लगनशील बेटी को मिली मदद

लैंगिक समानता के लिए जागरूकता अभियान के रूप में सम्पूर्ण देश में साईकिल यात्रा करते बिहार के नवयुवक राकेश कुमार सिंह की यात्रा का पड़ाव उरई, जनपद जालौन बना. 20 सितम्बर 2016 की शाम लोगों से मिलते-मिलाते, संवाद स्थापित करते हुए राकेश की साईकिल उरई के विभिन्न स्थानों, चौराहों पर रुक कर नागरिकों से संवाद स्थापित करने का सूत्र बन रही थी. महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, बच्चियों के साथ होती छेड़छाड़ की घटनाएँ, कन्या भ्रूण हत्यायें, भेदभाव, लैंगिक असमानता आदि विषयों पर चर्चाएँ की जा रही थी. जागरूकता अभियान के इसी क्रम में राकेश की साईकिल उरई शहर के रेलवे स्टेशन की ओर चल दी. शाम रात में बदल चुकी थी. संक्षिप्त वैचारिकी के बाद जागरूक राकेश की दृष्टि स्टेशन के पूछताछ केंद्र की रौशनी में पढ़ती एक छोटी बच्ची की तरफ गई. वे सहजता-असहजता की स्थिति के साथ उस बच्ची के पास पहुँचे. वो छोटी बच्ची, दिव्या पूरी तन्मयता के साथ अपने स्कूल का कार्य करने में लगी हुई थी. उसी के पास उसकी छोटी बहिन खेलने में मगन थी. 

दिव्या अपनी छोटी बहिन के साथ, रेलवे स्टेशन पर 

राकेश को अपने सामने खड़े देखकर एक पल को वे दोनों कुछ सकुचाई सी किन्तु राकेश के वात्सल्यपूर्ण व्यवहार से उनका संकोच दूर हो गया. चन्द मिनट की बातचीत से पता चला कि वे दोनों बहिनें स्टेशन के पास ही किराये के मकान में अपनी माँ के साथ रहती हैं. घर में बिजली व्यवस्था न होने के कारण दिव्या स्टेशन के बाहर की रौशनी में आकर स्कूल में मिला अपना गृहकार्य पूरा करती है. माँ मजदूरी करती है, उसकी बहिन अभी पढ़ती नहीं है बस उसका साथ देने यहाँ चली आती है, पढ़ना उसे बहुत अच्छा लगता है, वे गरीब हैं, ऐसी कुछ बातें बताते हुए उस बच्ची ने राकेश की फोटो खींच लेने की बात पर अपना सिर सहमति में हिला दिया.
राकेश ने सहज भाव से दिव्या और उसकी बहिन की कुछ तस्वीरें अपने मोबाइल कैमरे से निकाल ली. शहर में अन्य जगहों पर चर्चा करते हुए राकेश देर रात शहर के अपने ठिकाने पर वापस लौटे. लौटते ही सबसे पहले राकेश ने उस बच्ची की तस्वीर उसके द्वारा मिली संक्षिप्त जानकारी के साथ सोशल मीडिया पर शेयर कर दी. संवेदनात्मक दृष्टि रखते हुए उस तस्वीर को राकेश के कई मित्रों सहित उरई तथा उरई से बाहर के कई जागरूक लोगों ने शेयर किया. मीडिया के कुछ साथियों ने उस खबर को वेबसाइट पर तो कुछ मित्रों ने समाचार-पत्रों में प्रकाशित किया. 

लैंगिक आज़ादी के लिए साईकिल यात्री राकेश कुमार सिंह द्वारा लगाई गई पोस्ट 

इस बीच 25 सितम्बर की शाम कुछ स्थानीय मित्रों ने खबर दी कि जिलाधिकारी जालौन संदीप कौर द्वारा उस बेटी को आर्थिक मदद करने के साथ-साथ आवास भी उपलब्ध करवा दिया गया है. इस बारे में जानकारी करने पर पता चला कि राकेश द्वारा सोशल मीडिया पर डाली गई खबर के लगातार शेयर होती रही और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के सामने पहुँची. वहाँ से आदेश होते ही जिला प्रशासन हरकत में आया और दिव्या के परिवार को मदद उपलब्ध करवाई गई. दिव्या की माँ मोनिका के नाम डूडा कॉलोनी में एक आवास आवंटित किया गया. इसके साथ-साथ दस हजार रुपये की आर्थिक मदद भी दी गई. इसके साथ ही उसे समाजवादी पेंशन योजना से लाभान्वित किये जाने का भी भरोसा दिया गया. 

जिलाधिकारी जालौन, संदीप कौर द्वारा सहायता 

दिव्या की माँ मोनिका ट्रेन में भीख माँगकर गुजारा करती है. उसके पति द्वारा उसको छोड़ दिया गया है. दिव्या की पढ़ाई में विशेष रुचि है. उनकी स्थिति जानने के बाद जिलाधिकारी ने उन्हें हरसंभव मदद देने का आश्वासन दिया है.

राकेश के प्रयास के साथ-साथ प्रदेश मुख्यमंत्री और जिलाधिकारी के कदम अनुकरणीय एवं सराहनीय हैं.  


जीवन मूल्य स्थापित करने होंगे

समाज का जब निर्माण हुआ होगा, उस समय भी किसी न किसी तरह के मूल्य अवश्य ही चलन में रहे होंगे। भारतीय संदर्भों में मूल्यों का तादात्म्य सत्यम, शिवम, सुन्दरम से बैठाकर उसे अनुपम, अलौकिक माना जाता है। वर्तमान समय में जबकि वैश्विक स्तर पर अनेकानेक लोकतान्त्रिक शक्तियाँ विभिन्न प्रकार के संकटों से दो-चार हो रही है, उन्हें भी मूल्यों की, मानवीय मूल्यों की महत्ता का एहसास हो रहा है। ऐसी स्थिति में वैश्विक स्तर पर जीवन मूल्यों को अपनाने की सलाह दी जाने लगती है। देशों को, वहाँ के नागरिकों को, नक्सलवाद अथवा आतंकवाद के द्वारा नरसंहार करने वाले व्यक्तियों, संगठनों से जीवन मूल्यों की रक्षा करने की गुहार लगाई जाने लगती है। सवाल उठता है कि आखिर मानवीय मूल्यों, जीवन मूल्यों अथवा मूल्यों की पहचान क्या है? इनके स्थापन के मानक क्या हैं?

जीवन-मूल्यों अथवा मानवीय-मूल्यों को समझने के लिए उसके निर्धारक तत्त्वों को जानना अपरिहार्य है। मनुष्य का सम्पूर्ण कायिक, मानसिक, सामाजिक व्यवहार उसकी मूल प्रवृत्तियों के द्वारा संचालित होता है। इन्हीं प्रवृत्तियों के आधार पर मूल्य संरचना निर्माण को मुख्य रूप से दो भागों में विभक्त किया जाता है। इसमें पहला जैविक आधार और दूसरा पराजैविक आधार कहा जाता है। इन मूल्यों में जैविक आधार के अन्तर्गत शारीरिक संरचना, मूल प्रवृत्तियाँ, संवेग, प्रेरणा, अनुभूतियाँ, अभिवृत्तियाँ, सहानुभूति, अनुकरण, सुझाव, अभिरुचि, पूर्व धारणा और तर्क को सम्मिलित किया जाता है। पराजैविक आधार को पुनः तीन भागों सामाजिक, प्राकृतिक और मानविकी में स्वीकारा गया है। इस विभाजन में किसी भी व्यवस्था को सुचारू ढंग से संचालित करने के लिए उसका पराजैविक आधार अत्यन्त महत्वपूर्ण माना गया है। इसमें सामाजिक मूल्य के साथ-साथ मानवीय मूल्य भी अन्तर्निहित हैं। मनुष्य की कल्पनाशीलता, उसकी तार्किकता, चैतन्यता उसके अन्य पशुओं से कहीं अधिक श्रेष्ठ बनाती है। उसकी यही सांस्कृतिकता के चलते उसके प्रत्येक कार्य का मूल्यपरक होना परिहार्य होता है। सामाजिक मान्यताओं की बात हो अथवा राजनैतिक स्थितियों की चर्चा सभी में मानव के जीवन-मूल्यों का सशक्त होना जरूरी है। यदि मानवीय मूल्यों की आदर्शवादी व्यवस्था न हो तो सम्भवतः समाज का, शासन का संचालन करना बेहद दुष्कर हो जाये। आस्थाओं, परम्पराओं, चिन्तन, जीवन-साधना को विस्मृत करने के बाद किसी भी रूप में सामाजिकता को विखण्डित करने का कार्य किया जाना मानवीय-मूल्यों के लोप को ही दर्शाता है।

मानवीय क्रियाकलापों में आज मानवीय मूल्यों में हृास देखने को मिल रहा है। परिवार जैसी संस्था का लोप होता जा रहा है। संयुक्त परिवार लगातार सिकुड़ते हुए एकल परिवारों और नाभिकीय परिवारों में सिमटने लगे हैं। ऐसा होने से संयुक्त परिवारों में सम्पत्ति के अधिकारों में परिवर्तन, परम्परागत व्यवसाय के महत्व में कमी, सम्बन्धों में परिवर्तन, धार्मिक प्रकृति का हृास, आकार का हृास, परिवार के महत्व में कमी आदि देखने को मिली है। समाज में जिस तरह से लगातार हिंसा, अत्याचार, महिला हिंसा, यौनापराध, हत्याओं आदि का सिलसिला चल निकला है वह मानवीय मूल्यों के क्षरण का ही दुष्परिणाम है। ऐसे में विचार करने की आवश्यकता है कि इन मूल्यों को कैसे प्रतिस्थापित किया जाये? इनके क्षरण को कैसे रोका जाये? समझने की बात है कि आखिर हम मानवीय मूल्यों के विकास के लिए कर क्या रहे हैं? हम जीवन-मूल्यों की प्रतिस्थापना के लिए, अगली पीढ़ी में उसके हस्तांतरण के लिए क्या कदम उठा रहे हैं? यदि पूरी ईमानदारी से मनुष्य अपने प्रयासों की ओर देख भर ले तो पायेगा कि उसके समस्त क्रियाकलापों के द्वारा मूल्यों का, जीवन-मूल्यों का क्षरण ही हुआ है।


मानवीय मूल्यों का मनुष्य के साथ साहचर्य अनादिकाल से रहा है और बिना इसके मनुष्य निरा पशु समान ही माना गया है। ऐसे में किसी भी रूप में मानवीय मूल्यों को बचाना मानव की प्राथमिकता में शामिल होना चाहिए। यद्यपि परिवर्तन समाज की शाश्वत प्रक्रिया है किन्तु यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कहीं लगातार होते जा रहे अंधाधुँध परिवर्तन में मनुष्य स्वयं को तो समाप्त नहीं करता जा रहा है। जब भी कोई समाज विकासक्रमानुसार एक अवस्था से दूसरी अवस्था में सवंमित होता है तभी जीवन-व्यवस्था से सम्बद्ध मानवीय सम्बन्धों पर आधारित जीवन-मूल्यों के स्वरूप एवं दिशा में भी परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। तब युगीन आवश्यकतानुसार पूर्वस्थापित जीवन-मूल्यों का पुनर्मल्यांकन, अवमूल्यन तथा नव-निर्माण का कार्यक्रम भी क्रियान्वित होता है।ऐसी स्थिति में जीवन-मूल्यों की प्रतिस्थापना के लिए एकमात्र सहारा शिक्षा व्यवस्था ही नजर आती है। शिक्षा जहाँ एक ओर मनुष्य के वैयक्तिक व्यक्तित्व को विकसित करती है, वहाँ उसके सामाजिक तथा सांस्कृतिक व्यक्तित्व को भी गति देती है। देखा जाये तो शिक्षा व्यक्ति की चिन्तन-शक्ति, अभिरुचि, क्षमता आदि का विकास करके उसकी सामाजिकता और सांस्कृतिकता का निर्माण करता है। शिक्षा के द्वारा व्यक्ति कई-कई पीढ़ियों की सांस्कृतिक विरासत का संवाहक बनता है। यही संवाहक यदि मानवीय-मूल्यों का संरक्षण करता हुआ आगे बढ़ता है तो वो न केवल समाज के लिए लाभकारी होता है वरन् लोकतन्त्र के लिए भी कारगर होता है। 

राकेश की साईकिल एक्सप्रेस : चेन्नई टू बिहार फॉर जेंडर फ्रीडम

जब पहली बार बहिन दिव्या ने उस व्यक्ति के बारे में बताया तो लगा कि कोई सिरफिरा ही है. ऐसे व्यक्ति को सिरफिरा नहीं कहा जाये तो और क्या कहा जाये जो अपने परिवार की चिंता किये बिना दूसरे परिवारों की चिंता कर रहा हो. अपनी बेटी, पत्नी, बहिन के भविष्य, उनकी सुरक्षा से अधिक दूसरी बहिन, बेटियों की चिंता करने में लगा हो. इतना होना ही उसको सिरफिरा नहीं बना रहा था वरन इससे भी कहीं अधिक आगे निकल जाना उसे सिरफिरा सिद्ध करने को विवश कर रहा था. दरअसल वो युवक सिर्फ उनकी सुरक्षा की बात ही नहीं करने जा रहा था वरन पूरे देश में साईकिल यात्रा के द्वारा जागरूकता सन्देश देने जा रहा था. पूरे देश का साईकिल के द्वारा भ्रमण करने का अर्थ कोई एक-दो सप्ताह तो था नहीं, कोई एक-दो महीने भी नहीं था. ऐसा करने के पीछे पूरे तीन साल का समय उसने निर्धारित कर रखा था.


छोटी बहिन दिव्या का स्नेहिल आदेश हुआ कि वो जब अपनी यात्रा आरम्भ करे तो हम उसको रूट-मैप उपलब्ध कराते रहें ताकि वो अपना अधिक से अधिक समय सकारात्मक रूप से लगा सके. इंटरनेट से दोस्ताना सम्बन्ध होने के कारण ऐसा करना हमारे लिए कठिन नहीं था मगर यात्रा के आरम्भ होने का स्थान, उस यात्रा के चलने की अवधि सशंकित करने वाली अवश्य थी. बहरहाल उस युवक की दृढ़ता कम न हुई. उसका विश्वास कम न हुआ. आत्मबल ने उसका साथ न छोड़ा और उस नौजवान ने 15 मार्च 2014 को साईकिल पर पहला पैडल मार उसे चला ही दिया. लैंगिक असमानता को दूर करने के लिए उस नौजवान ने अपने आसपास का अथवा अपने परिचित क्षेत्र को नहीं चुना वरन अपने मूल स्थान बिहार से सैकड़ों किमी दूर तमिलनाडु के चेन्नई को इस काम के लिए चुना. जिस तरह ये समूचा अभियान हमारे लिए किसी सिरफिरे दिमाग की उपज समझा जा रहा था, किसी के लिए भी हो सकता था. जिस तरह से उस युवक की ये साईकिल यात्रा हमारे लिए अचम्भा थी वैसे किसी के लिए भी हो सकती थी. आश्चर्य तो तब हुआ जबकि पता चला कि साईकिल यात्रा समापन की पूर्व निर्धारित तिथि 15 मार्च 2017 को आगे बढ़ाकर 15 अक्टूबर 2018 कर दिया गया है. जी हाँ, बिहार के तरियानी छपरा के युवक राकेश कुमार सिंह ने लैंगिक असमानता दूर करने के उद्देश्य से अपनी साईकिल यात्रा को जब आरम्भ किया था तब उनकी मंशा मार्च 2017 में इसका समापन करने की थी.


यात्रा आरम्भ होने के पहले से मोबाइल के द्वारा राकेश से वार्तालाप होने लगा. वो जमीनी स्तर पर अपनी तैयारियों, कार्यों की चर्चा करते और हम दिव्या के सहयोग से उनकी सहायता कमरे में बैठकर करते. अंततः वो दिन आ गया जब राकेश की साईकिल दौड़ पड़ी. सार्थक उद्देश्य को लेकर  दौड़ती साईकिल एक बार चली तो फिर चलती चली जा रही है. लैंगिक आज़ादी के लिए यात्रा के ध्येय वाक्य के साथ राकेश की साइकिल यात्रा तमिलनाडु से शुरू हुई होकर केरल, पांडिचेरी, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उड़ीसा, बिहार, नेपाल के सीमावर्ती कस्बों, स्थानों से होकर उत्तर प्रदेश से गुजरती हुई मध्य प्रदेश पहुँच चुकी है. ढाई वर्ष की इस यात्रा में राकेश लगभग सोलह हजार किमी की यात्रा कर चुके हैं. वे महज यात्रा नहीं कर रहे हैं वरन अपनी यात्रा के विभिन्न पड़ावों में लोगों से संवाद स्थापित भी कर रहे हैं. उनके साथ विचारों का आदान-प्रदान करने वाले राकेश अभी तक लगभग चार लाख लोगों से मिल चुके हैं. 


दिल्ली विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त राकेश के मन में अचानक से ऐसा करने का विचार नहीं जागा. वे भी शिक्षा पूरी करने के बाद आम युवकों की भांति जीवन-यापन के लिए नौकरी करने लगे. इसी दौरान उनका सम्पर्क एक ऐसे इंसान से हुआ जो तेजाब हमलों की शिकार युवतियों के लिए कार्य करता था. संवेदना से भरे राकेश ने भी चार माह तेजाबी हमले की शिकार युवतियों के साथ रह कर उनकी पीढ़ा, सामाजिक तिरस्कार, दर्द, उनके परिवार की परेशानी, व्यक्तित्व के संकट को बहुत ही करीब से देखा, पहचाना, एहसास किया. युवतियों के साथ होते तेजाबी हमले, उनके साथ होती दुर्व्यवहार की घटनाएँ, छेड़खानी आदि के साथ-साथ कन्या भ्रूण हत्या, दहेज़ हत्या, घरेलू हिंसा, लैंगिक असमानता आदि को भी वे आये दिन देख रहे थे. इन सबसे उद्वेलित होकर एक दिन उन्होंने अपनी नौकरी को त्याग समाज की युवतियों के पक्ष में, लैंगिक असमानता को दूर करने के लिए कार्य करने का मन बना लिया. 


इसे हमारा सौभाग्य ही कहा जायेगा कि उनकी साईकिल यात्रा के पड़ावों में हमारा शहर उरई भी आया. उनकी यात्रा के आरम्भ होने के पहले से उनके साथ मोबाइल पर बना संपर्क, महिलाओं से सम्बंधित विभिन्न मुद्दों पर उनके साथ विचार-विमर्श, यात्रा के विभिन्न चरणों में आती सुखद-दुखद स्थितियों की चर्चा आदि से उनके साथ एक रिश्ता सा बन गया था. इस रिश्ते ने 19 सितम्बर 2016 की सुबह गले मिलकर अप्रत्यक्ष को प्रत्यक्ष बना दिया. दो दिनों तक जनपद में कई-कई जगहों पर उनके संवाद, उनकी यात्रा, लोगों से विचार-विमर्श को देख-सुनकर उनके विश्वास को बहुत करीब से देखने का अवसर मिला. पाँच घंटे में 119 किमी की दूरी तय करने के बाद भी जनपद जालौन में जगह-जगह जाने की ललक, लोगों से संवाद स्थापित करने का उत्साह देखते बनता था. यात्रा के अपने अनुभवों को बताते हुए उन्होंने बताया कि समूचे देश के अभी तक जिन नौ प्रान्तों में वे अपनी यात्रा कर चुके हैं वहाँ पहनावे को लेकर, शिक्षा को लेकर, रहन-सहन को लेकर स्थितियाँ कमोवेश एक जैसी ही हैं. इन सबको दूर करने के लिए मानसिकता को बदलना होगा. हम सब मिलकर समाज को भले न बदल पायें पर कम से कम अपने परिवार को बदलने का काम करें. यदि एक-एक व्यक्ति अपने घर को ही महिला हिंसा मुक्त कर दे, महिला को शिक्षित होने, रोजगार करने, पहनने की आज़ादी दे तो समाज का भला अपने आप ही हो जायेगा. 



15 अक्टूबर 2018 को बिहार में उनके गृह जनपद में यात्रा समापन पर वैचारिक मेले का आयोजन किया जायेगा, जिसमें पूरे देश भर से जागरूक लोगों का, सामाजिक कार्यकर्ताओं का जमावड़ा होगा. उनकी इस यात्रा से लोग सबक सीख सकें, महिलाओं के प्रति सौहार्द्रपूर्ण रवैया अपना सकें, उनको भी इंसान समझकर उनके साथ सकारात्मक व्यवहार कर सकें, ऐसी अपेक्षा की जा सकती है. 


अशुद्धियों के साथ न हो हिन्दी विकास

इंटरनेट ने समाज में परिवर्तन तो किया ही, भाषाई स्तर पर भी व्यापक परिवर्तन किया है. भाषाई विकास के द्वारा सूचनाओं के आदान-प्रदान के साथ-साथ सभ्यताओं-संस्कृतियों को जानने-समझने में सुविधा हुई है. यहाँ भाषाई विकास से तात्पर्य विशेष रूप से हिन्दी भाषा के विकास से है. देखने में आया है कि इंटरनेट पर किसी विषय-वस्तु को खोजने पर सामग्री भले ही हिन्दी भाषा से की अपेक्षा अंग्रेजी भाषा में अधिक देखने को मिल रही है किन्तु हिन्दी भाषा के प्रति लोगों का रुझान लगातार बढ़ता ही जा रहा है. इसे देखते हुए कई प्रतिष्ठित संस्थानों ने अपनी वेबसाइट का हिन्दी संस्करण भी बना रखा है. आम हिन्दी-प्रेमी भी सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों से जुड़कर हिन्दी भाषा का विकास करने में लगा हुआ है. यद्यपि ये हिन्दी विकास अभी कविताओं, ग़ज़लों, छोटे-छोटे लेखों आदि के द्वारा किया जा रहा है. प्रथम दृष्टया देखा जाये तो इससे किसी विषय पर गंभीर सामग्री तो उपलब्ध नहीं हो पा रही है किन्तु इंटरनेट पर हिन्दी तो समृद्ध हो ही रही है.

सामान्य रूप में देखने में आता है कि आपसी वार्तालाप में जहाँ हर एक-दो शब्दों के बाद अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग करना आम बात सी हो गई है वहीं ब्लॉग-लेखन में अथवा अन्य माध्यमों के लेखन में ऐसा देखने को नहीं मिलता है. इंटरनेट का उपयोग करने वाले लोग जो हिन्दी लेखन में सक्रिय हैं वे अपना लेखन बिना अंग्रेजी के शब्दों के कर रहे हैं. दरअसल संप्रेषणीयता की सहजता के लिए भाषा का विकास किया गया. फिर इसी क्रम में नए-नए शब्दों की, उनके अर्थों की लगातार खोज की गई. शब्दों को गढ़ने के साथ-साथ वह अन्य भाषाओं के शब्दों को भी आत्मसात करता रहा. गौरवशाली संस्कृत से उत्पन्न शब्दों के कारण हिन्दी शब्द-भण्डार दूसरी भाषाओं के शब्द-भण्डार से कहीं अधिक समृद्ध रहा है. आम बातचीत पर यदि ध्यान दिया जाये तो उसमें हिन्दी के साथ अंग्रेजी, उर्दू, अरबी, फारसी आदि शब्दों का मिश्रण दिखता है जो वार्तालाप को प्रवाहमान बनाता है. इन भाषाओं के साथ-साथ दूसरी भाषाओं के शब्द भी हिन्दी के साथ इतनी आसानी से घुले-मिले हैं कि उनमें विभेद कर पाना आसान नहीं होता है. अंग्रेजी के बहुतेरे शब्द जैसे प्लेट, बोतल, ट्रेन, प्लेटफ़ॉर्म आदि भी इसी तरह से हैं. संभव है कि किसी समय हिन्दी शब्दों की अनुपलब्धता के कारण इन शब्दों का उपयोग किया गया होगा. अब ये शब्द अंग्रेजी से ज्यादा हिन्दी के समझ आते हैं. इनका उपयोग करने में कहीं कोई हिचक नहीं होती है, कहीं कोई भेदभाव नहीं दिखता है.


इस विकास ने भाषा को समृद्ध किया है तो उसको अशुद्धियों का शिकार भी बनाया है. लोगों द्वारा लगातार व्याकरण का ध्यान रखे बिना शब्दों, वाक्यों का प्रयोग किया जा रहा है. वर्तनी की अशुद्धियाँ भाषाई विकृति को पैदा कर रही हैं. अनेक शब्द को बहुवचन बनाकर अनेकों लिखना, आशीर्वाद को आर्शीवाद लिखना, उपलक्ष तथा उपलक्ष्य को, अलग अर्थ होने के बाद भी एक ही अर्थ में लिखने की गलती की जा रही है. लिखने-बोलने की एक और बड़ी गलती आम होती जा रही है जब कि महिला लेखिकायें या महिला लेखिका लिखा-बोला जा रहा है. हिन्दी लेखन में अंग्रेजी शब्दों की सहज स्वीकार्यता के कारण बहुत से लोग हिन्दी लेखन के नाम पर इस तरह की अशुद्धियों को नज़रंदाज़ करने की बात कहते हैं. ऐसे लोगों का तर्क है कि भाषा विकास के लिए बंधे-बंधाये नियमों को ध्वस्त करना ही होगा. संभव है कि ये सत्य हो किन्तु ये भी ध्यान रखना होगा कि रूढ़ नियमों को ध्वस्त करने के चक्कर में कहीं हम हिन्दी विकास को अवरुद्ध तो नहीं कर रहे हैं. हिन्दी शब्दों, वर्णों, वर्तनियों के साथ खिलवाड़ तो नहीं कर रहे हैं. 

रुला जाता है बुढ़वा मंगल

उस दिन बुढ़वा मंगल था. स्थानीय अवकाश होने के कारण विद्यालय, कार्यालय, कचहरी आदि में छुट्टी थी. पिताजी भी घर पर ही थे. छोटा भाई हर्षेन्द्र अपने कुछ मित्रों के साथ उरई के पास बने संकट मोचन मंदिर गया हुआ था. हम भी अपनी छुट्टी के चलते ग्वालियर नहीं गए थे. मंदिर वगैरह जाने का, बुढ़वा मंगल को होने वाला दंगल देखने का ऐसा कोई विशेष शौक न तो हमारा था और न ही हमारे मित्रों का. ऐसे में दोपहर को घर में ही आराम से पड़े थे. बात सन 1991 की है, तब हाथ में न तो मोबाइल होता था, न मेज पर कंप्यूटर और न ही इंटरनेट जैसा कुछ. सो किताबों से अपनी दोस्ती को सहज रूप से आगे बढ़ा रहे थे.

तभी किसी ने दरवाजे को बहुत जोर-जोर से पीटना शुरू किया. साथ में वो व्यक्ति पिताजी का नाम लेता जा रहा था. दरवाजा पीटने की स्थिति से लग रहा था कि उसे बहुत जल्दी है. हम शायद जोर से चिल्ला बैठते मगर उसके द्वारा पिताजी का नाम बार-बार, चिल्ला-चिल्ला कर लेते जाने से लगा कि कोई ऐसा है जो उम्र में पिताजी से बड़ा है. जल्दी से उठकर दरवाजा खोला तो सामने गाँव के द्वारिका ददा हैरान-परेशान से खड़े थे. इतनी देर में अन्दर से पिताजी भी बाहर आ गए. “चाचा की तबियत बहुत ख़राब है.” ददा के मुँह से इतना ही निकला.

“कहाँ हैं?” के सवाल पर उनके हाथ का इशारा पास के डॉक्टर देवेन्द्र के क्लीनिक की तरफ गया. हमने बिना कुछ आगे सुने, उस तरफ पूरी ताकत से दौड़ लगा दी. बमुश्किल सौ मीटर की दूरी पर बने उनके क्लीनिक के सामने एक जीप खड़ी थी और गाँव के कुछ लोग. हमने जल्दी से जीप के पीछे वाले हिस्से में चढ़कर देखा, बाबा चादर ओढ़े लेते हुए थे.

“बाबा, बाबा” हमारी आवाज पर कोई हरकत नहीं हुई. तब तक पिताजी, अम्मा भी आ गए. डॉक्टर देवेन्द्र ने जीप में अन्दर जाकर बाबा को देखा और नकारात्मक मुद्रा में सिर हिला दिया.

“डॉक्टर साहब, ऐसा नहीं हो सकता, जरा फिर से देख लीजिये.” अम्मा जी का रोआंसा सा स्वर उभरा. पिताजी, हमारी और गाँव के बाकी लोगों की आँखों में पानी भर आया. डॉक्टर साहब ने दोबारा जाकर जाँच की और जीप से उतर कर फिर वही जवाब दिया.

एक झटके में लगा जैसे समूचा परिवार ख़तम हो गया. अइया गाँव में ही थीं. रोने-बिलखने के बीच बाबा की पार्थिव देह को गाँव ले जाने की ही सलाह पिताजी को दी गई. मोहल्ले के कुछ लोगों को खबर दी गई. समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या किया जाये. तब दूरसंचार सुविधा भी आज के जैसी अत्याधुनिक नहीं थी. तीनों चाचा लोग दूर थे, उनको कैसे खबर दी जाए, पिताजी इस सोच में थे. टेलीफोन से, तार से, जाकर जैसे भी हो उनको खबर दी जाए, इसकी जिम्मेवारी मोहल्ले के लोगों ने ले ली.

17 सितम्बर 1991, दिन मंगलवार, बुढ़वा मंगलवार, हम लोग उसी जीप में बैठकर बाबा की देह को लेकर गाँव चल दिए. वे बाबा जो उसी सुबह तक लगभग 75-76 वर्ष की उम्र में पूरी तरह स्वस्थ, तंदरुस्त, सक्रिय थे और अचानक हम सबको छोड़कर चले गए. काम करने के दौरान सुबह दीवार से सिर टकरा जाने, गाँव के नजदीक के कस्बे माधौगढ़ में प्राथमिक उपचार के बाद उरई लाया गया. जहाँ वे बिना किसी तरह की सेवा करवाए इस निस्सार संसार में हम सबको अकेला कर गए.


जमींदार परिवार का होने के बाद भी बाबा जी ने अपने समय में बहुत कठिनाइयों का सामना किया. पढ़ाई के समय भी संघर्ष किया. आज़ादी की लड़ाई में खुलकर भाग भले न लिया हो पर आन्दोलनों में भागीदारी की. एकबार स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का प्रमाण-पत्र बनने का मौका आया तो ये कहकर मना कर दिया कि ऐसा कोई काम उन्होंने नहीं किया कि उन्हें सेनानी कहा जाये. बाबा जी से बहुत कुछ सीखने को मिला. मेहनत, आत्मविश्वास, कर्मठता, निर्भयता, जोश, जीवटता, सकारात्मक सोच आदि-आदि गुणों का जो क्षणांश भी हममें मिलता है वो उनकी ही देन है. आज 25 वर्ष हो गए उनको हमसे दूर हुए मगर ऐसा लगता है जैसे वो बुरा वक्त कल की ही बात हो. बुढ़वा मंगल हर बार रुला जाता है. 

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