30 जून 2021

सोशल मीडिया का बढ़ता दायरा

वर्तमान दौर में सोशल मीडिया के महत्त्व से कोई इंकार नहीं कर सकता है. तकनीकी विकास के साथ जैसे-जैसे इंटरनेट की उपलब्धता, सहजता आम आदमी तक होती गई, सोशल मीडिया ने और भी तेजी से अपना फलक विस्तृत किया. आज का दिन, यानि कि 30 जून को सोशल मीडिया दिवस के रूप में जाना जाता है. इस दिवस को मनाये जाने की शुरुआत वर्ष 2010 से हुई. सबसे पहले वर्ष 1997 में एंड्रयू वेनरिच ने पहला सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सिक्सडिग्री लांच किया था. वर्ष 2001 में इसके दस लाख से अधिक यूजर्स होने के बाद इसे बंद कर दिया गया. समय के साथ बहुत सारे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म सक्रिय रूप से सामने आते रहे. वर्तमान में लगभग सभी व्यक्तियों के हाथ में स्मार्ट फोन है, फोन में सस्ती इंटरनेट सुविधा है ऐसे में शायद ही कोई व्यक्ति सोशल मीडिया से दूर होगा. सभी की सोशल मीडिया पर आने की, उसके उपयोग करने की अपनी ही कहानी होगी. सोशल मीडिया के अपने अनुभव भी होंगे, कुछ खट्टे होंगे तो कुछ मीठे भी होंगे.


सोशल मीडिया पर हमारी उपस्थिति ब्लॉग के माध्यम से हुई थी. वर्ष 2008 में मई माह में सबसे पहले अपना ब्लॉग बनाकर पहली पोस्ट लिखी. उसके बाद छोटे भाई ने उस समय खूब प्रसिद्धि पाए मंच ऑरकुट के बारे में बताया. पहली बार में समझ ही नहीं आया कि ये क्या चक्कर है. उसी ने ऑरकुट पर हमारा एकाउंट बनाया और कुछ दिन की अपनी माथापच्ची के बाद समझ आया कि इसमें करना क्या है, इससे होना क्या है. उसी दौरान फेसबुक से भी परिचय हुआ. अपना एकाउंट भी बनाया मगर अब फिर वही पुरानी कहानी कि इसका किया क्या जाये, इसमें किया क्या जाये? कई महीनों तक बस एकाउंट ही बना रहा और किया-धरा कुछ भी नहीं. कई महीनों के बाद ब्लॉग के सहारे ही ऑरकुट से चलते हुए फेसबुक तक आये और फिर वहीं से बहुत सारे सोशल मीडिया मंचों पर पहुँचने का अवसर मिला.




इन तमाम सारे मंचों में ऑरकुट तो अब बंद ही है. ब्लॉग के पुराने साथियों में कुछ अभी भी वहाँ सक्रिय हैं और बहुत सारे साथी फेसबुक पर अपनी सक्रियता दिखाने में लगे हैं. हमारा अपना व्यक्तिगत अनुभव ये रहा है कि तमाम सारे मंचों में से फेसबुक ने उपभोक्ता को व्यापक पहुँच और स्वतंत्रता दी है. जो लोग भी स्मार्ट फोन का उपयोग कर रहे होंगे उनमें से लगभग सभी लोग फेसबुक पर सक्रिय होंगे ही, भले ही उनकी सक्रियता बहुत ज्यादा न हो. फेसबुक ने हमें भी बहुत सारे आयामों से परिचय करवाया, बहुत सारे और मंचों से पहचान करवाई, बहुत से वरिष्ठ लोगों से, बहुत से प्रतिष्ठित लोगों से, बहुत से नामचीन लोगों से, बहुत से नए लोगों से परिचय करवाया. इन सभी के साथ बहुत से मधुर अनुभव मिले तो बहुत सारे लोगों से बहुत सारे कड़वे अनुभव भी मिले.


सोशल मीडिया को इधर बहुत गलत तरीके से भी उपयोग में लिया जाने लगा है. इसके सहारे धोखाधड़ी भी खूब बढ़ी. आपराधिक घटनाक्रमों ने भी अपना डेरा यहाँ जमाना शुरू कर दिया. एक-दूसरे के प्रति घृणा फ़ैलाने का काम, दुश्मनी निभाने का काम, दूसरे को बदनाम करने का काम भी यहाँ खूब होने लगा. ऐसा नहीं कि सोशल मीडिया में सिर्फ बुरा ही बुरा हो रहा हो. यहाँ बहुत सारा काम अच्छा ही अच्छा हो भी रहा है. वर्तमान कोरोनाकाल में सोशल मीडिया के द्वारा ही बहुत सारे लोगों तक मदद भी पहुँचाई जा सकी. बहुत से ऐसे लोगों को भी बचाया गया जिनकी जान को खतरा था. सोशल मीडिया ने बहुत से नए कलाकारों को, नई-नई प्रतिभाओं को उभरने का अवसर भी इस कोरोनाकाल में दिया. सार्वजनिक रूप से कार्यक्रमों का आयोजन बंद था ऐसे में सोशल मीडिया ने ऑनलाइन मंच उपलब्ध करवा कर नवीन प्रतिभाओं को मुरझाने से बचा लिया.


ये तो सार्वभौम सत्य है कि किसी भी बात के दो पहलू होते हैं. यदि उसके साथ बुराई है तो अच्छाई भी जुड़ी है. यदि किसी के साथ मधुरता जुड़ी है तो उसके साथ कड़वाहट भी होगी. कुछ ऐसा ही सोशल मीडिया के साथ भी है. यहाँ बहुत सारी अच्छाइयों के बीच खूब सारी बुराइयाँ भी हैं. ये उपयोग करने वाले पर निर्भर करता है कि वह किसको साथ लेकर आगे बढ़ता है, सोशल मीडिया पर खुद को प्रस्तुत करता है.


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29 जून 2021

यादों को सहेजने वाला साथी है कैमरा

अपनी यादों को हमेशा के लिए यादगार बनाने का बेहतरीन माध्यम कैमरा है. किसी समय में कैमरा में रील डाले जाने के कारण फोटोग्राफी बहुत महँगा शौक हुआ करता था तब बहुत कम लोग कैमरा का उपयोग किया करते थे. आज मोबाइल में कैमरा होने के कारण फोटोग्राफी या कैमरा अब समाज की जीवनशैली का मुख्य भाग हो गया है. कैमरा केवल फोटो खींचने का काम नहीं करता है बल्कि उसके माध्यम से फोटोग्राफर के कौशल को, उसकी बुद्धिमत्ता को, उसके दृष्टिकोण, उसकी कल्पनाशीलता आदि को भी परखा जा सकता है. इस पोस्ट के द्वारा कैमरा के बारे में चर्चा करने का कारण ये है कि आज, 29 जून को कैमरा दिवस मनाया जाता है.


ऐसा माना जाता है कि कैमरे का आविष्कार एक अरब विद्वान इब्न अल-हेथम द्वारा किया गया. उन्होंने इसे कैमरा ऑब्स्कुरा नाम से पुकारा. इसके माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया गया कि कैसे एक सपाट सतह पर किसी दृश्य को प्रोजेक्ट करने के लिए प्रकाश का उपयोग किस तरह किया जाए. कैमरा के द्वारा एक तस्वीर को संरक्षित करने का काम एक तकनीक की सहायता से किया जाता है. इसे हेलियोग्राफ़ कहा जाता है. इसका आविष्कार पहली बार वर्ष 1816 में फ़्रांस के जोसेफ नाइसफोर नीप्स द्वारा किया गया जो वर्ष 1825 में दुनिया की पहचान बना.  इन आविष्कारों के बाद भी कैमरे का वास्तविक आविष्कारक वर्ष 1829 में अलेक्जेंडर वोल्कोट को माना जाता है. इनके द्वारा बनाये गए कैमरा से ऐसी तस्वीरें सामने आईं जो आसानी से फीकी नहीं पड़तीं.


हमारे पुराने साथी 


इस दिन वे साथी याद आ रहे हैं जिन्होंने क्लिक करने के हमारे शौक को बड़ी गंभीरता से निभाने में अपना पूरा साथ दिया. रील वाला कैमरा हमने बचपन से ही देखा और चलाया है. बाद में मामा जी की तरफ से कक्षा आठ या नौ में गिफ्ट मिला था क्लिक III कैमरा. सादा फोटो की दुनिया से बाहर निकलने पर रंगीन फोटो वाले कई कैमरे उपयोग किये. 110 वाला कैमरा भी, जिसमें एकदम पतली रील पड़ती थी और याशिका के कई कैमरे. डिजिटल कैमरों का युग चाहे जब शुरू हुआ हो मगर हमने पहला डिजिटल कैमरा लिया था वर्ष 2009 में, मुंबई यात्रा के समय. उसके बाद तीन डिजिटल कैमरे और लिए गए. अंतिम रूप से वर्ष 2017 में निकोन का DSLR लिया गया.


इसके साथ-साथ मोबाइल भी अब तुरत-फुरत में कैमरा की भूमिका निभाता है. हमेशा हमारे साथ अथवा शायद किसी के साथ भी कैमरा नहीं रहता होगा, ऐसे में मोबाइल ही सच्चा कैमरा बनकर सामने आता है. ये स्वीकारने में कोई गुरेज नहीं कि आकस्मिक रूप से मोबाइल भी फोटोग्राफी में भरपूर साथ दे देता है हमारा.


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26 जून 2021

बचपना अपने जीवन में उतार कर तो देखिये

देखा जाये तो हर एक मौसम का अपना मजा है. जिसको मौसम का मजा लेने की आदत है वो किसी न किसी बहाने उस मौसम का अपनी तरह से उसका आनंद लिया करता है. किसी को गर्मी पसंद है क्योंकि इस मौसम में वह देश-विदेश के बर्फीले स्थानों के घूमने का मौका निकाल लेते हैं. कुछ लोगों के लिए सर्दी पसंद का कारण है क्योंकि उस मौसम का गुलाबीपन मनभावन होता है. कुछ लोगों को बरसात का मौसम उसकी रिमझिम के कारण, भीगते हुए मस्ती करने के कारण पसंद आता है. हर मौसम का अपना आनंद है, हर मौसम का अपना महत्त्व है. हमें भी सभी मौसम अपनी-अपनी विशेषताओं के कारण पसंद हैं मगर बरसात का आना सबसे सुखद लगता है. इसका कारण खुद को बचपन में लौटा ले जाने जैसा अनुभव कराना है. बरसात का आना हमारे लिए आज भी भीगने का सन्देश लाने जैसा होता है. बचपन में तो भीगना, कागज की नाव बनाकर तैराना, एक साथ कई नावों को धागे से बाँधकर तेरा देना, भरे पानी में कूद कर खुद को भिगाते हुए बगल वाले को भिगो देना, मेंढकों की टर्र-टर्र को पकड़ना, बारिश बंद हो जाने के बाद भीगे पौधों को हिलाकर उनकी पत्तियों पर बैठी बूंदों के नीचे आकर भीगना आदि सहज भाव से होता रहता था. यह सहजता हम आज भी बनाये हुए हैं.




ये और बात है कि बचपन से युवावस्था की तरफ बढ़ते रहने के साथ कार्यशैली बदलती रही. कार्य बदलते रहे. जीवनशैली बदलती रही. जिम्मेवारियाँ बढ़ती रहीं. इन सबके बदलते रहने के बीच बरसात हर साल अपनी रंगत में आती रही. ये और बात है कि पर्यावरणीय समस्याओं के चलते अब बरसात अपने उस रूप में नहीं आती जैसी कि हमारे बचपने में आती थी. क्या कुछ न बदला. समय बदला, बरसात की रंगत बदली, बारिश की समयसीमा भी बदली मगर यदि न बदला तो बरसात में मौज-मस्ती करने का हमारा अंदाज. उम्र अपनी जगह, जिम्मेवारी अपनी जगह, प्रस्थिति अपनी जगह, कार्य अपनी जगह और बरसात की मस्ती अपनी जगह. कई बार तेज बारिश में सड़क पर खुद को भिगाते घूमते समय लोगों को दुकानों में, किसी आड़ में, कहीं किसी स्थान पर दुबके खड़े लोगों को देखकर विचार आता है कि क्या इनके अन्दर बारिश में भीगने की इच्छा नहीं होती? बारिश में भीगने के डर से दुबके खड़े लोगों में युवाओं को देखकर तो उनके ऊपर तरस आता है. यदि वे इस अवस्था में खुलकर जीने का आनंद नहीं उठा पा रहे हैं तो उस समय क्या उठाएंगे जबकि उनके ऊपर परिवार की, अपने कार्य की, पद की जिम्मेवारी होगी.


कई बार लगता है हमने कि लोग अनावश्यक रूप से गंभीर बनने की कोशिश में जीवन जीना भूल चुके हैं. बढ़ती उम्र के लोग ये सोचकर बारिश में नहीं भीगते कि लोग क्या कहेंगे. वे बच्चों के साथ कागज की नाव इसलिए तैराने की हिम्मत नहीं जुटा पाते कि लोग उन्हें पागल न समझ लें. युवाओं में भी भीगने को लेकर, पानी में कूदने, नाव तैराने को लेकर संकोच का भाव है. आजकल के बच्चे, युवा अचानक ही अपनी उम्र से कई गुना अधिक बड़े-बुजुर्ग बन चुके हैं. जिम्मेवारियों से पहले ही उनके कंधों पर अनावश्यक जिम्मेवारियाँ डाल दी गई हैं. ऐसा नहीं हैं कि हमारे कंधों पर जिम्मेवारी नहीं, ऐसा भी नहीं है कि हमारे आसपास के वातावरण में, समाज में हमारी प्रस्थिति-स्थिति दोयम दर्जे की है मगर अपनी जिंदगी को अपने ढंग से जीने के लिए किसी की क्या परवाह करना. हाँ, हमारी उन्मुक्तता से, हमारी स्वच्छंदता से, हमारी मौज-मस्ती से किसी अन्य के जीवन पर, उसकी जीवनशैली पर, उसके आनंद पर, उसके रहन-सहन पर किसी तरह का नकारात्मक असर न पड़े, इसका ध्यान रखा ही जाना चाहिए. हम तो आज भी बारिश का इंतजार उसी बेसब्री से करते हैं जैसे कि बचपन में किया करते थे. आज भी बारिश होते ही शहर की सड़कों पर विचरना शुरू हो जाता है. भरे पानी में, बहते पानी में नाव का तैराना शुरू हो जाता है. 


अभी कुछ दिन पहले दो-तीन दिन कभी-कभी बहुत तेज बारिश हुई. इसे शायद संयोग ही कहेंगे कि उस समय हम घर से बाहर ही थे. तेज बारिश के उस मौके पर हमने बजाय दुबक के बैठने के बारिश में घूमने का मौका निकाला. न केवल हम बारिश में भीगने निकले बल्कि बारिश के तेज समझ आते ही हम घर आये और उस समय घर में उपस्थित अपनी दोनों बेटियों को स्कूटर में बैठाया और निकल पड़े तेज बारिश का आनंद लेने. बहुत से परिचित लोगों के लिए यह हँसी-मजाक का विषय बन जाता है मगर एक बार बच्चा बनकर देखिये, एक बार अपनी बढ़ती उम्र में बचपन को जीकर देखिये, आपको भी हमारी तरह मजा आएगा, सुकून मिलेगा.




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24 जून 2021

हाल्ट, हुकुम सर देयर, फंडर फ़ो

हाल्ट, हुकुम सर देयर. फंडर फ़ो. इस वाक्य से आपमें से संभव है कि बहुत से लोगों का पाला पड़ा हो और बहुत से लोगों का नहीं भी पड़ा होगा. बहुत से लोगों से ऐसे वाक्य का सामना प्रत्यक्ष रूप से किया होगा और बहुत से लोग ऐसे होंगे जिन्होंने ऐसे लोगों की जुबानी ही इस वाक्य से परिचय पाया होगा. हम भी उन्हीं लोगों में से हैं जिन्होंने इस वाक्य का परिचय अपने बाबा जी से प्राप्त किया है.


वैसे बहुत से लोग तो अभी तक कई बार पढ़ चुके होंगे इसे और इसके भीतर की टाइपिंग मिस्टेक खोजने में लगे होंगे. बहुत से लोगों ने तो टाइपिंग मिस्टेक निकाल कर इसे सही भी पढ़ लिया होगा. अब पता नहीं उन्होंने क्या गलती निकाली होगी और उसको सही करके क्या पढ़ा होगा? ये तो परदे के पीछे की बात है मगर जो लोग भी इस वाक्य से परिचित हैं वे अवश्य ही मन ही मन में या फिर खुलकर मुस्कुरा रहे होंगे.


असल में ऐसा वाक्य सुरक्षा प्रहरियों द्वारा किसी समय बोला जाता था. हमारे बाबा जी पुलिस में हुआ करते थे. उनकी पुलिस विभाग में सेवाएँ अंग्रेजी राज्य के समय से ही शुरू हो गईं थीं. उस समय के बारे में, सुरक्षात्मक कदमों के बारे में बताते समय ऐसे वाक्य से हम लोगों का परिचय करवाया था. यह वाक्य असल में ऐसा नहीं हुआ करता था बल्कि जो पहरेदार, सुरक्षाकर्मी अपनी ड्यूटी में तैनात हुआ करते थे उनके द्वारा मूल वाक्य को कुछ इस रूप में बोला जाता था.




इस वाक्य का मूल वाक्य भी आपके बीच रखेंगे पहले इसके बोले जाने का कारण तो पढ़ लीजिये. सुरक्षा बलों की तैनाती की जगह पर, कार्यालय, घरों आदि की सुरक्षा में तैनात कर्मियों द्वारा यह वाक्य उस समय जोर से बोला जाता था जब कोई उनकी निर्धारित सीमा के भीतर प्रवेश कर जाता था. इस वाक्य के द्वारा वे सामने से आने वाले की, सीमा रेखा में घुस आने वाले की पहचान करते थे कि वह दोस्त है अथवा दुश्मन. अब आप सोचेंगे कि एक जरा से वाक्य से कोई कैसे पहचान सकता था कि अन्दर आने वाला दोस्त है या दुश्मन. जी हाँ, सही सोचा आपने. असल में सुरक्षा कर्मियों को किसी भी संदिग्ध व्यक्ति के अपनी सीमा रेखा में घुस आने वाले को गोली मार देने तक के आदेश हुआ करते थे. इसलिए जैसे ही कोई संदिग्ध व्यक्ति इन सुरक्षा कर्मियों को अपनी सीमा में घुसता दिखाई देता था तो वे जोर से बोलते थे, हाल्ट हुकुम सर देयर. फंडर फ़ो. ऐसा वे तीन बार जोर-जोर से बोला करते थे. उसमें जवाब मिल जाने पर तो ठीक अन्यथा की स्थिति में वे सुरक्षा कर्मी उस संदिग्ध पर गोली भी चला देते थे.


यह वाक्य सुरक्षा कर्मियों के अल्प शिक्षित होने, ग्रामीण अंचलों से होने के कारण इस तरह बोला जाने लगा था. मूल वाक्य इस तरह का नहीं हुआ करता था. हॉल्ट, हू कम्स देयर, फ्रेंड ऑर फ़ो?  के द्वारा सामने आने वाले से जानकारी ली जाती थी कि वह दोस्त है या दुश्मन. सामने वाला भी पहली बार में ही अपना जवाब दे दिया करता था.


बाबा जी बताया करते थे कि कई बार दुश्मन की तरफ से अचानक से हमला हो जाया करता था. सुरक्षा कर्मियों को बोलने का, पूछने का मौका ही नहीं मिल पाता था कि हाल्ट. हुकुम सर देयर, फंडर फ़ो? और वे इसे बोलने, पूछने के पहले ही दुश्मन के हमले का शिकार हो जाया करते थे. कुछ इसी तरह का दुश्मन अबकी हमारे बीच है, जो हमारी सुरक्षा व्यवस्था को पूछने का अवसर ही नहीं दे रहा है कि हू कम्स देयर, फ्रेंड ऑर फ़ो? वह तो बस सीधे हमला कर दे रहा है. हमारी इम्युनिटी को, हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बुरी तरह से प्रभावित कर दे रहा है.


जी हाँ, सही समझे आप, कोरोना अबकी ऐसा ही दुश्मन बनके आया है जिसने पूछने का मौका ही नहीं दिया. अभी भी मौका है संभलने का, अपने सुरक्षा तंत्र को सजग बनाने का. अपनी क्षमता को मजबूत कीजिये, अपनी इम्युनिटी पॉवर को बढ़ाइए और किसी भी दुश्मन के हमला करने से पहले, उसके सीमा रेखा में घुसने के पहले ही सुरक्षा तंत्र को पूछने दीजिये, हाल्ट, हुकुम सर देयर.....


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22 जून 2021

कहानी यारों-दिलदारों की

 किसी भी तरह की समस्या से कैसे निकलना है यह खुद हम पर निर्भर करता है. ये व्यक्ति की मनोदशा पर, उसके व्यवहार पर निर्भर करता है कि वह किसी भी विषम परिस्थिति में खुद को संयमित करते हुए उसे अपने पक्ष में करे. पिछले वर्ष 2020 से जबसे कोरोना ने अपनी गिरफ्त में देश को लिया उसी के बाद से बहुत से लोगों में दहशत में आ गए थे. यह दहशत इस वर्ष और बढ़ गई जबकि कोरोना की दूसरी लहर का कहर दिखा. ये समय अप्रैल मध्य से भयावह सा दिखाई देने लगा था. उसी भयावहता के बीच लगातार यह प्रयास रहा कि सबको इस भयावहता से, दहशत से बचा सकें. इसके लिए लगातार लोगों से बात करना, उनके अन्दर विश्वास जगाना, उनको हिम्मत देना आदि को मिलकर, फोन से करना शुरू किया. इसके बहुत अच्छे परिणाम सामने आये.


इसी में एक रात सोशल मीडिया पर अपने अनेक मित्रों के बीच इसी तरह की कुछ सकारात्मक बातों पर चर्चा हो रही थी. बात की बात में रंगमंच की कलाकार, साहित्यकार और हमारी मित्र गीतिका वेदिका ने किसी चर्चा पर एक शब्द यार दिलदार छोड़ा. बस उसी समय मन में, दिल में एक विचार आया कि कुछ ऐसा किया जाये जिसमें अपने दोस्तों के बारे में चर्चा की जाये. तुरंत उसी समय यार-दिलदार के नाम से एक एल्बम सोशल मीडिया पर बनाया. यह काम 06 मई 2021 को शुरू किया. उस समय सिर्फ फोटो लगाने का विचार था. अपने बचपन के मित्रों से, कॉलेज समय के मित्रों से उस एल्बम को सजाना शुरू किया. शुरू में यही लग रहा था कि लोगों की निगाह में यह एक चलताऊ सा काम होगा. ऐसे एल्बम में लोगों को रुचि नहीं होगी. आखिर कोई क्यों हमारे मित्रों के बारे में उत्सुकता दिखाएगा?


चूँकि माहौल कोरोना के कारण, लॉकडाउन के कारण एकाकी था, भयावह था, दहशत से भरा हुआ था. ऐसे में लोग कुछ नया सा होते अपने बीच देखना चाह रहे होंगे और शायद इसी सोच के कारण शुरू के एक-दो दिन बाद ही यार-दिलदार एल्बम में लोगों ने उत्सुकता दिखाना शुरू की, अपनी रुचि प्रदर्शित की. मित्रों की फोटो, बहुत पुराने मित्रों की फोटो, पुराने दिनों की फोटो देखकर लोगों में भी ख़ुशी दिखाई दी. बहुत से लोगों ने अपनी फोटो के बारे में भी चर्चा की. बहुत से लोगों ने हमारे मित्रों के बारे में जानने की भी इच्छा प्रकट की. ऐसे में लगा कि किसी गम्भीर माहौल को कुछ हल्का-फुल्का बनाने के उद्देश्य से यार-दिलदार एल्बम बनाना सफल रहा.


बहुत से लोगों ने जब मित्रों के बारे में जानना चाहा, सम्बंधित चित्रों की कहानी जाननी चाही तो लगा कि अब अपने उन्हीं दोस्तों के बारे में, दोस्तों के साथ खिंचाई फोटो के बारे में, उस फोटो से सम्बंधित कहानी के बारे में, मित्रों के साथ गुजारे दिनों के बारे में भी बताया जाना चाहिए. इस तरह के काम से यदि लोगों को अपने पुराने दिन याद आ जाएँ, अपने मित्र याद आ जाएँ, मित्रों के साथ गुजारे सुहाने दिन याद आ जाएँ तो यह काम अच्छा ही कहा जायेगा. बस इसी अच्छे काम को अब ब्लॉग पर भी लगाया जायेगा. अपने मित्रों की फोटो और कहानी यहाँ भी आएगी, आप लोग भी घूमियेगा हमारे साथ, हमारे सुहाने दिनों में, हमारे मित्रों के साथ.




20 जून 2021

बचपन की वो चटर-पटर अभी भी ज़ारी है



इस चित्र को देखकर आपको अपना बचपन याद आया होगा. याद आया या नहीं? यदि याद नहीं आया तो इसका मतलब ये ही कहा जायेगा कि आपने अपने बचपन को मस्ती से नहीं बिताया है. और जिस-जिस को ये याद आ गया है तो फिर कहने ही क्या. ऐसे लोगों की उँगलियों में हरकत होने लगी होगी इसके साथ खेलने की. ये एक तरह की पैकिंग शीट है जिसमें हवा भरे कोष्ठ बने होते हैं. ये शीट या कहें कि हवा भरे कोष्ठ किसी भी सामान को धक्के से, टूट-फूट से बचाने का काम करते हैं.


ये तो हुआ इसका असल मगर संक्षिप्त परिचय. वैसे भी किसी बड़े और गम्भीर परिचय की अभी आवश्यकता है नहीं इसके लिए. बस आप सभी से ये परिचित है, आप सभी इससे परिचित हैं, यही काफी है. परिचय की बहुत ज्यादा आवश्यकता इसलिए भी नहीं है क्योंकि इसके साथ बहुत से लोग अपना बचपन बिता चुके हैं और अभी भी जबकि बहुत से लोग युवा, अधेड़, वृद्ध हो गए होंगे, इससे खेलना नहीं छोड़ पा रहे होंगे.


हम ही नहीं हमारी बेटियाँ आज भी इस ताक में रहती हैं कि कौन सबसे पहले इस शीट को अपने कब्जे में करे. वर्तमान दौर में बहुत सारा सामान ऑनलाइन प्रकट करवाया जाता है. इस ऑनलाइन मार्केटिंग के कारण लगभग सभी तरह के सामानों में यह शीट लिपटी आती है. सामान निकालने के बाद सबसे पहला काम इस शीट के साथ खेलना होता है.


अब जिन्होंने इसके साथ नहीं खेला है वे आश्चर्य अवश्य कर रहे होंगे कि इससे कैसे खेला जाता होगा? अरे जी, इसके साथ खेलने का अपना ही मजा है. इस शीट में बने हवा के कोष्ठ, जिनके एक तरह के छोटे गुब्बारे समझा का सकता है, को उँगलियों के दवाब से फोड़ा जाये तो पट्ट-पट्ट की आवाज़ करते हुए फूट जाते हैं. इस आवाज़ में इतनी मधुरता होती है कि एक कोष्ठ फोड़ने के बाद रुका नहीं जाता है. एक, दिर एक, फिर एक और.... धीरे-धीरे सारी शीट के गुब्बारे फूट जाते हैं.


मन की मस्ती पूरी होते-होते हाथ में बस एक प्लास्टिक शीट रह जाती है. जिन लोगों ने इसका मजा लिया है, वे अवश्य ही खोजने में लग गए होंगे इसे. और हाँ, जिन-जिन लोगों ने इसके साथ अभी तक खेलने का मजा नहीं लिया है वे कहीं से इस शीट को प्रकट करें और गुब्बारे फोड़ने का मजा लूट लें.


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17 जून 2021

रानी लक्ष्मीबाई का अंतिम युद्ध

बुन्देलखण्ड के इतिहास की बारीकियों से परिचित करवाने वाले देवेन्द्र सिंह जी की कलम से...

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१७ जुन,१८५८ महारानी लक्ष्मीबाई का बलिदान दिवस, आज १७ जून है तो आज की पोस्ट उन्हीं को समर्पित करता हुआ ग्वालियर में लड़े गए युद्ध का विवरण.


१७ जून से एक दिन पहले कल यानि १६ जून को रोज अपनी सेना के साथ बहादुरपुर से मोरार की तरफ बढ़ा लेकिन उसके पहले उसने अपनी व्यूहरचना पूरी कर ली थी. संक्षेप में कहूँ तो यह इस प्रकार थी, ग्वालियर के दक्षिण दिशा में मेजर ओर हैद्राबाद कन्टन्जेंट के साथ आ जमा था. उसका कार्य यह था कि ग्वालियर शिवपुरी मार्ग से यदि भारतीय सेना दक्षिण की ओर भागने की कोशिश करे तो उसको रोके. ग्वालियर, लश्कर और मुरार को तीन भागों में बांट कर ग्वालियर के पूर्व-दक्षिण में कोटा की सराय में मुख्य मोर्चा स्थापित किया. ग्वालियर से कोटा की सराय सात मील की दुरी पर थी और लश्कर वहाँ से लगभग चार मील पर था. एक बार कम्पू और लश्कर पर अधिकार हो जाय तो किले के दक्षिण का भाग उनके उनके अधिकार में आने में ज्यादा मुश्किल का सामना नहीं करना पड़ता. रोज ने निश्चय किया कि वह स्वयं मुरार पर अधिकार करेगा और वहीं से कोटा की सराय में विद्यमान स्मिथ को सहयोग करेगा. स्मिथ के ऊपर सबसे महत्वपूर्ण स्थान का भार था.


ग्वालियर में क्रांतिकारी सैनिकों के मोर्चे इस प्रकार थे, तात्या टोपे का मोर्चा कम्पू में, राव साहब पश्चिम में था, बाँदा के नवाब अलीबहादुर को ग्वालियर नगर और किले का भार सौपा गया. १६ जून को हुए युद्ध में क्रांतिकारी सेनाओं की हार हुई और उनको पीछे हटना पड़ा. मुरार पर रोज का अधिकार हो गया. रोज के साथ Sir Robert Hamilton, Agent to the Governor-General in central India और Major Charters MacPherson, the Political Resident of Gwalior भी मुरार में आए. इसके साथ ही ब्रिगेडियर जनरल नेपिअर और महाराजा जयाजीराव सिंधिया भी आगरा से मुरार रोज के कैम्प में आ गये. अंग्रेजों ने सिंधिया से एक विज्ञप्ति जारी करवाई जिसमें ग्वालियर के सैनिकों से जो क्रांतिकरियों की तरफ से लड़ रहे थे, से कहा गया कि अंग्रेजी फ़ौज उनको राजपद फिर से देने के लिए युद्ध कर रही है. अतः वे उनका साथ छोड़ दें, उनके लिए आम माफ़ी की घोषणा की जाती है. ऐसा लगता है कि इस घोषणा का कुछ असर हुआ और फौजियों में कुछ लोग फिर से सिंधिया से मिलने की सोचने लगे.


रानी लक्ष्मीबाई ने फिर एक बार आगे आकर अंग्रेजों की धूर्तता के बारे में उनको समझाया. मेरे गुरु प्रोफेसर बिलास राय मिश्रा ने अपनी पुस्तक The Rising of 1857 in Bundelkhand with Special Reference to Jhansi के पेज न० १११ में लिखा – The Rani, however, once again rose equal to the occasion, she prepared an excellent plan of defence, entrusting to herself the most difficult task defending the eastern side of Gwalior. Accordingly, she made dispositions of her small force on the hills not yet occupied by the British. Her chief officers were Munder, Juhi, Ram Chandra desmukh, Raghunath singh, and Gul mohammad. They did not shut themselves up inside the fort. The fate that had befallen Jhansi was a constant reminder of the futility and danger of getting shut up inside the fort and thereby running the risk of being reduced to submission for want of provisions and other necessaries.


इस प्लान के तहत १६ जून की रात तक रानी ने और नेताओं से सलाह लेकर सब तोपें लगवा दीं. १७ जून को प्रातः सिंधिया की अश्वशाला से रानी के लिए एक नया घोडा लाया गया क्योंकि १६ जून को मुरार के मोर्चे में रानी का घोड़ा घायल हो गया था. उन्होंने हाथ में तलवार और कमर में खंजर बांध कर फौजियों की तरह सफ़ेद पैजामा और लाल कुरता पहना, साथ ही गले में मोतियों की माला डाली. पैरों में नागरा पहन, सिर पर सफ़ेद चंदेरी मुरैठा धारण कर रानी युद्ध के लिए तैयार हो गई.




इधर भोर होते ही स्मिथ की फ़ौज में युद्ध का बिगुल बज गया. स्मिथ ने एक भाग को रिजर्व में छोड़ा और अन्य के साथ आगे बढ़ा. उसका दल ४०० या ५०० कदम आगे बढ़ा था कि क्रांतिकारी सेना के गोलों की बौछार होने लगी. पीछे हट कर उसने अपने घुड़सवार दस्ते को आगे बढ़ाया और पीछे से गोलों की मार शुरू की. घनघोर युद्ध शुरू हो गया. इसी में रानी के एक तोपची ने कैप्टेन हिनेज को लक्ष्य करके एक गोला चलाया मगर दुर्भाग्य से गोला कैप्टेन के घोड़े को लगा और वह बच गया. हिनेज इस घटना से इतना डर गया कि कमान कैप्टेन पोर को दी. युद्ध होते-होते दोपहर हो गई. कोई भी पक्ष न जीतता और न ही हारता लग रहा था.


अब अंग्रेजों की ओर से कर्नल हिक्स और लेफ्टिनेंट रेले ने मोर्चा संभाला लेकिन अभी वे थोडा ही आगे बढ़े थे कि रानी के मोर्चे से चले एक गोले ने रेले और उसके घोड़े के प्राण ले लिए. इस आक्रमण में डाक्टर शेलोक्क भी घायल हो गया. इस मोर्चे पर रानी की जीत लगभग तय लग रही थी. तभी Cornet Goldworthy वीरतापूर्ण कौशल से अंग्रेजों की हारती बाजी को बचाया. उसने और कर्नल ब्लेक ने क्रांतिकारियों के मोर्चे पर खलबली मचा दी. दो घंटे के भयानक युद्ध के बाद भारतियों की तरफ के पार्श्व भाग की सेना पीछे हटने लगी. सारी भारतीय सेना तेजी से फूलबाग के परेड मैदान की तरफ पीछे हटने लगी.


रानी लक्ष्मीबाई ने जब यह देखा तो वह अपने सैनिकों को उत्साहित करते हुए प्राणों की बाजी लगा कर युद्ध करने लगी. दिन के तीन बज चुके थे, युद्ध करते-करते रानी अपने साथियों से बहुत दूर पहुँच गई थी. उसके बॉडीगार्ड भी उससे बहुत दूर थे. रानी के साथ केवल मुन्दर ही थी. इसी समय स्मिथ ने अपनी रिजर्व में रोके हुए ८वीं हुसर्स सैनिकों की टुकड़ी को युद्ध में उतार दिया. ताजादम ये सैनिक एकदम से उन पर टूट पड़े. अब रानी ने प्राण बचाने के लिए सोनरेखा नाले को पार करना चाहा. इसी वक्त मुन्दर को एक गोली लगती है. रानी ने सुना कि पीछे से मुन्दर कह रही थी कि अब वह नहीं भाग सकती. रानी पीछे मुड़ी और मुन्दर को गोली मारने वाले का काम तमाम कर दिया लेकिन तभी एक सैनिक की तलवार का करारा हाथ उन पर पड़ा. उनकी माथे से दाहिनी आँख तक का भाग कट गया. सहसा एक गोली भी उसकी छाती में समा गई. वह घोड़े पर औंधे मुँह गिर पड़ी. इसी समय अंग्रेजी फ़ौज को वापस लौटने का आदेश देने वाला बिगुल बजा और उनके सैनिक पीछे लौट चले. ये सैनिक भी नहीं जानते थे कि उन्होंने किसको मारा है.


रानी के साथियों ने रानी को ढूँढना शुरू किया परन्तु वह कहाँ थी. थोड़ी दूर पर रानी का घोडा मिला. रानी अभी भी उस पर ही लेटी थी. उसकी सांसे चल रही थी. सब उनको लेकर नाले के पार एक कुटिया पर लाए. थोड़ी ही देर में रानी की सांसें थम गईं. तात्या टोपे ने अपने बयान में बतलाया था कि रामचंद्र देशमुख ने रानी की चिता में आग दी थी.


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रानी झाँसी की पुण्यतिथि पर सादर श्रद्धांजलि सहित 

14 जून 2021

अब कहानियों, यादों में है हमारा मिंटू

समय को गुजरना ही होता है, सो गुजर रहा है. कुछ अच्छे पलों के साथ, कुछ बुरे पलों के साथ. इन अच्छे-बुरे पलों के साथ बहुत से लोग साथ हैं और बहुत से लोग कहानी बन गए हैं. ऐसे लोग जो कहानी बन गए हैं उनमें एक हमारा मिंटू भी शामिल हो गया है. आज पाँच महीने होने को आये मगर ऐसा लगता है जैसे अभी दरवाजे पर जोर से आवाज़ लगाएगा परी की. यह उसकी आदत बन चुकी थी कि वह कभी भी बिना किसी सूचना के घर आ जाया करता था. यदा-कदा उसकी डांट लगाईं तो वह हमें ही खबर करता था मगर इस निवेदन के साथ कि घर में किसी को, खासतौर से परी को मत बताइयेगा. परी उसकी भतीजी है यानि हमारी बेटी.


घर पर आने के बाद जोर से ‘परी की आवाज़ लगाते ही घर के अन्दर हलचल मच जाती. मिंटू और परी की ऐसे शरारतें चलती जैसे एक ही आयु-वर्ग के हों. कभी वो परी को सोते में भिगो देता, कभी परी उसके साथ कोई शरारत करती. कभी मिंटू हमारी घड़ी, पेन, चश्मा आदि को लेकर परी को परेशान करता तो कभी परी उसके सामानों को छिपाकर उसके साथ मस्ती करती. कभी-कभी चाचा-भतीजी की इस तरह की शरारत भरी मस्ती में हम ही दोनों की डांट लगा दिया करते.


बीच में मिंटू... अगल-बगल उनकी भतीजियाँ परी-पलक 


ऐसी शरारत उन दोनों के बीच इस बार इसी दीपावली पर हुईं. इसमें मिंटू की जबरदस्त डांट भी हमने लगाई. अंदाजा नहीं था कि चाचा-भतीजी के बीच इस तरह कि शरारत अंतिम बार हो रही है. दीपावली मनाने के बाद वापस लौटने के बाद सोचा भी नहीं था कि अब मिंटू कहानी बनकर हमारे बीच रहेगा. अब आये दिन बातचीत में मिंटू की किसी न किसी बात की चर्चा होती है. आये दिन कोई न कोई किस्सा, कोई न कोई शरारत, कोई न कोई घटना हमारी चर्चा में रहती है.


एक पल में एक व्यक्ति याद बन जाता है, स्मृति बन जाता है, एक झटके में कोई जीता-जागता, चलता-फिरता अपना परिजन एक कहानी बन जाता है. कल तक हम सबके बीच अपनी शरारत भरी उपस्थिति के साथ रहने वाला मिंटू अब कहानी बन गया है, अब हमारी स्मृतियों में है, अब हमारी बातचीत का हिस्सा है. मिंटू तुम्हारी बहुत सी कहानियाँ हमारे दिल में आज भी ज्यों की त्यों जीवित हैं, किसी दिन सबके बीच आएँगीं.




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12 जून 2021

बाल श्रम के प्रति सामाजिक नजरिया ही सही नहीं

बाल श्रम की जब भी बात होती है तब हम सभी सार्वजनिक रूप से अपने आदर्श स्वरूप में दिखने लगते हैं. जैसे ही बाल श्रम की बात ख़त्म होती है वैसे ही तुरंत सबकुछ भूल कर हम भी एक सामान्य इंसान की तरह पेश आने लगते हैं. हमारा एक मानना ये है कि यदि हम किसी भी तरह से कोई सकारात्मक काम कर सकें तो उसे कर देना चाहिए क्योंकि वर्तमान में सकारात्मकता की कमी देखने को मिल रही है. कुछ ऐसी ही स्थिति में बाल श्रम भी आता है. आवश्यक नहीं कि बाल श्रम में किसी बालक का काम करना ही शामिल किया जाये. उसके द्वारा किसी भी तरह का ऐसा काम जो उसकी आयु, उसकी मानसिक स्थिति के अनुसार सही नहीं वह उसके व्यक्तित्व विकास में बाधक है, अपने आपमें बाल श्रम की स्थिति में आता है.


इधर बहुत लम्बे समय से सामाजिक जीवन में सहभागिता करने के कारण, शिक्षा जगत से जुड़े होने के कारण, किसी न किसी रूप में मीडिया के संपर्क में बने रहने के कारण और उससे अधिक घूमने की प्रवृत्ति होने के कारण आये दिन ऐसी स्थितियों से दो-चार होना पड़ जाता है जबकि वहाँ बाल श्रम जैसी स्थिति दिखाई देती है. आज के सन्दर्भ में एक घटना याद आ रही है जो लगभग छह-सात साल पुरानी होगी.


हमारे उरई के एक गेस्ट हाउस में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहा था. हम अपनी आदत के अनुसार पीछे बैठे हुए फोटो खींचने में लगे हुए थे. उसी समय हमने देखा कि हॉल में पहली पंक्ति में बैठे लोगों को पानी पिलाने का काम दो बच्चे कर रहे हैं. दोनों की उम्र लगभग आठ-दस साल की रही होगी. जितना आश्चर्य उनकी उम्र को देखकर हुआ उतना ही आश्चर्य पहली पंक्ति में बैठे अतिथियों को देखकर हुआ. उसमें प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ जनप्रतिनिधि भी बैठे हुए थे. उनके पीछे की पंक्तियों में मीडिया के लोग, जनपद के गणमान्य नागरिक बैठे हुए थे मगर किसी की तरफ से उन बच्चों के काम करने पर सवाल नहीं किया गया.


उन बच्चों के पानी पिलाने के बाद बाहर निकलने पर उनके पीछे हमने जाकर उनकी जानकारी ली. उन दोनों में बड़ी उम्र की एक लड़की थी. हमारी किसी भी बात का जवाब दिए बिना वह अपने साथ के छोटे लड़के को लेकर उस तरफ चली गई जहाँ नाश्ता, खाना बन रहा था. लगभग दस मिनट बाद एक आदमी हमारे पास आया. उसने जरा गम्भीर सी स्थिति बनाते हुए कारण जानना चाहा उन बच्चों से पढ़ाई के बारे में, उनकी उम्र के बारे में, उनके परिवार के बारे में पूछने को लेकर.


हमने उस व्यक्ति को आश्वस्त किया कि कोई पुलिस जैसा मामला नहीं है, बस हम सामान्य रूप से पूछ रहे थे. जब उस व्यक्ति को लगा कि हम उनका अनिष्ट नहीं करना चाहते हैं तो उसने बताया कि वह उन दोनों बच्चों का मामा है. उन दोनों बच्चों की माँ उसके साथ खाना बनाने का काम करती है. उन बच्चों के पिता का कुछ साल पहले निधन हो गया है. ऐसे में वह अपनी बहिन को अपने साथ इस खाना बनाने वाले काम में लगाये है. इसी के साथ इन बच्चों को काम करने के बदले सौ रुपये देता है. उनकी पढ़ाई के बारे में उसने जानकारी दी कि वे दोनों स्कूल में पढ़ते हैं. रात के समय का खाना होने की दशा में अथवा स्कूल की छुट्टी होने पर उनको भी साथ ले आता है.


अब इसे लेकर वह कितना सही बोला या कितना गलत ये तो वही जाने मगर जब चाय-नाश्ते के समय में उन प्रशासनिक अधिकारियों से, जनप्रतिनिधियों से उन बच्चों के बारे में सवाल किये तो कोई संतुष्टि देने वाला जवाब तो नहीं मिला बल्कि ये सुनने को मिला कि उनकी फोटो कहीं छपवा न देना. सोचा जा सकता है कि जब आँखों देखते हुए हमारे तंत्र की ऐसी स्थिति है तो परदे के पीछे कैसे-कैसे खेल न होते होंगे.


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10 जून 2021

रक्त-सम्बन्ध से ज्यादा गहरा रिश्ता - 2050वीं पोस्ट

कुछ घटनाएँ संयोग रूप में हमारे साथ जुड़ सी गई हैं. ऐसी तमाम घटनाओं में एक घटना रक्तदान करने की है. संभव है कि प्रत्येक व्यक्ति के साथ उसके द्वारा किये गए पहले रक्तदान की स्मृतियाँ गहरे से जुड़ी हों क्योंकि ये कार्य है ही ऐसा. हमारे साथ भी पहले रक्तदान की घटना आज भी गहरे से जुड़ी हुई है. इस गहराई से जुड़े होने के पीछे कोई विशेष घटना नहीं बल्कि पहली बार 1990-91 में नकली नाम से रक्तदान करना जुड़ा है. इस बारे में बहुत न लिखेंगे क्योंकि कई बार पहले भी लिख चुके, इस बारे में. इसे आप यहाँ से पढ़ सकते हैं.


रक्तदान करने से लेकर एक और घटना जुड़ी है जो स्मृति-पटल पर सदैव को अंकित हो गई है. आज श्वेता की स्मृति में पूर्व की भांति रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया था. श्वेता-अंकुर से पारिवारिक घनिष्टता होने के कारण स्वाभाविक था कि इस आयोजन में सक्रिय उपस्थिति रहनी ही थी. अब पता नहीं इसे संयोग कहा जाये कि दुर्योग कि श्वेता से हमारी अंतिम मुलाकात रक्तदान करने के दौरान ही हुई थी. किसी को आवश्यकता पड़ने पर उसे कॉल की गई होगी. चिकित्सक परिवार से सम्बन्ध रखने के कारण उसे रक्त की महत्ता ज्ञात थी. तत्काल उसकी उपस्थिति रक्तदान के लिए हुई. उस समय तक हम रक्तदान कर चुके थे. श्वेता के रक्तदान करने के बाद हमारी एक मित्र ने हमसे उसकी तरफ इशारा करते हुए उससे परिचित होने की बात पूछी. हमने श्वेता को चुप रहने का इशारा करते हुए उससे अपना परिचित न होना बताया. हमारी उसी मित्र ने जानकारी देते हुए बताया कि ये मुस्कान हॉस्पिटल वाले डॉ० अंकुर शुक्ला की पत्नी हैं. हमने अंकुर के नाम पर भी अनभिज्ञता दिखाई तो हमारी मित्र चौंकी क्योंकि उस समय तक अंकुर और मुस्कान हॉस्पिटल जनपद में ही नहीं वरन आसपास के क्षेत्रों में भी प्रसिद्द हो चुके थे. ऐसे में हमें इनके बारे में न मालूम होना आश्चर्य की, चौंकने की बात ही थी.


हमारी मित्र की शक्ल-सूरत देख हम दोनों ठहाका मार कर हँस दिए. ऐसा इसलिए क्योंकि अंकुर हमारे छोटे भाई के समान है और उस दिन के पहले भी कई बार हम लोगों की मुलाकात पारिवारिक माहौल में हो चुकी थी. तब श्वेता ने ही उन मित्र का संशय दूर करते हुए कहा, ये हमारे बड़े भाई हैं. तब अंदाजा भी नहीं था कि हँसने-खिलखिलाने वाली, सबकी सहायता को तत्पर रहने वाली श्वेता के साथ हमें अगला कोई पल किसी भी रिश्ते के रूप में बिताने को नहीं मिलेगा. 


फ़िलहाल, आज के आयोजन में हमेशा की तरह अपने दायित्व को पूरा किया. हमारे साथ हमारे छोटे भाई हर्षेन्द्र ने भी रक्तदान किया. पिछले कई सालों से प्रतिवर्ष चार बार रक्तदान करने का नियम बना रखा है. हर बार एक सवाल किया जाता है कि कितने बार रक्तदान कर चुके हैं? इसके जवाब में हम हर बार उनको अपनी मर्जी की संख्या भरने के लिए बोल देते हैं. हर बार खुद से एक सवाल करते हैं, कई बार चिकित्सा अधिकारियों से भी किया मगर उचित जवाब न मिला कि आखिर रक्तदान करने वाले से उसके द्वारा किये जाने वाले रक्तदान की संख्या क्यों पूछी जाती है? विगत वर्षों का जितना अनुभव हमें है ये स्थिति आपस में सिर्फ प्रतिद्वंद्विता बढ़ाती है, एक तरह के अहंकार को बढ़ाती है.




हर्षेन्द्र, अंकुर, श्वेता, हम 


(आज, 10 जून 2021 की कुछ फोटो)

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(यह हमारे इस ब्लॉग की 2050वीं पोस्ट है)

09 जून 2021

निगेटिव रील से घर पर बनायें डिजिटल फोटो

फोटोग्राफी भी एक तरह का जूनून है. अब तो तकनीकी विकास ने फोटोग्राफी को बहुत आसान कर दिया है. किसी समय जबकि कैमरे में रील का उपयोग हुआ करता था तब फोटोग्राफी आज की अपेक्षा ज्यादा कठिन थी. एक तो रील का झंझट, प्रति रील फोटो की सीमित संख्या, रील धुलवाने, फोटो डेवलप करवाना आदि तमाम सारे कदम एक-दूसरे से जुड़े होते थे. उसके बाद जाकर एक फोटो देखने को मिलती थी.


अब रील वाला ज़माना भले न रहा हो मगर पुराने शौक़ीन लोगों के पास निगेटिव रील बहुत बड़ी संख्या में जमा हैं. पुरानी फोटो में बहुत सी तो समय के साथ मित्रों, परिजनों में बँटती रहती हैं, तो कुछ फोटो पुरानी होकर ख़राब भी होने लगती हैं. इसके अलावा पुरानी फोटो को देखकर उनसे जुड़ी यादों को एक-दूसरे तक शेयर करने के लिए भी फोटो की आवश्यकता होती है. ऐसे में या तो फोटो को स्कैन किया जाता है या फिर कैमरा/मोबाइल से उसकी फोटो खींचकर ऐसा किया जाता है.


बहुत से लोगों के मन में रहता है कि यदि निगेटिव रील से डिजिटल फोटो बन सकती तो उनके लिए अपनी यादों को शेयर करना सहज हो जाता. तो अब ऐसे लोगों का इंतजार ख़त्म हुआ. तकनीकी विकास के दौर में यह भी सुविधा प्राप्त हुई है कि अब घर बैठे अपने निगेटिव रील को डिजिटल फोटो में बदला जा सकता है. इसके लिए दो-चार आवश्यक चीजों की जरूरत होती है, उनके प्रयोग से निगेटिव रील से डिजिटल फोटो बनाई जा सकती है.


इस तरह की आवश्यक चीजों में निगेटिव तो आपके पास है ही. इसके अलावा एक कैमरा, कम्प्यूटर/ लैपटॉप, उसमें फोटोशॉप सॉफ्टवेयर चाहिए होता है. इसके साथ ही एक लाइट वाला बोर्ड भी आवश्यक है जिसके द्वारा सफ़ेद रंग का प्रकाश हो सके. ऐसे बोर्ड बाजार में बने-बनाए मिलते हैं अथवा उनको बनवाया/बनाया भी जा सकता है. किसी भी सामान्य से बिजली उपयोग वाले डिब्बे में सफ़ेद रौशनी वाला बल्ब/एलईडी/सीएफ़एल लगा सकते हैं. इस डिब्बे को सफ़ेद प्लास्टिक शीट से बंद कर दिया जाये, जिससे रौशनी सीधे न निकल कर सफ़ेद रंग का रिफ्लेक्शन दे. यहाँ ध्यान ये रखना है कि रौशनी सफ़ेद ही रखनी है.


सफ़ेद रौशनी का रिफ्लेक्शन देने वाला बिजली का बोर्ड 


अब शुरू होता है आपका काम. इसी बोर्ड पर अपने निगेटिव को फँसा दीजिये. इसके लिए एक निगेटिव के आकार का कागज़ काटकर भी उसका उपयोग किया जा सकता है. निगेटिव को सफ़ेद रौशनी देते बोर्ड में लगाने पर निगेटिव स्पष्ट रूप से चमकने लगेगा.


बोर्ड में लगाई गई निगेटिव 


इसके बाद किसी कैमरे से उसकी फोटो खींचना है. यहाँ ध्यान रखना है कि फोटो साफ़ आये, वह ब्लर न करे. यदि निगेटिव की फोटो धुँधली/ब्लर आती है तो उसकी डिजिटल फोटो साफ़ न आएगी.


फोटो खींचने के बाद नंबर आएगा कम्प्यूटर/लैपटॉप का. इसमें इनस्टॉल किये फोटोशॉप सॉफ्टवेयर का. खींची गई फोटो को अपने लैपटॉप में सेव कर लीजिये. इस फोटो को फोटोशॉप सॉफ्टवेयर पर एडिट करने के लिए खोलिए.


फोटो खींचने के बाद निगेटिव की फोटो 


निगेटिव रील की फोटो खींचते समय कोशिश करिए कि उसी एक स्नैप की फोटो खींची जाए जिसे आप डिजिटल फोटो में बदलना चाहते हैं. यदि किसी कारण से अथवा फोटो साफ़ रखने के लिए अतिरिक्त हिस्सा भी फोटो में आ जाये तो उसे फोटोशॉप से हटाया जा सकता है.


फोटो को फोटोशॉप सॉफ्टवेयर में खोलने के बाद आवश्यक भाग को क्रॉप कर लें. अब आपको इस फोटो को इनवर्स करना है. इससे इसके रंग बदल जायेंगे, जिससे निगेटिव की यह फोटो डिजिटल फोटो में बदल जाएगी. इसके बाद आपको एक कमांड चलानी होती है. जो लोग विंडो बेस्ड लैपटॉप का उपयोग करते हैं, वे कंट्रोल (Ctrl) के साथ आई (I) को दबा कर फोटो को इनवर्स कर सकते हैं. मैक लैपटॉप इस्तेमाल करने वाले लोग इनवर्स करने के लिए Control+Option+Command+8 को दबा सकते हैं.


फोटो इनवर्स होते ही आपको अपनी असली फोटो दिखने लगेगी. संभव है कि इसमें मूल फोटो जैसे रंग न दिखाई दें तो उनको आप एडिट करके बना सकते हैं. इसके लिए फोटोशॉप सॉफ्टवेयर के लेवल, कलर बैलेंस, ब्राइटनैस, कंट्रास्ट आदि का सहारा ले सकते हैं.


निगेटिव फोटो को इनवर्स करने के बाद सामने आई फोटो 


ऐसा करने से आप फोटो की खूबसूरती बढ़ा सकते हैं. निगेटिव रील से डिजिटल में बदली फोटो को पहले जैसी फोटो के रूप में अपने लैपटॉप में सहेज सकते हैं. अपने मित्रों, परिजनों के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी शेयर कर सकते हैं.


इस पूरी प्रक्रिया को आप वीडियो में भी देख सकते हैं. इसके लिए यहाँ क्लिक करें.

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08 जून 2021

मोबाइल से ऐसे की जा सकती है बेहतरीन फोटोग्राफी

किसी समय में फोटोग्राफी करना जटिल काम हुआ करता था साथ ही खर्चीला भी. तकनीकी विकास ने बहुत सारे उपकरणों का आविष्कार किया, उन्हीं में से एक आविष्कार डिजिटल कैमरा भी है. डिजिटल कैमरा आने के बाद रील की आवश्यकता नहीं रह गई. डिजिटल कैमरा से फोटो खींचते जाइए और चाहे जितनी फोटो खींचते जाइए. डिजिटल कैमरा फोटोग्राफी के क्षेत्र में एक उपयोगी उपकरण सिद्ध हुआ. इस उपयोगी साधन के आने से फोटोग्राफी सुगम हुई तो इसमें क्रांति लाने का काम मोबाइल ने किया. बेसिक फोन के विकल्प रूप में जन्मे मोबाइल कालांतर में फोटोग्राफी के लिए बेहतरीन ढंग से उपयोग किये जाने लगे. 


जो लोग फोटोग्राफी के शौक़ीन हैं उनके लिए मोबाइल फोटोग्राफी एक तरह की वरदान साबित हुई है. वे इस उपकरण से बेहतरीन फोटोग्राफी कर ले रहे हैं. शौकिया मोबाइल फोटोग्राफी करने वालों के सामने समस्या रहती है कि मोबाइल के द्वारा कैसे बेहतरीन फोटोग्राफी की जा सके. यद्यपि किसी भी मोबाइल कैमरे के रिजल्ट किसी भी कैमरे के जैसे नहीं हो सकते तथापि कुछ स्थितियों को ध्यान में रखते हुए फोटोग्राफी की जाये तो परिणाम बेहतर आ सकते हैं. इसके लिए किसी विशेष तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता नहीं है, बस कुछ सामान्य से कदम हैं जिनको अपनाये जाने के बाद फोटोग्राफी को बेहतर बनाया जा सकता है.




कैमरा हो मोबाइल, फोटोग्राफी के लिए लेंस का सर्वाधिक महत्त्व होता है. बेहतर फोटो के लिए आवश्यक है कि कैमरा लेंस साफ़ हो. चूँकि मोबाइल का उपयोग बातचीत के लिए होता ही है. हाथों में रहने के कारण पसीने से, उँगलियों के निशानों से, जेब में रखने के चलते अथवा किसी स्थान पर रखने के कारण लेंस पर निशान आ जाते हैं अथवा वह कुछ धुँधला हो जाता है. ऐसे में उस गंदे लेंस से फोटोग्राफी करने पर फोटो साफ़ नहीं आ सकती है. बेहतर हो कि जब भी फोटोग्राफी के लिए मोबाइल का उपयोग किया जाये, उसका कैमरा लेंस साफ़ कर लेने की आदत बना ली जाये.


मोबाइल फोन से फोटो खींचते समय इसका भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि उसका फ्लैश कम से कम उपयोग में लाया जाये. चूँकि मोबाइल के फ्लैश बहुत अधिक पॉवरफुल नहीं होते हैं. ऐसे में वे अपेक्षित रौशनी तो दे नहीं पाते, जिससे फोटो की गुणवत्ता पर नकारात्मक असर पड़ता है. ऐसे में इसका भी ध्यान रखा जाये कि जब भी मोबाइल का इस्तेमाल फोटोग्राफी के लिए किया जाये यह जाँच लिया जाये कि फ्लैश ऑन तो नहीं है. हाँ, रात के समय, अँधेरे में, कम रौशनी में फोटोग्राफी करने के लिए फ्लैश का इस्तेमाल किया जा सकता है.




मोबाइल से फोटोग्राफी कर रहे हों अथवा कैमरा से एक बात विशेष रूप से ध्यान दिए जाने योग्य है कि आपके फोकस में क्या-क्या है. बहुत से लोग बिना फोकस में आने वाले ऑब्जेक्ट को देखे बस क्लिक, क्लिक करने में लग जाते हैं. बाद में देखने पर जानकारी होती है कि जिसका फोटो लिया जा रहा है, उसके साथ-साथ बहुत सी ऐसी चीजों की फोटो आ गई है ओ उस पूरी फोटो को बेकार बना दे रही है. ऐसे में फोटो खींचते समय जितना ध्यान इसका रखना है कि फोकस में क्या-क्या लाना है, उससे ज्यादा महत्त्वपूर्ण ये जान लेना है कि फोकस से बाहर क्या रखना है. अनावश्यक वस्तुओं को फोकस से बाहर रखने के बाद सिर्फ अपने ऑब्जेक्ट को ही केंद्र में रखते हुए फोटोग्राफी करेंगे तो बेहतर फोटो सामने आएगी.


दिन में या रात में फोटोग्राफी करते समय इसका ख्याल जरूर रखें कि आपके कैमरे पर, आपके ऑब्जेक्ट पर लाइट कहाँ से आ रही है, कैसी आ रही है. यदि बहुत ज्यादा रौशनी आपके द्वारा निर्धारित ऑब्जेक्ट के पीछे है तो बैकग्राउंड में बहुत ज्यादा सफेदी आने की सम्भावना है. इससे बैकग्राउंड में दिखने वाली तमाम चीजें लगभग गायब हो जायेंगीं. किसी भी फोटो में उसके बैकग्राउंड का बहुत प्रभाव पड़ता है, ऐसे में इसका ध्यान रखना चाहिए कि आपके ऑब्जेक्ट के पीछे बहुत तेज रौशनी न हो. यहाँ ध्यान रखें कि लाइट का जो भी माध्यम हो, जहाँ से लाइट आ रही हो उसे अपने पीछे कर लें. ऐसा करने के पीछे उद्देश्य यह हो कि लाइट सीधे आपके ऑब्जेक्ट पर न पड़े. यदि किसी व्यक्ति की फोटो ले रहे हों तो उसके चेहरे को सीधी रौशनी से बचाने का प्रयास करें. यदि व्यक्ति के चेहरे पर सीधी रौशनी पड़ती है फोटो में उसका रंग गहरा आने की सम्भावना है.


मोबाइल एक सीमित क्षमता वाला उपकरण है, जिसमें कैमरा को एक सीमित उपयोग के लिए बनाया गया है. ऐसे में बहुत सारी बाध्यताओं के साथ एक बाध्यता यह भी है कि मोबाइल कैमरे से फोटोग्राफी करते समय ज़ूम का उपयोग न के बराबर किया जाये. ज़ूम करके फोटोग्राफी करने से बेहतर है कि फोटो खींचने के बाद उसकी एडिटिंग करते समय अपनी फोटो में ऑब्जेक्ट को ज़ूम कर लें.  




इन बातों के साथ-साथ यह भी याद रखें कि वर्तमान में बेहतरीन फोटो के लिए जितना महत्त्वपूर्ण कैमरा है, लेंस है, कुछ सामान्य से नियम हैं उतना ही महत्त्वपूर्ण है खींची गई फोटो की एडिटिंग करना. फोटो को एडिट करने के कुछ बेसिक नियम हैं, उनको सीखकर भी आप अपनी फोटो को बेहतर बना सकते हैं. कुछ सॉफ्टवेयर भी हैं जो फोटो की एडिटिंग करने में सहायक होते हैं, आप उनका भी उपयोग कर सकते हैं.


डिजिटल फोटोग्राफी में एक सुविधा बेहतर फोटोग्राफी के लिए अत्यंत सहायक सिद्ध हुई है और वह है रील का न लगना. कैमरा हो अथवा मोबाइल, रील के न उपयोग होने से प्रति रील सीमित फोटो खींचने के बंधन से मुक्ति मिली. इसके साथ ही यह भी स्वतंत्रता मिली कि एक बार में किसी भी ऑब्जेक्ट की, किसी जगह की कितनी भी फोटो खींची जा सकती हैं. बाद में जो फोटो आपकी आशानुरूप हों उन्हें रखते हुए शेष सभी फोटो को डिलीट किया जा सकता है.


इन बातों के अलावा सबसे महत्त्वपूर्ण है फोटोग्राफी का अभ्यास. अधिक से अधिक फोटो खींचने का अभ्यास करें, उक्त बातों के अलावा भी फोटोग्राफी से सम्बंधित विधान जानने-सीखने का प्रयास करें, फोटो को बेहतर से बेहतर लाने के लिए लगातार फोटोग्राफी करें. फोटोग्राफी के शौक में अपने जूनून को शामिल कर दीजिये फिर देखिये एक न एक दिन आपकी फोटो बेहतरीन नजर आने लगेगी.


(मोबाइल से खींची गई कुछ फोटो)

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06 जून 2021

फोटो खिंचवाने की आतुरता और रील का ख़त्म हो जाना

कैमरा बचपन से ही घर में देखते आ रहे थे इसलिए वह हमारे लिए कोई नई चीज नहीं थी. इसके अलावा जब हम कक्षा आठ में थे, उन दिनों हमारे डॉक्टर मामा ने हमें एक कैमरा गिफ्ट किया. उस समय तो इतना जेबखर्च भी नहीं मिलता था कि कैमरे में रील डलवा कर अपना शौक पूरा कर पाते इसके बाद भी कुछ महीनों तक पाई-पाई जोड़कर कभी-कभार रील डलवा कर शौक पूरा कर लिया जाता था. उन्हीं दिनों विज्ञान प्रगति में अथवा आविष्कार पत्रिका में एक ट्रिक देखने को मिली उस ब्लैक एंड व्हाइट रील से अधिक से अधिक फोटो निकालने की. उस चक्कर में दो-तीन रील बेकार हो गईं, सो अपने फोटोग्राफी शौक को कुछ दिनों के लिए टाल देना उचित समझ आया.


पढ़ाई से लड़ते-जूझते हुए किसी भी बच्चे की सबसे कठिन मानी जाने वाली दोनों परीक्षाओं हाईस्कूल, इंटरमीडिएट को सफलतापूर्वक पार करने के बाद जब हम स्नातक में आ गए तो फोटोग्राफी के शौक ने फिर फड़फड़ाना शुरू किया. अब जेबखर्च की जगह महीने का खर्च मिलना शुरू हो गया था, जिसके चलते पैसे बचाना आसान हो गया था. इसके साथ ही बहुत से मित्र भी सहयोगी बनने लगे सो फोटोग्राफी के शौक की उड़ान तेज होने लगी. स्कूल टाइम में जिस शौक को पूरा करने में कई-कई महीने लग जाते थे, वो अब कॉलेज टाइम में जल्दी-जल्दी पूरा होने लगा. हालाँकि अब कैमरा बदल चुका था. घर में देखा पिताजी वाला कैमरा और मामा जी द्वारा गिफ्ट किया कैमरा अब काम नहीं आ रहा था क्योंकि वे दोनों ब्लैक एंड व्हाईट फोटो के लिए बने थे. अब रंगीन फोटो के लिए रील डलवाई जाती, कैमरा भी मित्रों से ले लिया जाता. हमारे उरई के लंगोटिया यार अश्विनी से उसका कैमरा ले लिए जाता तो महीनों के हिसाब से हमारे पास रहता. ग्वालियर के मित्र वहाँ कैमरे की व्यवस्था कर देते. कॉलेज की पढ़ाई पूरी करके उरई वापस आने के बाद हमने अपने जेबखर्च को बचा-बचाकर अपना पहला कैमरा खरीदा. उसके बाद तो दे दनादन वाली स्टायल में फोटोग्राफी होने लगी. 


उन दिनों जबकि रील वाली फोटोग्राफी ही हुआ करती थी तब आज की तरह अंधाधुंध फोटो नहीं खींची जाती थीं. एक रील में महज 36 फोटो खींचने की सुविधा मिलती थी, जिसे रील को कमरे में लगाते समय की कलाकारी के चलते दो-तीन स्नैप तक और बढ़ा लिया जाता था. एक-एक फोटो का बहुत महत्त्व हुआ करता था. उन दिनों अनावश्यक रूप से क्लिक करने की गुस्ताखी नहीं की जाती थी. एक-एक फोटो खीचने के पहले, खिंचवाने के पहले बहुत सारे तामझाम करने पड़ते थे. सबके अंदाज का, आसपास के माहौल का ध्यान रखना पड़ता था. जब कैमरे में रील का नंबर 32-33 दिखने लगे और उसके बाद फोटो खींचने की माँग हो जाये. ऐसे में एक-एक स्नैप जैसे अनमोल हुआ करता था. सबसे ज्यादा मजा तो तब आता था जबकि रील अपनी निर्धारित संख्या 36 को पार करके भी एक-दो स्नैप खींच दे. इसके बाद किसी समय फोटो खिंचाने को सब तैयारी की गई, सभी लोग एकाग्र भाव से कैमरे के सामने जुटे मगर ये क्या, कैमरे ने फोटो खींचने से इनकार कर दिया क्योंकि अब रील में जगह बाकी नहीं. सोचिये उस समय फोटो खिंचवाने वालों की मनोदशा.


इसके अलावा शादी-विवाह समारोहों में, किसी अन्य कार्यक्रमों में जहाँ कि फोटो खींचने वाली स्थिति की मौज ली जानी हो वहाँ इक्का-दुक्का लोग खाली कैमरा लिए फ्लैश चमकाते दिखते रहते. ऐसे लोग असल कैमरा वालों की रील को बचाने में सहयोग करते रहते थे. इन सबके बाद इंतजार रहता रील के धुलकर आने का, फोटो बनकर आने का, उनको जल्दी से जल्दी देखने का. इसके लिए भी मारा-मारी मचती घर में. लैब से फोटो लाने वाला उस समय शहंशाह हुआ करता था क्योंकि वही सबसे पहले फोटो देखता था. उसके घर में आने पर छीना-झपटी का माहौल हो जाता. फोटो फट न जाएँ, इसका ध्यान रखते हुए सभी गठबंधन करते हुए फोटो को देखने का नंबर लगा लेते.


ये निशानी है हमारी फोटोग्राफी की 


अब ऐसी कोई भी स्थिति नहीं बनती. देखा जाये तो अब फोटो को लेकर कोई क्रेज जैसा नहीं रह गया है. हर हाथ में स्मार्ट फोन होने के कारण हर हाथ में कैमरा है. न पहले जैसी आतुरता, न पहले जैसा रोमांच, न पहले जैसी लालसा. अब बस क्लिक-क्लिक-क्लिक करते जाओ और जो पसंद न आये उसे डिलीट कर दो. न फोटो खींचने का उत्साह, न फोटो खिंचवाने का जोश और न फोटो देखने की उमंग.


इधर अपने सामानों को सहेजने के क्रम में आज पुराने निगेटिव सही करने बैठे तो लगा कि कितनी फोटो ऐसी हैं जो अब हमारे पास नहीं हैं. उन दिनों में फोटो बनने के बाद दोस्तों के बीच बंट गईं. कुछ साल पहले निगेटिव से डिजिटल पॉजिटिव बनवाने सम्बन्धी तकनीक का पता चला था मगर आसपास की सभी फोटो लैब ने ये काम बंद कर रखा है. अब इधर एक तकनीक की जानकारी हुई है. उसी के सहारे कारखाना खोल बैठे हैं, पुँने निगेटिव को डिजिटल पॉजिटिव बनाने का. देखते हैं कितन सफल होते हैं.


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03 जून 2021

प्राकृतिक आपदाओं का माल्थस के जनसंख्या सिद्धांत से सह-सम्बन्ध

सकल विश्व वर्तमान में एक चीनी वायरस, कोरोना की चपेट में आया हुआ है. यद्यपि इस सम्बन्ध में यूरोप की कुछ प्रयोगशालाओं द्वारा इसके प्राकृतिक वायरस होने की बात कही गई है तथापि इस थ्योरी पर कोई विश्वास नहीं कर रहा है. इस अविश्वास का कारण स्वयं चीन है. बहरहाल, अभी इस पर चर्चा नहीं. आज हम चर्चा करते हैं जनसंख्या सिद्धांत की. जनसंख्या का सम्बन्ध सदैव से उपलब्ध संसाधनों से रहा है. जनसंख्या और संसाधन के बीच यह सम्बन्ध स्थापित करने के लिए अनेकानेक सिद्धांत प्लेटो के समय से सामने आते रहे हैं. इन सिद्धांतों में दो तरह के सिद्धांत सामने आये. पहला, प्राकृतिक सिद्धांत और दूसरा, सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धांत. जिस जनसंख्या सिद्धांत को सर्वाधिक महत्त्व मिला, उसे थॉमस राबर्ट माल्थस द्वारा प्रतिपादित किया गया था. इसे प्राकृतिक सिद्धांत में शामिल किया जाता है.



माल्थस ब्रिटेन के निवासी थे तथा इतिहास तथा अर्थशास्त्र विषय के ज्ञाता थे. इन्होंने अपने एक निबंध प्रिंसिपल ऑफ़ पापुलेशन (Principle of Population) में एक तरफ जनसंख्या की वृद्धि एवं जनसांख्यिकीय परिवर्तनों (demographic changes) का तथा दूसरी तरफ सांस्कृतिक एवं आर्थिक परिवर्तनों का उल्लेख किया. यह निबंध वर्ष 1798 में प्रकाशित भी हुआ था. माल्थस ने अपने निबंध में संसाधन शब्द के स्थान पर जीविकोपार्जन के साधन का प्रयोग किया था. उन्होंने विचार दिया कि मानव में जनसंख्या बढ़ाने की क्षमता बहुत अधिक है और इसकी तुलना में पृथ्वी में मानव के लिए जीविकोपार्जन के साधन जुटाने की क्षमता कम है. उनके अनुसार जनसंख्या वृद्धि गुणोत्तर श्रेणी या ज्यामितीय रूप (Geometrical Progression) में होती है अर्थात जनसंख्या 1248163264128256... की दर से बढ़ती है. इसके उलट जीविकोपार्जन के साधन समान्तर श्रेणी या अंकगणितीय रूप (Arithmetic Progression) में अर्थात 123456789... की दर से बढ़ते हैं. 

वे अपने सिद्धांत में मानते थे कि प्रत्येक 25 वर्षों के बाद जनसंख्या दुगनी हो जाती है. इस स्थिति के अनुसार वे आकलन करके बताते हैं कि दो सौ वर्षों में जनसंख्या और संसाधनों में 256 तथा 9 का अनुपात हो जाता है अर्थात दो सौ वर्षों में जनसंख्या में 256 इकाइयों की वृद्धि होती है जबकि संसाधनों में मात्र इकाइयों की. यदि यह बिना नियंत्रण के आगे बढ़ता रहे तो यह अंतर लगभग अनिश्चित हो जायेगा. इस तरह की स्थिति के कारण जनसंख्या इतनी अधिक हो जाएगी कि उसका भरण-पोषण लगभग असंभव हो जायेगा. इसके चलते भुखमरीकुपोषण सहित अन्य समस्याओं का जन्म होता है.

ऐसी आनुपातिक स्थिति के चलते माल्थस का मानना था अतः उत्पादन चाहे कितना भी बढ़ जाएजनसंख्या की वृद्धि दर उससे सदा ही अधिक रहेगी. उन्होंने जनसंख्या एवं संसाधनों की अनुपात की तीन अवस्थाओं को बताया.

1- जब संसाधन उपलब्ध जनसंख्या की तुलना में अधिक हो.
2- जब संसाधन और जनसंख्या दोनों लगभग समान हो.
3- जब संसाधन के तुलना में जनसंख्या अधिक हो.

पहली और दूसरी स्थिति में जनसँख्या के कम अथवा समान होने के कारण जनसंख्या संबंधी समस्याओं की पहचान नहीं हो पाती लेकिन तीसरी स्थिति में, जबकि जनसंख्या संसाधनों से अधिक होती है तब जनसंख्या वृद्धि एक भयावह चुनौती के रूप में सामने आती है. इस स्थिति में जनसंख्या तथा संसाधनों के बीच की खाई अधिक बढ़ जाती है. परिणामस्वरूप पूरा समाज अमीर और गरीब में विभाजित हो जाता है. इसी के चलते पूंजीवादी व्यवस्था स्थापित हो जाती है. इस अवस्था में खाद्यान्न संकट वृहद स्तर पर उत्पन्न होता है और जनसंख्या के लिए खाद्यान्न की समस्या प्रमुख हो जाती है. संसाधनों पर अधिक दबाव की स्थिति में भुखमरीमहामारीयुद्ध और प्राकृतिक आपदा की स्थिति उत्पन्न होने लगती है. ऐसी स्थिति के कारण हुई मौतों के पश्चात् जनसंख्या में कमी आती है अर्थात जनसंख्या प्रकृति द्वारा नियंत्रित हो जाती है और पहली अथवा दूसरी  अवस्था में जाने लगती है. 


उनका स्पष्ट मत था कि जनसंख्या को यदि नियंत्रित न करके जनसंख्या और संसाधनों में संतुलन स्थापित नहीं किया जाता है तो प्रकृति स्वतः ही संतुलन स्थापित लेती है. जनसंख्या नियंत्रण के इन कारणों को माल्थस ने सकारात्मक उपाय कहा है. इसके साथ-साथ माल्थस ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए इन सकारात्मक उपायों के अतिरिक्त भी नियंत्रण के प्रभावी उपाय किए जाने पर जोर दिया. उनका कहना था कि यदि मनुष्य स्वयं ही ब्रह्मचर्य का पालनआत्मसंयमदेर से विवाह और विवाह के बाद भी आत्मसंयम जैसे नैतिक उपायों पर जोर दे तो न ही जनाधिक्य की स्थिति उत्पन्न होगी और न ही जनसंख्या विस्फोट की स्थिति होगी.

यदि उक्त सिद्धांत के परिप्रेक्ष्य में विगत एक दशक की प्राकृतिक घटनाओं पर ही नजर डालें तो समझ आएगा कि लगभग समूचा विश्व अपने आपमें किसी न किसी प्राकृतिक आपदा की चपेट में लगातार आता रहा है. जंगलों की आग, सूनामी जैसी स्थिति, बाढ़, भूस्खलन, ज्वालामुखी विस्फोट, सार्स, इबोला, मर्स आदि महामारियाँ, चक्रवाती तूफ़ान आदि-आदि ऐसी प्राकृतिक आपदाएँ हैं जिनके द्वारा संभव है कि प्रकृति समय-समय पर जनसंख्या और संसाधनों में संतुलन स्थापित कर रही हो. वर्तमान में कोरोना वायरस को इसी रूप में देखा जा सकता है. इसकी पहचान होने के समय मौसम के प्रभावी होने की बात करते हुए कहा जा रहा था कि कोरोना वायरस गर्म क्षेत्रों में ज्यादा समय तक जिन्दा नहीं रहता है. यदि एकबारगी इसे सच मान लें तो हम सभी देख रहे हैं कि आज, मार्च की समाप्ति के बाद भी देश में गर्मी नहीं पड़ी है. लगभग हर दूसरे-चौथे दिन यहाँ बारिश होने के चलते मौसम ठंडा हो जा रहा है. कहीं यह प्रकृति द्वारा संतुलन बनाने का प्रयास तो नहीं?

कुछ भी हो मगर यह सत्य है कि जब-जब जनसंख्या उपलब्ध संसाधनों से अधिक होगी तो अराजकता की स्थिति आएगी. सामानों, उत्पादों के लिए लूट मचेगी. सक्षम लोगों तक इनकी उपलब्धता हो सकेगी जो इससे वंचित रहेंगे वे भुखमरी, कुपोषण आदि का शिकार होंगे. स्पष्ट है कि प्रकृति स्वतः ही संतुलन स्थापित कर लेगी. वर्तमान कोरोना परिदृश्य में, भले ही यह चीन द्वारा निर्मित वायरस है, हम सभी को जनसँख्या नियंत्रण के उपायों पर गम्भीर होना ही होगा. यदि ऐसा नहीं कर सके तो आने वाला समय लगातार ऐसी ही किसी न किसी महामारी का, विभीषिका का शिकार बनता रहेगा.


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01 जून 2021

संवेदनहीन होकर हम मौत को एन्जॉय करने लगे हैं

आप में से बहुतों को शीर्षक पढ़कर आश्चर्य हुआ होगा. यदि ये कहें कि आश्चर्य से ज्यादा कुछ अजीब सी अनुभूति आई होगी, हमारे प्रति एक अलग तरह की ही सोच बनी होगी तो इसमें आश्चर्य न होगा. हमने खुद इस शीर्षक को लिखने के पहले बहुत सोचा मगर सच यही लगा कि हम सबने अब मौत को ‘एन्जॉय’ करना शुरू कर दिया है. ऐसा इसलिए भी कह सकते हैं क्योंकि इस कोरोना के विषम समय में भी लोग मौत की खबरों का प्रसारण करने से खुद को नहीं रोक पा रहे हैं. मौतों का होना एक तरह की घटना है जो उससे सम्बंधित व्यक्ति को जोड़ती है तो बहुत से लोगों को परेशान भी करती है. ऐसा समझने के बाद भी यदि हम मौत की खबरों का इधर-उधर भेजना नहीं रोक पा रहे हैं तो स्पष्ट है कि अब किसी की मौत हमें परेशान नहीं करती. किसी की मौत हमें संवेदित नहीं करती. किसी की मृत्यु हमें विचलित नहीं करती.


हाँ, ऐसा तब गलत हो जाता है जबकि ऐसा किसी हमारे अपने के साथ हुआ हो. किसी अपने की मृत्यु पर हम विचलित भी होते हैं, संवेदित भी होते हैं, भावनाओं में भी बहते हैं. अपने परिजनों से इतर, अपने ख़ास लोगों से अलग किसी भी मृत्यु को हम सभी आजकल एन्जॉय करने लगे हैं. ऐसा गलत न लगे तो खुद देखिये आजकल सोशल मीडिया पर मौतों की खबरों को. ऐसे-ऐसे लोगों के बारे में लोग खबरें लगाने में लगे हैं जिनसे उनका सीधे-सीधे कोई लेना-देना नहीं है. बात यहाँ तक कुछ ठीक भी मान ली जाये मगर कुछ लोग इससे आगे जाकर मौतों पर कार्टून बनाने लगे, मीम्स, जोक्स बनाकर मस्ती करने लगे. इसे क्या कहा जायेगा? क्या ये किसी कि मौत को एन्जॉय करना नहीं? कोरोना से होने वाली मौतों, श्मशान घाट के चित्र, वीडियो, चिकित्सालयों में मृतकों और उनसे जुड़े लोगों की स्थिति आदि को संवेदनहीनता के स्तर से दिखाया जाना यही साबित करता है.




इधर ऐसा समझ आ रहा है कि आजकल सोशल मीडिया की जन-जन तक पहुँच ने भी संवेदनशीलता को समाप्त किया है. हर हाथ में मोबाइल और हर हाथ में इंटरनेट ने सभी को पत्रकार बना दिया है. एक ऐसा पत्रकार जो संवेदनहीन है, समाज की वास्तविकता से परे है. उसे पता नहीं है कि उसके द्वारा प्रसारित करने वाली किस खबर से समाज पर, समाज के व्यक्तियों पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है. उसे इसका भी भान नहीं है कि उसके द्वारा जाने-अनजाने में प्रसारित की जाने वाली खबरों से, प्रसारित किये जाने वाले चित्रों से लोगों के मन-मष्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ रहा है. सबसे पहले हम की अनावश्यक कोशिश के चलते बहुधा दुर्घटनाओं की फोटो लोगों के मोबाइल पर सहज पहुँच में हैं. ऐसी फोटो देखने के बाद जहाँ एक तरफ संवेदना उपजनी चाहिए मगर ऐसा होता नहीं है.


दरअसल हम सभी की संवेदनाएं मर चुकी हैं. रोज हम हत्या, बलात्कार, दुर्घटना, मृत्यु की सजीव फोटो देखते रहते हैं. दो-चार दिन की संवेदना के बाद हम सभी वही चिर-परिचित पाषाण ह्रदय बन जाते हैं. उसके बाद सामने वाला हमारे लिए महज एक देह बन जाता है. देखने वाला उसे अपनी आँखों से देखता है. कोई उस मृत देह की मांसलता देखता है, कोई उस मृत देह में जेवरात खोजता है, कोई उसके परिधान देखता है. किसी के लिए भी वह संवेदनशीलता का मसला नहीं होता है. एक पल में सम्बंधित चित्र को देखने के बाद, सम्बंधित खबर को पढ़ने के बाद उससे सम्बंधित कार्टून, चुटकुले दिमाग में उभरने लगते हैं. इसके बाद वही होता है जो आजकल हम सभी करने में लगे हैं. एक चित्र और उसके साथ कई-कई चुटकुले, कार्टूनों का प्रसारण, शेयर कई-कई लोगों तक होने लगता है. आखिर हम सबको उस मौत पर एन्जॉय तो करना ही है क्योंकि वो मरने वाला हमारा अपना नहीं. अब वो मरने वाला कोई नामचीन है या फिर सामान्य व्यक्ति, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. हमें तो बस इससे मतलब है कि उसमें ऐसा क्या है जो उसकी मौत भी हमारा एन्जॉय कर सके.

 

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