29 अक्टूबर 2008
"पुलिस आपकी मित्र है"
28 अक्टूबर 2008
इस दीपावली पर करें एक संकल्प
- क्या उस व्यक्ति को खुशी मिल रही होगी जिसके घर में पिछले तीन-चार वर्षों से खाने को कुछ भी हुआ नही है?
- क्या वे लोग इस त्यौहार को खुशी से मना सकते हैं जिन्हों ने आतंकवाद के धमाके में अपने परिवारीजनों को खोया है?
- क्या वे लोग खुशी का अनुभव कर सकते है जिन्हों ने किसी न किसी दूषित वातावरण के कारण अपने आपको या अपने ख़ास को बीमार बना दिया है?
- क्या वो इस समय खुशी मनायेगा जिसका कोई अपना किसी की लापरवाही के कारण मौत का शिकार हो गया है?
- बस करिए ये कि आप संकल्प करिए हर वर्ष दीपावली के दिन एक पौधा लगाने का।
- आप तमाम तरह की मिठाई खाते-खिलाते हैं, अनेक व्यंजन आप और आपके महमान खाते हैं प्रतिवर्ष किसी भी भूखे को भरपेट भोजन कराइए.
- हजारों रुपये की आतिशबाजी को फोड़ने के साथ-साथ कुछ थोड़ी सी आतिशबाजी उस बच्चे-बच्ची को भी दे दे जिसका कोई नहीं है तो आपको अपनी आतिशबाजी में और भी रंग नजर आयेंगे।
- देवी-देवता किसी भी तरह से जुआ खेलने से प्रसन्न नहीं होते, आप भी जुआ न खेलें, भले ही आप हमेशा जीतते हों बस ये करें कि जितना भी जीतने कि गुंजाईश हो उतने रुपये से किसी गरीब छात्र-छात्रा की स्कूल फीस भर दे, उनको पुस्तक आदि खरीदवा दे, आप पर वाकई लक्ष्मी जी मेहरबान हो जायेंगी।
27 अक्टूबर 2008
कैसे रुकेगी चोरी??????
वर्तमान समय विश्वास-अविश्वास के मध्य अपनी स्वीकार्यता को तलाश कर रहा है. एक व्यक्ति पर भरोसा है तो दूसरे पर भरोसा नहीं. व्यक्ति-व्यक्ति की स्थिति में परिवर्तन आया है. समय का चक्र अनेक परिवर्तन करवाता है और इसी कारण लोगों की सोच में, कार्यशैली में, व्यवहार में परिवर्तन आता है. इसका बहुत सरल उदहारण एक बड़े प्रसिद्द गीत से दिया जा सकता है "बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ, आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ" जिस कालखंड में ये गीत लिखा गया था उस समय इस गीत को लिखने, उसे गुनगुनाने के पीछे निश्चय ही पवित्र धारणा काम कर रही होगी पर आज इस गीत के क्या मायने लगाये जाते हैं (हास्य-व्यंग्य के कार्यक्रमों की देन है ये) कि आदमी होकर आदमी से प्यार.............??????? ये अन्तर सोच का है।
इस पोस्ट के लिखने के पीछे भी एक सोच काम कर रही थी। अपने ब्लॉग विचरण के दौरान एक ब्लॉग पर ताला बना देखा। जो आपके पेज को सुरक्षित रखता है। सुरक्षित इस रूप में कि कोई आपकी पोस्ट के मैटर को चुरा न सके। किसी मायने में तो ये सोच सही है पर किसी रूप में ये कतई सम्भव नहीं है. आख़िर जिसे मैटर चुराना होगा तो वो सीधे-सीधे न चुरा कर उसकी प्रिंट कोपी निकाल कर मैटर चुरा लेगा. ये तो हुई सोच, अब यही सोच पढ़े-लिखे लोगों पर भी लागू होती है. पढ़े-लिखे लोग ही इस तरह की चुरा-चुराई की हरकतें ज्यादा करते हैं. वैसे चुराने की सोच, रोकने की कवायद हमारी समझ से इसलिए भी परे है कि शब्दों के थोड़े से हेर-फेर से समूचा लेख, कविता, कहानी आदि कुछ भी बदल जाता है, अब कहाँ रह गया ताला और कहाँ रह गया सर्वाधिकार का फंदा. शब्द तो उतने ही हैं, विचार अनेक हैं, शब्दों की क्रमबद्धता ज्यादा है तो बस किसी भी लिखे को उठाइये और कर दीजिये कुछ शब्दों को इधर से उधर और कहिये कि क्या खूब लिखा है हमने.
एक दो-चार लाइन का उदाहरण देख लीजिये-
सितारों को जमीन पर सजाने की हसरत है हमारी।
नदियों के रुख को मोड़ने की हसरत है हमारी॥
अब इसी का चोरी किया रूप भी देख लीजिये-
जमीन पर सितारे सजाने की, हसरत है हमारी।
रुख नदियों का मोड़ने की, हसरत है हमारी॥
क्या ये सर्वाधिकार या कोपी राईट का उल्लंघन है? नक़ल तो की ही गई, चोरी तो की ही गई।
वैसे वो ताला हम भी लगाए हैं, जो लोग उसको लगाना चाहें वो वहाँ से उससे सम्बंधित लिंक पर जा सकते हैं।
दीपावली की आपको एवं आपके परिवार को शुभकामनाएं।
करिए कुछ ऐसा की आने वाला समय भयावह न हो कुछ इस तरह हास्यास्पद........और भयावह
वत सावित्री की पूजा करतीं स्त्रियाँ (न संभले तो आने वाले कल की सच्चाई)
इन महिलाओं से कुछ सीखना होगा
दीपावली का त्यौहार आ गया है, लक्ष्मी जी की पूजा होगी; इससे पहले नव रात्रि का पावन पर्व भी मनाया गया. इस पर्व पर भी किसी न किसी रूप में नारी शक्ति की पूजा की जाती है, कन्याओं को भोजन करवाया जाता है. इसी के ठीक उलट ये भी सत्य है कि महिलाओं को इसी समाज में अपने अस्तित्व के लिए लडाई करनी पड़ रही है और लड़कियों को जन्म के लिए आन्दोलनों का सहारा लेना पड़ रहा है. इन्हीं सबके बीच कुछ लोग (इनमें महिलायें और पुरूष दोनों शामिल हैं) नारी-शक्ति, स्त्री-विमर्श को पुरजोर हवा दे रहे हैं. अनेक नारे, अनेक गोष्ठियां, अनेक तरह के लेख आदि ये सिद्ध करने में लगे हैं कि नारी-शक्ति कुछ भी कर सकती है. ये सत्य है कि नारी-शक्ति कुछ भी कर सकती है पर आज स्त्री-विमर्श, स्त्री-सशक्तिकरण के नाम पर जो हो रहा है वो स्त्री को कटघरे में ही खडा करता है. कुछ कहे बिना आज की कुछ वस्तविक नारियों के उदहारण आपको बताते हैं, शायद आपको लगे कि ये ही वो नारियां हैं जो सही मायनों में स्त्री-शक्ति का उदहारण हैं।
देश में पुरोहिती, कर्म-कांडों का अपना स्थान रहा है और अभी तक ये सब पुरुषों के द्वारा ही होता आया है। अब कुछ महिलाओं ने इस क्षेत्र में कदम रख कर अपनी शक्ति का अहसास करवा दिया है।
बनारस के तुलसीपुर में स्थित पाणिनी कन्या महाविद्यालय से शास्त्री की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद कुछ लड़कियों ने विवाह करवाने का कार्य शुरू किया। इसके लिए उनका ब्राहमण होना आवश्यक नहीं है। महाविद्यालय की आचार्य नंदिता शास्त्री बड़े ही गर्व से बतातीं हैं कि अब इन छात्राओं को देश के अतिरिक्त विदेश से भी लोग बुला रहे हैं।
यहाँ की पूर्व छात्रा मैत्रेयी का कहना है कि उनके पास अमेरिका तक से आमंत्रण आ रहे हैं। ये छात्राएं विवाह करवाने के साथ-साथ शान्ति-यज्ञ, गृह-प्रवेश, मुंडन, नामकरण, यज्ञोपवीत आदि करवा रहीं हैं।
इसी तरह कानपुर के कानपूर विद्या मन्दिर डिग्री कालिज की प्राचार्य डॉ0 आशारानी राय वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच पुरोहिती का कार्य करतीं हैं। उन्हों ने किसी भी विरोध की परवाह किए बगैर अपनी छात्राओं को वेद पाठ भी करवाया। इसके अतिरिक्त उन्हों ने महिलाओं के लिए सर्वथा निषिद्ध माने गए क्षेत्र श्मशान घाट में जाकर अन्तिम संस्कार भी करवाए हैं और करवा भी रहीं हैं। अपने पिता और श्वसुर का अन्तिम संस्कार भी उन्हीं ने किया था.
इन्हीं की तरह सुनीति गाडगिल ने विवाह के अतिरिक्त श्राद्ध कर्म भी करवाए हैं। बनारस की ही पांडेयपुर की निवासी वन्दना जायसवाल उर्फ़ अनु ने, नगर निगम के सफाई कर्मी मुन्ना की विधवा बीडा देवी और भेलूपुर की महिला चित्रकार और विदेश में कला की प्रोफेसर रहीं डॉ0 अलका मुखर्जी आदि ने अपने परिवार में किसी अन्य पुरूष के न रहने पर माता, पिता, पति आदि का अन्तिम संस्कार विधवत संपन्न किया।
ऐसा नहीं है कि पढ़ी-लिखी महिलाओं द्वारा ऐसा किया जा रहा है। राजस्थान की 72 वर्षीय विधवा की मृत्यु पर उसकी सात बेटियों ने अर्थी को कन्धा दिया और चिता को मुखाग्नि देकर पिंडदान तक किया.
हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले की दलित महिला प्रेमा देवी ने तो अपने पति की मृत्यु पर आपने बेटों को अर्थी को कंधा नहीं लगाने दिया। उसका कहना था कि इन बेटों ने जीते-जी अपने पिता, मेरे पति की सेवा नहीं की इस कारण इनको कोई अधिकार नहीं कि उनकी अर्थी को कन्धा दे या फ़िर अन्तिम संस्कार करें. अंततः उस महिला की जिद के बाद उसकी दोनों बहुओं और पड़ोस की दो अन्य महिलाओं ने उसके पति की अर्थी को कन्धा दिया, मुखाग्नि उसके पोतों ने दी।
इस तरह की घटनाओं के अतिरिक्त कुछ लोग ऐसे भी हैं जो विवाह के अवसर पर होने वाले रस्मों में परिवर्तन तक मात्र इस कारन कर रहे हैं क्योंकि वे लड़के-लड़कियों में किसी तरह का अन्तर नहीं करते हैं.
बनारस के कश्यप फ़िल्म एंड टेलीविसन रिसर्च इंस्टिट्यूट के निदेशक डॉ0 डी0 कश्यप ने अपने तीन बेटों के विवाह में बेटों को नहीं बल्कि अपनी बहुओं को घोडी पर चढ़वाया था. उन्हों ने अपनी बहुओं का द्वारचार संस्कार कर पहले उनको मंच पर महाराज कुर्सी पर बिठवाया उसके बाद उनके लड़कों ने आकर जयमाला डाली। इस विवाह में फेरे, कन्यादान जैसी रस्मों को नहीं निभाया गया. यहाँ सिर्फ़ जयमाल और सिंदूरदान हुआ।
इसी तरह जयपुर की जुड़वां बहनों ने एक साथ विवाह के समय घोडी पर सवार होकर बिन्दौरी नामक परम्परा मे ये क्रांतिकारी कदम उठा कर दिखा दिया कि उनमें और लड़कों मे किसी तरह का अन्तर नहीं है।
शादी-विवाह, मुन्दम, संस्कारों से इतर एक और कार्य में महिलाओं ने अपनी उपस्थिति दर्शाई है और वो है बालाजी के मन्दिर में नाइनों का काम शुरू करके। इस मन्दिर में आने वाले लोग अपने केशों को भगवान् पर चढाते हैं और इनमें महिलाएं भी होतीं हैं। महिलाओं ने अब यहाँ भी बाल काटने का काम शरू किया है जिसे अभी तक यहाँ सिर्फ़ पुरूष ही करते थे।
एक मुस्लिम महिला ने तो क्रन्तिकारी कदम उठा कर पहली महिला काजी होने का गौरव प्राप्त किया है। पश्चिम बंगाल के पूर्वी मिदनापुर जिले के गाँव नंदीग्राम की शबनम आरा ने अपने काजी पिता के लकवा-ग्रस्त हो जाने पर निकाह आदि में उनका सहयोग करना शरू किया। धीरे-धीरे उनको शरीयत का इल्म हो गया। बाद में पिता की मृत्यु के बाद उन्हों ने अपना पंजीयन काजी के रूप में करवाया। मुश्किलों के बीच अंततः वे सफल रहीं और आज काजी के रूप में काम कर रहीं हैं।
ये कुछ उदाहरण हैं जो महिलाओं की हिम्मत को दर्शाते हैं। यही असली महिला-शक्ति है जो विपरीत परिस्थितियों से न घबरा कर अपना मुकाम बना चुकीं हैं। क्या कम कपडों और लचकते बदन को नारी-शक्ति समझने वाली महिलायें इन महिलाओं से कुछ सीखेंगीं? पुरुषों को कुछ सीखने की जरूरत नहीं क्योंकि उसे महिला की जरूरत नहीं, यदि होती तो कन्या-भ्रूण हत्या न हो रहीं होतीं?
{ये जानकारी श्री कृष्ण कुमार यादव, वरिष्ठ डाक अधीक्षक, कानपुर नगर मंडल, कानपुर के लेख "बदलते सरोकारों के बीच स्त्री समाज" द्वारा प्राप्त हुई। ये लेख स्पंदन (साहित्यिक पत्रिका) के मार्च 2008 अंक में प्रकाशित हुआ था।}
24 अक्टूबर 2008
मन का विश्वास भगवान, मन का वहम भूत
एक सलाम इनके नाम भी
23 अक्टूबर 2008
हल्ला बोल, हल्ला बोल
21 अक्टूबर 2008
जाना हो विदेश तो राज की मदद करो
मदारी-जमूरे के इस खेल पर तो हम-आप-सब ताली बजाते हैं, मजा लेते हैं और चल देते हैं अपनी-अपनी राह पर लेकिन इस खेल पर कोई ताली नहीं बजा रहा है, कोई मजा नहीं ले रहा है, कोई पैसों-रुपयों की बरसात नहीं कर रहा है...............बस खेल खेलने वाले खेल रहे हैं.................परेशान होने वाले परेशान हो रहे हैं. महाराष्ट्र में हो रहे इस हंगामे को और क्या नाम दिया जा सकता है? बेक़सूर परीक्षार्थियों की पिटाई सिर्फ़ इस बात पर कि कोई दूसरे प्रान्त का आदमी उनके हक़ को मार रहा है. उत्तर भारतीय मराठा मानुष के हकों को मार रहे हैं. अभी तक तो लड़ाई इस बात की थी कि यहाँ से गए उत्तर भारतीय मराठी भाषा नहीं बोलते पर अब लड़ाई इस बात की शुरू हो गई है कि उत्तर भारतीय उनकी जगहों पर नौकरी भी करने लगे हैं.
अब इस देश में ऎसी व्यवस्था बना दी जाए जिससे व्यक्ति पाने ही प्रांत में नौकरी कर सके, अपने ही प्रांत में व्यवसाय कर सके, यदि किसी दूसरे राज्य में जाना भी पड़े तो उसके लिए पासपोर्ट और वीसा बनवा कर जाए. वैसे ये बुरा विचार नहीं है, देखा जाए तो राज ठाकरे पूरे देश को इस तरह से बाँट देना चाहते हैं कि आदमी आसानी से अपने पासपोर्ट का प्रयोग कर सके। भाई हम जैसे तमाम होंगे जो पासपोर्ट तो बनवा लेते हैं और फ़िर पूरी जिन्दगी विदेश जाने के सपने देखते रहते हैं. कम से कम हम जैसों का तो विदेश जाने, अपने पासपोर्ट पर विदेश की मुहर लगी देखने का तो सपना पूरा होगा.
इसी के साथ-साथ आजकल भारतीय समाज में अपनी बेटियों की शादी के लिए NRI लड़कों को पहली पसंद के रूप में देखा जाता है, अपने बेटे के NRI के रूप में पहचान बनाने को देख कर गर्व होता है..........जो लोग इसके अतिरिक्त भी किसी न किसी रूप में NRI होने की चाह रखते हैं राज ठाकरे उनकी भी हसरत को पूरा कर रहे हैं।
तो फ़िर हंगामा कैसा? शोर कैसा? उपद्रव कैसा? आइये जो लोग सस्ती दरों पर विदेश की सैर करना चाहते हैं........जो लोग ज्यादा खर्च किए बिना NRI होने का मजा लेना चाहते हैं वे लोग भी इस खेल में जुट जाएँ, जुड़ जाएँ. आज नहीं तो कल ये देश कई हिस्सों में बँटा तो हो सकता है कि हमारा-आपका-हम सबका नाम होगा और विदेश का मजा अलग से मिलेगा......पासपोर्ट का भी उपयोग हो सकेगा.
तो जुड़िये इस महाभियान में (महाप्रयोग की तरह) और सफल कीजिए उत्तर भारतीयों और मराठा मानुष के बीच खोदी जा रही खाई के प्रयास को..........ये सब उस समय हो रहा है जबकि इस देश की प्रथम नागरिक (महामहिम राष्ट्रपति जी) भी एक मराठा मानुष हैं...........जय मराठा, जय उत्तर भारतीय, जय भारत (देश तो अब बाद में ही आता है)
20 अक्टूबर 2008
चाँद के पार चलो
तमाशा घुस के देखें
19 अक्टूबर 2008
ऐसा कब तक.......??????
16 अक्टूबर 2008
किला बना हेरिटेज संपत्ति
आज जालौन जनपद के लिए वाकई खुशी का दिन होना चाहिए। चम्बल, यमुना, सिंध, पहूज और क्वारी नदी के संगम क्षेत्र (यह क्षेत्र पचनदा के नाम से प्रसिद्द है) से 12 किमी दूर रामपुरा स्टेट में बने एक एतिहासिक किले को पर्यटन विभाग ने हैरिटेज किले के रूप में मान्यता दे दी है।
उनका कहना है कि कोई भी देशी-विदेशी पर्यटक इस किले में पर्यटक के रूप में आकर उनके परिवार के साथ रह सकता है। अभी विगत दो वर्षों के दौरान इस किले में उनके मेहमान के रूप में चार जर्मन, दो फ्रांसीसी, दो ब्रिटिश नागरिकों सहित तमाम देशी-विदेशी पर्यटक परिवार के साथ इस किले का आनद उठा चुके हैं.
राजा राम सिंह की धरोहर अब समूचे बुंदेलखंड की धरोहर बन चुकी है या कहें कि समूचे उत्तर-प्रदेश की धरोहर हो चुकी है।
राजनीति का रंग कैसा.......???
13 अक्टूबर 2008
राम की वास्तविकता और काल्पनिकता
अभी एक सिस्टर को संत का दर्जा मिला तो मन में एक ख्याल आया कि इसी बीच हिन्दू धर्म के आराध्य (चुनावी राजनीती में भाजपा के) श्री राम के बारे में भी थोड़ा सा कुछ लिख दिया जाए. स्थिति तो ये है कि आपने हिन्दू या राम पर कुछ कहा नहीं तो तमाम सारे लोग जो सोचने की शक्ति भी खो चुके हैं वे भी चिंतन करके आपके ऊपर शब्द-भेदी वाण चलाने लग जाते हैं. इसी कारण को ध्यान में रख कर लगा कि कुछ कहा जाए. राम की वास्तविकता, उनके अस्तित्व पर हमेशा से प्रश्न चिन्ह लगाये जाते रहे हैं. कभी कहा गया कि ये कोई एतिहासिक पात्र नहीं हैं, कभी कहा गया कि राम जैसा कोई भी भारत में नहीं हुआ, कभी कहा गया कि गोस्वामी तुलसी दास ने अपने महाकाव्य की सफलता के लिए एक पात्र का निर्माण किया आदि-आदि................
देखा जाए तो भगवान् राम का नाम ही ऐसा है कि जिसको देखो वही जुगाली करना शुरू कर देता है. हमारे बुंदेलखंड में कहा जाता है कि मिचकरियन (मेंढकों) को खांसी उठ रही है. आपने देखा होगा कि इस खांसी में काफ तो बहुत आता है और ये छूत का रोग तेजी से बाकियों को भी अपनी गिरफ्त में ले लेता है। भगवान् राम को लेकर अच्छी बातें इस समय कम होतीं हैं उनकी चर्चा बुराई के रूप में अधिक होती है. बुराई करने के लिए भी दो-तीन प्रकरण हैं और घूम-फ़िर कर इनकी सत्यता को जाने बिना ही राम को विवाद का केन्द्र-बिन्दु बना दिया जाता है.
इन प्रकरणों में एक है राम के द्बारा किया गया शम्बूक वध, शम्बूक वध को लेकर दलित समाज में बहुत ही आक्रोश है. वे तो अब दलित-साहित्य के सहारे ये तक साबित करने में लगे हैं कि राम से बड़ा पापी और शम्बूक से ज्यादा पुण्यात्मा कोई था ही नहीं. यहाँ विवाद इस बात का नहीं है कि दलित समाज आज राम को पापी और ग़लत साबित कर रहा है. समस्या तो ये है कि एक तरफ़ तो यही दलित समाज राम के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता. दलित-साहित्य के पुरोधा राम को काल्पनिक पात्र बताते-बताते अपना साहित्य रचे दाल रहे हैं वहीँ दूसरी तरफ़ शम्बूक वध पर राम की छीछालेदर किए जा रहे हैं. ये क्या बात हुई, पात्र काल्पनिक और उसकी घटना को सत्य माना जा रहा है.
अब यदि राम काल्पनिक हैं तो उनके किसी भी कार्य को उसी कल्पना की तरह देखना चाहिए और यदि शम्बूक का वध सही है तो ध्यान रखना होगा कि राम का अस्तित्व था, है, रहेगा. इसी तरह की घटना समाज में विखंडन की स्थिति पैदा करती है.वैसे आपको याद हो तो भगवान् राम के अस्तित्व पर सवाल तो कांग्रेस पार्टी ने भी उठाये थे और हलफनामा भी अदालत में दिया था। रामसेतु को लेकर. अब यदि राम थे ही नहीं तो किस बात का राम सेतु और किस बात का विवाद पर यदि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी विजयादशमी को राम-लक्ष्मण की आरती उतारतीं हैं तो इसका मतलब कि राम का अस्तित्व आपको स्वीकार है.
अब कहा जायेगा कि ये आस्था का सवाल है, अपनी पसंद का सवाल है तो क्या आपने किसी को मिकी-माउस की, सुपरमैन की, स्पाईडरमैन की किसी हरकत पर विवाद करते देखा है? उसके आसमान में उड़ने पर, इमारतों में चढ़ने पर क्या विवाद करते देखा है? नहीं न......क्योंकि ये काल्पनिक हैं। अब जब राम काल्पनिक हैं तो शम्बूक वध पर विवाद कैसा, उनका नाम लेते लोगों पर साम्प्रदायिकता का शक कैसा, उनकी किसी भी घटना को दलित-विरोधी या समाज विरोधी क्यों मानना?
क्या कुछ और है वास्तविकता या काल्पनिकता का अर्थ?
चमत्कार हो गया सर झुकाओ
आइये मिल कर गर्व करें। अजी पूछ रहे हैं कि किस बात का? आपको नहीं पता कि सिस्टर अलफोंसा अब संत बन गईं हैं. केरल में जन्मीं अलफोंसा को संत की उपाधि वेटिंकन सिटी में प्रदान की गई. खुशी की बात इसलिए है कि गिरजाघरों के दो सौ वर्षों के इतिहास में ये पहली बार है जब किसी महिला को संत का दर्जा दिया गया. इन्हें पॉप जोन पाल द्वितीय द्वारा 1986 में धन्य घोषित किया गया था. आज से लगभग 55 वर्ष पूर्व शुरू हुई संत बनने की प्रक्रिया के बाद वे अब संत बन पाईं.
शायद आपको याद हो कि मदर टेरेसा भी धन्य घोषित हो चुकीं हैं और उनके एक चमत्कार का इन्तजार है और वे भी संत घोषित कर दीं जायेंगी. सिस्टर अलफोंसा ने एक चमत्कार जो विशेष माना गया वो ये किया कि उनकी प्रार्थना से एक लकवे का मरीज पूरी तरह ठीक हो गया था. क्या ऐसा सम्भव है? क्या बिना इलाज के किसी लकवे के मरीज का मात्र दुआओं के असर से ठीक हो जाना वास्तविकता है? ये सवाल इसलिए क्योंकि मदर टेरेसा के नाम पर जो चमत्कार है वो एक महिला के पेट का ट्यूमर उनकी फोटो को पेट पर रखने मात्र से ठीक हो जाना है.
वैसे हिन्दू धर्म में ये बहुत होता है पर सब ढोंग करार दिया जाता है. यही धर्मात्मा और बुद्धिजीवी (मेरी नजर में बुद्धिभोगी) जय-जयकार कर रहे हैं सिस्टर के संत बनने की. यदि ईसाई धर्म में ये चमत्कार सम्भव है तो हिन्दू धर्म में होते चमत्कार ढकोसले कैसे? ज्यादा नहीं लिखेंगे नहीं तो हिदू समर्थक होने के कारण साम्प्रदायिक का लेवल चिपका दिया जायेगा और यहाँ लिखा हुआ बेकार जायेगा।
इस चमत्कार पर चाँद लाईनें
तुम्हारा खून, खून,
हमारा खून पानी.
हम करें तो पाप,
तुम करो तो नादानी.
12 अक्टूबर 2008
अब रावण मारना मुश्किल है
09 अक्टूबर 2008
विजयादशमी की शुभकामनायें
नफरत-हिंसा को मार गिराएँ।
हर्ष-उमंग के फूटें पटाखे,
विजयादशमी कुछ इस तरह मनाएँ।
06 अक्टूबर 2008
बातें कैसी-कैसी
05 अक्टूबर 2008
क्या हो रहा है ये सब?
एक बात और यहाँ उभर कर आई कि राजनेताओं को अब बेदखल किया जाना चाहिए, चाहे उसे सरकार या संसद या राष्ट्रपति स्वयं करे या ये अधिकार जनता को दिए जाएँ. वोट के लालच में जिस तरह की राजनीती अब हो रही है वह समाज में वैमंश्यता ही बढ़ा रही है. ख़ुद देखिये कि आरक्षण की राजनीति ने किस कदर अगडे-पिछडे का भेद स्पष्ट कर दिया है. अब सरकारी नौकरी के लिए क्रीमी लेयर की सीमा 4.50 लाख रुपये कर दी है, यानी कि एक सवर्ण जिसकी वार्षिक आय कुछ भी हो वह आरक्षण का लाभ नहीं ले सकता (गरीब होने पर भी नहीं) और एक वार्षिक लखपति व्यक्ति सरकारी आरक्षण भी पायेगा और परीक्षा शुल्क में छूट भी पायेगा.
चर्चा तो इस हद तक हुई कि यहाँ लिख दें तो बहुतों को हजम न हो पर सार इतना है कि यदि देश को तरक्की और अमन-पसंद बनाना है तो सभी को स्वार्थ छोड़ कर फिरकापरस्तों को मुँहतोड़ जवाब देना होगा अन्यथा.....
04 अक्टूबर 2008
कविता-प्रेमियों के लिए
"अनुभूति और स्वर" कविता संग्रह मेरे पूज्य अंकल डॉ0 ब्रजेश कुमार जी का है। वे सेवानिवृति के बाद घर पर आराम और आनंद से अपने दिन गुजार रहे हैं. मेरी आंटी(डॉ0 ब्रजेश जी की धर्मपत्नी) अपने बेटे-बहू और छोटी सी प्यारी नातिन के साथ रह रहे अंकल के इस कविता-संग्रह में उनकी बहुत पुरानी कवितायें हैं. अंकल पहले यहाँ उरई में ही एक डिग्री कॉलेज में प्राध्यापक थे. अंकल ने अपना बहुत सा समय नाटकों के निर्देशन में दिया और बहुत छोटे से शहर उरई में एक सांस्कृतिक माहौल भी बनाया था. यहाँ तक कि वर्तमान में देश में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए मशहूर उरई की संस्था "वातायन" की स्थापना भी उन्हीं ने की थी. कविताओं को बहुत पुराना इसलिए भी कह सकते हैं क्योंकि हमने विगत कई वर्षों से कविता लेखन करते नहीं देखा था.
बहरहाल कुछ भी हो उनकी कविताओं की डायरी देखने के बाद लगा कि इन कविताओं को प्रकाशित होना चाहिए. बस यही सोच कर कुछ थोड़ी सी कविताओं को उनके ब्लॉग पर पोस्ट कर रहे हैं और इन्हीं कविताओं को किताब के रूप में भी प्रकाशित करवा रहे हैं. अभी तो आप लोग-वे जो कविताओं से प्रेम करते हैं- इनका आनंद उठायें.
मेरा तो एक प्रयास है अंकल की रचनाओं को सामने लाने का, शेष तो उनका ही आशीर्वाद है.