नेताजी की मृत्यु का सच सामने आये

सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु पर आज तक संदेह बना हुआ है. इस संदेहास्पद स्थिति के साथ-साथ एक विद्रूपता ये है कि देश की आज़ादी के पूर्व से लेकर आज़ादी के बाद अद्यतन भारत सरकार द्वारा किसी भी तरह की ठोस सकारात्मक कार्यवाही नहीं की गई है. हालाँकि तीन-तीन जाँच आयोगों के द्वारा विभिन्न सरकारों ने औपचारिकता का ही निर्वहन किया है और वो भी कुछ जागरूक सक्रिय नागरिकों के हस्तक्षेप के बाद. इस बात को बुरी तरह से प्रसारित करने और एक तरह की सरकारी मान्यता देने के बाद कि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु १८ अगस्त १९४५ को एक विमान दुर्घटना में हो गई थीअधिसंख्यक लोगों द्वारा इसे स्वीकार कर पाना मुमकिन नहीं हो पा रहा था और ये स्थिति आज भी बनी हुई है.


विमान दुर्घटना और मृत्यु का सच
नेता जी की विमान दुर्घटना को लेकरउनकी मृत्यु की खबर और बाद में उनके जीवित होने की खबर के सन्दर्भ में सामने आते कुछ तथ्यों ने भी समूचे घटनाक्रम को उलझाकर रख दिया है. जहाँ एक तरफ नेता जी की मृत्यु एक बमबर्षक विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने पर बताई जा रही है वहीं ताईवानी अख़बार ‘सेंट्रल डेली न्यूज़’ से पता चलता है कि १८ अगस्त १९४५ के दिन ताइवान (तत्कालीन फारमोसा) की राजधानी ताइपेह के ताइहोकू हवाई अड्डे पर कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त नही हुआ था. इसी तथ्य पर हिन्दुस्तान टाइम्स’ के भारतीय पत्रकार (मिशन नेताजी’ से जुड़े) अनुज धर के ई-मेल के जवाब में ताईवान सरकार के यातायात एवं संचार मंत्री लिन लिंग-सान तथा ताईपेह के मेयर ने जवाब दिया था कि १४ अगस्त से २५ अक्तूबर १९४५ के बीच ताईहोकू हवाई अड्डे पर किसी विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने का कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं है। (तब ताईहोकू के इस हवाई अड्डे का नाम मात्सुयामा एयरपोर्ट’ था और अब इसका नामताईपेह डोमेस्टिक एयरपोर्ट’ है।) बाद में २००५ में,ताईवान सरकार के विदेशी मामलों के मंत्री और ताईपेह के मेयर मुखर्जी आयोग के सामने भी यही बातें दुहराते हैं. नेता जी की मृत्यु को अफवाह मानने वालों का मानना है कि वो शव नेता जी का नहीं वरन एक ताईवानी सैनिक इचिरो ओकुरा’ का था जो बौद्ध धर्म को मानने वाला था. बौद्ध परम्परा का पालन करते हुए ही उसका अंतिम संस्कार मृत्यु के तीन दिन बाद नेता जी के रूप में किया गया. इस विश्वास को इस बात से और बल मिलता है कि सम्बंधित शव का अंतिम संस्कार चिकित्सालय के कम्बल में लपेटे-लपेटे ही कर दिया गया थाजिससे किसी को भी ये ज्ञात नहीं हो सका कि वो शव किसी भारतीय का था या किसी ताईवानी का. मृत्यु प्रमाण-पत्र का दोबारा बनाया जाना भी इस संदेह को पुष्ट करता है कि नेता जी की मृत्यु विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी.

दुर्घटना के बाद नेता जी का प्रवास
ये तथ्य किसी से भी छिपा नहीं है कि नेता जी का आज़ाद हिन्द फ़ौज की स्थापना और इटलीजापान,जर्मनी से मदद लेने के पीछे एकमात्र उद्देश्य भारत देश को स्वतंत्र करवाना था. उनकी इन गतिविधियों को ब्रिटेन किसी भी रूप में पसंद नहीं कर रहा था. ऐसे में उसने नेता जी को अंतर्राष्ट्रीय अपराधी घोषित कर दिया था.  इधर अंग्रेज भले ही भारत देश को स्वतंत्र करना चाह रहे थे किन्तु वे नेता जी को राष्ट्रद्रोही घोषित करके उनके ऊपर मुकदमा चलाने को बेताब थे. इसके साथ-साथ नेता जी के सहयोगी रहे स्टालिन और जापानी सम्राट तोजो किसी भी कीमत पर नेता जी को ब्रिटेन-अमेरिका के हाथों नहीं लगने देना चाहते थे. वे इस बात को समझते थे कि मित्र राष्ट्र में शामिल हो जाने के बाद ब्रिटेन-अमेरिका उन पर नेता जी को सौंपने का अनावश्यक दवाब बनायेंगे. हो सकता है तत्कालीन स्थितियों में इस दवाब को नकार पाना इनके वश में न रहा हो. ऐसे में इन सहयोगियों ने एक योजना के तहत नेता जी को अभिलेखों में मृत दिखाकर उन्हें सोवियत संघ में शरण दिलवा दी हो. इस तथ्य को इस कारण से भी बल मिलता है कि नेता जी समेट वे तीन व्यक्ति (नेताजी के सहयोगी और संरक्षक के रूप में जनरल सिदेयीविमान चालाक मेजर ताकिजावा और सहायक विमान चालक आयोगी) ही इस दुर्घटना में मृत दर्शाए गए थे जिन्हें सोवियत संघ में शरण दिलवाई जानी थी.

भारत सरकार का रवैया
भारत सरकार ने वर्ष १९६५ में गठित ‘शाहनवाज आयोग’ को ताइवान जाने की अनुमति नहीं दी थी. समूची की समूची जाँच आयोग ने देश में बैठे-बैठे ही पूरी कर ली थी. और शायद इसी का सुखद पुरस्कार उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल करके दिया गया.
१९७० में गठित ‘खोसला आयोग’ को भी रोका गया था किन्तु कुछ सांसदों और कुछ जन-संगठनों के भारी दवाब के कारण उसे ताइवान तो जाने दिया गया मगर किसी भी सरकारी या गैर-सरकारी संस्था से संपर्क नहीं करने दिया गया.
मुखर्जी आयोग ने भारत सरकार से जिन दस्तावेजों की मांग की वे आयोग को नहीं दिए गए. अधिकारियों ने वही पुराना राग अलापा कि एविडेंस एक्ट की धारा १२३ एवं १२४ तथा संविधान की धारा ७४(२) के तहत इन फाइलों को नहीं दिखाने का प्रिविलेज” उन्हें प्राप्त है.
रूस में भी जाँच आयोग को पहले तो जाने नहीं दिया गया बाद में भारत सरकार की अनुमति के अभाव में आयोग को न तो रूस में नेताजी से जुड़े दस्तावेज देखने दिए गए और न ही कलाश्निकोव तथा कुज्नेट्स जैसे महत्वपूर्ण गवाहों के बयान लेने दिए गए.
भारत सरकार ने १९४७ से लेकर अब तक ताइवान सरकार से उस दुर्घटना की जाँच कराने का अनुरोध भी नहीं किया है.

 कुछ फ़र्ज़ हमारा भी है

आज भी हमारी सरकार के ताइवान के साथ कूटनीतिक सम्बन्ध नहीं कायम हो सके हैं. इसके पार्श्व में नेहरू कासरकारों का चीन-प्रेम भी हो सकता है. नेता जी के बारे में उपजे संदेह के बादलों को पहले तो स्वयं नेहरू ने और फिर बाद में केंद्र सरकारों ने छँटने नहीं दिया. पारदर्शिता बरतने के लिए लागू जनसूचना अधिकार अधिनियम के इस दौर में भी नेता जी से मामले में किसी भी तरह की पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है. नेता जी दुर्घटना का शिकार हुए या अपनों की कुटिलता कानेता जी देश लौटे या देश की सरकार ने उनको अज्ञातवास दे दियावे रूस में ही रहे या फिर कहीं किसी विदेशी साजिश का शिकार हो गए….ये सब अभी भी सामने आना बाकी है. ऐसे में सत्यता कुछ भी हो पर सबसे बड़ा सत्य यही है कि देश के एक वीर सपूत को आज़ादी के बाद भी आज़ादी नसीब न हो सकी. भले ही नेता जी अपने अंतिम समय में गुमनामी बाबा बनकर रहे और स्वर्गवासी हुए फिर भी उनकी आत्मा आज भी आज़ादी के लिए भटक रही हैतड़प रही है. ये हम भारतवासियों का फ़र्ज़ बनता है कि कम से कम आज़ादी के एक सच्चे दीवाने को आज़ाद भारत में आज़ादी दिलवाने के लिए संघर्ष करें… जय हिन्द!!

राजनैतिक जागरूकता की आवश्यकता

चुनावी मौसम सबको अपने आगोश में ले लेता है. प्रशासनिक अमला अपनी तरह से कार्य करने में जुट जाता है, राजनैतिक दल अपनी तरह से गतिविधियाँ बढ़ा देते हैं. राजनैतिक दल जहाँ लुभावने वादों और तमाम तरह के सपने दिखाकर मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की रणनीति बनाते हैं वहीं प्रशासनिक अमला मतदाताओं को अधिक से अधिक मतदान करने के लिए जागरूक करने लगता है. उसकी तरफ से मतदाता जागरूकता कार्यक्रमों के संचालन की भरमार होने लगती है. कभी गोष्ठी, कभी जुलूस, कभी रैली, कभी नुक्कड़ नाटक आदि. इन सबके लिए  राष्ट्रीय, प्रादेशिक स्तर से जनपद, ग्रामीण स्तर तक प्रशासन मुस्तैदी से मतदाता जागरूकता कार्यक्रम चलाने में जुट जाता है और उसके साथ सम्बंधित क्षेत्र के कुछ नागरिक भी जुट जाते हैं. इनमें कुछ तो ऐसे हैं जो शौकवश इन कार्यक्रमों में दिख जाते हैं अन्यथा की स्थिति में बहुतायत में वे लोग हैं जो किसी न किसी रूप में प्रशासन के दबाव में हैं, प्रशासन से लाभान्वित होते रहते हैं, प्रशासन से लाभ लेने की जुगाड़ में रहते हैं अथवा प्रशासन की गुड बुक में आने की जद्दोजहद करते रहते हैं. ज्यादातर देखने में आ रहा है कि मतदाता जागरूकता कार्यक्रमों में रैली के लिए, गोष्ठी के लिए अथवा किसी कार्यक्रम के लिए माध्यमिक विद्यालयों को, महाविद्यालयों को प्रशासन द्वारा पकड़ सा लिया जाता है, उनके विद्यार्थियों के रूप में संख्याबल बना लिया जाता है. पोस्टरतथा अन्य प्रचार-सामग्री साथ में मीडिया की उपस्थिति फिर फोटो सेशन, कुछ भाषणबाज़ी और निपट गया मतदाता जागरूकता कार्यक्रम. इस बार जिला प्रशासन अन्य तरीके अपनाने के साथ मानव श्रृंखला बनाये जाने पर भी जोर दे रहा है. शहर भर में सड़क के किनारे खड़े सरकारी कर्मी, विद्यालयों, महाविद्यालयों के विद्यार्थी, समाजसेवी आदि मतदाता जागरूकता अभियान सम्बन्धी नारे लगाते अपनी उपस्थिति दिखाने में लगे हुए हैं. 



आखिर ऐसे अभियानों का, कार्यक्रमों का और गोष्ठियों आदि का औचित्य क्या है? सिर्फ मतदाता को जागरूक बनाकर, अधिक से अधिक मतदान करवा कर क्या सिद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है? कहीं न कहीं नागरिकों की सक्रियता के चलते, चंद महाविद्यालयों, विद्यालयों के विद्यार्थियों के संख्याबल से, प्रशासनिक मातहतों के ज़रिये प्रशासन अधिक मतदान पर चुनाव आयोग के सामने अपनी पीठ खुद ठोंक लेता है. इसके अलावा कुछ और परिवर्तन होता नहीं दीखता है. बदलाव की जिस पहल की बात की जा रही है, वो देखने को नहीं मिलती है; मतदाताओं को उसकी शक्ति, उसके अधिकारों का जो झुनझुना पकड़ाया जाता है उसमें स्थायित्व नहीं दीखता है. आखिर जब तक चयन के लिए सही लोग सामने नहीं आयेंगे, तब तक अधिक मतदान से क्या मिलने वाला है? चुनाव आयोग जिस तरह से अधिक मतदान के लिए, निष्पक्ष मतदान के लिए, मतदाता जागरूकता के लिए कमर कसे रहता है, उसी तरह राजनैतिक दलों के लिए भी उसे मुस्तैद होना पड़ेगा. 



आखिर अधिक से अधिक मतदान करना ज्यादा उपयुक्त है या फिर सही व्यक्ति को मतदान करने की आवाज़ उठाना ज्यादा उपयुक्त है? आज जिस तरह से धर्म-मजहब के आधार पर, जातिगत आधार पर, क्षेत्रगत आधार पर मतदान होने लगा है उससे अधिक से अधिक मतदान का औचित्य समझ नहीं आता है. मतदाता को शक्तिशाली, सत्ता बदलने वाला भले ही बताया जाता हो किन्तु उसके अधिकार, उसकी शक्ति बस उसी समय तक काम करती है जबकि वो मतदान करने के लिए बटन दबाता है. उसके बाद उसके हाथ में न तो अपने प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार होता है और न ही उसके स्थान पर किसी और को सदन में भेजने का. ठगा सा खड़ा रहकर बस वो अगले चुनाव का इंतज़ार करता है. जागरूक होकर मतदाता जब मतदान स्थल पहुँचता है तो उसे वही भ्रष्ट, अपराधी, सुस्त, कामचोर प्रवृत्ति के प्रत्याशी दिखाई देते हैं. ऐसे में उसके जागने का क्या अर्थ निकला? ऐसे में नोटा जैसा विकल्प भी उसके किसी काम का नहीं होता. शातिर प्रत्याशी ऐसे में और आगे निकल जाता है. अब मतदाताओं के जागने की नहीं, मतदाताओं को जागरूक करने की नहीं वरन राजनैतिक दलों को, राजनीतिज्ञों को जागरूक करने की आवश्यकता है. उनको इसके लिए जागरूक करने की जरूरत है कि वे निष्पक्ष छवि के लोगों को, जनप्रिय लोगों को, ईमानदार लोगों को चुनाव मैदान में उतारें. उनको इसके लिए जागरूक करना होगा कि वे दल-बदलुओं को टिकट न दें; इसके लिए भी जागरूक करना होगा कि शराब, धन-बल, बाहू-बल से वोट खरीदना बंद किया जाये; उनको इसके लिए भी जागरूक करना चाहिए कि कम से कम धन-खर्च में इस लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को संपन्न कराएँ. क्या कोई रास्ता है अथवा मतदाताओं को जागरूक करने का ढोल पीटा जाता रहेगा; मतदाता जागरूकता अभियान निपटाया जाता रहेगा और जागरूक मतदाता उसी तरह से कई चोरों में एक चोर को, अनेक भ्रष्टों में एक भ्रष्ट को, तमाम अपराधियों में एक अपराधी को चुनता रहेगा. 



राजनैतिक सुधार के लिए उतरो मैदान में

चुनाव आते ही सम्बंधित प्रदेश के लोग, लगभग सभी लोग अपनी-अपनी तरह से सक्रिय हो जाते हैं. राजनीतिज्ञ अपने स्तर पर सक्रियता दिखाने लगते हैं तो उनके समर्थक अपनी तरह की सक्रियता में संलिप्त हो जाते हैं. इसके साथ ही निर्वाचन आयोग, जिला प्रशासन भी सक्रियता से अपने दायित्वों का निर्वहन करने में जुट जाते हैं. चुनावों में इन दो पक्षों की प्रत्यक्ष भूमिका के अलावा बहुत से ऐसे पक्ष होते हैं जो कहीं न कहीं सक्रिय राजनीति में संलिप्त न होने के बाद भी पूरे चुनावी मौसम में सक्रिय दिखाई देते हैं. ऐसे लोगों में एक तो वे लोग होते हैं जो किसी न किसी रूप में चुनावी कार्यों से जुड़े होते हैं. इनमें बैनर, पोस्टर, होर्डिंग छापने वाले, राजनीतिज्ञों के पक्ष में प्रचार-प्रसार करने वाले लोग शामिल होते हैं. इसके अलावा एक दूसरा पक्ष वो होता है जिसकी चुनावों में किसी तरह की कोई भागीदारी नहीं होती है, सिवाय मतदान करने के किन्तु इसके बाद भी उसके द्वारा सर्वाधिक सक्रिय भूमिका का निर्वाह किया जाता है. ये पक्ष चुनावी क्षेत्र में सभी जगह पाया जाता है. क्या गाँव, क्या शहर. क्या गली क्या चौराहा. क्या चाय की दुकान क्या पान की गुमटी. क्या दफ्तर क्या बाज़ार. सर्वत्र इस पक्ष की उपस्थिति रहती है. और सर्वाधिक गौर करने वाली स्थिति ये होती है कि इस पक्ष के द्वारा अपने-अपने तर्कों से अपने-अपने समर्थन वाले दल की सरकार तक बनवा दी जाती है. अपने मन का प्रतिनिधि चुनवा लिया जाता है. अपनी पसंद का मुख्यमंत्री बना लिया जाता है. 



देश, प्रदेश को संचालित करने वाली सबसे अहम् प्रक्रिया को, सबसे महत्त्वपूर्ण कदम राजनीति को आज उससे दूर होते जा रहे प्रबुद्ध वर्ग ने नाकारा साबित करवा दिया है. राजनीति को सबसे निकृष्ट कोटि का काम सिद्ध करवा दिया है. इसी कारण गली-चौराहे-नुक्कड़ पर खड़े लोग राजनीतिक चर्चा में तो संलिप्त दिखाई पड़ जाते हैं, उसकी अच्छाइयों से ज्यादा उसमें बुराइयों को खोजने का काम करते हैं, उसमें सक्रिय ईमानदार लोगों से अधिक उसमें सक्रिय भ्रष्ट-माफिया लोगों की अधिक चर्चा करते हैं. इसका दुष्परिणाम ये होता है कि राजनीति के नकारात्मक प्रचार का एक से बढ़ते हुए अनेक तक चला जाता है और समाज की एक सोच ये बनती चली जाती है कि वर्तमान में राजनीति से अधिक घटिया, अधिक बुरी कोई चीज नहीं. आखिर, किसी ने कभी इस पर विचार किया है कि राजनीति कब, कैसे भ्रष्ट बना दी गई? कब, कैसे राजनीति को बुराई का समर्थन करने वाला सिद्ध कर दिया गया है? किसने राजनीति को गन्दा बना दिया है? शायद राजनीति पर, गठबंधन पर, चुनावों पर, जनप्रतिनिधियों पर, सरकार के कार्यों पर लम्बी-लम्बी बहस करने का समय सबके पास है. अपने-अपने बनाये निष्कर्षों को थोपने का समय सबके पास है. अपने पूर्वाग्रहों को दूसरों पर लादने के लिए अनुभव सबके पास है. यदि किसी के पास कुछ नहीं है तो वो ये कि लोगों के बीच जाकर राजनीति की असलियत को समझाने का काम किया जाये. यदि समय नहीं है तो इस बात का कि अपनी आने वाली पीढ़ी को बता सकें कि बिना राजनीति के ये देश एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता है. यदि समय नहीं है तो इसके लिए नहीं है कि लोगों को राजनीति के विरुद्ध करते नकारात्मक प्रचार से रोका जा सके.


राजनीति के प्रति राजनीति से प्रबुद्धजनों के मोह-भंग ने, राजनीति के बढ़ते अपराधीकरण ने, राजनीति के प्रति होते नकारात्मक प्रचार ने, राजनीति के प्रति अपनी भावी पीढ़ी को प्रेरित न कर पाने ने राजनीति को दो कौड़ी का बना दिया है. आज प्रत्येक मतदाता राजनीति पर बड़ी लम्बी-लम्बी चर्चा करने का दम रखता है मगर अपनी संतानों को राजनीति में आने को प्रेरित नहीं करता. उसके द्वारा राजनीति में आती गिरावट पर चिंता व्यक्त की जाती है मगर उसके उसमें सुधार के लिए भावी पीढ़ी को आगे नहीं किया जाता. ऐसे लोगों की बातों में राजनीति की गिरावट दिखती है मगर इनके मन में बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी के लुभावने पैकेज के सपने सजे होते हैं. प्रत्येक नागरिक को समझना होगा कि किसी भी सदन के लिए एक निश्चित समयावधि के बाद अपनी सीटों को भरा जाना अनिवार्य है. यदि अच्छे लोग राजनीति में आकर चुनावों में नहीं उतरेंगे तो सदन अपने आपको ऐसे लोगों से भर लेगा जो उस समय चुनाव-मैदान में होंगे. ये स्थिति धीरे-धीरे बढ़ती गई और आज बहुतायत में हालत ये है कि अच्छे लोग राजनीति से, चुनावी मैदान से बाहर हैं और अपराधी किस्म के लोग राजनीति में प्रवेश करते जा रहे हैं. राजनीति में आती जा रही गंदगी सिर्फ बातें करने से, अनावश्यक बहस करने से दूर नहीं होने वाली. यदि इसे साफ़ करना है, राजनीतिक गंदगी को मिटाना है तो राजनीति की बातें नहीं वरन राजनीति करनी होगी. आज के लिए न सही, कल के लिए.... अपने लिए न सही, अपनी भावी पीढ़ी के लिए लोगों को जागना होगा. 

असुरक्षित माहौल में सुरक्षा

स्वागत हो रहा था नए साल का. स्वागत हो रहा था इस अवसर पर आयोजित पार्टियों में शामिल होने वालों का. कोई भीड़ में नए साल का उत्सव मना रहा था तो कोई अकेले में इसका आनंद उठा रहा था. किसी ने अपने उल्लास को जल्द निपटा लिया तो किसी के लिए ये आयोजन देर रात तक चलता रहा. इस उमंग, मस्ती, हुल्लड़ के आयोजन के बाद एकाएक समाज का पुरुष समुदाय अपने आपको शर्मिंदा महसूस करने लगा. अचानक से ऐसा कुछ हुआ कि सम्पूर्ण देश को लगने लगा कि मानवता कलंकित हो गई. इस शर्मिंदा होने के पीछे, कलंकित होने जैसी भावना के पीछे बैंगलूरू में घटित छेड़खानी की घटनाएँ रहीं. शाम से शुरू पार्टी का सुरूर अचानक से उस समय उतरता महसूस होने लगा जबकि भीड़ में उपस्थित कुछ असामाजिक तत्त्वों ने वहाँ उपस्थित लड़कियों के साथ शारीरिक छेड़खानी करनी शुरू कर दी. इस शर्मिंदगी पूर्ण घटना में उस समय और वृद्धि हुई जबकि देर रात लगभग तीन बजे एक सुनसान सी गली में एक अकेली लड़की के साथ भी छेड़खानी की गई. दोनों घटनाओं के वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हो गए और उनके आते ही सम्पूर्ण समाज में शर्मिंदगी की, पुरुष होने पर ग्लानि होने की लहर सी दौड़ गई. महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की ये कोई पहली घटनाएँ नहीं थीं. इससे पहले भी महिलाओं के साथ छेड़खानी की, उनके साथ शारीरिक दुराचार की खबरें लगातार सामने आती रही हैं. फिर इस बार ऐसा क्या हुआ कि अचानक से बहुतेरे पुरुषों को अपने पुरुष होने पर ग्लानि होने लगी? इन दो घटनाओं में ऐसी क्या विशेष बात रही कि समाज खुद को कलंकित महसूस करने लगा?



जिस तेजी से आपराधिक प्रवृत्ति के युवाओं ने इन घटनाओं को अंजाम दिया उसी तेजी से सम्पूर्ण देश में इन दोनों घटनाओं पर बहस आरम्भ हो गई. सामान्यजन से लेकर ख़ास, नेता से लेकर कलाकार तक, स्त्री से लेकर पुरुष तक सब बहस में भाग लेते दिखे. स्पष्ट था कि कोई भी उन युवकों के प्रति किसी तरह की सहानुभूति नहीं रख रहा था जो छेड़छाड़ की घटना में संलिप्त पाए गए. ऐसी किसी घटना पर अपराधियों का पक्ष लिया भी नहीं जाना चाहिए मगर क्या देशव्यापी बहस के साथ ही ऐसी किसी समस्या का निदान हो जायेगा? कुछ वर्ष पूर्व दिल्ली के निर्भया कांड से चर्चित गैंगरेप मामले के बाद किसी तरह की सख्ती अपराधी मानसिकता वालों पर लगाई जा सकी है? क्या किसी भी स्तर पर महिलाओं की, लड़कियों की, कामकाजी महिलाओं की सुरक्षा के सम्बन्ध में कोई कठोर कदम उठाया गया है? क्या कहीं भी किसी महिला को सुरक्षित वातावरण होने का एहसास हुआ है? आज शायद ही कोई जगह बची हो जहाँ महिलाओं के साथ असुरक्षा का वातावरण न बना हो. ऐसे में क्या किया जाये? क्या महिलाओं को ऐसी कुंठित मानसिकता वाले लोगों के हवाले छोड़ रखा जाये? क्या इसी तरह से किसी भी घटना के सामने आने के बाद बहस कर ली जाया करे? क्या किसी भी घटना के बाद पुरुष-महिलाओं के एकदूसरे को गरियाने का काम करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेनी चाहिए? क्या पहनावे, मानसिकता को लेकर आपसी तर्क-कुतर्क के द्वारा ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगाया जा सकता है?

यदि हम सब वाकई महिलाओं के साथ होने वाली छेड़छाड़ की घटनाओं को रोकना चाहते हैं, उन पर अंकुश लगाना चाहते हैं तो हम सभी को मिलकर इसके मूल में जाना होगा. पहचानना होगा कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? जानना होगा कि ऐसे कौन से कारक हैं जो पुरुषों को महिलाओं के विरुद्ध छेड़खानी को उकसाते हैं? ऐसी घटनाओं के बाद हरबार पुरुषों की तरफ से आवाज़ उठती है कि महिलाओं का पहनावा ऐसी घटनाओं के लिए जिम्मेवार है. इसके उलट महिलाओं की तरफ से आरोप लगाया जाता है कि पुरुष मानसिकता बलात्कारी है, उसे बस मौका चाहिए होता है. ज़ाहिर सी बात है कि आपसी विवाद से किसी समस्या का हल नहीं निकलना है. यहाँ एक बात ध्यान रखनी होगी कि वर्तमान में न केवल जागरूक होने की जरूरत है वरन सशक्त, सचेत होने की जरूरत है. इससे शायद ही किसी को इंकार हो कि आज का माहौल असुरक्षित हो गया है. न केवल महिलाएँ ही वरन पुरुष भी असुरक्षा महसूस करने लगे हैं. कहीं भी लूट लिया जाना. कहीं भी मारपीट का शिकार बन जाना. आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों द्वारा उनकी हत्या करना. इसी तरह से बच्चे भी आज कहाँ सुरक्षित हैं? स्कूल में, बाजार में, पार्कों में, मोहल्ले में भी वे असुरक्षा महसूस करते हैं. आये दिन बच्चों के अपहरण की घटनाएँ हमारे सामने आती रहती हैं.


ऐसे में जबकि सम्पूर्ण वातावरण असुरक्षित दिख रहा हो तब महज पहनावे को लेकर, युवकों की मानसिकता को लेकर किये जाने अनर्गल विमर्श से कुछ हल नहीं निकलने वाला. यदि माहौल असुरक्षित है तो पहले हमें सुरक्षित रहने की जरूरत है. अपने परिजनों की सुरक्षा के प्रति हमें सचेत होने की आवश्यकता है. अपने घर के बाहर कार, बाइक आदि खड़ी करने पर हम उसमें ताला लगाते हैं, अपने घर को तालेबंदी में रखते हैं, अपनी छोटी से छोटी वस्तु को सुरक्षित रखने का प्रयास करते हैं फिर अपने परिजनों को आपराधिक तत्त्वों के हाथों में सहजता से क्यों सौंप देते हैं? यहाँ बात किसी भी व्यक्ति को ताले में रखने की नहीं वरन उनकी सुरक्षा व्यवस्था की है. अपने घर की लड़कियों को सुरक्षा के सम्पूर्ण उपायों के बारे में बताया जाये. एकांत, सुनसान वातावरण आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के लिए उत्प्रेरक का कार्य करता है. ऐसे में अपने बेटे-बेटियों को समझाएं कि अकेले में, सुनसान में किसी विपत्ति के आने पर उससे कैसे निपटना है. असल में आधुनिकता के वशीभूत आज ऐसे किसी भी उपाय को बताना, अपनाना लड़कियों पर अंकुश लगाने जैसी भावना के रूप में प्रचारित किया जाने लगता है. ऐसे माता-पिता को पिछड़ा सिद्ध किया जाने लगता है जो अपने बच्चों की सुरक्षा के प्रति ज्यादा ही सचेत दिखते हैं. ऐसे घर-परिवार को संकुचित मानसिकता का बताया जाने लगता है जो देर रात अपने बच्चों को घर से बाहर नहीं रहने देते हैं. यहाँ समझना होगा कि यदि वातावरण असुरक्षित है तो फिर सुरक्षा हमें ही करनी होगी. यदि ऐसा करने में हम असफल रहते हैं अथवा जानबूझकर ऐसा नहीं करते हैं तो इसका सीधा सा अर्थ है कि हम अपने लोगों को खुलेआम आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के हाथों में सौंप रहे हैं. 

हथियारों के सहारे शांति

वर्तमान कालखंड की कितनी बड़ी विसंगति ये है कि एक तरफ सकल विश्व शांति की बात करता है दूसरी तरफ इसी वैश्विक सभ्यता के देश खुद को हथियारों से संपन्न किये जा रहे हैं. शांति, अहिंसा की बात करने वाले देश भी हथियारों को बनाने, खरीदने, जमा करने की अंधी दौड़ में शामिल हैं. ये देश जितने गर्व से अपने देशों में अमन-चैन बढ़ाने वाले कार्यों की पैरवी करते हैं उसी अहंकार से अपने हथियारों की मारक क्षमता का प्रदर्शन भी करते हैं. समझ से परे है आज का दौर कि आखिर सभी देश चाहते क्या हैं? सभी देशों को भली-भांति ज्ञात है कि हथियारों की इस दौड़ से समूचा विश्व अंततः विनाश की ओर ही जा रहा है, इसके बाद भी हथियारों के प्रति मोह कम नहीं हो रहा है. हथियारों का संग्रह करते इन देशों को ये भी मालूम है कि वर्तमान दौर में कोई भी देश युद्ध जैसी स्थिति को नहीं चाहता है. इस सोच का सबसे बड़ा उदाहरण भारत-पाकिस्तान के संबंधों से ही दिखाई देता है. पाकिस्तान के जन्म से ही दोनों देशों के मध्य विवादों की स्थिति बनी रही है. प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष युद्धों से भी देश जूझता रहा है, सीमा-पार आतंकवाद से भी देश लगातार जूझ रहा है किन्तु इसके बाद भी भारत की केन्द्रीय सत्ता कभी युद्ध जैसी स्थिति नहीं चाहती है. पाकिस्तान से लगातार होते आ रहे विवादों, आतंकी हमलों के बाद भी भारत का प्रयास यही रहता है कि विवादों का अंत युद्ध के बजाय शांति से ही हो. इसके बाद भी भारत की तरफ से अत्याधुनिक हथियारों का बनाया जाना लगातार ज़ारी है.


देश की तरफ से अभी पृथ्वी का सफल परीक्षण किया गया. इसकी मारक क्षमता के बारे में कहा जा रहा है कि आधी दुनिया इसकी जद में आ गई है. पृथ्वी की मारक क्षमता के साथ-साथ इसकी गति, इसकी भारक्षमता के बारे में भी देश ने गर्व से बताया. समूची दुनिया को आभास कराया गया कि हथियारों की शक्ति के मामले में देश अन्य विकसित देशों के समकक्ष हो गया है. भारत देश सदा से ही शांति, अहिंसा की बात करता रहा है, समूची दुनिया में अमन-चैन के संदेशों का प्रसारण करता रहा है ऐसे में उसके द्वारा हथियारों का संग्रह आश्चर्य से कम नहीं है. यहाँ वैश्विक सन्दर्भ में एक तथ्य को ध्यान रखना भी अपेक्षित है कि एक तरफ जहाँ विश्व समुदाय की महाशक्ति कहे जाने वाले देशों ने हथियारों का निर्माण, संग्रह खुद को सशक्त बनाने, अन्य देशों पर अपना प्रभुत्व ज़माने के लिए किया वहीं भारत की तरफ से हथियारों का निर्माण, संग्रहण एक तरह की मजबूरी रही है. एक तरफ हमारा देश जहाँ पड़ोसी देशों के विश्वासघातों से दो-चार होता रहा है वहीं दूसरी तरफ अनेक पश्चिमी देशों द्वारा किसी न किसी रूप में भारतीय उपमहाद्वीप में अपना कब्ज़ा ज़माने के अवसरों को जवाब देता रहा है. छोटे-बड़े किसी भी हमले के जवाब के लिए, हमलों को रोकने के लिए देश का शक्ति-संपन्न होना अत्यावश्यक है. इसी कारण से भारत ने समय-समय पर अपनी तकनीक को उन्नत किया, अपने हथियारों के संग्रह को उन्नत किया, हथियारों की मारक क्षमता को बढ़ाया है. परमाणु हथियारों की सम्पन्नता, प्रक्षेपास्त्रों का निर्माण, मिसाइलों का संग्रह आदि के द्वारा भारत खुद को लगातार शक्तिशाली बनाता रहा है.
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आज भले ही देश के लिए ये गर्व की बात हो कि वह शक्तिसंपन्न देशों की श्रेणी में शामिल हो गया है, लगातार शक्ति सम्पन्न होता जा रहा है किन्तु ऐसे हथियारों का उपयोग शायद ही कभी किया जाये. महाशक्ति माने जाने वाले देश भी शायद ही इनका उपयोग कभी करना चाहें. फिर सवाल उठता है जब हथियारों का उपयोग किया ही नहीं जाना है तब आखिर इनका निर्माण किसलिए? क्या इन्हीं हथियारों ने आतंकी संगठनों को जन्म तो नहीं दिया है? क्या शक्तिसंपन्न देशों ने हथियारों का बाजार बनाकर समूचे विश्व को संकट के मुहाने पर खड़ा नहीं कर दिया है? तीसरे विश्व के नाम से जाने वाले देशों में हथियारों की होड़ पैदा कर देना इन्हीं महाशक्तियों की साजिश तो नहीं? आखिर जिन देशों में अनेकानेक समस्याएँ आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई हैं वहाँ हथियारों के प्रति मोह किसलिए? खुद हमारा देश भी आजतक बेरोजगारी, गरीबी, बीमारियों आदि से पार नहीं पा सका है किन्तु सीमा-पार से उत्पन्न होते संकट के चलते हथियारों का जखीरा लगाने को मजबूर है. विज्ञान, तकनीक का उपयोग इंसानी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए होने के साथ-साथ विध्वंस के लिए भी किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है. इक्कीसवीं सदी का डेढ़ दशक गुजर जाने के बाद भी बहुत सारे सवाल आज भी निरुत्तर हैं. शांति, अमन, चैन तलाशते विश्व का हथियारों के प्रति मोह आज भी बरक़रार है. याद रखना होगा कि शांति, अमन, चैन का माहौल इन्हीं के सहारे बन सकता है न कि हथियारों के सहारे. ध्यान रखना होगा कि हथियारों का जमावड़ा देश की शक्ति-सम्पन्नता तो बढ़ता है साथ ही उसके अन्दर निर्भयता की जगह भय ही बढ़ाता है. हथियारों के बल पर शांति इक्कीसवीं सदी का सबसे बड़ा झूठ है. 

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