डिजिटल युग ही भविष्य है

ये अपने आपमें कितना विद्रूप है कि एक तरफ देश को विश्वगुरु बनने के सपने देखे जा रहे हैं, दूसरी तरफ आधुनिक तकनीक से वंचित किये जाने की कोशिश भी की जा रही है. केंद्र सरकार द्वारा पाँच सौ रुपये और एक हजार रुपये के नोट बंद किये जाने के बाद से लगातार डिजिटल ट्रांजेक्शन पर जोर दिया जा रहा है. नोटबंदी के दीर्घकालिक परिणाम क्या होंगे और कैसे होंगे ये अभी भविष्य के गर्भ में है लेकिन ये बात स्पष्ट है कि नोटबंदी के बाद से कालेधन पर, जाली मुद्रा पर अवश्य ही अंकुश लगेगा. भविष्य में पुनः जाली मुद्रा का कारोबार देश के अन्दर अपना साम्राज्य न फैला सके इसके लिए सरकार द्वारा लगातार कैशलेस सोसायटी बनाये जाने पर जोर दिया जा रहा है. आम आदमी को खुद प्रधानमंत्री द्वारा संबोधित करके अधिक से अधिक मौद्रिक आदान-प्रदान इलेक्ट्रॉनिक रूप में किये जाने को कहा जा रहा है. आज वैश्विक स्तर पर देखा जाये तो सभी विकसित देशों में लगभग समस्त मौद्रिक आदान-प्रदान इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से किया जाता है. हमारे पडोसी देशों में चीन में भी कैश के रूप में मात्र दस प्रतिशत लेनदेन होता है.


विपक्ष द्वारा जिस तरह से नोटबंदी का विरोध किया जा रहा है, उसकी अपनी राजनीति है. इसके उलट जिस तरह से कैशलेस सोसायटी का विरोध किया जा रहा है, इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजेक्शन का विरोध किया जा रहा है वो कहीं न कहीं देश के विकास को बाधित करने जैसा ही है. ऐसे मुद्दे पर देश की सबसे पुरानी पार्टी होने का दम भरने वाली कांग्रेस का विरोध भी हास्यास्पद है. उसे इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि उसी पार्टी के एक पूर्व प्रधानमंत्री द्वारा देश में कम्प्यूटर लाये जाने की बात लगभग सभी के द्वारा एकसमान रूप से की जाती है, उसी के द्वारा तकनीक का विरोध किया जा रहा है. कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों की, सुदूर क्षेत्रों तक इंटरनेट की पहुँच न होने की बात कहकर डिजिटल ट्रांजेक्शन को अनावश्यक बताया जा रहा है. उन सभी लोगों को विचार करना होगा कि आखिर देश में छह दशक से अधिक तक केंद्र की सत्ता संभालने वाली कांग्रेस ने देश के ग्रामीण अंचलों में शिक्षा का, तकनीक का, बैंकों का, विद्युत् व्यवस्था का उचित प्रबंध क्यों नहीं किया?

ये सत्य है कि आज अचानक से देश को कैशलेस बना देना न तो आसान है और न ही उचित है. आज भी देश का बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जो एटीएम का उपयोग करने में घबराता है. आज भी बहुत बड़ा बुद्धिजीवी वर्ग ऐसा है जो नेट बैंकिंग का, इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजेक्शन के प्रति शंकित भाव रखता है. आज भी देश में बहुत से भाग ऐसे हैं जहाँ इंटरनेट सुविधा नहीं पहुँच सकी है. ऐसी हालातों में निश्चित ही कैशलेस सोसायटी की अवधारणा एक स्वप्न के समान ही लगती है. इसके बाद भी इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि भविष्य इसी तरह के लेनदेन का है. देश को यदि विश्व के अन्य उन्नत देशों, विकसित देशों के साथ आर्थिक, राजनैतिक, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा करनी है; उनके साथ तालमेल बैठाना है तो इस तरह के ट्रांजेक्शन को अपनाना ही होगा. इसके लिए अभी कठिनाइयाँ भले ही सामने दिख रही हों मगर देश के महानगरों के साथ-साथ छोटे-छोटे शहरों, कस्बों, गांवों में ऐसे लोगों को जागरूकता का कार्य करना होगा जो इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजेक्शन के बारे में सहज हैं. इस विधि, तकनीक से अपरिचित लोगों को परिचित करवाना पड़ेगा. व्यापारी वर्ग को, नौकरीपेशा वर्ग को, महिलाओं को, संस्थानों को कैशलेस सोसायटी बनाने के लिए अपना सहयोग देना होगा.  


इस देश में हमेशा से आधुनिक तकनीक का अपने स्तर पर विरोध किया जाता रहा है, आज भी हो रहा है. इस विरोध के अपने-अपने राजनैतिक लाभ है मगर कैशलेस सोसायटी के लाभों को समझते हुए अधिकाधिक उपयोग करने पर जोर देना ही होगा. इस तरह के लेनदेन से जहाँ नकद मौद्रिक चलन कम होगा, इससे नकली नोट के बाजार में आने की सम्भावना समाप्त हो जाएगी. इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजेक्शन होने से रिश्वतखोरी को, भ्रष्टाचार को रोकने में मदद मिलेगी. सरकारी स्तर पर, निजी स्तर पर आम आदमी को परेशान करने की, काम लटकाए जाने की प्रवृत्ति से छुटकारा मिलेगा. संभव है कि राहजनी, लूटमार आदि की घटनाओं में कमी आये. वैश्विक स्तर पर देश की आर्थिक स्तर पर साख भी मजबूत होगी और देश विकसित देशों के साथ सहजता से प्रतिस्पर्धा कर सकेगा. इसके अलावा बहुत से लाभ ऐसे हैं जो देशहित में हैं और याद रखना चाहिए कि देशहित से ही नागरिकहित बनता है. यदि इसी तरह तकनीक का विरोध होता रहता तो आज देश में कम्प्यूटर का युग न आया होता और देश की अनेक कम्प्यूटर प्रतिभाएं वैश्विक स्तर पर अपना लोहा न मनवा रही होती. आज विरोधी लोग भले ही मोदी के नाम पर, पे टू मोदी के नाम से कटाक्ष करके कैशलेस सोसायटी बनाये जाने का, इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजेक्शन का विरोध करें मगर देश के उन्नत, विकसित भविष्य के लिए इसे अपनाना ही होगा. देश को कैशलेस बनना ही होगा, देशवासियों को डिजिटल ट्रांजेक्शन के लिए खुद को तैयार करना ही होगा. 

करिश्माई व्यक्तित्व अम्मा

अभिनेत्री से नेत्री बनने के सफ़र में वे कब लोगों की अम्मा बन गईं, पता ही नहीं चला. भारतीय राजनीति में जयललिता जैसा चमत्कारी व्यक्तित्व कम ही देखने को मिलता है. ऐसा व्यक्तित्व जो न केवल लोकप्रियता के चरम पर रहा वरन आमजन के दिलों में भी गहरे से बैठा रहा. जयललिता की कहानी अपने आपमें एक फ़िल्मी सफ़र जैसी रही. अल्पायु में पिता का देहांत, फिर माँ के दवाब में आकर फ़िल्मी कैरियर अपनाना, राजनीति में आने का विरोध झेलना तथा एम०जी० रामचंद्रन की मृत्यु के बाद उनके परिजनों का विरोध सहते हुए भी जयललिता ने अपनी राजनैतिक जमीन तैयार की. एक ऐसी जमीन जिस पर वे पूरी क्षमता, दृढ़ता के साथ अंत-अंत तक खड़ी रहीं. उन्होंने राजनीतिक पृष्ठभूमि न होने के बाद भी खुद को राजनीति में एक प्रभावशाली चरित्र के रूप में स्थापित किया. उनके जाने के बाद उनके प्रशंसकों, समर्थकों का हताश निराश होना, आत्महत्या का रास्ता चुन लेना, लगातार आँसू बहाना कोई पहली बार नहीं हुआ है. जयललिता के लिए उनके समर्थकों की ऐसी आस्थायुक्त दीवानगी उस समय भी देखने को मिली थी जबकि उन्हें भ्रष्टाचार के एक मामले में सजा सुनाई गई थी. ऐसा तब भी हुआ था जबकि न्यायालय के एक आदेश पर उनको मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने से रोका गया था. जयललिता को अम्मा बनाने के पीछे खुद उनका व्यक्तित्व, उनके कार्य प्रमुख रहे हैं.  



प्रदेश की महिलाओं में वे विशेष रूप से गरीबों को दिए जाने वाले भोजन और शराबबंदी के फैसले के कारण लोकप्रिय हुईं थी. राजनीतिक कारणों से उनके लिए फैसले कुछ भी कहानी कहते हों, उनके जेवरों, कपड़ों, सैंडलों के जबरदस्त संग्रह भले ही उनको विलासी प्रवृत्ति का दर्शाते हों मगर महिलाओं, बालिकाओं के लिए उनके द्वारा किये गए कार्यों ने उन्हें अम्मा बना दिया. वे महिलाओं, बच्चियों की सुरक्षा, उनकी समस्याओं के समाधान को लेकर लगातार चिंतित रहीं. इसी कारण वे अक्सर संवेदनशील निर्णय लेकर अपनी जिम्मेवारियों का निर्वहन करती रही. उनके द्वारा शुरू की गई ‘क्रेडल बेबी स्कीम’ और ‘अम्मा बेबी किट’ को इसी रूप में देखा जा सकता है. ‘अम्मा बेबी किट’ में दिए जाने वाले सामानों के कारण मिली प्रशंसा के बाद सस्ता भोजन देने वाली उनकी ‘अम्मा कैंटीन योजना’ ने आम आदमी को आकर्षित किया. अपने जनहित के ऐसे निर्णयों के साथ-साथ वे अक्सर कठोर निर्णय लेने के कारण भी जनमानस में लोकप्रिय रहीं. दोबारा सत्ता में आने के बाद उन्होंने मंदिरों में पशुबलि रोकने, लाटरी बंद करने, एक निश्चित आय से अधिक आय वालों के राशन कार्ड निरस्त करने जैसे कठोर निर्णयों से भी वे लोकप्रियता का अपना ग्राफ बढ़ाती रहीं. गरीबों, जनसामान्य, महिलाओं के हितार्थ लिए गए उनके निर्णयों ने जहाँ उन्हें जनमानस में लोकप्रिय बनाया वहीं राजनैतिक जीवन में उनके द्वारा लिए गए निर्णयों ने उन्हें भारतीय राजनीति का करिश्माई व्यक्तित्व बनाया. 

एम०जी० रामचंद्रन के साथ आरम्भ की गई उनकी राजनैतिक यात्रा में बहुत बार उनको विरोध का सामना करना पड़ा. उस विरोध के बाद भी वे लगातार आगे बढ़ती रहीं. 1984 में उनको पार्टी का विरोध सहना पड़ा मगर वे एमजीआर की कृपा से राज्यसभा पहुंची. लोगों की दृष्टि में इसे विशुद्ध कृपा ही माना गया क्योंकि पार्टी स्तर पर भी ऐसी हवा बनी हुई थी. इसके साथ-साथ जयललिता का वो कार्यकाल ऐसा रहा भी नहीं कि कुछ विशेष माना जाये. इसके बाद भी वे अपने आपको अपने संकल्प और दृढ निश्चय के कारण स्थापित करती रहीं. एमजीआर के देहांत के बाद जैसे उन्होंने समूची पार्टी को अपने नियंत्रण में ले लिया. हठी, अक्खड़, तुनकमिजाज आदि जैसी छवियों के बाद भी वे पार्टी में पहले से लेकर दसवें पायदान पर खुद ही खड़ी थी. ये उनके व्यक्तित्व का चमत्कार ही कहा जायेगा कि केंद्र सरकार को दिए जाने वाले समर्थन के बाद भी वे अपने गठबंधन वाले दलों से स्थायी रिश्ता नहीं रखती थी. कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस को समर्थन देने के बाद भी उनपर स्वार्थपरक राजनीति करने का ठप्पा नहीं लगा. इस साफ-सुथरी छवि बने रहने का कारण आम आदमी के हितार्थ उनका काम करना रहा है. 

एक ऐसे समय में जबकि वे नितांत सामान्य परिवार से आई हों राजनीति में एक स्तम्भ बन जाना चमत्कार ही कहा जायेगा. पार्टीगत विरोध के बाद भी खुद को स्थापित करना हो, कपड़ों, सैंडलों के भव्य भंडार की कहानी हो, उनके द्वारा दत्तक पुत्र की परीलोक कथाओं जैसी शादी की चर्चा हो, आय से अधिक संपत्ति का मामला रहा हो, समर्थन वापसी के कारण एक वोट से अटल जी की सरकार का गिरना रहा हो, सोनिया को समर्थन देने के बाद भी उनके साथ मंच साझा न करने का हठ रहा हो, कई-कई बार मुख्यमंत्री पद संभालना रहा हो, आमजन का उनके प्रति अगाध विश्वास-आस्था का होना रहा हो आदि-आदि सबकुछ उन्हें विराट स्वरूप प्रदान करते हैं. उनका जाना भारतीय राजनीति के एक स्तम्भ का जाना तो है ही, महिलाओं, बेटियों, गरीबों की अम्मा का जाना भी है. 



लापरवाही का खामियाजा

फिर गैरजिम्मेवारी, फिर दुर्घटना, फिर सैकड़ों इंसानों की मौत, फिर सैकड़ों घायल, फिर अनेक परिवार शोक-संतप्त, फिर मुआवजा, फिर घोषणा, फिर जाँच, फिर रिपोर्ट, फिर वही ढाक के तीन पात. कितना आसान होता है किसी दुर्घटना पर एक उच्चस्तरीय जाँच समिति बना देना. कई-कई लोगों के बयान ले लेना और फिर कार्यवाही के नाम पर महज खानापूर्ति. हर दुर्घटना के बाद, चाहे वो छोटी हो या बड़ी, सामने सिर्फ यही आता है कि इंसानी चूक के चलते, मानवीय त्रुटि के कारण दुर्घटना हुई. दुर्घटना के जिम्मेवार चंद लोगों में से कुछेक को मामूली सी सजा देकर कार्यवाही से इतिश्री कर ली जाती है. कुछ ऐसा ही किया जायेगा कानपुर देहात में पुखरायाँ के निकट दुर्घटनाग्रस्त हुई इंदौर-पटना एक्सप्रेस के मामले में भी. रविवार की सुबह तड़के तीन बजे जबकि लोग गुलाबी ठंडक में कम्बल-रजाई में दुबके नींद का आनंद ले रहे होते हैं, उसी समय मानवीय चूक का शिकार ट्रेन होती है जो देखते ही देखते सैकड़ों लोगों की जान से खेल जाती है. जोरदार धमाके और धूल के गुबार के बीच ट्रेन के चौदह डिब्बे पटरी से उतर कर जिंदगी को मौत में बदल जाने का कारक बन जाते हैं. गहन अंधकार के बीच मचती चीख-पुकार और फिर संवेदनशील नागरिकों का बचाव कार्य आरम्भ हो जाता है. इंसानी लापरवाही का नतीजा लाशों, घायलों के रूप में सामने आने लगता है. आनन-फानन सत्ता के शीर्ष की तरफ से उच्चस्तरीय जाँच के आदेश दे दिए जाते हैं. यात्रियों के बचाव कार्य, उनको उनके गंतव्य तक पहुँचाने, घायलों को उपचार के साथ-साथ सम्बंधित जिम्मेवार लोगों के बयान लेने-देने का सिलसिला भी आरम्भ होता है.
दुर्घटना स्थल पर प्रथम दृष्टया ही समझ आता है सिवाय इंसानी चूक, सम्बंधित कर्मियों की लापरवाही के अलावा कुछ हो ही नहीं सकता है. सामने आया भी कुछ ऐसा ही. ज़िन्दगी के मामले में सौभाग्यशाली रहे बहुतेरे यात्रियों ने बताया कि ट्रेन के झाँसी से चलते ही उसके एक कोच में तकनीकी समस्या सामने आ गई थी. इसके बाद भी ट्रेन को चलाये रखा गया. यात्रियों की इस तरह की बयानबाजी को उस समय बल मिला जबकि दुर्घटनाग्रस्त ट्रेन के ड्राईवर ने भी अपने बयान में कुछ इसी तरह की बात कही. सम्बंधित अधिकारियों को उसके द्वारा तकनीकी खराबी के बाद ट्रेन को कानपुर तक लिए जाने की बात कहकर समस्या से मुँह चुराने जैसी स्थिति सामने आई. इस स्थिति के चलते सम्बंधित अधिकारियों को दोषी माना जा सकता है कि उन्होंने ट्रेन की समस्या को सुधारने की कोशिश क्यों नहीं की. इसके साथ-साथ ट्रेन ड्राईवर को भी निर्दोष नहीं माना जा सकता है क्योंकि उसको तकनीकी समस्या ज्ञात हो चुकी थी, इसके बाद भी ट्रेन सौ से अधिक की रफ़्तार से दौड़ने में लगी थी. ये घनघोर लापरवाही का खामियाजा है जो सैकड़ों नागरिकों ने, कई-कई परिवारों ने भुगता है. एक जरा सी चूक, एक मामूली सी लापरवाही के चलते न जाने कितने मासूम बच्चे असमय काल का शिकार बन गए, न जाने कितने अनाथ होकर सड़कों पर भटकने लगेंगे. आखिर कब तक किसी और की लापरवाही का खामियाजा निर्दोष इंसानों को भुगतना पड़ेगा?
ये अपने आपमें शर्मसार करने वाली स्थिति है कि एक तरफ देश उन्नति, तरक्की, विकास की बात करता है, दूसरी तरफ आये दिन दुर्घटनाओं से सामना करता है. एक तरफ बुलेट ट्रेन लाने की कवायद शीर्ष सत्ता द्वारा की जा रही है वहीं दूसरी तरफ अधिकारियों द्वारा लापरवाही दिखाई जा रही है. ये समझने वाली बात है कि किसी भी स्तर पर सरकारी मशीनरी में लापरवाही चरम पर है. उनमें अपनी जिमेवारियों के प्रति, अपने दायित्व के प्रति जागरूकता का घनघोर आभाव दिखता है. इसके पीछे उनकी लापरवाही के बाद भी समुचित दंड न दिए जाने की स्थिति है. कहीं न कहीं सम्पूर्ण मशीनरी अपने बीच के लोगों को बचाने के लिए आगे-आगे काम करने लगती है. यही वो स्थिति है जहाँ कि लापरवाही शनैः-शनैः चरम पर पहुँचती जाती है. यदि किसी भी मामले में दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा देने का प्रावधान बनाया जाये तो संभवतः लोगों में अपने दायित्व के प्रति नकारात्मक भाव न जागे और लापरवाही भी कम से का हो. यदि इसी ट्रेन दुर्घटना का सन्दर्भ लिया जाये तो अधिकारियों में, सरकारी मशीनरी में जितनी मुस्तैदी अब दुर्घटना के बाद दिख रही थी यदि उतनी मुस्तैदी तकनीकी खराबी आने के पहले चरण में दिखा ली जाती तो शायद इतनी बड़ी विभीषिका को टाला जा सकता था. 



बहरहाल, लापरवाही का अंजाम जो होना था वो हुआ. हँसी-ख़ुशी अपनी मंजिल को निकले सैकड़ों यात्री बीच में ही हमेशा-हमेशा के लिए सो गए. अब सरकारी खानापूर्ति चलेगी. मुआवजे का खेल खेला जायेगा. कागजों की लीपापोती की जाएगी. कुछ दिनों के लिए कुछ लोगों का निलंबन जैसा सामान्य सा दंड दिखाई देगा और फिर सबकुछ अपने ढर्रे पर आ जायेगा. नागरिक उसी तरह से जान जोखिम में डालकर यात्रा करते रहेंगे. अधिकारी उसी निर्लज्जता के साथ लापरवाही दिखाते रहेंगे. शीर्ष सत्ता उसी तरह से सबकुछ नजरअंदाज़ करके अपने खेल में लग जाएगी. सोचना-समझना होगा कि इन सबके बीच आखिर नुकसान किसका हो रहा है? 

सुखद माहौल की आस जगी

दिशाहीन राजनीति को दिशा मिलने की सम्भावना नजर आती दिख रही है, केंद्र सरकार के नोटबंदी के निर्णय से. संभव है कि जो लोग नोटबंदी फैसले के विरोध में हैं वे इससे इत्तेफाक न रखें. इसके लिए थोड़ा पीछे जाकर देखने की आवश्यकता है. विगत एक-दो दशक की राजनीति में जिस तरह से माफियाओं का, धनबल का, बाहुबल का, अपराधियों का प्रवेश हुआ है उससे आम जनमानस के मन से राजनीति के लिए सम्मान भाव समाप्त सा हो गया था. लोगों के मन में एक विचार गहरे से पैठ गया था कि राजनीति निकृष्ट कोटि का काम हो गया है. राजनीति को न जाने कितने अपमानजनक विशेषणों से नवाजा जाने लगा था. जनता की इस नकारात्मकता का प्रभाव राजनीतिज्ञों पर भी हुआ. राजनीति के अपराधीकरण और अपराधियों के राजनीतिकरण ने अच्छे-बुरे का भेद समाप्त कर दिया. राजनीति में सक्रिय भले लोगों की पहचान धीरे-धीरे संकट में पड़ने लगी. यहाँ पूरी तरह से धनबल, बाहुबल का वर्चस्व दिखाई देने लगा. भू-माफिया, बालू-माफिया, अपराधी आदि जबरदस्त तरीके से सक्रिय होकर पैसे के दम पर शासन-प्रशासन-जनता को अपने पैरों की जूती समझने लगे. 



राजनीति से विमुख होती पीढ़ी के बीच राजनीति में आने की इच्छुक पीढ़ी भी दिखाई दी. ये किसी भी तरह का सुखद संकेत करती नजर नहीं आई वरन इस पीढ़ी के मन में भी जल्द से जल्द अधिकाधिक धन पैदा करने, अकूत संपत्ति बनाने, बड़ी-बड़ी, मंहगी गाड़ियों का काफिला रखने की लालसा दिखाई देने लगी. ऐसी विभ्रम की स्थिति के बीच, निराशा के दौर में एक आशा की किरण उस समय जागती दिखी जबकि देश की राजधानी में अन्ना आन्दोलन की शुरुआत हुई. समूचे देश से भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनमानस उठ खड़ा हुआ. लोगों की जागरूकता देखकर लगा कि जिस जनमानस के मन में भ्रष्टाचार से लड़ने के प्रति नैराश्य भाव जाग चुका था वही जनमानस इसके खिलाफ सड़कों पर उतर आया है. लगा कि अभी देश में सकारात्मकता की लौ बुझी नहीं है. इसी ज़ज्बे का, जनमानस की इसी भावना का लाभ उठाते हुए अन्ना आन्दोलन के एक सदस्य ने राजनीति में पदार्पण किया. सत्ता नहीं, व्यवस्था बदलने आये हैं कि जयघोष के साथ उनके द्वारा मुख्यमंत्री पद धारण किया गया. भ्रष्टाचार से जूझती जनता को, जनलोकपाल बिल के लिए संघर्ष कर रहे जनमानस को, राजनीति में सुधार के अवसर तलाशती युवा पीढ़ी को लगा कि अब सही अवसर आया है. अच्छा-अच्छा विचार करते जनमानस को एकाएक उस समय झटका सा लगा जबकि व्यवस्था परिवर्तन करने वाले भी उसी रंग में रंगे दिखाई दिए जिसमें बहुतायत राजनीतिज्ञ रंगे हुए लग रहे थे. सत्ता मिलते ही अचानक विरोधियों के खिलाफ सबूत गायब हो गए. सत्ता पाते ही उनके साथ के लोग भ्रष्टाचार में लिप्त मिलने लगे. अपराधीमुक्त राजनीति देने का दावा करने वालों के साथी अपराधी नजर आने लगे. ये परिदृश्य उन लोगों के लिए अत्यंत कष्टकारी लगा जो वास्तविक रूप से जमीनी स्तर पर कार्य कर रहे थे. ये स्थिति उनके लिए असहज हो गई जो राजनीति में सुधारवादी दृष्टिकोण से लगातार काम कर रहे थे. वे सब अपने को ठगा सा महसूस करने लगे.


किंकर्तव्यविमूढ़ वाली स्थिति में ऐसे लोग हतप्रभ दिखाई दे रहे थे. उनके सामने कोई रास्ता नहीं बचा समझ आ रहा था. स्वच्छ राजनीति की बात करने वाले खुद अस्वच्छता में लिप्त दिखे. भ्रष्टाचारमुक्त राजनीति करने वाले भ्रष्टाचार के पोषक दिखे. जनलोकपाल बिल की वकालत करने वाले उसे भूलते दिखे. इस विषम स्थिति में जनमानस में हताशा, निराशा का माहौल पनपने लगा. वे ताकतें जो राजनीति को अपराध का, भ्रष्टाचार का, माफियागीरी का अड्डा मान रही थी, और तेजी से अपना विस्तार करने लगी. अवैध संपत्ति पैदा करना, संपत्ति पर कब्ज़ा, जाली मुद्रा का प्रसार, नशे के कारोबार का बढ़ना, रिश्वतखोरी को सामान्य शिष्टाचार बना देना आदि-आदि इनके प्रमुख कार्य हो गए. हताश जनमानस और भी निराशा के गर्त में चला गया. राजनीति में स्वच्छता की बात करना उसे कपोलकल्पना लगने लगा. ईमानदार और स्वच्छ छवि वालों की राजनीति में कोई जगह नहीं दिख रही थी. ऐसे माहौल में जबकि आम जनमानस का राजनीति से, राजनीतिज्ञों से, सत्ता के शीर्ष से विश्वास उठता जा रहा था तब केंद्र सरकार का नोटबंदी का कठोर फैसला नरम झोंके के समान नजर आया है. इस कदम से देश की व्यवस्था में, राजनीति में भले ही बहुत अधिक सकारात्मक प्रभाव न दिखाई दे किन्तु सामान्य रूप में एक सन्देश उनके खिलाफ अवश्य गया है जो सिर्फ धन को ही ज़िन्दगी का अंतिम सत्य मान बैठे थे. उनके खिलाफ एक कड़ा सन्देश गया है जो धनबल, बाहुबल से राजनीति को अपनी रखैल की तरह बना बैठे थे. ये फैसला उन लोगों को प्रोत्साहित करेगा जो राजनैतिक सुधार के लिए लगातार संकल्पित हैं. वे अब लोगों को समझा सकते हैं कि सत्ता का शीर्ष यदि चाहे तो परिस्थितियों से लड़ा जा सकता है. ये फैसला उन लोगों के अन्दर से नैराश्यबोध दूर कर सकता है जो मान बैठे थे कि राजनीति में सुधार संभव नहीं, राजनीतिज्ञों के वश का कुछ नहीं. यद्यपि नोटबंदी के फैसले से आम जनमानस को कतिपय कष्ट हुआ है, क्षणिक परेशानी का अनुभव हो रहा है तथापि इससे उसी को दीर्घकालिक लाभ मिलने वाला है. यदि राजनीति के प्रति, राजनीतिज्ञों के प्रति, शीर्ष सत्ता के प्रति जरा सा भी सकारात्मक वातावरण बनता है तो वह देश के विकास के लिए, देश की राजनीति के लिए, देश के नागरिकों के लिए ही लाभप्रद होगा.

भीड़तंत्र की भीड़भाड़

बड़े नोटों पर प्रतिबन्ध लगने के बाद बैंकों और डाकघरों के सामने लगातार लम्बी-लम्बी लाइन देखने को मिल रही हैं. इनमें लगे लोगों में बहुतायत वे लोग हैं जो चलन से बाहर कर दिए गए नोटों को जमा करने के बजाय बदलने के लिए खड़े हुए हैं. केंद्र सरकार द्वारा जाली नोट और काले धन पर अंकुश लगाने की दृष्टि से पाँच सौ और एक हजार रुपये के नोट पर प्रतिबन्ध लगा दिया. ऐसे में बाजार में अनावश्यक हड़बड़ी मच गई. लोगों में अनचाहे रूप से ये सन्देश चला गया कि नोट बंद हो गए हैं. ऐसे में लोगों ने अपने पास संग्रहीत पुराने बड़े नोटों को बजाय बैंक में जमा करने के उनको बदलना ज्यादा उपयुक्त समझा. चूँकि बंदी के बाद से लगातार एटीएम बंद अथवा नहीं के बराबर काम कर रहे हैं. इसके चलते आम जनमानस ने अपनी सोच से सही कदम ही उठाया. सरकार द्वारा नोट बदलने की सुविधा देने के पीछे उद्देश्य ये था कि नोटबंदी के चलते जनता के पास रोजमर्रा की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु धन की उपलब्धता बनी रहे. आवश्यकता की पूर्ति हेतु धन के बदलाव के साथ जहाँ जनता ने सौ-सौ रुपये के नोटों का संग्रह करना शुरू कर दिया वहीं आय से अधिक धन रखे लोग भी ऐसे कृत्य के लिए सक्रिय हो गए. बैंकों या डाकघरों के सामने बढ़ती जा रही भीड़ का कुछ और ही समाजशास्त्र, दूसरी तरह का मनोविज्ञान ही सामने आने लगा.


आम नागरिक के हितार्थ किसी भी बैंक से नोट बदलने की सुविधा का दुरुपयोग उन लोगों द्वारा किया जाने लगा जो अवैध रूप से धन का संचय किये हुए हैं. उनके द्वारा लाइन में लगने के बदले पारिश्रमिक देकर मजदूरों, गरीबों को इस काम में लगाया जाने लगा. एक दिन का अथवा कुछ घंटों का मेहनताना दो सौ रुपये से लेकर एक हजार रुपये तक दिए जाने से बैंकों/डाकघरों में भीड़ बढ़ती ही जा रही थी. अवैध धन का संचय किये हुए लोगों को ऐसे मजबूर लोगों की, मजदूर किस्म के लोगों की उपलब्धता भी सहजता से इस कारण हो गई क्योंकि नोटों के प्रतिबंधित होने और नए नोटों के सामान्य रूप में चलन में न आ पाने के कारण मजदूरों को, कामगारों को काम नहीं मिल रहा था. नोटों के प्रतिबन्ध और अवैध धन की उपलब्धता ने मजदूरों और धनिकों के मध्य माँग और आपूर्ति के सिद्धांत को जन्म दिया. काम न मिलने से परेशान व्यक्तियों को जहाँ काम, धन की जरूरत महसूस हुई वहीं धन खपाने वालों को व्यक्तियों की आवश्यकता थी. दोनों पक्षों के अपने-अपने हितों की खातिर बैंकों, डाकघरों के सामने की भीड़ दिनोंदिन कम होने के बजाय बढ़ती ही रही. इस किराये की भीड़ का दुष्परिणाम ये होने लगा कि वे व्यक्ति नाहक परेशानी का शिकार होने लगे जिन्हें वाकई धन की आवश्यकता है. जिनके लिए नोटों का बदला जाना वाकई अपरिहार्य है. लम्बी-लम्बी लाइन के कारण बुजुर्गों को, महिलाओं को अत्यधिक समस्या का सामना करना पड़ रहा है.


बैंकों, डाकघरों में भीड़ बढ़ने, लाइन बढ़ने का कारण सिर्फ नोट बदलना नहीं, सिर्फ मजदूरी पा लेना नहीं वरन भीड़ की मानसिकता भी है. बहुसंख्यक जनता भीड़ बढ़ाने, लाइन बढ़ाने की मानसिकता से ग्रसित होती है. अफवाहों का बाज़ार यहाँ जल्द गर्म होने लगता है. ऐसे में अंदरूनी रूप से ये अफवाह कि नोट बाज़ार में सभी सहजता से उपलब्ध नहीं होंगे, लोगों में संचय की प्रवृत्ति जाग गई. इसके साथ-साथ मुफ्त के सामान से लेकर आवश्यक वस्तुओं के संग्रह तक, ग्रीन कार्ड बनवाने से लेकर सिम लेने तक, आधार कार्ड बनवाने से लेकर राशनकार्ड बनवाने तक, मंदिर में जाने से लेकर राहत सामग्री लेने तक सब जगह भीड़ की मानसिकता अधिक से अधिक बटोर लेने की होती है, सबसे पहले प्राप्त कर लेने की होती है. इस मानसिकता ने भी बैंकों, डाकघरों में भीड़ को बढ़ाया है. ऐसे में लोगों का बैंक, डाकघर जाकर लाइन लगाना, भीड़ बढ़ाना कम होगा, कहा नहीं जा सकता. यद्यपि केंद्र सरकार ने अपने स्तर पर सही कदम उठाया था किन्तु जनता की हड़बड़ी के कारण और धनकुबेरों के चंद रुपये ठिकाने लगाये जाने की मानसिकता के कारण भीड़ में कमी नहीं आ रही है. इसके साथ-साथ कुछ बिन्दुओं पर सरकारी तैयारियाँ भी अपेक्षित प्रतीत नहीं हो रही. नए नोटों का बाज़ार में, बैंकों में समय से उपलब्ध न हो पाना, एटीएम में नए नोटों की निकासी सम्बन्धी सॉफ्टवेयर की अनुपलब्धता, मशीन में नए नोट के आकार के खाँचे का न होना भी भीड़ बढ़ने के कारण बने. सरकार को शुरूआती दौर में नोट बदलने के लिए दिन का निर्धारण कर देना चाहिए था. जिस बैंक में खाता हो उसी में नोटों का बदलाव हो जैसा प्रावधान किया जाना चाहिए था. इससे एक तो सप्ताह के सभी दिनों में बैंकों, डाकघरों में भीड़ नहीं रहती. इसके साथ-साथ सभी बैंकों, डाकघरों में भी भीड़ नहीं होती. असल में सभी बैंकों से नोटों को बदलने की सुविधा का दुरुपयोग उन्हीं लोगों द्वारा किया जाने लगा जो लाइन में खड़े होने का भुगतान कर रहे हैं, भुगतान ले रहे हैं. एक बार नोट बदल कर भाड़े के मजदूर किसी दूसरी बैंक की लाइन में जाकर वहाँ भीड़ बढ़ाने लगे. हालाँकि सरकार द्वारा अब नोट परिवर्तन के समय स्याही लगाने का फैसला किया है देखना ये है कि भीड़ बढ़ाने वाली, लाइन लगाने वाली मानसिकता से ग्रसित जनता पर इस फैसले का कितना प्रभाव पड़ता है. 

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