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22 March 2017

समुद्र का किनारा, रोशन जहाज और पार्टी : अंडमान-निकोबार यात्रा

कार से उतरते ही सबसे पहले आँखों के आगे चार पानी के जहाज सजे हुए नजर आये. एक समुद्री तट के ठीक किनारे और बाकी तीन किनारे से थोड़ा दूर. चारों ओर अँधेरा और उस अँधेरे को चीरते जहाजों की रौशनी समुद्री लहरों के साथ अजब-अजब सी आकृतियाँ बना रही थी. दिन में नीला दिखाई देने वाला विशाल समुद्र रात के अंधकार में दूर-दूर तक काला नजर आ रहा था. आँखों में सामने सजे, समुद्र के सीने पर स्थिर जहाजों की मनमोहक रौशन छवि को कैद करते हुए उस जगह के लिए बढ़े जहाँ उस रात छोटी बेटी आशी का जन्मदिन मनाया जाना था. 



सीढ़ियाँ चढ़कर जब ऊपर पहुँचे तो अद्भुत नजारा दिखाई दे रहा था. एक तरफ रंग-बिरंगे गुब्बारों, सजावटी झालरों, रंगीन रौशनी से झिलमिलाता हॉल और दूसरी तरफ विशाल लहराता समुद्र. हाथों में कैद कर लेने भर की दूरी पर समुद्री किनारा और उस पर पर कोस्टगार्ड के जहाजों की उतराती रौशनी. ठंडी-ठंडी हवा को साथ लेकर समुद्री लहरें रौशनी के साथ ऐसे भागदौड़ करने में लगी थी मानो वे भी आशी के जन्मदिन में बच्चों के साथ खेलकूद रही हों. 



कुछ समय बाद समुद्री किनारे से थोड़ा दूर स्थिर तीनों जहाजों से आसमानी आतिशबाजी के नज़ारे दिखाई देने लगे. इधर जन्मदिन पर बिटिया रानी केक काट चुकी थी और उधर तीनों जहाजों से होती आतिशबाजी ऐसा मालूम पड़ती थी जैसे इसी ख़ुशी में हो रही हो. लाल, नीले, हरे, पीले रंग खिलकर बिखरते तो पूरा समुद्र उसी रंग में सराबोर दिखाई देने लगता.  




समुद्र से मीलों दूर रहने वाले हम लोगों के लिए सामने का नजारा अद्भुत ही कहा जायेगा जबकि हमारे छोटे भाई और जन्मदिन पर आमंत्रित लोगों के लिए ऐसे नज़ारे सामान्य सी बात थी. पोर्टब्लेयर में नेवी अधिकारी होने के नाते उसका समुद्र से याराना ही कहा जायेगा. उसी ने बताया कि कोस्टगार्ड का दिन विशेष होने के कारण इन जहाजों को सजाया जाता है. संभवतः उस दिन भी कोई विशेष आयोजन हो रहा था. एक तरफ जन्मदिन के लिए सजी हुई जगह रौशनी की जगमगाहट थी तो सामने कोस्टगार्ड के जहाजों पर भी रौशनी खिल रही थी. 




एक तरफ यहाँ भी मधुर संगीत जन्मदिन के उल्लास में झूम रहा था तो दूसरी तरफ कोस्टगार्ड ऑफिस से भी संगीत की लहरियां रह-रह कर कानों में टकरा जाती थीं. छोटे भाई के दोस्तों, उसके सहयोगियों, सीनियर्स का आना शुरू हुआ. बच्चे अपनी मस्ती में मगन थे और बड़े अपनी ही मस्ती में. खुले आसमान के नीचे पार्टी अपने यौवन पर थी. नाच-गाना, जाम टकराना, हंसी-मजाक, बच्चों का उछलना-कूदना सबकुछ आनंदित करने वाला था. सेना के अनुशासन के साथ-साथ उसकी मस्ती को सुना करते थे मगर यहाँ खुद अपनी आँखों से देख भी रहे थे. छोटे भाई के सहयोगी, मित्र, उसके सीनियर्स आदि बहुत ही आत्मीयता से मिले.  अंडमान-निकोबार की यात्रा का मन कई वर्षों से था और दिल में एक ही अभिलाषा थी सेलुलर जेल दर्शन की. इस बार जब कार्यक्रम निर्धारित हुआ तो फिर उसको ऐसे बनाया कि सबके साथ आशी का जन्मदिन मनाने का अवसर निकल आये. यहाँ सबके बीच आकर, एक अद्भुत और हम लोगों के लिए दुर्लभ नज़ारे के बीच जन्मदिन का उल्लास यात्रा की एक विशेष उपलब्धि कही जा सकती है. अपने परिवार के साथ किसी भी आयोजन का अपना आनंद है और वो आनंद तब और बढ़ जाता है जबकि सबकी तरफ से भरपूर सम्मान-आदर मिले. एक पल को लगा नहीं कि हम उन सबके बीच अजनबी से हैं. सबसे पहली मुलाकात और चंद पल की मुलाकात में ही अपनापन. सबकी अपनी मस्ती, अपना ही अलग अंदाज. बहुत-बहुत मजा आया समुद्र के किनारे की उस विशेष पार्टी का. 




बड़े भाई होने का एक तरह का ये फायदा भी रहता है कि छोटे भाई के सभी मित्र भरपूर सम्मान-आदर देते हैं. यहाँ छोटे भाई के मित्र, सहयोगी तो आदर-सम्मान दे ही रहे थे, उसके बॉस भी बड़ी गर्मजोशी से मिले. उनकी आत्मीयता देखकर एहसास ही नहीं हो रहा था कि कोई बॉस जसा व्यक्तित्व बात कर रहा है. बातचीत में, व्यवहार में अत्यंत सहज, अत्यंत मधुर. अंडमान-निकोबार को बहुत अच्छे से घूमने का बारम्बार आग्रह सा करना, भले ही एक औपचारिकता सी हो किन्तु ऐसा लगा नहीं कि वे महज औपचारिकता कर रहे हैं. वापसी में मिलते हुए विदा लेना दर्शाता है कि उनको संबंधों का निर्वहन करना बखूबी आता है. रात काफी हो चली थी. लोगों के वापस जाने का क्रम भी शुरू हो गया था. अगले दिन हम लोगों को भी हैवलॉक की यात्रा पर निकलना था सो घर वापसी की मजबूरी थी. पार्टी के सुरूर को, समुद्र के नशे को, जगमगाती रौशनी की मदहोशी को अधूरे मन से अलविदा कहते हुए वापस घर जाने को कार में बैठ लिए. अब आँखों में रंगीन समुद्र, झिलमिलाती लहरें, रोशन जहाज और पार्टी की मस्ती कैद थी, जो अगली सुबह हमारे साथ हैवलॉक चलने वाली थी. 

21 March 2017

विकास की राह चलने से बदलेगी छवि

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाये जाने की आवाज़ उनके समर्थकों की तरफ से लगातार उठाये जाने के बाद भी किसी को अंदाज़ा नहीं था कि भाजपा आलाकमान उनके नाम पर अपनी स्वीकृति देगा. उनका नाम बतौर मुख्यमंत्री घोषित होना अपने आपमें चौंकाने वाला निर्णय ही कहा जायेगा. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सबका साथ, सबका विकास की नीति और सर्वहितकारी राजनीति के चलते अनुमान लगाना कठिन था कि योगी जैसे कट्टर हिंदुत्व छवि और विवादित बयान देने वाले व्यक्ति को उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी जाएगी. ऐसे समय में जबकि ठीक दो वर्ष बाद केंद्र सरकार को या कहें कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सम्पूर्ण देश के सामने लोकसभा चुनाव की परीक्षा से गुजरना है, उत्तर प्रदेश में कट्टर हिंदुत्व छवि का मुख्यमंत्री बनाया जाना अपने आपमें एक चुनौती ही कहा जायेगा. मोदी के सामने ये चुनौती इस कारण और बड़ी है क्योंकि विगत डेढ़ दशक से अयोध्या राम मंदिर मामला जिस तरह से अपनी उपस्थिति राजनैतिक और सामाजिक हलकों में बनाये हुए है उसके फिर से तेजी से उभरने की आशंका बनती दिखाई दे रही है. राम मंदिर समर्थकों में, मोदी-योगी के समर्थकों में, हिंदुत्व के पक्षधर लोगों में अब आशा की किरण का संचार हुआ है कि केंद्र और प्रदेश में भाजपा की बहुमत की सरकार होने के कारण राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ होगा. विगत कुछ दशकों में नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह से अपनी राजनैतिक कुशलता को प्रदर्शित किया है उसे देखने के बाद लगता नहीं कि यह निर्णय उन्होंने किसी दवाब में, किसी जल्दबाजी में या फिर महज हिंदुत्व अवधारणा के कारण लिया है. मोदी की राजनीति पूरी तरह से समेकित विकास की, समावेशी विकास की तरफ बढती दिखती है. ऐसे में योगी का मुख्यमंत्री बनना संकेत करता है कि वे उत्तर प्रदेश में हिंदुत्व की अवधारणा को विकास के साथ समन्वित करके आगे बढ़ना चाहते हैं. इसका कारण वर्तमान चुनावों में मतदाताओं का ध्रुवीकरण हो जाना रहा हो. 2014 के लोकसभा चुनाव रहे हों या फिर उत्तर प्रदेश के वर्तमान चुनाव, मतदाताओं का ध्रुवीकरण हुआ है. इसके चलते भाजपा को अन्य धर्मों, जातियों, वर्गों के साथ-साथ हिन्दुओं का संगठित मत प्राप्त हुआ है.


जिस तरह से विगत पंद्रह वर्षों से भाजपा प्रदेश सरकार से बाहर रही है और चक्रानुक्रम में जिस तरह से दो क्षेत्रीय दलों ने अपनी सरकार बनाकर क्षेत्रीयता, जातीयता, वर्गवाद, परिवारवाद को बढ़ावा दिया है उसने प्रदेश के विकास-क्रम को बाधित किया है. सड़कों, पार्कों, गलियारों, एक्सप्रेस वे आदि के द्वारा एक निश्चित क्षेत्र में विकास को सम्पूर्ण विकास का सूचक नहीं माना जा सकता है. प्रदेश का सर्वांगीण विकास करने का दावा करने वाली सरकार ने पूर्वांचल की तरफ, बुन्देलखण्ड की तरफ उस दृष्टि से नहीं देखा जिस विकास दृष्टि से वे अपने-अपने क्षेत्र को देखती रही हैं. अब जबकि योगी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले चुके हैं तब उन्हें और उनके मंत्रिमंडल को ये समझना होगा कि उनके पास मात्र दो वर्ष का ही समय है. योगी के सामने ये चुनौती रहेगी कि इन्हीं दो वर्षों में प्रदेश के विकास का एक मॉडल मतदाताओं के सामने रखना होगा.

वर्तमान विधानसभा चुनाव में जनता ने मोदी की विकासछवि को देखते हुए प्रचंड बहुमत प्रदान किया. इस बहुमत में न केवल हिन्दू मतदाता शामिल था वरन अल्पसंख्यकों विशेष रूप से मुसलमानों का भी मत शामिल है. ऐसे में योगी के सामने मुस्लिम समुदाय के भीतर जबरिया भर दिए गए भय को दूर करना भी एक चुनौती है. देश-प्रदेश की राजनीति में विगत कई दशकों से मुसलमानों को जिस तरह से वोट-बैंक के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है, उनको हिंदुत्व का भय दिखाकर ध्रुवीकरण किया जाता रहा है, सुविधाओं-सब्सिडी के नाम पर जिस तरह से वरीयता दी जाती रही है, राजनैतिक लाभ के लिए जिस तरह से उनका तुष्टिकरण किया जाता रहा है उसने भी मुस्लिम समुदाय की दृष्टि में भाजपा को, योगी को अछूत बना रखा है. उनके प्रति एक तरह का भय जगा रखा है.


आज जिस तरह का वातावरण योगी को लेकर बनाया जा रहा है ठीक वैसा ही वातावरण लोकसभा चुनाव के पहले मोदी को लेकर बनाया जा रहा था. मोदी की कट्टर छवि को स्वयं मोदी ने आकर तोड़ा है. इसके पीछे उनके कार्यों का प्रभावी होना रहा है. बिना पक्षपात के सबका साथ, सबका विकास की भावना का अन्तर्निहित होना रहा है. योगी को मुस्लिम समुदाय के भीतर बैठे डर को दूर करने के साथ सम्पूर्ण प्रदेश के विकास की राह निर्मित करनी होगी. इसके लिए किसानों के उत्पादों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदना, फसल बीमा की राह आसान करना, नागरिक सुरक्षा, जनकल्याण कार्यों को करना, बुन्देलखण्ड, पूर्वांचल, रुहेलखण्ड आदि पिछड़े क्षेत्रों के विकास हेतु अलग से कोई मॉडल बनाना आदि कार्यों को अंजाम देना होगा. जिस तरह के विकासकार्यों को प्रधानमंत्री मोदी आगे ला रहे हैं उसे फलीभूत होने का अवसर तभी मिल सकेगा इसलिए विगत वर्षों में जिस तरह का अनियमित, अनियंत्रित विकास देखने में आया है उसको नियमित करना होगा. गुंडाराज की स्थिति के चलते जिस तरह कानून व्यवस्था ध्वस्त हुई है उसे सुधारना होगा. जाति-धर्म विशेष के चलते होते आये छोटे-बड़े उपद्रवों के चलते जिस तरह आमजन में भय, असुरक्षा का माहौल बना हुआ है उसे दूर करना वर्तमान प्रदेश सरकार की प्राथमिकता में होना चाहिए. योगी और उनकी कट्टर हिंदूवादी छवि को पसंद करने वाले समर्थकों को एक बात याद रखनी होगी कि विवादित बयानों के चलते एकबारगी किसी की भी छवि एक वर्ग विशेष में स्थापित भले ही हो जाये किन्तु उस छवि को दीर्घकालिक रूप से स्थापित करने के लिए उसे विकास की राह चलना ही होता है. यदि योगी सरकार मोदी सरकार की तर्ज़ पर विकास की राह चल पड़ती है तो प्रदेश की जनता को उनकी सकारात्मक छवि बनाते देर नहीं लगेगी. अब देखना ये है कि योगी किस तरह से और कितना मोदी की समग्र विकासनीति वाली छवि का लाभ उठाते हैं.

18 March 2017

जरावा जनजाति और मड वोलकेनो : अंडमान-निकोबार यात्रा













 









अंडमान-निकोबार की नीले समुद्री जल और नैसर्गिक प्राकृतिक सुन्दरता को दिल-दिमाग में अभी पूरी तरह बसा भी नहीं पाए थे कि वहाँ से वापसी का दिन दिखाई देने लगा. लौटने से पहले उस जगह को देखने का कार्यक्रम बना जिस जगह के बारे में पहले दिन से सुनते आ रहे थे. वो जगह थी बाराटांग द्वीप, जो पोर्टब्लेयर से सौ-सवा सौ किमी से अधिक की दूरी पर है. अंडमान-निकोबार द्वीप समूह अनेक तरह की विशेषताओं से संपन्न है. बाराटांग भी अपने आपमें विशेष है. एक तो यहाँ जाने के लिए अंडमान-निकोबार की एक जनजाति जरावा के लिए आरक्षित वनक्षेत्र से गुजरना होता है, दूसरा बाराटांग में लाइम स्टोन गुफा, मड वोलकेनो (मिट्टी वाला ज्वालामुखी) जो सक्रिय अवस्था में हैं, स्पाइक द्वीप और पैरट द्वीप आदि अद्वितीय प्राकृतिक स्थल हैं. 

पोर्टब्लेयर से बाराटांग के रास्ते में जरावा जनजाति आरक्षित वनक्षेत्र होने के कारण वहाँ प्रशासनिक नियमों के अनुसार ही यात्रा करनी पड़ती है. दरअसल एकाधिक बार पर्यटकों द्वारा जरावा जनजाति के लोगों के साथ दुर्व्यवहार किये जाने और कभी-कभी जरावा जनजाति के लोगों द्वारा उन पर आक्रमण कर दिए जाने के कारण उस आरक्षित वनक्षेत्र की यात्रा को सुरक्षा निगरानी में पूरा किया जाता है. यह यात्रा दिन में केवल चार बार – सुबह छह बजे, नौ बजे, दोपहर बारह बजे और फिर तीन बजे संपन्न होती है. बाराटांग से वापसी की यात्रा इस समय के आधे घंटे बाद आरम्भ होती है. आरक्षित वनक्षेत्र की यात्रा लगभग सत्तर किमी से अधिक की है. जिसमें आज भी जरावा जनजाति के महिला-पुरुष नग्नावस्था में या फिर अल्प वस्त्रों में दिखाई दे जाते हैं. 

पोर्टब्लेयर से चिरकाटांग नामक स्थान पर पहुँच सभी गाड़ियों को एक फॉर्म में अपनी जानकारी भरकर वहाँ स्थित पुलिस चौकी में जमा करना होता है. इसके बाद ही नियत समय पर कारों, बसों का लम्बा काफिला बाराटांग को चल देता है. आरक्षित वनक्षेत्र में किसी भी गाड़ी को रुकने की अनुमति नहीं होती है और न ही किसी तरह की फोटोग्राफी करने की अनुमति है. चिरकाटांग से चला काफिला मिडिल स्ट्रेट में आकर रुकता है, जहाँ से छोटे शिप द्वारा बीस-पच्चीस मिनट की समुद्री यात्रा के द्वारा बाराटांग पहुंचा जाता है. 

हम लोग भी सुबह-सुबह चिरकाटांग पहुँच गए. बिटिया रानी अपनी आदत के अनुसार कार-यात्रा में ऊँघने की शुरुआत करते हुए नींद मारने लगती है. चिरकाटांग पहुंचकर उसे जब उठाना चाहा तो पहले तो वो अनमनी सी दिखी. उसे बताया कि हो सकता है कि जनजाति के लोग दिखें, तब भी उसे कोई फर्क महसूस न हुआ पर उसके पूछने पर जैसे ही उसे बताया कि जनजाति मतलब अर्ली मैन तो वह चैतन्य होकर बैठ गई. अपनी पाठ्यपुस्तकों में पढ़े अर्ली मैन को देखने की लालसा उसे भी जाग उठी. 

बहू द्वारा थर्मस में रख दी गई चाय का आनंद लेते हुए हमने फॉर्म में जानकारी भरने की औपचारिकताओं को निपटाया. इसके बाद हमारी कार लगभग दो सौ गाड़ियों के काफिले संग ठीक नौ बजे मिडिल स्ट्रेट के लिए चल दी. उतार-चढ़ाव भरे रास्तों में घनघोर जंगलों के बीच भागती कारों के अलावा और कुछ दिखाई नहीं देता था. दोनों तरफ घने पेड़, कभी-कभी एक तरफ गहरी खाई दिखाई देती तो कभी घना जंगल. बेटी हमारी गोद में पूरे कौतूहल के साथ जरावा जनजाति के लोगों को देखने के लिए बैठी हुई थी. चूँकि नियमानुसार कैमरा चलाना प्रतिबंधित था, सो हमने भी नियम का पालन करते हुए कैमरा, मोबाइल सब एक कोने में लगा दिए थे. 

आरक्षित वनक्षेत्र में सबसे सुखद स्थिति ये रही कि बाराटांग जाते और आते समय जरावा जनजाति के लोगों के दर्शन हो गए. जाते समय मात्र तीन व्यक्ति ही मिले जो दो अलग-अलग स्थानों पर बैठे हुए थे. चूँकि सरकारी स्तर पर तथा गैर-स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद से जरावा जनजाति के लोगों को मुख्यधारा में शामिल किये जाने के प्रयास चल रहे हैं. इसके चलते उनको वस्त्र, भोजन आदि मुहैया कराया जाता है. जाते समय मिले तीन लोगों में दो पुरुष और एक महिला रहे, जो नग्नावस्था में तो नहीं मगर अल्पवस्त्रों में थे. बाराटांग से वापसी में एक दर्जन से अधिक की संख्या में जरावा लोग दिखाई दिए, जिनमें बहुतायत में नग्नावस्था में ही थे. एक हल्का इशारा करने पर ड्राईवर ने कार की गति को थोड़ा सा कम तो किया मगर रुकने की अनुमति न होने के कारण रोका जाना संभव नहीं हुआ. एकबारगी सोचा कि मोबाइल के द्वारा उनकी फोटो निकाल ली जाये किन्तु ड्राईवर के भयग्रस्त दिखाई देने के चलते ऐसा करना उचित न लगा. 

घने जंगल का आनंद लेते, खोजी निगाहों से जरावा जनजाति के लोगों को खोजते, टेढ़े-मेढ़े रास्तों से गुजरते हुए हम लोग कोई दो घंटे से अधिक की यात्रा के बाद मिडिल स्ट्रेट पहुँचे. वहाँ से छोटे शिप के द्वारा बाराटांग जाना था. मिडिल स्ट्रेट और बाराटांग के बीच शिप नियमित रूप से आवाजाही करता रहता है. हम लोगों के पहुँचने पर शिप किनारे पर लगा हुआ था. जल्दी से उसमें सवार होकर आगे की यात्रा के लिए चल दिए. मिडिल स्ट्रेट से बाराटांग की छोटी सी समुद्री यात्रा में किनारे-किनारे मैंग्रो ट्री के दृश्य मन को लुभा रहे थे. शिप पर बस का चढ़ा होना पूछा तो पता चला कि बस वहाँ से लगभग दो सौ किमी दूर मायाबंदर और डिगलीपुर तक जाती है. 

बाराटांग पहुँचकर हमारे कार ड्राईवर ने अपने परिचित एक कार वाले को पकड़ा और हम सब किनारे से लगभग पाँच-छह किमी दूर मड वोलकेनो पहुँच गए. पूरे अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में कुल ग्यारह मड वोलकेनो पाए गए हैं, जिनमें से आठ बाराटांग और मिडिल अंडमान द्वीप में हैं. जिस मड वोलकेनो को देखने हम लोग जा रहे थे वो सक्रिय है और वहाँ के लोग बताते हैं कि सुनामी के समय में उसमें भयंकर विस्फोट हुआ था. जिससे बहुत सी जगहों पर छोटे-छोटे वोलकेनो जैसे स्थल निर्मित हो गए हैं. वहाँ के कार ड्राईवर ने हम लोगों को ऐसी दो-तीन जगहें रास्ते में दिखाई. 

निर्धारित जगह पर कार से उतरने के बाद सौ मीटर से अधिक की दूरी पैदल तय करनी थी. बाँस, खजूर सहित अन्य जंगली वृक्षों की सघनता के बीच लगभग चार फुट चौड़े गलियारे में बनी मिट्टी की करीब डेढ़ सौ छोटी-छोटी सीढियाँ हमें मड वोलकेनो की तरफ ले जा रही थी. संकरे से रास्ते के दोनों तरफ लकड़ी की रेलिंग सुरक्षा की दृष्टि से लगी हुई थी. इसी रेलिंग के बाहर कई जगह बाँस की बनी कुर्सियाँ भी लगी हुई थीं. जिन पर बैठकर कुछ लोग अपनी थकान दूर करते नजर आये. संकरे रास्ते को धीरे-धीरे तय कर एक बड़े से मैदान जैसी जगह पर जब खुद को खड़े पाया तो सामने लकड़ी की बाढ़ से घिरा मड वोलकेनो क्षेत्र दिखाई दिया. 

वोलकेनो के नाम पर जैसी आकृति दिमाग में बनती है उससे इतर दृश्य वहाँ दिख रहा था. जगह-जगह छोटे-बड़े छेदों से कीचड़ निकल रहा था. कहीं-कहीं लगातार बुलबुले फूट रहे थे. बहता हुआ कीचड़, मिट्टी उसके सक्रिय और जागृत होने का प्रमाण था. तेज धूप के चलते वहाँ ज्यादा देर रुकना संभव नहीं हुआ और हम लोग वापस नीचे उतर आये. 

मड वोलकेनो के अलावा बाराटांग में लाइम स्टोन गुफा, पैरेट द्वीप आदि दर्शनीय स्थल हैं किन्तु उसके लिए कम से कम एक दिन बाराटांग में रुका जाए. चूँकि अगले दिन हमारी पोर्ट ब्लेयर से वापसी निर्धारित थी, ऐसे में बाराटांग में मड वोलकेनो के अलावा कहीं और जाना नहीं हो सका. समय की कमी न होती तो अवश्य ही बाराटांग रुककर वहाँ की नैसर्गिक सुन्दरता को आत्मसात किया जाता. 

बहुत छोटी सी जगह पर निवास कर रहे लोगों के लिए सरकारी स्तर पर पर्याप्त ख्याल रखा गया है. सरकारी परिवहन का डिपो होने के साथ-साथ माध्यमिक विद्यालय, दूरसंचार विभाग का होना इसका प्रमाण है. दोपहर का भोजन करते समय वहाँ के लोगों से बातचीत के दौरान पता चला कि वहाँ भोजन में मछली और चावल ही मुख्य रूप से खाया जाता है. 

एक साफ़-सुथरे से ढाबे पर भोजन के लिए बैठे तो हम और ड्राईवर माँसाहारी वाली निर्धारित जगह पर और पत्नी तथा बिटिया शाकाहारी वाली निर्धारित जगह पर बैठ गए. चार लोगों के लिए निर्धारित मेज पर पहले से दो लोग बैठे हुए थे. किसी और मेज पर जगह न देखकर हम दोनों लोग उसी एकमात्र खाली मेज पर जम गए. भोजन सम्बन्धी बिना किसी तरह के आर्डर के एक लड़की ने आकर हम दोनों के सामने एक-एक थाली रख दी. मेज पर पहले से ही चार कटोरे भरे हुए रखे थे, जिनमें एक में दाल, दो में सूखी सब्जी और एक में मछली रखी थी. कुछ कहते उससे पहले ही उसी लड़की ने आकर थाली में ढेर सारा चावल डाल दिया. हमने अपने ड्राईवर की तरफ देखा तो वो समझ गया और लड़की की तरफ देखकर बोला चिकन. अगले ही क्षण लड़की एक कटोरी में चिकन दे गई. ड्राईवर ने बताया कि यहाँ रोटी नहीं मिलेगी. यदि रोटी खानी होती है तो लगभग दो-तीन घंटे पहले आर्डर करना होता है. चावल, चिकन, मछली सहित अन्य भोज्यपदार्थ कितना भी लिया जा सकता है, उसका मूल्य निर्धारित है. 

धन चुकाने वाली स्थिति होने के बाद भी ढाबे पर अत्यंत विनम्रता और आतिथ्य भाव से भोजन करवाया गया. अभी तक के जीवन में हमने पहली बार वहीं चावल में चिकन या मछली के साथ दाल, आलू-गोभी आदि कि की सूखी सब्जी को मिलाकर खाते देखा. ढाबे पर भोजन करने वाले यात्रियों को किनारे तक छोड़ने की निःशुल्क सुविधा भी उपलब्ध थी. यकीनन यह कार ड्राईवर और ढाबे मालिक के बीच का कोई अनुबंध होता होगा. 

फ़िलहाल स्वादिष्ट भोजन का लुफ्त उठाने के बाद, उस ढाबे की मालकिन जिसका मायका और ससुराल दोनों ही उत्तर प्रदेश में ही थे, से बातचीत कर, उसके परिवार की, बाराटांग में बसने की जानकारी के साथ-साथ वहाँ आसपास की, वहाँ के लोगों की, रहन-सहन की कुछ और जानकारी लेते हुए हम लोग बाराटांग से वापसी करने को मिडिल स्ट्रेट, चिरकाटांग होते हुए घर के लिए पोर्ट ब्लेयर को निकल पड़े. जहाँ प्यारी सी भतीजी आशी, बहू नेहा और छोटा भाई नीरज हम लोगों का इंतज़ार कर रहे थे. 























सभी चित्र लेखक द्वारा लिए गए हैं.

09 March 2017

हैवलॉक में नैसर्गिक सौन्दर्यानुभूति : अंडमान-निकोबार यात्रा

पोर्ट ब्लेयर में दो दिन की घूमा-फिरी के बाद समुद्र किनारे सजे-सजाये खड़े तीन जहाजों के अद्भुत दृश्य को आत्मसात करते हुए देर रात तक बिटिया रानी के जन्मदिन की पार्टी और फिर सुबह-सुबह हैवलॉक द्वीप को चल देना. अंडमान-निकोबार में जल्दी सूर्योदय होने के कारण सुबह छह बजने से पहले ही तेज धूप हम सबका स्वागत करने को तैयार हो चुकी थी. छोटे भाई के दो मित्र अपने परिवार सहित हमारा इंतज़ार करते मिले. औपचारिकतायें जल्दी-जल्दी निपटाने के साथ ही हम सब शिप में अपनी निर्धारित सीट पर जा बैठे. नियत समय पर शिप ने समुद्र के सीने पर डोलना शुरू किया. आरम्भिक कुछ मिनटों की यात्रा को शिप के नियमों के अन्तर्गत अपनी जगह पर बैठे-बैठे करने के बाद यात्रियों को डैक पर आने की अनुमति दे दी गई. हमारी और परिवार की पहली समुद्री यात्रा होने के कारण एक अलग तरह का रोमांच भी था. हालाँकि इससे पूर्व कन्याकुमारी में विवेकानन्द रॉक पर पहुँचने के लिए फैरी की यात्रा की जा चुकी थी मगर वो कुछ मिनट की ही यात्रा था. उसके ठीक उलट पोर्ट ब्लेयर से हैवलॉक दो घंटे से अधिक की यात्रा थी. 


डैक पर आने की अनुमति मिलते ही हम अपना कैमरा संभाल डैक पर आ पहुँचे. हिलते-डुलते, उछलते-लहराते शिप की यात्रा में कुछ समय तो अपने दिमाग का संतुलन बनाने में लग गया. चक्कर आता सा समझ आ रहा था. कई यात्रियों को जी मिचलाते, उलटी करते भी देखा मगर ये बात हम तीनों लोगों के साथ अच्छी रही कि किसी को उलटी जैसी समस्या नहीं हुई. यद्यपि बिटिया रानी को कुछ उलटी जैसा हुआ मगर वो भी एक-दो बार के बाद सामान्य हो गई. सूरज की किरणें भिन्न-भिन्न तरीके से समुद्री लहरों का श्रृंगार करने में लगी थीं. शिप अपनी पूरी ताकत से विशाल समुद्र का सीना चीरकर उत्साह से आगे बढ़ा जा रहा था. जहाज के तल समुद्री जल को चीरते हुए दूधिया फेन बनाते हुए अनगिनत मनमोहक छवियों का निर्माण करने में लगा था. 




पूरे रास्ते जहाज के रास्ते छोटी-छोटी मछलियाँ, जिनमें डॉल्फिन भी शामिल थी, उछलकूद मचाते हुए इधर से उधर कूद-फांद करने में लगी थीं. दो घंटे से अधिक की यात्रा डैक किनारे खड़े-खड़े, समुद्री लहरों को कैमरे में कैद करते-करते कब हैवलॉक आ गया पता ही नहीं चला. इस दौरान जहाज पर बजते संगीत के बीच यात्रियों की मस्ती, नाच-गाना भी होता रहा. नवयुगल थिरकते हुए अपना आनंद बटोर रहे थे तो बुजुर्ग भी किसी से पीछे नहीं थे. सब मस्ती के मूड में एक परिवार सा लग रहे थे. न कोई छेड़छाड़, न कोई अभद्रता, न कोई अश्लीलता ऐसा लग रहा था जैसे सब अपने परिवार के बीच नाच-गाना-मस्ती कर रहे हों. 


हर्षोल्लास, मस्ती के माहौल में हैवलॉक आने की सूचना मिली. सब अपनी-अपनी जगह फिर बैठ गए. हैवलॉक उतने के बाद नैसर्गिक प्राकृतिक सुन्दरता चारों तरफ बिखरी दिखी. चंद किमी के दायरे में समुद्र किनारे बसी अत्यंत छोटे से मनमोहक हैवलॉक में राधानगर, कालापत्थर और एलिफेंटा सहित कुल तीन बीच वहाँ के सौन्दर्य को पर्यटकों के सामने बिखेरते हैं. समुद्री जल इस कदर साफ़ और नीला है कि उसकी गहराई में छिपे सौन्दर्य को भी सहजता से निहारा जा सकता है. 



शाम को राधानगर बीच पर पहुँचकर देखा कि सैकड़ों की संख्या में लोग समुद्री लहरों के साथ खेलते-कूदते आनंद उठा रहे हैं. इनमें से बहुतायत में नवयुगल थे जो आसपास की दुनिया से बेखबर सिर्फ अपने में निमग्न थे. मनमोहक सूर्यास्त के बाद वापस होटल लौटना हुआ. एक अजब सी अनुभूति के बाद महसूस हुआ कि समुद्र कितना भयावह होता है और कितना मनमोहक भी, बस उसकी स्थिति का अंतर होता है.





अगले दिन वैसे तो एलिफेंटा बीच जाने का निर्धारित कार्यक्रम था मगर सबने अपने-अपने कारणों से वहाँ जाने से इंकार कर दिया. चाय-नाश्ते आदि से निपटने के बाद हम सपरिवार कालापत्थर बीच को चल दिए. सामने विशाल समुद्र और उसके किनारे एक तरफ विशाल काली शिलाखंड, उसके काले छोटे-छोटे पत्थर उस बीच को कालापत्थर बीच के नाम से प्रसिद्धि दिलाये हुए थे. राधानगर बीच के मुकाबले यहाँ पर्यटकों की संख्या बहुत कम दिखी. इस बीच पर घोंघे, सीपी, शंख आदि जीवों का किनारे रेत पर रेंगना अद्भुत लगा. इसके अलावा छोटे-छोटे केंकड़े भी बड़ी तेजी से इधर से उधर भागते दिख रहे थे. ऐसा दृश्य कहीं और देखने को मिला नहीं था, इसके अलावा इनको कहीं और देखा भी नहीं था. नई तरह के जीवों को देखने का कौतूहल तो था ही साथ ही एक अदृश्य भय भी काम कर रहा था. 





तीसरे दिन हैवलॉक से वापसी का समय निर्धारित था. एकदम शांत, निर्मल, स्वच्छ हैवलॉक से इतनी जल्दी जाने का मन भी नहीं हो रहा था मगर जाना भी था. वापसी शिप का समय दोपहर बाद तीन बजे निर्धारित था. होटल छोड़ने के पूर्व कुछ देर हैवलॉक टहलकर वहाँ के बारे में कुछ और जानकारी एकत्र करने निकल पड़े. लगभग पच्चीस-तीस दुकानों का बाज़ार और बाजार के ठीक बीच एक छोटी सी मगर सजी हुई सब्जीमंडी, इतना सा बहुत छोटा सा बाजार वहाँ की जरूरतें पूरी करता था. यहाँ की जरूरत का सामान पोर्ट ब्लेयर से ही आता है और यहाँ के लोग भी अपनी अतिरिक्त जरूरतों के लिए पोर्ट ब्लेयर ही जाते हैं. 



पूरे हैवलॉक में ऑटो, कार, बस खूब हैं मगर एक भी दुकान इनको सुधारने की नहीं है. किसी भी तरह की मरम्मत, रिपेयरिंग के लिए इनको पोर्ट ब्लेयर जाना होता है. एक तरफ से बहुत अधिक किराया होने के कारण बस, कार, ऑटो वाले गीली अवस्था में किसी यात्री को बिठाते नहीं हैं. इसका कारण खारा पानी होने के कारण उनके वाहन का जल्द ख़राब होना रहता है.

दिन में अपनी चहलकदमी के बीच बाजार के कई दुकानदारों से बातचीत की. वहाँ के एक स्कूल में जाकर उनके प्रिंसिपल से मुलाकात की. उन्होंने सहर्ष, प्रसन्न भाव से हम सबका स्वागत किया. हैवलॉक के बारे में, वहाँ की शिक्षा व्यवस्था के बारे में जानकारी दी. प्राथमिक स्तर से लेकर इंटरमीडिएट तक के कुल सात विद्यालय वहाँ स्थित हैं. इनमें हिन्दी, अंग्रेजी और बंगला माध्यम से शिक्षा दी जाती है. उन्हीं से पता चला कि वर्तमान में हैवलॉक में लगभग आठ हजार के आसपास आबादी है, जिसमें से वहाँ के मूल निवासी लगभग दो ढाई हजार होंगे. शेष सभी व्यापारी, नौकरी आदि के सिलसिले में बाहर से आये हुए हैं. धर्म सम्बन्धी जानकारी ज्ञात करने पर पता चला कि वहाँ हिन्दू, मुस्लिम, बंगाली, मलयालम, तमिल आदि निवासी हैं. शिव और दुर्गा को पूजने वाले अधिक हैं और हैवलॉक में पाँच मंदिर हैं. जिनमें एक दुर्गा जी का और एक शिव जी का मंदिर है, जो वहीं बाजार में स्थित सब्जीमंडी के किनारे बने हैं. उन्हीं के साथ श्री हरि मंदिर भी है. शेष दो मंदिर राधानगर बीच जाते समय स्थित हैं.




निर्धारित समय पर शिप हैवलॉक से वापस पोर्ट ब्लेयर को चल पड़ा. आते समय शिप मेम्बर्स से संपर्क बना लेने के कारण डैक से शुरू हुई यात्रा डैक पर ही समाप्त की. दिल के साफ नागरिकों के दिल में सहज स्थापना के कारण पूरी यात्रा हँसते-बतियाते बीत गई. 


जाते समय जहाँ सूरज चढ़ते रूप में समुद्री लहरों संग खेल रहा था वहीं वापसी के समय उसका लौटता हुआ स्वरूप दिखाई दे रहा था. रंग बदलता सूरज अपने साथ-साथ लहरों के रंग को भी बदल दे रहा था. समुद्री भयावहता कहीं दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही थी. छोटी-छोटी मछलियों की अटखेलियाँ, लहरों का उछलना-कूदना, समुद्री जल का दूध सा सफ़ेद फेन बनाकर साथ-साथ भागना, जहाज का अथाह समुद्र के ऊपर पूरी मस्ती से भागना सबकुछ अद्भुत और रोमांचक लग रहा था. इन सबके बीच हैवलॉक की यादों को दिल में संजोकर, वहाँ के नयनाभिराम दृश्यों को कैमरे में कैद करके वापस पोर्ट ब्लेयर लौट आये.