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11 June 2017

हताश विपक्ष की कुंठित प्रतिक्रिया

शून्य को भरने के लिए समाज में सलाह दी जाती है सकारात्मक सोच की, सार्थक कार्य करने की. इसके उलट राजनीति में शून्य को भरने के लिए विशुद्ध राजनैतिक हथकंडे अपनाये जाते हैं. इन हथकंडों को अपनाने में खून भी बहाना पड़े, आग भी लगानी पड़े, झूठ का सहारा लेना पड़े तो भी कम है. वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में केंद्र से विपक्ष लगभग शून्य की स्थिति में है. वर्तमान लोकसभा में गिने-चुने दलों को अवसर मिल पाया कि उनके प्रतिनिधि सदन में बैठ सकें. केन्द्रीय सत्ता के कार्यों और उसके प्रतिनिधियों के चाल-चलन में खोट न निकाल पाने के कारण, विगत तीन वर्षों में किसी भी तरह के घोटाले न निकाल पाने के कारण, केन्द्रीय नेतृत्व के कार्यों से जनता को असंतुष्ट न देख पाने के कारण विपक्षी दलों में हताशा का माहौल है. इसको महज ऐसे समझा जा सकता है कि देश भर में जबरदस्त विरोधी रहे विपक्षी दल भी आपस में गलबहियाँ करते दिख रहे हैं. ये गलबहियाँ समाजहित में नहीं हैं, देश की भलाई के लिए नहीं हैं, राजनैतिक सुधार के लिए नहीं हैं वरन केंद्र की सरकार को हटाने के लिए हैं. इन लोगों को खुद से एक सवाल करना चाहिए कि आखिर केंद्र की सरकार ने ऐसे कौन से काम किये हैं जो जिसको लेकर उसे हटाने की बात की जाये? देखा जाये तो विपक्षियों के पास वर्तमान में कोई मुद्दा नहीं है इसलिए उनके द्वारा ऐसे कार्यों को अंजाम दिया जा रहा है जिसके चलते देश में, समाज में तनाव का माहौल बने और लोगों में केंद्र के प्रति भाजपा के प्रति नफरत पैदा हो. विपक्षियों की इस सोच के पीछे का मूल कारण दो वर्षों में संपन्न होने वाले लोकसभा चुनाव हैं. उनकी सोच है कि समाज में इस तरह के तनाव पैदा करने से केंद्र के प्रति, भाजपा के प्रति नाराजगी पैदा होगी जो विपक्षियों के लिए लाभदायक रहेगी.

विपक्षियों की इसी नकारात्मक सोच का परिणाम है कि केरल में कांग्रेसियों द्वारा खुलेआम एक गाय को काट डाला गया, उसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया में चलाया गया. इसी तरह खबर आई है कि विधायकों ने अपनी बैठक के पहले बीफ खाकर केंद्र सरकार के पशुवध सम्बन्धी नियम का विरोध जताया है. बिना सम्पूर्ण नियमावली को देखे-पढ़े सिर्फ विरोध करने के नाम पर विरोध की राजनीति ने ऐसे कृत्यों को अंजाम दिया. कुछ इसी तरह का कार्य आजकल मध्य प्रदेश में देखने को मिल रहा है. जहाँ किसानों के आन्दोलन के नाम पर हताश-निराश विपक्ष अपने कार्यकर्ताओं के साथ सड़क पर है. किसानों की कर्जमाफी के नामपर जिस तरह का उपद्रव पिछले कुछ दिनों से प्रदेश की सड़कों पर दिख रहा है वह किसी भी रूप में किसानों का आन्दोलन नहीं लग रहा है. कारों, बसों को जला देना, यात्रियों से भरी बस में तोड़फोड़ करना आदि लक्षण नहीं हैं किसी भी किसान आन्दोलन के. इसका प्रमाण भी वो वीडियो दे रहा है जिसमें एक विधायक को थाने में आग लगा देने की बात कही जा रही है. असल में देश भर में जहाँ-जहाँ विपक्षी कमजोर हैं अथवा भाजपा तेजी से उठ रही है वहाँ-वहाँ विपक्षियों की एक सोची-समझी साजिश के द्वारा ऐसे कार्य किये जा रहे हैं.

कार्यों में नकारात्मकता खोजने में विफल विपक्ष, घोटाले-विहीन सरकार की लोकप्रियता में वृद्धि देख कर घबराता विपक्ष, सरकार के राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के कार्यों में सफलता देखकर हताश होते विपक्ष के पास कोई मुद्दा शेष भी नहीं है जिसके आधार पर वे जनता के बीच जा सकें. इसके चलते वे सिवाय नफरत, गुंडागर्दी फ़ैलाने के कुछ और नहीं कर पा रहे हैं, न कुछ और सोच पा रहे हैं. विपक्ष का ये रवैया किसी भी रूप में न तो भाजपा के लिए घातक है और न ही केन्द्रीय सत्ता के लिए. यदि ये रवैया घातक है तो सिर्फ समाज के लिए. इस तरह के कृत्य से समाज में वैमनष्यता बढ़ने का खतरा रहता है आपसी तालमेल समाप्त होने की शंका उभरती है. विपक्षियों को आपस में गलबहियाँ करते समय विचार करना होगा कि उनका गठबंधन काहे के लिए हो रहा है? क्या वाकई वे समाज के लिए एक होना चाहते हैं? क्या उनके एक होने का मकसद सिर्फ सत्ता पाना है? क्या समाज को वाकई केन्द्रीय नेतृत्व से लाभ नहीं मिल रहा है? बहरहाल वर्तमान स्थिति में केन्द्रीय सत्ता को तथा भाजपानीत प्रादेशिक सरकारों को सजग रहने की आवश्यकता है क्योंकि विपक्षी हताशा-निराशा में माहौल बिगाड़ने के अलावा कोई और काम करेंगे नहीं. उनकी गिरती स्थिति का सूचक सिर्फ इतना है कि विपक्षी अब सरकार के कार्यों की बजाय उसके बयानों में कमियाँ खोजने का काम करने लगे हैं. जब देश का, प्रदेश का विपक्ष इतना कमजोर हो जाये कि वो कार्यों के बजाय शब्दों पर राजनीति करने लगे, किसी और के नाम पर अपने कार्यकर्ताओं को सड़क पर उतारने लगे, समाजहित की जगह पर समाज में विध्वंस फ़ैलाने लगे तो समझ लेना चाहिए कि वातावरण विषाक्त होने वाला है. 

05 June 2017

पॉलीथीन का नकार, पर्यावरण का बचाव

वर्तमान विकास के दौर में समाज पर्यावरण संकट के दौर से भी गुजर रहा है. वास्तविकता यह है कि इस संकट को खुद मनुष्य ने उत्पन्न किया है. इसके लिए किसी शक्ति को, किसी परमात्मा को, किसी प्राकृतिक आपदा को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है. मनुष्यों के द्वारा उत्पन्न किया गया पर्यावरण संकट आज मानव समाज के सामने एक चुनौती के रूप में आया है. विकास की अंधी दौड़ में इन्सान ने पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपने दायित्वों को विस्मृत कर दिया है. मानव ने आदिमानव से महामानव बनने के क्रम में प्रकृति को इस बात की परवाह किये बिना क्षतिग्रस्त किया है कि उसकी संतति प्रकृति से क्या पाएगी. स्व-विकास में लिप्त, स्वार्थ में लिप्त इंसान के लिए सोचने का भी समय नहीं कि जिस पर्यावरण में वह साँस ले रहा है, जिस प्राकृतिक वातावरण में वह जीवनयापन कर रहा है उसको नष्ट कर देने से सर्वाधिक नुकसान वह स्वयं का ही कर रहा है. दुष्परिणामस्वरूप पर्यावरण संकट सामने आया है.


सामान्य रूप से पर्यावरण का पारिभाषिक सन्दर्भ संस्कृत के परि उपसर्ग में आवरण शब्द को सम्बद्ध करने से लगाया जाता है अर्थात ऐसी चीजों का समुच्चय जो किसी व्यक्ति, जीवधारी, वनस्पति आदि को चारों तरफ से आवृत्त किये हो. पर्यावरण के सामान्य अर्थ से इतर यदि इसका सन्दर्भ निकालने का प्रयास किया जाये तो ज्ञात होता है वर्तमान में जो कुछ भी ज्ञात-अज्ञात हम अपने आसपास देख-महसूस कर रहे हैं, वो सभी पर्यावरण है. हमारे आसपास, हमारे लिए जीवन की एक सम्पूर्ण व्यवस्था का निर्माण करता है, उसे हम पर्यावरण कहते हैं. इसमें सजीव-निर्जीव वस्तुएँ, पेड़-पौधे, जीव-जंतु, हवा, पानी, मिट्टी, वनस्पति, सूर्य, चंद्रमा, तारे, धरती, आकाश आदि सभी समाहित किये जाते हैं. जल, धरती, आकाश, वायु आदि सभी के साथ वर्तमान में उसका व्यवहार दोस्ताना नहीं रह गया है वरन इनका अधिक से अधिक उपभोग करने की मानसिकता के साथ मनुष्य काम कर रहा है.

विकास के नाम पर शनैः-शनैः प्रकृति को क्षतिग्रस्त करके पर्यावरण में असंतुलन पैदा किया जा रहा है. सुख-समृद्धि के लिए उठाये जा रहे अदूरदर्शी क़दमों के कारण प्रकृति में जबरदस्त असंतुलन देखने को मिल रहा है. ओजोन परत में छेद होना, ग्लेशियरों का पिघलना, अम्लीय वर्षा का होना, बेमौसम की बरसात का होना, बर्फ़बारी की घटनाएँ आदि इस असंतुलन का दुष्परिणाम हैं. जल, वायु, ध्वनि, मृदा आदि प्रदूषण से उत्पन्न पर्यावरण असंतुलन मानव जीवन के साथ-साथ वन्य प्राणियों के, वनस्पतियों को खतरा पैदा कर रहा है. कल-कारखानों से निकलने वाला धुआँ, वाहनों से निकलती कार्बन मोनो आक्साइड तथा अन्य जहरीली गैसें, बिजली ताप घर से निकलती सल्फर डाई आक्साइड, धूम्रपान से निकलता विषैला धुआँ, तथा अन्य रूप में वातावरण में मिलती निकोटिन, टार अमोनिया, बेंजापाईरिन, आर्सेनिक, फीनोल मार्श आदि जहरीली गैसें व्यक्तियों, जंतुओं, वनस्पतियों आदि को व्यापक रूप से नुकसान पहुँचा रही हैं. ऐसे में इनसे बचाव के तरीके, इनकी रोकथाम के प्रयासों, प्रदूषण को कम करने पर विचार, पर्यावरण संतुलन बनाये जाने सम्बन्धी प्रयासों, प्रदूषण दूर करने-कम करने संबंधी क़दमों आदि की चर्चा अत्यावश्यक तो है ही, उनको अमल में लाया जाना उससे भी ज्यादा आवश्यक है.


इसमें भी हम देखते हैं कि सर्वाधिक नुकसान पॉलीथीन से होता समझ आ रहा है, दिख भी रहा है. जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है कि इसमें पाली एथीलीन होती है जो एथिलीन गैस बनाती है. इसमें पालीयूरोथेन नामक रसायन के अतिरिक्त पालीविनायल क्लोराइड (पीवीसी) भी पाया जाता है. पॉलीथीन हो या कोई भी प्लास्टिक, उसमें पाये जाने वाले इन रसायनों को नष्ट करना लगभग असंभव ही होता है क्योंकि प्लास्टिक या पॉलीथीन को जमीन में गाड़ने, जलाने, पानी में बहाने अथवा किसी अन्य तरीके से नष्ट करने से भी इसको न तो समाप्त किया जा सकता है और न ही इसमें शामिल रसायन के दुष्प्रभाव को मिटाया जा सकता है. यदि इसे जलाया जाये तो इसमें शामिल रसायन के तत्व वायुमंडल में धुंए के रूप में मिलकर उसे प्रदूषित करते हैं. यदि इसको जमीन में दबा दिया जाये तो भीतर की गर्मी, मृदा-तत्त्वों से संक्रिया करके ये रसायन जहरीली गैस पैदा करते हैं, इससे भूमि के अन्दर विस्फोट की आशंका पैदा हो जाती है. पॉलीथीन को जलाने से क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैस धुंए के रूप में वायुमंडल से मिलकर ओजोन परत को नष्ट करती है. इसके साथ-साथ पॉलीथीन को जमीन में गाड़ देना भी कारगर अथवा उचित उपाय नहीं है क्योंकि यह प्राकृतिक ढंग से अपघटित नहीं होता है इससे मृदा तो प्रदूषित होती ही है साथ ही ये भूमिगत जल को भी प्रदूषित करती है. इसके साथ-साथ जानवरों द्वारा पॉलीथीन को खा लेने के कारण ये उनकी मृत्यु का कारक बनती है.

ये जानते-समझते हुए भी बहुतायत में पॉलीथीन का उपयोग हो रहा है. यद्यपि केन्द्रीय सरकार ने रिसाइक्लड, प्लास्टिक मैन्यूफैक्चर एण्ड यूसेज रूल्स के अन्तर्गत 1999 में 20 माइक्रोन से कम मोटाई के रंगयुक्त प्लास्टिक बैग के प्रयोग तथा उनके विनिर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया था किन्तु ऐसे प्रतिबन्ध वर्तमान में सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गए हैं. इसका मूल कारण पॉलीथीन बैग की मोटाई की जांच करने की तकनीक की अपर्याप्तता है. ऐसे में पॉलीथीन के दुष्प्रभाव को रोकने का सर्वाधिक सुगम उपाय उसके पूर्ण प्रतिबन्ध का ही बचता है. पॉलीथीन के द्वारा उत्पन्न वर्तमान समस्या और भावी संकट को देखते हुए नागरिकों को स्वयं में जागरूक होना पड़ेगा. कोई भी सरकार नियम बना सकती है, अभियान का सञ्चालन कर सकती है किन्तु उसे सफलता के द्वार तक ले जाने का काम आम नागरिक का ही होता है. इसके लिए उनके द्वारा दैनिक उपयोग में प्रयोग के लिए कागज, कपड़े और जूट के थैलों का उपयोग किया जाना चाहिए. नागरिकों को स्वयं भी जागरूक होकर दूसरों को भी पॉलीथीन के उपयोग करने से रोकना होगा. हालाँकि अभी भी कुछ सामानों, दूध की थैली, पैकिंग वाले सामानों आदि के लिए सरकार ने पॉलीथीन के प्रयोग की छूट दे रखी है, इसके लिए नागरिकों को सजग रहने की आवश्यकता है. उन्हें ऐसे उत्पादों के उपयोग के बाद पॉलीथीन को अन्यत्र, खुला फेंकने के स्थान पर किसी रिसाइकिल स्टोर पर अथवा निश्चित स्थान पर जमा करवाना चाहिए. ये बात हम सबको स्मरण रखनी होगी कि सरकारी स्तर पर पॉलीथीन पर लगाया गया प्रतिबन्ध कोई राजनैतिक कदम नहीं वरन हम नागरिकों के, हमारी भावी पीढ़ी के सुखद भविष्य के लिए उठाया गया कदम है. इसको कारगर उसी स्थिति में किया जा सकेगा, जबकि हम खुद जागरूक, सजग, सकारात्मक रूप से इस पहल में अपने प्रयासों को जोड़ देंगे.


वर्तमान जीवनशैली को, व्यापारिक-वाणिज्यिक स्थिति को, कल-कारखानों-उद्योगों पर मानवीय उपलब्धता, मानवीय रहन-सहन के तौर-तरीकों आदि के चलते ये कल्पना ही लगता है कि सभी लोग पूर्णरूप से पर्यावरण संरक्षण हेतु प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं किन्तु ये कदापि असंभव नहीं कि एक-एक व्यक्ति खुद को सुधारने का काम कर ले तो पर्यावरण संकट को दूर न किया जा सके. पर्यावरण संकट से निपटने में सबसे बड़ी बाधा व्यक्ति का स्वयं के प्रति ईमानदार न होना ही है और जब तक इन्सान अपने प्रति ईमानदारी से कार्य नहीं करेगा, तब तक इस तरह के अत्यावश्यक कार्यों में समस्या उत्पन्न होती ही रहेगी. इस सम्बन्ध में मनुष्य को ही समाधानात्मक कदम उठाने होंगे. इससे भले ही समस्या पूर्ण रूप से समाप्त न हो पर बहुत हद तक इससे निपटने में सहायता मिल जाएगी.  

04 June 2017

तोहफे में जीत न दे आना उनको

पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध सुधारने की कवायद तबसे चलनी शुरू हो गई थी, जबसे उसका जन्म हुआ था. आये दिन किसी न किसी कदम के द्वारा ऐसा होता दिखता है. सम्बन्ध सुधार के दौर में पाकिस्तान की तरफ से बारम्बार इसको बाधित करने का उपक्रम भी चलाया जाता रहा है. एक तरह शांति-वार्ताएं चलती हैं तो दूसरी तरफ अशांति की हरकतें की जाने लगती हैं. पाकिस्तान का अपना इतिहास रहा है नित्य ही भारत के लिए समस्याएँ पैदा करने का. कभी युद्ध के द्वारा, कभी घुसपैठ के द्वारा, कभी आतंकी हमलों के द्वारा, कभी संयुक्त राष्ट्र में बेवजह कश्मीर के मुद्दे को उठाने के द्वारा.


पाकिस्तान की बात ही क्या की जाये, यदि अपने देश के इन नेताओं की, जिम्मेवार लोगों की ही बात की जाये तो ताजा घटनाक्रम में ही भारत-पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच को ही लिया जा सकता है. दोनों देशों के मध्य सम्बन्ध सहज हों, मधुर हों इसको स्वीकार करने वाले पर्याप्त संख्या में हमारे देश में मौजूद हैं. इसके साथ ही ऐसे लोग भी बहुत हैं जो खेलों के द्वारा, सांस्कृतिक वातावरण के द्वारा, साहित्य-कला के द्वारा दोनों देशों के संबंधों-रिश्तों को सुधारने की वकालत करते हैं. हालाँकि समस्त देशवासी ऐसा शत-प्रतिशत रूप से नहीं स्वीकारते हैं. बहुत से नागरिकों ने दोनों देशों के बीच क्रिकेट मैच का एकसुर से विरोध किया है. सोचने की बात है कि एक तरफ देश में सैनिकों के साथ-साथ अनेक मासूम, निर्दोष नागरिकों को पाकिस्तानी आतंक के चलते अपनी जान गँवानी पड़ रही है वहीं दूसरी तरफ सम्बन्ध सुधारने की कवायद में मगन रहने वाले मैच खेलने में लगे हुए हैं. ये अत्यंत शर्मनाक स्थिति तो है ही साथ ही अत्यंत अपमानजनक भी है. ये अपमान उन तमाम शहीदों का है जो आतंकी हमले का शिकार हुए; ये अपमान उन सैनिकों का है जो आये दिन सीमा पर पाकिस्तानी आतंकियों का, पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ का सामना करते हैं.

आज सम्पूर्ण विश्व इस बात को स्वीकारने लगा है कि भारत देश में आतंकी घटनाओं के पीछे पाकिस्तान का हाथ है और इससे भी कोई इंकार नहीं करता है कि भारतीय सेना महज इस कारण खामोश रही है कि हमारे देश की सरकारों ने सदैव शांति-वार्ताओं के द्वारा हल निकालना चाहा है. सेना की ख़ामोशी को कमजोरी समझने की भूल न तो पाकिस्तान को करनी चाहिए और न ही भारत में बैठे पाकिस्तान-प्रेमियों को ऐसा करने की छूट है. क्रिकेट हो या फिर कोई और मसला सभी में देश की अखंडता का, देश की सेना के मनोबल का, देशवासियों की भावनाओं का सम्मान किया जाना अनिवार्य होना चाहिए.


अंत में अपनी बात क्योंकि मैच तो रद्द होने से रहा. क्रिकेट का स्व-घोषित महामुकाबला होने वाला है. बहरहाल मैच का परिणाम कुछ भी हो, हमें एक बात का विशेष ध्यान रखना है कि जीतने अथवा हारने वाला देश नहीं होगा बल्कि किसी देश की क्रिकेट टीम जीतेगी और किसी देश की टीम मैच हारेगी. यह सुनना स्वयं में कितना खराब लगता है कि भारत हारा. हालांकि इस तरह की गलती स्वयं हमसे भी हो जाती है पर हमें ही इस बात का ध्यान रखना है कि गलती बार-बार न हो. आप स्वयं देखिये कई बार हमारी टीम बहुत बुरी तरह से हारी है तो मीडिया ने लिख दिया कि फलां देश ने भारत को बुरी तरह से रौंदा. हमारी क्रिकेट टीम हार सकती है, जीत भी सकती है पर हमारा देश भारत कभी नहीं हार सकता, उसे तो बस जीतना है और जीतना ही है.


एक अन्तिम बात कि हमें तो डर लग रहा है कि कहीं पाकिस्तान से दोस्ती दिखाने के चक्कर में हमारी टीम उनको जीत का तोहफा न दे डाले. दोनों देशों के इतने बड़े-बड़े हुक्मरान बैठे होंगे और हमारे देश में वैसे भी पाकिस्तान के सम्बन्ध में बहुत ही कोमल दिल रहता है. कहीं इसी कोमलता के, सहिष्णुता के दर्शन मैच में न हो जायें?

27 May 2017

तीन वर्ष के मोदी

राष्ट्रीय राजनीति का अनुभव न होने के बाद भी जिस तेजी से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने न केवल राष्ट्रीय राजनीति में वरन अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में अपने आपको स्थापित किया है वह प्रशंसनीय है. गुजरात मुख्यमंत्रित्व काल में उनकी छवि गुजरात दंगे और मुस्लिम विरोधी प्रचारित होने के चलते अमेरिका द्वारा उनको वीजा देने से इंकार कर दिया गया था. बाद में न सिर्फ अमेरिका ने वरन वैश्विक समुदाय ने मोदी जी की राजनैतिक सूझबूझ का लोहा माना और उनके माध्यम से देश के साथ मधुर संबंधों को मधुरतम बनाया. तीन वर्ष पहले प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते समय नरेन्द्र मोदी के सामने अनेकानेक चुनौतियाँ थीं. देश में अनेक समस्याओं के साथ-साथ विपक्षी बौखलाहट वाली भी एक समस्या प्रमुख थी. देश भर में छाई नमो लहर ने शेष दलों को जैसे हाशिये पर खड़ा कर दिया था. जाति, धर्म के नाम पर चलने वाली राजनीति को बहुत हद तक मतदाताओं ने आइना दिखा दिया था. ऐसे ने विपक्षियों में बौखलाहट आना स्वाभाविक था. इस बौखलाहट से निपटते हुए मोदी जी के सामने उसी गुजरात मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत करना था, जिसके सहारे वे लगातार गुजरात की राजनीति में अपना सिक्का जमाये हुए थे. भ्रष्टाचार-रिश्वतखोरी को दूर करना, कार्यप्रणाली को सही करना, जीवनशैली को सुचारू बनाना, हाशिये पर खड़े लोगों के हितार्थ काम करना, अल्पसंख्यकों के मन से नकारात्मकता को दूर करना, देश के चारित्रिक बदलाव की पहल करना आदि ऐसे काम थे जो सहजता से संपन्न होने वाले नहीं थे.


चुनौतियों के साथ काम करना संभवतः मोदी जी के साथ-साथ परछाईं की तरह लगा रहता है. राज्य की राजनीति में इसने कभी पीछा नहीं छोड़ा और राष्ट्रीय राजनीति में भी चुनौतियाँ साथ में आईं. उन्होंने इन चुनौतियों के साथ बड़ी ही सहजता से आगे बढ़ते हुए देश को नई ऊँचाइयों पर ले जाने का संकल्प लिया हुआ था. इसी संकल्प के जरिये वे संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा भारतीय विरासत योग को अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर स्थापित करने में सफल रहे. इसी तरह उन्होने देश के भीतर वर्षों से सुसुप्तावस्था में पड़े स्वच्छता विषय को जागृत किया. लाल किले से उनका स्वच्छता सम्बन्धी अभियान लगातार आगे बढ़ता नजर आ रहा है. मोदी जी की दृष्टि में जहाँ एक तरफ औद्योगिक विकास था वहीं आम जनमानस के विकास की बात भी वे करने में लगे थे. औद्योगिक घरानों को विशेष लाभ देने के आरोपों के बीच उन्होंने जनधन योजना के द्वारा समाज के हाशिये पर खड़े लोगों को देश की मुख्य विकासधारा से जोड़ने का काम किया. स्वच्छता को आधार बनाकर मोदी जी ने जिस तरह से शौचालय निर्माण का अभियान गाँव-गाँव तक पहुँचा दिया है वैसा विगत के वर्षों में देखने को कदापि नहीं मिला था. केंद्र सरकार ने उनके नेतृत्व में दिखाया कि वर्तमान सरकार जन-जन की सरकार है. जन-धन योजना, सामाजिक सुरक्षा बीमा योजना, अटल पेंशन योजना, उज्ज्वला योजना, बैंक खातों में सब्सिडी का आना, रसोई गैस की सब्सिडी का स्वेच्छा से त्याग करना आदि वे उदहारण हैं जो उनकी दूरगामी सोच को दर्शाते हैं. इन योजनाओं के पीछे का मूल उद्देश्य समाज में आदमी-आदमी के बीच के फर्क को कम करना, मिटाना रहा है. ऐसी योजनाओं के द्वारा सरकार ने आमजन को जोड़ने का काम किया, स्टार्टअप जैसे कार्यक्रम चलाकर देश के युवाओं को नई दिशा दी है, मेक इन इण्डिया के द्वारा विदेशी निवेशकों को आकर्षित किया है.


इसके बाद भी अभी चुनौतियाँ बहुत सारी हैं. तीन सालों में मोदी जी ने अभी जनमानस में विश्वास जमाया है. देश भर में फैली अव्यवस्था को दूर कर पाने में वे अभी सफल होते नहीं दिखे हैं. सबका साथ, सबका विकास के नारे को यदि वास्तविकता में लागू करना है तो मोदी जी को आमूलचूल परिवर्तन करने होंगे. ऐसे परिवर्तन करने की क्षमता उनमें है भी. ऐसा उन्होंने नोटबंदी करके दिखाया है, पाकिस्तान के प्रति कठोर रवैया अपनाकर प्रदर्शित किया है. इसके बाद भी उन्हें अभी और कड़े फैसले लेने की जरूरत है. कश्मीर समस्या, नक्सलवाद, कानून व्यवस्था, चिकित्सा, शिक्षा, कृषि, राजनैतिक वैमनष्यता आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जिनसे पार पाने की जरूरत है. विगत तीन वर्षों में मोदी जी ने जिस तरह से अपने कार्यों को, अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को आगे बढ़ाया है उससे उनकी मुस्लिम विरोधी छवि कम हुई है. अल्पसंख्यकों में भी विश्वास जगा है. इसी विश्वास के चलते ही मुस्लिम महिलाओं ने तीन तलाक जैसे संवेदनशील विषय पर मोदी जी का साथ चाहा है. देखा जाये तो विगत के कई-कई वर्षों की अनियमितता ने देश में कार्यशैली को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है. लोगों की सोच को भी नकारात्मक बनाया है. किसी भी काम के पीछे राजनैतिक दलों का लामबंद होना समझ में आता है किन्तु आम जनमानस को समझना होगा कि उसके लिए क्या सही है, क्या गलत है. मोदी सरकार अभी भी जनमानस की समस्याओं को सुलझाने के साथ-साथ राजनैतिक प्रतिद्वंद्वियों से जूझने के साथ-साथ मीडिया के नकारात्मक प्रचार-प्रसार से भी दो-चार हो रही है. ऐसे में आने वाले दो साल मोदी सरकार के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण होंगे. उन्हें न केवल जनता की समस्याओं को दूर करना है वरन देश के भीतर बैठे देश-विरोधियों की हरकतों को भी बढ़ने से रोकना है.

20 May 2017

अफवाह के चंगुल से बचें

किसी समय अंग्रेजों ने हमारे देश को मदारी, जमूरों का देश कहा था. सोने की चिड़िया कहे जाने वाले देश को पूरी तरह से लूटने के बाद गरीब बना दिए गए देशवासियों को अंग्रेज शासक कुछ भी समझने को आज़ाद थे. देश गुलाम था, देशवासी गुलाम थे ऐसे में वे यहाँ के नागरिकों को, देश को कुछ भी कह सकते थे. लम्बे संघर्ष के बाद, हजारों जाने-अनजाने वीर-वीरांगनाओं की शहादत रंग लाई और देश आज़ाद हुआ. अंग्रेज शासक चले गए किन्तु जाते-जाते वे अपनी मानसिकता का गहरा बीजारोपण यहाँ कर गए. जिसका दुष्परिणाम ये हुआ कि आज़ादी के बाद भी देश को जमूरा, मदारियों, नौटंकीबाजों का देश समझने वालों की कमी नहीं रही. गुलाम देश के अंग्रेजी शासकों की तर्ज़ पर आज़ाद देश के स्थानीय अंग्रेजों ने भी समय-समय पर देशवासियों के लिए अपनी-अपनी परिभाषायें निर्मित की. किसी ने बेवक़ूफ़ कहा, किसी ने कैटल क्लास बताया, किसी ने कुछ, किसी ने कुछ. इन परिभाषाओं को पुष्ट करने का काम समय-समय पर समाज में फैलती तमाम बातों ने भी किया है. इसमें भी सदैव से पढ़े-लिखे लोगों का भी बहुत बड़ा हाथ रहा है. कुछ दिनों पहले EVM के हैक किये जाने की अफवाह उड़ी. उसके भी पहले नोटबंदी के समय नए नोट को लेकर अनेक तरह की अफवाह फैलाई गईं. फोटोशॉप करके भी फोटो के द्वारा अफवाह फ़ैलाने का काम पढ़े-लिखे लोगों का ही होता है. अभी देखिये, एक पढ़े-लिखे विद्वान माने जाने वाले वकील साहब तीन तलाक जैसी नितांत अव्यवहारिक व्यवस्था की तुलना आस्था से करने बैठ गए. कुछ सालों पहले यही वकील साहब अदालत में हलफनामा देकर बता रहे थे कि जिस श्रीराम के प्रति हिन्दू आस्था व्यक्त करता है वे काल्पनिक हैं. 


इस अव्यावहारिक तुलनात्मक उदाहरण के साथ ही एक और घटनाक्रम दो-तीन दिन से बहुत तेजी से सबके बीच चलने में लगा है. इसमें लोगों को बताया-समझाया जा रहा है कि एक नौ अंकों के मोबाइल नंबर से फोन आएगा और उसे रिसीव करते ही मोबाइल फट जायेगा. हालाँकि अभी तक कहाँ-कहाँ मोबाइल फटा इसकी कोई जानकारी नहीं, इसके बाद भी इस मैसेज को लगातार-बराबर शेयर किया जा रहा है. ऐसे मैसेज समय-समय पर सोशल मीडिया की शान में चार चाँद तो लगाते ही हैं देशवासियों के सामान्य से ज्ञान पर भी रौशनी डालते हैं. कभी नमक की कमी होने लगती है, कभी कॉस्मिक किरणें रात को बारह बजे पृथ्वी के पास से निकलने लगेंगी, कभी कोई उल्का पिंड धरती पर गिरने की तैयारी करने लगता है. ऐसे में याद आता है सन 1980 के आसपास का समय जबकि स्काई लैब के गिरने की अफवाह बहुत तेजी से फैली थी. उस समय लोगों में मरने के डर से, सब खो जाने के भय से अफरातफरी मच गई थी. समझा जा सकता है कि उस समय तकनीक का, संचार साधनों का अभाव था किन्तु अब तो प्रत्येक व्यक्ति तकनीकी संपन्न है, संचार साधनों के सहारे समूचे विश्व से जुड़ा है. ऐसे में किसी भी तरह की अफवाह पर समाज के बहुत बड़े वर्ग का चिंताग्रस्त हो जाना अंग्रेजों और देशी-अंग्रेजों द्वारा यहाँ के बहुतायत नागरिकों के लिए कहे गए वचनों को सिद्ध करता है.


उस समय जबकि लोगों के पास शिक्षा के साधन कम थे, लोगों का परिचय तकनीक से दूर-दूर तक नहीं था तब उनका दिग्भ्रमित हो जाना स्वाभाविक था. तब उनके पास संचार के साधन भी नहीं थे, जो थे भी वे इतने उन्नत नहीं थे कि पल में सुदूर क्षेत्र की खबर का आदान-प्रदान कर सकें. ऐसी विषम स्थितियों में नागरिकों का अफवाहों के चंगुल में फँस जाना समझ आता है. आज जबकि तकनीकी दुनिया बहुत समर्थ है; आज जबकि लगभग हर हाथ में संचार साधन की उन्नत तकनीक है; आज जबकि एक पल में देश की ही नहीं वरन विदेश की किसी भी खबर को सामने खड़ा देख सकते हैं तब भी समाज का बहुत बड़ा वर्ग अफवाहों का शिकार बन जाता है, जालसाजी का शिकार बन जाता है. ऐसे समय में ये समझ से परे है कि आखिर ऐसा क्यों हो जाता है? आखिर ऐसा होने में दोषी कौन होता है? जो अफवाह फैलाकर, जालसाजी करके अपना उल्लू सीधा करता है या फिर वो जो इसका शिकार बन जाता है? आज जिस तेजी से तकनीक का विकास हुआ है, उसी तेजी से इसका दुरुपयोग करने वालों की संख्या में भी वृद्धि हुई है. तकनीक की आड़ लेकर कभी अफवाह के द्वारा लोगों को ठगने का काम किया जाता है तो कभी इसी तकनीक के सहारे अफवाह फैलाकर किसी लोभ-लालच का शिकार बनाया जाता है. आवश्यकता सजग रहने की है, सचेत रहने की है. तकनीकी रूप से सक्षम होने का अर्थ सोशल मीडिया में हस्तक्षेप बढ़ जाना नहीं है; तकनीकी ज्ञान का अर्थ किसी भी रूप में मोबाइल पर समूची दुनिया को कैद समझ लेना नहीं है वरन तकनीकी रूप से साक्षर होने का अर्थ है कि अपने आसपास होने वाले किसी भी घटनाक्रम के बारे में सही-सही जानकारी रखना. किसी भी अफवाह, घटनाक्रम के सामने आने टार उसकी सत्यता, उसकी प्रामाणिकता को पता करना. यदि ऐसा हम नहीं कर पा रहे हैं तो इसका सीधा सा अर्थ है कि हम सभी पढ़े-लिखे निरक्षर हैं. यदि ऐसा हम नहीं कर पा रहे हैं तो इसका सीधा सा अर्थ है कि हम आये दिन खुद को ठगी का शिकार बनवा रहे हैं. यदि हम ऐसा नहीं कर पा रहे हैं तो इसका सीधा सा अर्थ है कि हम खुद को, अपने वर्तमान को, भविष्य को खतरे में डाल रहे हैं. खुद को, परिवार को, समाज को, देश को खतरों से बचाने के लिए अफवाहों से बचने, उनके प्रचार-प्रसार से बचने, उनकी सत्यता प्रमाणित करने की आवश्यकता है. 

11 May 2017

बुद्ध को एक बार फिर मुस्कुराना होगा

इस बार बुद्ध पूर्णिमा, 10 मई के अगले दिन ही वो गौरवशाली दिन, 11 मई आया जब देश में बुद्ध मुस्कुराये थे. जी हाँ, 11 मई 1998 जब देश में दोबारा बुद्ध मुस्कुराये थे. इससे पहले वे सन 1974 में मुस्कुराये थे. देश के परमाणु इतिहास में दो बार भूमिगत परीक्षण किये गए और दोनों ही बार शांति-अहिंसा के परिचायक महात्मा बुद्ध का नाम इसके गुप्त सन्देश के रूप में उपयोग किया गया. यह सम्पूर्ण विश्व को यह सन्देश देने के लिए पर्याप्त और स्पष्ट है कि देश के परमाणु कार्यक्रम का उद्देश्य सिर्फ शांति-अहिंसा के लिए है, शांतिपूर्ण कार्यो के लिये है और यह परीक्षण भारत को उर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिये है. पोखरण में 11 और 13 मई 1998 को पाँच भूमिगत परमाणु परीक्षण करने के साथ ही भारत ने स्वयं को परमाणु शक्ति संपन्न देश घोषित कर दिया. 


राजस्थान के पोखरण में पाँच परमाणु विस्फोट होने से समूचे विश्व में तहलका मच गया था. इसका कारण किसी को भी इस कार्यक्रम की भनक न लग पाना रही. परीक्षण के इन धमाकों से सारा संसार चकित रह गया. ऑपरेशन शक्ति के रूप में शुरू हुए इस अभियान की भनक विकसित देशों के उपग्रहों को भी न लगने के पीछे कलाम साहब की बहुत बड़ी भूमिका रही. चूँकि 1995 में ऐसे कार्यक्रम को अमेरिकी उपग्रह द्वारा पकड़ लिया गया था, जिसके बाद अन्तर्राष्ट्रीय दवाब के आगे देश ने अपने उस कार्यक्रम को टाल दिया था. इस बार कलाम साहब अपनी टीम के साथ किसी भी तरह की हीलाहवाली के मूड में नहीं थे. उन्होंने गुप्त कोड के ज़रिये अपनी बातचीत को बनाये रखा. पोखरण में काम उसी समय किया गया जबकि उपग्रहों की नजर में वो जगह नहीं होती थी. परमाणु परीक्षण से सम्बंधित समस्त उपकरणों को सेब की पेटियों में लाया गया, जिससे किसी को शक न हो. परीक्षण पूर्व की पूरी तैयारी में कलाम साहब सहित समस्त वैज्ञानिक सेना की वर्दी में तथा सैन्य अधिकारियों के रूप में ही रहे जिससे यही लगे कि भारतीय सेना का कोई कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है. परीक्षण क्षेत्र के आसपास के ग्रामवासियों को भी परीक्षण के दिन तक किसी तरह का आभास नहीं होने दिया गया था.

तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी 20 मई को परीक्षण स्थल पहुंचे. उन्होंने देश को एक नया नारा जय जवान-जय किसान-जय विज्ञान दिया. सभी देशवासी प्रधानमंत्री के साथ-साथ गर्व से भर उठे. अमरीका, रूस, फ्रांस, जापान और चीन आदि देशों ने भारत को आर्थिक सहायता न देने की धमकी देते हुए प्रतिबन्ध भी लगा दिए किन्तु देश इन धमकियों के सामने नहीं झुका. देश ने इन्हीं प्रतिबंधों के बीच 13 मई 1998 को पोखरण में फिर से परमाणु परीक्षण करके सम्पूर्ण विश्व को स्पष्ट जवाब दे दिया था कि वो किसी भी ताकत के आगे झुकने वाला नहीं है. इन परीक्षणों को करने का मुख्य उद्देश्य विश्व को यह बताना था कि देश किसी भी सामरिक क्षमता का मुँहतोड जवाब देने में समर्थ है. अपनी सुरक्षा के लिए आत्मनिर्भर है.


आज से लगभग दो दशक पहले देश ने सम्पूर्ण विश्व को दरकिनार करते हुए, बहुत सारे विकसित देशों के प्रतिबंधों को नकारते हुए अपनी जीवटता का परिचय दिया था. आज जबकि देश तत्कालीन स्थितियों से कई गुना अधिक सक्षम है, कई गुना तकनीकी रूप से विकसित है, कई गुना अधिक वैश्विक समर्थन उसके साथ है उसके बावजूद चंद आतंकी ताकतों के सामने देश की शीर्ष सत्ता कमजोर नजर आ रही है. पड़ोसी देशों के समर्थन से संचालित आतंकवाद के सामने कमजोर पड़ती दिख रही है. पड़ोसी सेना के कायराना हरकतों के आगे चुप्पी साधे बैठी है. माना कि इन सबके लिए परमाणु हथियारों का उपयोग नहीं किया जा सकता है, किसी अन्य स्थिति में किया भी नहीं जाना चाहिए मगर देश के विरुद्ध षडयन्त्र कर रहे लोगों को, देश में हिंसा फैलाते आतंकियों को, देश की सेना के लिए मुश्किल बनती पड़ोसी सेना-आतंकियों को सबक सिखाने के लिए उसी परमाणु परीक्षण जैसा हौसला, जीवटता चाहिए जो पहले दिखा था. एक बार फिर से बुद्ध को मुस्कुराना होगा और इस बार भी उनके मुस्कुराने का उद्देश्य शांति स्थापित करना होगा, सेना का स्वाभिमान बरक़रार रखना होगा, देश की अखंडता को बनाये रखना होगा. 

07 May 2017

सख्त कदम उठाये सरकार घाटी में

पाकिस्तान के जन्म के साथ ही जम्मू-कश्मीर का विवाद शुरू हो गया था. आज तक आमजन के समझ के परे है कि देश के लिए पाकिस्तान के अलावा मुख्य समस्या क्या है, जम्मू-कश्मीर या फिर जम्मू-कश्मीर के निवासी? इस समस्या को सरकारों ने और भी जटिल बनाया है. देश की आज़ादी के तुरंत बाद जब रियासतों के विलय की प्रक्रिया चल रही थी, उस समय जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देकर तत्कालीन केंद्र सरकार ने अपने लिए समस्या को पैदा कर लिया था. संभव है कि तत्कालीन परिस्थितियों में ऐसा करना उपयुक्त रहा हो पर उसके सन्दर्भ में भी कभी भी स्पष्ट नहीं किया गया कि ऐसा क्यों किया गया. उसके बाद से जो स्थितियाँ वहाँ बनती आई हैं वे किसी से छिपी नहीं हैं. पाकिस्तान ने अपने जन्म के साथ ही उत्पात मचाना शुरू कर दिया था. शांति-अहिंसा-समझौतों की राह पर चलने वाले तत्कालीन लोगों की नीतियों के कारण देश का एक हिस्सा आजतक पाकिस्तान के कब्जे में है. इतने के बाद भी पाकिस्तान की नीयत में बदलाव नहीं आया. उसकी तरफ से आतंकवाद को पोषित किया जाता रहा और किसी समय खुशहाल घाटी में हिंसा, अत्याचार, बमों, बंदूकों के शोर उभरने लगे. वहाँ के हिन्दू नागरिकों को अत्याचारों का सामना करना पड़ा. महिलाओं, बच्चियों के साथ शारीरिक अमानवीयता की पराकाष्ठा दिखाई गई. ज़ुल्मों-सितम के चलते वहाँ के हिन्दू नागरिकों को घाटी से पलायन करना पड़ा. आतंक-प्रिय लोगों को इसके बाद भी चैन नहीं मिला. आये दिन उनके द्वारा घाटी में आतंक को विस्तार दिया जाता रहा.  


समय बदलने के साथ देश में केंद्र सरकारें बदलती रही किन्तु जम्मू-कश्मीर और पाकिस्तान के प्रति नीतियों में बदलाव देखने को नहीं मिले. केंद्र सरकार में परिवर्तन हुआ और देश की जनता ने भारी बहुमत से भाजपा को सत्ता सौंपी. इसके पीछे कहीं न कहीं इस्लामिक आतंकवाद के विरुद्ध वातावरण का बनना, पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद को मुँहतोड़ जवाब देने की संकल्पना काम कर रही थी. इस अवधारणा के बीच घाटी में हुए विधानसभा चुनावों ने भी भाजपा के लिए राह निर्मित की. लगातार राज्य की सत्ता से बाहर बनी भाजपा को वर्तमान में राज्य सरकार में शामिल होने का अवसर प्राप्त हुआ. देश में गठबंधन सरकार के विरोध भी किया गया क्योंकि बहुसंख्यक लोगों का मानना था कि अलगाववादियों का समर्थन करने वालों के साथ भाजपा को सरकार नहीं बनानी थी. इसके बाद भी बहुसंख्यक लोग इसके पक्षधर रहे. उनका मानना था कि कम से कम इस बहाने राज्य सरकार के सञ्चालन में, वहाँ की स्थानीय व्यवस्था में भाजपा का हस्तक्षेप होने से जम्मू-कश्मीर में चले आ रहे अलगाववादी कदमों में कुछ लगाम लगे. सरकार बनने के बाद भी सकारात्मक परिवर्तन देखने को नहीं मिले बल्कि आये दिन उत्पात की, हिंसा की, उपद्रव की घटनाएँ और तेज होने लगीं. शैक्षिक संस्थान में देश विरोधी नारे लगाये गए. भारत माता की जय कहने वालों का उत्पीड़न किया गया. सेना को पत्थरों की मार सहनी पड़ी. सैनिकों को दुर्वयवहार सहना पड़ा. पाकिस्तान की तरफ से हमलों की संख्या में वृद्धि होने लगी. वीर शहीदों के पार्थिव शवों के साथ भी हैवानियत दिखाई गई. केंद्र और राज्य में भाजपा सरकार होने के बाद भी किसी दिन नहीं लगा कि जम्मू-कश्मीर की समस्या को सुलझाने के लिए कोई प्रयास किये जा रहे हों. 


यहाँ केंद्र सरकार को और राज्य सरकार में गठबंधन करती भाजपा को सोचना होगा कि देश की तरफ से, घाटी की तरफ से उनको बहुमत मिलने के पीछे कहीं न कहीं उनका वो एजेंडा था जो धारा 370 को हटाने की बात करता था. कहीं न कहीं वो बयानबाजी थी जो पाकिस्तान को मुँहतोड़ जवाब देने के लिए होती थी. ऐसे में जनसमुदाय में आक्रोश होना स्वाभाविक है. अब सरकार को या कहें कि भाजपा को विशेष रूप से इस तरफ ध्यान देने की जरूरत है. घाटी के अलगाववादियों के साथ सख्ती से पेश आने की आवश्यकता है. इसके अलावा एक बात और विशेष रूप से केंद्र और राज्य सरकार को अमल में लानी होगी वो है वहाँ की स्थानीय पुलिस का हस्तक्षेप. स्पष्ट सी बात है कि सेना केंद्र के आदेशों के इंतज़ार में बनी रहती है और स्थानीय पुलिस को वहाँ के स्थानीय लोगों के समर्थन के साथ-साथ राज्य सरकार का संरक्षण मिल हुआ है. यही कारण है कि वहाँ आये दिन पाकिस्तानी झंडे लहराए जाने लगते हैं. देश विरोधी नारेबाजी की जाने लगती है. घाटी में शांति-व्यवस्था बनाये रखने के लिए आवश्यक कदमों में प्राथमिकता के आधार पर स्थानीय पुलिस के स्थान पर सेना को वरीयता दी जाये. इसके अलावा किसी भी कीमत पर अलगाववादियों को मिलने वाली तमाम सुविधाओं को समाप्त कर उन पर सख्त कार्यवाही की जाये. सेना को सीमापार से घुसपैठ रोकने, सीमापार से आते आतंकियों और हमलों को रोकने, पाकिस्तानी सेना द्वारा की जा रही कार्यवाही का जवाब देने को पर्याप्त रूप से आज़ादी दी जानी चाहिए. बातचीत एक रास्ता हो सकता है मगर सभी समस्याओं का समाधान बातचीत ही नहीं है. समझने-सोचने वाली बात है कि राज्य में भाजपा सरकार के गठबंधन के बाद ही अचानक से पत्थरबाजी की, आतंकी हमलों की, पाकिस्तानी सेना के हमलों की घटनाएँ क्यों बढ़ गईं? 

28 April 2017

गेंहू के संग घुन पिसता हो तो पिसे

फिर एक नक्सली हमला हुआ. फिर हमारे कई जवान शहीद हो गये. फिर सरकार की तरफ से कड़े शब्दों में निंदा की गई. फिर कठोर कदम उठाये जाने की बात कही गई. इस ‘फिर’ में हर बार हमारे जवान ही कुर्बान हो रहे हैं और इस ‘फिर’ का कोई अंतिम समाधान नहीं निकल रहा है.

परिचयात्मक रूप में नक्सलवाद कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के उस आंदोलन का अनौपचारिक नाम है जो पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ. इसे भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने 1967 में सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन के रूप में आरम्भ किया था. वे चीन के कम्यूनिस्ट नेता माओत्से तुंग से प्रभावित थे और मानते थे कि न्यायहीन दमनकारी वर्चस्व को केवल सशस्त्र क्रांति से ही समाप्त किया जा सकता है. यह सशस्त्र संघर्ष उनकी मृत्यु के बाद अपनी असल विचारधारा से अलग हो गया. देखा जाये तो वर्तमान में नक्सलवाद सरकार के सामानांतर एक सत्ता स्थापित करने की मानसिकता से काम कर रहा है. अब इसका उद्देश्य किसी भी रूप में आदिवासियों को उनके अधिकारों को दिलवाना, अपने वन-जंगलों-संसाधनों पर अपना आधिपत्य बनाये रखना मात्र नहीं रह गया है. अब उनके द्वारा आदिवासियों की आड़ लेकर राजनैतिक संरक्षण प्राप्त किया जा रहा है जो कहीं न कहीं उन्हें सत्ता के करीब लाता है. सत्ता के करीब पहुँचने की इसी स्थिति का दुष्परिणाम ये है कि आज नक्सलवाद भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है. देश के 180 जिलों यानि कि भारतीय भूगोल का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा नक्सलवादियों के कब्जे में है जो लगभग 92 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में है. यह देश के 10 राज्यों-उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश आदि तक फैला हुआ है. इसी इलाके को आज रेड कॉरिडोर के नाम से जाना जाता है. एक अनुमान के अनुसार लगभग 30 हजार सशस्त्र नक्सली वर्तमान में इसी विचारधारा से काम कर रहे हैं.


नक्सलवादियों द्वारा प्रतिवर्ष सैकड़ों, हजारों की संख्या में लोगों को मौत के घाट उतार दिया जाता है. कई बार पुलिस मुखबिरी करने के शक में वे आदिवासी भी शामिल होते हैं, जिनके अधिकारों के लिए लड़ने की बात नक्सली करते हैं. सबसे आश्चर्यजनक बात ये है कि एक तरफ कॉरपोरेट घरानों द्वारा आदिवासियों की सम्पदा को लूटने की बात की जाती है दूसरी तरफ पूरी चर्चा में कहीं भी आदिवासी दिखाई नहीं देते हैं. ऐसे में यदि सरकार को किसी तरह का हल निकालना है तो बातचीत के मोड़ पर नक्सलियों के साथ-साथ उन आदिवासियों को भी शामिल करना होगा, जिनके अधिकारों का हनन हो रहा है.

विगत कुछ वर्षों की घटनाओं को देखने में साफ तौर पर समझ आ रहा है कि नक्सलियों द्वारा अपने प्रभाव को, शक्ति को, राजनैतिक संरक्षण को धन-उगाही के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा है. उनके द्वारा सम्बंधित क्षेत्र में विकास-कार्यों को बाधित करना उनका मुख्य उद्देश्य बन गया है. वे किसी भी रूप में नहीं चाहते हैं कि क्षेत्र का विकास हो और आदिवासियों में राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल होने की मंशा जन्म ले. वे समूचे क्षेत्र और व्यक्तियों को अपनी हथियारों की सत्ता के अधीन रखना चाहते हैं. ऐसे में यदि बातचीत एक रास्ता है तो सैन्य कार्यवाही भी एक रास्ता है. सैन्य कार्यवाही के जवाब में एक तर्क हमेशा आता है कि इसमें निर्दोष नागरिक मारे जायेंगे. इसके जवाब में बस एक ही सवाल कि क्या नक्सली हमलों में अभी तक निर्दोष नहीं मारे गए? ‘गेंहू के साथ घुन भी पिसता है’ की बात को दिमाग में रखते हुए सरकार एक तरफ सैन्य कार्यवाही की छूट देनी चाहिए साथ ही स्थानीय नागरिकों के साथ तालमेल बैठाते हुए उनका समर्थन हासिल करना चाहिए क्योंकि जब तक स्थानीय नागरिकों का समर्थन नक्सलियों के साथ है (चाहे स्वेच्छा से अथवा डर से) तब तक समस्त नक्सलियों को समाप्त करना संभव नहीं. इसके अलावा केंद्र और राज्य सरकारों के मध्य संबंधों को और बेहतर बनाये जाने की आवश्यकता है. केंद्र द्वारा भेजे गए सुरक्षा बलों व स्थानीय पुलिस के बीच बेहतर तालमेल बनाये जाने की जरूरत है. नक्सलियों से निपटने के लिए सरकार को अपनी रणनीति में बदलाव करने होंगे. सोचना होगा कि आखिर संसाधनों के नाम पर, विकास के नाम पर जंगलों को, वनों को, पहाड़ों को समाप्त कर देने से वहाँ से विस्थापित आदिवासी जायेंगे कहाँ? यदि उसके द्वारा आदिवासियों के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जाना सुनिश्चित है तो उसके द्वारा आदिवासियों को उससे विस्थापित करने की बजाय उन्हें मालिकाना अधिकार देना होगा.

एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि आदिवासी क्षेत्रों से चुने गए जनप्रतिनिधियों को इन आदिवासियों के साथ समन्वय स्थापित करना चाहिए. सत्यता यही कि नक्सलवाद का अंतिम समाधान सिर्फ हिंसा नहीं है क्योंकि नक्सलवाद अब एक विचारधारा के रूप में काम कर रहा है. इसमें राजनैतिक लोगों का सरकार के, सेना के, सुरक्षाबलों के समर्थन में आना होगा. आदिवासियों एवं आदिवासी क्षेत्रों के चहुंमुखी विकास की बात करनी होगी. यही नक्सलवाद के निराकरण के लिए रामबाण अचूक औषधि है. 

21 April 2017

ट्वीट से उपजा अज़ान-लाउडस्पीकर विवाद

लोग एक बार फिर मुद्दे से भटक कर उसे धर्म, मजहब की चौखट पर खींच लाये. गायक सोनू निगम ने एक बहुत सामान्य सी बात के सन्दर्भ में चार ट्वीट किये और बस उनके मूल को समझे बिना विवाद शुरू हो गया. विवाद करने वालों को लगा कि उनके ट्वीट का मूल अज़ान को बंद करवाना है जबकि वे उसका निहितार्थ भुला बैठे. यदि सोनू निगम के चारों ट्वीट को पढ़ा जाये तो सहजता से पता चलता है कि उसमें उनका मूल भाव लाउडस्पीकर के उपयोग पर है न कि अज़ान पर. अब ये और बात है कि सोनू निगम के विरोध में आने वाले बस अज़ान को ही देख रहे हैं. इस विवाद के साथ एक और बात हुई और वो अत्यंत हास्यास्पद रही. सोनू निगम के ट्वीट के विरोध में एक मौलवी सामने आये और सोनू निगम का सिर मूंडने के बदले दस लाख रुपये देने का फतवा जारी कर बैठे. उनके फतवा लाते ही सोनू ने अगले दिन अपना सिर मुंडवा लिया. अब लोग सोनू निगम के समर्थन में आते हुए मौलवी के पीछे पड़ गए. इस आगा-पीछा पड़ने में मूल भावना कहीं गुम हो गई. इस पूरे विवाद में मुद्दा न तो ट्वीट था, न अज़ान, न ही फतवा बल्कि मूल मुद्दा था धार्मिक कृत्यों में लाउडस्पीकर का उपयोग होना. सोनू निगम ने ट्वीट के द्वारा अपनी परेशानी बताई या फिर अपनी लोकप्रियता की राह को और साफ़ किया ये वही जानें किन्तु उससे एक मुद्दा निकला कि धार्मिक कृत्यों में लाउडस्पीकर का इस्तेमाल हो या न हो. जो लोग भी अपने-अपने स्तर में इस चर्चा में सहभागी बने वे इससे भटक कर हिन्दू, मुस्लिम में विभक्त हो गए. 





देखा जाये तो विगत कुछ वर्षों से समाज दो भागों में बंट गया है. एक हिन्दू और दूसरा गैर-हिन्दू. यहाँ भी कुछ ऐसा ही हुआ. सोनू निगम के चार ट्वीट में यदि पहले ट्वीट में अजान शब्द आया है तो तीसरे शब्द में मंदिर, गुरुद्वारा शब्दों का भी प्रयोग किया गया है. इसके बाद भी बवाल पैदा करने में अज़ान-प्रेमी ही सामने आये हैं. इसमें मुस्लिम और गैर-मुस्लिम दोनों तरफ के लोग हैं. वैसे सोचने की बात बस इतनी है कि आखिर मुस्लिम समुदाय को इस पर आपत्ति क्या है कि उनकी मजहबी क्रिया में लाउडस्पीकर का उपयोग न होने का ट्वीट आ गया? कहीं उनको ये तो नहीं लग रहा कि ट्वीट के बहाने सरकार उनकी मजहबी क्रिया में उपयोग होने वाले लाउडस्पीकर को प्रतिबंधित तो करने जा रही है? वैसे समाज में यदि हिन्दू-मुस्लिम समुदाय के धार्मिक कृत्यों में लाउडस्पीकर के उपयोग पर गौर किया जाये तो मंदिरों में लाउडस्पीकर का उपयोग नियमित रूप से उतना नहीं होता है जितना कि मस्जिदों में किया जाता है. शत-प्रतिशत मस्जिदों में दिन में पाँच बार लाउडस्पीकर का उपयोग किया जाता है, इसके मुकाबले मंदिरों की संख्या कम है. हिन्दू धार्मिक कृत्यों में भागवत, रामचरित मानस का पाठ, सत्यनारायण कथा आदि के समय लाउडस्पीकर का उपयोग अवश्य किया जाता है. ऐसा भी नियमित न होकर कुछ दिन के लिए होता है. किसके द्वारा उपयोग कम हो रहा है, किसके द्वारा उपयोग कम हो रहा है, ये एक अलग मुद्दा बन सकता है किन्तु यहाँ समझने वाली बात ये है कि आखिर धार्मिक कृत्यों में लाउडस्पीकर की आवश्यकता क्यों पड़ती है? इसका उपयोग किया ही क्यों जाता है? भले ही सोनू निगम ने किसी भी अन्य मानसिकता के वशीभूत ट्वीट करके लाउडस्पीकर की समस्या को सामने रखा तो क्या उस पर आम सहमति बनाते हुए इसके प्रयोग पर प्रतिबन्ध की बात सबको नहीं करनी चाहिए थी? ऐसा कुछ न हुआ बल्कि इसके उलट हिन्दू-मुस्लिम विवाद को जन्म दे दिया गया.


बहरहाल अंतिम निष्कर्ष क्या होगा ये तो बाद की बात है मगर एक सामान्य से ट्वीट पर आक्रोशित हो जाना, फतवा जारी करना, सोनू निगम पर मुकदमा दर्ज करने की अपील, धार्मिक भावनाओं को भड़काने का आरोप लगाने जैसे कदम मुस्लिम समुदाय की आक्रामकता को ही दर्शाता है. यही आक्रामकता उनको समुदाय में सबसे कहीं अलग-थलग खड़ा कर देती है. अपने आपको मुख्यधारा से अलग न होने देने की दिशा में वे खुद ही कुछ सोचें और विचार करें. उन्हें समझना होगा कि समाज-निर्माण में फैसले लेने का आधार न तो ट्वीट होता है और न ही लाउडस्पीकर. आपसी समझ, विश्वास, स्नेह ही सबको आगे बढ़ाता है, सबकी धार्मिक भावनाओं का सम्मान करता है. 

14 April 2017

सैनिकों का मनोबल न गिरे, ध्यान रखना

किसी भी उस व्यक्ति के लिए जो देश का, सेना का, वीर जवानों का सम्मान करता है, उस हालिया वीडियो को देख कर आक्रोशित होना स्वाभाविक है जिसमें हमारे वीर सैनिकों को कश्मीरी युवकों की हरकतों को सहना पड़ रहा है. जम्मू-कश्मीर के उपचुनाव संपन्न करवाने के बाद लौटते सैनिकों के साथ कश्मीरी युवकों का व्यवहार किसी भी रूप में ऐसा नहीं है कि कहा जाये कि वे लोग सेना का सम्मान करते हैं. सैनिकों के साथ उनके दुर्व्यवहार के साथ-साथ लगते नारे समूची स्थिति को स्पष्ट करते हैं. सैनिकों के साथ हुई ये घटना उन लोगों के लिए एक सबक के तौर पर सामने आनी चाहिए जो कश्मीरी युवकों को भोला और भटका हुआ बताते नहीं थकते हैं. जिनके लिए सेना के द्वारा पैलेट गन का इस्तेमाल करना भी उनको नहीं सुहाता है. सोचने वाली बात है कि जिस सेना के पास, सैनिकों के पास देश के उपद्रवियों से लड़ने की अकूत क्षमता हो वे चंद सिरफिरे युवकों के दुर्वयवहार को चुपचाप सहन कर रहे हैं. ये निपट जलालत जैसे हालात हैं. 


जम्मू-कश्मीर का आज से नहीं वरन उसी समय से ऐसा हाल है जबकि पाकिस्तान ने अपने जन्म के बाद से ही वहाँ अपनी खुरापात करनी शुरू कर दी थी. विगत कई दशकों में जम्मू-कश्मीर में और केंद्र में सरकारों का पर्याप्त समर्थन न मिल पाने का बहाना लेकर सेना के जवानों को अपमान का घूँट पीकर रह जाना पड़ता था. वर्तमान राज्य सरकार में जब भाजपा ने गठबंधन किया तो माना जाने लगा था कि उनके द्वारा सत्ता में भागीदारी से शायद जम्मू-कश्मीर के हालातों में कुछ सुधार आयेगा. वहाँ तैनात सैनिकों के सम्मान की चर्चा की जायेगी. इधर केंद्र-राज्य दोनों जगह भाजपा की सरकार होने के बाद, लगातार पाकिस्तानी आतंकवाद को मुँहतोड़ जवाब देने के वादे के बाद तथा जम्मू-कश्मीर के बिगड़ते हालात सुधारने की बात करने के बाद भी वहाँ की स्थितियाँ सामान्य नहीं हो पाई हैं. अब जो वीडियो आया है उसे देखकर लगता नहीं कि निकट भविष्य में वहाँ के हालात सुधरने की सम्भावना है. अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों, संधियों, समझौतों के अनुसार माना कि युद्ध अनिवार्य अंग नहीं है मगर देश के अन्दर उत्पात मचाते लोगों पर नियंत्रण न करना किस कानून के अंतर्गत है? सेना पर, सैनिकों पर पत्थरबाजी करते लोगों से न निपटने के लिए कौन सा समझौता आड़े आ रहा है? वीर सैनिक अपमान का घूँट पीते रहें और कश्मीरी युवक मानवाधिकार की हनक के चलते साफ़-साफ़ बच निकलें ऐसा किस नियम में लिखा हुआ है? 

सैनिकों के साथ हुए दुर्व्यवहार के वीडियो ने समूचे देश को आक्रोशित कर दिया है. इससे बस वे ही लोग बचे हैं जो किसी आतंकी की फाँसी के लिए देर रात अदालत का दरवाजा खुलवा सकते हैं. वे ही आक्रोशित नहीं हैं जो पत्थरबाज़ी करते युवकों, महिलाओं, बच्चों को भटका हुआ बताते हैं. उनके ऊपर इस वीडियो का कोई असर नहीं हुआ जो सेना को बलात्कारी बताते हैं. बहरहाल, किस पर इस वीडियो का असर हुआ, किस पर असर नहीं हुआ ये आज मंथन करने का विषय नहीं है. अब सरकार को इस वीडियो का स्वतः संज्ञान लेते हुए उसी वीडियो के आधार पर सम्बंधित युवकों पर कठोर कार्यवाही करे. इसके अलावा सेना को कम से कम इतनी छूट तो अवश्य दी जानी चाहिए कि वे अपने ऊपर होने वाले इस तरह के हमलों का, पत्थरबाज़ी का तो जवाब दे ही सकें. मानवाधिकार का सवाल वहाँ खड़ा होना चाहिए जबकि वे जबरिया किसी व्यक्ति को परेशान करने में लगे हों. यदि एक सैनिक अपने सम्मान की रक्षा नहीं कर पा रहा है तो वो पल उसके लिए बहुत ही कष्टकारी होता है. ऐसी घटनाओं पर सरकारों का शांत रह जाना, सम्बंधित अधिकारियों द्वारा कोई कार्यवाही न करना सैनिकों के मनोबल को गिराता है. यहाँ सरकार को ध्यान रखना होगा कि किसी भी तरह से सेना का, सैनिकों का मनोबल न गिरने पाए. यदि सेना का मनोबल गिरता है तो वह देश के हित में कतई नहीं होगा. देश के अन्दर बैठे फिरकापरस्त और देश के बाहर बैठे आतातायी चाहते भी यही हैं कि हमारी सेना का, सैनिकों का मनोबल गिरे और वे अपने कुख्यात इरादों को देश में अंजाम दे सकें. देश की रक्षा के लिए, किसी राज्य की शांति के लिए, नागरिकों की सुरक्षा के लिए सरकारों को पहले सेना के, सैनिकों के सम्मान की रक्षा करनी होगी. कश्मीरी युवक, भले ही लाख गुमराह हो गए हों, मासूम हों, भटक गए हों मगर ऐसी हरकतों के लिए उनके पागलपन को कठोर दंड के द्वारा ही सुधारा जाना चाहिए. यदि इस तरह की घटनाओं के बाद सम्बंधित पक्ष पर किसी तरह की कार्यवाही नहीं होती है तो उनके नापाक मंसूबे और विकसित होंगे और वे सेना के लिए ही संकट पैदा करेंगे. समझना होगा कि यदि हमारी सेना, वीर सैनिक संकट में आते हैं तो देश स्वतः संकट में आ जायेगा. देश को बचाने के लिए आज ही सेना को, सैनिकों को ससम्मान बचाना होगा. ऐसी घटनाओं से निपटने को सम्पूर्ण अधिकार देना होगा.