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27 May 2017

तीन वर्ष के मोदी

राष्ट्रीय राजनीति का अनुभव न होने के बाद भी जिस तेजी से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने न केवल राष्ट्रीय राजनीति में वरन अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में अपने आपको स्थापित किया है वह प्रशंसनीय है. गुजरात मुख्यमंत्रित्व काल में उनकी छवि गुजरात दंगे और मुस्लिम विरोधी प्रचारित होने के चलते अमेरिका द्वारा उनको वीजा देने से इंकार कर दिया गया था. बाद में न सिर्फ अमेरिका ने वरन वैश्विक समुदाय ने मोदी जी की राजनैतिक सूझबूझ का लोहा माना और उनके माध्यम से देश के साथ मधुर संबंधों को मधुरतम बनाया. तीन वर्ष पहले प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते समय नरेन्द्र मोदी के सामने अनेकानेक चुनौतियाँ थीं. देश में अनेक समस्याओं के साथ-साथ विपक्षी बौखलाहट वाली भी एक समस्या प्रमुख थी. देश भर में छाई नमो लहर ने शेष दलों को जैसे हाशिये पर खड़ा कर दिया था. जाति, धर्म के नाम पर चलने वाली राजनीति को बहुत हद तक मतदाताओं ने आइना दिखा दिया था. ऐसे ने विपक्षियों में बौखलाहट आना स्वाभाविक था. इस बौखलाहट से निपटते हुए मोदी जी के सामने उसी गुजरात मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत करना था, जिसके सहारे वे लगातार गुजरात की राजनीति में अपना सिक्का जमाये हुए थे. भ्रष्टाचार-रिश्वतखोरी को दूर करना, कार्यप्रणाली को सही करना, जीवनशैली को सुचारू बनाना, हाशिये पर खड़े लोगों के हितार्थ काम करना, अल्पसंख्यकों के मन से नकारात्मकता को दूर करना, देश के चारित्रिक बदलाव की पहल करना आदि ऐसे काम थे जो सहजता से संपन्न होने वाले नहीं थे.


चुनौतियों के साथ काम करना संभवतः मोदी जी के साथ-साथ परछाईं की तरह लगा रहता है. राज्य की राजनीति में इसने कभी पीछा नहीं छोड़ा और राष्ट्रीय राजनीति में भी चुनौतियाँ साथ में आईं. उन्होंने इन चुनौतियों के साथ बड़ी ही सहजता से आगे बढ़ते हुए देश को नई ऊँचाइयों पर ले जाने का संकल्प लिया हुआ था. इसी संकल्प के जरिये वे संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा भारतीय विरासत योग को अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर स्थापित करने में सफल रहे. इसी तरह उन्होने देश के भीतर वर्षों से सुसुप्तावस्था में पड़े स्वच्छता विषय को जागृत किया. लाल किले से उनका स्वच्छता सम्बन्धी अभियान लगातार आगे बढ़ता नजर आ रहा है. मोदी जी की दृष्टि में जहाँ एक तरफ औद्योगिक विकास था वहीं आम जनमानस के विकास की बात भी वे करने में लगे थे. औद्योगिक घरानों को विशेष लाभ देने के आरोपों के बीच उन्होंने जनधन योजना के द्वारा समाज के हाशिये पर खड़े लोगों को देश की मुख्य विकासधारा से जोड़ने का काम किया. स्वच्छता को आधार बनाकर मोदी जी ने जिस तरह से शौचालय निर्माण का अभियान गाँव-गाँव तक पहुँचा दिया है वैसा विगत के वर्षों में देखने को कदापि नहीं मिला था. केंद्र सरकार ने उनके नेतृत्व में दिखाया कि वर्तमान सरकार जन-जन की सरकार है. जन-धन योजना, सामाजिक सुरक्षा बीमा योजना, अटल पेंशन योजना, उज्ज्वला योजना, बैंक खातों में सब्सिडी का आना, रसोई गैस की सब्सिडी का स्वेच्छा से त्याग करना आदि वे उदहारण हैं जो उनकी दूरगामी सोच को दर्शाते हैं. इन योजनाओं के पीछे का मूल उद्देश्य समाज में आदमी-आदमी के बीच के फर्क को कम करना, मिटाना रहा है. ऐसी योजनाओं के द्वारा सरकार ने आमजन को जोड़ने का काम किया, स्टार्टअप जैसे कार्यक्रम चलाकर देश के युवाओं को नई दिशा दी है, मेक इन इण्डिया के द्वारा विदेशी निवेशकों को आकर्षित किया है.


इसके बाद भी अभी चुनौतियाँ बहुत सारी हैं. तीन सालों में मोदी जी ने अभी जनमानस में विश्वास जमाया है. देश भर में फैली अव्यवस्था को दूर कर पाने में वे अभी सफल होते नहीं दिखे हैं. सबका साथ, सबका विकास के नारे को यदि वास्तविकता में लागू करना है तो मोदी जी को आमूलचूल परिवर्तन करने होंगे. ऐसे परिवर्तन करने की क्षमता उनमें है भी. ऐसा उन्होंने नोटबंदी करके दिखाया है, पाकिस्तान के प्रति कठोर रवैया अपनाकर प्रदर्शित किया है. इसके बाद भी उन्हें अभी और कड़े फैसले लेने की जरूरत है. कश्मीर समस्या, नक्सलवाद, कानून व्यवस्था, चिकित्सा, शिक्षा, कृषि, राजनैतिक वैमनष्यता आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जिनसे पार पाने की जरूरत है. विगत तीन वर्षों में मोदी जी ने जिस तरह से अपने कार्यों को, अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को आगे बढ़ाया है उससे उनकी मुस्लिम विरोधी छवि कम हुई है. अल्पसंख्यकों में भी विश्वास जगा है. इसी विश्वास के चलते ही मुस्लिम महिलाओं ने तीन तलाक जैसे संवेदनशील विषय पर मोदी जी का साथ चाहा है. देखा जाये तो विगत के कई-कई वर्षों की अनियमितता ने देश में कार्यशैली को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है. लोगों की सोच को भी नकारात्मक बनाया है. किसी भी काम के पीछे राजनैतिक दलों का लामबंद होना समझ में आता है किन्तु आम जनमानस को समझना होगा कि उसके लिए क्या सही है, क्या गलत है. मोदी सरकार अभी भी जनमानस की समस्याओं को सुलझाने के साथ-साथ राजनैतिक प्रतिद्वंद्वियों से जूझने के साथ-साथ मीडिया के नकारात्मक प्रचार-प्रसार से भी दो-चार हो रही है. ऐसे में आने वाले दो साल मोदी सरकार के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण होंगे. उन्हें न केवल जनता की समस्याओं को दूर करना है वरन देश के भीतर बैठे देश-विरोधियों की हरकतों को भी बढ़ने से रोकना है.

20 May 2017

अफवाह के चंगुल से बचें

किसी समय अंग्रेजों ने हमारे देश को मदारी, जमूरों का देश कहा था. सोने की चिड़िया कहे जाने वाले देश को पूरी तरह से लूटने के बाद गरीब बना दिए गए देशवासियों को अंग्रेज शासक कुछ भी समझने को आज़ाद थे. देश गुलाम था, देशवासी गुलाम थे ऐसे में वे यहाँ के नागरिकों को, देश को कुछ भी कह सकते थे. लम्बे संघर्ष के बाद, हजारों जाने-अनजाने वीर-वीरांगनाओं की शहादत रंग लाई और देश आज़ाद हुआ. अंग्रेज शासक चले गए किन्तु जाते-जाते वे अपनी मानसिकता का गहरा बीजारोपण यहाँ कर गए. जिसका दुष्परिणाम ये हुआ कि आज़ादी के बाद भी देश को जमूरा, मदारियों, नौटंकीबाजों का देश समझने वालों की कमी नहीं रही. गुलाम देश के अंग्रेजी शासकों की तर्ज़ पर आज़ाद देश के स्थानीय अंग्रेजों ने भी समय-समय पर देशवासियों के लिए अपनी-अपनी परिभाषायें निर्मित की. किसी ने बेवक़ूफ़ कहा, किसी ने कैटल क्लास बताया, किसी ने कुछ, किसी ने कुछ. इन परिभाषाओं को पुष्ट करने का काम समय-समय पर समाज में फैलती तमाम बातों ने भी किया है. इसमें भी सदैव से पढ़े-लिखे लोगों का भी बहुत बड़ा हाथ रहा है. कुछ दिनों पहले EVM के हैक किये जाने की अफवाह उड़ी. उसके भी पहले नोटबंदी के समय नए नोट को लेकर अनेक तरह की अफवाह फैलाई गईं. फोटोशॉप करके भी फोटो के द्वारा अफवाह फ़ैलाने का काम पढ़े-लिखे लोगों का ही होता है. अभी देखिये, एक पढ़े-लिखे विद्वान माने जाने वाले वकील साहब तीन तलाक जैसी नितांत अव्यवहारिक व्यवस्था की तुलना आस्था से करने बैठ गए. कुछ सालों पहले यही वकील साहब अदालत में हलफनामा देकर बता रहे थे कि जिस श्रीराम के प्रति हिन्दू आस्था व्यक्त करता है वे काल्पनिक हैं. 


इस अव्यावहारिक तुलनात्मक उदाहरण के साथ ही एक और घटनाक्रम दो-तीन दिन से बहुत तेजी से सबके बीच चलने में लगा है. इसमें लोगों को बताया-समझाया जा रहा है कि एक नौ अंकों के मोबाइल नंबर से फोन आएगा और उसे रिसीव करते ही मोबाइल फट जायेगा. हालाँकि अभी तक कहाँ-कहाँ मोबाइल फटा इसकी कोई जानकारी नहीं, इसके बाद भी इस मैसेज को लगातार-बराबर शेयर किया जा रहा है. ऐसे मैसेज समय-समय पर सोशल मीडिया की शान में चार चाँद तो लगाते ही हैं देशवासियों के सामान्य से ज्ञान पर भी रौशनी डालते हैं. कभी नमक की कमी होने लगती है, कभी कॉस्मिक किरणें रात को बारह बजे पृथ्वी के पास से निकलने लगेंगी, कभी कोई उल्का पिंड धरती पर गिरने की तैयारी करने लगता है. ऐसे में याद आता है सन 1980 के आसपास का समय जबकि स्काई लैब के गिरने की अफवाह बहुत तेजी से फैली थी. उस समय लोगों में मरने के डर से, सब खो जाने के भय से अफरातफरी मच गई थी. समझा जा सकता है कि उस समय तकनीक का, संचार साधनों का अभाव था किन्तु अब तो प्रत्येक व्यक्ति तकनीकी संपन्न है, संचार साधनों के सहारे समूचे विश्व से जुड़ा है. ऐसे में किसी भी तरह की अफवाह पर समाज के बहुत बड़े वर्ग का चिंताग्रस्त हो जाना अंग्रेजों और देशी-अंग्रेजों द्वारा यहाँ के बहुतायत नागरिकों के लिए कहे गए वचनों को सिद्ध करता है.


उस समय जबकि लोगों के पास शिक्षा के साधन कम थे, लोगों का परिचय तकनीक से दूर-दूर तक नहीं था तब उनका दिग्भ्रमित हो जाना स्वाभाविक था. तब उनके पास संचार के साधन भी नहीं थे, जो थे भी वे इतने उन्नत नहीं थे कि पल में सुदूर क्षेत्र की खबर का आदान-प्रदान कर सकें. ऐसी विषम स्थितियों में नागरिकों का अफवाहों के चंगुल में फँस जाना समझ आता है. आज जबकि तकनीकी दुनिया बहुत समर्थ है; आज जबकि लगभग हर हाथ में संचार साधन की उन्नत तकनीक है; आज जबकि एक पल में देश की ही नहीं वरन विदेश की किसी भी खबर को सामने खड़ा देख सकते हैं तब भी समाज का बहुत बड़ा वर्ग अफवाहों का शिकार बन जाता है, जालसाजी का शिकार बन जाता है. ऐसे समय में ये समझ से परे है कि आखिर ऐसा क्यों हो जाता है? आखिर ऐसा होने में दोषी कौन होता है? जो अफवाह फैलाकर, जालसाजी करके अपना उल्लू सीधा करता है या फिर वो जो इसका शिकार बन जाता है? आज जिस तेजी से तकनीक का विकास हुआ है, उसी तेजी से इसका दुरुपयोग करने वालों की संख्या में भी वृद्धि हुई है. तकनीक की आड़ लेकर कभी अफवाह के द्वारा लोगों को ठगने का काम किया जाता है तो कभी इसी तकनीक के सहारे अफवाह फैलाकर किसी लोभ-लालच का शिकार बनाया जाता है. आवश्यकता सजग रहने की है, सचेत रहने की है. तकनीकी रूप से सक्षम होने का अर्थ सोशल मीडिया में हस्तक्षेप बढ़ जाना नहीं है; तकनीकी ज्ञान का अर्थ किसी भी रूप में मोबाइल पर समूची दुनिया को कैद समझ लेना नहीं है वरन तकनीकी रूप से साक्षर होने का अर्थ है कि अपने आसपास होने वाले किसी भी घटनाक्रम के बारे में सही-सही जानकारी रखना. किसी भी अफवाह, घटनाक्रम के सामने आने टार उसकी सत्यता, उसकी प्रामाणिकता को पता करना. यदि ऐसा हम नहीं कर पा रहे हैं तो इसका सीधा सा अर्थ है कि हम सभी पढ़े-लिखे निरक्षर हैं. यदि ऐसा हम नहीं कर पा रहे हैं तो इसका सीधा सा अर्थ है कि हम आये दिन खुद को ठगी का शिकार बनवा रहे हैं. यदि हम ऐसा नहीं कर पा रहे हैं तो इसका सीधा सा अर्थ है कि हम खुद को, अपने वर्तमान को, भविष्य को खतरे में डाल रहे हैं. खुद को, परिवार को, समाज को, देश को खतरों से बचाने के लिए अफवाहों से बचने, उनके प्रचार-प्रसार से बचने, उनकी सत्यता प्रमाणित करने की आवश्यकता है. 

11 May 2017

बुद्ध को एक बार फिर मुस्कुराना होगा

इस बार बुद्ध पूर्णिमा, 10 मई के अगले दिन ही वो गौरवशाली दिन, 11 मई आया जब देश में बुद्ध मुस्कुराये थे. जी हाँ, 11 मई 1998 जब देश में दोबारा बुद्ध मुस्कुराये थे. इससे पहले वे सन 1974 में मुस्कुराये थे. देश के परमाणु इतिहास में दो बार भूमिगत परीक्षण किये गए और दोनों ही बार शांति-अहिंसा के परिचायक महात्मा बुद्ध का नाम इसके गुप्त सन्देश के रूप में उपयोग किया गया. यह सम्पूर्ण विश्व को यह सन्देश देने के लिए पर्याप्त और स्पष्ट है कि देश के परमाणु कार्यक्रम का उद्देश्य सिर्फ शांति-अहिंसा के लिए है, शांतिपूर्ण कार्यो के लिये है और यह परीक्षण भारत को उर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिये है. पोखरण में 11 और 13 मई 1998 को पाँच भूमिगत परमाणु परीक्षण करने के साथ ही भारत ने स्वयं को परमाणु शक्ति संपन्न देश घोषित कर दिया. 


राजस्थान के पोखरण में पाँच परमाणु विस्फोट होने से समूचे विश्व में तहलका मच गया था. इसका कारण किसी को भी इस कार्यक्रम की भनक न लग पाना रही. परीक्षण के इन धमाकों से सारा संसार चकित रह गया. ऑपरेशन शक्ति के रूप में शुरू हुए इस अभियान की भनक विकसित देशों के उपग्रहों को भी न लगने के पीछे कलाम साहब की बहुत बड़ी भूमिका रही. चूँकि 1995 में ऐसे कार्यक्रम को अमेरिकी उपग्रह द्वारा पकड़ लिया गया था, जिसके बाद अन्तर्राष्ट्रीय दवाब के आगे देश ने अपने उस कार्यक्रम को टाल दिया था. इस बार कलाम साहब अपनी टीम के साथ किसी भी तरह की हीलाहवाली के मूड में नहीं थे. उन्होंने गुप्त कोड के ज़रिये अपनी बातचीत को बनाये रखा. पोखरण में काम उसी समय किया गया जबकि उपग्रहों की नजर में वो जगह नहीं होती थी. परमाणु परीक्षण से सम्बंधित समस्त उपकरणों को सेब की पेटियों में लाया गया, जिससे किसी को शक न हो. परीक्षण पूर्व की पूरी तैयारी में कलाम साहब सहित समस्त वैज्ञानिक सेना की वर्दी में तथा सैन्य अधिकारियों के रूप में ही रहे जिससे यही लगे कि भारतीय सेना का कोई कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है. परीक्षण क्षेत्र के आसपास के ग्रामवासियों को भी परीक्षण के दिन तक किसी तरह का आभास नहीं होने दिया गया था.

तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी 20 मई को परीक्षण स्थल पहुंचे. उन्होंने देश को एक नया नारा जय जवान-जय किसान-जय विज्ञान दिया. सभी देशवासी प्रधानमंत्री के साथ-साथ गर्व से भर उठे. अमरीका, रूस, फ्रांस, जापान और चीन आदि देशों ने भारत को आर्थिक सहायता न देने की धमकी देते हुए प्रतिबन्ध भी लगा दिए किन्तु देश इन धमकियों के सामने नहीं झुका. देश ने इन्हीं प्रतिबंधों के बीच 13 मई 1998 को पोखरण में फिर से परमाणु परीक्षण करके सम्पूर्ण विश्व को स्पष्ट जवाब दे दिया था कि वो किसी भी ताकत के आगे झुकने वाला नहीं है. इन परीक्षणों को करने का मुख्य उद्देश्य विश्व को यह बताना था कि देश किसी भी सामरिक क्षमता का मुँहतोड जवाब देने में समर्थ है. अपनी सुरक्षा के लिए आत्मनिर्भर है.


आज से लगभग दो दशक पहले देश ने सम्पूर्ण विश्व को दरकिनार करते हुए, बहुत सारे विकसित देशों के प्रतिबंधों को नकारते हुए अपनी जीवटता का परिचय दिया था. आज जबकि देश तत्कालीन स्थितियों से कई गुना अधिक सक्षम है, कई गुना तकनीकी रूप से विकसित है, कई गुना अधिक वैश्विक समर्थन उसके साथ है उसके बावजूद चंद आतंकी ताकतों के सामने देश की शीर्ष सत्ता कमजोर नजर आ रही है. पड़ोसी देशों के समर्थन से संचालित आतंकवाद के सामने कमजोर पड़ती दिख रही है. पड़ोसी सेना के कायराना हरकतों के आगे चुप्पी साधे बैठी है. माना कि इन सबके लिए परमाणु हथियारों का उपयोग नहीं किया जा सकता है, किसी अन्य स्थिति में किया भी नहीं जाना चाहिए मगर देश के विरुद्ध षडयन्त्र कर रहे लोगों को, देश में हिंसा फैलाते आतंकियों को, देश की सेना के लिए मुश्किल बनती पड़ोसी सेना-आतंकियों को सबक सिखाने के लिए उसी परमाणु परीक्षण जैसा हौसला, जीवटता चाहिए जो पहले दिखा था. एक बार फिर से बुद्ध को मुस्कुराना होगा और इस बार भी उनके मुस्कुराने का उद्देश्य शांति स्थापित करना होगा, सेना का स्वाभिमान बरक़रार रखना होगा, देश की अखंडता को बनाये रखना होगा. 

07 May 2017

सख्त कदम उठाये सरकार घाटी में

पाकिस्तान के जन्म के साथ ही जम्मू-कश्मीर का विवाद शुरू हो गया था. आज तक आमजन के समझ के परे है कि देश के लिए पाकिस्तान के अलावा मुख्य समस्या क्या है, जम्मू-कश्मीर या फिर जम्मू-कश्मीर के निवासी? इस समस्या को सरकारों ने और भी जटिल बनाया है. देश की आज़ादी के तुरंत बाद जब रियासतों के विलय की प्रक्रिया चल रही थी, उस समय जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देकर तत्कालीन केंद्र सरकार ने अपने लिए समस्या को पैदा कर लिया था. संभव है कि तत्कालीन परिस्थितियों में ऐसा करना उपयुक्त रहा हो पर उसके सन्दर्भ में भी कभी भी स्पष्ट नहीं किया गया कि ऐसा क्यों किया गया. उसके बाद से जो स्थितियाँ वहाँ बनती आई हैं वे किसी से छिपी नहीं हैं. पाकिस्तान ने अपने जन्म के साथ ही उत्पात मचाना शुरू कर दिया था. शांति-अहिंसा-समझौतों की राह पर चलने वाले तत्कालीन लोगों की नीतियों के कारण देश का एक हिस्सा आजतक पाकिस्तान के कब्जे में है. इतने के बाद भी पाकिस्तान की नीयत में बदलाव नहीं आया. उसकी तरफ से आतंकवाद को पोषित किया जाता रहा और किसी समय खुशहाल घाटी में हिंसा, अत्याचार, बमों, बंदूकों के शोर उभरने लगे. वहाँ के हिन्दू नागरिकों को अत्याचारों का सामना करना पड़ा. महिलाओं, बच्चियों के साथ शारीरिक अमानवीयता की पराकाष्ठा दिखाई गई. ज़ुल्मों-सितम के चलते वहाँ के हिन्दू नागरिकों को घाटी से पलायन करना पड़ा. आतंक-प्रिय लोगों को इसके बाद भी चैन नहीं मिला. आये दिन उनके द्वारा घाटी में आतंक को विस्तार दिया जाता रहा.  


समय बदलने के साथ देश में केंद्र सरकारें बदलती रही किन्तु जम्मू-कश्मीर और पाकिस्तान के प्रति नीतियों में बदलाव देखने को नहीं मिले. केंद्र सरकार में परिवर्तन हुआ और देश की जनता ने भारी बहुमत से भाजपा को सत्ता सौंपी. इसके पीछे कहीं न कहीं इस्लामिक आतंकवाद के विरुद्ध वातावरण का बनना, पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद को मुँहतोड़ जवाब देने की संकल्पना काम कर रही थी. इस अवधारणा के बीच घाटी में हुए विधानसभा चुनावों ने भी भाजपा के लिए राह निर्मित की. लगातार राज्य की सत्ता से बाहर बनी भाजपा को वर्तमान में राज्य सरकार में शामिल होने का अवसर प्राप्त हुआ. देश में गठबंधन सरकार के विरोध भी किया गया क्योंकि बहुसंख्यक लोगों का मानना था कि अलगाववादियों का समर्थन करने वालों के साथ भाजपा को सरकार नहीं बनानी थी. इसके बाद भी बहुसंख्यक लोग इसके पक्षधर रहे. उनका मानना था कि कम से कम इस बहाने राज्य सरकार के सञ्चालन में, वहाँ की स्थानीय व्यवस्था में भाजपा का हस्तक्षेप होने से जम्मू-कश्मीर में चले आ रहे अलगाववादी कदमों में कुछ लगाम लगे. सरकार बनने के बाद भी सकारात्मक परिवर्तन देखने को नहीं मिले बल्कि आये दिन उत्पात की, हिंसा की, उपद्रव की घटनाएँ और तेज होने लगीं. शैक्षिक संस्थान में देश विरोधी नारे लगाये गए. भारत माता की जय कहने वालों का उत्पीड़न किया गया. सेना को पत्थरों की मार सहनी पड़ी. सैनिकों को दुर्वयवहार सहना पड़ा. पाकिस्तान की तरफ से हमलों की संख्या में वृद्धि होने लगी. वीर शहीदों के पार्थिव शवों के साथ भी हैवानियत दिखाई गई. केंद्र और राज्य में भाजपा सरकार होने के बाद भी किसी दिन नहीं लगा कि जम्मू-कश्मीर की समस्या को सुलझाने के लिए कोई प्रयास किये जा रहे हों. 


यहाँ केंद्र सरकार को और राज्य सरकार में गठबंधन करती भाजपा को सोचना होगा कि देश की तरफ से, घाटी की तरफ से उनको बहुमत मिलने के पीछे कहीं न कहीं उनका वो एजेंडा था जो धारा 370 को हटाने की बात करता था. कहीं न कहीं वो बयानबाजी थी जो पाकिस्तान को मुँहतोड़ जवाब देने के लिए होती थी. ऐसे में जनसमुदाय में आक्रोश होना स्वाभाविक है. अब सरकार को या कहें कि भाजपा को विशेष रूप से इस तरफ ध्यान देने की जरूरत है. घाटी के अलगाववादियों के साथ सख्ती से पेश आने की आवश्यकता है. इसके अलावा एक बात और विशेष रूप से केंद्र और राज्य सरकार को अमल में लानी होगी वो है वहाँ की स्थानीय पुलिस का हस्तक्षेप. स्पष्ट सी बात है कि सेना केंद्र के आदेशों के इंतज़ार में बनी रहती है और स्थानीय पुलिस को वहाँ के स्थानीय लोगों के समर्थन के साथ-साथ राज्य सरकार का संरक्षण मिल हुआ है. यही कारण है कि वहाँ आये दिन पाकिस्तानी झंडे लहराए जाने लगते हैं. देश विरोधी नारेबाजी की जाने लगती है. घाटी में शांति-व्यवस्था बनाये रखने के लिए आवश्यक कदमों में प्राथमिकता के आधार पर स्थानीय पुलिस के स्थान पर सेना को वरीयता दी जाये. इसके अलावा किसी भी कीमत पर अलगाववादियों को मिलने वाली तमाम सुविधाओं को समाप्त कर उन पर सख्त कार्यवाही की जाये. सेना को सीमापार से घुसपैठ रोकने, सीमापार से आते आतंकियों और हमलों को रोकने, पाकिस्तानी सेना द्वारा की जा रही कार्यवाही का जवाब देने को पर्याप्त रूप से आज़ादी दी जानी चाहिए. बातचीत एक रास्ता हो सकता है मगर सभी समस्याओं का समाधान बातचीत ही नहीं है. समझने-सोचने वाली बात है कि राज्य में भाजपा सरकार के गठबंधन के बाद ही अचानक से पत्थरबाजी की, आतंकी हमलों की, पाकिस्तानी सेना के हमलों की घटनाएँ क्यों बढ़ गईं? 

28 April 2017

गेंहू के संग घुन पिसता हो तो पिसे

फिर एक नक्सली हमला हुआ. फिर हमारे कई जवान शहीद हो गये. फिर सरकार की तरफ से कड़े शब्दों में निंदा की गई. फिर कठोर कदम उठाये जाने की बात कही गई. इस ‘फिर’ में हर बार हमारे जवान ही कुर्बान हो रहे हैं और इस ‘फिर’ का कोई अंतिम समाधान नहीं निकल रहा है.

परिचयात्मक रूप में नक्सलवाद कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के उस आंदोलन का अनौपचारिक नाम है जो पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ. इसे भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने 1967 में सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन के रूप में आरम्भ किया था. वे चीन के कम्यूनिस्ट नेता माओत्से तुंग से प्रभावित थे और मानते थे कि न्यायहीन दमनकारी वर्चस्व को केवल सशस्त्र क्रांति से ही समाप्त किया जा सकता है. यह सशस्त्र संघर्ष उनकी मृत्यु के बाद अपनी असल विचारधारा से अलग हो गया. देखा जाये तो वर्तमान में नक्सलवाद सरकार के सामानांतर एक सत्ता स्थापित करने की मानसिकता से काम कर रहा है. अब इसका उद्देश्य किसी भी रूप में आदिवासियों को उनके अधिकारों को दिलवाना, अपने वन-जंगलों-संसाधनों पर अपना आधिपत्य बनाये रखना मात्र नहीं रह गया है. अब उनके द्वारा आदिवासियों की आड़ लेकर राजनैतिक संरक्षण प्राप्त किया जा रहा है जो कहीं न कहीं उन्हें सत्ता के करीब लाता है. सत्ता के करीब पहुँचने की इसी स्थिति का दुष्परिणाम ये है कि आज नक्सलवाद भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है. देश के 180 जिलों यानि कि भारतीय भूगोल का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा नक्सलवादियों के कब्जे में है जो लगभग 92 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में है. यह देश के 10 राज्यों-उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश आदि तक फैला हुआ है. इसी इलाके को आज रेड कॉरिडोर के नाम से जाना जाता है. एक अनुमान के अनुसार लगभग 30 हजार सशस्त्र नक्सली वर्तमान में इसी विचारधारा से काम कर रहे हैं.


नक्सलवादियों द्वारा प्रतिवर्ष सैकड़ों, हजारों की संख्या में लोगों को मौत के घाट उतार दिया जाता है. कई बार पुलिस मुखबिरी करने के शक में वे आदिवासी भी शामिल होते हैं, जिनके अधिकारों के लिए लड़ने की बात नक्सली करते हैं. सबसे आश्चर्यजनक बात ये है कि एक तरफ कॉरपोरेट घरानों द्वारा आदिवासियों की सम्पदा को लूटने की बात की जाती है दूसरी तरफ पूरी चर्चा में कहीं भी आदिवासी दिखाई नहीं देते हैं. ऐसे में यदि सरकार को किसी तरह का हल निकालना है तो बातचीत के मोड़ पर नक्सलियों के साथ-साथ उन आदिवासियों को भी शामिल करना होगा, जिनके अधिकारों का हनन हो रहा है.

विगत कुछ वर्षों की घटनाओं को देखने में साफ तौर पर समझ आ रहा है कि नक्सलियों द्वारा अपने प्रभाव को, शक्ति को, राजनैतिक संरक्षण को धन-उगाही के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा है. उनके द्वारा सम्बंधित क्षेत्र में विकास-कार्यों को बाधित करना उनका मुख्य उद्देश्य बन गया है. वे किसी भी रूप में नहीं चाहते हैं कि क्षेत्र का विकास हो और आदिवासियों में राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल होने की मंशा जन्म ले. वे समूचे क्षेत्र और व्यक्तियों को अपनी हथियारों की सत्ता के अधीन रखना चाहते हैं. ऐसे में यदि बातचीत एक रास्ता है तो सैन्य कार्यवाही भी एक रास्ता है. सैन्य कार्यवाही के जवाब में एक तर्क हमेशा आता है कि इसमें निर्दोष नागरिक मारे जायेंगे. इसके जवाब में बस एक ही सवाल कि क्या नक्सली हमलों में अभी तक निर्दोष नहीं मारे गए? ‘गेंहू के साथ घुन भी पिसता है’ की बात को दिमाग में रखते हुए सरकार एक तरफ सैन्य कार्यवाही की छूट देनी चाहिए साथ ही स्थानीय नागरिकों के साथ तालमेल बैठाते हुए उनका समर्थन हासिल करना चाहिए क्योंकि जब तक स्थानीय नागरिकों का समर्थन नक्सलियों के साथ है (चाहे स्वेच्छा से अथवा डर से) तब तक समस्त नक्सलियों को समाप्त करना संभव नहीं. इसके अलावा केंद्र और राज्य सरकारों के मध्य संबंधों को और बेहतर बनाये जाने की आवश्यकता है. केंद्र द्वारा भेजे गए सुरक्षा बलों व स्थानीय पुलिस के बीच बेहतर तालमेल बनाये जाने की जरूरत है. नक्सलियों से निपटने के लिए सरकार को अपनी रणनीति में बदलाव करने होंगे. सोचना होगा कि आखिर संसाधनों के नाम पर, विकास के नाम पर जंगलों को, वनों को, पहाड़ों को समाप्त कर देने से वहाँ से विस्थापित आदिवासी जायेंगे कहाँ? यदि उसके द्वारा आदिवासियों के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जाना सुनिश्चित है तो उसके द्वारा आदिवासियों को उससे विस्थापित करने की बजाय उन्हें मालिकाना अधिकार देना होगा.

एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि आदिवासी क्षेत्रों से चुने गए जनप्रतिनिधियों को इन आदिवासियों के साथ समन्वय स्थापित करना चाहिए. सत्यता यही कि नक्सलवाद का अंतिम समाधान सिर्फ हिंसा नहीं है क्योंकि नक्सलवाद अब एक विचारधारा के रूप में काम कर रहा है. इसमें राजनैतिक लोगों का सरकार के, सेना के, सुरक्षाबलों के समर्थन में आना होगा. आदिवासियों एवं आदिवासी क्षेत्रों के चहुंमुखी विकास की बात करनी होगी. यही नक्सलवाद के निराकरण के लिए रामबाण अचूक औषधि है. 

21 April 2017

ट्वीट से उपजा अज़ान-लाउडस्पीकर विवाद

लोग एक बार फिर मुद्दे से भटक कर उसे धर्म, मजहब की चौखट पर खींच लाये. गायक सोनू निगम ने एक बहुत सामान्य सी बात के सन्दर्भ में चार ट्वीट किये और बस उनके मूल को समझे बिना विवाद शुरू हो गया. विवाद करने वालों को लगा कि उनके ट्वीट का मूल अज़ान को बंद करवाना है जबकि वे उसका निहितार्थ भुला बैठे. यदि सोनू निगम के चारों ट्वीट को पढ़ा जाये तो सहजता से पता चलता है कि उसमें उनका मूल भाव लाउडस्पीकर के उपयोग पर है न कि अज़ान पर. अब ये और बात है कि सोनू निगम के विरोध में आने वाले बस अज़ान को ही देख रहे हैं. इस विवाद के साथ एक और बात हुई और वो अत्यंत हास्यास्पद रही. सोनू निगम के ट्वीट के विरोध में एक मौलवी सामने आये और सोनू निगम का सिर मूंडने के बदले दस लाख रुपये देने का फतवा जारी कर बैठे. उनके फतवा लाते ही सोनू ने अगले दिन अपना सिर मुंडवा लिया. अब लोग सोनू निगम के समर्थन में आते हुए मौलवी के पीछे पड़ गए. इस आगा-पीछा पड़ने में मूल भावना कहीं गुम हो गई. इस पूरे विवाद में मुद्दा न तो ट्वीट था, न अज़ान, न ही फतवा बल्कि मूल मुद्दा था धार्मिक कृत्यों में लाउडस्पीकर का उपयोग होना. सोनू निगम ने ट्वीट के द्वारा अपनी परेशानी बताई या फिर अपनी लोकप्रियता की राह को और साफ़ किया ये वही जानें किन्तु उससे एक मुद्दा निकला कि धार्मिक कृत्यों में लाउडस्पीकर का इस्तेमाल हो या न हो. जो लोग भी अपने-अपने स्तर में इस चर्चा में सहभागी बने वे इससे भटक कर हिन्दू, मुस्लिम में विभक्त हो गए. 





देखा जाये तो विगत कुछ वर्षों से समाज दो भागों में बंट गया है. एक हिन्दू और दूसरा गैर-हिन्दू. यहाँ भी कुछ ऐसा ही हुआ. सोनू निगम के चार ट्वीट में यदि पहले ट्वीट में अजान शब्द आया है तो तीसरे शब्द में मंदिर, गुरुद्वारा शब्दों का भी प्रयोग किया गया है. इसके बाद भी बवाल पैदा करने में अज़ान-प्रेमी ही सामने आये हैं. इसमें मुस्लिम और गैर-मुस्लिम दोनों तरफ के लोग हैं. वैसे सोचने की बात बस इतनी है कि आखिर मुस्लिम समुदाय को इस पर आपत्ति क्या है कि उनकी मजहबी क्रिया में लाउडस्पीकर का उपयोग न होने का ट्वीट आ गया? कहीं उनको ये तो नहीं लग रहा कि ट्वीट के बहाने सरकार उनकी मजहबी क्रिया में उपयोग होने वाले लाउडस्पीकर को प्रतिबंधित तो करने जा रही है? वैसे समाज में यदि हिन्दू-मुस्लिम समुदाय के धार्मिक कृत्यों में लाउडस्पीकर के उपयोग पर गौर किया जाये तो मंदिरों में लाउडस्पीकर का उपयोग नियमित रूप से उतना नहीं होता है जितना कि मस्जिदों में किया जाता है. शत-प्रतिशत मस्जिदों में दिन में पाँच बार लाउडस्पीकर का उपयोग किया जाता है, इसके मुकाबले मंदिरों की संख्या कम है. हिन्दू धार्मिक कृत्यों में भागवत, रामचरित मानस का पाठ, सत्यनारायण कथा आदि के समय लाउडस्पीकर का उपयोग अवश्य किया जाता है. ऐसा भी नियमित न होकर कुछ दिन के लिए होता है. किसके द्वारा उपयोग कम हो रहा है, किसके द्वारा उपयोग कम हो रहा है, ये एक अलग मुद्दा बन सकता है किन्तु यहाँ समझने वाली बात ये है कि आखिर धार्मिक कृत्यों में लाउडस्पीकर की आवश्यकता क्यों पड़ती है? इसका उपयोग किया ही क्यों जाता है? भले ही सोनू निगम ने किसी भी अन्य मानसिकता के वशीभूत ट्वीट करके लाउडस्पीकर की समस्या को सामने रखा तो क्या उस पर आम सहमति बनाते हुए इसके प्रयोग पर प्रतिबन्ध की बात सबको नहीं करनी चाहिए थी? ऐसा कुछ न हुआ बल्कि इसके उलट हिन्दू-मुस्लिम विवाद को जन्म दे दिया गया.


बहरहाल अंतिम निष्कर्ष क्या होगा ये तो बाद की बात है मगर एक सामान्य से ट्वीट पर आक्रोशित हो जाना, फतवा जारी करना, सोनू निगम पर मुकदमा दर्ज करने की अपील, धार्मिक भावनाओं को भड़काने का आरोप लगाने जैसे कदम मुस्लिम समुदाय की आक्रामकता को ही दर्शाता है. यही आक्रामकता उनको समुदाय में सबसे कहीं अलग-थलग खड़ा कर देती है. अपने आपको मुख्यधारा से अलग न होने देने की दिशा में वे खुद ही कुछ सोचें और विचार करें. उन्हें समझना होगा कि समाज-निर्माण में फैसले लेने का आधार न तो ट्वीट होता है और न ही लाउडस्पीकर. आपसी समझ, विश्वास, स्नेह ही सबको आगे बढ़ाता है, सबकी धार्मिक भावनाओं का सम्मान करता है. 

14 April 2017

सैनिकों का मनोबल न गिरे, ध्यान रखना

किसी भी उस व्यक्ति के लिए जो देश का, सेना का, वीर जवानों का सम्मान करता है, उस हालिया वीडियो को देख कर आक्रोशित होना स्वाभाविक है जिसमें हमारे वीर सैनिकों को कश्मीरी युवकों की हरकतों को सहना पड़ रहा है. जम्मू-कश्मीर के उपचुनाव संपन्न करवाने के बाद लौटते सैनिकों के साथ कश्मीरी युवकों का व्यवहार किसी भी रूप में ऐसा नहीं है कि कहा जाये कि वे लोग सेना का सम्मान करते हैं. सैनिकों के साथ उनके दुर्व्यवहार के साथ-साथ लगते नारे समूची स्थिति को स्पष्ट करते हैं. सैनिकों के साथ हुई ये घटना उन लोगों के लिए एक सबक के तौर पर सामने आनी चाहिए जो कश्मीरी युवकों को भोला और भटका हुआ बताते नहीं थकते हैं. जिनके लिए सेना के द्वारा पैलेट गन का इस्तेमाल करना भी उनको नहीं सुहाता है. सोचने वाली बात है कि जिस सेना के पास, सैनिकों के पास देश के उपद्रवियों से लड़ने की अकूत क्षमता हो वे चंद सिरफिरे युवकों के दुर्वयवहार को चुपचाप सहन कर रहे हैं. ये निपट जलालत जैसे हालात हैं. 


जम्मू-कश्मीर का आज से नहीं वरन उसी समय से ऐसा हाल है जबकि पाकिस्तान ने अपने जन्म के बाद से ही वहाँ अपनी खुरापात करनी शुरू कर दी थी. विगत कई दशकों में जम्मू-कश्मीर में और केंद्र में सरकारों का पर्याप्त समर्थन न मिल पाने का बहाना लेकर सेना के जवानों को अपमान का घूँट पीकर रह जाना पड़ता था. वर्तमान राज्य सरकार में जब भाजपा ने गठबंधन किया तो माना जाने लगा था कि उनके द्वारा सत्ता में भागीदारी से शायद जम्मू-कश्मीर के हालातों में कुछ सुधार आयेगा. वहाँ तैनात सैनिकों के सम्मान की चर्चा की जायेगी. इधर केंद्र-राज्य दोनों जगह भाजपा की सरकार होने के बाद, लगातार पाकिस्तानी आतंकवाद को मुँहतोड़ जवाब देने के वादे के बाद तथा जम्मू-कश्मीर के बिगड़ते हालात सुधारने की बात करने के बाद भी वहाँ की स्थितियाँ सामान्य नहीं हो पाई हैं. अब जो वीडियो आया है उसे देखकर लगता नहीं कि निकट भविष्य में वहाँ के हालात सुधरने की सम्भावना है. अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों, संधियों, समझौतों के अनुसार माना कि युद्ध अनिवार्य अंग नहीं है मगर देश के अन्दर उत्पात मचाते लोगों पर नियंत्रण न करना किस कानून के अंतर्गत है? सेना पर, सैनिकों पर पत्थरबाजी करते लोगों से न निपटने के लिए कौन सा समझौता आड़े आ रहा है? वीर सैनिक अपमान का घूँट पीते रहें और कश्मीरी युवक मानवाधिकार की हनक के चलते साफ़-साफ़ बच निकलें ऐसा किस नियम में लिखा हुआ है? 

सैनिकों के साथ हुए दुर्व्यवहार के वीडियो ने समूचे देश को आक्रोशित कर दिया है. इससे बस वे ही लोग बचे हैं जो किसी आतंकी की फाँसी के लिए देर रात अदालत का दरवाजा खुलवा सकते हैं. वे ही आक्रोशित नहीं हैं जो पत्थरबाज़ी करते युवकों, महिलाओं, बच्चों को भटका हुआ बताते हैं. उनके ऊपर इस वीडियो का कोई असर नहीं हुआ जो सेना को बलात्कारी बताते हैं. बहरहाल, किस पर इस वीडियो का असर हुआ, किस पर असर नहीं हुआ ये आज मंथन करने का विषय नहीं है. अब सरकार को इस वीडियो का स्वतः संज्ञान लेते हुए उसी वीडियो के आधार पर सम्बंधित युवकों पर कठोर कार्यवाही करे. इसके अलावा सेना को कम से कम इतनी छूट तो अवश्य दी जानी चाहिए कि वे अपने ऊपर होने वाले इस तरह के हमलों का, पत्थरबाज़ी का तो जवाब दे ही सकें. मानवाधिकार का सवाल वहाँ खड़ा होना चाहिए जबकि वे जबरिया किसी व्यक्ति को परेशान करने में लगे हों. यदि एक सैनिक अपने सम्मान की रक्षा नहीं कर पा रहा है तो वो पल उसके लिए बहुत ही कष्टकारी होता है. ऐसी घटनाओं पर सरकारों का शांत रह जाना, सम्बंधित अधिकारियों द्वारा कोई कार्यवाही न करना सैनिकों के मनोबल को गिराता है. यहाँ सरकार को ध्यान रखना होगा कि किसी भी तरह से सेना का, सैनिकों का मनोबल न गिरने पाए. यदि सेना का मनोबल गिरता है तो वह देश के हित में कतई नहीं होगा. देश के अन्दर बैठे फिरकापरस्त और देश के बाहर बैठे आतातायी चाहते भी यही हैं कि हमारी सेना का, सैनिकों का मनोबल गिरे और वे अपने कुख्यात इरादों को देश में अंजाम दे सकें. देश की रक्षा के लिए, किसी राज्य की शांति के लिए, नागरिकों की सुरक्षा के लिए सरकारों को पहले सेना के, सैनिकों के सम्मान की रक्षा करनी होगी. कश्मीरी युवक, भले ही लाख गुमराह हो गए हों, मासूम हों, भटक गए हों मगर ऐसी हरकतों के लिए उनके पागलपन को कठोर दंड के द्वारा ही सुधारा जाना चाहिए. यदि इस तरह की घटनाओं के बाद सम्बंधित पक्ष पर किसी तरह की कार्यवाही नहीं होती है तो उनके नापाक मंसूबे और विकसित होंगे और वे सेना के लिए ही संकट पैदा करेंगे. समझना होगा कि यदि हमारी सेना, वीर सैनिक संकट में आते हैं तो देश स्वतः संकट में आ जायेगा. देश को बचाने के लिए आज ही सेना को, सैनिकों को ससम्मान बचाना होगा. ऐसी घटनाओं से निपटने को सम्पूर्ण अधिकार देना होगा.   

08 April 2017

वर्तमान के साये में अतीत की यात्रा

जिंदगी कई बार बहुत लम्बी लगती है तो कभी बहुत छोटी सी. इसी तरह समय कई बार काटे नहीं कटता और कई बार रोके नहीं रुकता. कुछ ऐसा ही एहसास हुआ आज जबकि चौबीस साल पुराने समय को फिर से आज में उतार लाने की कोशिश की गई. तीन वर्ष की बेहतरीन ज़िन्दगी को कुछ घंटों में जीने की कोशिश की गई. यदि कहा जाये कि किसी अदृश्य टाइम मशीन के द्वारा अतीत को वर्तमान में खड़ा करने का प्रयास किया गया या फिर वर्तमान को उसी अतीत में पहुँचा दिया गया तो अतिश्योक्ति न होगी. सोशल नेटवर्किंग के जरिये एक-एक करके इधर-उधर बिखरे रत्नों को, मोतियों को समेटा-सहेजा जाने लगा. उन सभी को एक-एक करके फिर से खोजा जाने लगा जो समाज में जिंदगी की आपाधापी में कहीं खो गए थे. या कहें कि हमारे आसपास होते हुए भी हमें दिखाई नहीं दे रहे थे क्योंकि हम सभी अपने-अपने परिवार, अपने-अपने रोजगार, अपने-अपने कार्यों में उलझे हुए थे. एक-एक को जोड़ते हुए फिर वही संसार बनाने की एक पहल की गई. किन्तु-परन्तु के बीच पहल की उड़ान शुरू हुई. 





हॉस्टल की वो दुनिया अपने आपमें अद्भुत ही कही जाएगी, जहाँ कोई चिंता नहीं, कोई फिकर नहीं, कोई जिम्मेवारी नहीं, कोई बोझ नहीं बस मस्ती ही मस्ती, हुडदंग ही हुडदंग. हॉस्टल से निकल कर अपने-अपने संसार में सिमटे-लिपटे लोगों के मन में लगातार रहा कि क्या कभी अपने पुराने साथियों से मिलना हो पायेगा? क्या उन साथियों के साथ फिर वही मस्ती भरी हरकतें, शरारतें की जा सकेंगी जो उन कभी हुआ करती थी? और भी सवाल उपजते फिर आपाधापी में खो जाते. जिस भविष्य की कभी चिंता नहीं की उसी भविष्य के संवर जाने के बाद भी सवालों के घेरे साथ चलते. आखिर भावनात्मकता कब तक सवालों के बोझ को सहती? कब तक अपने अत्यंत प्रिय साथियों से बिछड़कर दूर रहती. किसी समय में तकनीक से दूर साथियों ने अपने-अपने डायरी के पन्ने अपने-अपने साथियों के पते-ठिकानों से सजाये थे. उन पते-ठिकानों का लगातार बदलना जारी रहा. शुरुआती पत्र-व्यवहार और गर्मजोशी समय के साथ परिवर्तित होती रही. इस परिवर्तन का असर ये हुआ कि सब अपने में सिमट गए. कुछ मिलते रहे, कुछ और दूर होते चले गए. 





और फिर अंततः वह दिन आ ही गया जिसका सभी को उस दिन से इंतज़ार थाजिस दिन सभी से दूर हुए थे. हॉस्टल के दिनों को हॉस्टल के साथियों ने फिर से जिंदा कर दिया. जिंदगी की आपाधापी में अपने से भी दूर हो गए लोगों को फिर सबसे जोड़ा गया. इस बार वे जुड़े मगर अकेले नहीं. अबकी उनके साथ समूचे हॉस्टल से जुड़ा उनका परिवार भी, उनकी जीवनसाथी भी, उनके बच्चे भी. एक-एक से मिलते-मिलते, सूत्र बटोरते-समेटते सब फिर सामने नजर आने लगे. तकनीक ने सबको जोड़ने में सहयोग दिया. मिलन की उत्कंठा ने सबको और प्रेरित किया. भावनात्मकता का ज्वार उमड़ने लगा. देखते-देखते वह दिन आ ही गया जबकि सबकी सहमति से सबने आपस में अतीत में जाने का, अतीत को वर्तमान में लाने का निश्चय किया. सम्मिलन केंद्र बना वही स्थान जो कि किसी समय हम सभी की कर्मभूमि हुआ करता था. हम सभी के कदमों से जहाँ हलचल मचा करती थी. हम सभी के कार्यों से जहाँ विचलन हुआ करता था. अबकी हम सब अकेले न थे बल्कि साथ में थे वे लोग जो वर्षों से हम सभी की हॉस्टल की कहानियाँ सुनते आ रहे थे. वे साथ थे जो वर्षों से तत्कालीन फोटो देख-देखकर उस अतीत को वर्तमान की निगाहों से देखना चाहते थे. अपने-अपने जीवनसाथी, बच्चों के साथ सबने पूरी आत्मीयता से अपनी उपस्थिति को दर्शाया. 



सम्मिलन के निश्चय से पहले के किन्तु-परन्तु सभी साथियों की सक्रियता, उत्साह, मिलन की तीव्रता देखकर धराशाही हो गए. गले मिलते लोग, उसी बेलौस अंदाज़ में हँसते-बोलते-बतियाते मित्र, फिर से न बिछड़ने देने की नीयत से बारम्बार बाँहों में जकड़ने का अपनापन. सभी के बच्चे, जीवनसाथी बस मुँह खोले आत्मीयता का, अपनेपन का चरम देख रहे थे. शायद उन लोगों ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि डेढ़-डेढ़, दो-दो दशकों के बाद मिलते लोग, कुछ परिचित, कुछ अपरिचित चेहरों से मिलते लोग इतनी आत्मीयता दिखायेंगे. भावनात्मकता, अपनत्व के चरम से सराबोर होकर एक दूसरे को सराबोर करते हुए समूचे माहौल को रसमय बना देंगे. सन 1975 से शुरू हॉस्टल यात्रा को कतिपय कारणोंवश विराम लगा सन 2003 में पर तब तक गंगा-जमुना में बहुत सारा पानी बह गया था. काल की धार में बहते रत्न फिर मिले. बहुत से पुराने अनमोल मोतियों ने अपनी उपस्थिति दिखाते हुए अपना उत्साह दिखाया. आश्चर्य लगा कि वर्ष 1988 से लेकर वर्ष 2003 तक के बैच के बहुतायत मित्र सपरिवार समूचे सम्मिलन समारोह में पूरी आत्मीयता, अपनत्व बरसाते रहे. इससे भी अधिक आश्चर्य की बात ये रही कि हॉस्टल के उन बिंदास, बेलौस, बेफिक्र मित्रों से पहली बार मिलते अन्य परिजनों में भी गज़ब का उत्साह था. सबके मन में हॉस्टल देखने की हार्दिक इच्छा, अपने जीवनसाथी के अन्य दूसरे मित्रों के बारे में, उनके परिजनों से मिलने की उत्कंठा दिखी. 



हँसी-मजाक, हुल्लड़ करते समय कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला. एकबारगी किसी का ध्यान अपने मोबाइल की तरफ नहीं गया. पूरे दिन लोगों के अपडेट सोशल नेटवर्किंग में देखने को नहीं मिले. ऐसा लग रहा था जैसे लोग वर्तमान में नहीं वरन अतीत की यात्रा कर रहे हों. जर्जर खड़ी बुलंद इमारत को फिर से जिंदाकर अपने उन्हीं दिनों में खो गए हों. उन दिनों की यादें, उस समय के किस्से, सबकी मासूम सी गोपनीयता को उन्हीं के परिजनों के सामने खोलते, लगा ही नहीं कि सदन में उपस्थित कोई भी व्यक्ति वर्तमान में है. हॉस्टल के तत्कालीन नारे, तत्कालीन जयघोष, वैसी ही शरारतें कुल मिलाकर सबको उसी कालखंड में ले गई थीं जहाँ कि वे कभी रहा करते थे. सूरज के उगने से शुरू हुआ मस्ती भरा दिन कब शाम में बदल गया पता ही नहीं चला. शाम के गहराने के साथ शुरू हुआ फिर से उसी वर्तमान में जाने का क्रम जहाँ जिम्मेवारियाँ हैं, दायित्व हैं, कर्तव्यबोध है. फिर शुरू हुआ वही दशकों पुराना क्रम. गले मिलते, हँसते, आँखों को गीला करते और फिर अपनी राह चलते. दशकों पहले के और अब के समय में एक अंतर दिखा. तक के डायरी-पेन से इतर इस बार तकनीक साथ थी. अगली बार मिलने का निश्चय साथ था. इस वादे के साथ कि हर वर्ष सबका मिलना निश्चित है, हम सभी अतीत की कुछ घंटों की यात्रा के बाद वर्तमान में लौट आये.  

04 April 2017

बिना प्रोत्साहन कैशलेस व्यवस्था संभव नहीं

नोटबंदी के बाद सरकार लगातार कैशलेस अर्थव्यवस्था की तरफ ध्यान दे रही है. जनता को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है कि वह अधिक से अधिक लेन-देन डिजिटल माध्यम से करे. इसी कारण से सरकार की तरफ से नकद लेन-देन को हतोत्साहित करने के लिए दो लाख रुपये से अधिक के नकद लेन-देन पर प्रतिबन्ध लगा दिया है. इसका उद्देश्य जहाँ एक तरफ बैंकों में भीड़ को कम करना है वहीं दूसरी ओर इसके द्वारा काला धन, नकली मुद्रा, भ्रष्टाचार को कम करना या रोकना भी है. यह सच है कि यदि समाज में अधिक से अधिक लेन-देन नकदी के स्थान पर डिजिटल माध्यम से होने लगे, इंटरनेट बैंकिंग, क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, एटीएम आदि का उपयोग अधिक से अधिक होने लगे तो काले धन को, नकली मुद्रा को नियंत्रण में रख पाना सहज हो जायेगा. नोटबंदी के पहले तक जिस तरह से लोगों में नकद लेन-देन के प्रति एक प्रकार का मोह देखने को मिलता था, वो अभी भी दूर नहीं हुआ है. क्रेडिट कार्ड अथवा इंटरनेट बैंकिंग के प्रति अभी भी उतनी जागरूकता नहीं आई है, जितनी की अपेक्षित थी. इसके पीछे एक ओर तो समाज की बहुसंख्यक जनता का डिजिटल माध्यमों के साथ दोस्ताना सम्बन्ध विकसित न कर पाना है. इसके साथ ही साथ सरकारी स्तर पर डिजिटल विनिमय को बढ़ावा देने के लिए भी प्रोत्साहन योजनाओं की जबरदस्त कमी देखने को मिल रही है. इसके उलट सार्वजनिक क्षेत्र के अग्रणी बैंक भारतीय स्टेट बैंक द्वारा नकद जमा-निकासी पर, एटीएम के उपयोग पर अपना ही नया नियम लागू कर दिया गया है. इससे आमजन के नकारात्मक रूप से प्रभावित होने की आशंका बढ़ी है. 


सरकार के साथ-साथ बैंक भी चाहती हैं कि उनके पास कम से कम भीड़ पहुँचे और इसके लिए उनके द्वारा समय-समय पर इस तरह की योजनायें लागू की जाती हैं जो जनता को घर बैठे सुविधाएँ मुहैया कराती हैं. इधर भारतीय स्टेट बैंक द्वारा तीन बार नकद जमा के बाद जमा पर शुल्क लगा दिया है. ये शुल्क नाममात्र को नहीं वरन इतना है कि आम खाताधारक की जेब पर असर डालेगा. यहाँ यदि सरकार का अथवा बैंक का ये विचार हो कि लोगों की नकद जमा-निकासी की सीमा बनाकर उनको डिजिटल विनिमय के लिए प्रोत्साहित किया जा सकेगा तो ऐसा सोचना उसकी भूल है. ऐसा उनके लिए तो सहज हो सकता है जो वेतनभोगी हैं किन्तु उनके लिए कतई सहज नहीं है जिनको महीने भर फुटकर-फुटकर धन मिलता रहता है. ऐसे में ये लोग अपने धन को बैंक में जमा करने के स्थान पर अपने पास ही संग्रहित करके रखना शुरू कर देंगे. ये स्थिति जहाँ एक तरफ डिजिटल विनिमय माध्यम को हतोत्साहित करेगी वहीं दूसरी तरफ धन-संचय की प्रवृत्ति को बढ़ावा देकर मुद्रा को चलन से दूर करेगी. इसके अलावा खाते में न्यूनतम मासिक जमाराशि को लेकर भी भारतीय स्टेट बैंक द्वारा बनाया गया नियम गले से नीचे न उतरने वाला है. चाहे मेट्रो शहर हों अथवा ग्रामीण इलाके, सभी में आमजन की स्थिति ये है कि उसके लिए एक-एक रुपये का महत्त्व होता है. ये देखने में भले ही न्यूनतम राशि समझ आ रही हो किन्तु उनके लिए बहुत बड़ी धनराशि है जिनके पास धनोपार्जन के न्यूनतम अथवा सीमित साधन हैं. ऐसे में न्यूनतम मासिक जमाराशि रखना उनकी मजबूरी हो जाएगी. इस मजबूरी के चलते उनका पारिवारिक बजट गड़बड़ाने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है.



यदि सरकार को अथवा बैंकों को डिजिटल माध्यम को प्रोत्साहित करना है तो उन्हें आमजन को कुछ लाभ देने होंगे. डिजिटल लेन-देन को विकसित करने के लिए सरकार को चाहिए कि क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड आदि से भुगतान करने पर न्यूनतम टैक्स लेने की व्यवस्था समाप्त की जाये. इससे सामान्य उपभोक्ता बड़ी रकम को कार्ड के माध्यम से भुगतान करने से बचता है. इसी तरह इंटरनेट बैंकिंग में भी भुगतान करने पर टैक्स लगाया जाता है. इससे भी उपभोक्ता के अन्दर हिचकिचाहट पैदा होती है. इसके अलावा तकनीकी रूप से अभी इंटरनेट सेवाएँ अभी इतनी उन्नत और सशक्त नहीं हो सकी हैं कि आमजन आर्थिक लेन-देन के लिए इस प्रणाली पर पूर्णरूप से विश्वास करने लगे. आये दिन होती धोखाधड़ी के चलते, एटीएम में धन के फँसने, भुगतान के समय इंटरनेट सेवा बाधित होने के चलते भी उपभोक्ता में भय का माहौल बना रहता है. इससे भी वह डिजिटल माध्यमों से भुगतान के लिए खुद को प्रेरित नहीं कर पाता है. सरकार को, उसके सहयोगी अंगों को चाहिए कि वे पहले मूलभूत सुविधाओं को उन्नत और विकसित करें. कार्ड के लेन-देन के साथ-साथ इंटरनेट बैंकिंग में लगने वाले शुल्क को समाप्त करें. डिजिटल माध्यम से भुगतान करने वालों को किसी तरह से लाभान्वित करें. भारतीय स्टेट बैंक द्वारा लागू किये गए हालिया नियमों को जनहित में, कैशलेस व्यवस्था के हित में तत्काल प्रभाव से रद्द करें. यदि सरकार इस तरह के कदम नहीं उठाती है, जिससे आम उपभोक्ता स्वयं को लाभान्वित महसूस करे, सुरक्षित महसूस करे तब तक डिजिटल माध्यमों को, कैशलेस व्यवस्था को पूर्णरूप से लागू कर पाना दूर की कौड़ी समझ आती है. 

30 March 2017

पहली हवाई-यात्रा से पहुँचे पोर्ट ब्लेयर : अंडमान-निकोबार यात्रा

कोई काम पहली बार किया जा रहा हो तो उसमें उत्साह, उमंग, रोमांच जैसी अनुभूति होती है. कुछ ऐसा ही हमारे साथ हो रहा था. पहली बार अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की यात्रा और पहली बार ही हवाई-यात्रा करने का अवसर हाथ आने वाला था. टिकट की बुकिंग से लेकर उसकी अन्य औपचारिकताओं के बारे में समुचित जानकारी इकठ्ठा कर मारी थी. कई वर्षों की हाँ-ना के बाद अंडमान-निकोबार जाने का कार्यक्रम बन पाया था, सो उसमें कोई अड़ंगा नहीं चाह रहे थे, किसी भी तरह का. इधर कुछ वर्षों से हमारी यात्राओं के साथ एक अजीब सा संयोग जुड़ता रहा है. कहीं भी जाने का कार्यक्रम बनाया तो उसमें किसी न किसी तरह का व्यवधान आ गया. दो बार जम्मू-कश्मीर का प्रोग्राम बनाया तो वहाँ बाढ़ के चलते नहीं जा पाए. नेपाल जाने का फ़ाइनल हो गया था तो वहाँ भूकंप ने तबाही मचा दी. इसी तरह एक साल अपनी छोटी बहिन दिव्या के पास जाने को बड़ोदा के लिए ट्रेन में बैठ भी गए तो बीच रास्ते उतरना पड़ा, वहाँ चालू हो गए हार्दिक पटेल के उत्पात के कारण. हाल ही में पहली बार अंडमान-निकोबार की यात्रा जब प्लान कर रहे थे तो उस समय भी अड़ंगा लगने जैसा माहौल बन गया था. समाचारों से पता चला कि हैवलॉक में तूफ़ान आने से बहुत सारे लोग वहाँ फँस गए हैं. तब उस कार्यक्रम को आगे बढ़ाना पड़ा. इस बार यात्रा फ़ाइनल हो गई थी. चुनावी मौसम होने के कारण बसों का चलना लगभग बंद सा था, सो झाँसी से ट्रेन पकड़ने की सुविधा के लिए कार बुक कर ली थी. इस यात्रा के लिए आरंभिक अड़ंगे रात में ही लगते दिखे, जब सोते समय अचानक गर्दन की नस खिंच गई और उसका हिलना-डुलना बंद सा हो गया. लगभग एक घंटे की मालिश, कसरत, मशक्कत के बाद गर्दन नार्मल हुई. दूसरा अड़ंगा लगता सुबह समझ आया जबकि कार ड्राईवर ने फोन पर बताया कि उसकी कार चुनाव ड्यूटी के लिए पुलिस प्रशासन ने पकड़ ली है. कोई घंटे भर बाद उसी ने अपने परिचित की निजी कार की व्यवस्था करवाई और हम लोग झाँसी के लिए निकल सके.


पहली हवाई-यात्रा का रोमांच तो हम तीनों लोगों को महसूस हो रहा था क्योंकि हम तीनों (हमारी, पत्नी निशा और बेटी परी) की ये पहली हवाई-यात्रा थी. सामान का वजन, सारे आवश्यक कागजात, पहचान-पत्र आदि सँभालकर झाँसी से दिल्ली पहुँचे. घर वालों के लिए देर रात दिल्ली उतरना चिंता का कारण बना हुआ था. इस कारण नॉएडा में रह रही छोटी बहिन रिमझिम और लखनऊ में रह रहा छोटा भाई हर्षेन्द्र फोन से लगातार संपर्क में रहे. रिमझिम ट्रेन यात्रा से ही उबेर कैब बुक करने, फिर टैक्सी से एअरपोर्ट रूट, टैक्सी किराये आदि की जानकारी देती रही. दिल्ली में कैब सम्बन्धी आरंभिक अड़ंगे से निपटते हुए देर रात लगभग दो बजे एअरपोर्ट पहुँच गए. फ्लाइट सुबह सवा सात बजे थी जिस कारण एअरपोर्ट पर सुरक्षा, चेक-इन, बोर्डिंग पास आदि औपचारिकतायें सुबह पाँच बजे के आसपास से शुरू हो जानी थी. जरा से आराम के चक्कर में सोते रह जाने के अनजान डर के कारण होटल में रुकने के बजाय एअरपोर्ट पर रुकना ज्यादा सही लगा. वहाँ पहुँचकर लाउन्ज में पड़ी तमाम कुर्सियों में से अपनी मनपसंद जगह छाँटकर उन्हीं पर पसर लिए.


सोना तो हुआ नहीं पर आराम जैसा कुछ हो गया था. बिटिया रानी भी नई जगह के उत्साह में कभी इधर-उधर टहलने लगती, कभी लेट जाती. समय होते ही हम लोग आवश्यक औपचारिकताओं को निपटाने में लग गए. सुरक्षा जाँच के समय कृत्रिम पैर के चलते अधिकारी ने हमें अलग रूम में ले जाकर जाँच की अनुमति अपने अधिकारी से माँगी. कृत्रिम पैर को अलग स्कैन मशीन से जाँचने के बाद संतुष्ट अधिकारी ने अन्दर जाने की अनुमति दे दी. उसी अधिकारी से जब हमने फोटोग्राफी करने सम्बन्धी जानकारी चाही तो उसने हँसते हुए जवाब दिया कि आप हमारी सुरक्षा व्यवस्था को छोड़कर कहीं भी फोटोग्राफी कर सकते हैं. गेट नंबर 49 से टाटा विस्तारा की फ्लाइट हम लोगों को पकड़नी थी. वहाँ बने मार्गदर्शक चिन्हों के सहारे आगे बढ़ते चले. उस समय आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता और गर्वानुभूति हुई जब अन्दर सूर्य नमस्कार मुद्राओं को दर्शाता स्मारक दिखाई दिया. सुबह की पहली किरण फूट कर बाहर उजियारा करने वाली थी और अन्दर हम लोग सूर्य नमस्कार मुद्राओं के साथ फोटोग्राफी करते हुए आलोकित हो रहे थे. गेट तक पहुँचने के लिए जगह-जगह मोबाइल प्लेटफ़ॉर्म बने हुए थे, जिन पर बिटियारानी उछल-कूद करते हुए, मस्ती करती चली जा रही थी. 



निश्चित समय पर संकेत होते ही हम लोग प्लेन में सवार हुए. क्रू मेम्बर्स के द्वारा स्वागत, समय-समय पर आवश्यक खाद्य-पदार्थों का वितरण, फ्लाइट सम्बन्धी अन्य जानकारियों का दिया जाना आदि सबकुछ व्यवस्थित, नियंत्रित सा संचालित हो रहा था. खिड़की के बाहर बादलों का रुई के फाहों की तरह कभी साथ-साथ उड़ना, कभी प्लेन के नीचे आ जाना, कभी एकदम साफ़ आसमान अद्भुत अनुभव का एहसास करा रहा था. दिल्ली से पोर्ट ब्लेयर को चली फ्लाइट को कोलकाता में थोड़ी देर रुकना था. प्लेन के उतरने के पूर्व कोलकाता की बड़ी-बड़ी ऊंची इमारतों का खिलौनों के जैसे दिखना, सड़कों, नदी आदि का किसी मानचित्र सा दिखाई देना आँखों को लुभा रहा था. कोलकाता एअरपोर्ट का नाम नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के नाम पर है. वहाँ लगे बड़े से बोर्ड पर चमकते वास्तविक नेता का नाम देखकर मन ही मन नेताजी को नमन किया. लगभग चालीस मिनट रुकने के बाद हम लोगों को लेकर प्लेन दोबारा उड़ चला. 







पोर्ट ब्लेयर उतरने के लगभग बीस-पच्चीस मिनट पहले क्रू मेम्बर्स की तरफ से ख़राब मौसम होने के संकेत देते हुए सीट बेल्ट बाँधने के निर्देश दिए गए. सामान्य स्थिति में बना हुआ प्लेन हलके-हलके से हिचकोले खाता हुआ समझ आया. उस समय प्लेन घनघोर बादलों के बीच से गुजर रहा था. आसमान में उड़ते बादलों को खिड़की के एकदम करीब महसूस करना अद्भुत था. अंडमान-निकोबार की सीमा में घुसते ही खिड़की से टापुओं की हरियाली, समुद्र का नीला-हरा रंग आँखों को आकर्षित कर रहा था. धीरे-धीरे प्लेन ने उतरना शुरू किया. बस्ती नजर आ रही थी. पोर्ट ब्लेयर की नैसर्गिक सुन्दरता अपना बखान खुद कर रही थी. लगभग साढ़े बारह बजे दोपहर में जब पोर्ट ब्लेयर में कदम रखा तो सबसे पहले उस वीर पुरुष को नमन किया जिसके नाम से पोर्ट ब्लेयर के एअरपोर्ट का नामकरण किया गया है; जिसके नाम से सेलुलर जेल के अंग्रेज अधिकारी तक भयभीत रहते थे; जिसको भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन में दो बार काला पानी की सजा सुनाई गई थी. जी हाँ, वीर सावरकर (विनायक दामोदरदास सावरकर) को प्रणाम करते हुए हम लोग एअरपोर्ट के बाहर जाने वाले गेट पर आ पहुँचे.




 छोटा भाई नीरज, बिटिया आशी के साथ प्रसन्नचित्त मुद्रा में पहले से ही मौजूद था. एअरपोर्ट पर मोबाइल ऑन करते ही सबसे पहले उसके वहाँ आ जाने सम्बन्धी कॉल मिल गई थी. छह घंटे प्लेन की (दिल्ली से पोर्ट ब्लेयर), लगभग छह घंटे ट्रेन की (झाँसी से दिल्ली), दो घंटे कार की (उरई से झाँसी) की यात्रा के साथ-साथ लगभग ढाई घंटे झाँसी रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के इंतज़ार का समय और लगभग साढ़े पाँच घंटे दिल्ली एअरपोर्ट पर रुकने का समय आदि मिलाकर लगभग बाईस घंटे की यात्रा के बाद घर पहुँचकर सुकून मिला. बहू नेहा के हाथ की बनी चाय की चुस्की संग सबके हालचाल का आदान-प्रदान करते हुए, बतियाते हुए अंडमान-निकोबार आने का वर्षों से लटका कार्यक्रम पूरा हुआ. आप लोगों को लग रहा होगा कि इतने लम्बे सफ़र के बाद भी थकान जैसी कोई बात हमने नहीं की. अरे, इतने लम्बे सफ़र की थकान को तो बिटियारानी आशी ने अपनी मीठी-मीठी, रोचक बातों से कार में ही दूर कर दिया था.