आत्महत्याओं के पीछे

फिर एक आत्महत्या, फिर एक युवा का चले जाना. दुःख भी होता है, क्षोभ भी होता है मगर बहुत सारे अनुत्तरित से सवाल सामने आ जाते हैं. तमाम तरह की अनिश्चितता सामने आ जाती है. संभावनाओं के इस दौर में भी युवा-शक्ति का अनिश्चय के साये में ज़िन्दगी बिताना और फिर हताशा में मौत के आगोश में चले जाना समझ से परे है. अनिश्चय हावी है, हताशा हावी है, निराशा जारी है, इंसान का मरना जारी है, युवाओं का मरना ज़ारी है. इस हावी रहने में, बहुत कुछ जारी रहने में सबसे बुरा है सपनों का मरते जाना, विश्वास का मिटते जाना. यांत्रिक रूप से गतिबद्ध ज़िन्दगी नितांत अकेलेपन के साथ आगे बढ़ती दिखती है किन्तु आगे बढ़ती सी लगती नहीं. इक्कीसवीं सदी को औद्योगीकरण की, भूमंडलीकरण की, वैश्वीकरण की, तकनीक की सदी घोषित कर दिया गया. इसके चलते समाज में अर्थ को महत्त्वपूर्ण माना जाने लगा. लोगों के लिए एकमात्र उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ धनोपार्जन करना बन गया है. इसके लिए जीवन को यंत्रवत सा बना लिया गया है. अब विद्रूपता ये की ये यांत्रिक ज़िन्दगी न केवल धनोपार्जन के लिए वरन बचपन, शिक्षा, घर-परिवार आदि में भी दिखने लगी है. किसी समय मौज-मस्ती, शैतानियों, शरारतों आदि के लिए बचपन को याद किया जाता था किन्तु अब ऐसा लगता है जैसे बचपन की भ्रूण हत्या कर दी गई है. हँसते-खेलते बच्चों की जगह बस्तों का बोझ लादे, थके-हारे से, मुरझाये से बच्चे दिखाई देते हैं. शरारतों, शैतानियों की जगह उनके चेहरों पर बड़ों-बुजुर्गों जैसी भाव-भंगिमा, सोच-विचार दिखाई देता है. नीले आकाश के नीचे उन्मुक्त खेलते, तितली बनकर उड़ते बच्चों को अब कमरों में बंद कर दिया गया है, उड़ान के लिए उनके हाथों में लैपटॉप, मोबाइल थमा दिए गए हैं. किसी समय में दादा-दादी, नाना-नानी के आँचल में छिपकर परियों, वीरों के किस्से-कहानियाँ सुन-सुनकर बड़े होने वाले बच्चे टीवी सीरियल्स के कथित लाइव शो को देखकर बड़े हो रहे हैं, स्मार्टफोन की इंटरनेट दुनिया के कारण समय से पहले ही स्मार्ट हो रहे हैं. 



धनोपार्जन की आपाधापी में अभिभावकों का संलिप्त रहना, युवाओं का भागमभाग में जुट जाना, अपनी आँखों के सपनों को जिंदा बनाये रखने के लिए संवेदना को मारकर आगे बढ़ते जाना आदि ऐसा कुछ हुआ जिसने समूचे समाज को उल्टा खड़ा कर दिया. अनियमित होती जीवनशैली, परिवार से दूर रहने की मजबूरी, अधिकाधिक भौतिक संसाधनों की प्राप्ति करना, चकाचौंध भरी जिंदगी को जीने की लालसा ने इंसान को इंसान की जगह मशीन बना दिया. मशीन बनते इस इंसान ने मशीन बनते ही सबसे पहले अपने भीतर की संवेदना को समाप्त कर उसकी जगह एक बाज़ार को जन्म दिया. रिश्ते, नातों, परिवार, बच्चों, दोस्तों आदि को उसने सिर्फ बाज़ार की दृष्टि से देखा. सब जगह उसने हानि-लाभ का समीकरण लगाया और उसी के अनुसार अपने आपको संबंधों-रिश्तों के साँचे में उतारा. इस यांत्रिक जीवन का दुष्परिणाम यह हुआ कि सारे रिश्ते समाप्त से होते दिखे. बच्चों के लिए माता-पिता और माता-पिता के लिए बच्चे नोट छापने की मशीन मात्र बनकर रह गए. रिश्तों का मोल महज संबोधन के लिए होता दिखने लगा. ऐसी स्थिति में अकेलापन बढ़ना स्वाभाविक ही है और वैसा हुआ भी. धन, भौतिक संसाधन, आधुनिकतम उपकरण, तकनीक की भरमार हो गई और इंसान एकदम अकेला हो गया.


इस अकेलेपन को दूर करने के लिए तनहा इंसान ने सबक न लिया; अपनी तन्हाई को दूर करने के लिए अपनों का सहारा नहीं लिया; अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए इंसानों का सहयोग नहीं लिया क्योंकि विडम्बना ये है कि आधुनिकता के बाज़ार में इंसान दिख ही नहीं रहे हैं. चारों तरफ सिर्फ मशीन ही मशीन हैं, यंत्र ही यंत्र हैं. अकेलेपन का उपाय मोबाइल में, लैपटॉप में, छलकते जाम में, सिगरेट के छल्लों में, नशे के बादलों में, दैहिक आकर्षण में, बिस्तर की सिलवटों में खोजा जा रहा है. सेल्युलाइड के परदे की चकाचौंध को ही अपने जीवन की वास्तविकता मान लिया जा रहा है. आभासी दुनिया के नकलीपन को ही अपने जीवन का असलीपन बना लिया जा रहा है. इससे अकेलापन कम होने की बजे और बढ़ता जा रहा है. इंसान के भीतर एक तरह का खोखलापन बढ़ता जा रहा है. यही कारण है कि पिता अपनी ही बेटी से कुकृत्य करने में लगा है. भाई-बहिन के बीच शारीरिक सम्बन्ध बन रहे हैं. इंसानी देह महज भोग की वस्तु बनती जा रही है. यौनेच्छा पूर्ति के लिए हवसी बच्चियों, वृद्धाओं, शवों तक को नहीं बख्श रहे हैं. दैहिक संबंधों को मानसिक संबंधों पर वरीयता दी जाने लगी है. ऐसी स्थिति में अंत नितांत दुखद होता है. जब आँख खुलती है तो व्यक्ति को अपने चारों तरफ आभासी दुनिया का एहसास होता है, नितांत भ्रम का एहसास होता है, सबकुछ पीछे छूट जाने के दुःख होता है, अपनों के कहीं दूर चले जाने का भाव जगता है. यही सबकुछ व्यक्ति में और अधिक दुःख, हताशा, निराशा का संचार कर देता है. ऐसे में व्यक्ति या तो अवसाद की अवस्था में चला जाता है या फिर आत्महत्या जैसा जघन्य कृत्य कर बैठता है. ज़ाहिर है कि अकेलेपन का इलाज मशीन नहीं, बाज़ार नहीं, तकनीक नहीं वरन अपने लोग हैं, घर-परिवार है. आवश्यकता इस सत्य को समझने की है. यदि ऐसा नहीं होता है तो कारण कुछ भी बताये जाएँ, लोगों में अकेलापन हावी रहेगा, लोगों का मौत के आगोश में चलते चले जाना जारी रहेगा.

केन्द्रीय बजट के बारे में

केन्द्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने 01 फरवरी को देश का केन्द्रीय बजट पेश करके वर्षों से चली आ रही परम्परा को तोड़ दिया. अभी तक केन्द्रीय बजट प्रतिवर्ष फरवरी माह के अंतिम कार्यदिवस को पेश किया जाता रहा है. इस बजट के साथ रेल बजट को भी पेश करके एक और परिपाटी को भी तोड़ा गया है. अभी तक रेल बजट को केन्द्रीय बजट से अलग पेश किया जाता रहा है. इससे पूर्व सन 2000 में तत्कालीन वित्तमंत्री यशवंत सिंह ने भी बजट से जुड़ी एक परम्परा को तोड़ा था. वर्ष 2000 तक केंद्रीय बजट को फरवरी महीने के अंतिम कार्य-दिवस को शाम पाँच बजे घोषित किया जाता था. ऐसा औपनिवेशिक काल से चला आ रहा था, जब ब्रिटिश संसद दोपहर में बजट पारित करती थी जिसके बाद भारत ने इसे शाम को पेश करना आरम्भ किया. यह परंपरा सर बेसिल ब्लैकैट ने 1924 में शुरु की थी. इसके पीछे का कारण रात भर जागकर वित्तीय लेखा-जोखा जोखा तैयार करने वाले अधिकारियों को आराम बताया जाता था. अटल बिहारी बाजपेयी की एनडीए सरकार (बीजेपी द्वारा नेतृत्व) के तत्कालीन वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा ने परम्परा को तोड़ते हुए 2001 के केंद्रीय बजट के समय को बदलते हुए पूर्वान्ह ग्यारह बजे घोषित किया. 


बजट शब्द की उत्पति लैटिन शब्द बुल्गा से हुई, इसका अर्थ है चमड़े का थैला. बुल्गा से फ्रांसीसी शब्द बोऊगेट की उत्पति हुई. जिसके बाद अंग्रजी शब्द बोगेट अस्तित्व में आया, इससे बजट शब्द बना. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 112 में भारत के केन्द्रीय बजट को वार्षिक वित्तीय विवरण के रूप में निर्दिष्ट किया गया है. यह भारतीय गणराज्य का वार्षिक बजट होता है, जिसे प्रत्येक वर्ष फरवरी के अंतिम कार्य-दिवस में भारत के वित्तमंत्री द्वारा संसद में पेश किया जाता रहा है. इसके पश्चात् भारत के वित्तीय वर्ष की शुरूआत अर्थात 1 अप्रैल से बजट को लागू करने से पहले इसे सदन द्वारा पारित करना आवश्यक होता है. भारत देश का पहला बजट 7 अप्रैल 1860 को ब्रिटिश सरकार के वित्त मंत्री जेम्स विल्सन ने पेश किया था. जबकि आज़ादी के ठीक पहले अंतरिम सरकार का बजट लियाकत अली खां ने पेश किया था. यह बजट 9 अक्टूबर 1946 से लेकर 14 अगस्त 1947 तक की अवधि के लिए था. स्वतंत्र भारत का प्रथम केन्द्रीय बजट 26 नवम्बर 1947 को आर.के. षणमुखम चेट्टी द्वारा प्रस्तुत किया गया था. इसमें 15 अगस्त 1947 से लेकर 31 मार्च 1948 के दौरान साढ़े सात महीनों को शामिल किया गया था. आर.के. षणमुखम चेट्टी ने ही अपने बजट में पहली बार अंतिरम शब्द का प्रयोग किया था. तब से लघु अवधि के बजट के लिए इस शब्द का इस्तेमाल किया जाने लगा. भारतीय गणतंत्र की स्थापना के बाद पहला बजट 28 फरवरी 1950 को जान मथाई ने पेश किया था. इस बजट में ही योजना आयोग की स्थापना का वर्णन किया था. 

बजट छपने के लिए भेजे जाने से पहले वित्त मंत्रालय मे हलवा खाने की रस्म निभाई जाती है. इस रस्म के बाद बजट पेश होने तक वित्त मंत्रालय के संबधित अधिकारी किसी के संपर्क में नहीं रहते हैं. यहाँ तक कि उनको अपने परिवार से दूर रहकर वित्त मंत्रालय में ही रुकना पड़ता है. 1958-59 में देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने बजट पेश किया उस समय वित्त मंत्रालय उनके पास था ऐसा करने वाले वे देश के पहले प्रधानमंत्री बने. मोरारजी देसाई ने अब तक सर्वाधिक दस बार बजट पेश किया है. इनमें आठ केन्द्रीय बजट तथा दो अंतरिम बजट हैं. अपने जन्मदिन पर बजट पेश वाले वह एकमात्र प्रधानमंत्री हैं. उनके इस्तीफा देने के बाद इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री के साथ-साथ वित्त मंत्रालय का पदभार भी संभाला. वित्त मंत्री के पद को हासिल करने वाली वे पहली महिला भी बनी. 


बीटिंग रिट्रीट - beating retreat 2017

beating retreat 2017


संवैधानिक स्वतंत्रता का दुरुपयोग न होने दें

आज हम सभी के लिए गौरव का दिन है. आज ही के दिन सन 1950 में हमारे संविधान को सम्पूर्ण देश में लागू किया गया. इसके लागू होते ही हमारा देश लोकतान्त्रिक व्यवस्था के साथ-साथ एक गणराज्य के रूप में भी जाना जाने लगा. ये अपने आपमें अद्भुत है कि हमारे देश में केन्द्रीय सत्ता की प्रभुता के साथ-साथ राज्यों की प्रभुता को भी बराबर से स्वीकारा गया है. संविधान निर्माताओं ने केंद्र के साथ-साथ राज्यों को भी पर्याप्त अधिकार दिए. नागरिकों को व्यापक अधिकार प्रदान किये. कर्तव्यों का निर्वहन, मौलिक अधिकारों की रक्षा आदि का सूत्रपात इसी संविधान के द्वारा होना आरम्भ हुआ. संविधान निर्माताओं ने अपने पास असीमित अधिकार होने के बाद भी केंद्र और राज्य के साथ-साथ सामान्य नागरिक को भी पर्याप्त अधिकार, पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान किये जाने की वकालत की थी. वे चाहते तो अधिकारों को सामाजिक रूप से लोकतान्त्रिक न बनाकर उसे भी वंशानुगत अथवा परिवार तक सीमित कर सकते थे. यकीनन उनका उद्देश्य देश के विकास में सभी की भूमिका, सभी नागरिकों की स्वतंत्र भागेदारी करना रहा होगा. इसी कारण से नागरिकों को स्वतंत्रता के साथ जीवन-यापन करने के पर्याप्त अधिकार संविधान निर्माताओं ने संविधान के माध्यम से उपलब्ध कराये हैं.

इधर देखने में आने लगा है कि वर्तमान समय में स्वतन्त्रता, संविधान के नाम पर बहुतेरे नागरिकों द्वारा अपने अधिकारों का दुरुपयोग होने लगा है. इसके पीछे बहुत से लोग समाज को दोष देना शुरू कर देते हैं. देखा जाये तो समाज समस्याओं से हमेशा से ग्रस्त रहा है. वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि हम खुद व्यवस्थाओं के सुचारू रूप से चलने में अपना कितना योगदान दे रहे हैं. गणतन्त्र दिवस के इस अवसर पर बजाय इस बात के कि किसने क्या किया, किसने क्या नहीं किया हम इस बात पर विचार करें कि हमने क्या किया? हम आज जितने अधिक साक्षर हुए हैं, जितने अधिक शक्तिशाली बने हैं उतने ही अधिक वर्ग हमारे आसपास दिख रहे हैं. आज सहज रूप में देखने में आता है कि कोई गाँधी वर्ग में खुद को खड़ा किये हैं, कोई नेहरू वर्ग में, कोई अम्बेडकर वर्ग में. इन वर्गों के द्वारा बजाय सामाजिक चेतना लाने के एक-दूसरे को नीचा दिखाने के प्रयास किये जा रहे हैं. यही कारण है कि आज किसी के लिए हेडगेवार देश तोडने वाले हैं तो किसी को सरदार पटेल की देश भक्ति पर संदेह दिखता है. कोई सरदार भगत सिंह को अपने पाले में शामिल करने की फिराक में दिखता है तो कोई अशफाक को अपने ग्रुप का बताता है. ये स्थिति क्षणिक रूप में किसी को प्रचार भले ही दिला दे किन्तु देश के लिए घातक है. देशवासियों के अलग-अलग गुटों में बंटने का फायदा विरोधियों द्वारा, देश के दुश्मनों द्वारा उठाये जाने की आशंका नजर आती है.


ऐसी स्थिति में हम सभी को विचार करना होगा कि क्या ऐसी स्थिति में वाकई हम संविधान का सम्मान करने की दशा में दिखते हैं? क्या ये स्थितियाँ हमें गणतन्त्र दिवस मनाने की अनुमति देतीं हैं? क्या इस तरह से हम अपनी आजादी दिलाने वाले शहीदों के प्रति सच्ची श्रृद्धांजलि अर्पित कर पाने के अधिकारी हैं? सवाल बहुत से हैं. उनको खोजने के लिए समूचे देश को एक होना पड़ेगा. सभी को वर्ग, जाति, धर्म के तमाम खांचों से बाहर निकल कर देशहित में काम करना होगा. इत्तेफाक से हमारा प्रदेश इस समय चुनावी दौर से गुजर रहा है. किसी भी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के सफल होने के पीछे उसके नागरिकों का, उसके मतदाताओं का बहुत बड़ा योगदान होता है. आइये हम सब मिलजुलकर सकारात्मक रूप से मतदान करने निकलें. लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को मजबूत बनाने के लिए, गणतंत्र को सशक्त बनाने के लिए, संविधान के प्रति आस्था को और गहरा करने के लिए स्वच्छ मतदान प्रक्रिया को अपनाएं. एकजुट होकर गणतन्त्र दिवस मनायें. देश को सशक्त बनायें. देशवासियों को सफल बनायें. 

नेताजी की मृत्यु का सच सामने आये

सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु पर आज तक संदेह बना हुआ है. इस संदेहास्पद स्थिति के साथ-साथ एक विद्रूपता ये है कि देश की आज़ादी के पूर्व से लेकर आज़ादी के बाद अद्यतन भारत सरकार द्वारा किसी भी तरह की ठोस सकारात्मक कार्यवाही नहीं की गई है. हालाँकि तीन-तीन जाँच आयोगों के द्वारा विभिन्न सरकारों ने औपचारिकता का ही निर्वहन किया है और वो भी कुछ जागरूक सक्रिय नागरिकों के हस्तक्षेप के बाद. इस बात को बुरी तरह से प्रसारित करने और एक तरह की सरकारी मान्यता देने के बाद कि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु १८ अगस्त १९४५ को एक विमान दुर्घटना में हो गई थीअधिसंख्यक लोगों द्वारा इसे स्वीकार कर पाना मुमकिन नहीं हो पा रहा था और ये स्थिति आज भी बनी हुई है.


विमान दुर्घटना और मृत्यु का सच
नेता जी की विमान दुर्घटना को लेकरउनकी मृत्यु की खबर और बाद में उनके जीवित होने की खबर के सन्दर्भ में सामने आते कुछ तथ्यों ने भी समूचे घटनाक्रम को उलझाकर रख दिया है. जहाँ एक तरफ नेता जी की मृत्यु एक बमबर्षक विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने पर बताई जा रही है वहीं ताईवानी अख़बार ‘सेंट्रल डेली न्यूज़’ से पता चलता है कि १८ अगस्त १९४५ के दिन ताइवान (तत्कालीन फारमोसा) की राजधानी ताइपेह के ताइहोकू हवाई अड्डे पर कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त नही हुआ था. इसी तथ्य पर हिन्दुस्तान टाइम्स’ के भारतीय पत्रकार (मिशन नेताजी’ से जुड़े) अनुज धर के ई-मेल के जवाब में ताईवान सरकार के यातायात एवं संचार मंत्री लिन लिंग-सान तथा ताईपेह के मेयर ने जवाब दिया था कि १४ अगस्त से २५ अक्तूबर १९४५ के बीच ताईहोकू हवाई अड्डे पर किसी विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने का कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं है। (तब ताईहोकू के इस हवाई अड्डे का नाम मात्सुयामा एयरपोर्ट’ था और अब इसका नामताईपेह डोमेस्टिक एयरपोर्ट’ है।) बाद में २००५ में,ताईवान सरकार के विदेशी मामलों के मंत्री और ताईपेह के मेयर मुखर्जी आयोग के सामने भी यही बातें दुहराते हैं. नेता जी की मृत्यु को अफवाह मानने वालों का मानना है कि वो शव नेता जी का नहीं वरन एक ताईवानी सैनिक इचिरो ओकुरा’ का था जो बौद्ध धर्म को मानने वाला था. बौद्ध परम्परा का पालन करते हुए ही उसका अंतिम संस्कार मृत्यु के तीन दिन बाद नेता जी के रूप में किया गया. इस विश्वास को इस बात से और बल मिलता है कि सम्बंधित शव का अंतिम संस्कार चिकित्सालय के कम्बल में लपेटे-लपेटे ही कर दिया गया थाजिससे किसी को भी ये ज्ञात नहीं हो सका कि वो शव किसी भारतीय का था या किसी ताईवानी का. मृत्यु प्रमाण-पत्र का दोबारा बनाया जाना भी इस संदेह को पुष्ट करता है कि नेता जी की मृत्यु विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी.

दुर्घटना के बाद नेता जी का प्रवास
ये तथ्य किसी से भी छिपा नहीं है कि नेता जी का आज़ाद हिन्द फ़ौज की स्थापना और इटलीजापान,जर्मनी से मदद लेने के पीछे एकमात्र उद्देश्य भारत देश को स्वतंत्र करवाना था. उनकी इन गतिविधियों को ब्रिटेन किसी भी रूप में पसंद नहीं कर रहा था. ऐसे में उसने नेता जी को अंतर्राष्ट्रीय अपराधी घोषित कर दिया था.  इधर अंग्रेज भले ही भारत देश को स्वतंत्र करना चाह रहे थे किन्तु वे नेता जी को राष्ट्रद्रोही घोषित करके उनके ऊपर मुकदमा चलाने को बेताब थे. इसके साथ-साथ नेता जी के सहयोगी रहे स्टालिन और जापानी सम्राट तोजो किसी भी कीमत पर नेता जी को ब्रिटेन-अमेरिका के हाथों नहीं लगने देना चाहते थे. वे इस बात को समझते थे कि मित्र राष्ट्र में शामिल हो जाने के बाद ब्रिटेन-अमेरिका उन पर नेता जी को सौंपने का अनावश्यक दवाब बनायेंगे. हो सकता है तत्कालीन स्थितियों में इस दवाब को नकार पाना इनके वश में न रहा हो. ऐसे में इन सहयोगियों ने एक योजना के तहत नेता जी को अभिलेखों में मृत दिखाकर उन्हें सोवियत संघ में शरण दिलवा दी हो. इस तथ्य को इस कारण से भी बल मिलता है कि नेता जी समेट वे तीन व्यक्ति (नेताजी के सहयोगी और संरक्षक के रूप में जनरल सिदेयीविमान चालाक मेजर ताकिजावा और सहायक विमान चालक आयोगी) ही इस दुर्घटना में मृत दर्शाए गए थे जिन्हें सोवियत संघ में शरण दिलवाई जानी थी.

भारत सरकार का रवैया
भारत सरकार ने वर्ष १९६५ में गठित ‘शाहनवाज आयोग’ को ताइवान जाने की अनुमति नहीं दी थी. समूची की समूची जाँच आयोग ने देश में बैठे-बैठे ही पूरी कर ली थी. और शायद इसी का सुखद पुरस्कार उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल करके दिया गया.
१९७० में गठित ‘खोसला आयोग’ को भी रोका गया था किन्तु कुछ सांसदों और कुछ जन-संगठनों के भारी दवाब के कारण उसे ताइवान तो जाने दिया गया मगर किसी भी सरकारी या गैर-सरकारी संस्था से संपर्क नहीं करने दिया गया.
मुखर्जी आयोग ने भारत सरकार से जिन दस्तावेजों की मांग की वे आयोग को नहीं दिए गए. अधिकारियों ने वही पुराना राग अलापा कि एविडेंस एक्ट की धारा १२३ एवं १२४ तथा संविधान की धारा ७४(२) के तहत इन फाइलों को नहीं दिखाने का प्रिविलेज” उन्हें प्राप्त है.
रूस में भी जाँच आयोग को पहले तो जाने नहीं दिया गया बाद में भारत सरकार की अनुमति के अभाव में आयोग को न तो रूस में नेताजी से जुड़े दस्तावेज देखने दिए गए और न ही कलाश्निकोव तथा कुज्नेट्स जैसे महत्वपूर्ण गवाहों के बयान लेने दिए गए.
भारत सरकार ने १९४७ से लेकर अब तक ताइवान सरकार से उस दुर्घटना की जाँच कराने का अनुरोध भी नहीं किया है.

 कुछ फ़र्ज़ हमारा भी है

आज भी हमारी सरकार के ताइवान के साथ कूटनीतिक सम्बन्ध नहीं कायम हो सके हैं. इसके पार्श्व में नेहरू कासरकारों का चीन-प्रेम भी हो सकता है. नेता जी के बारे में उपजे संदेह के बादलों को पहले तो स्वयं नेहरू ने और फिर बाद में केंद्र सरकारों ने छँटने नहीं दिया. पारदर्शिता बरतने के लिए लागू जनसूचना अधिकार अधिनियम के इस दौर में भी नेता जी से मामले में किसी भी तरह की पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है. नेता जी दुर्घटना का शिकार हुए या अपनों की कुटिलता कानेता जी देश लौटे या देश की सरकार ने उनको अज्ञातवास दे दियावे रूस में ही रहे या फिर कहीं किसी विदेशी साजिश का शिकार हो गए….ये सब अभी भी सामने आना बाकी है. ऐसे में सत्यता कुछ भी हो पर सबसे बड़ा सत्य यही है कि देश के एक वीर सपूत को आज़ादी के बाद भी आज़ादी नसीब न हो सकी. भले ही नेता जी अपने अंतिम समय में गुमनामी बाबा बनकर रहे और स्वर्गवासी हुए फिर भी उनकी आत्मा आज भी आज़ादी के लिए भटक रही हैतड़प रही है. ये हम भारतवासियों का फ़र्ज़ बनता है कि कम से कम आज़ादी के एक सच्चे दीवाने को आज़ाद भारत में आज़ादी दिलवाने के लिए संघर्ष करें… जय हिन्द!!

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