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21 April 2017

ट्वीट से उपजा अज़ान-लाउडस्पीकर विवाद

लोग एक बार फिर मुद्दे से भटक कर उसे धर्म, मजहब की चौखट पर खींच लाये. गायक सोनू निगम ने एक बहुत सामान्य सी बात के सन्दर्भ में चार ट्वीट किये और बस उनके मूल को समझे बिना विवाद शुरू हो गया. विवाद करने वालों को लगा कि उनके ट्वीट का मूल अज़ान को बंद करवाना है जबकि वे उसका निहितार्थ भुला बैठे. यदि सोनू निगम के चारों ट्वीट को पढ़ा जाये तो सहजता से पता चलता है कि उसमें उनका मूल भाव लाउडस्पीकर के उपयोग पर है न कि अज़ान पर. अब ये और बात है कि सोनू निगम के विरोध में आने वाले बस अज़ान को ही देख रहे हैं. इस विवाद के साथ एक और बात हुई और वो अत्यंत हास्यास्पद रही. सोनू निगम के ट्वीट के विरोध में एक मौलवी सामने आये और सोनू निगम का सिर मूंडने के बदले दस लाख रुपये देने का फतवा जारी कर बैठे. उनके फतवा लाते ही सोनू ने अगले दिन अपना सिर मुंडवा लिया. अब लोग सोनू निगम के समर्थन में आते हुए मौलवी के पीछे पड़ गए. इस आगा-पीछा पड़ने में मूल भावना कहीं गुम हो गई. इस पूरे विवाद में मुद्दा न तो ट्वीट था, न अज़ान, न ही फतवा बल्कि मूल मुद्दा था धार्मिक कृत्यों में लाउडस्पीकर का उपयोग होना. सोनू निगम ने ट्वीट के द्वारा अपनी परेशानी बताई या फिर अपनी लोकप्रियता की राह को और साफ़ किया ये वही जानें किन्तु उससे एक मुद्दा निकला कि धार्मिक कृत्यों में लाउडस्पीकर का इस्तेमाल हो या न हो. जो लोग भी अपने-अपने स्तर में इस चर्चा में सहभागी बने वे इससे भटक कर हिन्दू, मुस्लिम में विभक्त हो गए. 





देखा जाये तो विगत कुछ वर्षों से समाज दो भागों में बंट गया है. एक हिन्दू और दूसरा गैर-हिन्दू. यहाँ भी कुछ ऐसा ही हुआ. सोनू निगम के चार ट्वीट में यदि पहले ट्वीट में अजान शब्द आया है तो तीसरे शब्द में मंदिर, गुरुद्वारा शब्दों का भी प्रयोग किया गया है. इसके बाद भी बवाल पैदा करने में अज़ान-प्रेमी ही सामने आये हैं. इसमें मुस्लिम और गैर-मुस्लिम दोनों तरफ के लोग हैं. वैसे सोचने की बात बस इतनी है कि आखिर मुस्लिम समुदाय को इस पर आपत्ति क्या है कि उनकी मजहबी क्रिया में लाउडस्पीकर का उपयोग न होने का ट्वीट आ गया? कहीं उनको ये तो नहीं लग रहा कि ट्वीट के बहाने सरकार उनकी मजहबी क्रिया में उपयोग होने वाले लाउडस्पीकर को प्रतिबंधित तो करने जा रही है? वैसे समाज में यदि हिन्दू-मुस्लिम समुदाय के धार्मिक कृत्यों में लाउडस्पीकर के उपयोग पर गौर किया जाये तो मंदिरों में लाउडस्पीकर का उपयोग नियमित रूप से उतना नहीं होता है जितना कि मस्जिदों में किया जाता है. शत-प्रतिशत मस्जिदों में दिन में पाँच बार लाउडस्पीकर का उपयोग किया जाता है, इसके मुकाबले मंदिरों की संख्या कम है. हिन्दू धार्मिक कृत्यों में भागवत, रामचरित मानस का पाठ, सत्यनारायण कथा आदि के समय लाउडस्पीकर का उपयोग अवश्य किया जाता है. ऐसा भी नियमित न होकर कुछ दिन के लिए होता है. किसके द्वारा उपयोग कम हो रहा है, किसके द्वारा उपयोग कम हो रहा है, ये एक अलग मुद्दा बन सकता है किन्तु यहाँ समझने वाली बात ये है कि आखिर धार्मिक कृत्यों में लाउडस्पीकर की आवश्यकता क्यों पड़ती है? इसका उपयोग किया ही क्यों जाता है? भले ही सोनू निगम ने किसी भी अन्य मानसिकता के वशीभूत ट्वीट करके लाउडस्पीकर की समस्या को सामने रखा तो क्या उस पर आम सहमति बनाते हुए इसके प्रयोग पर प्रतिबन्ध की बात सबको नहीं करनी चाहिए थी? ऐसा कुछ न हुआ बल्कि इसके उलट हिन्दू-मुस्लिम विवाद को जन्म दे दिया गया.


बहरहाल अंतिम निष्कर्ष क्या होगा ये तो बाद की बात है मगर एक सामान्य से ट्वीट पर आक्रोशित हो जाना, फतवा जारी करना, सोनू निगम पर मुकदमा दर्ज करने की अपील, धार्मिक भावनाओं को भड़काने का आरोप लगाने जैसे कदम मुस्लिम समुदाय की आक्रामकता को ही दर्शाता है. यही आक्रामकता उनको समुदाय में सबसे कहीं अलग-थलग खड़ा कर देती है. अपने आपको मुख्यधारा से अलग न होने देने की दिशा में वे खुद ही कुछ सोचें और विचार करें. उन्हें समझना होगा कि समाज-निर्माण में फैसले लेने का आधार न तो ट्वीट होता है और न ही लाउडस्पीकर. आपसी समझ, विश्वास, स्नेह ही सबको आगे बढ़ाता है, सबकी धार्मिक भावनाओं का सम्मान करता है. 

14 April 2017

सैनिकों का मनोबल न गिरे, ध्यान रखना

किसी भी उस व्यक्ति के लिए जो देश का, सेना का, वीर जवानों का सम्मान करता है, उस हालिया वीडियो को देख कर आक्रोशित होना स्वाभाविक है जिसमें हमारे वीर सैनिकों को कश्मीरी युवकों की हरकतों को सहना पड़ रहा है. जम्मू-कश्मीर के उपचुनाव संपन्न करवाने के बाद लौटते सैनिकों के साथ कश्मीरी युवकों का व्यवहार किसी भी रूप में ऐसा नहीं है कि कहा जाये कि वे लोग सेना का सम्मान करते हैं. सैनिकों के साथ उनके दुर्व्यवहार के साथ-साथ लगते नारे समूची स्थिति को स्पष्ट करते हैं. सैनिकों के साथ हुई ये घटना उन लोगों के लिए एक सबक के तौर पर सामने आनी चाहिए जो कश्मीरी युवकों को भोला और भटका हुआ बताते नहीं थकते हैं. जिनके लिए सेना के द्वारा पैलेट गन का इस्तेमाल करना भी उनको नहीं सुहाता है. सोचने वाली बात है कि जिस सेना के पास, सैनिकों के पास देश के उपद्रवियों से लड़ने की अकूत क्षमता हो वे चंद सिरफिरे युवकों के दुर्वयवहार को चुपचाप सहन कर रहे हैं. ये निपट जलालत जैसे हालात हैं. 


जम्मू-कश्मीर का आज से नहीं वरन उसी समय से ऐसा हाल है जबकि पाकिस्तान ने अपने जन्म के बाद से ही वहाँ अपनी खुरापात करनी शुरू कर दी थी. विगत कई दशकों में जम्मू-कश्मीर में और केंद्र में सरकारों का पर्याप्त समर्थन न मिल पाने का बहाना लेकर सेना के जवानों को अपमान का घूँट पीकर रह जाना पड़ता था. वर्तमान राज्य सरकार में जब भाजपा ने गठबंधन किया तो माना जाने लगा था कि उनके द्वारा सत्ता में भागीदारी से शायद जम्मू-कश्मीर के हालातों में कुछ सुधार आयेगा. वहाँ तैनात सैनिकों के सम्मान की चर्चा की जायेगी. इधर केंद्र-राज्य दोनों जगह भाजपा की सरकार होने के बाद, लगातार पाकिस्तानी आतंकवाद को मुँहतोड़ जवाब देने के वादे के बाद तथा जम्मू-कश्मीर के बिगड़ते हालात सुधारने की बात करने के बाद भी वहाँ की स्थितियाँ सामान्य नहीं हो पाई हैं. अब जो वीडियो आया है उसे देखकर लगता नहीं कि निकट भविष्य में वहाँ के हालात सुधरने की सम्भावना है. अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों, संधियों, समझौतों के अनुसार माना कि युद्ध अनिवार्य अंग नहीं है मगर देश के अन्दर उत्पात मचाते लोगों पर नियंत्रण न करना किस कानून के अंतर्गत है? सेना पर, सैनिकों पर पत्थरबाजी करते लोगों से न निपटने के लिए कौन सा समझौता आड़े आ रहा है? वीर सैनिक अपमान का घूँट पीते रहें और कश्मीरी युवक मानवाधिकार की हनक के चलते साफ़-साफ़ बच निकलें ऐसा किस नियम में लिखा हुआ है? 

सैनिकों के साथ हुए दुर्व्यवहार के वीडियो ने समूचे देश को आक्रोशित कर दिया है. इससे बस वे ही लोग बचे हैं जो किसी आतंकी की फाँसी के लिए देर रात अदालत का दरवाजा खुलवा सकते हैं. वे ही आक्रोशित नहीं हैं जो पत्थरबाज़ी करते युवकों, महिलाओं, बच्चों को भटका हुआ बताते हैं. उनके ऊपर इस वीडियो का कोई असर नहीं हुआ जो सेना को बलात्कारी बताते हैं. बहरहाल, किस पर इस वीडियो का असर हुआ, किस पर असर नहीं हुआ ये आज मंथन करने का विषय नहीं है. अब सरकार को इस वीडियो का स्वतः संज्ञान लेते हुए उसी वीडियो के आधार पर सम्बंधित युवकों पर कठोर कार्यवाही करे. इसके अलावा सेना को कम से कम इतनी छूट तो अवश्य दी जानी चाहिए कि वे अपने ऊपर होने वाले इस तरह के हमलों का, पत्थरबाज़ी का तो जवाब दे ही सकें. मानवाधिकार का सवाल वहाँ खड़ा होना चाहिए जबकि वे जबरिया किसी व्यक्ति को परेशान करने में लगे हों. यदि एक सैनिक अपने सम्मान की रक्षा नहीं कर पा रहा है तो वो पल उसके लिए बहुत ही कष्टकारी होता है. ऐसी घटनाओं पर सरकारों का शांत रह जाना, सम्बंधित अधिकारियों द्वारा कोई कार्यवाही न करना सैनिकों के मनोबल को गिराता है. यहाँ सरकार को ध्यान रखना होगा कि किसी भी तरह से सेना का, सैनिकों का मनोबल न गिरने पाए. यदि सेना का मनोबल गिरता है तो वह देश के हित में कतई नहीं होगा. देश के अन्दर बैठे फिरकापरस्त और देश के बाहर बैठे आतातायी चाहते भी यही हैं कि हमारी सेना का, सैनिकों का मनोबल गिरे और वे अपने कुख्यात इरादों को देश में अंजाम दे सकें. देश की रक्षा के लिए, किसी राज्य की शांति के लिए, नागरिकों की सुरक्षा के लिए सरकारों को पहले सेना के, सैनिकों के सम्मान की रक्षा करनी होगी. कश्मीरी युवक, भले ही लाख गुमराह हो गए हों, मासूम हों, भटक गए हों मगर ऐसी हरकतों के लिए उनके पागलपन को कठोर दंड के द्वारा ही सुधारा जाना चाहिए. यदि इस तरह की घटनाओं के बाद सम्बंधित पक्ष पर किसी तरह की कार्यवाही नहीं होती है तो उनके नापाक मंसूबे और विकसित होंगे और वे सेना के लिए ही संकट पैदा करेंगे. समझना होगा कि यदि हमारी सेना, वीर सैनिक संकट में आते हैं तो देश स्वतः संकट में आ जायेगा. देश को बचाने के लिए आज ही सेना को, सैनिकों को ससम्मान बचाना होगा. ऐसी घटनाओं से निपटने को सम्पूर्ण अधिकार देना होगा.   

08 April 2017

वर्तमान के साये में अतीत की यात्रा

जिंदगी कई बार बहुत लम्बी लगती है तो कभी बहुत छोटी सी. इसी तरह समय कई बार काटे नहीं कटता और कई बार रोके नहीं रुकता. कुछ ऐसा ही एहसास हुआ आज जबकि चौबीस साल पुराने समय को फिर से आज में उतार लाने की कोशिश की गई. तीन वर्ष की बेहतरीन ज़िन्दगी को कुछ घंटों में जीने की कोशिश की गई. यदि कहा जाये कि किसी अदृश्य टाइम मशीन के द्वारा अतीत को वर्तमान में खड़ा करने का प्रयास किया गया या फिर वर्तमान को उसी अतीत में पहुँचा दिया गया तो अतिश्योक्ति न होगी. सोशल नेटवर्किंग के जरिये एक-एक करके इधर-उधर बिखरे रत्नों को, मोतियों को समेटा-सहेजा जाने लगा. उन सभी को एक-एक करके फिर से खोजा जाने लगा जो समाज में जिंदगी की आपाधापी में कहीं खो गए थे. या कहें कि हमारे आसपास होते हुए भी हमें दिखाई नहीं दे रहे थे क्योंकि हम सभी अपने-अपने परिवार, अपने-अपने रोजगार, अपने-अपने कार्यों में उलझे हुए थे. एक-एक को जोड़ते हुए फिर वही संसार बनाने की एक पहल की गई. किन्तु-परन्तु के बीच पहल की उड़ान शुरू हुई. 





हॉस्टल की वो दुनिया अपने आपमें अद्भुत ही कही जाएगी, जहाँ कोई चिंता नहीं, कोई फिकर नहीं, कोई जिम्मेवारी नहीं, कोई बोझ नहीं बस मस्ती ही मस्ती, हुडदंग ही हुडदंग. हॉस्टल से निकल कर अपने-अपने संसार में सिमटे-लिपटे लोगों के मन में लगातार रहा कि क्या कभी अपने पुराने साथियों से मिलना हो पायेगा? क्या उन साथियों के साथ फिर वही मस्ती भरी हरकतें, शरारतें की जा सकेंगी जो उन कभी हुआ करती थी? और भी सवाल उपजते फिर आपाधापी में खो जाते. जिस भविष्य की कभी चिंता नहीं की उसी भविष्य के संवर जाने के बाद भी सवालों के घेरे साथ चलते. आखिर भावनात्मकता कब तक सवालों के बोझ को सहती? कब तक अपने अत्यंत प्रिय साथियों से बिछड़कर दूर रहती. किसी समय में तकनीक से दूर साथियों ने अपने-अपने डायरी के पन्ने अपने-अपने साथियों के पते-ठिकानों से सजाये थे. उन पते-ठिकानों का लगातार बदलना जारी रहा. शुरुआती पत्र-व्यवहार और गर्मजोशी समय के साथ परिवर्तित होती रही. इस परिवर्तन का असर ये हुआ कि सब अपने में सिमट गए. कुछ मिलते रहे, कुछ और दूर होते चले गए. 





और फिर अंततः वह दिन आ ही गया जिसका सभी को उस दिन से इंतज़ार थाजिस दिन सभी से दूर हुए थे. हॉस्टल के दिनों को हॉस्टल के साथियों ने फिर से जिंदा कर दिया. जिंदगी की आपाधापी में अपने से भी दूर हो गए लोगों को फिर सबसे जोड़ा गया. इस बार वे जुड़े मगर अकेले नहीं. अबकी उनके साथ समूचे हॉस्टल से जुड़ा उनका परिवार भी, उनकी जीवनसाथी भी, उनके बच्चे भी. एक-एक से मिलते-मिलते, सूत्र बटोरते-समेटते सब फिर सामने नजर आने लगे. तकनीक ने सबको जोड़ने में सहयोग दिया. मिलन की उत्कंठा ने सबको और प्रेरित किया. भावनात्मकता का ज्वार उमड़ने लगा. देखते-देखते वह दिन आ ही गया जबकि सबकी सहमति से सबने आपस में अतीत में जाने का, अतीत को वर्तमान में लाने का निश्चय किया. सम्मिलन केंद्र बना वही स्थान जो कि किसी समय हम सभी की कर्मभूमि हुआ करता था. हम सभी के कदमों से जहाँ हलचल मचा करती थी. हम सभी के कार्यों से जहाँ विचलन हुआ करता था. अबकी हम सब अकेले न थे बल्कि साथ में थे वे लोग जो वर्षों से हम सभी की हॉस्टल की कहानियाँ सुनते आ रहे थे. वे साथ थे जो वर्षों से तत्कालीन फोटो देख-देखकर उस अतीत को वर्तमान की निगाहों से देखना चाहते थे. अपने-अपने जीवनसाथी, बच्चों के साथ सबने पूरी आत्मीयता से अपनी उपस्थिति को दर्शाया. 



सम्मिलन के निश्चय से पहले के किन्तु-परन्तु सभी साथियों की सक्रियता, उत्साह, मिलन की तीव्रता देखकर धराशाही हो गए. गले मिलते लोग, उसी बेलौस अंदाज़ में हँसते-बोलते-बतियाते मित्र, फिर से न बिछड़ने देने की नीयत से बारम्बार बाँहों में जकड़ने का अपनापन. सभी के बच्चे, जीवनसाथी बस मुँह खोले आत्मीयता का, अपनेपन का चरम देख रहे थे. शायद उन लोगों ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि डेढ़-डेढ़, दो-दो दशकों के बाद मिलते लोग, कुछ परिचित, कुछ अपरिचित चेहरों से मिलते लोग इतनी आत्मीयता दिखायेंगे. भावनात्मकता, अपनत्व के चरम से सराबोर होकर एक दूसरे को सराबोर करते हुए समूचे माहौल को रसमय बना देंगे. सन 1975 से शुरू हॉस्टल यात्रा को कतिपय कारणोंवश विराम लगा सन 2003 में पर तब तक गंगा-जमुना में बहुत सारा पानी बह गया था. काल की धार में बहते रत्न फिर मिले. बहुत से पुराने अनमोल मोतियों ने अपनी उपस्थिति दिखाते हुए अपना उत्साह दिखाया. आश्चर्य लगा कि वर्ष 1988 से लेकर वर्ष 2003 तक के बैच के बहुतायत मित्र सपरिवार समूचे सम्मिलन समारोह में पूरी आत्मीयता, अपनत्व बरसाते रहे. इससे भी अधिक आश्चर्य की बात ये रही कि हॉस्टल के उन बिंदास, बेलौस, बेफिक्र मित्रों से पहली बार मिलते अन्य परिजनों में भी गज़ब का उत्साह था. सबके मन में हॉस्टल देखने की हार्दिक इच्छा, अपने जीवनसाथी के अन्य दूसरे मित्रों के बारे में, उनके परिजनों से मिलने की उत्कंठा दिखी. 



हँसी-मजाक, हुल्लड़ करते समय कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला. एकबारगी किसी का ध्यान अपने मोबाइल की तरफ नहीं गया. पूरे दिन लोगों के अपडेट सोशल नेटवर्किंग में देखने को नहीं मिले. ऐसा लग रहा था जैसे लोग वर्तमान में नहीं वरन अतीत की यात्रा कर रहे हों. जर्जर खड़ी बुलंद इमारत को फिर से जिंदाकर अपने उन्हीं दिनों में खो गए हों. उन दिनों की यादें, उस समय के किस्से, सबकी मासूम सी गोपनीयता को उन्हीं के परिजनों के सामने खोलते, लगा ही नहीं कि सदन में उपस्थित कोई भी व्यक्ति वर्तमान में है. हॉस्टल के तत्कालीन नारे, तत्कालीन जयघोष, वैसी ही शरारतें कुल मिलाकर सबको उसी कालखंड में ले गई थीं जहाँ कि वे कभी रहा करते थे. सूरज के उगने से शुरू हुआ मस्ती भरा दिन कब शाम में बदल गया पता ही नहीं चला. शाम के गहराने के साथ शुरू हुआ फिर से उसी वर्तमान में जाने का क्रम जहाँ जिम्मेवारियाँ हैं, दायित्व हैं, कर्तव्यबोध है. फिर शुरू हुआ वही दशकों पुराना क्रम. गले मिलते, हँसते, आँखों को गीला करते और फिर अपनी राह चलते. दशकों पहले के और अब के समय में एक अंतर दिखा. तक के डायरी-पेन से इतर इस बार तकनीक साथ थी. अगली बार मिलने का निश्चय साथ था. इस वादे के साथ कि हर वर्ष सबका मिलना निश्चित है, हम सभी अतीत की कुछ घंटों की यात्रा के बाद वर्तमान में लौट आये.  

04 April 2017

बिना प्रोत्साहन कैशलेस व्यवस्था संभव नहीं

नोटबंदी के बाद सरकार लगातार कैशलेस अर्थव्यवस्था की तरफ ध्यान दे रही है. जनता को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है कि वह अधिक से अधिक लेन-देन डिजिटल माध्यम से करे. इसी कारण से सरकार की तरफ से नकद लेन-देन को हतोत्साहित करने के लिए दो लाख रुपये से अधिक के नकद लेन-देन पर प्रतिबन्ध लगा दिया है. इसका उद्देश्य जहाँ एक तरफ बैंकों में भीड़ को कम करना है वहीं दूसरी ओर इसके द्वारा काला धन, नकली मुद्रा, भ्रष्टाचार को कम करना या रोकना भी है. यह सच है कि यदि समाज में अधिक से अधिक लेन-देन नकदी के स्थान पर डिजिटल माध्यम से होने लगे, इंटरनेट बैंकिंग, क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, एटीएम आदि का उपयोग अधिक से अधिक होने लगे तो काले धन को, नकली मुद्रा को नियंत्रण में रख पाना सहज हो जायेगा. नोटबंदी के पहले तक जिस तरह से लोगों में नकद लेन-देन के प्रति एक प्रकार का मोह देखने को मिलता था, वो अभी भी दूर नहीं हुआ है. क्रेडिट कार्ड अथवा इंटरनेट बैंकिंग के प्रति अभी भी उतनी जागरूकता नहीं आई है, जितनी की अपेक्षित थी. इसके पीछे एक ओर तो समाज की बहुसंख्यक जनता का डिजिटल माध्यमों के साथ दोस्ताना सम्बन्ध विकसित न कर पाना है. इसके साथ ही साथ सरकारी स्तर पर डिजिटल विनिमय को बढ़ावा देने के लिए भी प्रोत्साहन योजनाओं की जबरदस्त कमी देखने को मिल रही है. इसके उलट सार्वजनिक क्षेत्र के अग्रणी बैंक भारतीय स्टेट बैंक द्वारा नकद जमा-निकासी पर, एटीएम के उपयोग पर अपना ही नया नियम लागू कर दिया गया है. इससे आमजन के नकारात्मक रूप से प्रभावित होने की आशंका बढ़ी है. 


सरकार के साथ-साथ बैंक भी चाहती हैं कि उनके पास कम से कम भीड़ पहुँचे और इसके लिए उनके द्वारा समय-समय पर इस तरह की योजनायें लागू की जाती हैं जो जनता को घर बैठे सुविधाएँ मुहैया कराती हैं. इधर भारतीय स्टेट बैंक द्वारा तीन बार नकद जमा के बाद जमा पर शुल्क लगा दिया है. ये शुल्क नाममात्र को नहीं वरन इतना है कि आम खाताधारक की जेब पर असर डालेगा. यहाँ यदि सरकार का अथवा बैंक का ये विचार हो कि लोगों की नकद जमा-निकासी की सीमा बनाकर उनको डिजिटल विनिमय के लिए प्रोत्साहित किया जा सकेगा तो ऐसा सोचना उसकी भूल है. ऐसा उनके लिए तो सहज हो सकता है जो वेतनभोगी हैं किन्तु उनके लिए कतई सहज नहीं है जिनको महीने भर फुटकर-फुटकर धन मिलता रहता है. ऐसे में ये लोग अपने धन को बैंक में जमा करने के स्थान पर अपने पास ही संग्रहित करके रखना शुरू कर देंगे. ये स्थिति जहाँ एक तरफ डिजिटल विनिमय माध्यम को हतोत्साहित करेगी वहीं दूसरी तरफ धन-संचय की प्रवृत्ति को बढ़ावा देकर मुद्रा को चलन से दूर करेगी. इसके अलावा खाते में न्यूनतम मासिक जमाराशि को लेकर भी भारतीय स्टेट बैंक द्वारा बनाया गया नियम गले से नीचे न उतरने वाला है. चाहे मेट्रो शहर हों अथवा ग्रामीण इलाके, सभी में आमजन की स्थिति ये है कि उसके लिए एक-एक रुपये का महत्त्व होता है. ये देखने में भले ही न्यूनतम राशि समझ आ रही हो किन्तु उनके लिए बहुत बड़ी धनराशि है जिनके पास धनोपार्जन के न्यूनतम अथवा सीमित साधन हैं. ऐसे में न्यूनतम मासिक जमाराशि रखना उनकी मजबूरी हो जाएगी. इस मजबूरी के चलते उनका पारिवारिक बजट गड़बड़ाने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है.



यदि सरकार को अथवा बैंकों को डिजिटल माध्यम को प्रोत्साहित करना है तो उन्हें आमजन को कुछ लाभ देने होंगे. डिजिटल लेन-देन को विकसित करने के लिए सरकार को चाहिए कि क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड आदि से भुगतान करने पर न्यूनतम टैक्स लेने की व्यवस्था समाप्त की जाये. इससे सामान्य उपभोक्ता बड़ी रकम को कार्ड के माध्यम से भुगतान करने से बचता है. इसी तरह इंटरनेट बैंकिंग में भी भुगतान करने पर टैक्स लगाया जाता है. इससे भी उपभोक्ता के अन्दर हिचकिचाहट पैदा होती है. इसके अलावा तकनीकी रूप से अभी इंटरनेट सेवाएँ अभी इतनी उन्नत और सशक्त नहीं हो सकी हैं कि आमजन आर्थिक लेन-देन के लिए इस प्रणाली पर पूर्णरूप से विश्वास करने लगे. आये दिन होती धोखाधड़ी के चलते, एटीएम में धन के फँसने, भुगतान के समय इंटरनेट सेवा बाधित होने के चलते भी उपभोक्ता में भय का माहौल बना रहता है. इससे भी वह डिजिटल माध्यमों से भुगतान के लिए खुद को प्रेरित नहीं कर पाता है. सरकार को, उसके सहयोगी अंगों को चाहिए कि वे पहले मूलभूत सुविधाओं को उन्नत और विकसित करें. कार्ड के लेन-देन के साथ-साथ इंटरनेट बैंकिंग में लगने वाले शुल्क को समाप्त करें. डिजिटल माध्यम से भुगतान करने वालों को किसी तरह से लाभान्वित करें. भारतीय स्टेट बैंक द्वारा लागू किये गए हालिया नियमों को जनहित में, कैशलेस व्यवस्था के हित में तत्काल प्रभाव से रद्द करें. यदि सरकार इस तरह के कदम नहीं उठाती है, जिससे आम उपभोक्ता स्वयं को लाभान्वित महसूस करे, सुरक्षित महसूस करे तब तक डिजिटल माध्यमों को, कैशलेस व्यवस्था को पूर्णरूप से लागू कर पाना दूर की कौड़ी समझ आती है. 

30 March 2017

पहली हवाई-यात्रा से पहुँचे पोर्ट ब्लेयर : अंडमान-निकोबार यात्रा

कोई काम पहली बार किया जा रहा हो तो उसमें उत्साह, उमंग, रोमांच जैसी अनुभूति होती है. कुछ ऐसा ही हमारे साथ हो रहा था. पहली बार अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की यात्रा और पहली बार ही हवाई-यात्रा करने का अवसर हाथ आने वाला था. टिकट की बुकिंग से लेकर उसकी अन्य औपचारिकताओं के बारे में समुचित जानकारी इकठ्ठा कर मारी थी. कई वर्षों की हाँ-ना के बाद अंडमान-निकोबार जाने का कार्यक्रम बन पाया था, सो उसमें कोई अड़ंगा नहीं चाह रहे थे, किसी भी तरह का. इधर कुछ वर्षों से हमारी यात्राओं के साथ एक अजीब सा संयोग जुड़ता रहा है. कहीं भी जाने का कार्यक्रम बनाया तो उसमें किसी न किसी तरह का व्यवधान आ गया. दो बार जम्मू-कश्मीर का प्रोग्राम बनाया तो वहाँ बाढ़ के चलते नहीं जा पाए. नेपाल जाने का फ़ाइनल हो गया था तो वहाँ भूकंप ने तबाही मचा दी. इसी तरह एक साल अपनी छोटी बहिन दिव्या के पास जाने को बड़ोदा के लिए ट्रेन में बैठ भी गए तो बीच रास्ते उतरना पड़ा, वहाँ चालू हो गए हार्दिक पटेल के उत्पात के कारण. हाल ही में पहली बार अंडमान-निकोबार की यात्रा जब प्लान कर रहे थे तो उस समय भी अड़ंगा लगने जैसा माहौल बन गया था. समाचारों से पता चला कि हैवलॉक में तूफ़ान आने से बहुत सारे लोग वहाँ फँस गए हैं. तब उस कार्यक्रम को आगे बढ़ाना पड़ा. इस बार यात्रा फ़ाइनल हो गई थी. चुनावी मौसम होने के कारण बसों का चलना लगभग बंद सा था, सो झाँसी से ट्रेन पकड़ने की सुविधा के लिए कार बुक कर ली थी. इस यात्रा के लिए आरंभिक अड़ंगे रात में ही लगते दिखे, जब सोते समय अचानक गर्दन की नस खिंच गई और उसका हिलना-डुलना बंद सा हो गया. लगभग एक घंटे की मालिश, कसरत, मशक्कत के बाद गर्दन नार्मल हुई. दूसरा अड़ंगा लगता सुबह समझ आया जबकि कार ड्राईवर ने फोन पर बताया कि उसकी कार चुनाव ड्यूटी के लिए पुलिस प्रशासन ने पकड़ ली है. कोई घंटे भर बाद उसी ने अपने परिचित की निजी कार की व्यवस्था करवाई और हम लोग झाँसी के लिए निकल सके.


पहली हवाई-यात्रा का रोमांच तो हम तीनों लोगों को महसूस हो रहा था क्योंकि हम तीनों (हमारी, पत्नी निशा और बेटी परी) की ये पहली हवाई-यात्रा थी. सामान का वजन, सारे आवश्यक कागजात, पहचान-पत्र आदि सँभालकर झाँसी से दिल्ली पहुँचे. घर वालों के लिए देर रात दिल्ली उतरना चिंता का कारण बना हुआ था. इस कारण नॉएडा में रह रही छोटी बहिन रिमझिम और लखनऊ में रह रहा छोटा भाई हर्षेन्द्र फोन से लगातार संपर्क में रहे. रिमझिम ट्रेन यात्रा से ही उबेर कैब बुक करने, फिर टैक्सी से एअरपोर्ट रूट, टैक्सी किराये आदि की जानकारी देती रही. दिल्ली में कैब सम्बन्धी आरंभिक अड़ंगे से निपटते हुए देर रात लगभग दो बजे एअरपोर्ट पहुँच गए. फ्लाइट सुबह सवा सात बजे थी जिस कारण एअरपोर्ट पर सुरक्षा, चेक-इन, बोर्डिंग पास आदि औपचारिकतायें सुबह पाँच बजे के आसपास से शुरू हो जानी थी. जरा से आराम के चक्कर में सोते रह जाने के अनजान डर के कारण होटल में रुकने के बजाय एअरपोर्ट पर रुकना ज्यादा सही लगा. वहाँ पहुँचकर लाउन्ज में पड़ी तमाम कुर्सियों में से अपनी मनपसंद जगह छाँटकर उन्हीं पर पसर लिए.


सोना तो हुआ नहीं पर आराम जैसा कुछ हो गया था. बिटिया रानी भी नई जगह के उत्साह में कभी इधर-उधर टहलने लगती, कभी लेट जाती. समय होते ही हम लोग आवश्यक औपचारिकताओं को निपटाने में लग गए. सुरक्षा जाँच के समय कृत्रिम पैर के चलते अधिकारी ने हमें अलग रूम में ले जाकर जाँच की अनुमति अपने अधिकारी से माँगी. कृत्रिम पैर को अलग स्कैन मशीन से जाँचने के बाद संतुष्ट अधिकारी ने अन्दर जाने की अनुमति दे दी. उसी अधिकारी से जब हमने फोटोग्राफी करने सम्बन्धी जानकारी चाही तो उसने हँसते हुए जवाब दिया कि आप हमारी सुरक्षा व्यवस्था को छोड़कर कहीं भी फोटोग्राफी कर सकते हैं. गेट नंबर 49 से टाटा विस्तारा की फ्लाइट हम लोगों को पकड़नी थी. वहाँ बने मार्गदर्शक चिन्हों के सहारे आगे बढ़ते चले. उस समय आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता और गर्वानुभूति हुई जब अन्दर सूर्य नमस्कार मुद्राओं को दर्शाता स्मारक दिखाई दिया. सुबह की पहली किरण फूट कर बाहर उजियारा करने वाली थी और अन्दर हम लोग सूर्य नमस्कार मुद्राओं के साथ फोटोग्राफी करते हुए आलोकित हो रहे थे. गेट तक पहुँचने के लिए जगह-जगह मोबाइल प्लेटफ़ॉर्म बने हुए थे, जिन पर बिटियारानी उछल-कूद करते हुए, मस्ती करती चली जा रही थी. 



निश्चित समय पर संकेत होते ही हम लोग प्लेन में सवार हुए. क्रू मेम्बर्स के द्वारा स्वागत, समय-समय पर आवश्यक खाद्य-पदार्थों का वितरण, फ्लाइट सम्बन्धी अन्य जानकारियों का दिया जाना आदि सबकुछ व्यवस्थित, नियंत्रित सा संचालित हो रहा था. खिड़की के बाहर बादलों का रुई के फाहों की तरह कभी साथ-साथ उड़ना, कभी प्लेन के नीचे आ जाना, कभी एकदम साफ़ आसमान अद्भुत अनुभव का एहसास करा रहा था. दिल्ली से पोर्ट ब्लेयर को चली फ्लाइट को कोलकाता में थोड़ी देर रुकना था. प्लेन के उतरने के पूर्व कोलकाता की बड़ी-बड़ी ऊंची इमारतों का खिलौनों के जैसे दिखना, सड़कों, नदी आदि का किसी मानचित्र सा दिखाई देना आँखों को लुभा रहा था. कोलकाता एअरपोर्ट का नाम नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के नाम पर है. वहाँ लगे बड़े से बोर्ड पर चमकते वास्तविक नेता का नाम देखकर मन ही मन नेताजी को नमन किया. लगभग चालीस मिनट रुकने के बाद हम लोगों को लेकर प्लेन दोबारा उड़ चला. 







पोर्ट ब्लेयर उतरने के लगभग बीस-पच्चीस मिनट पहले क्रू मेम्बर्स की तरफ से ख़राब मौसम होने के संकेत देते हुए सीट बेल्ट बाँधने के निर्देश दिए गए. सामान्य स्थिति में बना हुआ प्लेन हलके-हलके से हिचकोले खाता हुआ समझ आया. उस समय प्लेन घनघोर बादलों के बीच से गुजर रहा था. आसमान में उड़ते बादलों को खिड़की के एकदम करीब महसूस करना अद्भुत था. अंडमान-निकोबार की सीमा में घुसते ही खिड़की से टापुओं की हरियाली, समुद्र का नीला-हरा रंग आँखों को आकर्षित कर रहा था. धीरे-धीरे प्लेन ने उतरना शुरू किया. बस्ती नजर आ रही थी. पोर्ट ब्लेयर की नैसर्गिक सुन्दरता अपना बखान खुद कर रही थी. लगभग साढ़े बारह बजे दोपहर में जब पोर्ट ब्लेयर में कदम रखा तो सबसे पहले उस वीर पुरुष को नमन किया जिसके नाम से पोर्ट ब्लेयर के एअरपोर्ट का नामकरण किया गया है; जिसके नाम से सेलुलर जेल के अंग्रेज अधिकारी तक भयभीत रहते थे; जिसको भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन में दो बार काला पानी की सजा सुनाई गई थी. जी हाँ, वीर सावरकर (विनायक दामोदरदास सावरकर) को प्रणाम करते हुए हम लोग एअरपोर्ट के बाहर जाने वाले गेट पर आ पहुँचे.




 छोटा भाई नीरज, बिटिया आशी के साथ प्रसन्नचित्त मुद्रा में पहले से ही मौजूद था. एअरपोर्ट पर मोबाइल ऑन करते ही सबसे पहले उसके वहाँ आ जाने सम्बन्धी कॉल मिल गई थी. छह घंटे प्लेन की (दिल्ली से पोर्ट ब्लेयर), लगभग छह घंटे ट्रेन की (झाँसी से दिल्ली), दो घंटे कार की (उरई से झाँसी) की यात्रा के साथ-साथ लगभग ढाई घंटे झाँसी रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के इंतज़ार का समय और लगभग साढ़े पाँच घंटे दिल्ली एअरपोर्ट पर रुकने का समय आदि मिलाकर लगभग बाईस घंटे की यात्रा के बाद घर पहुँचकर सुकून मिला. बहू नेहा के हाथ की बनी चाय की चुस्की संग सबके हालचाल का आदान-प्रदान करते हुए, बतियाते हुए अंडमान-निकोबार आने का वर्षों से लटका कार्यक्रम पूरा हुआ. आप लोगों को लग रहा होगा कि इतने लम्बे सफ़र के बाद भी थकान जैसी कोई बात हमने नहीं की. अरे, इतने लम्बे सफ़र की थकान को तो बिटियारानी आशी ने अपनी मीठी-मीठी, रोचक बातों से कार में ही दूर कर दिया था. 

28 March 2017

सोच यही है कि तुम अक्षम हो

गत वर्ष प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा मन की बात में विकलांगजनों के लिए दिव्यांगजन शब्द प्रयोग में लाने की बात कही गई थी. इसके समर्थन में बहुतायत लोग आये थे साथ ही साथ इसके विरोध में भी कई जगह से आवाजें उठी थी. हमने भी व्यक्तिगत रूप से पत्र के माध्यम से प्रधानमंत्री जी से निवेदन किया था कि अच्छी सोच और सार्थक मानसिकता के परिणामस्वरूप वे ऐसा विचार लाये किन्तु यदि दिव्यांग शब्द बदलने के साथ-साथ वे मानसिकता बदलाव का भी आहवान कर दें तो शायद कुछ और भला हो जाये. बहरहाल वे लगातार अपने कार्यों से नए-नए बदलावों का संकेत दे रहे हैं किन्तु उनके कार्यों से लोगों की मानसिकता में बदलाव आता दिख नहीं रहा है. उनके स्वच्छता अभियान को पूर्वाग्रह से देखते हुए विरोध भी किया गया. इसको स्वीकारते हुए कि सफाई सभी के लिए अत्यावश्यक है, अनिवार्य है लोगों का गंदगी करना लगातार जारी है. बदलाव की बयार तभी अपना असर दिखाती है जबकि उसके साथ मानसिकता में परिवर्तन आये. कुछ ऐसा ही दिव्यांग शब्द को लेकर सामने आया. प्रधानमंत्री जी के आहवान पर मीडिया ने, विभागों ने, सरकारों ने, प्रशासन ने विकलांग की जगह दिव्यांग शब्द का प्रयोग करना शुरू कर दिया. मंत्रालयों में भी दिव्यांगजन का इस्तेमाल किया जाने लगा किन्तु मानसिकता में परिवर्तन तनिक भी न दिखाई दिया.


वैसे समाज में आये दिन शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों को अलग-अलग तरह से अलग-अलग अनुभवों से गुजरना पड़ता है. कहीं उनके साथ दयाभाव जैसा बोध कराया जाता है तो कहीं उन पर एहसान किये जाने जैसी मानसिकता दिखाई देती है. इसके साथ-साथ कहीं-कहीं वे दुर्व्यवहार का शिकार भी बनते हैं. शाब्दिक रूप से हिंसा का शिकार होने के साथ-साथ वे शारीरिक हिंसा, मानसिक हिंसा का शिकार भी बनते दिख जाते हैं. इसमें कहीं से वे लोग भी पीछे नहीं हैं जो शिक्षित हैं, रोजगार में हैं, व्यवसाय में हैं. ऐसे लोग भी अपनी शारीरिक अक्षमता के चलते आये दिन भेदभाव का, नकारात्मकता का शिकार बनते हैं. समाज के रोज के ऐसे कई-कई उदाहरणों से इतर अभी हाल में ही केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान का बयान न केवल निंदनीय है बल्कि शर्मनाक भी है. उनका ये कहना कि सौ लंगड़े मिलकर भी एक पहलवान नहीं बन सकते, को वे भले ही कहावत का नाम देकर विकलांगजनों (प्रधानमंत्री के शब्दों में दिव्यांगजनों) के अपमान को कम नहीं करता है. संभव है कि ऐसे बयान के पीछे उनकी मानसिकता दिव्यांगजनों का अपमान करना अथवा तिरस्कार करने की न रही हो किन्तु ये तो स्पष्ट है कि उनकी मानसिकता में दिव्यांगजन नकारात्मक भाव लिए हुए हैं. यदि ऐसा न होता तो क्या वे ऐसा बयान देते?

देखा जाये तो रामविलास पासवान कोई साधारण अथवा सामान्यजन नहीं हैं. वे विगत कई बार के सांसद रहने के साथ-साथ विगत कई सरकारों में केन्द्रीय मंत्री के रूप में भी कार्य कर चुके हैं. विगत सरकारों की विकलांगजनों के लिए क्या भूमिका रही हो इससे अब कोई फर्क नहीं पड़ता. अब तो वे वर्तमान केंद्र सरकार में भी मंत्री हैं और सहजता से समझ रहे हैं कि विकलांगों अथवा दिव्यांगों के लिए उनकी सरकार की, उनके प्रधानमंत्री की प्राथमिकतायें क्या हैं. ऐसे में उनके द्वारा ऐसा बयान दिया जाना सिर्फ और सिर्फ उनकी मानसिकता का सूचक है. यदि दिव्यांगों के प्रति उनकी सोच सकारात्मक होती तो वे ऐसा बयान कदापि नहीं देते. उनकी सोच समकक्षों के लिए सही है, उनके प्रति सकारात्मक है तभी उन्होंने गठबंधन पर तंज कसते हुए किसी नेता का नाम नहीं लिया, किसी दल का नाम नहीं लिया. आखिर जब वे सौ लँगड़े कहकर अनजाने ही दिव्यांगजनों का मजाक बना रहे थे, तब वे उसी जगह सौ लालू, सौ राहुल, सौ अखिलेश, सौ नीतीश जैसा भी कुछ कह सकते थे. मगर ऐसा उनके द्वारा नहीं कहा गया क्योंकि उनकी सोच में वर्षों से एक ही भाव गहरे तक भरा बैठा है कि लँगड़े लोग कुछ नहीं कर सकते.


विकलांग की जगह दिव्यांग करने से बेहतर होता कि इसी मानसिकता को बदला जाता. जिसने समाज के बहुतायत वर्गों में गहराई से इस बात को बैठा दिया है कि शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता है. समाज से ऐसे उदाहरणों को सामने लाने का काम सरकार को, समाजसेवियों को, शिक्षण संस्थानों को, प्रदेश सरकारों को, जिला प्रशासन को, मीडिया को करना होगा, जिन्होंने अपनी शारीरिक कठिनाई पर विजय प्राप्त करते हुए नए-नए आयाम स्थापित किये हैं. आवश्यक नहीं कि सभी लोग मंत्री बनें, गोल्ड मैडल लायें, पर्वतों की ऊँचाई नापें. एक ऐसा व्यक्ति जो कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में दूसरे आम व्यक्तियों से शारीरिक रूप से भिन्न है यदि वो अपनी इसी कठिनाई पर विजय पाते हुए, अपनी मानसिकता को सशक्त बनाकर, आत्मविश्वास को प्रबल बनाकर दो-चार कदम भी आगे बढ़ता है तो वही समाज के लिए अनुकरणीय होना चाहिए. काश! केन्द्रीय मंत्री महोदय पासवान के बयान से सबक लेते हुए समाज के समूचे अंग जागने का काम करें, जिससे आने वाले समय में दिव्यांगजनों के लिए दिमाग में बसी नकारात्मक भावना दूर हो सके. 

22 March 2017

समुद्र का किनारा, रोशन जहाज और पार्टी : अंडमान-निकोबार यात्रा

कार से उतरते ही सबसे पहले आँखों के आगे चार पानी के जहाज सजे हुए नजर आये. एक समुद्री तट के ठीक किनारे और बाकी तीन किनारे से थोड़ा दूर. चारों ओर अँधेरा और उस अँधेरे को चीरते जहाजों की रौशनी समुद्री लहरों के साथ अजब-अजब सी आकृतियाँ बना रही थी. दिन में नीला दिखाई देने वाला विशाल समुद्र रात के अंधकार में दूर-दूर तक काला नजर आ रहा था. आँखों में सामने सजे, समुद्र के सीने पर स्थिर जहाजों की मनमोहक रौशन छवि को कैद करते हुए उस जगह के लिए बढ़े जहाँ उस रात छोटी बेटी आशी का जन्मदिन मनाया जाना था. 



सीढ़ियाँ चढ़कर जब ऊपर पहुँचे तो अद्भुत नजारा दिखाई दे रहा था. एक तरफ रंग-बिरंगे गुब्बारों, सजावटी झालरों, रंगीन रौशनी से झिलमिलाता हॉल और दूसरी तरफ विशाल लहराता समुद्र. हाथों में कैद कर लेने भर की दूरी पर समुद्री किनारा और उस पर पर कोस्टगार्ड के जहाजों की उतराती रौशनी. ठंडी-ठंडी हवा को साथ लेकर समुद्री लहरें रौशनी के साथ ऐसे भागदौड़ करने में लगी थी मानो वे भी आशी के जन्मदिन में बच्चों के साथ खेलकूद रही हों. 



कुछ समय बाद समुद्री किनारे से थोड़ा दूर स्थिर तीनों जहाजों से आसमानी आतिशबाजी के नज़ारे दिखाई देने लगे. इधर जन्मदिन पर बिटिया रानी केक काट चुकी थी और उधर तीनों जहाजों से होती आतिशबाजी ऐसा मालूम पड़ती थी जैसे इसी ख़ुशी में हो रही हो. लाल, नीले, हरे, पीले रंग खिलकर बिखरते तो पूरा समुद्र उसी रंग में सराबोर दिखाई देने लगता.  




समुद्र से मीलों दूर रहने वाले हम लोगों के लिए सामने का नजारा अद्भुत ही कहा जायेगा जबकि हमारे छोटे भाई और जन्मदिन पर आमंत्रित लोगों के लिए ऐसे नज़ारे सामान्य सी बात थी. पोर्टब्लेयर में नेवी अधिकारी होने के नाते उसका समुद्र से याराना ही कहा जायेगा. उसी ने बताया कि कोस्टगार्ड का दिन विशेष होने के कारण इन जहाजों को सजाया जाता है. संभवतः उस दिन भी कोई विशेष आयोजन हो रहा था. एक तरफ जन्मदिन के लिए सजी हुई जगह रौशनी की जगमगाहट थी तो सामने कोस्टगार्ड के जहाजों पर भी रौशनी खिल रही थी. 




एक तरफ यहाँ भी मधुर संगीत जन्मदिन के उल्लास में झूम रहा था तो दूसरी तरफ कोस्टगार्ड ऑफिस से भी संगीत की लहरियां रह-रह कर कानों में टकरा जाती थीं. छोटे भाई के दोस्तों, उसके सहयोगियों, सीनियर्स का आना शुरू हुआ. बच्चे अपनी मस्ती में मगन थे और बड़े अपनी ही मस्ती में. खुले आसमान के नीचे पार्टी अपने यौवन पर थी. नाच-गाना, जाम टकराना, हंसी-मजाक, बच्चों का उछलना-कूदना सबकुछ आनंदित करने वाला था. सेना के अनुशासन के साथ-साथ उसकी मस्ती को सुना करते थे मगर यहाँ खुद अपनी आँखों से देख भी रहे थे. छोटे भाई के सहयोगी, मित्र, उसके सीनियर्स आदि बहुत ही आत्मीयता से मिले.  अंडमान-निकोबार की यात्रा का मन कई वर्षों से था और दिल में एक ही अभिलाषा थी सेलुलर जेल दर्शन की. इस बार जब कार्यक्रम निर्धारित हुआ तो फिर उसको ऐसे बनाया कि सबके साथ आशी का जन्मदिन मनाने का अवसर निकल आये. यहाँ सबके बीच आकर, एक अद्भुत और हम लोगों के लिए दुर्लभ नज़ारे के बीच जन्मदिन का उल्लास यात्रा की एक विशेष उपलब्धि कही जा सकती है. अपने परिवार के साथ किसी भी आयोजन का अपना आनंद है और वो आनंद तब और बढ़ जाता है जबकि सबकी तरफ से भरपूर सम्मान-आदर मिले. एक पल को लगा नहीं कि हम उन सबके बीच अजनबी से हैं. सबसे पहली मुलाकात और चंद पल की मुलाकात में ही अपनापन. सबकी अपनी मस्ती, अपना ही अलग अंदाज. बहुत-बहुत मजा आया समुद्र के किनारे की उस विशेष पार्टी का. 




बड़े भाई होने का एक तरह का ये फायदा भी रहता है कि छोटे भाई के सभी मित्र भरपूर सम्मान-आदर देते हैं. यहाँ छोटे भाई के मित्र, सहयोगी तो आदर-सम्मान दे ही रहे थे, उसके बॉस भी बड़ी गर्मजोशी से मिले. उनकी आत्मीयता देखकर एहसास ही नहीं हो रहा था कि कोई बॉस जसा व्यक्तित्व बात कर रहा है. बातचीत में, व्यवहार में अत्यंत सहज, अत्यंत मधुर. अंडमान-निकोबार को बहुत अच्छे से घूमने का बारम्बार आग्रह सा करना, भले ही एक औपचारिकता सी हो किन्तु ऐसा लगा नहीं कि वे महज औपचारिकता कर रहे हैं. वापसी में मिलते हुए विदा लेना दर्शाता है कि उनको संबंधों का निर्वहन करना बखूबी आता है. रात काफी हो चली थी. लोगों के वापस जाने का क्रम भी शुरू हो गया था. अगले दिन हम लोगों को भी हैवलॉक की यात्रा पर निकलना था सो घर वापसी की मजबूरी थी. पार्टी के सुरूर को, समुद्र के नशे को, जगमगाती रौशनी की मदहोशी को अधूरे मन से अलविदा कहते हुए वापस घर जाने को कार में बैठ लिए. अब आँखों में रंगीन समुद्र, झिलमिलाती लहरें, रोशन जहाज और पार्टी की मस्ती कैद थी, जो अगली सुबह हमारे साथ हैवलॉक चलने वाली थी. 

21 March 2017

विकास की राह चलने से बदलेगी छवि

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाये जाने की आवाज़ उनके समर्थकों की तरफ से लगातार उठाये जाने के बाद भी किसी को अंदाज़ा नहीं था कि भाजपा आलाकमान उनके नाम पर अपनी स्वीकृति देगा. उनका नाम बतौर मुख्यमंत्री घोषित होना अपने आपमें चौंकाने वाला निर्णय ही कहा जायेगा. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सबका साथ, सबका विकास की नीति और सर्वहितकारी राजनीति के चलते अनुमान लगाना कठिन था कि योगी जैसे कट्टर हिंदुत्व छवि और विवादित बयान देने वाले व्यक्ति को उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी जाएगी. ऐसे समय में जबकि ठीक दो वर्ष बाद केंद्र सरकार को या कहें कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सम्पूर्ण देश के सामने लोकसभा चुनाव की परीक्षा से गुजरना है, उत्तर प्रदेश में कट्टर हिंदुत्व छवि का मुख्यमंत्री बनाया जाना अपने आपमें एक चुनौती ही कहा जायेगा. मोदी के सामने ये चुनौती इस कारण और बड़ी है क्योंकि विगत डेढ़ दशक से अयोध्या राम मंदिर मामला जिस तरह से अपनी उपस्थिति राजनैतिक और सामाजिक हलकों में बनाये हुए है उसके फिर से तेजी से उभरने की आशंका बनती दिखाई दे रही है. राम मंदिर समर्थकों में, मोदी-योगी के समर्थकों में, हिंदुत्व के पक्षधर लोगों में अब आशा की किरण का संचार हुआ है कि केंद्र और प्रदेश में भाजपा की बहुमत की सरकार होने के कारण राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ होगा. विगत कुछ दशकों में नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह से अपनी राजनैतिक कुशलता को प्रदर्शित किया है उसे देखने के बाद लगता नहीं कि यह निर्णय उन्होंने किसी दवाब में, किसी जल्दबाजी में या फिर महज हिंदुत्व अवधारणा के कारण लिया है. मोदी की राजनीति पूरी तरह से समेकित विकास की, समावेशी विकास की तरफ बढती दिखती है. ऐसे में योगी का मुख्यमंत्री बनना संकेत करता है कि वे उत्तर प्रदेश में हिंदुत्व की अवधारणा को विकास के साथ समन्वित करके आगे बढ़ना चाहते हैं. इसका कारण वर्तमान चुनावों में मतदाताओं का ध्रुवीकरण हो जाना रहा हो. 2014 के लोकसभा चुनाव रहे हों या फिर उत्तर प्रदेश के वर्तमान चुनाव, मतदाताओं का ध्रुवीकरण हुआ है. इसके चलते भाजपा को अन्य धर्मों, जातियों, वर्गों के साथ-साथ हिन्दुओं का संगठित मत प्राप्त हुआ है.


जिस तरह से विगत पंद्रह वर्षों से भाजपा प्रदेश सरकार से बाहर रही है और चक्रानुक्रम में जिस तरह से दो क्षेत्रीय दलों ने अपनी सरकार बनाकर क्षेत्रीयता, जातीयता, वर्गवाद, परिवारवाद को बढ़ावा दिया है उसने प्रदेश के विकास-क्रम को बाधित किया है. सड़कों, पार्कों, गलियारों, एक्सप्रेस वे आदि के द्वारा एक निश्चित क्षेत्र में विकास को सम्पूर्ण विकास का सूचक नहीं माना जा सकता है. प्रदेश का सर्वांगीण विकास करने का दावा करने वाली सरकार ने पूर्वांचल की तरफ, बुन्देलखण्ड की तरफ उस दृष्टि से नहीं देखा जिस विकास दृष्टि से वे अपने-अपने क्षेत्र को देखती रही हैं. अब जबकि योगी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले चुके हैं तब उन्हें और उनके मंत्रिमंडल को ये समझना होगा कि उनके पास मात्र दो वर्ष का ही समय है. योगी के सामने ये चुनौती रहेगी कि इन्हीं दो वर्षों में प्रदेश के विकास का एक मॉडल मतदाताओं के सामने रखना होगा.

वर्तमान विधानसभा चुनाव में जनता ने मोदी की विकासछवि को देखते हुए प्रचंड बहुमत प्रदान किया. इस बहुमत में न केवल हिन्दू मतदाता शामिल था वरन अल्पसंख्यकों विशेष रूप से मुसलमानों का भी मत शामिल है. ऐसे में योगी के सामने मुस्लिम समुदाय के भीतर जबरिया भर दिए गए भय को दूर करना भी एक चुनौती है. देश-प्रदेश की राजनीति में विगत कई दशकों से मुसलमानों को जिस तरह से वोट-बैंक के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है, उनको हिंदुत्व का भय दिखाकर ध्रुवीकरण किया जाता रहा है, सुविधाओं-सब्सिडी के नाम पर जिस तरह से वरीयता दी जाती रही है, राजनैतिक लाभ के लिए जिस तरह से उनका तुष्टिकरण किया जाता रहा है उसने भी मुस्लिम समुदाय की दृष्टि में भाजपा को, योगी को अछूत बना रखा है. उनके प्रति एक तरह का भय जगा रखा है.


आज जिस तरह का वातावरण योगी को लेकर बनाया जा रहा है ठीक वैसा ही वातावरण लोकसभा चुनाव के पहले मोदी को लेकर बनाया जा रहा था. मोदी की कट्टर छवि को स्वयं मोदी ने आकर तोड़ा है. इसके पीछे उनके कार्यों का प्रभावी होना रहा है. बिना पक्षपात के सबका साथ, सबका विकास की भावना का अन्तर्निहित होना रहा है. योगी को मुस्लिम समुदाय के भीतर बैठे डर को दूर करने के साथ सम्पूर्ण प्रदेश के विकास की राह निर्मित करनी होगी. इसके लिए किसानों के उत्पादों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदना, फसल बीमा की राह आसान करना, नागरिक सुरक्षा, जनकल्याण कार्यों को करना, बुन्देलखण्ड, पूर्वांचल, रुहेलखण्ड आदि पिछड़े क्षेत्रों के विकास हेतु अलग से कोई मॉडल बनाना आदि कार्यों को अंजाम देना होगा. जिस तरह के विकासकार्यों को प्रधानमंत्री मोदी आगे ला रहे हैं उसे फलीभूत होने का अवसर तभी मिल सकेगा इसलिए विगत वर्षों में जिस तरह का अनियमित, अनियंत्रित विकास देखने में आया है उसको नियमित करना होगा. गुंडाराज की स्थिति के चलते जिस तरह कानून व्यवस्था ध्वस्त हुई है उसे सुधारना होगा. जाति-धर्म विशेष के चलते होते आये छोटे-बड़े उपद्रवों के चलते जिस तरह आमजन में भय, असुरक्षा का माहौल बना हुआ है उसे दूर करना वर्तमान प्रदेश सरकार की प्राथमिकता में होना चाहिए. योगी और उनकी कट्टर हिंदूवादी छवि को पसंद करने वाले समर्थकों को एक बात याद रखनी होगी कि विवादित बयानों के चलते एकबारगी किसी की भी छवि एक वर्ग विशेष में स्थापित भले ही हो जाये किन्तु उस छवि को दीर्घकालिक रूप से स्थापित करने के लिए उसे विकास की राह चलना ही होता है. यदि योगी सरकार मोदी सरकार की तर्ज़ पर विकास की राह चल पड़ती है तो प्रदेश की जनता को उनकी सकारात्मक छवि बनाते देर नहीं लगेगी. अब देखना ये है कि योगी किस तरह से और कितना मोदी की समग्र विकासनीति वाली छवि का लाभ उठाते हैं.

18 March 2017

जरावा जनजाति और मड वोलकेनो : अंडमान-निकोबार यात्रा













 









अंडमान-निकोबार की नीले समुद्री जल और नैसर्गिक प्राकृतिक सुन्दरता को दिल-दिमाग में अभी पूरी तरह बसा भी नहीं पाए थे कि वहाँ से वापसी का दिन दिखाई देने लगा. लौटने से पहले उस जगह को देखने का कार्यक्रम बना जिस जगह के बारे में पहले दिन से सुनते आ रहे थे. वो जगह थी बाराटांग द्वीप, जो पोर्टब्लेयर से सौ-सवा सौ किमी से अधिक की दूरी पर है. अंडमान-निकोबार द्वीप समूह अनेक तरह की विशेषताओं से संपन्न है. बाराटांग भी अपने आपमें विशेष है. एक तो यहाँ जाने के लिए अंडमान-निकोबार की एक जनजाति जरावा के लिए आरक्षित वनक्षेत्र से गुजरना होता है, दूसरा बाराटांग में लाइम स्टोन गुफा, मड वोलकेनो (मिट्टी वाला ज्वालामुखी) जो सक्रिय अवस्था में हैं, स्पाइक द्वीप और पैरट द्वीप आदि अद्वितीय प्राकृतिक स्थल हैं. 

पोर्टब्लेयर से बाराटांग के रास्ते में जरावा जनजाति आरक्षित वनक्षेत्र होने के कारण वहाँ प्रशासनिक नियमों के अनुसार ही यात्रा करनी पड़ती है. दरअसल एकाधिक बार पर्यटकों द्वारा जरावा जनजाति के लोगों के साथ दुर्व्यवहार किये जाने और कभी-कभी जरावा जनजाति के लोगों द्वारा उन पर आक्रमण कर दिए जाने के कारण उस आरक्षित वनक्षेत्र की यात्रा को सुरक्षा निगरानी में पूरा किया जाता है. यह यात्रा दिन में केवल चार बार – सुबह छह बजे, नौ बजे, दोपहर बारह बजे और फिर तीन बजे संपन्न होती है. बाराटांग से वापसी की यात्रा इस समय के आधे घंटे बाद आरम्भ होती है. आरक्षित वनक्षेत्र की यात्रा लगभग सत्तर किमी से अधिक की है. जिसमें आज भी जरावा जनजाति के महिला-पुरुष नग्नावस्था में या फिर अल्प वस्त्रों में दिखाई दे जाते हैं. 

पोर्टब्लेयर से चिरकाटांग नामक स्थान पर पहुँच सभी गाड़ियों को एक फॉर्म में अपनी जानकारी भरकर वहाँ स्थित पुलिस चौकी में जमा करना होता है. इसके बाद ही नियत समय पर कारों, बसों का लम्बा काफिला बाराटांग को चल देता है. आरक्षित वनक्षेत्र में किसी भी गाड़ी को रुकने की अनुमति नहीं होती है और न ही किसी तरह की फोटोग्राफी करने की अनुमति है. चिरकाटांग से चला काफिला मिडिल स्ट्रेट में आकर रुकता है, जहाँ से छोटे शिप द्वारा बीस-पच्चीस मिनट की समुद्री यात्रा के द्वारा बाराटांग पहुंचा जाता है. 

हम लोग भी सुबह-सुबह चिरकाटांग पहुँच गए. बिटिया रानी अपनी आदत के अनुसार कार-यात्रा में ऊँघने की शुरुआत करते हुए नींद मारने लगती है. चिरकाटांग पहुंचकर उसे जब उठाना चाहा तो पहले तो वो अनमनी सी दिखी. उसे बताया कि हो सकता है कि जनजाति के लोग दिखें, तब भी उसे कोई फर्क महसूस न हुआ पर उसके पूछने पर जैसे ही उसे बताया कि जनजाति मतलब अर्ली मैन तो वह चैतन्य होकर बैठ गई. अपनी पाठ्यपुस्तकों में पढ़े अर्ली मैन को देखने की लालसा उसे भी जाग उठी. 

बहू द्वारा थर्मस में रख दी गई चाय का आनंद लेते हुए हमने फॉर्म में जानकारी भरने की औपचारिकताओं को निपटाया. इसके बाद हमारी कार लगभग दो सौ गाड़ियों के काफिले संग ठीक नौ बजे मिडिल स्ट्रेट के लिए चल दी. उतार-चढ़ाव भरे रास्तों में घनघोर जंगलों के बीच भागती कारों के अलावा और कुछ दिखाई नहीं देता था. दोनों तरफ घने पेड़, कभी-कभी एक तरफ गहरी खाई दिखाई देती तो कभी घना जंगल. बेटी हमारी गोद में पूरे कौतूहल के साथ जरावा जनजाति के लोगों को देखने के लिए बैठी हुई थी. चूँकि नियमानुसार कैमरा चलाना प्रतिबंधित था, सो हमने भी नियम का पालन करते हुए कैमरा, मोबाइल सब एक कोने में लगा दिए थे. 

आरक्षित वनक्षेत्र में सबसे सुखद स्थिति ये रही कि बाराटांग जाते और आते समय जरावा जनजाति के लोगों के दर्शन हो गए. जाते समय मात्र तीन व्यक्ति ही मिले जो दो अलग-अलग स्थानों पर बैठे हुए थे. चूँकि सरकारी स्तर पर तथा गैर-स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद से जरावा जनजाति के लोगों को मुख्यधारा में शामिल किये जाने के प्रयास चल रहे हैं. इसके चलते उनको वस्त्र, भोजन आदि मुहैया कराया जाता है. जाते समय मिले तीन लोगों में दो पुरुष और एक महिला रहे, जो नग्नावस्था में तो नहीं मगर अल्पवस्त्रों में थे. बाराटांग से वापसी में एक दर्जन से अधिक की संख्या में जरावा लोग दिखाई दिए, जिनमें बहुतायत में नग्नावस्था में ही थे. एक हल्का इशारा करने पर ड्राईवर ने कार की गति को थोड़ा सा कम तो किया मगर रुकने की अनुमति न होने के कारण रोका जाना संभव नहीं हुआ. एकबारगी सोचा कि मोबाइल के द्वारा उनकी फोटो निकाल ली जाये किन्तु ड्राईवर के भयग्रस्त दिखाई देने के चलते ऐसा करना उचित न लगा. 

घने जंगल का आनंद लेते, खोजी निगाहों से जरावा जनजाति के लोगों को खोजते, टेढ़े-मेढ़े रास्तों से गुजरते हुए हम लोग कोई दो घंटे से अधिक की यात्रा के बाद मिडिल स्ट्रेट पहुँचे. वहाँ से छोटे शिप के द्वारा बाराटांग जाना था. मिडिल स्ट्रेट और बाराटांग के बीच शिप नियमित रूप से आवाजाही करता रहता है. हम लोगों के पहुँचने पर शिप किनारे पर लगा हुआ था. जल्दी से उसमें सवार होकर आगे की यात्रा के लिए चल दिए. मिडिल स्ट्रेट से बाराटांग की छोटी सी समुद्री यात्रा में किनारे-किनारे मैंग्रो ट्री के दृश्य मन को लुभा रहे थे. शिप पर बस का चढ़ा होना पूछा तो पता चला कि बस वहाँ से लगभग दो सौ किमी दूर मायाबंदर और डिगलीपुर तक जाती है. 

बाराटांग पहुँचकर हमारे कार ड्राईवर ने अपने परिचित एक कार वाले को पकड़ा और हम सब किनारे से लगभग पाँच-छह किमी दूर मड वोलकेनो पहुँच गए. पूरे अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में कुल ग्यारह मड वोलकेनो पाए गए हैं, जिनमें से आठ बाराटांग और मिडिल अंडमान द्वीप में हैं. जिस मड वोलकेनो को देखने हम लोग जा रहे थे वो सक्रिय है और वहाँ के लोग बताते हैं कि सुनामी के समय में उसमें भयंकर विस्फोट हुआ था. जिससे बहुत सी जगहों पर छोटे-छोटे वोलकेनो जैसे स्थल निर्मित हो गए हैं. वहाँ के कार ड्राईवर ने हम लोगों को ऐसी दो-तीन जगहें रास्ते में दिखाई. 

निर्धारित जगह पर कार से उतरने के बाद सौ मीटर से अधिक की दूरी पैदल तय करनी थी. बाँस, खजूर सहित अन्य जंगली वृक्षों की सघनता के बीच लगभग चार फुट चौड़े गलियारे में बनी मिट्टी की करीब डेढ़ सौ छोटी-छोटी सीढियाँ हमें मड वोलकेनो की तरफ ले जा रही थी. संकरे से रास्ते के दोनों तरफ लकड़ी की रेलिंग सुरक्षा की दृष्टि से लगी हुई थी. इसी रेलिंग के बाहर कई जगह बाँस की बनी कुर्सियाँ भी लगी हुई थीं. जिन पर बैठकर कुछ लोग अपनी थकान दूर करते नजर आये. संकरे रास्ते को धीरे-धीरे तय कर एक बड़े से मैदान जैसी जगह पर जब खुद को खड़े पाया तो सामने लकड़ी की बाढ़ से घिरा मड वोलकेनो क्षेत्र दिखाई दिया. 

वोलकेनो के नाम पर जैसी आकृति दिमाग में बनती है उससे इतर दृश्य वहाँ दिख रहा था. जगह-जगह छोटे-बड़े छेदों से कीचड़ निकल रहा था. कहीं-कहीं लगातार बुलबुले फूट रहे थे. बहता हुआ कीचड़, मिट्टी उसके सक्रिय और जागृत होने का प्रमाण था. तेज धूप के चलते वहाँ ज्यादा देर रुकना संभव नहीं हुआ और हम लोग वापस नीचे उतर आये. 

मड वोलकेनो के अलावा बाराटांग में लाइम स्टोन गुफा, पैरेट द्वीप आदि दर्शनीय स्थल हैं किन्तु उसके लिए कम से कम एक दिन बाराटांग में रुका जाए. चूँकि अगले दिन हमारी पोर्ट ब्लेयर से वापसी निर्धारित थी, ऐसे में बाराटांग में मड वोलकेनो के अलावा कहीं और जाना नहीं हो सका. समय की कमी न होती तो अवश्य ही बाराटांग रुककर वहाँ की नैसर्गिक सुन्दरता को आत्मसात किया जाता. 

बहुत छोटी सी जगह पर निवास कर रहे लोगों के लिए सरकारी स्तर पर पर्याप्त ख्याल रखा गया है. सरकारी परिवहन का डिपो होने के साथ-साथ माध्यमिक विद्यालय, दूरसंचार विभाग का होना इसका प्रमाण है. दोपहर का भोजन करते समय वहाँ के लोगों से बातचीत के दौरान पता चला कि वहाँ भोजन में मछली और चावल ही मुख्य रूप से खाया जाता है. 

एक साफ़-सुथरे से ढाबे पर भोजन के लिए बैठे तो हम और ड्राईवर माँसाहारी वाली निर्धारित जगह पर और पत्नी तथा बिटिया शाकाहारी वाली निर्धारित जगह पर बैठ गए. चार लोगों के लिए निर्धारित मेज पर पहले से दो लोग बैठे हुए थे. किसी और मेज पर जगह न देखकर हम दोनों लोग उसी एकमात्र खाली मेज पर जम गए. भोजन सम्बन्धी बिना किसी तरह के आर्डर के एक लड़की ने आकर हम दोनों के सामने एक-एक थाली रख दी. मेज पर पहले से ही चार कटोरे भरे हुए रखे थे, जिनमें एक में दाल, दो में सूखी सब्जी और एक में मछली रखी थी. कुछ कहते उससे पहले ही उसी लड़की ने आकर थाली में ढेर सारा चावल डाल दिया. हमने अपने ड्राईवर की तरफ देखा तो वो समझ गया और लड़की की तरफ देखकर बोला चिकन. अगले ही क्षण लड़की एक कटोरी में चिकन दे गई. ड्राईवर ने बताया कि यहाँ रोटी नहीं मिलेगी. यदि रोटी खानी होती है तो लगभग दो-तीन घंटे पहले आर्डर करना होता है. चावल, चिकन, मछली सहित अन्य भोज्यपदार्थ कितना भी लिया जा सकता है, उसका मूल्य निर्धारित है. 

धन चुकाने वाली स्थिति होने के बाद भी ढाबे पर अत्यंत विनम्रता और आतिथ्य भाव से भोजन करवाया गया. अभी तक के जीवन में हमने पहली बार वहीं चावल में चिकन या मछली के साथ दाल, आलू-गोभी आदि कि की सूखी सब्जी को मिलाकर खाते देखा. ढाबे पर भोजन करने वाले यात्रियों को किनारे तक छोड़ने की निःशुल्क सुविधा भी उपलब्ध थी. यकीनन यह कार ड्राईवर और ढाबे मालिक के बीच का कोई अनुबंध होता होगा. 

फ़िलहाल स्वादिष्ट भोजन का लुफ्त उठाने के बाद, उस ढाबे की मालकिन जिसका मायका और ससुराल दोनों ही उत्तर प्रदेश में ही थे, से बातचीत कर, उसके परिवार की, बाराटांग में बसने की जानकारी के साथ-साथ वहाँ आसपास की, वहाँ के लोगों की, रहन-सहन की कुछ और जानकारी लेते हुए हम लोग बाराटांग से वापसी करने को मिडिल स्ट्रेट, चिरकाटांग होते हुए घर के लिए पोर्ट ब्लेयर को निकल पड़े. जहाँ प्यारी सी भतीजी आशी, बहू नेहा और छोटा भाई नीरज हम लोगों का इंतज़ार कर रहे थे. 























सभी चित्र लेखक द्वारा लिए गए हैं.