इस दौरान उनके साथ किसी तरह के कोई नेता मौजूद नहीं थे. अब इसे कुछ भी कहा जाए पर सभी का (कांग्रेसियों का) यही कहना होगा कि राहुल गरीबों का दर्द समझते हैं. वाकई दर्द इसी तरह समझा जाता है. कहने की जरूरत नहीं कि ये ड्रामेवाजी पूरी तरह चुनावों को ध्यान में रख कर की जा रही है.

फिलहाल ड्रामेवाजी ही सही पर एक पल को राहुल मजदूरों के साथ तो आए........एक पल को गरीबों-अमीरों का भेद तो मिटा...........एक पल को राम राज्य तो स्थापित हुआ............एक पल को राजा भी प्रजा के साथ आया............एक पल को.....................सारा कुछ एक पल का ही किस्सा रहा पर मीडिया को मिला फुल टाइम का मसाला. युवराज का मजदूरों के साथ आना.
आप भी देखें ये किस्सा

01 अक्टूबर 2008

देवी की भक्ति, मन की शक्ति

मन्दिर में भगदड़ मची और कई सारे लोग घायल हो गए कुछ तो इस दुनिया से ही विदा हो गए. अपने पीछे अपने परिवार, मित्रों को रोता-बिलखता छोड़ कर चले गए. दुःख इसका भी है कि इस घटना में मारे और घायलों में बच्चे भी हैं. क्या मंदिरों, देवी-देवताओं में अब शक्ति नहीं रही कि वे अपने भक्तों को बचा सकें या फ़िर भक्तों में पहले जैसी भक्ति नहीं रही कि भगवान् स्वयं आकर उनके कष्ट हर सके? फिलहाल ये प्रश्न तो बड़े ही ज्ञानी महात्मा ही हल कर सकते हैं, हम ठहरे अदना से आम आदमी. अब आम आदमी किसी भी घटना के दुःख से थोड़ी देर ही दुखी होता है और किसी घटना के सुख से थोड़ी ही देर सुखी होता है. कुछ ऐसा ही सबके साथ होता है, हमारे साथ भी हुआ. तो इस बात का जवाब खोजे बिना कि क्या किसके कारण हो रहा है अपने आम अंदाज़ में जो भक्ति देख रहे हैं उसी को बताते हैं.
शारदीय नवरात्रि का पर्व शुरू हो गया है. जगह-जगह देवी दुर्गा की झांकियां लगीं हैं (यहाँ माँ नहीं कहा है क्योंकि अब दुर्गाजी में माँ का रूप न देख कर लोग देवी का रूप देख रहे हैं). झांकियां बड़े ही सुंदर ढंग से सजाईं जा रहीं हैं. यदि गौर किया हो तो विगत चार-पाँच वर्षों से इस तरह के आयोजनों की बाढ़ सी आ गई है. किसी भी शहर के गली मुहल्ले में, चौराहों, नुक्कडों पर झांकियां लगीं दिखाई देंगी. इसमें सबसे ख़ास बात यदि आपने देखी हो तो वो है युवा वर्ग के लोगों का ज्यादा से ज्यादा भाग लेना. कभी-कभी बड़ा आश्चर्य लगता है ये देख कर कि जिस उमर में लड़कों को अपने भविष्य की चिंता होनी चाहिए, अधिक से अधिक समय अपनी पढाई में देना चाहिए वो समय वे झांकियों में भजन गाते दिखते हैं, देवी का श्रृंगार करते दिखते हैं. क्या हो गया है इन युवाओं को? क्या वाकई ये भक्ति है या फ़िर अपनी असफलता से भागने का एक धार्मिक रास्ता?
ये सवाल किसी ज्ञानी-महात्मा के स्तर के नहीं वरन किसी भी आम भारतीय के स्तर के हैं. इसी वजह से हमें भी इनके जवाब आसानी से मिल गए. आज का युवा इन दस दिनों में किसी न किसी रूप में देवियों के रूप से जुडा रहना चाहता है. इस कारण कोई पूजा के लिए, कोई आराधना के लिए आता है. कोई आरती के होने पर वहां होता है तो कोई अर्चना के समय आता है. किसी को श्रद्धा, किसी को आस्था यहाँ लाती है. सबके अपने-अपने तरीके हैं, सबकी अपनी-अपनी भक्ति है, सबकी अपनी-अपनी देवी है। अब इस तरह की भक्ति, इस तरह के भक्त के लिए देवी या देवता क्यों आने लगे?
(जो अपनी भक्ति, अपनी पूजा-आराधना में लगे हैं लगे रहें, किसी को व्यवधान पहुँचाने का हमारा इरादा नहीं है. जय माँ दुर्गा या जय देवी?)

डर सा लगता है

"जय श्री राम" अब ये शब्द कहने में डर सा लगता है. अपने हिन्दू होने पर डर लगता है. लगातार होते हमलों ने मुस्लिम समाज को, ईसाई समाज को भयभीत कर दिया है वहीँ हमें हिन्दू होने के अहसास ने भयभीत कर रखा है. कभी घटना आती है कि किसी स्थान पर कोई आंतकवादी पकडा गया है तो मन ही मन दुआ करते हैं कि पकड़ने वाले का नाम किसी मुस्लिम या ईसाई समुदाय से ना हो. कभी तो कोई आंतकवादी हिन्दू नाम का भी पकडा जाए. कहीं ये हिन्दुओं की साजिश तो नहीं? हिन्दू वैसे भी हमेशा साजिश ही करता रहा है. कभी मुस्लिमों पर हमले करके और कभी ईसाइयों पर हमले करके; कभी मस्जिदों को गिरा कर तो कभी गिरजाघरों में आग लगा कर. बहरहाल हिन्दू संगठन क्या करते रहे, क्या कर रहे हैं ये हमारी चिंता नहीं. हमें तो अपने हिन्दू होने की चिंता हो रही है.
अपने आसपास, मुहल्ले में, पड़ोस में, कॉलेज में, बाज़ार में हर समय हम यही चिंता में डूबे रहते हैं कि कहीं कोई दंगा न हो जाए, कहीं किसी बम की आवाज़ न गूँज जाए, कहीं किसी को पकड़ न लिया जाए. कहने को ये न हो कि एक हिन्दू टहल रहा था इस कारण ये सब हो गया. हर समय सोते-जागते यही डर लगता है कि कहीं ऐसा न हो कि हमारे आने-जाने के स्थानों के आसपास की किसी मस्जिद या गिरजाघर में कोई आतंकी कार्यवाही हो जाए और हिन्दू होने के नाते हमें ही पकड़ लिया जाए.
हर तरफ़ आज चर्चा इसी बात की है कि हिन्दुओं द्वारा मस्जिद पर, गिरजाघरों पर हमले किए जा रहे हैं. ये कौन से हिन्दू हैं ये नहीं बताया जा रहा है. इसी कारण डर लगता है कि कोई हमें बाहर निकलते समय संदेह की निगाह से तो नहीं देखता? कोई हमारा संपर्क किसी हिंदूवादी संगठन से तो नहीं जोड़ता है? उफ़.......कितना कष्ट है आज अपने हिन्दू होने में। ऐसा ही कष्ट मुसलमान भी दर्शाते हैं, ईसाई भीदार्शाते हैं पर गनीमत है इनके साथ कि सरकार, मंत्री, मीडिया, बुद्धिजीवी, लेखक, साहित्यकार आदि-आदि सभी लोग हैं पर बेचारा हिन्दू एकदम अकेला है.
जो दो-एक साथ भी आते हैं वे भी सांप्रदायिक कह दिए जाते हैं.......डर एक ये भी है कि कहीं हमें सांप्रदायिक न कह दिया जाए? तो हिन्दुओ मेरी खातिर ही आवाज़ सुनो........सब कुछ करो पर अपने धर्म की बात न करो........सब कुछ कहो बस "जय श्री राम" न कहो.