क्या इन दिनों आम आदमी या आम जनमानस साहित्य से विरत होता जा रहा है? यह सवाल हम कभी अपने आपसे भी करते हैं और कभी-कभी उनसे भी करते हैं जो स्वयं को साहित्य से जुड़ा हुआ अथवा स्वयं को आलोचक भी बताते हैं। आपके सामने यह सवाल इसलिए उछाला क्योंकि इधर ब्लाग पर बहुत सा साहित्य और बहुत सी साहित्यिक गतिविधियाँ देखने को मिलीं।
साहित्य को लेकर इस प्रकार का सवाल इस कारण और उपजता है क्योकि हम एक साहित्यिक पत्रिका ‘स्पंदन’ का सम्पादन भी कर रहे हैं। यद्यपि लघु-पत्रिकाओं का भविष्य बहुत उज्ज्वल नहीं होता है फिर भी एक बहुत बड़ा पाठक वर्ग इन पत्रिकाओं का भी होता है।
इधर साहित्य में कुछ रुचि और फिर हिन्दी भाषा के प्रति कुछ भी थोड़ा सा योगदान देने की ललक ने हमारा ब्लाग संसार में प्रवेश कराया। ब्लाग संसार में लगातार अपने विविध ब्लाग्स के माध्यम से कुछ न कुद करते रहे और कुछ न कुछ करने की अभिलाषा है। इसी परिप्रेक्ष्य में एक रचनात्मक ब्लाग ‘शब्दकार’ बनाया था। इसी माह की 01 तारीख से इसमें रचनाओं का प्रकाशन भी कर दिया था।
रचनाओं के प्रकाशन से पूर्व हमने लोगों को ई-मेल के माध्यम से, लोगों के ब्लाग पर जाकर टिप्पणी के माध्यम से इस ब्लाग की सूचना दी। लोगों से रचनायें भेजने का अनुरोध भी किया। प्रत्युत्तर में रचनाओं की प्राप्ति भी हुई और अभी भी हो रही है। इसके बाद भी देखकर लगता है कि साहित्यिक ब्लाग गतिविधियों को संचालित करने वाले लोग भी अभी इससे दूर हैं। इसके अतिरिक्त कुछ लोग ऐसे भी हैं जो एहसान करने की तरीके से रचनाओं को प्रेषित कर रहे हैं। यह सब हमारे सवाल को और भी पुख्ता करता है।
चूँकि ब्लाग पर लगभग ग्यारह माह का समय होने को है पर देखा जाये तो अभी भी हमें वे लक्षण नहीं आ सके हैं जो ब्लाग के लिए आवश्यक हैं? हालांकि कई बार इस तरह की पोस्ट भी पढ़ डालीं जिनमें सही और उचित ब्लागिंग के बारे में बताया गया था पर शायद नाकाम रहा। ऐसा हम अपनी पोस्ट पर टिप्पणी के कम मिलने के कारण नहीं कह रहे हैं वरन् इस कारण ऐसा कह रहे हैं क्योकि जब हमने रचनात्मक ब्लाग ‘शब्दकार’ के बारे में लोगों को उनकी पोस्ट पर टिप्पणी के माध्यम से बताया तो चार लोगों ने हमें ई-मेल के द्वारा ऐसा न करने की सलाह दे डाली। इससे हमें लगा कि शायद यह सही तरीका नहीं है अपने किसी रचनात्मक ब्लाग के प्रचार करने का।
बहरहाल जहाँ तक ‘इस हाथ दे और उस हाथ ले’ वाली परम्परा से टिप्पणियों का करना होता है तो ये गलत है। यदि आपको ब्लाग पर किसी बात की सूचना देनी हो तो हमारे विचार से टिप्पणी ही सबसे अच्छा माध्यम है और यही सोच कर हमने ऐसा किया। चलिए शब्दकार तो बना लिया और उसमें नित्य ही कोई न कोई रचना प्रकाशित हो रही है। सोचा था कि इसकी सफलता के बाद अपने कुछ ब्लाग मित्रों के साथ मिलकर ब्लाग पर एक मासिक पत्रिका की शुरुआत करते। वैसे ऐसा करेगे तो पर शब्दकार को मिल रहे सहयोग को देखकर लगता है कि साहित्य प्रेमियों की संख्या कम से कमतर होती जा रही है। अब लोग अपना लिखा कुछ भी साहित्य के नाम पर आपको तो पढ़ाना चाह रहे हैं पर जो असल साहित्य है उसे पढ़ना ही नहीं चाह रहे। इसके साथ ही जो लोग अच्छा साहित्य लिख रहे हैं उसे भी नहीं पढ़ना चाहते हैं।
अन्त में फिर सवाल क्या साहित्य प्रेमियों की संख्या कम होती जा रही है? क्या टिप्पणियों के द्वारा किसी बात (जो अव्यावसायिक हो या जो जनहितकारी हो) का प्रचार नहीं किया जा सकता है? ब्लाग लेखन का सही एवं उचित दिशा-निर्देशन क्या है?
अन्त में चुनावी चकल्लस- एक-दो नहीं कई एक हैं दौड़ में,
कोई है तन्हा किसी के साथ मेले हैं।
अपने और परायों की कोई पहचान नहीं,
प्रधानमंत्री बनने की राह में बहुत झमेले हैं।।
31 मार्च 2009
साहित्य पाठक नहीं रहे अब.....
30 मार्च 2009
हमने बचाई सबसे ज्यादा बिजली
हमने बचाई सबसे ज्यादा बिजली। कल रात में धरती की खातिर बिजली को एक घंटे गुल रहना था, जैसा कि अपनी कल की पोस्ट पर आपको बताया था कि हमारे शहर में वैसे भी बिजली की कटौती से बचत होती ही रहती है सा कल भी हुई। रात को जैसे ही 8 बजे बिजली आई फिर पन्द्रह मिनट बाद चली गई। इसके बाद आना-जाना बना रहा। कुल मिला कर 8 से 10 बजे तक के दो घंटे में बिजली मात्र 30 मिनट को आई।
अब आई रात को सोने की बारी। चूँकि बिजली बचाना थी तो इस समय भी विद्युत विभाग कैसे शान्त रहता। रात्रि में लगभग सवा बारह बजे बिजली गई और फिर उसका आना हुआ ठीक दो बजकर दस मिनट पर। इतना सही समय इस कारण से बता पा रहे हैं क्योंकि गरमी के कारण नींद तो आने से रही। हाँ भाई इन्वर्टर है पर उसे भी तो चार्ज होने के लिए बिजली की आवश्यकता होती है।
सवा दो बजे बिजली के आने के बाद फिर उसने सुबह चार बजे के आसपास थोड़ा प्रातःकालीन सैर की और लगभग बीस मिनट के बाद बापस आ गई। अपने नियत समय सुबह 8 बजे पर उसको जाना था सो उस समय वह चली गई और अपने आने के निर्धारित समय दोपहर 12 बजे पर आ नहीं सकी। (कहीं चुनाव प्रचार में व्यस्त होगी?)
अब बताइये हम लोगों ने बचाई सबसे अधिक बिजली।
वैसे इस देश में बहुत से ऐसे शहर और गाँव हैं जहाँ 10 से 12 घंटे तक बिजली लगातार नहीं आती है और कुछ में तो स्थिति ऐसी है कि पूरे दिन के साथ-साथ दो-दो, तीन-तीन दिन भी हो जाते हैं जब बिजली के दर्शन नहीं होते हैं। वे तो लगातार ही बिजली बचाने में लगे हैं, उन्हें बधाई और विद्युत विभाग को भी सहयोग करने के लिए बधाई।
चुनावी चकल्लस-जीत हो उनकी या हो हार,
सभी दिखाते अपने वार।
हार से रहते हैं घबराते,
जीत को करते प्रयास अपार।
लेकिन देखो बेढ़ंगा खेल,
जीत के बाद भी मिलता हार।
28 मार्च 2009
धरती के सहयोग के लिए
‘अब पछताये होत का जब चिड़िया चुग गई खेत’ यह पंक्ति हर एक व्यक्ति ने सुन रखी होगी। इसी के साथ-साथ शायद ही ऐसा कोई होगा जो इसका अर्थ न समझता हो पर सब बेकार। आज इस पंक्ति का संदर्भ इस रूप में है कि हम आज रात्रि में अपनी धरती माता को बचाने के लिए कुछ छोटा सा दिखावा वाला कदम उठायेंगे। चलिए सकल विश्व की आवाज है तो आवाज से आवाज मिलानी ही होगी नहीं तो हमें भी पिछड़ा और हर काम में टाँग अड़ाने वाला कह दिया जायेगा।
वैसे टाँग अड़ाने का जन्म सिद्ध अधिकार हमने महाशक्तियों को दे दिया है। ग्रीन हाउस इफेक्ट हो या फिर ओजोन परत क्षरण का मामला सभी में वे सारे देश आगे हैं जिन्होंने विकास की अंधी दौड़ में न तो प्रकृति को कुछ समझा और न नही पर्यावरण की रक्षा की। अब जबकि संकट समूचे विश्व पर आन पड़ा है तो वे अपनी गलतियों का ठीकरा हम विकासशील देशों के ऊपर फोड़ना चाहते हैं।
बहरहाल आज का दिन इस बात का नहीं है कि हम इस बात का विश्लेषण करें कि कौन सही है कौन गलत। इस बात की अभी जरूरत भी नहीं है कि हम देखें कि क्यों और किसकी गलती का खामियाजा सारा संसार उठाने को है। आज नहीं पर कल अवश्य ही इस बात की जरूरत होगी कि हम बैठ कर इस बात को तय करें कि यह सब किसकी गलती से अधिक है। विकसित देश भी यदि जवाबदेह हैं तो हम विकासशील देशों की भी गलती कम नहीं है।
चलिए आज की रात्रि के कुछ पल धरती माता को।
एक अंदर की बात.....हम भारतवासी जाने-अनजाने शक्ति की बचत करते रहते हैं। उत्तर प्रदेश के अधिकांश शहरों में बिजली की समस्या इस तरह से है कि न चाहते हुए भी आदमी द्वारा बिजली की बचत हो जाती है। एक नजर हमारे शहर की विद्युत व्यवस्था पर भी डाल लीजिए- प्रातः 8 बजे से 12 बजे तक बिजली नहीं रहनी है फिर आयेगी और 3 बजे चली जायेगी। इसके बाद आयेगी रात्रि में 8 बजे, इसके बाद रहती तो रात भर है पर जाना बराबर लगा रहता है। कभी एक घंटे को तो कभी दो घंटे को, ये घोषित कार्यक्रम में नहीं है, अतः इसे जाना नहीं माना जाता।
फिर भी इतने से ही जिम्मेवारियों से मुक्त नहीं हुआ जा सकता।
अब चुनावी चकल्लस-
किसको अपना यार कहें और किसे सुनायें गम,
अपने ही अब पल्ला झटके, और निकालें दम।
सोचा था सब अपने हैं, मौज करेंगे मिलकर,
छोड़ गये सब बीच धार में, तन्हा डूबे हम।।
27 मार्च 2009
नव संवत्सर का स्वागत करें
नवरात्रि का पर्व आज से प्रारम्भ हुआ और नव संवत् 2066 (नये वर्ष) का शुभारम्भ हुआ। अंग्रेजी माह के वशीभूत हम अपना ही नववर्ष भुला बैठे। वैसे भी इस पंचांग का अब कोई अर्थ ही नहीं रह गया है। हमारी नई पीढ़ी तो शायद हिन्दी माहों के नाम भी नहीं जानती होगी।
चलिए जानती हो या नहीं आज के दिन कुछ और न लिखकर अपने महीनों के नाम उस नई पीढ़ी के लिए जो किसी न किसी रूप में भारतीयता से जुड़ना तो चाहती है पर अपने सामने किसी आदर्श को न पाकर व्यथित है।
हिन्दी बारह माहों के नाम इस प्रकार से हैं-
1. चैत्र 2. वैशाख
3. ज्येष्ठ 4. आषाढ़
5. श्रावण (सावन) 6. भाद्रपद (भादों)
7. आश्विन (क्वार) 8. कार्तिक
9. मार्गशीष (अगहन) 10. पौष (पूस)
11. माघ 12. फाल्गुन (फागुन)
और अन्त में चुनावी चकल्लसराजनीतिक कुश्ती के अब अपने रंग दिखे,
उठापटक करने को सब दाँव मारते दिखे।
कैसे पटकें किसको पटके, कोशिश जारी है,
वोट के लालच में सब चरण चूमते दिखे।।
26 मार्च 2009
जनता अपना कलेजा देने को विवश है
दोस्तों का आना और जाना लगा हुआ है। आज की दोस्ती कल दुश्मनी में बदलती दिख रही है। कोई कह रहा है कि वे हमारे साथ हैं तों कोई कह रहा है कि हमें फलां का साथ है। देखने वाले परेशान हैं कि दोस्ती का आंकड़ा किस तरह समझें पर दिखाने वालों को कोई परेशानी नहीं है।
यह सब चुनावी मौसम के मस्ताने हैं जो अपने-अपने यार-दोस्तों को तलाशने में और दूसरे के दोस्तों को भगाने में लगे हैं। यह हमारे देश का लोकतन्त्र है जहाँ इस समय सब काम सत्ता के लिए चल रहे हैं। दलों का अपना फंडा है कि किस तरह से किसके साथ निभेगी। निभाने की समस्या सिर्फ चुनावों तक के लिए है, इसके बाद तो जनता को निभानी है।
बहुत पहले (छोटे में) एक कहानी पढ़ी थी - बंदर और मगरमच्छ की, जिसके अनुसार मगरमच्छ ने अपनी पत्नी के लिए बंदर का कलेजा मांगा (दोस्ती की आड़ में) और बंदर ने खुद को चालाकी से बचा लिया। बंदर तो बच गया पर उन दोनों की दोस्ती तो सदा के लिए समाप्त हो गई।
आजकल जनता से उसका कलेजा मांगा जाता है। जनता बचने की कोशिश भी करती है पर बच नहीं पाती है क्योंकि इसे नहीं तो उसे अपना कलेजा देना ही है। ऐसे में उसको कोई उपाय भी नहीं सूझता है कि वह क्या करे?
चलो कलेजे को तैयार करो क्योंकि ये नहीं तो कोई दूसरा मगरमच्छ कलेजा खाने को तैयार बैठा है।
चुनावी चकल्लस-गलबहियों के दौर हैं, बजे मिलन के गीत,
इनसे रिश्ता, उनसे नाता, बता रहे हैं मीत।
ढूँढ़ रहे हैं दल-दल में, एक कुर्सी का साथ,
कुर्सी पाते ही बोलेंगे, कैसा रिश्ता, कैसा मीत?
25 मार्च 2009
चुनावी चक्कर में
आखिर ये तो तय हो गया कि अब इस देश के लोगों का चहेता खेल क्रिकेट का नया फटाफट संस्करण ‘आई पी एल’ अब भारत में नहीं होगा। देश में महासंग्राम की तैयारी चल रही है और ऐसे में कोई दूसरा संग्राम सम्भव ही नहीं। इसकी सम्भावना इसकी सुरक्षा कारणों से उतनी नहीं थी जितनी कि राजनेताओ की ओर से जनता का ध्यान हटने से थी।
सोचिए एक पल को कि जिस देश में लोगों को किसी न किसी रूप में जनता के सामने बने रहने की आदत सी पड़ गई हो चाहे वह अपने भाषणों से हो या फिर अपने कारनामों से वहाँ ऐन चुनावों के वक्त क्यों इस आदत को खोना पसंद करेंगे?
क्रिकेट होता और लोगों का ध्यान पूरी तरह से इसी पर रहता। ऐसे में चुनाव की चर्चा कौन करता, भड़काऊ भाषणों की ओर कौन ध्यान देता, न तो मीडिया इस ओर ध्यान देती और न ही जनता। आई पी एल अपनी जिद पर अड़ा था कि वह तारीखों को आगे नहीं बढ़ायेगा। इसके लिए उसने तमाम सारे बहाने भी बना रखे थे। अब जबकि यह आयोजन देश से बाहर हो रहा है तब वे सब बहाने कहाँ गये जो दिये जा रहे थे।
यहाँ भी वही बात थी सबके लिए चर्चा में बने रहने का तरीका। चलो अब क्रिकेट तो बाहर ही हो रहा है, अब तो फुर्सत में चुनावों की, नेताओं की, उनके कारनामों की चर्चा कर ही सकते हैं?
(आज से चुनावों तक कुछ चुनावी चकल्लस करने का विचार है, कितना सफल होते हैं यह बाद की बात है)
चुनावी चकल्लस- रणभेरी बज गई, सजने लगे सब यन्त्र,
कुर्ते सजे, सजे पाजामे और सजा गन-तन्त्र।
मन में नये रोमांच का होने लगा संचार,
लोकतान्त्रिक देश में आने को है लोकतन्त्र।
23 मार्च 2009
शहीदों की आत्मा करती होगी सवाल
करिये उन्हें याद जो चले गये देश के नाम पर। इस चुनावी मौसम में हर किसी को गांधी, नेहरू की याद आ रही है; किसी को अम्बेडकर की तो किसी को महात्मा बौद्ध याद आ रहे हैं। इन्हीं यादों के बीच लोगों ने याद किया जेड गुडी को, जो कल प्रातः (जैसा कि मीडिया ने खबर दी) संसार को छोड़कर चलीं गईं।
कौन किसे याद करता है किसे नहीं यह उस व्यक्ति की अपनी का विषय होता है पर जेड गुडी को उनके कुछ कार्यों के कारण अवश्य ही याद किया जा रहा है। हमारे देश की संस्कृति में एक विशेष बात ये है कि मृतात्मा के लिए कभी भी अपशब्दों का प्रयोग नहीं किया जाता है। जेड गुडी क्यों प्रसिद्ध हुई यह सबको पता है पर जो इस देश की परम्परा है उसके अनुसार ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे और उनके परिवार को धैर्य और इस दुःख को सहने की ताकत दे।
जहाँ तक हमारे देश के वर्तमान व्यक्तित्वों का सवाल है वे खुलेआम अपने शहीदों का, महान व्यक्तित्वों का अपमान करते घूम रहे हैं। कोई किसी को गाली दे रहा है कोई किसी को पूरी व्यवस्था को चौपट करने वाला बता रहा है। समझ में नहीं आ रहा है कि हमारे देश के नेता चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे है या फिर हमारे देश के पूज्य लोगों की बेइज्जती करने में लगे हैं। कौन किसे क्या कह रहा है यह किसी से भी नहीं छुपा है। यह सब देखकर तो लगता है कि यदि इन महान व्यक्तित्वों की आत्मायें (जो आत्मा-परमात्मा में विश्वास नहीं करते उनसे क्षमा) आपस में मिलतीं और अपने सुख-दुख की चर्चा करतीं होगी तो निश्चय ही मिल कर पूरी संविधान सभा से सवाल करतीं होगी कि क्यों चुनाव को, मतदान प्रक्रिया को इस देश के संविधान में रखा गया?
22 मार्च 2009
भगत सिंह की याद में
कार्यक्रम की रूपरेखा बहुत भव्यता से इतर सादगी और संवेदनात्मक रहती है। आज यानि की शहादत की पूर्व संध्या पर मूर्तियों के सामने ज्योति प्रज्ज्वलन के साथ-साथ देशभक्तिपूर्ण गीतों की प्रस्तुति की जाती है। दो-चार प्रमुख लोगों के विचारों की प्रस्तुति भी होती है।
अगले दिन यानि की 23 मार्च को प्रातःकाल उन शहीदों की मूर्तियों पर माल्यार्पण होने के बाद सायं 5 बजे से एक सांस्कृतिक मार्च निकाला जाता है। इसमें शहर के गणमान्य लोगों की सहभगिता होती है। गीतों, विचारों के साथ-साथ दो-तीन स्थानों पर इप्टा के एवं अन्य संस्थाओं के कलाकारों द्वारा नुक्कड़ नाटकों का भी आयोजन किया जाता है।
इन कार्यक्रमों के द्वारा जनता के बीच शहीद भगत सिंह के विचारों को प्रसारित करना होता है। उद्देश्य यह होता है कि शायद एक ही आदमी उनके विचारों से प्रेरणा प्राप्त कर साम्राज्यवाद को समाप्त करने की दिशा में कार्य करने लगे।
आइये आप भी कुछ चित्रों के द्वारा (यद्यपि चित्र साफ नहीं आये हैं फिर भी) आज के कार्यक्रम में शामिल हो लीजिए।



21 मार्च 2009
हिन्दी भाषा की चीर-फाड़ न करें.....
इस समय हिन्दी दिवस या फिर हिन्दी से सम्बन्धित कोई भी सप्ताह, पखवाड़ा, माह आदि भी नहीं मनाया जा रहा है फिर भी हम हिन्दी की बात करने आ गये हैं। दरअसल देखने में आ रहा है कि विगत कुछ वर्षों से हिन्दी को लेकर हिन्दी भाषियों और अहिन्दी भाषियों के द्वारा हिन्दी विकास के लिए बड़े-बड़े स्तर पर प्रचार-प्रसार, बड़े-बड़े कार्य किये जाते रहे हैं। इन्हीं कार्यों और इनके प्रयासों से जो लोग जागरूक हुए हैं वे तो सही रूप में कार्य कर रहे हैं और जो बस ये दिखाने के लिए कि वे भी हिन्दी विकास हेतु कार्य कर रहे हैं, हिन्दी की टाँग तोड़ने का काम कर रहे हैं।
आपने देखा होगा कि इस समय हिन्दी भाषा में कार्य करने वाला व्यक्ति (जो हिन्दी में पढ़ा रहा है या जो ये साबित करना चाहता है कि वो सच्चा हिन्दी सेवी है) अपने कार्यों के दौरान अंग्रेजी के कुछ शब्दों को भी हिन्दी में अपने अनुसार अनुवाद करके उनका प्रयोग कर रहा है। यही अतिप्रेम की निशानी हिन्दी को लाभ पहुँचाने के स्थान पर हानि पहुँचा रही है।
इस समय हिन्दी की पत्रिकाओं और हिन्दी के पत्रों पर गौर करिए, हिन्दी सेवी का अहम् पाले लोगों का काम देखिए वे मोबाइल के स्थान पर विविध शब्दों का प्रयोग करने में लगे हैं। आखिर मोबाइल इस समय जन-जन की पहुँच में है और हिन्दी सेवी या फिर हिन्दी की पत्र-पत्रिकाएँ होने के कारण सम्पर्क में मोबाइल लिख कर अंग्रेजी कैसे लिख दें? इसका निवारण करते हुए इन महामना लोगों ने मोबाइल को ‘चलितवार्ता’, ‘चलभाष’, ‘दूरध्वनि’, ‘चलध्वनि’ का नाम देकर स्थापित करना शुरू कर दिया है।
अच्छा है कि अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी का प्रयोग हो पर यह तो नहीं कि जिसका जो मन हुआ वही लिखने लगे। क्या वास्तव में मोबाइल के हिन्दी अर्थ यही सब होंगे? एक मिनट को विचार करें कि क्या इन शब्दों का हिन्दी में अनुवाद किया जाये तो क्या इनका अर्थ मोबाइल ही निकलेगा?
इसी तरह से हिन्दी की छीछालेदर करने में हमारे हास्य व्यंग्य के कविगणों का विशेष हाथ भी रहा है। कविता में हास्य का पुट पैदा करना है तो हिन्दी को अतिक्लिष्ट रूप में प्रस्तुत कर दो, हास्य उत्पन्न हो जायेगा। इन कविताओं में, हास्य का पुट देने के लिए साइकिल को ‘द्विचक्रवाहिनी’, ट्रेन को ‘लौहपथगामिनी’ के नाम से परिभाषित किया जाता है। क्या वास्तव में इन दोनों शब्दों के यही हिन्दी अनुवाद होंगे? (ऐसे बहुत से शब्द हैं जो अंगेरजी के हैं और उनका हिन्दी रूपान्तरण हास्य के लिए क्लिष्ट रूप में किया जाता है।)
हिन्दी की मानक शब्दावली का निर्माण करने के लिए हमारे देश में एक आयोग कार्य कर रहा है। आयोग का कार्य सराहनीय है किन्तु इसके बाद भी उसमें अनेक प्रकार की खामियाँ हैं जो हिन्दी की स्थिति को गिरावट का शिकार बना दे रहीं हैं। इसके पीछे आयोग की मंशा ये कदापि नहीं है कि हिन्दी का विकास न हो पर कम से कम उस आयोग को जो हिन्दी की मानक शब्दावली का निर्माण कर रहा हो उसे तो इसका ध्यान रखना ही होगा। हिन्दी को मानक रूप देने की अतिशय जल्दबाजी में हिन्दी की मात्राओं के साथ तथा पंचम वर्ण के साथ व्यापक रूप से खिलवाड़ किया जा रहा है। निःसंदेह इससे हिन्दी भाषा की व्यापक शब्दावली बने या न बने पर कुछ शब्दों का लोप अवश्य ही हो जायेगा।
आयोग ने मानक रूप के लिए पंचम वर्ण के प्रयोग में छूट की है इससे आम बोलचाल की भाषा में कहें तो आधे अक्षर के प्रयोग में आसानी हो गयी है। अब सम्पादक को आप ‘संपादक’ लिख सकते हैं, दयानन्द को आप ‘दयानंद’ लिख सकते हैं। इससे आसानी भले ही हुई हो पर यदि गौर किया जाये तो ज्ञात होगा कि हम आधे म को धीरे-धीरे भुला देंगे, जैसे कि हमने पंचम वर्ण ‘ञ’ को भुला दिया है। क्या आप लोग अब ‘ञ’ का प्रयोग करते हैं?
हिन्दी भाषा के विकास का दौर चल रहा है या नहीं ये तो नीति-नियंता ही जानते होगे पर ये तो तय बात है कि अंगेजी को देखकर हिन्दी अनुवाद से हिन्दी का विकास नहीं होगा। सिर्फ हिन्दी में शब्दों के बोलने के लिए अंगेजी शब्दों का हिन्दी अनुवाद सही नहीं है। यदि किया ही जाये तो इसको व्यंग्य रूप में नहीं सहज स्वीकार्य रूप में प्रयोग किया जाये। हिन्दी भाषा का सरलीकरण किया जाये, सहजीकरण किया जाये ताकि हिन्दी वाकई जन-जन की भाषा बन सके। कवि सम्मेलनों या हँसी, चुटकुलों के लिए प्रयोग न हो सके। क्या किसी ग्रामीण या शहरी ने ‘लालटेन’ का कोई हिन्दी अनुवाद खोजने की कोशिश की है?
वैसे एक सवाल हमारा ब्लाग के पुरोधाओं से (मात्र जिज्ञासा शमन के लिए) ‘ब्लाग’ का हिन्दी रूपान्तरण या अनुवाद ‘चिट्ठा’ किस आधार पर किया गया है?
20 मार्च 2009
सामाजिक संस्कार और सोच में यू-टर्न
मुम्बई की एक घटना आज समाचार पत्र में पढ़ी और उसके प्रत्युत्तर में कुछ लोगों के विचार भी सुने तो लगा कि समाज में संस्कारों, मान्यताओं, विचारों में व्यापक परिवर्तन हो चुका है। समाचार पत्र में छपी घटना शायद किसी को अचम्भित या हतप्रद न करे क्योंकि हमारे समाज में ऐसी घटनायें आम सी हो गयीं हैं। कुछ बाहर आ जा रही हैं और कुछ बाहर नहीं आ पा रहीं हैं।
इन घटनाओं पर आज किसी संस्कृति, सभ्यता, फैशन आदि के बारे में कोई भी विचार नहीं क्योंकि हमारी खुद की परम्परा, संस्कृति, संस्कार की इतनी महान विरासत रही है जब वह ही हम आत्मसात नहीं कर सके तो दुसर की संस्कृति, संस्कारों को दोष क्यों दें।
घटना ये है कि मुम्बई में एक व्यापारी पिता अपनी ही बेटी से नौ साल तक शारीरिक सम्बन्ध बनाये रहा। नौ साल बाद उस इक्कीस वर्षीया लड़की ने पुलिस के पास जाने का साहस जुटाया और अपने पिता का पकड़वा दिया।
नौ साल तक शारीरिक शोषण करवाने के बाद पुलिस में जाने के पीछे का कारण यह बताया गया कि अब वह काम पिपासु पिता अपनी दूसरी पन्द्रह वर्षीया पुत्री के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने का प्रयास करने लगा था।
हम आपके आसपास इस तरह की एक-दो घटनायें होतीं ही रहने लगीं है (आधुनिकता है भई!) तो जाहिर है कि इस घटना से भी किसी प्रकार की संवेदनशीलता नहीं जगी होगी।
यहाँ बस ये बताना है कि इस घटना के बाद अपनी टिप्पणी देने वाले भी दो-तीन वर्गों में दिखे।
एक वर्ग ने तो पहली लड़की के साहस की प्रशंसा की और पिता को कोसा। (यह वर्ग अधिकाधिक संख्या में होगा।)
दूसरा वर्ग ऐसा था जिसने कम से कम हमें एक बारगी तो चैंका ही दिया। इस वर्ग में अधिकतर की उम्र 40 वर्ष से ऊपर की थी या फिर 25 वर्ष के नीचे की थी। इन लोगों का जो कहना था उसका सार यह है कि
- बड़ी लड़की ने पुलिस के पास इसलिए शिकायत की क्योंकि अब उसका पिता उसकी छोटी बहिन के शरीर में रुचि लेने लगा था।
- उसके पिता को अब उससे शारीरिक सुख की प्राप्ति में आनन्द नहीं आता होगा।
- वह अपनी बहिन को बचाने के लिए या अपने पिता से स्वयं दोनों को बचाने के लिए पुलिस के पास नहीं गई थी बल्कि अपने हिस्से पर अपनी बहिन को कब्जा करते देख जलन में गई थी।
(यहाँ उन शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया है जो इन लोगों द्वारा कहे गये थे। भाषा को परिष्कृत कर दिया गया है पर सार यही है।)
इस तरह के संस्कार, संस्कृति और सोच हो गयी है हमारे और हमारे समाज की।
18 मार्च 2009
समाज में किस-किस तरह के लोग हैं?
कुछ इसी तरह के विषयों के बीच हल्के-फुल्के विषयों पर भी चर्चा हो गयी। बातों-बातों में बात निकली अनजान बनने की, जानबूझ कर मजा लेने की और अपने आपको सयाना समझने की। ये बातें चुनावों से सम्बन्धित थीं या फिर कुछ आपसी लोगों के व्यक्तिगत विचारों और उनके स्वभाव को लेकर।
इन्हीं बातों के सन्दर्भ में हमारे एक मित्र ने एक चुटकुला सुनाकर हँसाया और लोगों के सयानेपन की, लोगों के जानबूझ कर मजा लेने की आदत को भी आसानी से समझा दिया।
(पढ़ने के लिए यहाँ आयें)
17 मार्च 2009
हम स्मृति-लोप का शिकार होते हैं?
क्या हम सब स्मृति लोप का शिकार होते जा रहे हैं? यह सुनकर आपको आश्चर्य भले ही हो रहा हो पर यह सत्य है। इसको हम इस रूप में देख रहे हैं कि हम समय के साथ-साथ अपने पूर्वजों को भूलते-भुलाते जा रहे हैं। पूर्वजों के रूप में सदियों पुराने व्यक्तियों या महापुरुषों की चर्चा नहीं करेंगे, इनके रूप में हम अपने ही परिवार के बुजुर्गों को याद कर लें तो बेहतर है।
याद कीजिए अपने परिवार के किसी बुजुर्ग व्यक्ति का परिवार से हमेशा-हमेशा के लिए हमें छोड़ कर चले जाना। जी हाँ, सही है, उस व्यक्ति का स्वर्गवासी हो जाना। किस प्रकार से परिवार का प्रत्येक सदस्य उसके लिए आँसू बहाता है, किस प्रकार उसकी अंतिम यात्रा के समय भाव-व्हिवल होता है। उसके अंतिम संस्कार के बाद एक-एक दिन उसी की बातें करते बीतता है। प्रत्येक माह उस तिथि विशेष को किसी न किसी रूप में उस व्यक्ति को याद करने की परम्परा विकसित करने का प्रयास करते हैं। प्रत्येक माह किसी न किसी प्रकार से उसकी याद को ताजा करते हैं। होते-होते एक वर्ष भी व्यतीत हो जाता है और हम पुण्य तिथि के नाम पर कोई अच्छा सा कार्यक्रम करते हैं।
धीरे-धीरे यह कार्यक्रम चलता रहता है और साल दर साल इस प्रकार के कार्यक्रम का स्वरूप परिवर्तित होता रहता है। और एक दिन ऐसा भी आता है जब हम उस तिथि को ही विस्मृत करना शुरू कर देते हैं। ऐसा बहुत लम्बे समय के बाद नहीं वरन् दा-तीन सालों के अन्तर में ही होने लगता है। समझ में नहीं आता है कि ऐसा होता क्यों है?
हो सकता है कि सबके साथ ऐसा न होता हो पर ज्यादातर ऐसा ही होता है। हम अपने पारिवारिक दायित्वों और भागदौड़ भरी जिन्दगी में फंस कर अपने आधारों को ही भुला देते हैं। क्या यह स्मृति लोप नहीं है?
16 मार्च 2009
जनता को अधिकार ही कहाँ है?
देश में लोकसभा चुनाव की घोषणा क्या हुई हर आमो-खास इसी चर्चा में लग गया। हम सब किस तरह स्थितियों के वशीभूत होकर अपने-अपने काम करना शुरू कर देते हैं यह बात इसी से सिद्ध हो जाती है। समाज का प्रत्येक व्यक्ति इसी में किसी न किसी रूप में शामिल है। लोकतन्त्र का स्वरूप अब इतना ही दिखता है, इसके आगे नहीं। कहीं राजनीतिविज्ञान के अध्ययन के दौरान पढ़ रखा था कि लोकतन्त्र में जनता को किसी भी सरकार को उखाड़ फेंकने की ताकत होती है। ऐसा दिखता तो नहीं।
सैद्धांतिक रूप से इस तरह की बाते सही होतीं होंगी किन्तु इनका व्यावहारिक पक्ष अभी तक देखने को नहीं मिला है। एक बार चुने जाने के बाद सरकार को गिराने बचाने का काम चुने गये राजनेता ही करते हैं और जनता बेचारी बस तमाशा ही देखती है। किसी भी प्रकार से किसी भी समय ऐसा महसूस नहीं हुआ कि जनता ने अपनी ताकत के द्वारा किसी भी सरकार को गिराने का काम किया है।
देखा जाये तो जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन किताबी बात है। शासन है मंत्रियों का, शासन है मंत्रियों के लिए, शासन है मंत्रियों द्वारा। इसे विस्तार से बताने की आवश्यकता नहीं। कुछ लोग इसे विचारों का नकारात्मक स्वरूप कहेंगे पर क्या हम सब अपने आप से यही सब नहीं कहते हैं?
एक बार नहीं बार-बार यह सिद्ध हुआ है कि जनता एक बार बस मतदान करने का काम करती है शेष काम तो वही चुने गये प्रतिनिधि करते हैं। इनका ही कर्तव्य होना चाहिए कि जिस जनता के मत से वे विजयी हुए हैं उसका मान रखें पर वे सत्ता-लोलुपता और धन-लोलुपता में ऐसा कर नहीं पाते हैं। स्वार्थ उन्हें अपनी जनता के मत और समर्थन से गद्दारी करना सिखा देता है। जनता सबक सिखाती है पर वक्त के बहुत देर से आने के बाद और तब तक............।
होना यह चाहिए कि अब जनता को भी अधिकार मिले और मतदान करने से भी अधिक का अधिकार मिले। देखा जाये तो वर्तमान में जनता के पास सिर्फ और सिर्फ मत देने का अधिकार ही है। वह चाहे तो अपनी इच्छा के बाद भी किसी प्रत्याशी को न चुनने का अधिकार नहीं रखता है। चुनाव आयोग इस बारे में ऐसी व्यवस्था करे जिससे मतदाताओं के सामने एक विकल्प हो जो प्रत्याशियों के विरोध में भी, उनको नकाराने के क्रम में भी मतदान कर सके। आखिर मतदान की मशीन में इतनी बटनों के बीच एक और ‘इनमें से कोई नहीं’ का विकल्प लगी हुई बटन क्यों नहीं हो सकती है?
इसी तरह से देखा जाये तो किसी भी सांसद/विधायक के एक बार चुने जाने के बाद, यदि किसी तरह से सरकार नहीं गिरती है, वह अपने पूरे कार्यकाल में निरंकुशता का वातावरण निर्मित करता दिखता है। मतदाताओं के सामने कोई विकल्प नहीं होता है सिवाय अपने मतदान पर पछताने के। जबकि आये दिन चुनाव आयोग की ओर से चुनाव प्रणाली को सुधारने के सम्बन्ध में उपाय किये जा रहे हैं, ऐसे में इस प्रकार की व्यवस्था भी हो कि जनता अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को वापस भी बुला सके। आज की स्वार्थपरक राजनीति में सम्भव है कि इस सुविधा का राजनैतिक दल अपने हित में प्रयोग करना शुरू कर दें, तो ऐसे में चुनाव आयोग की ओर से इस पर किसी तरह की शर्त लगाई जा सकती है, किसी तरह का अनुबंध लगाया जा सकता है।
कुछ भी हो किन्तु चुनाव प्रणाली में अब जनता को अधिकार अधिक से अधिक दिये जाने की आवश्यकता है। उसे सिर्फ और सिर्फ अपने प्रतिनिधि चुनकर उनका तमाशा देखने को विवश नहीं किया जाना चाहिए।
इस विवशता का कारण ए है कि बने कोई, आये कोई, चुने कोई...........मरती तो जनता ही है क्योंकि ‘एक सांपनाथ, एक नागनाथ, डसना तो दोनों को ही है।’
15 मार्च 2009
मैं प्रधानमंत्री की दौड़ में नहीं हूँ.....
कौन होगा देश का प्रधानमंत्री? अभी चुनावों के लिए बिगुल बज ही पाया है और सत्तालोलुपों के द्वारा अपनी-अपनी भागीदारी किसी न किसी रूप में सुनिश्चित करने करवाने के प्रयास शुरू हो गये हैं। यह शायद किसी भी देश की बिडम्बना होगी कि वहाँ का प्रधान जनता की मर्जी से नहीं वरन् चुने गये सांसदों की मर्जी से तय होता है। इससे भी विद्रूपता की स्थिति यह होती है कि देश का प्रधानमंत्री उसी सदन का सदस्य नहीं होता है।
देश का संविधान जब लिखा गया (लिखा कहें या कहें कि तमाम सारे संविधानों के सार को एकत्र किया गया) तब देश के संविधान-निर्माताओं को यह भान तनिक भी नहीं रहा होगा कि आने वाले समय में इस प्रकार की स्थितियाँ भी पैदा हो जायेंगी कि देश का संचालन किसी नियुक्त व्यक्ति के द्वारा किया जायेगा। नियुक्त व्यक्ति किस प्रकार से स्वतन्त्र निर्णय ले सकता है यह सभी जानते हैं।
अब जबकि देश में चुनावी रणभेरी बज चुकी है तब कोई भी प्रधानमंत्री की दौड़ से स्वयं को बाहर समझना नहीं चाहता। जिसका नाम लिया जा रहा है वह तो प्रसन्न है और जिसका नाम नहीं लिया जा रहा है वह अपने नाम को स्वयं ही आगे ला रहा है। बस इतना ही तो कहना है कि मैं प्रधानमंत्री की दौड़ में शामिल नहीं हूँ। (वैसे मैं भी प्रधानमंत्री की दौड़ में शामिल नहीं हूँ, लोकतांत्रिक देश में इतना सोचने का अधिकार तो है ही?)
कई सारे हैं जो शायद इस बार अपनी सीट भी न बचा पायें किन्तु प्रधानमंत्री की दौड़ में शामिल हैं। कई ऐसे हैं जिन्होंने देश को एक प्रकार के जातिगत विभेदक में स्थापित कर दिया है वे भी कुछ प्रतिशत वोटों के सहारे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठना चाहते हैं। कुछ ऐसे हैं जो धर्म को राजनीति के साथ देख कर ही अपनी कुर्सी को पक्का समझ रहे हैं। कुछ तो ऐसे हैं जो बिना पेंदी के लोटे जैसा स्वभाव रखने के बाद भी प्रधानमंत्री बनने का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं। और भी बहुत हैं जो अपने-अपने स्वभाव के कारण चर्चित हैं, विवादित हैं किन्तु प्रधानमंत्री बनने का मोह नहीं त्याग पा रहे हैं। अब ऐसे देश में जहाँ ‘नेता’ शब्द सम्मान के स्थान पर गाली सा लगता हो, जहाँ कोई भी समाजसेवी नहीं प्रधानमंत्री बनना चाहता हो, जहाँ आम जनता के धन को चुनावी खर्चे के रूप में लुटाया जाता हो वहाँ किस प्रकार के लोकतन्त्र की कल्पना की जा सकती है? वहाँ सुदृढ़ लोकतन्त्र की कैसे स्थापना की जा सकती है? वहाँ सुखद लोकतन्त्र को कैसे देखा जा सकता है?
14 मार्च 2009
क्या हमारी सीमा और सेना चाक-चैबन्द हैं?
वहाँ उत्सव की तैयारी चल रही है तो ऐसे में भारत को सतर्क रहने की आवश्यकता है। क्या हमारी सीमा और सेना चाक-चैबन्द हैं?
13 मार्च 2009
खाने में नकली, सजाने में असली
‘टेस्ट कहाँ है?......टेस्ट कहाँ है?.......टेस्ट कहाँ है? ये चन्द शब्द टी0 वी0 स्क्रीन पर सुनाई देते हैं और इसके बाद सुनाई देता है कि ‘टेस्ट यहाँ है।’ इस शब्द के बाद एक महिला जायकेदार मसाला लेकर आती है और लोगों का स्वाद बन जाता है।
टी वी के लोगों का तो स्वाद बन गया पर इधर महसूस किया जा रहा है कि आम आदमी का स्वाद नहीं बन पा रहा है। ऐसा नहीं है कि उस महिला द्वारा दिखाये गये मसाले का प्रयोग नहीं होता हो, उस मसाले का उपयोग भी होता है पर नहीं.....स्वाद फिर भी नहीं। क्यों?
क्या एक बात आप लोगों ने गौर की कि अब खाने-पीने की सामग्री में मिलावट अत्यधिक रूप से होने लगी है। फल हों, सब्जी हो, दूध हो, घी हो या किसी अन्य प्रकार की खाद्य सामग्री, सभी मिलावट से भरपूर हैं। इस मिलावट में स्वाद कैसे आ भी सकता है?
इसके अलावा एक दूसरी बात भी अपने गौर की होगी कि खाने-पीने की वस्तुएँ भले मिलावट से भरपूर हो गयी हों पर सजावटी सामान मिलावट का शिकार नहीं हुआ है। उसमें अभी भी पूरी तरह शुद्धता दिखाई दे रही है।
देखा नहीं आपने साबुन में ताजे, रसीले नीबू मिले हैं, क्रीम में दूध, केसर मिल कर आपकी त्वचा को कोमल और मुलायम बना रहे हैं। मौसम में आपको आम खाने को मिले या नहीं पर आपको शुद्ध, ताजे आम का स्वाद किसी न किसी कोल्ड ड्रिंक में मिल रहा होगा। इसी तरह के और भी सजावटी सामान हैं जो किसी न किसी फल का स्वाद आपको देते हैं।
जहाँ तक खाने का सवाल है तो मौसमी फल जैसी अवधारणा तो अब समाप्त हो चुकी है। अब किसी भी मौसम के शुरू होते ही उस मौसम के फलों को पहले-पहल खाने की बालसुलभ चुहल भी अब खतम हो गयी है। याद है किसी भी मौसम में उस मौसम के फलों के आने का इन्तजार रहता था। साथ ही यह भी इन्तजार रहता था कि कब पिताजी बाजार से उन फलों को लेकर आयें और कब अम्माजी हम भाई बहिनों को खाने को दें।
अब ऐसा कुछ भी नहीं। पूरे वर्ष जो फल चाहिए वह मौजूद है। अब तो बच्चे भी सवाल-जवाब शुरू कर देते हैं कि आप कैसे कहते हैं कि फलां फल फलां मौसम का है, वह तो साल भर अपना सब्जी वाला लाता है। कैसे बतायें उन्हें कि जो सब्जी वाला साल भर लाता है वह फल नहीं फलों के क्लोन हैं, उनमें स्वाद और पौष्टिकता नाममात्र को भी नहीं है।
क्या आपको अब टमाटर को नमक के साथ खाली खाने में वही स्वाद आता है? क्या गाजर अब मीठी लगती है? क्या आप अब भी कच्ची फूलगोभी खाने का प्रयास करते हैं? क्या आपको मूली के पत्तों में स्वाद समझ आता है? क्या दूध की मलाई अब आपने देखी है? क्या आपका घी अब महक देता है? क्या दही में मिट्टी के बर्तन की सौंधी खुशबू आती है? क्या???????
सवाल बहुत पर जवाब यही कि शुद्ध नीबू वाला साबुन और दूध केसर वाली क्रीम........................।
11 मार्च 2009
बुरा न मानो होली में
होली की शुभकामनाओं सहित एक छोटी सी रचना..............बुरा न मानो होली में......
---------------------------------------
प्रकृति में छाई रही फागुनी बहार होली में।
हम निठल्लों से पड़े रहे बेकार होली में।।
संग के हमारे साथी रंगीन हो गये।
हम तो बस ढूँड़ते रहे अपना यार होली में।।
करने को गाल लाल नया चेहरा मिले कोई।
एक भाभी को रंगेंगे कितनी-कितनी बार होली में।।
निकल पड़े साइकिल से गलियों की खाक छानने।
हो गया एक हसीन मुखड़े का दीदार होली में।।
नई थी मंजिल साथी भी नया-नया था।
रंगने को उसे कई तरीके बनाये जोरदार होली में।।
नहीं किसी को अपना हमकदम बनाया हमने।
अकेले दम पर करेंगे दरिया पार होली में।।
कहीं गुलाल था उड़ता कहीं अबीर था घुला।
हो रही थी हर ओर रंगों की बौछार होली में।।
बड़े धड़कते दिल से हाथों में रंग लिए हम।
पहुँचे नये साथी को रंगने उसके द्वार होली में।।
दिल में डर का पुलिंदा बाँधे जोश में आगे बढ़े।
हो गया उसकी अम्मा से सामना जारदार होली में।।
बँध गई घिग्घी डर से गुड़गोबर सब हो गया।
बनने लगे उसी बेरुखे चेहरे पर चित्रकार होली में।।
होली के रंग में सराबोर तब तारे नजर आने लगे।
पड़ी जब उसके बाप से जूतों की मार होली में।।
‘चमड़ा पदक’ प्राप्त करते देख मुस्कराकर निहारा उसने।
कहा हो मानो न बुरा किसी बात का यार होली में।।
रोते, पड़ते, फटेहाल घर को बापस हो लिए।
सोचा पकड़ कान है भाभी ही अपनी सदाबहार होली में।।
10 मार्च 2009
होली को क्या ऐसे ही मनाते हैं?
होली पर सौहार्द्र के संदेश भेजना,
शुभकामनायें देना, फोन करना, एस एम एस करना,
पुरुष वर्ग द्वारा ‘‘होली है’’ का नारा लगा कर शराब तथा दूसरे नशों में मस्त रहना, (कुछ महिलायें भी इसमें शामिल हैं)
महिलाओं द्वारा गुझिया, पापड़ी, चाय, खाना आदि की तैयारी में लगे रहना,
बच्चों द्वारा घर की छत पर चढ़कर पिचकारी, गुब्बारों से रंग फेंकना,
अब होली ऐसे ही मनाई जाती है....क्या अब होली ऐसे ही मनाई जायेगी.....क्या यही होली कहलायी जायेगी?
‘‘‘‘‘‘होली है’’’’’’
09 मार्च 2009
पीटेंगे किसी भी बहाने से
कल अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस निकला और कल होली आने वाली है। महिला दिवस और होली के इस सामन्जस्य पर एक लोककथा याद आ रही है जिसमें एक पति को अपनी पत्नी को अकारण पीटने की बीमारी थी। आज भी बहुत सारे पतियों को इसी तरह की बीमारी है और इस चक्कर में बेचारे तमाम सारे पति सीता सेनाओं जैसों के शिकार हो जाते हैं। शिकर और शिकारी तो सदा इस जग में रहे हैं, कभी पुरुष शिकारी बना तो कभी शिकार; कभी महिला ने शिकार किया तो कभी बनी शिकार, आप तो इस कथा का आनन्द उठाइये.
-------------------------------------------------------
एक गाँव में एक पति को अपनी पत्नी को पीटने की बीमारी थी और पत्नी बेचारी इससे बहुत ही दुःखी रहती थी। एक बार उस गाँव में एक बाबाजी आये (तब महिला मोर्चा जैसी चीजें नहीं थीं तो बेचारी त्रस्त महिलाओं को बाबाओं आदि से सलाह लेना पड़ती थी) बाबाजी से समस्या को बताने पर समाधान ये निकला कि पत्नी पति की मर्जी की सारी स्थितियों को लागू कर दिया करे तो वह संतुष्ट रहेगा और पत्नी पिटाई से बच सकेगी।
बाबाजी ने कहा कि ऐसा कई दिनों तक चलने पर पति की मार-पिटाई की आदत छूट जायेगी और फिर दोनों चैन से रह सकेंगे। पत्नी ने सारी विधि समझी और घर आ गई।
अगले दिन सुबह-सुबह पति सोकर उठा और मंजन-कुल्ला करने निकला। चिल्ला कर पत्नी से पानी माँगा। पत्नी ने उसे पानी दिया तो उसने कहा कि उसे आज ठण्डे पानी से नहीं गरम पानी से कुल्ला करना है (आखिर पीटना जो था) पत्नी ने उसे गरम पानी दे दिया। पति खामोश, चुपचाप कुल्ला किया और बाकी काम में लग गया। नाश्ते के समय चाय, काफी को लेकर चिल्लाया तो पत्नी ने वह भी समस्या दूर कर दी। अब फिर पीटने का सवाल नहीं।
दोपहर में खाना खाने का समय हुआ तो पत्नी ने अपनी कुशलता से इसी तरह से बात को संभाल लिया। कच्चा-पक्का दोनों तरह का खाना बनाया। खीर भी बनाई तो रायता भी बनाया। जो कुछ पति माँग सकता था उसने वह सब बनाया। यहाँ भी पति हार गया और पत्नी पिटाई से बच गई।
इधर पत्नी बाबाजी के बताये हुए गुण से प्रसन्न थी तो पति महाशय निहायत परेशान कि कैसे पत्नी को मारा जाये? इसी उधेड़बुन में सारा दिन गुजर गया। किसी भी तरह से वह अपनी पत्नी को न मार सका।
अब आई रात.............खाना खाने में पत्नी ने फिर वही तरकीब दिखाई। सब कुछ होने के बाद जब सोने का समय आया तो पत्नी तो बेहद ही खुश थी किन्तु पति को तो जैसे कब्जियत होने लगी। उसने अपनी पत्नी से कहा कि कहाँ सोना है? पत्नी ने कहा कि कमरे में, छत पर, बाहर दालान में, आँगन में बिस्तर लगे हैं, जहाँ चाहो सो जाओ।
पति फिर परेशान.......अंततः वह थकहार कर बाहर खुले में जाकर लेट गया। दिमाग बराबर इसी में लगा था कि कैसे पत्नी को पीटा जाये? बगल के बिस्तर पर पत्नी आकर लेट गयी। पति ने ऊपर आसमान की तरफ देखा और वहाँ बनी सफेद रेखाओं को देखकर पूछा कि ये क्या है? पत्नी बेचारी भोली-भाली, जैसा कि हम सबको छोटे में बताया जाता था कि यह सफेद देखा इन्द्र भगवान के हाथी ऐरावत के निकलने की हैं, सो उसने भी अपने पति से कह दिया कि यहाँ से ऐरावत हाथी निकलता है।
बस फिर क्या था...पति महोदय उठे और अपना लट्ठ उठाकर चालू हो गये अपनी पत्नी के ऊपर। बेचारी पत्नी को सूझ न आया कि ऐसा क्या कह दिया कि जिससे उसकी पिटाई होने लगी?
पति अपनी पत्नी को मारते-मारते कहता जाये कि अच्छा इसी कारण बाहर खुले में बिस्तर लगाया है कि यहाँ से ऐरावत हाथी निकले, हमारे ऊपर गिर जाये, हम मर जायें और फिर तुम आजादी से मस्ती कर सको।
अब तो पत्नी ने सिर पीट लिया कि पिटना तो तय है, चाहे कारण कुछ भी बनाया जाये।
--------------------------------------------------
इस प्रकार के पतियों का इलाज किसी बाबा के पास या किसी नारीवादी मंच के पास भी नहीं है।
इस तरह के पतियों के कारण ही समूची पुरुष जाति को महिला-विरोधी होने का आरोप सहना पड़ता है।
(नारी समर्थक लोग हमें इस लोककथा के लिए माफ करेंगे..........क्या कर सकेंगे?)
08 मार्च 2009
सबका अपना-अपना अंदाज है.....कोई क्या करेगा?
महात्मा गांधी की वस्तुओं की नीलामी हुई या नहीं? सामानों को लाने के लिए सरकार ने माल्या से कहा या नहीं? इनके अतिरिक्त यह सच है कि महात्मा गांधी का सामान भारत आ गया है। अब जबकि सामान आ गये हैं तो कुछ लोग दुहाई देते घूम रहे हैं कि एक शराब बेचने वाले ने गांधी जी के सामानों को खरीदा है।
यह तो सत्य है कि गांधी जी शराब के विरोधी थे और यह भी सत्य है कि आज भी इस देश के अलावा विदेशों में भी उनको मानने वाले बहुत हैं। ऐसी स्थिति में क्या एक शराब मालिक के अलावा और कोई नहीं रह गया था जो उनके सामानों को भारत ला सकता?
आज इस देश में गांधी जी के नाम पर राजनीति करने वालों की संख्या कम नहीं है पर जहाँ उनके नाम पर पैसा लगाने की स्थिति आई तो सब कहीं न कहीं दूर छिप से गये। वैसे यह एक विवाद का विषय हो सकता है कि क्या गांधी जी अब सिर्फ 2 अक्टूबर पर या फिर किसी चुनावी सभा या फिर आदर्शवादी बातों के समय ही प्रासंगिक रह गये हैं?
गांधी जी की प्रासंगिकता की बात आती है तो बड़े जोर-शोर से चिल्ला-चिल्ला कर बताया जाता है कि वे आज भी प्रासंगिक हैं। कहाँ, कैसे, क्यों और किस तरह तो कोई कुछ बताने को तैयार नहीं। क्या अब वे सिर्फ किताबों या सरकारी कार्यालयों की दीवारों पर ही प्रासंगिक रह गये हैं?
प्रासंगिकता पर बहस नहीं करनी है। जिनके लिए प्रासंगिक हैं तो हैं और जिनके लिए नहीं हैं तो नहीं हैं। हम कौन होते हैं उनको प्रासंगिक या अप्रासंगिक बनाने वाले? किन्तु यह तो पूछ ही सकते हैं कि जब नीलाम किये जा रहे सामानों को लाने के लिए एक शराब कम्पनी का मालिक निकल पड़ता है तो लोगों को क्या आपत्ति हो गई? गांधी जी के वारिस (राजनैतिक) तो ‘जय हो....’ के अधिकार खरीदने और सीटों के बँटवारे में लगे थे।
चलिए गांधी जी के सामान आ गये हैं.............जिन्हें खुशियाँ मनानी हैं वे मना रहे हैं और जिन्हें कोसने का काम करना है वो लोग यही कर रहे हैं। सबका अपना-अपना अंदाज है...........कोई क्या करेगा?
07 मार्च 2009
सोचिये कुछ इस तरफ़ भी क्योंकि..........
कल है अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस और कार्यक्रमों की औपचारिकता का निर्वहन आज से ही प्रारम्भ हो गया है। जगह-जगह संगोष्ठियों, सभाओं, भाषणों, रैलियों आदि की औपचारिकता निभाई जाने लगी है। सरकारी संगठनों के साथ-साथ उन स्वयंसेवी संगठनों की मजबूरी भी है जो महिला-सशक्तीकरण के लिए कार्य कर रहे हैं कि वे इस दिन पर कार्यक्रम करें, सिर्फ करें ही नहीं अवश्य ही करें।
यदि भाषणों, रैलियों, कार्यक्रमों से ही विकास होना सम्भव होता तो हमारा मानना है कि सबसे अधिक विकास हम भारतवासियों ने ही किया होता। आये दिन की भाषणवाजियों और सभाओं के बाद भी विकास वहीं का वहीं है, नारियों की स्थिति वहीं की वहीं है, कन्या भ्रूण हत्या की स्थिति वहीं की वहीं है, स्त्री-पुरुष लिंगानुपात वहीं का वहीं है।
केवल भाषणों से नारी की स्थिति को सुधारा नहीं जा सकता है, यह चाहे पुरुषों द्वारा किया जा रहा हो या फिर खुद महिलाओं द्वारा। कुछ बिन्दु ऐसे है जिन पर बिना किसी पूर्वाग्रह के विचार अवश्य होना चाहिए।
- वंश-वृद्धि की लालसा में पुत्र प्राप्ति की चाह रखने वाले बतायें कि क्या जवाहरलाल नेहरू का वंश किसी लड़के के कारण चल रहा है?
- स्वामी विवेकानन्द, शहीद भगत सिंह, रानी लक्ष्मीबाई, चन्द्रशेखर आजाद आदि अनेक महापुरुषों का नाम किस लड़के के कारण चल रहा है?
- बेटे की चाह में लड़की को मारने वाले अपने लड़के के विवाह के लिए लड़का कहाँ से लायेंगे?
- इसी प्रकार से स्त्री-पुरुष लिंगानुपात कम होता रहा तो आने वाले समय में होने वाली स्त्री हिंसा की भयावहता को कौन रोकेगा?
- बराबर का दर्जा सिद्ध करती स्त्री आने वाले समय में कम संख्या के कारण अपनी खरीद-बिक्री को कैसे रोक सकेगी? (आज भी कई घटनायें इस तरह की प्रकाश में आईं हैं जहाँ कि परिवारों में पुरुष स्त्रियों को खरीद कर ला रहे है)
- लड़कियों की लगातार गिरती संख्या से क्या समाज में अनाचार की और विकट स्थिति पैदा होने वाली नहीं है?
सवाल बहुत हैं पर जवाब.......???
जवाब हमें ही देना होगा, मात्र किसी दिवस की औपचारिकता को पूरा करने के लिए ही आवाज उठाना और फिर शान्त हो जाना नैतिक नहीं है। समाज के सभी वर्गों को प्रयास करने होंगे, एकसाथ करने होंगे। पुरुष-स्त्री को आपसी विभेद को दूर करना होगा। क्या आधुनिकता का, ज्ञान का, अहम का रंग अपने ऊपर चढ़ा चुके स्त्री और पुरुष (दोनों को विचारना होगा) इस बात को समझेंगे?
06 मार्च 2009
राजनीति के ऊँट ने बदली करवट
राजनीति का ऊँट अपनी करवट बदल चुका है। बहुत छोटे में इस कहावत को सुना था और मन ही मन विचार आता था कि ऊँट के किस करवट बैठने का किसी काम से क्या मतलब है? बहरहाल, मतलब कुछ भी हो आज इसके अर्थ दूसरे हैं। राजनीति में आज की स्थितियों को देख कर लगता है कि आने वाले समय में इस क्षेत्र से वास्तविक राजनेता समाप्त हो जायेंगे और उनके विकल्प के रूप में दूसरे प्रकार के लोग ही राजनीति करते दिखाई पड़ेंगे।
याद तो नहीं है पर सुना और पढ़ा अवश्य है कि देश के स्वतन्त्र होने के कई साल बाद भी राजनीति में नेताओं का सम्मान होता था और नेता भी देश के कलाकारो का खिलाड़ियों का सम्मान किया करते थे। जहाँ तक हमें याद पड़ता है तो राजनेताओं को हमेशा से जनता पर भरोसा रहा और अपने कार्य पर भी भरोसा रहा। यही कारण रहा कि उन्होंने हमेशा चुनावों को अपनी तरह से, अपनी सामथ्र्य के सहारे से लड़ा।
आज देखने में आ रहा है कि सभी राजनैतिक दल अपनी विजय को पक्का करने के लिए, अपनी सीट को मजबूत करने के लिए किसी न किसी फिल्म स्टार के इर्द-गिर्द घूम रहे हैं। कोई किसी गाने के पीछे पागल है तो कोई किसी गाने वाले के पीछे चकरघिन्नी बना घूम रहा है। किसी को हीरोइन का साथ भी रहा है तो कोई हीरो के बल पर अपनी नैया पार लगाना चाहता है। अब देश की राजनीति इतने पर ही आकर टिक सी गयी है।
राजनीति के ऊँट ने करवट बदल ली है और अब वह राजनेताओं के स्थान पर फिल्म अभिनेताओं की तरफ मुँह करके बैठ गया है।
05 मार्च 2009
ये वक्त है अमन का, यहाँ पे शान्ति-शान्ति है....
- सुबह-सुबह आंख खुली तो मौसम बड़ा ही सुहाना लगा। हर ओर बड़ी ही खुशनुमा सी शांति छाई हुई थी। समाचार-पत्र खोल कर देखा, कहीं भी कोई मारपीट, हत्या, बलात्कार, लूट, आगजनी, आतंकी कार्यवाही का समाचार नहीं दिखा। प्रत्येक पेज पर सुख, समृद्धि, शांति, अमन-चैन के समाचार ही दिख रहे थे। एक पल को तो अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हुआ।
- देश में चुनावों की स्थिति है और किसी भी तरह के आपसी तल्ख बयान भी नहीं दिखाई दिये। राजनीति करने वालों की दिनचर्या पर निगाह डाली तो पता चला कि सबके सब बहुत ही तन्मयता से कार्य कर रहे हैं, सभी अपने-अपने क्षेत्रों में स्वार्थ को त्याग कर समाज सेवा में मगन हैं। नेताओं की छवि को लेकर भी किसी प्रकार से कोई आक्षेप कोई भी नहीं लगा रहा था। नेता भी बिना किसी अपराध, भ्रष्टाचार के जनता के बीच जाकर उनकी समस्याओं को सुन रहे थे।
- चुनाव के पहले जैसी भागमभाग बिलकुल भी नहीं दिख रही थी। सब प्रत्याशी बिना किसी तामझाम के अपना-अपना प्रचार करने में लगे हैं। साथ में न कोई बड़ी लग्जरी कार न कोई बंदूकधारी न सैकड़ों की भीड़, बस नेताजी और साथ में चार-छह समर्थक। सारे प्रत्याशी भी बेदाग छवि वाले दिख रहे थे, किसी के खिलाफ कोई भी आपराधिक मामला नहीं था, किसी के पास भी अकूत सम्पत्ति नहीं थी।
- बाजार में भी किसी प्रकार का कोई डर किसी को नहीं लग रहा था। कोई भी आपराधिक तत्व खुलेआम घूमता नहीं दिख रहा था। सब लोग निर्भीक भाव से रात को भी घूमने फिरने में लगे थे। घरों में ताले नहीं डाले जा रहे थे। सब कुछ बहुत ही अच्छा हो गया है।
- देश की विकास रफ्तार बहुत ही सकारात्मक रूप से ऊपर की ओर चलती चली जा रही थी। पड़ोसी देशों के साथ भी हमारे सम्बन्ध मधुरतम हो गये हैं। विश्व की तानाशाहात्मक शक्तियाँ भी हमें भरपूर सम्मान देने लगीं हैं। किसी प्रकार का कोई भी आतंकवाद हमारे देश के लिए खतरा नहीं रह गया है।
- चैकिये नहीं, ये कोई हकीकत या सपना नहीं। अब ब्लाग पर इसी तरह की पोस्ट ही लिखी जाया करेगी। हैरानी क्यों हो रही है? देखा नहीं आपने अब विचारों पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है। ब्लाग पर कुछ भी आपत्तिजनक लिखने पर कार्यवाही सम्भव है। तो क्यों लिखें किसी के खिलाफ? ऐसा लिखो जो विवाद न पैदा करे चाहे इसके लिए सच को छिपाना ही क्यों न पड़े?
- अब सब कुछ अच्छा ही अच्छा है......................
03 मार्च 2009
आस के सहारे चलती जनता
एक नट करतब दिखाने के लिए शहर में जगह-जगह अपनी लड़की के साथ जाता। जहाँ भी उसे सही जगह दिखती या फिर कायदे की भीड़ दिखती तो वह वहीं पर डेरा जमा कर करतब दिखाना शुरू कर देता। वह अपना सारा सामान एक गधे के ऊपर लाद कर ले जाता। गधा भी एकदम कमजोर किन्तु पूरी तन्मयता से काम करता।एक दिन संयोग से उस गधे का मित्र एक और गधा उसे मिल गया। दूसरा गधा बहुत ही तन्दरुस्त दिख रहा था। दूसरे गधे से अपने मित्र पहले गधे की हालत नहीं देखी गयी। उसने उसको अपने साथ आने को कहा। दूसरे गधे ने बताया कि मेरा मालिक कपड़े धोने का काम करता है। वह इतना दयालु है कि सुबह एक बार कपड़े मेरे ऊपर लादकर नदी किनारे तक ले जाता है और शाम को दोबारा धुले कपड़े मेरे ऊपर लादकर बापस ले आता है। बस, इतना ही काम है मेरा। पहले वाले नट के गधे ने बताया कि मुझे तो सारा दिन काम की तलाश में अपने मालिक के साथ-साथ पूरे शहर में दौड़ना पड़ता है। मेरा मालिक बहुत ही गरीब है तो मुझे खाने को कम भी मिलता है। दूसरे गधे ने समझाया कि तुम इस मालिक का काम छोड़कर मेरे मालिक के पास आ जाओ। वहाँ काम भी कम है और आराम भी बहुत है। यह सुनकर पहले गधे ने सांस छोड़ी और रस्सी पर बिना सहारे के चल रही नट की लड़की की ओर देखकर दूसरे गधे के साथ चलने से मनाकर दिया। दूसरे गधे ने न चलने का कारण पूछा तो पहले गधे ने बताया कि मेरे मालिक की लड़की जब रस्सी पर बिना किसी सहारे के चलती है तो मेरा मालिक चिल्ला-चिल्ला कर उससे कहता है कि चलती रहो यदि गिर गई तो इस गधे से तुम्हारी शादी कर दूँगा। मैं बस इसी आस में इसके साथ हूँ कि ये लड़की गिरे और मेरे साथ इसकी शादी हो जाये। आखिर बिना सहारे के चल रही लड़की कभी न कभी तो गिरेगी? कुछ ऐसा ही हाल आम जनता का है जो हर पांच साल में (कभी-कभी पहले भी) बिना सहारे के न चल पाने वालों के सहारे देश को सौंप देती है, इस आस के साथ कि शायद इस बार ये लोग कुछ अच्छा कर दें, शायद इस बार ये बिना सहारे के चल दें, शायद इस बार देश को ऊँचाइयों तक पहुँचा दें। शायद.....
------------------------------------------
नारीवादी क्षमा करेंगे, लड़की की शादी एक गधे से करवाने की बात मालिक से कहलवा कर। इस देश में विवाद जरा-जरा सी बात पर होते हैं..........देखा नहीं फ़िल्म बिल्लू बार्बर का नाम बदलवा ही लिया लोगों ने।
-------------------------------------------
निवेदन- एक निगाह शब्दकार पर भी डाल लीजियेगा। रचनात्मक सहयोग की अपेक्षा भी है। रचनाएँ प्रकाशन हेतु shabdkar@gmail पर भेजें।
-------------------------------------------
02 मार्च 2009
लोकतान्त्रिक व्यवस्था का आयोजन
अपनी-अपनी ढपली और अपना-अपना राग प्रारम्भ होने वाला है। सब कमर कस रहे हैं कि कैसे पब्लिक को बेवकूफ बना कर अपना उल्लू सीधा किया जाये। पब्लिक भी अपने आपको इसके लिए तैयार किये बैठी है कि कब मदारी आयें और कब उनको नचाने का काम शुरू हो।
प्रत्येक पाँच वर्ष में होने वाले इस महोत्सव का आयोजन कुछ ही देर में होने वाला है। सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश में इस प्रकार के आयोजन का अपना ही महत्व है। सारा तन्त्र इसी काम में लग जाता है और कई दिनों तक के लिए सारा काम-काज भी जैसे ठप्प सा हो जाता है। अधिसूचना लगी और सारी सरकारी मशीनरी काम करना (जनता का) बन्द करके चुनाव सम्पन्न करवाने में लग जाती है।
इस भव्य आयोजन में हर कोई अपने-अपने तरीके से दाँव लगाने को प्रयत्नशील रहता है। नेता जनता का वोट किसी भी तरह से खींचने को तैयार रहता है तो जनता अपने क्षेत्र के प्रत्याशी के पक्ष-विपक्ष में आंकड़े फिट करता है। इसी तरह मीडिया भी अपने पोल, सर्वे आदि के माध्यम से किसी भी दल को, किसी भी प्रत्याशी को विजय अथवा पराजय की ओर ले जाते हैं।
आम जनता इस गुमान में कि वह किसी भी प्रत्याशी के, किसी भी दल के भाग्य का निर्माता है प्रसन्न होती रहती है। जनता के पास लोकतन्त्र के नाम पर कुछ पल (शायद एक या दो मिनट) ही आते हैं जब वह वोटिंग मशीन का बटन दबाता है। बटन दबा, मत पड़ा और उसके बाद लोकतन्त्र समाप्त। अब कौन जीतेगा, कौन सरकार बनायेगा, कौन प्रधानमंत्री, मंत्री बनेगा, यह बात जनता तय नहीं कर सकती। (चल रही लोकसभा का प्रधानमंत्री बनने न बनने का नाटक याद है?) कहाँ रह गया लोकतन्त्र?
क्या इसे लोकतन्त्र कहेंगे, जहाँ गुनाहगार राजनेता शान से टहलता है और किसी बेगुनाह हो सजा मिल जाती है। (अभी हाल का ही उदाहरण, प्रतापगढ़ के एक गाँव में जहाँ बिजली नहीं, बिजली के खम्बे तक नहीं उस गाँव के एक सत्तर वर्ष के अंधे बुजुर्ग को पुलिस ने पकड़ कर बन्द कर दिया क्योंकि उसका जुर्म यह था कि वह कटिया डाल कर बिजली चोरी करता था।)
चलिए ................................... एक सूत्रवाक्य-‘किस-किस को गाइये, किस-किस को रोइये, आराम बड़ी चीज है, बिस्तर तानकर सोइये।’ चलिए इन्तजार करिये और मजा लीजिए क्योंकि अब सबकुछ मजा लेने के लिए ही तो होता है।
01 मार्च 2009
फ़िल्म महोत्सव, स्लम डॉग और हमारी फिल्में
हमारे शहर में पिछले तीन दिनों से अकादमिक और सांस्कृतिक माहौल बना हुआ था, जो आज रात समाप्त हुआ। यहाँ स्थानीय महाविद्यालय-दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय-में बी0 एड0 विभाग में एक सेमीनार था और इसी महाविद्यालय में तीन दिनों तक फिल्म महोत्सव का भी आयोजन किया गया था। फिल्म महोत्सव का शुभारम्भ 27 फरवरी को हुआ था और उसी दिन आस्कर पुरस्कारों से लदी-फदी फिल्म स्लम डाग मिलेनियम को दर्शकों की बेहद जबरदस्त मांग पर चलाया गया था। साथ में स्थानीय स्तर पर बनाई गयी लघु फिल्म का भी प्रदर्शन किया गया था। इस लघु फिल्म में उरई शहर के इतिहास और कालपी शहर के एतिहासिक महत्व के अतिरिक्त डा0 हरिमोहन पुरवार द्वारा अपनी मेहनत और लगन से तैयार किया गया ‘बुन्देलखण्ड संग्रहालय’ का सौन्दर्यपरक चित्रण किया गया था। अगले दो दिनों में कुछ पुरानी फिल्मों के साथ-साथ वृत्त चित्र एवं लघु फिल्मों को भी दिखाया गया।
इस मौके पर दर्शकों की प्रतिक्रिया स्लमडाग को लेकर जानने की उत्सुकता अधिक रही। हमें तो फिल्म में कुछ इस तरह का नहीं दिखा कि उसे इतने सारे आस्कर पुरस्कारों से लाद दिया गया (परिणाम तय करने वाले हमसे अधिक जानकार हैं)। कुछ इसी तरह की प्रतिक्रिया अन्य दर्शकों की भी रही। कहानी कुल मिला कर वही पर एक नये कलेवर में लिपटी दिखी। हाँ एक बात ये खास दिखी कि पूरी फिल्म को कौन बनेगा करोडपति के सवालों के साथ में गूँथ कर दिखाया गया। बस इसके अलावा हमें तो कुछ खास नहीं दिखा।
दो भाइयों के बीच एक लड़की की कहानी, एक अच्छे और एक बुरे की कहानी, प्यार की जीत की कहानी, अच्छे की विजय और बुरे की पराजय की कहानी। सब कुछ उसी भारतीय स्टाइल में जिसके लिए भारतीय निर्माता निर्देशकों को, कलाकारों को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर लताड़ा जाता रहा है। फिल्म का खास हिस्सा (भारतीयों के लिए) ‘जय हो’ गाना पूरी फिल्म समाप्त हो जाने के बाद दिखाया जाता है। फिल्म समाप्त हो जाती है, कास्टिंग चालू है, अब यदि प्यार उमड़ रहा है ‘जय हो’ के लिए तो रुको वरना जाओ अपने-अपने घर। पुरस्कार न मिलता तो शायद कोई भी इस गाने को सुनने के लिए नहीं रुकता, पर अब रुकेंगे। (याद हो आपको भारत सरकार ने राष्ट्रीयता जगाने के लिए फिल्मों के अन्त में राष्ट्रगान दिखाना अनिवार्य कर दिया था, कितने लोग खड़े होकर उसका सम्मान करते थे? जब फिल्म के बाद अपने राष्ट्रगान का सम्मान नहीं हो सका तो साधारण से गीत का क्या करते?)
बहरहाल, हम लोगों द्वारा आयोजित करवाया गया सेमीनार और फिल्म महोत्सव बहुत ही खुशगवार मौसम में समाप्त हुआ और आने वाले दिनों के लिए एक नई चेतना का सूत्रपात कर गया।
शब्दकार मे रचनाओं का प्रकाशन शुरू
आप सब सुधी ब्लाग साथियों को जानकर खुशी होगी कि रचनात्मकता और हिन्दी के विकास के लिए एक ब्लाग शब्दकार बनाया गया है। इस ब्लाग पर रचनाओं का प्रकाशन समय-समय पर किया जायेगा। कई मित्रों की रचनाएँ प्राप्त भी हो गयी हैं, जिन्हें समय-समय पर प्रकाशित किया जायेगा। इसी कड़ी में आज 01 मार्च से शब्दकार का प्रकाशन प्रारम्भ हो गया है।
पहली रचना कविता के रूप में प्रकाशित की गयी है। यह कविता डा0 ब्रजेश कुमार की है, जिनकी रचनाएँ उनके ब्लाग पर बराबर प्रकाशित हो रहीं हैं।
आइये आप भी शब्दकार को सहयोग करें और इसमें प्रकाशित हो रही रचनाओं को और रचनाकारों को प्रोत्साहन प्रदान करें।
आशा है कि आप सभी का सहयोग अवश्य ही प्राप्त होगा।