मीडिया का राजनैतिक रूप

राष्ट्रवाद, राष्ट्रप्रेम को लेकर वर्तमान में देश में एक अजब सा माहौल बना हुआ है. भाजपा सरकार के पक्षकार और विपक्षी दोनों तरफ से ऐसे विषयों पर अपने-अपने तर्क प्रस्तुत किये जा रहे हैं. इन बयानों, तर्कों को कसौटी पर कसे बिना, उनकी सत्यता को जाँचे बिना मीडिया द्वारा आग में घी डालने का काम किया जा रहा है. राष्ट्रवाद के पक्ष में अथवा विपक्ष में किसी भी तरह का बयान आने के बाद कतिपय मीडिया मंचों द्वारा अपनी टीआरपी को ध्यान में रखा जाने लगता है. स्वार्थमयी सोच के आगे ये विचार करना बंद कर दिया जाता है कि उनके इस तरह के प्रसारण से देश को किस तरह का नुकसान होने का अंदेशा है. विगत दो वर्षों से, जबसे कि केंद्र में भाजपा सरकार का आना हुआ है, मीडिया द्वारा, गैर-भाजपाइयों द्वारा ऐसे कृत्य कुछ अधिक ही होने लगे हैं. ऐसा माहौल बनाया जाने लगा है कि जो हो रहा है वो बस अभी ही हुआ है, न इससे पहले कभी ऐसा हुआ है और न कभी इसके बाद होगा. यदि इसके बाद होने की आशंका है और ये भाजपा के कार्यकाल में हुआ तो और भी भयानक होगा, इस तरह के प्रसारण से देशहित को ही नुकसान हुआ है.

विगत की आपत्तिजनक बातों को पुनः दोहराने का कोई लाभ नहीं. इसके उलट यदि वर्तमान की कुछ घटनाओं का संज्ञान लिया जाये तो भी स्थिति वहीं की वहीं दिख रही है. एक अभिनेत्री का बयान आया कि पाकिस्तान में सबकुछ नरक नहीं है और बस बवेला शुरू. पक्ष-विपक्ष अपने-पाने हथियार लेकर मैदान में उतर आये. बिना ये जाने-सोचे समझे कि उसने वाकई क्या कहा, क्या कहना चाहा. इसी तरह संघ प्रमुख का बयान आया कि किस कानून ने हिन्दुओं को अधिक बच्चे पैदा करने से रोका है, बस हो-हल्ला आरम्भ. मीडिया ने, गैर-भाजपाई मानसिकता वालों ने इसे ऐसे प्रसारित किया कि संघ प्रमुख ने हिन्दुओं से अधिक बच्चे पैदा करने को कहा है. ये कोई एकमात्र अथवा नया उदाहरण नहीं है किसी भी बयान पर मीडिया का दोहरा रवैया अपना लेना. देखने में आ रहा है कि मीडिया परिवार इस समय मीडिया से ज्यादा राजनीति सी करने में लगे हैं. अपने आपको एक राजनैतिक दल की तरह से प्रस्तुत कर रहे हैं. केंद्र की भाजपा सरकार के सामने विपक्ष की भांति खड़े हुए हैं. खड़े भी होना चाहिए, आखिर मीडिया ने, पत्रकारिता ने स्वयं को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ घोषित किया है. इसके बाद भी उसके द्वारा पूर्वाग्रह से ग्रसित पत्रकारिता देखने को मिल रही है. अभी हाल ही में भाजपा के एक नेता जी के बयान पर हो-हल्ला हुआ. एक दलित महिला के अपमान की बात उठी, उन पर आरोप तय किये गए, जेल भेजा गया, जमानत हुई और इन सबमें मीडिया ने बड़ी तन्मयतापूर्ण भूमिका का निर्वहन किया. अब जबकि मामला शांत है, उसी मीडिया ने जरा भी नहीं सोचा कि जिस बयान के द्वारा इतना हो-हल्ला मचा उसी बयान में बसपा की मुखिया पर टिकट बेचने का आरोप लगाया गया था. क्या मीडिया की जिम्मेवारी नहीं बनती थी कि वो इस आरोप के सम्बन्ध में भी तन्मयता दिखाती, तत्परता दिखाती?


देश भर में मीडिया द्वारा, गैर-भाजपाई दलों द्वारा इस तरह का माहौल बनाया जा रहा है कि भाजपा के द्वारा सिर्फ और सिर्फ गलत ही किया जा रहा है. हाल ही में अभिनेत्री के बयान को तवज्जो देने वाली मीडिया, संघ प्रमुख के बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश करने वाली मीडिया जेएनयू के बलात्कारी छात्र नेता वाले प्रकरण पर खामोश रही. किसी राजनैतिक दल की तरफ से कोई बयान नहीं आया. किसी मीडिया मंच ने इस पर आन्दोलन सा खड़ा नहीं किया. जबकि यही मीडिया, यही राजनैतिक दल कश्मीर के आतंकवादी के मारे जाने पर हुए उपद्रव को ऐसे तूल देने में लगे हैं जैसे देश में एकमात्र मुद्दा यही है. मीडिया को तथा राजनैतिक दलों को समझना होगा कि अनर्गल प्रसारण से वे भाजपा का नहीं देश का नुकसान कर रहे हैं. देशवासियों को खतरे में डाल रहे हैं. 

कजली महोत्सव से जुडी शौर्यगाथा

विन्ध्य पर्वत श्रणियों के बीच बसे, सुरम्य सरोवरों से रचे-बसे, नैसर्गिक सुन्दरता से निखरे बुन्देलखण्ड में ऐतिहासिकता, संस्कृति, लोक-तत्त्व, शौर्य-ओज, आन-बाण-शान की अद्भुत छटा के दर्शन होते ही रहते हैं. यहाँ की लोक-परम्परा में कजली का अपना ही विशेष महत्त्व है. महोबा के राजा परमाल के शासन में आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम के साथ-साथ अन्य बुन्देली रण-बाँकुरों की विजय की स्मृतियों को संजोये रखने के लिए कजली मेले का आयोजन आठ सौ से अधिक वर्षों से निरंतर होता आ रहा है. किसी समय में बुन्देलखण्ड में कजली लोक-पर्व को खेती-किसानी से सम्बद्ध करके देखा जाता था. जब यहाँ के गर्म-तप्त खेतों को सावन की फुहारों से ठंडक मिल जाती थी तो किसान वर्ग अपने आपको खेती के लिए तैयार करने लगता था. सावन के महीने की नौवीं से ही इसका अनुष्ठान शुरू हो जाता था. घर-परिवार की महिलाएँ खेतों से मिट्टी लाकर उसे छौले के दोने (पत्तों का बना पात्र) में भरकर उसमें गेंहू, जौ आदि को बो देती थी. नित्य उसमें पानी-दूध को चढ़ाकर उसका पूजन किया जाता था, इसके पीछे उन्नत कृषि, उन्नत उपज होने की कामना छिपी रहती थी. सावन की पूर्णिमा को इन पात्रों (दोने) में बोये गए बीजों के नन्हें अंकुरण (कजली) को निकालकर दोनों को तालाब में विसर्जन किया जाता था. बाद में इन्हीं कजलियों का आपस में आदरपूर्वक आदान-प्रदान करके एक दूसरे को शुभकामनायें देते हुए उन्नत उपज की कामना भी की जाती थी. ये परम्परा आज भी चली आ रही है, बस इसमें शौर्य-गाथा के जुड़ जाने से आज इसका विशेष महत्त्व हो गया है. 


 महोबा के राजा परमाल की पुत्री चंद्रावलि अपनी हजारों सहेलियों और महोबा की अन्य दूसरी महिलाओं के साथ प्रतिवर्ष कीरत सागर तालाब में कजलियों को सिराने (विसर्जन करने) जाया करती थी. सन ११८२ में दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान ने राजकुमारी के अपहरण की योजना बनाई और तय किया गया कि कजलियों के विसर्जन के समय ही आक्रमण करके राजकुमारी का अपहरण कर लिया जाये. पृथ्वीराज चौहान को भली-भांति ज्ञात था कि महोबा के पराक्रमी आल्हा और ऊदल एक साजिश का शिकार होकर महोबा से निकाले जा चुके हैं और महोबा को उनकी कमी में जीतना आसान होगा. अपनी विजय को सुनिश्चित करने और राजकुमारी के अपहरण के लिए उसके सेनापति चामुंडा राय और पृथ्वीराज चौहान के पुत्र सूरज सिंह ने महोबा को घेर लिया. उस समय महोबा शासन के वीर-बाँकुरे आल्हा और ऊदल कन्नौज में थे. रानी मल्हना ने उनको महोबा की रक्षा करने के लिए तुरंत वापस आने का सन्देश भिजवाया. सूचना मिलते ही आल्हा-ऊदल अपने चचेरे भाई मलखान के साथ महोबा पहुँच गए. परमाल के पुत्र रंजीत के नेतृत्व में पृथ्वीराज की सेना पर आक्रमण कर दिया गया. इस युद्ध की सूचना मिलते ही राजकुमारी चंद्रावलि का ममेरा भाई अभई (रानी मल्हना के भाई माहिल का पुत्र) उरई से अपने बहादुर साथियों के साथ महोबा पहुँच गया. लगभग २४ घंटे चले इस भीषण युद्ध में आल्हा-ऊदल के अद्भुत पराक्रम, वीर अभई के शौर्य के चलते पृथ्वीराज चौहान की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा. सेना रणभूमि से भाग गई, इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान का पुत्र सूरज सिंह भी मारा गया. इसके अलावा राजा परमाल का पुत्र रंजीत सिंह और वीर अभई भी वीरगति को प्राप्त हुए. ऐसी किंवदंती है कि वीर अभई सिर कटने के बाद भी कई घंटों युद्ध लड़ता रहा था.

ऐतिहासिक विजय को प्राप्त करने के बाद राजकुमारी चंद्रावलि और उसकी सहेलियों के साथ-साथ राजा परमाल की पत्नी रानी मल्हना ने, महोबा की अन्य महिलाओं ने भी भुजरियों (कजली) का विसर्जन किया. इसी के बाद पूरे महोबा में रक्षाबंधन का पर्व धूमधाम से मनाया गया. तब से ऐसी परम्परा चली आ रही है कि बुन्देलखण्ड में रक्षाबंधन का पर्व भुजरियों का विसर्जन करने के बाद ही मनाया जाता है. इसी कारण से आज भी इस क्षेत्र में बहिनें रक्षाबंधन पर्व के एक दिन बाद भाइयों की कलाई में राखी बाँधती हैं. वीर बुंदेलों के शौर्य को याद रखने के लिए ही कहीं-कहीं सात दिनों तक कजली का मेला आयोजित किया जाता है. यहाँ के लोग आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम को नमन करते हुए बुन्देलखण्ड के वीर रण-बाँकुरों को याद करते हैं.


तिरंगे को सच्ची सलामी अभी बाकी है

          जब पहली आधी रात को तिरंगा फहराया गया था, तब हवा हमारी थी, पानी हमारा था, जमीं हमारी थी, आसमान हमारा था तब भी जन-जन की आँखों में नमी थी। पहली बार स्वतन्त्र आबो-हवा में अपने प्यारे तिरंगे को सलामी देने के लिए उठे हाथों में एक कम्पन था मगर आत्मा में दृढ़ता थी, स्वभाव में अभिमान था, स्वर में प्रसन्नता थी, सिर गर्व से ऊँचा उठा था। समय बदलता गया, परिदृश्य बदलते रहे किन्तु तिरंगा हमेशा फहरता रहा, हर वर्ष फहराया जाता रहा। सलामी हर बार दी जाती रही किन्तु अहम् हर बार मरता रहा; गर्व से भरा सिर हर बार झुकता रहा; आत्मा की दृढ़ता हर बार कम होती रही। यह एहसास साल दर साल कम होता रहा। हाथों का कम्पन हर बार बढ़ता रहा; आँखों के आँसू हर बार तेजी से बहते रहे मगर कभी हमने हाथों के कम्पन को नहीं थामा, आँसुओं का बहना नहीं रोका; आँखों के आँसू नहीं पोंछे। पहली बार जब हाथ काँपे थे तो वे हमारे स्वाभिमान का परिचायक बने, अब यही कम्पन हमारे नैतिक चरित्र, चारित्रिक पतन को दिखा रहा है। पहली बार आँखों से बहते आँसू खुशी के थे मगर अब लाचारी, बेबसी, हताशा, भय, आतंक, अविश्वास आदि के हैं। सामने लहराता हमारा प्यारा तिरंगा हमसे हमारी स्वतन्त्रता का अर्थ पूछता है; हमसे हमारे शहीदों के सपनों का मर्म पूछता है।


          शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मरने वालों का यही बाकी निशां होगा कुछ ऐसा सोचकर ही हमारे वीर-बाँकुरों ने आजादी के लिए हँसते-हँसते अपने प्राण न्यौछावर कर दिये थे। इस महान सोच के बाद ही हमें प्राप्त हुई खुलकर हँसने की स्वतन्त्रता, खुलकर घूमने की आजादी, अपना स्वरूप तय करने की आजादी। हम आजाद तो हुए किन्तु विचारों की खोखली दुनिया को लेकर। राष्ट्रवाद जैसी अवधारणा अब हमें प्रभावित नहीं करती वरन् इसमें भी हमें साम्प्रदायिकता का बोध होने लगा है। यही कारण है कि आज हर ओर अराजकता का, हिंसा, अपराध, अत्याचार, भेदभाव आदि का बोलबाला दिख रहा है। ये सब एकाएक नहीं हो गया है, दरअसल स्वतन्त्र भारत के वक्ष पर एक ऐसी पीढ़ी ने जन्म ले लिया, जिसके लिए गुलामी एक कथा की भाँति है, शहीदों की शहादत उसके लिए गल्प की तरह है, आजादी के मतवालों की कुर्बानियाँ महज एक इत्तेफाक। ऐसी पीढ़ी के लिए आजादी का अर्थ स्वच्छन्दता, उच्शृंखलता आदि बना हुआ है; आजादी के गीत, राष्ट्रगीत, वन्देमातरम् इनके लिए आउटडेटेड हो गये हैं।

          आजाद भारत में लोकतन्त्र एक तरह की राजशाही में परिवर्तित होता चला जा रहा है। जनप्रतिनिधि अब जनता के सेवक से ज्यादा उनके हुक्मरान बनते जा रहे हैं। आजादी के दीवानों ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि विकास के नाम पर सत्तासीन लोग समाज के विकास के स्थान पर अपनी पीढ़ियों का विकास करने में जुट जायेंगे; विकसित समाज की अवधारणा में आम आदमी को महत्व नहीं मिल पायेगा। यही कारण है कि समय-समय पर देश में अलगाववादी ताकतें, नक्सलवादी ताकतें अपना सिर उठाने लगती हैं। अपने अधिकारों की माँग करते-करते ये ताकतें आतंकवादी शक्तियों में परिवर्तित हो जाती हैं और देश में अराजकता को फैलाने लगती हैं।

          इक्कीसवीं सदी में खड़े हमारे आजाद देश के पास आज भी स्थिरता का अभाव सा दिखाई देता है। कभी हम अपने पड़ोसी देशों की कृत्सित नीतियों का शिकार बनते हैं, कभी हमें सीमापार से हो रहे आतंकी हमलों से बचना पड़ता है तो कभी यह आग हमारे ही घरों में लगी दिखाई देती है। हम मंगल ग्रह पर पानी और जीवन की आशा में करोड़ों रुपये का अभियान चलाकर वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय के सामने सीना ठोंकते हैं तो शिक्षा के नाम पर वैश्विक जगत में अभी भी बहुत पीछे होने के कारण शर्मिन्दा होते हैं। अपनी संस्कृति के साथ विश्व की तमाम संस्कृतियों का समावेश कर हम सांस्कृतिक प्रचारक-विचारक के रूप में विख्यात होते हैं तो अपने देश की महिलाओं की गरिमा, उनकी जान की सुरक्षा न कर पाने के चलते शर्म से सिर झुका बैठते हैं। हमने औद्योगीकरण, उपभोक्तावादी संस्कृति के नाम पर हाथों में मोबाइल तो थमा दिये किन्तु शिक्षा के लिए हर हाथ को पुस्तकें, पेन्सिलें नहीं पकड़ा पाये। अभिजात्य वर्ग एवं पश्चिमीकरण की नकल में हमने हर हाथ को सस्ते दरों पर बीयर तो उपलब्ध करवा दी किन्तु बहुतायत में अपनी जनता को पीने का स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं करवा पाये।

          देखा जाये तो विकास के बाद भी हम विकास की खोखली अवधारणा को पोषित करते जा रहे हैं। मॉल, जगमगाते शहर, मैट्रो, मल्टीस्टोरीज, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स आदि हमारी विकास की सफलता नहीं हैं। जब तक एक भी बच्चा भूखा है, एक भी बच्चा अशिक्षित है, एक भी बच्चा रोगग्रस्त है तब तक हम अपने को विकसित और आजाद कहने योग्य नहीं। हमें आजादी की परिभाषा को समझाने-समझने की जरूरत है। जब तक देश का युवा भटकता हुआ आतंक की शरण में जाता रहेगा, जब तक विदेशी ताकतों के द्वारा हम संचालित रहेंगे, जब तक राजनीति में तुष्टिकरण हावी रहेगा, जब तक लोकतन्त्र के स्थान पर राजशाही को स्थापित करने के प्रयास होते रहेंगे, जब तक गाँवों की उपेक्षा कर औद्योगीकरण किया जाता रहेगा, जब तक कृषि के स्थान पर मशीनों को प्राथमिकता प्रदान की जाती रहेगी, जब तक इंसान उपभोग की वस्तु के तौर पर देखा जाता रहेगा, जब तक हमारी जाति हमारी पहचान का साधन बनी रहेगी तब तक हम अपने को वास्तविक रूप में आजाद कहने के हकदार नहीं।

          ऐसे में सवाल उठता है कि क्या फिर कोई हल नहीं इस समस्या का? है, मगर उसके लिए सत्ताधारियों के इंतजार के बजाय नागरिकों को ही आगे आना होगा। आपसी विभेद को समाप्त करना होगा। वैमनष्यता के चलते व्यक्ति अपना ही विकास नहीं कर सकता है तो वह समाज का, अपने परिवार का विकास कैसे करेगा? बच्चे हमारे भविष्य का आधार हैं, यदि वे ही अशिक्षित, भूखे, अस्वस्थ रहेंगे तो विकास की अवधारणा बेमानी है। याद रखना होगा कि जिन्हें सत्ता चाहिए वो हमारा ही उपयोग करके सत्ता प्राप्त कर लेते हैं तो क्या हम स्वयं के लिए अपना उपयोग कर अपना और अपने राष्ट्र का विकास नहीं कर सकते हैं? नागरिक किसी भी धर्म के हों, किसी भी जाति के हों, किसी भी क्षेत्र के हों किन्तु देश हमारा है और हम देश के, इस सोच के द्वारा हम विकास की, एकता की राह पर आगे बढ़ सकते हैं। यदि ऐसा हम कर पाते हैं तो हम अपने प्यारे तिरंगे को सच्ची सलामी दे सकेंगे और एक बार फिर हमारा सिर उसके सामने गर्व से भरा होगा, दृढ़ता से हमारे हाथ उठे होंगे, जयहिन्द, वन्देमातरम् का घोष हमारे कंठों से निकलकर समूचे आसमान में गूँज उठेगा।


चित्र गूगल छवियों से साभार 

आज़ादी बचाने को आज ही जागना होगा

ये संभवतः अपने आपमें हास्यास्पद प्रतीत हो कि इक्कीसवीं सदी में विचरण करता मानव आज भी कबीलाई संस्कृति में निवास कर रहा है. आवश्यक नहीं कि कबीलाई संस्कृति में निवास करने के लिए जंगलों, गुफाओं, कन्दारों, पेड़ों आदि पर रहा जाए. ये भी आवश्यक नहीं कि इस संस्कृति का होने के लिए नग्नावस्था में विचरण किया जाये या फिर पशुओं की खाल, घास-पत्तियों के द्वारा अपने शरीर को ढँका जाए. दरअसल कबीलाई संस्कृति अपने आपमें एक प्रकार की सामाजिक स्थिति थी, जिसे तत्कालीन समाज में मान्यता प्राप्त थी. संपत्ति पर कब्ज़ा कर लेना, धनलोलुपता में अपने ही सगे रिश्ते-नातों का खून बहा देना, राह चलती महिलाओं के साथ दुराचार करना, बच्चियों तक को अपनी हवस का शिकार बना लेना, अपनी ही सगी बेटियों-बहनों से शारीरिक सम्बन्ध बनाने लगना, आपस में विश्वासघात कर बैठना, दोस्ती को दुश्मनी में बदल देना, इंसान होकर भी इंसानों का शोषण करना, उनको गुलाम बनाना, उनके साथ अमानुषिक कृत्य करना, अमानवीयता दिखाना आदि-आदि ऐसा कुछ है जो इंसान के कबीलाई मानसिकता रखने को सिद्ध करता है. अपने आसपास धर्म, मजहब, क्षेत्र, भाषा, बोली आदि के छोटे-छोटे दल बना रखे हैं. इन छोटे-छोटे दलों के द्वारा वह कभी धर्म के नाम पर हंगामा खड़ा करता है तो कभी क्षेत्र के नाम पर उत्पात मचाता है. कभी उसके लिए बोली विवाद का विषयवस्तु बन जाती है तो कभी वह इंसानी गतिविधि को ही आक्रामकता के दायरे में समेट लेता है.  इंसानी गतिविधियों को, उसके क्रियाकलापों को देखने के बाद लगता नहीं है कि ये उसी देश के वासी हैं जहाँ गंगा-जमुनी संस्कृति का बखान अनेकानेक महामनाओं ने किया है. 



मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे-मोती जैसे गीतों को गाने वाले इस देश में ऐसे-ऐसे लोग जन्म ले रहे हैं जो किसी आतंकी को महज इसलिए शहीद बताने में लगे हैं क्योंकि वो एक मजहब विशेष से सम्बंधित था. मेरा रंग दे बसंती चोला गाते-गाते फांसी के फंदे को चूम लेने वाले भगत सिंह के सामने उस व्यक्ति को खड़ा किया जा रहा है जिसने खुलेआम देश की बर्बादी के नारे लगाने वालों का साथ दिया. क्या विद्रूपता है कि एक विद्यार्थी को जबरन दलित बता कर उसकी आत्महत्या पर राजनीति की जाती है वहीं सैकड़ों किसानों की आत्महत्याओं पर किसी के द्वारा संवेदना प्रकट नहीं होती, किसी के पुरस्कारों की वापसी नहीं होती है. जिस देश में भारतमाता की जय के नारे पर राजनीति होने लगे, जहाँ सूर्य नमस्कार पर राजनीति की जाने लगे, जहाँ योग को मजहब विरोधी बताया जाने के पीछे राजनैतिक साजिश दिखे, जहाँ तिरंगा लहराने पर पुलिस लाठियाँ भाँजे, जहाँ देश विरोधी नारे लगाने वालों के समर्थन में बुद्धिजीवी सड़कों पर उतरने लगे, जहाँ राजनैतिक विरोध दर्शाने के लिए किसी आतंकी लड़की को बेटी बनाने की होड़ दिखाई देने लगे वहाँ सोचा जा सकता है कि स्थितियाँ कितनी विस्फोटक, कितनी विध्वंसक, कितनी अराजक होती जा रही हैं.

आज भी समाज का एक बहुत बड़ा तबका इन सबसे ऊपर उठकर आपसी समन्वय से, सौहार्द्र से, सहयोग से, प्रेम-स्नेह से साथ रहना चाहता है. एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जो मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च आदि की राजनीति में नहीं पड़ना चाहता है. एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जिसके लिए भाईचारा, सामाजिक सौहार्द्र ही सबसे बड़ी पूजा है, सबसे बड़ी इबादत है. इसके साथ ही समाज में एक ऐसा वर्ग है जिसका उद्देश्य देश के अमन-चैन में खलल पैदा करना है. ऐसे लोगों की मानसिकता लोगों को धर्म, मजहब, जाति, क्षेत्र के खाँचे में बाँटकर समाज का विघटन करवाना है. इन तमाम सारी संदिग्ध भूमिकाओं के बीच खुद इंसान की भूमिका को भी संदेह से मुक्त नहीं किया जा सकता है. इसका कारण महज इतना है कि यदि हम इंसान ही आपस में विवाद पैदा करने के लिए, वैमनष्यता फ़ैलाने के लिए, आपसी खून बहाने के लिए आगे नहीं आयेंगे तो उन फिरकापरस्त ताकतों के किये धरे कुछ होने वाला नहीं है.

आज आम धारणा है कि किसी भी घटनाक्रम के लिए राजनेताओं को, राजनीति को, राजनैतिक दलों को सीधे-सीधे आरोपित कर दिया जाता है. ऐसा करने हम सभी लोग अपनी-अपनी भूमिकाओं को छिपा लेना चाहते हैं. अपने-अपने कर्तव्यों से मुँह मोड़ने का काम करने लगते हैं. सवाल उठता है कि आखिर तरक्की पसंद इंसान क्यों लोगों के भड़काने में आ जाता है? क्यों उसके द्वारा धर्म-मजहब की राजनीति की जाने लगती है? क्यों वह खुद को फिरकापरस्त ताकतों के बनाये हुए खाँचों में खुद को फिट करने लगता है? क्यों नहीं सब मिलकर ऐसी ताकतों को मुंहतोड़ जवाब देते हैं? क्यों नहीं सब मिलजुलकर एक-दूसरे की रक्षा करने को आगे आते हैं? क्यों नहीं सभी शिक्षित इंसान निरक्षर इंसानों को सही-गलत की जानकरी देने सामने आते हैं? स्पष्ट है कि हम सारे इंसानों के भीतर बैठा एक कबीला ऐसे समय में जाग जाता है. उसके अन्दर निवास करता हिंसक जानवर ऐसे माहौल में अपने आपको सशक्त महसूस करने लगता है. उसके अंदर की लहू पीने की प्यास और तेजी से भड़कने लगती है. चाँद, मंगल, अंतरिक्ष तक का सफ़र करने के बाद भी इंसान अपने भीतर विराजमान कबीले को, उसमें निवास करते जानवर को मार नहीं पाया है. यही कारण है कि मौका मिलते ही वह अपने मूल रूप में सामने आ जाता है, अपनों को मिटाने लगता है, अपनों का खून बहाने लगता है, रिश्तों का सर्वनाश करने लगता है. यहाँ समझने की आवश्यकता है कि नितांत स्वार्थमयी सोच के कारण यदि उसने अपने आपको कठपुतली बनने से नहीं रोका तो समाज में चारों तरफ धमाके सुनाई देंगे, लहू के दरिया बहते दिखाई देंगे, नौनिहाल रोते-बिलखते मिलेंगे. आने वाले सुखद समय के लिए, सामाजिक सौहार्द्र के लिए, स्नेहिल वातावरण के लिए हम सबको, हम इंसानों को आज ही जागना होगा. कल तो बहुत देर हो चुकी होगी.

इरोम के मौन संघर्ष की समाप्ति और सवाल

सोलह वर्ष से चला आ रहा अनशन आज समाप्त करने की घोषणा मणिपुर की आयरन लेडी इरोम चानू शर्मिला ने की. आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पॉवर एक्ट (AFSPA-अफस्पा)को ख़तम करने के लिए शुरू किया गया उनका अनशन संभव है कि युवा भावुकता के साथ आरम्भ हुआ हो किन्तु उसका एकाएक समापन भावुकता के कारण नहीं हुआ है. AFSPA-अफस्पा वह विशेष कानून है जो पूर्वोत्तर राज्यों के विभिन्न हिस्सों में लागू है. इस कानून के तहत सुरक्षा बलों को किसी को भी देखते ही गोली मारने या बिना वारंट के गिरफ्तार करने का अधिकार है. शर्मिला इसके खिलाफ इम्फाल के जस्ट पीस फाउंडेशन नामक गैर सरकारी संगठन से जुड़कर भूख हड़ताल कर रही हैं. मणिपुर के ईटानगर के एक कस्बे में नवम्बर 2000 में सैनिकों की गोलीबारी में 10 नागरिक मारे गए थे. उनमें से कोई भी इरोम का दोस्त या रिश्तेदार नहीं था किन्तु इरोम इससे बहुत विचलित हुई. इस एक घटना के परिणामस्वरूप अट्ठाईस वर्षीय लड़की ने अनशन करने का मन बनाया. इरोम ने इसके लिए किसी से चर्चा नहीं की, अपने किसी दोस्त, रिश्तेदार, संगठन आदि को भी नहीं बताया. अपनी माँ के पास आकर उनका आशीर्वाद लिया और अपना अनशन शुरू कर दिया. परिवार वालों को बाद में पता चला कि इरोम ने AFSPA-अफस्पा हटाने के लिए भूख हड़ताल करने का फ़ैसला लिया है.

इरोम शर्मिला 
उस समय मालोम गाँव, जहाँ उक्त घटना घटित हुई थी, के लोग भी नहीं चाहते थे कि इरोम वहाँ भूख हड़ताल करें. उन्हें डर था कि इस कारण ग्रामवासियों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं. धारे-धीरे लोग इरोम के समर्थन में जुटने लगे. शुरूआती दौर में इसे युवा जोश मानकर शासन-प्रशासन द्वारा बहुत गंभीरता से नहीं लिया गया. बाद में भूख हड़ताल लंबी खिचने पर इरोम पर आत्महत्या करने का आरोप लगा कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. इसके बाद से उनको लगातार हिरासत में ही रखा गया. न्यायालय में उनसे अनशन समाप्त करने के बारे में पूछा जाता और उनका जवाब हर बार न में होता. सरकार ने शर्मिला को आत्महत्या के प्रयास में गिरफ्तार किया था और ऐसी गिरफ्तारी एक साल से अधिक नहीं हो सकती अतः हर साल उन्हें रिहा करते ही दोबारा गिरफ्तार कर लिया जाता था. नाक से लगी एक नली के द्वारा उनको भोजन दिया जाता. बार-बार गिरफ़्तारी और नली के सहारे भोजन देने की प्रक्रिया के चलते एक सरकारी अस्पताल के एक कमरे को अस्थायी जेल बना दिया गया था. यद्यपि इरोम को 20 अगस्त 2014 को सेशन कोर्ट के आदेश से रिहा कर दिया गया किन्तु मणिपुर की राजधानी इंफाल के लगभग बीचों-बीच बना यही अस्पताल एक दशक से भी ज़्यादा समय से इरोम शर्मिला का घर रहा है. इन सोलह वर्षों में इरोम ने एक तरह की तपस्या सी की. उन्हें हर पन्द्रह दिन पर इंफाल के जवाहर लाल नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज से कोर्ट ले जाया जाता रहा. उनकी गाड़ी उनके असली घर के सामने से गुज़रती. किन्तु इरोम ने अपनी माँ से लिए प्रण के चलते उनसे या अपने परिजनों से मिलने की कोशिश नहीं की. बाकी बाहरी लोगों को उनसे मिलने की अनुमति भी नहीं थी. विशेष परिस्थितियों में, विशेष अनुमति के बाद कुछ लोगों को उनसे मिलवाया गया. सोलह वर्षों से अस्पताल ही उनकी दुनिया रहा है. इन सालों में उनकी जीभ ने किसी खाद्य-पदार्थ का स्वाद नहीं चखा. इस दौरान उनका ब्रश करना रुई के सहारे रहा ताकि और बिना पानी गलती से उनके होठों को न छू जाए.


इस विषम स्थिति के बाद, सोलह वर्षों से नाक की नली से दिए जाते भोजन के सहारे जिन्दा इरोम का अनशन समाप्त करने का फैसला उतना ही चौंकाने वाला रहा जितना कि अनशन शुरू करने वाला था. अनशन समाप्त करना, अपने ब्रिटिश प्रेमी-सहयोगी से विवाह करने तथा चुनाव लड़ने की घोषणा से लगता है कि उनके अनशन का आरम्भ भले ही युवा भावुकता हो किन्तु उसका समापन भावुकता की परिणति कदापि नहीं है. मीडिया में उनके अनशन समाप्ति को, उनके द्वारा लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में उतरने को क्रांतिकारी कदम बताया जा रहा है. सम्भावना जताई जा रही है कि इरोम के लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनने के बाद उनके संघर्ष को धार मिलेगी. माना जा रहा है कि राजनीति में बढ़ते जा रहे अँधियारे के बीच इरोम जैसे संघर्षशील लोग रौशनी का कार्य कर सकते हैं. और भी कई-कई सम्भावनाओं पर विचार किया जा रहा है. अनेकानेक भावी क़दमों की अपेक्षा की जा रही है. जिस समय इरोम ने अनशन शुरू किया था, उस समय भी किसी ने उसका भविष्य नहीं जाना था. अब जबकि उनका अनशन समाप्त हो चुका है कोई नहीं कह सकता कि भविष्य क्या होगा. सम्भावनाओं, अपेक्षाओं के बीच जो मूल बिन्दु सामने आता है वो यह कि आखिर इतने लम्बे संघर्ष के बाद हासिल क्या हुआ? जिस AFSPA-अफस्पा के लिए उनका अनशन चल रहा था उसमें किंचित मात्र भी संशोधन नहीं किया गया. ऐसे में सवाल उठता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि सोलह वर्षों के अपने संघर्ष के बाद भी किसी तरह का परिणाम न आते देख इरोम अन्दर से टूटने लगी हों? अपना अनशन उनको निरर्थक समझ आने लगा हो? समाज में रहने के बाद भी सामाजिक स्थितियों से दूर रखी गई इरोम के भीतर नैराश्य न जन्मने लगा हो? युवा आँखों के सपनों के असमय मरने का डर पैदा न हो गया हो? अनशन समाप्ति की घोषणा के साथ ही साथ विवाह करने और चुनाव लड़ने की घोषणा ऐसे सवालों को जन्म देती ही है. बहरहाल अंतिम सत्य क्या है इसे सिर्फ इरोम ही जानती है, वही बता सकती है. इरोम का अनशन समाप्त करना यदि सवालों को जन्म देता है तो इतनी लम्बी समयावधि में सरकारों की चुप्पी भी अनेक सवालों को जन्म देती है. क्या शांतिपूर्ण चलने वाले अनशन का कोई महत्त्व नहीं? क्या अकेले व्यक्ति का संघर्ष सकारात्मक परिणाम लाने के लिए सरकार को मजबूर नहीं कर सकता? AFSPA-अफस्पा समाप्त करना सरकारों को भले ही तर्कसंगत न लगता हो किन्तु सोलह वर्षों के संघर्ष को नजरअंदाज करना क्या तर्कसंगत है?
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(चित्र गूगल  छवियों से साभार लिया गया है) 

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