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सोच का दायरा व्यापक करना होगा

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इक्कीसवीं सदी, पॉप कल्चर, आधुनिकता, औद्योगीकरण, भूमण्डलीकरण, वैश्वीकरण आदि-आदि नये-नये शब्दों के बीच न जाने कितनी तरह के सम्बन्धों ने भी अपना सिर उठाया है। कबीलाई संस्कृति से अपने विकास का सफर तय करते हुए हम इंसानों ने परिवार की व्यापक और सुदृढ़ व्यवस्था और संकल्पना को साकार किया। पारिवारिक व्यवस्था की सुदृढ़ता के बीच ही हमने इंसानियत का, मावनता का, संवेदनशीलता का, सहायता का, दया का, परोपकार आदि का पाठ सीखा था। यह सब संयुक्त परिवार के कारण आसानी से बच्चों को उपलब्ध भी होता था और उनको आसानी से अपनी चारित्रिक विशेषता के रूप में ढालना आसान भी होता था।

इंसान ने अपने आपको विकसित करने का कार्य किया वहीं उसने अपनी इस चारित्रिक विशेषता को बदलने का कार्य किया। इंसानियत, परोपकार, मानवता, दया, स्नेह, सहायता आदि को उसने विस्मृत करना शुरू कर दिया। उसके सामने सिर्फ और सिर्फ धन कमाना एकमात्र लक्ष्य हो गया। इस लक्ष्य-बेधन के लिए इंसान ने परिवार को विखंडित कर दिया, सम्बन्धों को तार-तार कर दिया। संयुक्त परिवार से एकल परिवार और फिर उससे भी आगे जाकर उसने नाभिक परिवार का गठन कर डाला। इसी बीच आये क्रान्तिकारी से दिखने वाले परिवर्तनों ने समलैंगिकता, सहजीवन-लिव इन रिलेशनशिप- आदि को भी स्वीकृति प्रदान करवा दी।

परिवार में आये परिवर्तन का असर समाज पर तो पड़ा ही सबसे ज्यादा उसने इंसान को ही प्रभावित किया। अपने आपमें सिमटे रहने की प्रवृत्ति देखने को मिलने लगी। व्यक्ति एकाकी होकर जीवन-निर्वाह करने को महत्व देने लगा। उसके लिए स्वयं की अहमियत ही बढ़ी और शेष को उसने नगण्य रूप में स्वीकार करना शुरू कर दिया। इस तरह की सोच के चलते इंसान भीड़ के बीच भी खुद को तन्हा समझने लगा, परिणामतः हताशा-निराशा जैसी विकृतियों के साथ अवसाद जैसी बीमारियों ने भी इंसानी शरीर में अपना निवास कर लिया। इस तरह की समस्याओं के चलते न सिर्फ व्यक्ति, न सिर्फ परिवार बल्कि समाज को भी दुष्परिणाम भुगतने पड़ रहे हैं।

हम आये दिन देखते हैं कि राह चलते महिलाओं को, छोटी बच्चियों को, युवा लड़कियों को छेड़ने वाले अपना कार्य करते रहते हैं और राह चलते लोग उसे सिर्फ एक तमाशा समझकर देखकर भी अनदेखा कर जाते हैं। सड़क के किनारे पड़े घायल व्यक्ति को उठाकर चिकित्सालय पहुंचाने में भी हम संकोच करते दिखते हैं। राह चलते मदद करने की बात तो आज के समय में सम्भवतः बड़ी होगी, हम अपने पड़ोसी की मदद करने से भी हिचकते हैं। हमें इससे क्या लेना’, ‘हमारा इससे क्या लाभजैसी मानसिकता को पालकर भी हम समाज में खुद को सामाजिक प्राणी सिद्ध करने के प्रयास करते रहते हैं।

यह तो हम सभी को सोचना होगा कि सिर्फ और सिर्फ स्व-विकास के लिए, स्व-लाभ को ध्यान में रखकर किये गये कार्यों से हो सकता है कि हमें तात्कालिक लाभ तो प्राप्त हो जायें किन्तु उससे दीर्घगामी सुखद परिणाम किसी भी रूप में हासिल होने वाले नहीं। आज समाज के विकास हेतु, परिवार के विकास हेतु, व्यक्ति के विकास हेतु हमें स्व की सोच से बाहर निकलना पड़ेगा।



आन्दोलन की सफलता के लिए जन-संवाद आवश्यक है

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टीम अन्ना अब बिना किसी का नाम लिए चुनावी मैदान में उतरने का मन बनाते दिखने लगी है। इसके साथ ही यह भी संकेत मिले हैं कि अन्ना टीम अब जनता से सीधे संवाद कायम करेगी। यह अन्ना टीम का बेहतरीन फैसला कहा जा सकता है। जिस तरह से अभी तक के आन्दोलन में कुछ गिने-चुने लोग ही काबिज रहे उससे कहीं न कहीं जनता का एक बहुत बड़ा वर्ग सड़क पर तो आया किन्तु ऐन मौके पर खुद को ठगा सा महसूस करता दिखा।

आन्दोलन को इस कारण से तमाम लोगों ने समाप्त होना कहा, किसी-किसी ने आन्दोलन को असफल तक कहा। देखा जाये तो आन्दोलन असफल नहीं कहा जा सकता, हां इतना तो अवश्य है कि आन्दोलन कुछ हद तक कमजोर अवश्य ही हुआ है। ऐसे में यह अन्ना टीम का कर्तव्य बनता है कि वह सीधे-सीधे जनता के बीच जाये और संवाद स्थापित करते हुए जनलोकपाल और सरकारी लोकपाल के बीच के अन्तर को स्पष्ट करे। इस बात से शायद ही कोई इंकार करे कि आन्दोलन में सड़क पर उतरी जनता में बहुसंख्यक लोग ऐसे होंगे जिनको अन्ना के लोकपाल और सरकार के लोकपाल के मध्य का अन्तर ही ज्ञात नहीं होगा। इस आन्दोलन के द्वारा लोगों को लगा कि लोकपाल के द्वारा एक ऐसी जादू की छड़ी हाथ में आयेगी जो घूमते ही देश से भ्रष्टाचार समाप्त कर देगी।

अन्ना टीम को कम से कम यह प्रयास तो करना ही चाहिए कि वह जनता से सीधे-सीधे जुड़े। आज भी मीडिया के बीच ही जिन्दा रह गये इस आन्दोलन को छोटे-छोटे शहरों में, कस्बों में छोटे-छोटे से ग्रुप के रूप में जागरूक नागरिक जिन्दा रखे हुए हैं। अन्ना टीम को इन पर दृष्टिपात करने की आवश्यकता है।

इस आन्दोलन के चलते रहने के मध्य भी एकाधिक रूप से ऐसी घटनायें सामने आईं जिनसे स्पष्ट हुआ था कि आन्दोलन से जुड़े लोग भी किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार में लिप्त रहे। कम से कम एक प्रयास इस तरह का होना चाहिए कि सिवाय यह कहते रहने से कि लोकपाल बिल आयेगा और भ्रष्टाचार जायेगालोगों के बीच भ्रष्टाचारियों को उजागर करके जनता के बीच लाना होगा। इस ओर विशेष प्रयास इसलिए भी करना मुख्य होगा क्योंकि चुनावों में मतदान के समय व्यक्ति सब कुछ भूल कर अपनी पसंदीदा पार्टी को, अपनी जाति-धर्म के व्यक्ति को वोट देना पसंद करता है। यदि आन्दोलन के बाद भी इन चुनावों में यही होता है तो निश्चय ही यह अन्ना आन्दोलन की हार कही जायेगी। लोगों को जागरूक करने का कार्य आज भी अन्ना टीम से जुड़े सदस्यों से इतर लोग करने में लगे हैं, अन्ना टीम को, उनकी सहयोगी इंडिया अगेंस्ट करप्शन के सदस्यों को इनसे सम्पर्क करके इनका सहयोग करना होगा, इनका सहयोग लेना होगा।

वर्तमान में चुनावों के पूर्व ही जिस तरह से धन की पकड़ हो रही है और अभी तक करोड़ो की धनराशि को पकड़ा गया है उससे स्पष्ट है कि इन चुनावों में भ्रष्टाचार अपने चरम पर देखने को मिलेगा। ऐसे में स्थानीय लोगों से मिलकर अन्ना आन्दोलन समर्थक लोगों को इस बात के लिए भी जागरूकता प्रयास करने होंगे कि लोग जाति-धर्म आदि के बहकावे में न आयें और न ही किसी तरह के धनबल के लालच में, दबाव में।

यह स्पष्ट है कि आन्दोलन को आगे भी सफलता के नये मुकाम पर ले जाने के लिए अन्ना और उनकी टीम को जनता से सीधे संवाद की आवश्यकता है।



जनपद जालौन की कोंच विधानसभा - पहले विधायक से अंतिम विधायक तक की सूची

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जनपद जालौन में 2007 के आम चुनाव तक कुल चार विधानसभा सीटें थीं. उरई, कोंच, कालपी, माधौगड़.....इस बार के परिसीमन में एक सीट-कोंच- को समाप्त कर दिया गया. 2012 के आम चुनाव में जनपद जालौन में केवल तीन सीटों उरई, कालपी, माधौगड़ पर ही चुनाव होगा।


एक नज़र पहले आम चुनाव वर्ष 1952 से पन्द्रहवें आम चुनाव 2007 तक के कोंच विधानसभा के विधायकों की सूची..

क्र0सं0

वर्ष

विधायक का नाम

दल

1

1952

चित्तर सिंह

कांग्रेस

2

1957

चित्तर सिंह

कांग्रेस

3

1962

विजय सिंह

स्वतन्त्र पार्टी

4

1967

बसंतलाल

कांग्रेस

5

1969

बसंतलाल

कांग्रेस

6

1974

मलखान सिंह

जनसंघ

7

1977

कौशल किशोर

जनता पार्टी

8

1981

रामप्रसाद अहिरवार

कांग्रेस

9

1985

चौ0 श्यामलाल

कांग्रेस

10

1989

चैनसुख भारती

बसपा

11

1991

भानुप्रताप वर्मा

भाजपा

12

1993

चैनसुख भारती

बसपा

13

1996

दयाशंकर वर्मा

निर्दलीय

14

2002

दयाशंकर वर्मा

भाजपा

15

2007

अजय सिंह पंकज

बसपा