30 जुलाई 2008

तुष्टिकरण कब तक?

देश में हुए बम धमाकों ने तमाम सारे बुद्धिभोगियों के लिए सामान दे दिया. इधर मारे गए लोगों का दर्द नहीं है, दर्द है कि उनके विचारों को तवज्जो नहीं दी जा रही है. बमों के धमाकों ने किसी को कुछ दिया तो नहीं पर इन लोगों को जरूर बहस का मुद्दा दे दिया है. बम धमाकों की आड़ में हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर चर्चा आम हो गई है. कौन ज्यादा इस देश का है कौन इस देश का नहीं है, भाजपा ने क्या किया था, कांग्रेस ने क्या किया था.......अब दोनों क्या कर रहीं हैं, ये बात खोजी जा रही है.

बमों के साथ एक बार फ़िर गुजरात दंगों-बाबरी मस्जिद ने अपना सर उठाया है. सर उठाने के पीछे यही बुद्धिभोगी काम कर रहे हैं. बात की जारही है कि यदि बाबरी मस्जिद न गिराई जाती तो ये बम धमाके न होते. गुजरात दंगों में मुसलमानों को मारा गया इस कारण ये धमाके हुए हैं. क्या ये सही है? इसका उत्तर वे लोग हाँ देंगे जो किसी न किसी रूप में मुस्लिम तुष्टिकरण का रास्ता अपनाए हैं. यदि बाबरी मस्जिद ही एक मात्र कारण है तो क्या उसके पहले बम नहीं फ़ुट रहे थे? इसी तरह सभी साहित्यकारों को, फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़े जावेद अख्तर टाईप के लोगों को गुजरात दंगों में मरने वालों के प्रति संवेदना है पर वेही किसी भी रूप में गोधरा में रेल काण्ड की चर्चा भी नहीं करते हैं. आख़िर क्यों? क्या गोधरा में मरने वाले इंसान नहीं थे? क्या इस देश में मुस्लिम के दंगे में मरने पर ही लोगों की संवेदना जगती है? क्या हर तरह की आतंकी घटना के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ हिंदू ही जिम्मेवार होता है? यही तमाम सारे सवाल हैं जो कुछ फिरकापरस्त लोगों को कहने का मौका देते हैं कि "सभी मुस्लिम आतंकवादी नहीं है पर सारे आंतकवादी मुस्लिम हैं."

इस तरह के एक-दो नहीं कई उदहारण हैं जो समाज को अलग-अलग खेमे में बाँट रहे है. संसद हमले के आरोपी अफज़ल गुरु की फांसी की सज़ा पर अज तक कोई निर्णय नहीं लिया जा सका है, जबकि इसके ठीक उलट धनञ्जय चटर्जी को फांसी पर इतनी आनन्-फानन लटकाया गया था जैसे वो देश का बहुत बड़ा दुश्मन हो. क्या देश की संसद पर हमला करने वाला देश का दोस्त है जो संसद पर हमला कर उस ईमारत की मजबूती जांच रहा था? हमारा कहना है संसद पर हमला करने वाला कोई भी हो उसको तो उसी समय गोली मार देनी चाहिए थी जब वो पकडा गया था. यहाँ हिंदू या मुस्लिम वाली बात ही नहीं है. पर ये हमारे देश की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति है कि यहाँ आतंकवादी अपहरण करते हैं और छूट जाते हैं क्योंकि वे मुस्लिम हैं, एक आतंकवादी अबू सलेम चुनाव लड़ने तक का मन बना लेता है क्योंकि वो भी मुस्लिम है और तो और हास्यास्पद बात तब होती है जब देश की कुछ राजनैतिक पार्टियाँ परमाणु डील पर सरकार को इसलिए समर्थन देने को तैयार होती हैं क्योंकि उनको समझाया जाता है कि ये डील मुसलमानों के हितों के ख़िलाफ़ नहीं है. वह रे तुष्टिकरण की नीति, अब विदेश नीति भी इनको ध्यान में रख कर बनाई जायेगी।

समय आ गया है जब मुसलमानों को ख़ुद अपना अच्छा बुरा सोचना होगा. राजनीती उनको ऊपर उठाने के स्थान पर रसातल में ले जा रही है. बमों के धमाकों में हिंदू भी मरते हैं और मुसलमान भी, दंगे मुस्लिम भी करता है और हिंदू भी, धर्म दोनों के लिए महत्वपूर्ण है तब एक क्यों वोट की राजनीती का शिकार होकर ख़ुद को समाज में संदेह के घेरे में खड़ा कर रहा है? जहाँ तक बात तमाम बड़े-बड़े ठेकेदारों की है जो मुस्लिम समाज के स्वयम-भू ठेकेदार बने घूम रहे हैं वे ख़ुद बताये कि इन बम धमाकों में उनकी बोलती क्यों बंद हो गई है? ये लोग भी इस समाज को संदेहित बनाने का काम करते हैं. इनसे भी होशियार रहने की जरूरत है. क्या देश के मुस्लमान इस बात को समझेंगे?

28 जुलाई 2008

मरने-डरने के बीच जिंदगी


दो दिन धमाके में गुजरे, आपको इन सब के बीच कोई कडी जुड़ती दिखी? मैं बात आतंकवादियों से जुडी कडी की नहीं कर रहा हूँ. बात है हमारी राजनीतिक कड़ियों की. धमाके हुए, लोग मरे, घायल हुए..................इन सब दुखद हादसों के बीच कुछ चिर-परिचित सी बातें दिखाई दीं. वैसे ये बातें लगभग हर आतंकी वारदात के बाद दिखाई देतीं हैं. आपको वैसे पता होगा पर हम लोग लग जाते हैं दुखी लोगों के दुःख में शरीक होने और इन बातों से अपना ध्यान हटा लेते हैं. आइये आपको फ़िर याद करवा देन वो बातें जो आतीं हैं ऐसे आतंकी मौकों के बाद.


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१- आतंकवादी हमारे हौसलों को कमजोर नहीं कर सकते.


२- हम पूरी सख्ती से आतंकवाद को कुचल देंगे.


३- जनता संयम से काम ले, स्थिति नियंत्रण में है.


४- देश तोड़ने की साजिश कभी सफल नहीं होगी.


५- आतंक को कुचलने के प्रयासों में कोई कमी नहीं आयेगी.


६- सरकार हर सम्भव अपराधियों को पकड़ने की कोशिश कर रही है.


७- आतंकवाद से डरे बिना लोगों का जीवन फ़िर अपने रास्ते पर.


८- ग़म को भुला कर फ़िर चल पड़ना भारतवासियों की ताकत है.


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ऐसे बयान इतने नहीं कई और भी हैं जो बताते हैं कि हम किस हिम्मत से आतंकवाद का सामना कर रहे हैं. मर रहे हैं, डर रहे हैं पर लोगों को दिखा रहे हैं कि हम न मर रहे हैं न डर रहे हैं.


इस मरने डरने के बीच कब तक चलेगी ये जिंदगी?

27 जुलाई 2008

धमाके, आंसू, आश्वासन, कब तक?

फ़िर धमाके, फ़िर मौतें, फ़िर आश्वासन, फ़िर बयांवाजियाँ, फ़िर न झुकने की बातें, फ़िर????????????????फ़िर वही धमाके. कब तक ये आंसू बहेंगे? कब तक??????????

26 जुलाई 2008

डर किस बात का लगे?

घर से निकलने से डरता है आदमी,

अपने को कहीं फंसा समझता है आदमी.

हर कदम के साथ डर का साया रहता है,

ख़ुद को अपने से भय सा लगता है,

हवा तेज़ चले तो तूफ़ान का डर लगे,

रुके तो शमशान सी खामोशी दिखे.

है वक्त बेरहम, अब उससे डर लगे,

घड़ी की होती टिक-टिक से डर लगे.

क्या-क्या बताएं, किस-किस से डर लगे,

न हो कुछ आसपास तो भी डर लगे.

क्यों इस डर की घुसपैठ जीवन में है?

डर का डर क्यों घरों में है?

अपने-अपने में सिमटा है आदमी,

फ़िर डरने का डर किससे है?

भरे-पूरे घर में डर अपने से है,

अपने हज़ार चेहरों का ये डर है.

ओढे हुए आवरण के हटने का डर है,

अपने अस्तित्व के मिट जाने का डर है.

25 जुलाई 2008

आतंकवाद की तस्वीर

अपनी कतरन बैंक में जानकारियों की कतरनें इकट्ठा करने के लिए पुराने समाचार-पत्र एवं पत्रिकाएं खंगाल रहा था. इसी खोज-बीन में एक ख़बर पर नज़र गई. एक्सक्लूसिव रिपोर्ट थी "दहशतगर्दी की घटनाओं में भारत दुनिया में दूसरे नंबर पर", ख़बर देख कर चौंकना स्वाभाविक था. एक पल को सोचा कि ये बात तो सही है कि देश में किसी न किसी रूप में आतंकवादियों की करतूतें लोगों की जान लेती रहतीं हैं पर रोज का ये आंकडा होगा इस पर कभी विचार ही नहीं किया था.

दहशतगर्दी की घटनाओं में क्या-क्या होता है, क्या-क्या हो रहा है ये बताने की आवश्यकता मुझे नहीं दिखती, हाँ उन आंकडों को जरूर दिखाना है जो उस समाचार में दर्शाए गए थे।

आतंकवाद से पीड़ित शीर्ष 10 देश

(जनवरी 2004 से 31 दिसम्बर 2007 के बीच)

देश घटनाएँ मरे घायल

इराक़ 17249 38190 71173

भारत 3715 4346 9880

नेपाल 3407 1126 2867

थाईलैंड 2770 1976 3293

अफगानिस्तान 2736 4186 5636

कोलंबिया 2038 1845 2331

पाकिस्तान 1854 2285 5105

इजराइल 1680 191 2604

गाजा-पट्टी 877 174 1088

रूस 867 1344 2650

इन आंकडों से क्या अनुमान निकाला जाए ये तो बाद की बात है पर कभी-कभी लगता है कि क्या सरकार-शासन बिल्कुल नाकारा हो गए हैं क्या? आम आदमी एकदम असुरक्षित हो गया है क्या? सुरक्षा, पुलिस, क़ानून सब क्या मंत्रियों-संतरियों के लिए रह गए हैं?

(सभी आंकड़े समाचार-पत्र अमर उजाला कानपुर से साभार)

काले दिन पर पोल शुरू

देश आए दिन किसी न किसी मुद्दे को लेकर काला दिन आता रहता है।
अभी तक के घोषित कुछ काले दिनों को लेकर आपके सामने एक पोल लेकर आए हैं।
इस पर एक बहस की भी जरूरत है की क्यों हम आए दिन काले दिन देश के ऊपर लादते रहते है?

24 जुलाई 2008

ओलम्पिक का सफर

ओलम्पिक के सफर में इस बार ओलम्पिक का सफर-3 । ओलम्पिक की विगत की यात्रा हमें गुदगुदाती है, हंसाती है, रुलाती भी है. इसी यात्रा का मजा लें.

23 जुलाई 2008

राजनाति ये तो नहीं

उधर संसद में सभी सांसद विश्वास प्रस्ताव पर बह्साबासी कर रहे थे और इधर हम सब अपना-अपना कयास लगा रहे थे की अब ये होगा, तब ये होगा. होना क्या था ये सब को दिख रहा था, हाँ सरकार के गिरने की गुन्जाईस बस एक बाल के समान बारीक सी दिख रही थी. इसी बारीक़ गुंजाईश में लेफ्ट ने अपना वो कार्ड खेला जिसके विरुद्ध वो हमेशा रहता है. वो था मायावती को प्रधानमंत्री पद के लिए आगे लाना. मायावती को आगे लाना ग़लत या लेफ्ट की नीतियों के विरुद्ध नहीं था विरुद्ध था तो जातिगत राजनीति का विरोध करने के बाद भी जाति की राजनीति करने वाली मायावती को प्रधानमंत्री के लिए प्रमोट करना.

अब सरकाए के पक्ष में मतदान हुआ, मायावती के लिए कुछ कहने को नहीं बचा तो उन्हों ने वही पुराना राग अलापा कि दलित की बेटी को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया। वह री राजनीति, क्या यही सत्य है? एक बार को मान लिया जाए कि सरकार गिर जाती तो भी क्या इस स्थिति में मायावती प्रधानमंत्री बाब पातीं? बिल्कुल नहीं, क्योंकि सरकार गिराने में शामिल थी बी जे पी, बी जे पी क्या तब मायावती या लेफ्ट को समर्थन देती?

बहरहाल ये सब अब एक सवाल हैं. सत्यता ये है कि मनमोहन की तान पर सारे मुग्ध हुए और सरकार बच गई. हाँ जातिगत राजनीति करने वालों को ध्यान रखना होगा कि इस भारत देश में प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति तथा अन्य ऊँचे पदों पर दलित, मुस्लिम, महिलाएं आदि बहुत पहले पहुँच चुके हैं.

22 जुलाई 2008

संसद में घूस का भूत

देखा भइया आपने, भारत देश के लिए आज का दिन एक बार फ़िर से काला दिन रहा. वैसे आज संसद में जो कुछ हुआ वह वाकई शर्मशार करने वाला था. आज संसद में प्रधानमंत्री द्वारा लाये गए विश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग होनी थी। बहस कल से जारी थी, आज भी हुई. बहस के बाद वोटिंग होनी थी पर तभी भारतीय जनता पार्टी के एक सांसद ने धमाका कर दिया. धमाका किसी बम का नहीं था पर किसी बम से कम भी नहीं था.

संसद के भीतर एक बैग खोल कर उसमें से नोटों की गड्डियाँ निकल कर सदन में दिखाते हुए सत्ता पक्ष पर आरोप लगाया कि उन्हें तथा उनकी पार्टी के दो और सांसदों को वोटिंग से बाहर रहने के लिए तीन-तीन करोड़ रुपये की घूस दी गई है। इसी घूस का एडवांस एक करोड़ रुपये यह है. सदन सन्नाटे में था, टी वी देख रहे लोग सन्नाटे में आ गए. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है?

इस सन्नाटे की गहमागहमी के बाद सदन को स्थगित कर दिया गया। सदन के बाहर शुरू हुआ आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला. सत्ता पक्ष का कहना था कि ये विपक्ष की साजिश है उन्हें बदनाम करने की, विपक्ष विशेष रूप से बी जे पी का कहना था कि सरकार ने यह ग़लत काम किया है और वो इस्तीफा दे. बी जे पी के सांसद ने बाद में अमर सिंह एवं अकबर अहमद पर आरोप भी लगाया. सत्य क्या है ये तो अब जांच के बाद पता चलेगा पर इससे कई सवाल खड़े हो गए हैं.

पहली बात तो कि संसद जैसी संवेदित जगह पर कोई सांसद बैग लेकर कैसे जा पहुंचा? कल को कोई सांसद बैग के अन्दर हथियार लेकर भी जा सकता है।

दूसरी बात कि क्या आज के समय में वो भी तब जब कि आरोप लग रहे हों कि सांसद खरीदे जा रहे हैं, तब हमारे सांसद इतनी बड़ी बेवकूफी करेंगे कि वे खुलेआम रिश्वत के रुपये लेंगे?

तीसरी बात कि आज के सांसद के पास एक करोड़ रुपये कोई बड़ी रकम नहीं है, ऐसे में जब कि सांसदों की खरीद का मूल्य पच्चीस करोड़ रुपये तक लग चुका हो, कोई सांसद मात्र तीन करोड़ में बिकने को तैयार हो जाएगा?

सबसे अहम्, मेरी नज़र में कि आज किसी भी सांसद के लिए एक करोड़ रुपये एक साथ दिखा देना अजूबा नहीं है। ऎसी स्थिति में सबूतों के साथ रिश्वत की बात की जाती तो शायद ज्यादा तार्किक लगती.

इसके अतिरिक्त बी जे पी के सांसद ने रिश्वत की ख़बर करने के लिए संसद को क्यों चुना? उस समय क्यों चुना जब वोटिंग के लिए एक घंटा ही रह गया हो? मीडिया को, सदन को उसी समय क्यों नहीं बाते जिस समय उसको रिश्वत दी गई थी? ज़रा-ज़रा सी बात पर मीडिया को बुलाने वाले नेता इतनी गंभीर घटना पर मीडिया को बुलाना कैसे भूल गए?...................................सवाल बहुत हैं जवाब तो वही देंगे जो इससे जुड़े हैं।

एक बात जो मुझे पता है कि ये सांसद बीके हो या नहीं पर किसी के सवालों का जवाब देने नहीं आ रहे। अरे जब अपनी उस जनता को जवाब नहीं देते जो उन्हें चुन कर सदन में भेजती है तो बाकी की क्या औकात?

फिलहाल आरोप-प्रत्यारोप, गहमागहमी के बीच सरकार ने विश्वास मत हासिल कर लिया. अमेरिका से डील होगी या नहीं ये तो बाद की बात है पर अब सरकार के हमराज़ लेफ्ट के स्थान पर समाजवादी होंगे.

ई-आवेदन की योजना शुरू

सूचना के अधिकार के लिए सरकार लगातार प्रयासरत है पर लोगों में जागरूकता कम है। सरकार अब सूचना के अधिकार के लिए ई-आवेदन की योजना शुरू कर रही है।

16 जुलाई 2008

कन्या भ्रूण हत्या पर बहस में भाग लें


वर्तमान में समाज में कन्या भ्रूण हत्या जैसा जघन्य अपराध लगातार हो रहा है. सरकार, समाजसेवी संस्थाएं आदि अपने-अपने स्तर पर इस बुराई को दूर करने का प्रयास कर रहे है. इसके बाद भी भ्रूण लिंग की जाँच हो रही है, लड़की के होने पर उसकी गर्भ में ह्त्या हो रही है। बचाव के इन प्रयासों के बीच कुछ नारियों ने एक नया सवाल खड़ा कर पूरे मुद्दे को अलग दिशा में ले जाने का काम किया.


इन महिलाओं का सवाल है की वे लड़की नहीं चाहतीं क्योंकि उनके परिवार में पहले से दो या तीन लड़कियां हैं। ऐसे में या तो सरकार उनको लिंग परीक्षण एवं चयन की आजादी दे. यदि सरकार चाहती है कि भ्रूण में कन्या की हत्या न हो तो वो उस लड़की के पैदा होने के बाद उस बच्ची की देखभाल की जिम्मेवारी ले.


इन महिलाओं का तर्क है कि कितने और किन बच्चों को जन्मना है इस बात की आज़ादी महिलाओं को होनी चाहिए। आख़िर वे ही गर्भ में बच्चे को पालती हैं.


बहस का मुद्दा ये है कि क्या वास्तव में उन परिवारों को लिंग जाँच या लिंग चयन की आज़ादी होनी चाहिए जिनके पहिले से एक से अधिक लड़कियां हैं?

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क्या महिलाओं को गर्भ धारण करने की शक्ति के कारण इस बात की आज़ादी होनी चाहिए कि वे किसे जन्म देना चाहती हैं?


ये सवाल कपोल-कल्पित नहीं, फील्ड में काम करने के बाद मिले हैं। ऐसे एक नहीं अनेक सवाल हैं बस बहस इस बात पर है कि क्या पारिवारिक स्थिति हमें भ्रूण लिंग जांच, लिंग चयन या भ्रूण हत्या (गर्भपात) की आज़ादी देती है या इस बात पर आज़ादी मिलनी चाहिए?


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आइये बनिए समाज का अहम् हिस्सा, साथ में इस बहस का हिस्सा. भेजिए अपने विचार dr.kumarendra@gmail.com


ये तो बहस की शरुआत है.............कहाँ तक जायेगी पता नहीं.

15 जुलाई 2008

ब्लॉग बना अड्डेबाजी के लिए

ब्लॉग के दो साथियों ने ई-मेल के द्वारा हमारे ब्लॉग से जुड़ने की फरमाइश की. उन मित्रों को धन्यवाद जिन्होंने हमसे जुड़ने की बात की. वैसे भी कहा गया है की एक से भले दो. यहाँ एक बात बताना चाहेंगे की अपने इस ब्लॉग को तो अपने विचारों के लिए सुरक्षित कर रखा है. हाँ, ब्लॉग के साथियों की भावनाओं का सम्मान करते हुए एक नया ब्लॉग "अड्डेबाजी-अड्डेबाजों की" नाम से बना दिया है. इसे http://addebaji.blogspot.com के साथ देखा जा सकता है।
इस ब्लॉग पर सभी मित्रों का स्वागत है, आइये मिल कर अड्डेबाजी की जाए. बस अपना नाम, ई-मेल, पता, फोन आदि हमें dr.kumarendra@gmail.com पर ई-मेल कर दे। मिलजुल कर बैठने का मजा ही कुछ और है.
यहाँ एक बात और भी बता दे की हमने पहले से ही http://sahitykar.blogspot.com तथा http://bundeli.blogspot.com नाम से दो ब्लॉग सहयोग की भावना से बना रखे हैं। इसमें साहित्य प्रेमी साथियों के लिए साहित्य-स्पंदन तथा बुंदेलखंड से प्रेम करने वाले साथियों के लिए बुंदेलखंड ब्लॉग है. अपनी-अपनी पसंद से आप लोग इन ब्लॉग पर हमारा साथ दे सकते हैं.
चलिए जानकारी आपको हो गई, अब आगे आपकी मर्जी. नमस्कार.

14 जुलाई 2008

परमाणु समझौते की गर्मी

हवाओं में गर्माहट सी दिख रही है. आप कहेंगे कि पानी बरसने के बाद भी गर्माहट?....................जी जनाब, ये देश ही ऐसा है, यहाँ किसी भी मौसम में किसी भी समय गरमी आ सकती है. इस समय गरमी न्यूक्लियर डील की है..............हालाँकि अभी समझौता नहीं हुआ है पर गर्मी आ गई है. लेफ्ट ने राइट करने की गरज से अपना समर्थन बापस लिया था. सोचा होगा कि इस बार तो केन्द्र की सरकार घुटने टेक देगी पर ऐसा कुछ हुआ नहीं. इधर-उधर की जुगाड़ से सरकार समर्थन की बात करने लगी. लेफ्ट को लगा कि अब वे राइट होने वाले हैं. इस बीच नै गर्माहट आई कि उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री कुछ न कर गुजरें, सी बी आई टाईप का नया कारनामा शुरू होने को है.............(ऐसा समाचार पत्रों की ख़बर है)
गर्माहट इसी कारण से बढ़ी है, अब जहाँ देखो वहां लोग चर्चा में मगन हैं। पान की दूकान हो (ब्लॉग वाली पान की दूकान नहीं) या किसी दफ्तर का हॉल, पढ़ा-लिखा अधिकारी हो या घर की काम बाली बाई, कॉलेज हो या सिनेमा हॉल, रेस्टोरेंट हो या खेल का मैदान सब जगह बस परमाणु डील. हँसी तो तब आती है कि जिसे परमाणु का ककहरा भी नहीं पता वो भी इस पर चर्चा कर रहा है. अब क्या कहा जाए? क्या हमारी राजनीतिक समझ इतनी गहरी हो चुकी है कि इन राजनेताओं को समझना आसान हो गया है. क्योंकि हमारा अपना विचार है कि इन नेताओं को समझने में ख़ुद ब्रह्मा भी परेशां होंगे. आज क्या कहें, कल क्या करें....................अभी क्या कहें, अगले पल क्या कर गुजरें............पता नहीं. खैर हम तो बरसते पानी के मजे ले रहे थे कि लेफ्ट ने गरम हवा चला कर गर्माहट पैदा कर दी. अब ये गरमी तो दो-चार दिन में ही समाप्त होगी, जब समर्थन की बात पक्की हो जाएगी.
तब तक गरमी झेलना पड़ेगी, क्योंकि यदि भारत में रहना होगा, नेता-नेता कहना होगा। कुछ समझे............ये है छीछालेदर रस.

10 जुलाई 2008

"छीछालेदर रस" वही पुरानी कहानी

बहुत अरसे से मैं लेखन से जुदा हूँ। इसी बीच बिना प्रयास के पत्रकारिता में भी प्रवेश पा गया. तब पता लगा कि यदि किसी लेखक को पत्रकारिता का शौक (भूत) लग जाए तो अच्छी-भली स्थिति की खाट खडी हो जाए. उसका एक अहम् कारण है बाल की खाल निकालने वाला मुहावरा, वो यूँ कि कोई लेखक बाल की खाल निकालता है और यदि ऐसे में वो कहीं पत्रकार हुआ तो समझो कि बाल की खाल तो निकलेगी ही उस खाल में भी एक बाल वो पैदा करेगा और फ़िर उसकी खाल निकालेगा. ऐसी स्थिति को देख कर मैंने तुंरत एक नए रस का निर्माण कर दिया. अपनी तरफ़ से किसी भी बात को, किसी भी स्थिति को देख उसमें कुछ नया, अलग सा खोजने की कोशिश और बना दिया नया-नवेला रस "छीछालेदर रस". बहरहाल इस रस पर चर्चा बाद में क्योंकि रसों की चर्चा सरल, सहज नहीं है पर ये विश्वास है कि हमारे बनाए इस "छीछालेदर रस" की चर्चा सरस एवं सरल होगी. फ़िर कभी..............ठीक है.

अभी इस रस से सराबोर एक किस्सा। ये किस्सा हम इस समय लगातार देख रहे हैं पर "छीछालेदर" के साथ देखिये तो शायद मजा आएगा। परमाणु करार पर लगातार धमकी, लगातार सरकार गिराने का प्रयास और हो गया मन का. ये स्थिति तो तब आई जब सरकार परमाणु समझौता करने की बात कर रही है. लेफ्ट की स्थिति तो ये है कि यदि सरकार शुरू से इस करार के ख़िलाफ़ रहती तो लेफ्ट इस कारण सरकार गिरती कि सरकार करार का समर्थन क्यों नहीं कर रही है. मतलब लेफ्ट को सरकार गिरानी ही गिरानी थी चाहे समर्थन करो चाहे न करो. सत्ता का मजा खूब लूटा अब चुनाव आते ही ठीकरा फोड़ा सरकार के सर. ये तो हमेशा से यही करते आए हैं.......ऐसे लोगों की हालत से परेशां एक बाप-बेटे की कहानी है आज के "छीछालेदर रस" की.

एक गाँव में एक बाप-बेटे ने घोड़ा खरीदने का विचार किया और पहुँच गए मेले में घोड़ा खरीदने। घोड़ा खरीदा और बापस चल दिए अपने गाँव की तरफ़. बेटे ने कहा "पिताजी आप बुजुर्ग हैं आप घोडे पर बैठ जाइये मैं पैदल चल लूँगा." पिता घोडे पर बैठ गया, बेटा पैदल चलने लगा. मेले से निकल कर अपने गाँव के रस्ते में पड़ते पहले गाँव में पहुंचे तो लोगों ने कहा "देखो कितना कसाई बाप है, ख़ुद तो घोडे पर लदा बैठा है और बेटे को पैदल चला रहा है."

पिता को लगा लोग सही कह रहे हैं। मुझे बड़े होने के नाते पैदल चलना चाहिए और अपने बेटे को घोडे पर बैठना चाहिए. ऐसा सोच कर पिता घोडे से उतर गया और अपने बेटे को घोडे पर बिठा दिया. अब घोडे पर बेटे बैठा था, पिता पैदल चल रहा था. रस्ते में दूसरा गाँव मिला. लोगों ने देखा तो फ़िर वही लोगों की बक-बक "देखो संस्कार, सभ्यता तो रह ही नहीं गई है, बाप बुजुर्ग है और पैदल चल रहा है. बेटा जवान, चुस्त-दुरुस्त तो घोडे पर शान से बैठा है.......थू ऐसी औलाद पर जो अपने होता बाप को पैदल चला रही है."

बाप-बेटे ने सलाह की कि अभी जब बेटे पैदल चल रहा था तो लोगों ने भला-बुरा कहा, अब जब कि बाप पैदल चल रहा है तो भी लोगों को अच्छा नहीं लगा। ऐसा किया जाए कि कोई पैदल न चले, दोनों लोग घोडे पर बैठ जाते हैं. ऐसा विचार आपस में करके दोनों (बाप-बेटे) एक साथ घोडे पर बैठ कर अपने गाँव की तरफ़ जाने लगे. रास्ते के तीसरे गाँव में जब उन दोनों ने प्रवेश किया तो डरे कि पता नहीं लोग क्या कहें? हुआ कुछ ऐसा, जैसे ही थोड़ा आगे चले, वहां बैठे लोगों ने कहा "देखो तो ज़माना, दया-धर्म नाम की कोई भी चीज़ नहीं बची है. एक बेचारा घोड़ा और उस पर दो-दो लोग चढ़े बैठे हैं. ये नहीं कि एक बैठे, एक पैदल चले. मारे दे रहे हैं घोडे को.....राम....राम."

बाप-बेटे ने एक दुसरे का मुंह देखा और चुपचाप गाँव से बाहर आ गए। अब उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए? ये ज़माना तो किसी में खुश नहीं है. न बाप के बैठने में, न बेटे के बैठने में, न दोनों के एक साथ बैठने पर. तब किया क्या जाए? सोचते-सोचते दोनों ने फ़ैसला किया कि अब दोनों लोग पैदल ही चलेंगे.

अब ऐसा विचार कर दोनों पैदल चलते हुए गाँव की तरफ़ बढ़ने लगे। गाँव पहुँचने से पहले हीएक और गाँव मिला. अब दोनों को कोई डर नहीं लग रहा था कि कोई क्या कहेगा क्योंकि दोनों ही पैदल चल रहे थे. पर ऐसा होता कहाँ है कि लोग किसी को चैन से जीने दे. यहाँ भी यही हुआ, जो दो-चार लोग बैठे थे हँसे और बोले "देखो बेवकूफों को, घोड़ा लिए हैं पर पैदल चले जा रहे हैं. यदि घोडे पर बैठना ही नहीं है तो ले क्यों लिया? पैदल तो बिना घोडे के भी चल सकते थे."

बाप-बेटा अब समझ चुके थे कि समाज को किसी भी स्थिति में संतुष्ट नहीं किया जा सकता है। वे दोनों लोगों के कटाक्षों से इस हद तक परेशां, हताश हो चुके थे कि समझ नहीं पा रहे थे कि करना क्या है? दोनों ने रुक कर पूरी स्थिति पर विचार किया और समझा कि किसी भी स्थिति में वे सफल नहीं हो सकते हैं. गुस्से में, खीझ में, हताशा में, नाराजी में, परेशानी में उन दोनों ने कहा कि इससे भले तो वे बिना घोडे के थे. बस उनको आइडिया आ गया कि करना क्या है.............बिना समय गुजारे दोनों ने घोडे की लगाम को छोड़ उसको भगा दिया. बोले न रहेगा घोड़ा........न होगी परेशानी.

कुछ समझे आप....................नहीं? समझेंगे कैसे, ये तो मनमोहन सिंह से पूछिये.

07 जुलाई 2008

गाँधी फ़िर चर्चा में

आज ब्लॉग पर सैर सपाटा करते समय उड़नतश्तरी पर गए तो वहां गाँधी जी से मुलाकात हो गई। समीर भाई को तो वे जुआघर में मिले, हम भारतियों को वे सड़क पर किसी कागज़ पर डाक-टिकट के रूप में चिपके मिल जाते हैं. क्या किया जा सकता है? उड़नतश्तरी पर गाँधी जी की हालत देख कर लगा कि गाँधी जी पर कुछ लिखा जाए, कुछ ऐसा जो लोगों के मन में रहता है पर तथाकथित बुद्धिजीवियों (मेरे विचार में बुद्धि-भोगियों) की जमात में बैठ कर कोई भी गाँधी को न बुरा कहता है न स्वयं को उनके विचारों के विरुद्ध बताता है। वैसे लिखने का विचार कई बार मन में आया था पर लगता था कि क्या लोग पचा पाएंगे? समीर भाई को मिली टिप्पणियों ने दिखाया कि लोग गाँधी जी को पचा लेंगे।

गाँधी जी के प्रति जहाँ तक मेरी अपनी सोच का सवाल है तो मैं बहुत हद तक उनके कई विचारों से सहमत नहीं हूँ. जहाँ तक हम नै पीढ़ी के लोगों का सवाल है तो उसको न तो गाँधी जी को सही रूप में पढाया जा रहा है न वो ख़ुद पढ़ना चाह रहा है. इस स्थिति में सही-ग़लत की परिभाषा तय करना हम लोगों का काम नहीं होना चाहिए, पर हम करते हैं, वो भी उस आदमी के विचारों का पोस्ट-मोर्तम जो अब इस संसार में नहीं है। बहरहाल, गाँधी जी को अकेले में या अपने लोगों के बीच गली देने वाले तमाम लोग मिल जायेंगे जो खुले मंच से उनकी प्रशंशा करते नहीं थकेंगे। वो मंच चाहे किसी भाषण का हो या पत्रिकाओं में लेख लिखने का हो या यहाँ ब्लॉग का हो.

अब बात गांधी जी की हो रही है तो वो क्या थे क्या नहीं, अच्छे थे या बुरे, उनके विचार सही थे या ग़लत सब बीती बातें हैं। आज देश विदेश में उनको मानने वालों के कई अलग-अलग समूह हैं. कोई उनको अच्छा कहता है कोई ख़राब, किसी की निगाह में वो देशभक्त हैं तो कोई उनको अंग्रेजों का एजेंट कहता है, कोई उनको देश की आजादी लेन वाला बताता है कोई क्रांतिकारियों को बताता है, कोई उनको भगत सिंह की फांसी की सज़ा माफ़ न करवाने पर दोषी मानता है कोई इसको सही ठहराता है. जितने मुंह उतनी बातें, किसे सही कहें किसे ग़लत कहें समझ में नहीं आता? आज़ादी लाने में जितना योगदान गाँधी जी का है उतना ही आजाद, भगत, सुभाष आदि का है. सुभाष गंशी का विवाद किसी से छिपा नहीं है. और तो और गाँधी जी की बात अंत समय में नेहरू ने भी नहीं मानी थी. बहरहाल बात ये नहीं है कि गाँधी जी क्या थे क्यों थे, लोगों के मन में उनके लिए क्या धारणा है?

आज गाँधी जी की स्थिति पर लिखने का मन इसलिए हो आया कि गाँधी जी जुआघर में खड़े होकर कम से कम कुछ लोगों को दिख रहे थे पर भारत देश में सरकार ने उनके सम्मान में डाक-टिकट तो बना दिया पर सोचा नहीं कि इससे वो गाँधी जी को सम्मान नहीं दुर्गति करवा रही है। एक साधारण सा इंसान जिसके लिए गाँधी का चित्र वाला वो टुकडा एक डाक-टिकट मात्र है वो गाँधी की अहमियत क्या जानेगा? हाथ में लिया मुंह से थूक लगाया और दे मारा ताकत से हाथ उसको चिपकाने के लिए। अब गाँधी जी के सहारे उसकी डाक चली जा रही है. यहाँ तक गनीमत थी तो भी ठीक था, पोस्ट-ऑफिस वालों ने तो ठप्पा लगा कर उनका मुंह ही काला कर दिया. क्या ऐसे गाँधी की जरूरत है हमें? सरकार ये सम्मान कर रही है या अपमानित कर रही है? ऐसा हाल मात्र गाँधी जी का ही नहीं हर उस सम्मानित व्यक्तित्व का है जो डाक-टिकट पर छपा है.

इसी तरह गाँधी के नाम पर लोगों को भाषण देते सुना है पर सदन में चप्पल चलते, गलियां देते भी उन्ही लोगों को देखा है। फ़िर गाँधी जी कहाँ प्रासंगिक हैं? हमारे भाषण देने में या ब्लॉग पर देख कर ऎसी टिप्पणी लिखने में जो सिद्ध करे कि हम भी गाँधीवादी हैं. (कहीं संजय दत्त की गांधीगीरी का असर तो नहीं?) वैसे ये भी मजेदार है कि गाँधी के देश को गांधीगीरी फिल्में सिखा रहीं हैं. गाँधी जी का सवाल उठता है तो तमाम कथित धर्म-निरपेक्ष लोगों का एक सुर से गाली देना शुरू होता है गुजरात सरकार को, गुजरात दंगों के लिए. ये तमाम लोग रोते हैं कि गाँधी के राज्य को कुछ लोगों ने कलंकित कर दिया. वे लोग रोते हैं दंगों में मरने वालों के लिए. सोचो क्या गोधरा में मरे लोग गाँधी के राज्य में नहीं मरे? गोधरा में मरने वाले क्या इंसान नहीं थे? अन्य राज्यों में मरते लोग क्या इंसान नहीं? क्या गुजरात के अलावा कोई दूसरा राज्य गाँधी का नहीं? इधर हद तो तब हो गई जब एक जाति-विशेष के लोगों ने गाँधी जी को उस जाति के समारोह का प्रमुख मान कर गाँधी को अपनी जाति का होना साबित किया.

जैसा कि मैंने शुरू में कहा था कि मैं व्यक्तिगत रूप से गाँधी के विचारों और नीतियों से कभी सहमत नहीं रहा हूँ. हाँ ये सही है कि देश की सोई जनता को जगाने का काम उन्हों ने अवश्य किया. पर कई ऎसी बातें, कई ऐसे बिन्दु हैं जो गाँधी जी को विवादित करते हैं, उन पर चर्चा फ़िर कभी. समझ में आ गया है कि ब्लॉग पर लोग गाँधी जी को पढ़ना चाहते हैं भले ही मन मार के पढ़ें. आख़िर बुद्धिजीवी (नहीं......नहीं बुद्धि-भोगी) जो बनना है. अब हम भी आते रहेंगे, गाँधी पर कुछ न कुछ लाते रहेंगे पर आप लोग सही कहिये कि क्या आप सब मन से गाँधी समर्थक हैं? या ऐसा बस ब्लॉग पर दिखाने के लिए या फ़िर पढ़े-लिखे लोगों के बीच पैठ बनाने के लिए किया जा रहा है? कुछ भी हो कम से कम अपने में तो ईमानदार रहिये.

06 जुलाई 2008

हिंदू अपने ही देश में अपने देवी-देवताओं के दर्शनों के लिए मार खाता रहेगा

क्या आपने अमरनाथ यात्रा पर हो रहा विरोध देखा या सुना? हाँ भाई----अमरनाथ यात्रा का विरोध नहीं, सरकार द्वारा श्राइन बोर्ड को इस यात्रा के लिए हिन्दुओं को दी गई जमीं का विरोध है।(मालूम था कुछ लोगों को ये बात हज़म नहीं होगी कि कोई हिन्दुओं की बात करे) चलिए अब तो बात स्पष्ट हो गई, मामला कोई भी हो विरोध तो हिन्दुओं को सहयोग करने का हुआ ही। क्या हिंदू अपने ही देश में अपने देवी-देवताओं के दर्शनों के लिए मार खाता रहेगा या यदि कुछ सरकारी स्तर पर या राजनीतिगत किया जाएगा तो उसका परिणाम विरोध होगा? क्या हिन्दुओं को अपने देश में ही भेद-भाव सहना पड़ेगा? (पूरा पढ़ें)

बात विरोध की नहीं धरना की है. हिन्दुओं को सांप्रदायिक सिद्ध करने के कुत्सित प्रयास में एक कदम और. क्या यहाँ यह सवाल नहीं उठता कि क्या सामाजिक सौहार्द की सारी जिम्मेवारी हिन्दुओं ने उठा रखी है? क्या मुस्लिम धर्म के मानने वालों की जिम्मेवारी नहीं कि वे भी कुछ सौहार्द दिखाते? यदि यही हाल रहा तो हिन्दुओं को अपने देश में ही अपने आराध्यों को पूजने के लिए आज्ञा लेनी होगी.

02 जुलाई 2008

नया जनमत संग्रह शुरू

आरक्षण की हवा देश को हमेशा गर्म बनाये रखती है. इस गरमी में कई होनहार जल कर भस्म हुए, कई जरूरतमंद अपनी मंजिल न पा सके. राजनीती के खेल ने अच्छी-भली सूरते-हाल को बिगाड़ कर रख दिया है. क्रीमी लेयर के नाम पर एक बार फ़िर आरक्षण की आग हमारे चारों तरफ़ सुलग रही है. आप भी इस आग की तपिश महसूस करें इस जनमत के द्वारा, जो शुरू हुआ है हमारे सभी ब्लॉग पर एक साथ, आपकी राय जानने के लिए.पोल यहाँ-यहाँ है-

http://kumarendra.blogspot.com/

http://sahityakar.blogspot.com

http://bundeli.blogspot.com

http://dastawez.blogspot.com/

01 जुलाई 2008

बचपन से खिलवाड़ न करो

आधुनिकता में दौड़ते-दौड़ते हम कब अपने बच्चों को उनके बचपन से दूर ले गए हमें पता ही नहीं चला. अब आप कहेंगे कि इसमें आधुनिकता जैसी कोई बात कहाँ है? बिल्कुल है जनाब, बस आप गौर से देखिये. आधुनिकता इस मायने में कि हम अपने बच्चों को फिल्मों, टी0 वी0 की तरह का बच्चा बना देना चाहते हैं. हमें लगता है कि हमारा बच्चा तुम्हारे बच्चे से कमजोर कैसे?(बिल्कुल वही अंदाज़, तुम्हारी शर्ट मेरी शर्ट से सफ़ेद कैसे?)अब जनाब बच्चा न हो गया कोई प्रोडक्ट हो गया, जब जैसे चाह वैसे उसका उपयोग कर डाला. शुरुआत एकदम छोटे से ही होती है. घर में मित्र या महमान आने भर की देर है कि हम चालू हो जाते हैं अपनी जादूगीरी दिखने के लिए. "चलो बेटा अंकल को पोयम(कविता नहीं) सुनाओ, चलो बेटा पूरी टेबल(पहाड़े कहना कठिन है) सुना दो. यहाँ तक भी होता तो गनीमत थी, हमारे कदम बढ़ जाते हैं और आगे को. मेरा बेटा फलां फिल्मी एक्टर की नक़ल कर लेता है, किसी के डांस की कॉपी कर लेता है. इसके बाद शुरू होता है बच्चे का फिल्मी एक्टर बनना. डांस, डायलोग का सिलसिला तब तक चलता है जब तक कि बच्चा न रोने लगे या फ़िर महमान ही उठ कर न चल दे. आख़िर उसके मन में भी तो कीडा कुलबुलाने लगा है अपने बच्चे को एक्स्ट्रा बनने का और उसके घर पर आने वालों के लिए मनोरंजन करने का.इसके अलावा परीक्षाओं में ज्यादा से ज्यादा नंबर लेन का दवाब, मेरिट में आने का दवाब. अब कुछ दवाब हमारे कथित विकासवादियों ने भी बढ़ा दिया है, टी वी की दुनिया में रियलिटी शो का व्यापार खड़ा करके. बच्चे तो बच्चे उनके माँ-बाप तक नाचने गाने में लगे हैं कि पता नहीं कब मौका लगे और बच्चा तो मंच पर नाचे ही कुछ एंकर(जावेद जाफरी टाईप) माँ-बाप को भी नचवा देते हैं. अब इससे बच्चों का बचपन तो कहीं गम हो गया है, दवाब के चलते बच्चों की जिंदगी भी गुम हो रही है. आए दिन बच्चों की आत्महत्याओं की ह्रदय-विदारक खबरें इसी का दुष्परिणाम है. क्या हम बच्चों को उनका नैसर्गिक जीवन जीने देंगे?