30 अप्रैल 2009
सुभद्राकुमारी चौहान की कालजयी कविता - वो तो झाँसी वाली रानी थी
अभी अपना कुछ नहीं लिख रहे हैं। अपनी पत्रिका ‘स्पंदन’ के लिए कुछ सामग्री की तलाश कर रहे थे, उसी में प्रतिभाशाली साहित्यकार (यहाँ लेखक नहीं) सुभद्राकुमारी चौहान पर भी थोड़ा बहुत पढ़ने को मिला। उनके ऊपर लिखी गई एक पुस्तक में सुभद्रा जी द्वारा लिखी गई कालजयी कविता ‘झाँसी की रानी’ भी पढ़ने को मिली। यह कविता बहुत पहले अपनी प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ी थी, बाद में भी पढ़ने को मिलती रही। हर बार इसमें कुछ न कुछ नया ही लगता है।
सम्भव है कि आप सबने भी इस कविता को कई-कई बार पढ़ रखा हो पर आज यहाँ इस कविता को पोस्ट करने के पीछे मकसद दूसरा है। जो लोग साहित्यकार की परिभाषा जानना चाहते हैं उनके लिए बस इतना कहना है कि हम अभी इस लायक नहीं हुए हैं कि साहित्यकार की परिभाषा बता सकें पर शायद यह कविता बता देगी कि साहित्यकार कहते किसे हैं।
अपनी इसी एक कविता की दम पर सुभद्रा जी समूचे हिन्दी साहित्य जगत में आलोकित हैं। इसी तरह का एक और उदाहरण चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ जी भी हैं जो अपनी एक कहानी ‘उसने कहा था’ के कारण हिन्दी कहानी में अलग मुकाम हासिल किये हैं। बहुत ही कम लोगों को ज्ञात होगा कि उन्होंने मात्र तीन कहानियाँ ही लिखीं थीं।
क्या अब साहित्यकार की परिभाषा देना आवश्यक है या आप लोग (जिन्हें संशय है) वो समझ गये होंगे?
चलिए सुभद्राकुमारी चौहान जी की कविता पढ़िये और इस लिंक के द्वारा चन्द्रधर शर्मा जी की कहानी ‘उसने कहा था’पढ़ियेगा।
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‘झाँसी की रानी’
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सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटि तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी,
गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी,
चमक उठी सन् सत्तावन में
वह तलवार पुरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।
कानपुर के नाना की मुँहबोल बहन ‘छबीली’ थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के संग पढ़ती थी वह, नाना के संग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाल, कटारी उसकी यही सहेली थी,
वीर शिवाली की गाथाएँ
उसको याद जबानी थीं।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता का अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध, व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना, ये थे उसके प्रिय खिलवार,
महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी
भी आराध्य भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुभट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आई झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया,
शिव से मिली भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।
उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजयाली छाई,
किन्तु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाईं,
रानी विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आई,
निःसंतान मरे राजा जी
रानी शोक-समानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौजी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया,
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा
झाँसी हुई बिरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।
अनुनय-विनय नहीं सुनता है, विकट फिरंगी की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया,
राजाओं नब्वाबों के भी उसने पैरों को ठुकराया,
रानी दासी बनी यह
दासी अब महारानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।
छिनी राजधानी देहली की, लिया लखनऊ बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात,
जबकि सिंध, पंजाब, ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात,
बंगाले, मद्रास आदि की
भी तो यही कहानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।
रानी रोई रनिवासों में, बेगम ग़म से थी बेज़ार,
उनके गहने-कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरेआम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार,
‘नागपूर के जेवर ले लो, लखनऊ के लो नौलख हार’,
यों परदे की इज्जत पर-
देशी के हाथ बिकानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।
कुटिया में थी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था, अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधुंपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रणचंडी का कर दिया प्रकट आवहान,
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो
सोई ज्योति जगानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरमन से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थीं,
मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपुर, कोल्हापुर में भी
कुछ हलचल उकसानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।
इस स्वतंत्रता-महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना, धुंधुंपंत, ताँतिया, चतुर अजीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास-गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम,
लेकिन आज जुर्म कहलाती
उनकी जो कुरबानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।
इनकी गाथा छोड़ चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद्व असमानों में,
जख्मी होकर वाकर भागा
उसे अजब हैरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।
रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थककर गिरा भूमि पर, गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना-तट पर अंग्रेजों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार,
अंग्रेजों के मित्र सिंधिया
ने छोड़ी रजधानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।
विजय मिली, पर अंग्रेजों की फिर सेना घिर आई थी,
अब के जनरल स्मिथ सन्मुख था, उसने मुँह की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आईं थीं,
युद्ध-क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी,
पर, पीछे ह्यूरोज आ गया
हाय! घिरी अब रानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।
तो भी रानी मार-काटकर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था यह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,
रानी एक शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार,
घायल होकर गिरी सिंहनी
उसे वीर-गति पानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।
रानी गई सिधार, चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेईस की, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई
हमको जो सीख सिखानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।
जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी,
तेरा स्मारक तू ही होगी
तू खुद अमिट निशानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।
29 अप्रैल 2009
आओ साहित्यकार साहित्यकार खेलें
अभी पिछले दिनों ब्लाग पर कुछ तना-तनी दिखी, एक टिप्पणी को लेकर। सवाल साहित्यकार को लेकर उठा जो एक विवाद के रूप में सामने आया। किसी ने उसे अपने स्वाभिमान पर लिया तो किसी ने साहित्यकार शब्द पर ही संशय कर डाला।
चूँकि हम हिन्दी साहित्य के विद्यार्थी हैं और एक सवाल हमेशा हर उस व्यक्ति से पूछते हैं जो अपने को साहित्य से जुड़ा बताता है कि ‘‘साहित्य किसे कहेंगे?’’ इस सवाल ने हमेशा हमें परेशान किया है। उपन्यास, कहानी, कविता, ग़ज़ल, लघुकथा, नाटक आदि विधायें ही साहित्य हैं? साहित्य में संस्मरण, आलेखों को भी स्थान दिया जाता है, बस यहीं पर आकर सवाल फँसा देता है कि किस प्रकार के आलेखों को साहित्य में शामिल करेंगे?
आलेखों में किसी साहित्यकार के ऊपर लिखना, साहित्य की किसी भी विधा के बारे में बताना, किसी साहित्यिक विषय की आलोचना आदि करना आता है। यह सब किसी न किसी रूप में साहित्य का अंग स्वीकारे गये हैं। इसी के साथ निबंध को भी साहित्य का अंग माना जाता है और निबंध के ही एक रूप ‘ललित निबंध’ को भी साहित्य में शामिल माना जाता है। अब फिर वही सवाल कि यदि निबंध भी साहित्य का हिस्सा है तो किस प्रकार के निबंध?
क्या राजनैतिक पृष्ठभूमि को समेटे लिखे गये निबंधों को साहित्य में शामिल करेंगे? निबंध के द्वारा यदि भारत की विदेश नीति की चर्चा की जा रही हो, भारत के अपने पड़ोसी देशों की चर्चा की जा रही हो, देश-प्रदेश के भौगोलिक वातावरण की बात की जा रही हो, सामाजिक विसंगतियों की चर्चा की जा रही हो, जाति-धर्म-क्षेत्र की बात की जा रही हो तो क्या इस प्रकार के निबंधों को साहित्य में शामिल करेंगे? (यह सवाल जो भी सही ढंग से हमें समझा सके उसका बहुत आभार, क्योंकि यही हमें सबसे अधिक परेशान करता है)
साहित्य के अंग के इसी क्रम में एक जरा सी बात और। उपन्यास भी साहित्य की लोकप्रिय विधा है पर किस प्रकार के उपन्यास साहित्य में आते हैं और किस प्रकार के उपन्यासों को साहित्य में शामिल नहीं माना जाता है? यदि सभी प्रकार के उपन्यास साहित्य का हिस्सा हैं तो उन सस्ते से उपन्यासों को क्यों हेय दृष्टि से देखा जाता है जो सस्ते कागज पर, कम मूल्य पर होने के बाद भी सबसे अधिक बिकते हैं? नाम बताने की आवश्यकता नहीं, जासूसी उपन्यासों के (पाठक, शर्मा, आनन्द जैसे नामों वाले लेखकों के लोकप्रिय उपन्यास) पाठक तथाकथित साहित्यकारों से अधिक बिक्री करते हैं और आम पाठकों में अधिक लोकप्रिय हैं। क्या इन्हें साहित्य में शामिल किया जायेगा?
अब थोड़ी सी बात करें साहित्यकार की। आप साहित्यकार किसे मानते हैं? जो कुछ भी लिखना जानता हो वह साहित्यकार हो गया? अब लेखन चाहे प्रिंट का हो, इलेक्ट्रानिक का हो या आजकल भूत बन कर सभी को अपनी गिरफ्त में लेता ब्लाग लेखन हो, क्या इन सभी में कुछ भी लिख देना, छपवा लेना ही साहित्य और साहित्यकार की श्रेणी में आता है?
आज समस्या यही है कि सभी साहित्यकार है (लेखक कोई नहीं है) पाठक कोई भी नहीं। जिससे पूछो वही कुछ न कुछ लिख रहा है पर कुछ भी पढ़ नहीं रहा है। क्या साहित्यकार इतना छोटा और सस्ता शब्द हो गया है कि जो देखो वही साहित्यकार हो गया है?
याद कीजिए उन साहित्यकारों को जिनको साहित्यकार कहते में हमें भी गर्व होता है। उनका लिखा गया साहित्य देखिए तब ज्ञात होगा कि आज जो लिखा जा रहा है क्या उसे साहित्य कहा जा सकता है, उसके लिखने वाले को साहित्यकार कहा जा सकता है? एक शब्द पकड़ लिया और बन बैठे अपनी मर्जी के मालिक। अब जिसे देखो उसे बना दें साहित्यकार और जिसे देखो उसे थमा दें कोई भी पुरस्कार।
यह सत्य हो सकता है कि ब्लाग पर लिखने वाला व्यक्ति अच्छा लेखक हो, उसके भाव सौन्दर्य की प्रस्तुति करते हों, उनके लेखन से किसी प्रकार से सरोकरों की स्थापना होती हो, किसी न किसी प्रकार के मूल्यों को संरक्षण प्राप्त होता हो। इसके बाद भी इस सब का तात्पर्य कदापि यह नहीं कि वह साहित्यकार हो गया। साहित्यकार बनने के लिए कोई एक दो किताबों का छपवा लेना, कई कविताओं को प्रकाशित करना लेना, कई सारे ब्लाग की सदस्यता ले लेना ही काफी नहीं। साहित्य का मर्म जो भी जानता होगा वो अपने कुछ भी लिख लेने पर अपने को साहित्यकार कहलवाना पसंद नहीं करेगा।
पहले साहित्य का मर्म समझो, साहित्यकार की साधना समझो फिर अपने को साहित्यकार कहलवाने का दम पैदा करो। अपनी दैनिक चर्या को लिख देना, कुछ इधर-उधर की बकवास को चाशनी लगाकर लिख देना, सुंदरता, विमर्श की चर्चा कर देना, समाचारों को आधार बनाकर ब्लाग को रंग देना, तमाम सारी टिप्पणियों को इस हाथ दे, उस हाथ ले के सिद्धांत से पा लेना ही साहित्य की तथा साहित्यकार की पहचान नहीं।
जरा साहित्य पर दया करिए, हिन्दी साहित्य पर दया करिए साहित्यकारों का सम्मान कीजिए। यदि इतना कर सके तो ठीक अन्यथा साहित्य एवं साहित्यकार की लुटिया न डुबोइये।
चुनावी चकल्लस-रंग जमाये बैठे रहे, कोई न आया पास,
हाथ जोड़ कर घूम रहे, कोई न डाले घास,
जनता की सुध न मिली, न जाने क्या होगा,
धड़कन बढ़ती जाती है, होंगे फेल या पास?
28 अप्रैल 2009
कपड़े पहनने न पहनने के बीच का विवाद
इधर आई पी एल मैचों का प्रारम्भ हुआ वहीं उन लोगों की जीभ में खुजली पैदा हो गई जो कम कपड़ों में नारी को देखकर संस्कृति का क्षरण होना स्वीकार लेते हैं। यही तो आधुनिकता है कि कम से कम कपड़ों में टहला जाये। किसी को आपत्ति क्या है? और होनी भी नहीं चाहिए। संस्कृति का क्षरण कब और कैसे हो जाता है ये पता ही लगा पाये आज तक।
कभी पढ़ने में आता है कि नारी के साथ इज्जत से पेश न आने पर संस्कृति का क्षरण होता है। कभी पढ़ने में आता है कि कुछ लोगों ने विदेशी महिलाओं से शारीरिक छेड़खानी की, बदसलूकी की और संस्कृति का क्षरण हुआ। यह तो हम हमेशा से पढ़ते-सुनते आ रहे हैं कि नारी का स्थान समाज में पूज्य है और उसके साथ दुव्र्यव्यवहार किसी न किसी रूप में सांस्कृतिक चेतना के साथ किया गया भद्दा मजाक है जो दूसरे स्वरूप में संस्कृति के क्षरण को ही दर्शाता है। इसके बाद भी क्या हम आज भी नारियों की इज्जत करना सीख पाये हैं? (इस वाक्य से वे लोग अपने को दूर रखेंगे जो नारी को इज्जत देते हैं, बेटियों को सम्मान, प्यार देते हैं)
हम नहीं सीख पाये क्योंकि हम अभी भी देखते हैं कि महिलाओं के साथ लगातार छेड़खानी की घटनायें हो रहीं हैं। देश में चले एक नाटक को अभी शायद ही कोई भूला होगा जिसमें धर्म परिवर्तन कर आपस में एक हुआ गया और फिर धर्म की ही आड़ लेकर अलग-अलग हो गये। क्या यहाँ संस्कृति का क्षरण होता नहीं दिखा? कुछ ऐसा ही सवाल नारीवादियों से कि क्या इस प्रकार के उदाहरण नारी सशक्तिकरण के सूचक हैं?
चलिए बापस वहीं, कपड़ों वाली बात पर। एक जमाना था जब कहा जाता था कि निर्माता निर्देशक औरतों की, माडल की मजबूरी का फायदा उठाकर उनका शारीरिक शोषण करते हैं और उनको कम से कम कपड़ों में दर्शकों के सामने प्रस्तुत करते हैं। समय के साथ मजबूरी बदली, दर्शकों की सोच का फायदा नारियों ने उठाना शुरू किया। पुरुष के उपयोग का सामान हो या फिर स्त्रियों के प्रसाधन सभी में नारियाँ ही दिखने लगीं। होते-होते यह प्रदर्शन कम से कमतर कपड़ों में बदल गया। जब विरोध के स्वर उठे तो कहा गया कि नारियों की स्वतन्त्रता को बाधित किया जा रहा है। पुरुषों की सोच विकृत है। महिलाओं के पास जो दिखाने लायक है वो दिखा रहीं हैं। दर्शकों पर आरोप लगाया गया कि जो वे देखना चाहते हैं वहीं दिखा रहे हैं। कहने का तात्पर्य कि सबने अपने-अपने हिसाब से अपनी बातों को सही सिद्ध करने का प्रयास किया।
अब देखिए, दर्शकों में अकेले पुरुष वर्ग ही है या फिर सेक्स अपील को पुरुष ही देखना पसंद करते हैं। क्यों महिलाओं को नग्न रूप में दिखाया जाता है? क्यों महिलायें स्वयं को इस रूप में दिखाने को तैयार हो जातीं हैं? अब जो माडल रूप में पर्दे पर आ रहीं हैं वे गरीब नहीं, आर्थिक रूप से कमजोर नहीं, वे अपनी मर्जी से निर्माता-निर्देशकों को घुमाने वालीं अभिनेत्रियाँ हैं। तब क्या इसे भी मजबूरी का नाम दिया जाये? या फिर ये पब्लिसिटी का एक भौंड़ा तरीका है?
कुछ भी हो अब किसी भी रूप में इस नग्नता को रोक पाना सम्भव नहीं। यह अब तभी रुकेगी जब महिलाओं को स्वयं लगेगा कि उफ! अब बहुत हुआ।
कहने लिखने को बहुत है पर पोस्ट को देखते हुए लग रहा है कि बड़ी हो जायेगी। इसलिए अभी इतना ही...शेष क्रमिक रूप से सामने लाते रहेंगे। इसे यहीं पर समाप्त न समझा जाये।
(इस पोस्ट को लिखने के पीछे नारी ब्लाग की पोस्ट का बहुत बड़ा हाथ है।)
चुनावी चकल्लस-राजनैतिक परिदृश्य में दूर तक नहीं दिखतीं हैं,
फिर भी वे हाथों में हाथ लिये दिखतीं हैं,
चेहरे पे हँसी, आँखों में अदा लिए दिखतीं हैं,
सोचो क्या वे बस भीड़ के लिए दिखतीं हैं,
सोचो तुम भी कर्णधारो क्या कर रहे हो,
क्या वे तुम्हें बस एक शरीर ही दिखतीं हैं।
27 अप्रैल 2009
जूते की महिमा भली फ़िर भी सब अनजान
जूते पर जूता, जूते पर जूता....रहा नहीं गया। निकाली अपनी डायरी और कभी की गई जूता स्तुति आपके सामने। अब लगा कि ‘‘सकल चीज संग्रह करै, काउ दिन आवै काम’’....आज काम आ गई कविता....उनके काम आ रहा है जूता।
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जूते की महिमा भली फिर भी सब अनजान,
रक्षक पैरों का भला फिर भी पाये अपमान।
फिर भी पाये अपमान जोड़ी इनकी न्यारी,
आज की दुनिया में कहाँ दिखती ऐसी यारी।
मिल कर आपस में सदा हम सबको हैं दिखते,
कभी किसी के पैर में नहीं होते बेरंगे जूते।।
धर्म-कर्म में देखिए जूतों की न कोई काट,
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या हो श्मशान घाट।
या हो श्मशान घाट सभी जगह ये जाते,
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी इन्हें अपनाते।
जूतों के नाम पर कोई करता नहीं अधर्म,
सब धर्मों में है बड़ा प्यारा जूता धर्म।।
बिन लाइसेंस के मिल गया सुन्दर सा हथियार,
मौका जैसे ही मिले करो वार पर वार।
करो वार पर वार हर उलझन सुलझाये,
सामने वाले के सिर की ये खुजली मिटवाये।
अपना कहना है यही पहनो ये रातो-दिन,
जीवन न कट पायेगा जूते दादा के बिन।।
इससे बड़ी चुनावी चकल्लस तो शायद ही कोई होगी......सो आज भी नहीं।
राजनेता और मतदाता के बीच लोकतंत्र
यदि इसे किसी पूर्वाग्रह के रूप में न देखा जाये तो क्या कोई भी इस बात से इनकार करेगा कि वर्तमान में चल रही लोकसभा के लिए जब विगत चुनावों में जनता ने अपने मत का प्रयोग किया था तो उसके सामने वर्तमान प्रधानमंत्री जी का स्वरूप था? शायद ही किसी ने सोचा होगा कि माननीय मनमोहन सिंह जी इस देश के प्रधानमंत्री बनकर सामने आने वाले हैं? लोकसभा का प्रतिनिधित्व करने वाला व्यक्ति लोकसभा का पूरे पाँच वर्ष तक सदस्य ही नहीं रहा, क्या यह लोकतन्त्र का मजाक नहीं? इसी प्रकार से विगत वर्ष में चले एक राजनैतिक ड्रामे को तो कोई भी अभी तक नहीं भूला होगा, जबकि देश की एक बड़ी राजनैतिक पार्टी के समर्थन से एक निर्दलीय को मुख्यमंत्री बनना नसीब हो गया था। क्या ऐसा हमारे संविधान निर्माताओं ने सोचा होगा कि कभी इस लोकतांत्रिक देश में ऐसा भी दिन आयेगा?
वास्तव में इस देश में लोकतन्त्र यहीं तक सीमित है। जनता के सामने मशीन रहती है, पल भर को उसके सामने किसी को भी बनाने, किसी को भी बिगाड़ने की शक्ति होती है। मतदान किया और लोकतन्त्र समाप्त। यह हास्यास्पद लगता है पर सत्यता यही है। इस देश की जनता के सामने लोकतन्त्र चुनाव के समय आता है और वह भी मात्र दो-तीन पल को। इस प्रकार के लोकतन्त्र के साथ जनता कैसे सोचे कि उसका शासन, उसके लिए, उसके द्वारा चलाया जा रहा है?
मतदाता की तरह से राजनेता विचार नहीं करते हैं। यदि विचार करते होते तो किसी को अपने खानदान का नाम, किसी को अपने विगत को बताने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इस बार तो बहुत आम रूप में देखने में आया है कि मुद्दों के स्थान पर नामों के साथ चुनाव लड़ा जा रहा है। कोई किसी को इस परिवार का तो कोई किसी को दूसरे परिवार का बता रहा है। किसी के सामने दलित वोट बैंक के रूप में स्थापित है तो कोई मुसलमानों को अपने वोट बैंक के रूप में देखना पसंद कर रहा है। विकास के नाम पर तो किसी की लड़ाई नहीं लड़ी जा रही है तो कोई न कोई बात तो ऐसी चाहिए जो जनता के मतों को उस दल के लिए परिवर्तित कर दे। जब कुछ नहीं बन सका तो प्रधानमंत्री की दौड़ शुरू हो गई है। इससे विद्रूप स्थिति शायद भारतीय राजनैतिक इतिहास मे कभी ही रही हो जबकि नेताओं को स्वयं अपने आपको प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत करना पड़ रहा हो। यह भी राजनैतिक पतन की पहचान है, अस्तित्व संकट की पहचान है। ऐसी स्थिति में जबकि न तो मतदाता के सामने और न ही राजनेता के सामने कोई रास्ता है तब लोकतन्त्र के जीवित रहने के प्रमाण जुटा पाना भी मुश्किल प्रतीत होता है। आज किसी राजनेता के नाम पर, स्वयं को दलित का मसीहा बता कर, धर्म के नाम पर अपने आपको प्रतिस्थापित कर, धर्मनिरपेक्ष का मुखौटा धारण कर मतदाताओं को रिझाने का प्रयास किया जा रहा मतदाता और राजनेता के मध्य लोकतन्त्र कहीं पिस कर दम ही न तोड़ दे?
25 अप्रैल 2009
खिलाड़ी हैं या नौकर??
अकसर सुना है कि खिलाड़ियों की, कलाकारों की देश में हमेशा इज्जत रहती है। इधर आई पी एल की शुरुआत हुई उधर इसमें शामिल टीमों के मालिकों का तानाशाह जैसा रवैया प्रारम्भ हो गया। व्यापारी, फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोग खिलाड़ियों पर दवाब बना रहे हैं। आज तो शाहरूख खान ने लगभग चेतावनी भरे अंदाज में अपनी बात कही, राहुल द्रविड़ बापस लौट रहे हैं। क्या अब ये खिलाड़ी इनके खरीदे गये नौकर हैं? क्या इन सब बातों के लिए खिलाड़ी ही जिम्मेवार हैं? क्या इससे वाकई खेल का भला होगा?
चुनावी चकल्लस-बातों-बातों में कर रहे एकदूजे पर वार,
सत्ता लालच में भूले हैं विकास की राह,
कराहती, सिसकती जनता पर ध्यान नहीं,
अभी नजरों में है बसी संसद ही की राह।
24 अप्रैल 2009
नदी की तरह
नदी की तरह
बहते रहे तो
सागर से मिलेंगे,
थम कर रहे तो
जलाशय बनेंगे,
हो सकता है कि
आबो-हवा का
लेकर साथ,
खिले किसी दिन
जलाशय में कमल,
हो जायेगा
जलाशय का रूप
सुहावन, विमल,
पर कब तक?
गर्म तपती धूप जैसे
हालातों से
उड़ जायेगी
कमल की
गुलाबी रंगत,
वीरान हो जायेगा
तब फिर
जलाशय,
मगर.....
नदिया बह रही है,
बहती रहेगी,
हरा-भरा
करती रहेगी
और एकाकार हो जायेगी
सागर के संग।
22 अप्रैल 2009
हिन्दी.....हिन्दी......हिन्दी........
अभी दो-तीन दिन एक कार्यशाला में व्यस्त रहे। कभी-कभी कार्यक्रमों में कुछ लोग ऐसे मिल जाते हैं जो अपनी बातों के द्वारा कुछ न कुछ सिखा देते हैं। कार्यशाला पर जाने से पहले एक पुस्तक में हिन्दी भाषा को लेकर आलेख पढ़ रहे थे। आलेख में कुछ बातें बहुत ही अच्छी दी हुईं थीं। ऐसी बातें अधिकतर देखा गया है कि आजकल सिखाई नहीं जा रहीं हैं। पुस्तक में लिखीं बातों को ध्यान से इस कारण भी पढ़ा क्योंकि कहीं न कहीं हिन्दी के प्रति एक अलग तरह की अनुभूति होती है।
यह पता नहीं संयोग कहा जायेगा या और कुछ कि वर्कशाप में जिन सरल, सहज स्वभाव के सज्जन से मुलाकात हुई उन्हों ने भी अपनी बातों के दौरान हिन्दी भाषा के प्रति कुछ जानकारियाँ दीं। तमाम सारी बातों के बाद हम लोगों की चर्चा ने साबित किया कि हम लोग हिन्दी के प्रति तो सचेत हैं किन्तु अंग्रेजी के भय ने हमें हिन्दी से दूर कर दिया है।
हमारे देश का एक होनहार छात्र वैज्ञानिक बनने के लिए उस विषय से सम्बन्धित पुस्तकों का अध्ययन करना चाहता है किन्तु उसका मष्तिष्क तो अंग्रेजी-हिन्दी-विषय के चक्रव्यूह में उलझा रहता है। ऐसे में उसका स्वाभाविक विकास कैसे होगा? होता भी है तो वह हिन्दी के प्रति अपने कर्तव्य बोध को खो चुका होता है।
देखा जाये तो भाषा को आपसी सम्बन्ध, वार्तालाप के लिए, सम्पर्क के लिए बनाया गया था। आज भी भाषा के माध्यम से ही हम अपने मनोभावों को आसानी से सबके बीच रख पाते हैं। इस समझ के बाद भी हम क्यों भाषा को क्लिष्टता का जामा पहनाने के पक्ष में रहते हैं? सहजता के साथ हम जिस अभिव्यक्ति को कर सकते हैं वह क्लिष्टता के साथ कदापि सम्भव नहीं है। इसके बाद भी हम भाषा को लगातार जटिलता की ओर लिए जा रहे हैं। कहीं हम भाषा को जटिलता प्रदान कर अपने आपको बुद्धिजीवी तो साबित नहीं करना चाहते? यदि ऐसा है तो इस विचार को छोड़ कर भाषा को सरलता प्रदान करें और आपसी सम्बन्धों में आती दूरियों को मिटाने का प्रयास करें।
चुनावी चकल्लस-जिनके हाथ सने खून से वे जीवन देते दिखे,
जिन्होंने दिए धोखे वे विश्वास व्यक्त करते दिखे,
बदल लेते हैं वे अपने चरित्र को पल भर में,
हमसे मिले वो जब भी मुखौटा लगाये ही दिखे।
19 अप्रैल 2009
15 अगस्त को तिरंगा लन्दन में फहराया जाएगा..
आईपीएल (इंडियन प्रीमियर लीग) की शुरुआत हो गई है, विदेश में। देशी आयोजन, विदेशी धरती, क्या कमाल है? इस विषय पर हमारे बड़े भाईसाहब डा0 प्रदीप सिंह राठौड़ का कहना है कि ‘‘सुरक्षा के कारणों को लेकर आईपीएल अब विदेशों में खेला जायेगा। कल को यह भी सुनने को मिलेगा कि आतंकवाद के डर से 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा लंदन में फहराया जायेगा।’’
चुनावी चकल्लस-साम दाम से काम करें,
दण्ड की कोई बात नहीं,
वोट अभी हैं चाहिए,
अभी करे कोई घात नहीं,
पहले अपना काम निकालें,
जनता पर विश्वास जमा ले,
सत्ता मिलते हों उड़नछू,
आते है फिर हाथ नहीं।
18 अप्रैल 2009
बच्चे क्या अपराधियों की श्रेणी में आते हैं?
दिल्ली में एक बच्ची की मौत, स्कूल में मिली सजा से।
यह कोई एक घटना नहीं है, लगभग हर राज्य में हर दूसरे तीसरे माह इस प्रकार के समाचार सुनाई पड़ जाते हैं।
- क्या हम बच्चों को मारपीट से सुशिक्षित कर सकते हैं?
- क्या अध्यापक पिटाई और कठोर सजा के द्वारा बच्चों में शिक्षा के प्रति गम्भीरता पैदा कर सकते हैं?
- क्या बच्चों द्वारा की गई गलतियाँ इतनी गम्भीर होतीं हैं कि उनके साथ एक अपराधी की तरह से व्यवहार किया जाये?
- क्या आजकल के बच्चे इतने उद्दण्ड हो गये हैं कि बिना कठोर सजा के मानते ही नहीं?
- क्या आज के अध्यापकों में ज्ञान का अभाव हो गया है, जिसको वे कड़ी सजा के द्वारा छिपा लेना चाहते हैं?
- और भी बहुत सारे सवाल आपके मन में भी होंगे, सवाल बस सवाल बनकर न रह जायें, कुछ ऐसा प्रयास करें।
- बच्चों के भविष्य के प्रति जरा जागरूक भी बनें, बच्चे की जिन्दगी के लिए भी जागरूक बनें।
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आज चुनावी चकल्लस नहीं-----
17 अप्रैल 2009
जूता-चप्पलों के बहाने से
चिदम्बरम, जिन्दल और अब आडवानी....यह किसी चुनावी कार्यक्रम के लिए तिकड़ी जरूर न हो पर इस तिकड़ी में कुछ न कुछ साम्य अवश्य है। तीनों अपने-अपने चुनावी कार्यक्रमों में व्यस्त हैं और इस व्यस्तता के मध्य वे आम आदमी की नाराजगी का भी सामना करते हैं। हालांकि इस नाराजगी में इन तीनों में से कोई सीधे-सीधे सम्पर्क में नहीं आता है।
इनके ऊपर जिस प्रकार से जूते-चप्पल का वार किया गया उससे यह तो साफ है कि आम आदमी अपने गुस्से को काबू न कर उसे अलोकतांत्रिक तरीके से सामने ला रहा है। अब नेताओं को, राजनैतिक दलों को ये बात समझ में आ रही है कि क्या लोकतांत्रिक है और क्या अलोकतांत्रिक है? कहने को कुछ भी कहा जाये पर यह तो सही है कि इस प्रकार की घटनाएँ कदापि क्षम्य नहीं होनी चाहिए और सभी लोगों को एक स्वर में इनका विरोध करना चाहिए।
जनता यह भली-भांति जानती है कि अब तक उसको मात्र यह दिलासा देकर भरमाया ही जाता रहा है कि लोकतन्त्र में बहुत शक्ति है, मतदाता बहुत ताकतवर होता है, वह जब चाहे तब सत्ता परिवर्तन करदे। अब राजनीति शास्त्र का यह सूत्रवाक्य बहुत ही घिस-पिट गया है कि जनता का शासन, जनता के द्वारा, जनता के लिए।
वह समझता है कि मतदाता के लिए लोकतन्त्र केवल मुहर लगाने भर तक - अब केवल मशीन की बटन दबाने भर तक - ही है, इसके बाद वही होता है जो राजनेता चाहते हैं, चुने गये लोग चाहते हैं, पार्टी के आलाकमान चाहते हैं। राजनीति में विगत कुछ वर्षों में ऐसे बहुत से उदाहरण सामने आये हैं जबकि सरकार गठन में, सत्ता परिवर्तन में, उच्च नेतृत्व परिवर्तन में आम मतदाता की कोई भी भूमिका नहीं रही है।
आडवानी के केस में पार्टी को सोचने और चिन्तन की आवश्यकता है। किसी दल का कार्यकर्ता ही निराशा-हताशा-कुठा में अपने ही दल के शीर्ष नेता पर इस प्रकार से हमला बोल दे तो स्थिति सोचनीय कही जायेगी।
आज जिस प्रकार से दलबदल की राजनीति ने अपने ही दल में निष्ठावान कार्यकर्ताओं को हाशिए पर खड़ा कर दिया है, जिस प्रकार से धन-बल और बाहु-बल ने एकदम से प्रत्येक दल में पैठ बना ली है वह अवश्य ही किसी भी दल के समर्पित कार्यकर्ता को निराश करेगी।
केवल भाजपा को ही नहीं प्रत्येक उस दल को विचार करने पर मजबूर किया होगा जो अपने समर्पित कार्यकर्ताओं को भुलाकर दूसरे दलों से आये प्रभुत्वपूर्ण लोगों को या फिर एकाएक अपने ही दल में धन-बल से, बाहु-बल से सम्पन्न लोगों को बढ़ावा देने में लगे हैं। चिदम्बरम, जिन्दल, आडवानी तो केवल एक उदाहरण के रूप में सामने रखे जा सकते हैं, यदि इसी प्रकार अपने कार्यकर्ताओं का, आम आदमी का शोषण होता रहा, उसकी आकांक्षाओं का गला घोंटा जाता रहा तो यकीनन एक दिन ऐसा आयेगा जब सभाओं में, प्रेस-वार्ताओं में या अन्य ऐसी जगहो पर जहाँ कार्यकर्ता तथा आम जनता जमा हो वहाँ जूते, चप्पल आदि पहनना वर्जित कर दिया जाये।
चुनावी चकल्लस-जूते की महिमा भली, अब तक थे अनजान,
बिना लाइसेंस का मिल गया एक अस्त्र महान,
पैरों की रक्षा करो घूम लो चारों धाम, संकट आता जब दिखे करदो घमासान।
16 अप्रैल 2009
कुछ सवालों के जवाब जरूरी हैं.....
चुनाव आयोग चुनावों की निष्पक्षता को लेकर बुरी तरह सजग है। प्रत्याशियों को भी परेशान किये है, मतदाताओं को भी परेशानी में डाले है, समर्थकों को भी परेशान कर रहा है (परेशानी इस हाल में कि इस बार जिस तरह से चुनाव हो रहे हैं वैसे चुनाव देखने की आदत तो छूट ही चुकी थी)
आयोग ने प्रत्याशियों की घोषणाओं तक पर ताला डाल रखा है। किसी प्रकार के प्रलोभन नहीं दिये जायेंगे, सभायें भी होंगीं तो आयोग से पूछकर। इस प्रकार की बंदिशों में अब प्रत्याशी कशमशा कर रह जा रहे हैं पर कुछ विशेष नहीं कर पा रहे हैं।
इन्हीं सब बंदिशों, लगामों के बीच हमारे मन में कुछ सवाल उभरे जिनको लेकर चुनाव आयोग को लिख भेजा है पर वहाँ से अभी कोई जवाब नहीं आया है। सम्भव है कि अभी आये भी नहीं क्योंकि अभी वो चुनावों में ही व्यस्त है। किसे फुर्सत पड़ी है कि वो आम मतदाता के सवालों के जवाब दे? जब उन लोगों को फुर्सत नहीं है जो हम मतदाताओं के वोट पाकर ही सत्ता का सुख भोगते हैं तो औरों की क्या कहें?
सवाल मन में ये उठे कि प्रलोभनों की घोषणा करना मना है पर क्या राजनैतिक दलों के चुनावी घोषणा-पत्रों को प्रलोभन नहीं माना जाना चाहिए?
जो सुविधा जनता को अभी तक मुहैया नहीं थी और यदि अब हो रही है तो क्या यह चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है? (उदाहरण के लिए हमारे शहर में पहले बिजली आने-जाने का जो नियम था, अब उसमें बहुत अच्छा सुधार आ गया है। अब ज्यादातर बिजली रहती है। क्या यह प्रलोभन नहीं है? आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है?)
इसी तरह से इस बार ऐसी चर्चा है और हमारे उन मित्रों के माध्यम से पता भी चला है जो चुनाव में अपनी ड्यूटी का निर्वाह कर रहे हैं कि कोई व्यक्ति मतदान स्थल तक जाता है और मतदान की समूची प्रक्रिया से गुजरने के बाद चाहता है कि वो अपना वोट न दे तो मतदान अधिकारियों के पास रखे रजिस्टर में उसके विवरण के सामने लिख दिया जायेगा कि मतदान नहीं किया। यह उन लोगों के लिए अच्छा है जो तमाम व्यवस्था से नाराज होकर वोट नहीं देना चाहते। वे अपना मत भी नहीं देंगे और कोई दूसरा उनके मत का दुरुपयोग भी नहीं कर पायेगा। पर क्या इस व्यवस्था से मतदान की गोपनीयता भंग नहीं हो रहीं है?
हमारा मत किसे गया किसे नहीं, हमने मतदान किया या नहीं ये नितांत गोपनीय मामला है पर वो तो इस व्यवस्था से गोपनीय तो नहीं रहा। यदि आयोग को नकारात्मक वोट जैसी व्यवस्था ही करनी थी तो क्या वोटिंग मशीन में ही एक अतिरिक्त बटन की व्यवस्था नहीं करवाई जा सकती थी? वर्तमान व्यवस्था क्या मतदाता की गोतनीयता को उजागर नहीं करती है?
इसी तरह इस बार बहुत सालों के बाद माध्यमिक स्तर के अध्यापकों को भी चुनाव ड्यूटी में लगाया गया है। अधिसंख्यक अध्यापक किसी न किसी राजनैतिक दल से जुड़े हैं और बहुत तो ऐसे हैं जो किसी न किसी राजनैतिक दल में जिम्मेवार पदों पर हैं। क्या इस तरह के लोगों को पीठासीन अधिकारी बनाना या फिर मतदान कर्मचारी बनाना चुनाव को प्रभावित नहीं करेगा?
इस तरह के कुछ सवालों को आयोग के सामने रखा है। कुछ दूसरे प्रकार के सवालों को भी रखा है जिन पर चर्चा कभी बाद में, इन सवालों को पूर्व आयुक्त टी0एन0शेषन के सामने भी रखा था पर वहाँ से भी कोई जवाब नहीं आया था। क्या इन सवालों का जवाब हमें या अन्य दूसरे जागरूक मतदाताओं को मिलेगा?
चुनावी चकल्लस-देश के विकास के लिए सब खड़े हैं,
हम हैं सबसे बेहतर इसी पर अड़े हैं,
दूसरों को कोसने में कोई कसर नहीं,
भूल जाते हैं कि वे खुद कीचड़ में खड़े हैं।
14 अप्रैल 2009
दो सौवीं पोस्ट और जावेद भाई की नज़्म-पढ़ें भी, सुने भी
अपने ब्लाग के ग्यारह माह से कुछ ऊपर के समय में बहुत कुछ देखा, बहुत कुछ समझा। यह हमारी दो सौवीं पोस्ट है। क्या देखा और क्या समझा यह तो बाद में अभी अपनी दो सौवीं पोस्ट पर आपके सामने फिर जावेद भाई की एक प्रस्तुति, आशा है कि पिछली बार की तरह आपको ये भी बहुत ही पसंद आयेगी। वर्तमान संदर्भों में यह नज़्म विशेष महत्व रखती है।
चुनावी चकल्लस से आपको आज भी दूर रखेंगे, अगली पोस्ट से फिर...............।
सुनिये भी और पढ़िये भी, जावेद भाई की ये नज़्म.....उनसे नहीं कहो कुछ, खुद एक हो जागो,
कि सत्ता चला रहे वो, जमुहाइयों के साथ।
तुम शेर हो वतन के, क्यों माँद में घुसे हो,
दुश्मन को चीर डालो, अँगड़ाइयों के साथ।
गालिब मेरे चचा थे, तुलसी थे मेरे बाबा,
मैं शेर भी पढूँगा, चैपाइयों के साथ।
जो हाथ जोड़ते थे, अब उनके हाथ जोड़ो,
पहले रखा दी कुर्सी, ऊँचाइयों के साथ।
किसका मनायें मातम, किसकी मनायें खुशियाँ,
उस्ताद सो गये हैं, शहनाइयों के साथ।
मंदिर में जन्म अपना, मस्जिद में अपनी पूजा,
गिरजा में दुआ माँगें, ईसाइयों के साथ।
13 अप्रैल 2009
राम और हिन्दू ही साम्प्रदायिक क्यों लगते हैं?
वर्तमान लोकसभा चुनावों में तमाम सारे मुद्दों के बीच चले एक जूते ने सिख दंगों को भी मुद्दा बना दिया। एक जूता क्या चला पूरा का पूरा मुद्दा ही चल निकला। फिलहाल तो इस पर चर्चा नहीं। चर्चा यह कि चाहे मीडिया हो या नेता सभी की आँख की किरकिरी बनते हैं राम, अयोध्या, हिन्दू, आडवानी, मोदी, गुजरात। इस बार भी बने। आलोचनाओं का, आरोप-प्रत्यारोपों का दौर चला, हिन्दू साम्प्रदायिक लगा और शेष सारे धर्म सहिष्णु दिखे। ऐसा क्यों?
यह सत्य है कि धर्म के नाम पर किसी को भी हत्या करने, दंगा करने का अधिकार नहीं है, होना भी नहीं चाहिए। यदि ऐसा है तो उसका विरोध हो। इसके बाद भी यदि विरोध मात्र इस कारण से हो रहा है कि फलां व्यक्ति हिन्दू है या फलां व्यक्ति हिन्दुओं की बात करता है तो यह गलत है।
धर्म निरपेक्षता है क्या? और साम्प्रदायिकता क्या है? यदि कोई व्यक्ति सिर्फ हिन्दू हित की बात करता है और किसी दूसरे धर्म को हानि नहीं पहुँचाता है तो क्या वह साम्प्रदायिक है? कोई व्यक्ति गैर-हिन्दुओं के हितों की बात करता है और हिन्दुओं के नोताओं, आराध्यों का अपमान करता है तो क्या वह धर्मनिरपेक्ष हो जायेगा? इस प्रकार के सवालों पर भी राजनीति कर ली जाती है।
बार-बार हमने यह कहा है कि यदि यह मान भी लिया जाये कि गोधरा कांड और गुजरात के दंगे भाजपा ने करवाये हैं, हिन्दुओं ने करवाये हैं तो भी क्या सिर्फ गुजरात दंगों के पीड़ितों को याद किया जायेगा और गोधरा कांड के मृत लोगों को हिन्दू समझ कर कोसा जाता रहेगा? क्या गोधरा में मरने वाले आदमी नहीं हैं? क्या उनके प्रति हमारे मन में सम्वेदनायें नहीं होनी चाहिए?
इसी तरह से गुजरात दंगों के लिए समूचे हिन्दू समुदाय को, बाबरी कांड के लिए पूरे हिन्दू धर्म को, भाजपा को दोषी ठहराया जाता है। क्या वाकई इसके लिए सिर्फ हिन्दू ही दोषी है? यदि ऐसा है तो 1984 के सिख दंगों के लिए भी हिन्दुओं को दोष देना होगा क्योंकि भले ही वे किसी एक राजनैतिक दल के द्वारा भड़काये गये हों (जैसा कि आरोप लगाया जाता है) तो भी उनमें हिन्दू शामिल थे।
हिन्दुओं का नाम लेकर आगे बढ़ने वाले दल भाजपा का नाम लेकर हिन्दुओं को गाली देनी बन्द करनी होगी। किसी भी बात के लिए मोदी, आडवानी आदि को बुरा कहना और इनके परिप्रेक्ष्य में हिन्दुओं को बुरा-भला कहना कहाँ तक न्यायसंगत है। एक कंधार कांड के लिए हिन्दुओं का चेहरा घोषित कर आडवानी, भाजपा को दोष देने वाली राजनैतिक पार्टी यह भूल जाती है कि किसी जमाने में एक मंत्री पुत्री को बचाने के लिए भी आतंकवादियों को छोड़ा गया था। यहाँ तो सैकड़ों व्यक्तियों की जान को खतरा था। इस घटना को सामने लाकर भाजपा को दोष देना और फिर धीरे से भाजपा का नाम लेकर हिन्दुओं को गाली देने का काम अब बन्द करना होगा।
धर्मं निरपेक्षता क्या है इसे अभी राजनैतिक दलों को, राजनेताओं को समझना होगा। किसी एक समुदाय को अपना वोट बैंक समझ कर अपने पड़ोसी देश तक की हरकतों को नजरअंदाज करने की आदत को छोड़ना होगा। कुछ भी करते रहिए पर यह भी याद रखिएगा कि तालिबान हमारे देश की सीमा से बहुत दूर नहीं हैं।
चुनावी चकल्लस-
| यूँ हम तुम्हारे इशारे पर तारे तोड़ लायें, तुम कहो तो अपनी हद से गुजर जायें, बस एक बार हमें बिठा दो गद्दी पर, फिर देखना कैसे हम अपनी रंगत बदल जायें। |
|---|
हर बच्चे के मुंह में चाँदी की चम्मच क्यों नहीं होती?
‘चाँदी की चम्मच मुँह में लेकर पैदा होना’ बचपन में इस वाक्य को जब भी पढ़ते थे तो सोचा करते थे कि एक बच्चा कैसे इतनी बड़ी चम्मच लेकर पैदा होता होगा? हालांकि उस समय तो बच्चों के पैदा होने की प्रक्रिया ही हम लोगों की समझ से परे थी, कोई आज के बच्चे तो थे नहीं कि सब कुछ टी0वी0 पर, इंटरनेट पर दिखता हो। धीरे-धीरे अक्ल आई और उक्त वाक्य का सही अर्थ समझा। उस छुटपन में भी पिताजी के साथ, कभी अपने बाबाजी के साथ साइकिल पर बैठ कर स्कूल जाते हुए शहर में शान बघारतीं एक दो मोटरगाड़ियों को देखकर, कुछेक स्कूटरों को फरफराते देखकर लालच सा आता।
घर आकर अम्माजी से पूछते कि क्या हम लोग कार नहीं ले सकते? उन्हीं दिनों एक बड़ी ही रोचक घटना हुई जिसको लेकर आज तक परिवार में सभी हँसी-मजाक कर लेते हैं। हमारे मकान मालिक बहुत बुजुर्ग थे और उनके कोई सन्तान भी नहीं थी। सम्पन्नता के साथ-साथ उनको कंजूसी भी काफी सम्पन्नता में प्राप्त हुई थी। उनके पास उस समय एम्बेसडर कार थी, पूरे मुहल्ले में इकलौती कार।
वह कार हम बच्चों के लिए बड़ी ही कौतूहल की बस्तु थी। अपने दोस्तों के साथ स्कूल में इसी बात पर रोब झाड़ लिया करते थे कि हमारे वकील बाबा के पास कार है। (उन मकान मालिक को जोकि एडवोकेट थे, बुजुर्ग होने के कारण हम बच्चे बाबा कहते थे) पता नहीं अपनी वृद्धावस्था के कारण, कंजूसी के कारण या फिर किसी पर भी विश्वास न करने के कारण जब उनको लगने लगा कि अब कार चलाना उनकी अवस्था के अनुरूप नहीं रहा तो उन्होंने उस कार को बेच दिया। (बाबा अपनी कार स्वयं ही चलाते थे कभी कोई ड्राइवर नहीं रखा) कार बेच कर एक साइकिल खरीद ली।
घर में, मुहल्ले में बड़ी ही चर्चा हुई कि चचा को कंजूसी बहुत चढ़ी है........वृद्ध हो रहे हैं ऐसे में साइकिल चलायेंगे.....अरे! एक ड्राइवर ही रख लेते.......पैसे की कौन सी कमी है....आदि-आदि। हम छोटी बुद्धि के बालक कुछ समझ में तो आता नहीं था। रुपये-पैसे का भी मोल नहीं मालूम था। एक दिन अपनी अम्मा से कहा जैसे वकील बाबा ने अपनी कार बेचकर साइकिल खरीद ली है क्या वैसे पिताजी अपनी साइकिल बेचकर कार नहीं खरीद सकते? अम्मा हँस दीं और प्यार से सिर पर हाथ फेरकर बोलीं अब तुम ही कार खरीदना और हम दोनों को घुमाना।
हम तो भौचक्के से रह गये थे कि जो सवाल हमने पूछा अम्मा ने उसका उत्तर तो दिया नहीं हमारे सिर पर एक काम और बता दिया। अम्मा की बात हमारे दिमाग में घूमती रही, आज भी घूमती है। आज भी कार न ले सके, उन दोनों को न घुमा सके। बहरहाल............
समाज के कुछ लोगों को आज देखते हैं तो पता चलता है कि चाँदी की चम्मच मुँह में लेकर पैदा होना किसे कहा जाता है। एक तरफ युवा वर्ग है जो अपनी बेकारी से, घर-परिवार के भरण-पोषण की समस्या से जूझ रहा है और एक तरफ वो युवा वर्ग है जो अपने मुँह में चाँदी का चम्मच लेकर घूम रहा है।
एक तरफ ऐसे युवा हैं जो अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए किसी का वरदहस्त चाहते हैं और दूसरी ओर ऐसा युवा वर्ग है जिसकी चाटुकारिता में बड़े-बड़े अपने को धन्य समझ रहे हैं। देश के सर्वोच्च पद के लिए एक युवा का नाम उसकी काबिलियत के कारण नहीं मुँह में दबी चाँदी की चम्मच के कारण आ रहा है।
क्या देश का हर बच्चा चाँदी की चम्मच मुँह में दबाकर पैदा नहीं हो सकता है?
चुनावी चकल्लस-ये राजनीति का फंडा है कुछ भी करे जा,
बिना शर्म संकोच गधे को बाप कहे जा,
राजनीति में चाटुकारिता का अपना महत्व है,
दौड़ है पद की बस चाटुकारिता किये जा।
12 अप्रैल 2009
समाज हित में सकारात्मक स्वीकार्य निष्कर्ष चाहिए
एक बात हम आज तक नहीं समझ सके हैं कि जब भी स्त्री-पुरुष की चर्चा होती है तो वह चर्चा कपड़ों, अश्लीलता, मानसिकता पर आकर क्यों टिक जाती है? आज के समय में क्या स्त्री को मात्र एक देह की तरह ही स्वीकारा जाना चाहिए? क्या स्त्री-पुरुष के आपसी सम्बन्धों को केवल शरीर के आधार पर ही तय करने चाहिए? स्त्री सशक्तिकरण के नाम पर क्या स्त्रियों का रात को घूमना, कपड़ों का कम पहनना ही आता है?
यहाँ कोई कारण विवाद पैदा करना नहीं है किन्तु जब भी किसी बात की शुरुआत हो और उसका अन्त सकारात्मक या फिर किसी सहज स्वीकार्य निष्कर्ष पूर्ण न हो तो उस विवाद का कोई भी अर्थ नहीं। आजकल देखा जा रहा है कि समाज में स्त्री-पुरुष के नाम पर विवाद तो होता है, बहस भी चलती है पर किसी तरह का स्वीकार्य निष्कर्ष प्राप्त नहीं होता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम ही किसी निष्कर्ष को प्राप्त ही नहीं करना चाहते हैं?
यदि देखा जाये तो पुरुष अहम्, पुरुष प्रधानता के साथ-साथ आज आत्माभिमान भी इस विवाद के पीछे दिखाई देता है। घर में भी देखने में आया है कि पति-पत्नी में आपस में स्वाभिमान की लड़ाई चलती है। स्त्री जागरूकता ने महिलाओं को एक मंजिल प्रदान की है तो उसके सामने विवाद के रास्ते भी खोले हैं। इसके साथ ही प्रगति करती महिलाओं को पीछे करने में कुछ महिलाओं का भी योगदान रहता है। इस वाक्य को अन्यथा न लेकर एक पल को अपने आसपास घटती घटनाओं पर भी गौर कर लें तो पता चलेगा कि क्या सत्यता है?
किसी महिला की मदद से एक नादान बच्ची को देह व्यापार के बाजार में धकेल दिया जाता है। काल-गर्ल रैकेट का धंधा कराने के पीछे, संचालन के पीछे यदि पुरुष का दिमाग काम करता है तो एक महिला भी उसी क्षमता से भूमिका का निर्वाह करती है। कई बार खबरें पढ़ने में आतीं हैं कि आपसी रंजिश के चलते एक महिला की मदद से दूसरी महिला के साथ बलात्कार किया गया। आये दिन ऐसी खबरों का प्रकाशन होता है। इन सभी खबरों के पीछे पुरुष मानसिकता हावी नहीं रहती होगी?
एक बात और वह यह कि अक्सर देखा गया है कि किसी भी दहेज प्रताड़ना के केस में सीधे-सीधे पुरुष को दोषी करार दे दिया जाता है। क्या यह एकदम तथ्यपूर्ण है कि महिला हिंसा की सभी घटनाओं में दहेज का ही दानव काम कर रहा है? एक महिला यदि किसी दुर्घटनावश मृत्यु का शिकार हो जाती है तो क्या वह सिर्फ दहेज के दानव का ही शिकार बनती है? हर मामले में ऐसा नहीं होता है परन्तु अधिकतर मामलों में पूरे परिवार को दहेज प्रताड़ना के नाम पर हवालात की, जेल तक की हवा खानी पड़ जाती है।
इस प्रकार के संदर्भ समाज मंे आपस में तनाव ही पैदा करते हैं। आज यदि गौर किया गया हो तो आपने देखा होगा कि बस में, ट्रेन में अब महिलाओं के प्रति लोगों का नजरिया बदलता सा जा रहा है। एक महिला खड़ी रहती है और कोई पुरुष सवारी उसको जगह देने जैसी सहृदयता नहीं दिखाता है। क्या हम स्त्री सशक्तीकरण के नाम पर इस प्रकार का विभेद भरा समाज चाहते हैं? इसके ठीक उलट यदि कोई सहृदय पुरुष सवारी किसी खड़ी हुई महिला को जगह देने का जोखिम उठाता भी है तो उसे उस महिला से खरी खोटी सुनने को तैयार रहना पड़ता है। क्या अब समाज में स्त्री की मदद करना उसे पुरुष के अधीन बनाना ही है? समझ नहीं आता है कि आखिर हम स्वाधीनता के नाम पर, स्वतन्त्रता के नाम पर, सशक्तीकरण के नाम पर किस प्रकार का समाज बनाना चाह रहे हैं? यह बात पुरुषों और स्त्रियों (दोनों) पर लागू होती है।
सोचिए कि स्त्री पुरुष के आपसी सम्बन्धों पर चलती बहस क्या बस बहस ही बनी रहेगी या फिर उसमें किसी तरह के सकारात्मक परिणाम आने की गुंजाइश है? पुरुष के साथ-साथ आज स्त्री भी इस सवाल के लिए जिम्मेवार है क्योंकि अब वह भी आजाद है, स्वतन्त्र है, जागरूक है, सशक्त है।
चुनावी चकल्लस-चुनाव आयोग की पहल का असर दिखता है,
न बैनर, न पोस्टर, न शोरगुल दिखता है,
कैसे अपने वोटर को प्रभावित करें,
नेता इसी में बहुत परेशान सा दिखता है,
नहीं मतदाता के विकास की उसे फिक्र है,
वह तो विरोधी के विनाश में तत्पर दिखता है।
11 अप्रैल 2009
यहाँ सवाल मानसिकता का है....
क्या नारी के साथ बलात्कार का कारण उसके कपड़े हैं? इस सवाल को अभी नारी ब्लाग पर उठाया गया, साथ ही जब भी स्त्री-विमर्श की बात होती है तब भी इस प्रकार के प्रश्न को जरूर उठाया जाता है। यह उस प्रकार का सवाल है जो किसी हताशा या कोई अन्य रास्ता न दिखाई देने के बाद उत्पन्न होता है। महिलाओं की वेशभूषा क्या और कैसी हो इस पर हमेशा से सवाल-जवाब होते रहे हैं, शायद होते भी रहेंगे।
यह तो निश्चय ही सत्य है कि किसी भी व्यक्ति की वेशभूषा पर उसी ही व्यक्ति क अधिकार होना चाहिए अन्य को कदापि यह हक नहीं होना चाहिए कि वो इस पर अपनी टिप्पणी दे। इसके बाद भी एक सत्य यह भी सामने आता है कि किसी न किसी रूप में विवाद वस्त्रों को लेकर भी होता रहता है।
यहाँ एक दो साधारण सी बातों की ओर ध्यान दिलाने का प्रयास है जो अमूमन हर एक के साथ पेश आती होंगीं और इनको लेकर हमेशा विभ्रम की स्थिति बनी रहती है।
यदि लड़की के कम कपड़ों को निशाना बनाया जाये तो यह कहा जाता है कि छोटे कपड़े पहनने से रोकने वाला समाज कौन होता है? चलिए मान लिया.........इसी के साथ ही जुड़ी एक और स्थिति देखिए। यदि लड़की मिनी स्कर्ट पहन कर टहलती है और उसके घर में उसका भाई अपने दोस्तों के सामने या मोहल्ले में उसके मिनी स्कर्ट पहनने को रोकता है तो उसका विरोध किया जाता है। इसी के उलट यदि उस लड़की की सहेलियाँ आ जातीं हैं और घर का वह लड़का नेकर पहन कर उसी तरह घूमता है तो कहा जाता है कि लड़का बेशर्मी कर रहा है।
एक अन्य स्थिति को सोचिए कि महिलायें नाभि-दर्शना वस्त्रों में, स्लीवलैस कपड़ों में, देह-दर्शना कपड़ों में बाजार, समारोहों आदि में जातीं हैं यदि उनके घर के पुरुष - पति या भाई- हाफ पैण्ट में या पेट दिखाने वाली शर्ट पहन कर उनके साथ जाना चाहें तो क्या जा सकते हैं?
कपड़ों वाली स्थिति पर एक बात यदि आपने गौर की हो कि किसी गाने में, किसी फिल्मी सीन में हीरोइन तो कम से कम कपड़ों में नाच रही होती है, भले ही सीन में भयंकर सर्दी दिखाई जा रही हो और हीरो पूरे कपड़े पहने दिखाई देता है। अब यहाँ जवाब आता है कि दर्शक सौन्दर्य और देह ही देखना चाहते हैं इस कारण स्त्री की नग्न देह दिखाई जाती है। चलिए यह भी मान लिया तो क्या दर्शको के नाम पर क्या पुरुष ही हैं? महिलायें नहीं हैं जो अपनी मानसिक तृप्ति के लिए पुरुष की नग्न देह को देखना चाहें?
इन्हीं बातों पर याद आया कि पिछले दिनों अक्षय कुमार द्वारा अपनी ही पत्नी से अपनी जींस की बटन खुलेआम खुलवाने को लेकर बवाल पैदा कर दिया गया, उस पर अश्लीलता फैलाने का आरोप लगाकर शिकायत भी दर्ज करवा दी गई। क्या वाकई उसकी अश्लीलता उन स्त्रियों द्वारा फैलाई जा रही अश्लीलता से अधिक है जो कपड़ों के नाम पर बस कुछ थोड़ा सा कुछ लपेट ले रहीं हैं? सीने के उभार, शरीर के कटाव, आगे पीछे के सारे हिस्से छिपते हुए भी सबकुछ दिखाने को आतुर रहते हैं?
कपड़ों की परिभाषा क्या हो, पहनावे की शालीनता क्या हो, वेशभूषा की मर्यादा क्या हो ये तब तक तय नहीं हो सकता है जब तक स्त्री-पुरुष की आपसी सोच निर्धारित नहीं होती। बलात्कार किसी घटना या किसी स्थिति के कारण नहीं कुछ छुद्र मानसिकता वाले लोगों की उपज हैं। जब तक समाज से ऐसे लोगों को चिन्हित करके अलग नहीं किया जा सकता ये अपराध रुकने वाले नहीं। इसके साथ ही एक सवाल खड़ा होता है कि घर में छिपे ऐसे छुद्र मानसिकता वाले भाई-बाप से बच्चियों को कौन बचायेगा?
चुनावी चकल्लस-काया उनकी डोलती, फिर भी है तैयार,
पहन गले में घूम सकें जीत वाला हार,
रणनीति किसी को नाराज नहीं है करना
क्या जाने डूब जाये नाव बीच मझदार।
09 अप्रैल 2009
इनकी हताशा को क्या कोई समझेगा...
ये दिल का दर्द था जो जूते के रूप में सामने आया। यहाँ एक पूरी कौम को नजरअंदाज करने का मामला है तो वहाँ पूरे के पूरे देश को तबाह करने का मामला था। दोनों ही मामलों में कहीं न कहीं हताशा दिख रही थी। यहाँ हम उनकी नहीं अपनी बात करें तो बेहतर होगा।
सन् 1984, देश की प्रधानमंत्री की हत्या, देश में सिख विरोधी दंगों का शुरू होना और मौतों का मंजर, आग जलने का मंजर, चीखों और कराहों का मंजर.............. और भी बहुत कुछ।
हमें भली प्रकार से याद है इस समय की, हालांकि उस समय हम कक्षा 6 पास करके कक्षा 7 के विद्यार्थी बने थे। इंदिरा गांधी के बारे में इतना पता था कि वो बहुत ही कड़क नेता हैं, बालती बहुत ही बढ़िया हैं। चूँकि उस समय इंटरनेट, चैनल की सम्भावना हमारे लिए क्या आम रूप से नगण्य थी, टीवी भी गिने-चुने दो-चार घरों में होते थे। कभी-कभी इंदिरा गांधी को रेडियो पर ही सुना था और उसी आवाज ने प्रभावित कर रखा था।
हत्या होने का क्या अर्थ है, क्यों की गई, किसने की, क्या परिणाम होंगे इसका कुछ भी भान उस समय नहीं था। अगले दिन सुबह-सुबह अपने घर के सामने से गुजरने वाली छोटी सी गली से लोगों को सामान उठा-उठा कर भागते देखा। कोई कुछ लिए भागा जा रहा है, कोई कुछ लिए भागा जा रहा है। हम और हमारी छोटी सी मित्र मंडली हैरान कि ये आज हो क्या रहा है? चूँकि घर बाजार से दूर एक छोटी सी गली में था जहाँ पुलिस या किसी प्रकार के दंगाइयों का आज भी प्रभाव नहीं पड़ता, सो हम लोग अपने-अपने घरों के चबूतरे पर बैठे हँसते-गाते उस भागादौड़ी का मजा ले रहे थे।
बाद में घर में अन्य सदस्यों की बातचीत में पता चला कि शहर में दंगा हो गया है, सिखों की दुकानें लूटी जा रहीं हैं। ये बात फिर भी समझ में नहीं आई कि ऐसा क्यों किया जा रहा है। हम बच्चे अपने-अपने कामों में लगे रहे। घर के लोगों को उसके बाद बराबर रेडियो पर चिपके देखा। चाचा लोग बाहर थे, कोई रिश्तेदार कानपुर में तो कोई दिल्ली में तो कोई म0प्र0 में था। सबकी चिन्ता करते भी देखा। तब लगा कि कोई भीषण घटना हो गई है।
समय गुजरता रहा, घर के सदस्य-चाचा आदि- जैसे-जैसे समय मिलता रहा सुरक्षित हम लोगों के पास आ गये। दंगा नाम ही इतना बुरा होता है कि उसका असर आज भी उस दिन को याद करके समझ आता है। तब भी घर में आने वालों की, जिन्होंने दंगे को अपनी आँखों से देखा उनकी बातों को सुनकर लगा कि कैसे एक देश के लोग अपने ही देश के लोगों को मार देते हैं?
उस समय इंदिरा जी का व्यक्तित्व लगभग पूरे देश पर हावी था इस कारण इस घटना के कई साल गुजर जाने के बाद भी इंदिरा भक्त लोगों के मन से विरोधी भावना समाप्त नहीं हुई। बातों-बातों में दंगों की चर्चा, मारने वालों के प्रति दुर्भावना आदि का प्रदर्शन हो ही जाया करता था। यही सब आज भी हो रहा है पूरे 24 वर्ष के बाद (25 होने में कुछ माह ही शेष हैं।)
मामले में कार्यवाही की गई, लोगों को आरोपी बनाया गया, अदालती कार्यवाही हुई, बयान हुए, दंगा फैलाने वालों की शिनाख्त भी हुई, फैसले भी आये...........पर.............परिणाम..........??? यहीं आकर हताशा होती है। जब हमें होती है तो उन लोगों की स्थिति सोचिए जिन्होंने अपने सीने पर इसके घाव सहे हैं?
इस पूरे मामले में एक दो आदमी नहीं पूरी की पूरी मशीनरी ही दोषी रही है। जिसने भी इंदिरा गांधी के हत्यारों के गाँवों को पहले देखा हो वो अब उस स्थान का मुआयना करले, सारी स्थिति साफ हो जायेगी। एक बड़े पेड़ के गिरने पर धरती तो डोलती है पर गाँव के गाँव साफ नहीं होते हैं?
दंगे ने अपना असर दिखाया था, आज भी दिखा रहा है। इस पर तब भी सियासत हावी थी आज भी है। इस मामले को तब भी राजनैतिक रंग दिया गया था अब भी दिया जा रहा है। इसके आरोपी तब भी बाहर घूम रहे थे अब भी घूम रहे हैं। दंगे के पीड़ित उस समय भी रो रहे थे आज भी रो रहे हैं। न्याय का इंतजार उन्हें कल भी था न्याय का इंतजार उन्हें आज भी है। क्या न्याय मिलेगा? क्या हताशा दूर होगी? क्या आरोपी पकड़े जायेंगे? क्या अब दोबारा जूता नहीं फिंकेगा? क्या जवाब है किसी के पास?
चुनावी चकल्लस-हमने उनकी आँखों में अपने लिए अरमान देखा,
उनके हाथों में अपने लिए फिर सम्मान देखा,
अब तो वे हमारे सपनों में भी आने लगे हैं,
जिन्हें विगत कई सालों में हमने गुमनाम देखा।
08 अप्रैल 2009
दो करोड़ की संपत्ति बना कर दिखाओ
यदि आपका मासिक वेतन कोई दस-पन्द्रह हजार रुपये है और आपके पास कुल सम्पत्ति लगभग 60 लाख रुपये के आसपास है तो बतायें कि आपकी यह सम्पत्ति कितने वर्षों में चार गुनी (लगभग दो करोड़ रुपये से अधिक की) हो जायेगी?
क्या ऐसा मात्र चार-पाँच वर्षों में हो सकता है? हुआ है, हमारे देश के युवराज के साथ। आप ऐसा करके दिखाइये?
चुनावी चकल्लस-गर्म लोहे पर चोट करना चाहते हैं,
वोट के नाम पर लड़ाना चाहते हैं,
जन सेवा करने का कोई जज्बा नहीं,
सेवा के नाम पर मेवा खाना चाहते हैं।
07 अप्रैल 2009
सवाल-जवाब करना है तो वोट करें
हम तो इस चुनाव में वोट नहीं डालेंगे। क्या करेंगे वोट डाल कर? किसे दें सब तो एक जैसे हैं? डल गया वोट, कोई एक हमारे वोट से ही तो कोई मंत्री या सरकार तो बननी नहीं है? ये जुमले आजकल चुनावों में आम हों गये हैं। चुनाव की सरगर्मियाँ पूरे जोरों पर हैं और लोगों में मतदान को लेकर अभी से विभिन्न प्रकार के विचार बन-बिगड़ रहे हैं।
यह बात तो सत्य है कि वर्तमान परिदृश्य में राजनीति का माहौल बद से बदतर होता जा रहा है। आम आदमी और भला आदमी तो चुनावों से कोसों दूर होता जा रहा है। इसी राजनैतिक दूरी का परिणाम है कि बुरे लोगों का राजनीति में पदार्पण हो रहा है। यह तो सीधा सा सिद्धान्त है कि किसी भी खाली कुर्सी को कोई न कोई भरेगा, यदि भले लोग नहीं भरेंगे तो उस कुर्सी पर बुरे लोगों का कब्जा हो जायेगा।
एक बात तो सौ फीसदी सत्य है कि संसद हो या विधानसभा (यदि कार्यकाल सही ढंग से चलता रहे तो प्रति पाँच वर्ष में इनकी सभी सीटों को भरा जायेगा) अपनी सीटों को भरने के लिए विवश है। अब भले लोगों का इस ओर रुझाान नहीं है तो ये सदन किससे अपनी सीटों को भरें?
इस बार हर ओर मतदान करने को लेकर जागरूकता कार्यक्रम और अन्य फुटकर साधन अपनाये जा रहे हैं। यह सही भी है कि यदि किसी तरह की अनिवार्यता नहीं सामने आ रही है तो मतदान अवश्य ही करना चाहिए। यह भी सत्य है कि ‘एक नागनाथ, एक साँपनाथ, डसेंगे दोनों ही’ की तर्ज पर आज प्रत्याशी सामने दिखायी देते हैं। इस अनिश्चय वाली भीड़ में शायद एक चेहरा तो ऐसा होता ही होगा जो अपने व्यक्तित्व से प्रभावी रहता होगा? चलिए उसी को दे डालिए वोट।
वोट डालना इस कारण भी आवश्यक है क्योंकि हम बिना वोट किये कैसे अपने प्रतिनिधि या सरकार से सवाल-जवाब कर सकते हैं? जब हमने वोट ही नहीं दिया तो क्यों हम उनकी कार्यप्रणाली पर, उनके कुकृत्यों पर उँगली उठाते हैं। वोट इसलिए भी डालना है क्योंकि हमारे देश में औसत मतदान 46 से 48 प्रतिशत के बीच रह रहा है। अब एक पल को विचार करिए कि यदि मतदान पूरे पचास प्रतिशत हो जाये और पचास प्रतिशत लोग मत न दें तब क्या स्थिति बनेगी?
वोट देने वाले पचास प्रतिशत और उनमें भी माना कि दो ही प्रत्याशियों के बीच मुकाबला हो जाये। पचास प्रतिशत मत में से जीतने वाले को 26 प्रतिशत और हारने वाले को 24 प्रतिशत वोट मिलें। अब कुछ समझ में आया? जो व्यक्ति सत्ता पायेगा यानि की जीतेगा, उसे मिले केवल 26 प्रतिशत वोट और जो लोग मतदान से बाहर रहे वे थे 50 प्रतिशत। इसमें हारे वाले के 24 प्रतिशत भी मिला दें तो आँकड़ा क्या निकलेगा? 26 प्रतिशत वाला व्यक्ति शेष 74 प्रतिशत के ऊपर राज कर रहा है।
यह बात भी सत्य है कि लोकतन्त्र उस एक पल को ही आता है जब हम मतदान करने के लिए बूथ में खड़े होते हैं। मतदान करने के बाद किसकी सरकार बनवानी है, हमारा प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री कौन होगा, गठबंधन में कौन-कौन दल शामिल रहेंगे आदि तथ्य हमारी पहुच से दूर हो जाते हैं। लगातार अधिक से अधिक मतदान कर हम लोकतन्त्र को एक पल से भी अधिक देर के लिए बचा कर रख सकते हैं। गठबंधन की राजनीति, कम से कमतर होता मतदान प्रतिशत, भले लोगों का राजनीति से लगातार दूर होते जाना ही राजनैतिक हास का कारण है। यही कारण है कि इस देश में चालीस सांसदों का नेता प्रधानमंत्री बन जाता है, एक निर्दलीय विधायक मुख्यमंत्री बन जाता है, राज्यसभा सदस्य प्रधानमंत्री बनकर पाँच साल शासन करता है। क्या यह राजनैतिक विद्रूपता नहीं?
इसलिए कम प्रतिशत वाले को राज करने से रोकने के लिए, भले लोगों को पुनः राजनीति में स्थापित करने के लिए, अपना वोट देकर राजनेताओं से सवाल-जवाब करने के लिए मतदान अवश्य करें। अपने आपको प्रोत्साहित करिए तथा अन्य लोगों को भी प्रोत्साहित करिए।
चुनावी चकल्लस-उनको गुमान है कि वो जीत लेंगे हमें,
हम लें शपथ कि सबक उन्हें सिखा देंगे,
धोखा कब तक खायेंगे हम, सोचो तो,
वोट की एक चोट से ताकत हम दर्शा देंगे।
06 अप्रैल 2009
क्या कहेंगे प्रदेश की इस स्थिति पर?
हम आये दिन देखते हैं कि जब हम आपस में चर्चा करते हैं तो समाज की स्थिति पर अवश्य ही चर्चा करते हैं। समाज में क्या चल रहा है, राजनीति में क्या चल रहा है आदि पर चर्चा होती रहती है। हम भी इस तरह की चर्चाओं में अपनी भागीदारी करते रहते हैं।
समाचार पत्र भी सामाजिक स्थिति को बताने में बेहतर भूमिका का निर्वाह करते हैं। इधर चुनाव का मौसम आने से समाचार पत्रों में चुनाव पर चर्चा अधिक हो रही है। जैसा कि आदत में शुमार है सुबह की चाय और अखवार।
समाचार पत्र में चुनाव या फिर कुछ इधर उधर की और कुछ स्थानीय खबरों पर निगाह डाल कर समाचार पत्र पढ़ने की इतिश्री कर लेते हैं। (स्थानीय समाचारों में हमें भी स्थान मिल जाता है सो उनका पढ़ना तो अवश्य ही होता है।)
पिछले दो तीन दिनों से कुछ खास नहीं दिखा समाचारों में पर जैसा कि बाल में खाल निकालने की आदत सी है, मीडिया से भी जुड़ाव है, सामाजिक संस्थाओं से भी सम्पर्क बना है तो समाचारों को पोस्टमार्टम करने की दृष्टि से अधिक देखते हैं। इसी कारण लगा कि जो हमें विशेष लगा वो आपके सामने भी रखा जाये, जिससे पता लग सके कि हमारे समाज की वाकई यही स्थिति है या फिर मीडिया द्वारा इसे इस प्रकार का दिखाया जाता है।
उत्तर प्रदेश के एक प्रमुख समाचार पत्र ‘अमर उजाला’ में आज दिनांक 6 अप्रैल 2009 के बुन्देलखण्ड संस्करण में प्रदेश-आसपास के अन्तर्गत दो पृष्ठ समाचारों के हैं। इनमें प्रदेश के समाचारों से अवगत कराया जाता है, आज भी कराया गया।
आपके सामने पूरा समाचार न रखकर समाचार का शीर्षक ही रखेंगे, इसी से आप अंदाजा लगा लीजिएगा कि प्रदेश की क्या स्थिति है।
प्रदेश-आसपास पृष्ठ 10 में प्रकाशित समाचार- 1- एचटी लाइन का तार टूटकर गिरने से ताई-भतीजे की मौत
2- पीडब्ल्यूडी कर्मचारी से की टप्पेबाजी
3- पिहानी में आग से 60 बीघा फसल राख
4- कछौना में भी आग लगी
5- बंधक बनाकर छात्रा से तीन दिन तक दुराचार
6- दोस्त से ही मांग ली 25 लाख की रंगदारी
7- बस की टक्कर से बालक मरा, साथी घायल
8- मां की मौत के बाद पुत्र की भी मौत
9- संदिग्ध हालत में मौत, हत्या का आरोप
10- सोनभद्र में विस्फोटक संग महिला गिरफ्तार
11- किशोरी ने बलात्कारी को मार डाला
12- एक्सप्रेस से टकराने से बची मालगाड़ी
13- नाले में सुरंग बना कर उड़ाये शाप से जेवर
14- व्यापारी से मांगी तीन लाख की रंगदारी
15- आग से बालक जिंदा जला
(इसी पृष्ठ पर झलक शीर्षक से दिए गये कुछ समाचार)1- पत्नी के दुपट्टे से फांसी लगा झूल गया
2- संदिग्ध दशा में महिला का शव फांसी पर लटका मिला
3- मधुमिता के घर से सुरक्षा गारद हटाई गई
4- सीतापुर में पुलिस टीम पर दागीं 10 राउण्ड गोलियां
5- जीप की टक्कर से बच्चे की जान गई
ये हैं पृष्ठ 10 के समाचार, अब एक झलक पृष्ठ 11 के समाचारों पर भी1- प्रेम संबंध में बाधक बनने पर हुई थी बसपा नेता की हत्या
2- तीन मासूमों सहित छह लोग जिंदा जले
3- रफ्तार ने ली दो सगे भाइयों की जान
4- पलटने से बची केरला एक्सप्रेस
5- हादसा टला: क्रेक टेक से गुजर गई लिच्छवी एक्सप्रेस
6- बैटरी चोर गैंग पकड़ा गया
7- सफर दुश्वार: अब जनता एक्सप्रेस में लुटा यात्री
8- सरेशाम युवक का बाजार से अपहरण
9- संभलकर इस्तेमाल करें पराया एटीएम
10- ठेकेदार और उसकी मां की गोली मार कर हत्या
11- न्यायिक अधिकारी के घर की महिलाओं से लूट
12- स्कूली बस में उतरा करेंट, बाल-बाल बचे बच्चे
13- दो तांत्रिकों की गोली मारकर हत्या, एक घायल
ये हैं प्रदेश-आसपास की स्थिति, क्या कहेंगे आप?
चुनावी चकल्लस-अपने पर विश्वास नहीं, गैरों की खिदमत करते हैं,
अपने कर्म नहीं देखें, दूजों पर ताने कसते हैं,
ऊँची गाड़ी, ऊँचे बँगले, वो राजा जैसे दिखते हैं, है लोकतांत्रिक देश मगर, वो तानाशाही करते हैं।
05 अप्रैल 2009
जावेद भाई की कविता - सुने भी और पढ़ें भी
आज सुबह ही एक पोस्ट लिखी थी और इस समय आने का मकसद आपके सामने अपने शहर के एक कलाकार को सामने लाना है। जावेद कुदारी तो याद है आप लोगों को? जिन्हें याद है उनका आभार कि हमारे शहर के एक कलाकार को आपने याद रखा और जिन्हें याद नहीं कृपया वे यहाँ देख लें शायद कुछ याद आ जाये। बहरहाल जावेद कुदारी जितने अच्छे चित्रकार हैं उतने ही अच्छे गायक और लेखक हैं। उनके द्वारा हर गीत का अपना अंदाज है, अपनी ही रवानी है, अपना ही दर्द है। ऐसे ही एक गीत ‘अब कुम्हारों ने सदा को चाक धोकर रख दिये’ आपके सामने है। पढ़ने और सुनने दोनों रूप में, आप जैसे चाहें वैसे आनन्द उठायें।
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अब कुम्हारों ने सदा को, चाक धोकर रख दिए।
कोई आता ही नहीं लेने दिवाली के दिए।।
न गगरिया, न है पनघट,
न है पनिहारन कहीं,
और पथिक भी जा रहे हैं,
हाथ में थरमस लिए।
अब कुम्हारों ने सदा को, चाक धोकर रख दिए।
हर कुँए की झिर है सूखी,
आज गगरी के बिना,
रस्सियाँ मिलती नहीं अब,
सावन में झूलों के लिए।
अब कुम्हारों ने सदा को, चाक धोकर रख दिए।
कुल्लहड़ों, मटकों, घड़ों की,
पुतलियाँ खामोश हैं,
होंठ उनके भी हैं प्यासे,
तर गले जिसने किये।
अब कुम्हारों ने सदा को, चाक धोकर रख दिए।
गीली माटी ने अबों से,
धूल बनकर ये कहा,
नौजवां क्यों हाथ साने,
कर रहे एम0ए0 बी0ए0।
अब कुम्हारों ने सदा को, चाक धोकर रख दिए।
--------------------------------------------------
(जावेद भाई के सामने हमारी क्या बिसात इसलिए इस पोस्ट में चुनावी चकल्लस नहीं, क्षमा करिएगा)
सुनने में मजा अलग है, कृपया यहाँ सुनें।
हमें भी राजनीति में हस्तक्षेप करना होगा
वर्तमान चुनावों में ऐसा लग रहा है कि नेताओं द्वारा वोट मांगना जिस गति से हो रहा है उससे अधिक तेजी से मतदाताओं को मत डालने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। पिछले कई चुनावों में वोट प्रतिशत जिस तेजी से गिरा है वह वाकई लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लिए चिन्तनीय विषय है। इस पर चर्चा भी होनी चाहिए, चिन्ता भी होनी चाहिए। सरकारी स्तर पर जो प्रयास हो रहे हैं वे तो ठीक हैं गैर-सरकारी स्तर पर भी प्रयास भी तेजी से किये जा रहे हैं।
लोगों को प्रेरित करने से अधिक महत्वपूर्ण यह होना चाहिए कि लोगों की रुचि चुनावों में मतदान से कम क्यों हुई है? क्यों लोग लोकतन्त्र की अपनी शक्ति को प्रयोग में नहीं ला रहे हैं? यह जानने का प्रयास करना चाहिए कि कहीं लोगों का विश्वास तो इस प्रक्रिया से समाप्त तो नहीं होता जा रहा है?
यदि पूरे राजनैतिक परिदृश्य को देखा जाये तो आसानी से दिखाई देता है कि विगत एक दशक में राजनीति में जिस तेजी से अपराधियों का, बाहुबलियों का प्रवेश हुआ है; अस्त्रों-शस्त्रों का प्रयोग बढ़ा है; माफियाओं ने अपने धन-बल को लगाया है उससे आम आदमी ने चुनावों से, राजनीति से अपना ध्यान हटा लिया है।
चुनावों में अब आम आदमी के स्थान पर, सीधे-साधे आदमी के स्थान पर दबंग नेता को, बाहुबली को स्थान अधिक सुलभता से प्राप्त होता है। इनके अलावा राजनीति में संलग्न लोगों के पुत्र-पुत्रियों को स्थान मिलता है। वैसे आज मतदाता भी यही देखता है कि किसके पास कितनी गाड़ियाँ हैं, किसके पास कितने असलहे हैं, किसके साथ कितने आदमी हैं। साथ ही वह यह भी देखता है कि कौन सा व्यक्ति नेता के रूप में उसके काम करवाने में सक्षम है।
नेताओं के साथ भीड़ देखने की ललक, लकदक गाड़ियों के काफिले से उसकी अहमियत को आँकने की भूल के कारण ही आज चुनावों में धन की अधिकता हो गई है। हालांकि चुनाव आयोग द्वारा लगातार य प्रयास किये जाते रहे हैं कि इन सब अनावश्यक तत्वों के प्रयोग को रोका जा सके। कुछ कदम सार्थक भी रहे हैं और कुछ कदमों को हवा में ही उड़ा दिया गया है। चुनाव आयोग को और अधिक सख्ती बरतनी होगी जिससे बाहुबलियों का इस क्षेत्र में प्रवेश बन्द हो सके। इसके साथ ही अच्छे लोगों को भी राजनीति में उतरना होगा जिससे मतदान करने वालों के सामने भी एक अच्छा सा विकल्प मौजूद हो।
हम खुद अपने आपको राजनीति से दूर करके बाहुबलियों के लिए, अपराधियों के लिए, नाकारा लोगों के लिए स्थान खाली कर देते हैं। यदि राजनीति के सुनहरे काल को बापस लाना है, एक नया राजनैतिक समाज स्थापित करना है तो हमें अच्छे लोगों को आगे लाना होगा, स्वयं को आगे लाना होगा।
चुनावी चकल्लस- उन्होंने धीरे से कान में कुछ कहा,
किसी को धन, किसी को काम दिया,
फुसफुसाये जीतने की करो कोई जुगाड़,
चलो कोई भी चाल और बनी रहे आड़,
चुनाव आयोग का डण्डा बड़ा तगड़ा है,
खुलेआम चालबाजी करने में लफड़ा है।
04 अप्रैल 2009
माँ को समर्पित एक कविता - "माँ तुम ही मेरी ज़िन्दगी हो"
माँ को समर्पित कुछ पंक्तियाँ। संसार की हर माँ ऎसी ही होती है।
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आसमान की तेज धूप में,
शीतल छाया सी लगती हो।
मन के अँधियारे में,
धवल चाँदनी सी सजती हो।
दुःखों में नहीं तन्हा रहा,
विश्वास की ढाल बनती हो।
सफलता मिली जब भी कभी,
सिर पर ताज सा चमकती हो।
दूर रहे जब भी तुमसे,
धड़कन बनकर धड़कती हो।
क्या अस्तित्व है तुम्हारे बिना?
माँ, तुम ही मेरी जिन्दगी हो।
चुनावी चकल्लस- वे अब बहुत ही कायदे से मिलते हैं,
हर मुलाकात में फायदा ही देखते हैं।
फिर लाये हैं भर कर वादों की टोकरी,
मांगो या न मांगो बिना भाव तौलते हैं।
शामो-सहर जब आयें जोड़ कर हाथ,
समझो कि सिर पर चुनाव डोलते हैं।
03 अप्रैल 2009
डरते-डरते रामनवमी की शुभकामनायें
रामनवमी का दिन आज राम के वनवास का दिन हो गया है। एक तो राम ऊपर से चुनाव का समय, अच्छे-अच्छे घबरा रहे हैं आचार संहिता से। रामनवमी पर आचार संहिता का क्या काम? हम भी यही सोच रहे थे क्योंकि हमारे एक परिचित ने कुछ ऐसा कहा कि इस पर ध्यान गया।
हमारे उन परिचित सज्जन का कहना था कि राम आजकल भाजपा के पाले में हैं और जिस तरह से चुनाव आयोग सख्ती दिखा रहा है उससे लगता है कि राम का नाम न लिया जाये तो अच्छा है। हमें अपने उन परिचित पर हँसी आई और तरस भी आया।
हँसी इस कारण कि अब भगवान भी किसी न किसी के पाले में हैं। (पता नहीं कि पाले का तात्पर्य उनकी तरफ होना है या इस पाले का अर्थ पालन-पोषण से है) यह इस कारण से कि आज के जमाने में भगवान को मानने या न मानने वालों की संख्या लगभग बराबर मिल जायेगी किन्तु न मानने वालों के कुतर्क ही यह सिद्ध करते हैं कि भगवान का पालन-पोषण इंसान ही कर रहा है। बहरहाल............. तरस इस बात पर आया कि चुनाव आयोग के कुछ कदमों से आम आदमी इस कदर भयभीत है कि कुछ कहने-सुनने-समझने की स्थिति में नहीं है। हमारे वे परिचित भी आयोग फोबिया का शिकार समझ में आते हैं।
चुनाव, चुनाव आयोग, आचार संहिता, राम, चुनाव निशान इन सब पर हमारे परिचित और समाचार पत्र में छपे एक समाचार ने सोचने पर विवश कर दिया।
आज एक समाचार छपा था कि चुनावों तक प्राथमिक विद्यालयों में टीएलएम के नाम पर बनाये गये फलों, फूलों, जानवरों आदि के चित्रों को पुताई करवा कर छिपाया जायेगा। आपको बतादें कि एक-एक जिले में इन्हें बनवाने का खर्च लाखों रुपये आया है। चुनाव आयोग इसके पीछे कारण बताता है कि इनमें से ज्यादातर को चुनाव चिन्हों के रूप में आवन्टित किया गया है और स्कूलों में बने ये चित्र चुनावों को प्रभावित करेंगे।
ठीक इसी तरह से राम अब भाजपा के प्रतीक हैं, साम्प्रदायिकता के प्रतीक हैं, विध्वंस के प्रतीक हैं, नारी शोषण के प्रतीक हैं, दलित विरोध के प्रतीक हैं, हिंसा के प्रतीक हैं, हिन्दुत्व फैलाने के प्रतीक हैं.......क्या-क्या बतायें...राम अब बुरे कामों के ही प्रतीक हैं। अब ऐसी स्थिति में रामनवमी पर राम का नाम कैसे लिया जाये?
हम भी तो डरते-डरते राम के बारे में कुछ लिख रहे हैं, रासुका लगने का भी डर है। राम एक सम्प्रदाय के विरुद्ध बालने को भी प्रेरित करते हैं, नाक-कान काटने को भी प्रोत्साहित करते हैं, धनुष-वाण जैसे अस्त्र-शस्त्र को प्रोत्साहन देते हैं।
डरते-डरते ही सही आप सबको रामनवमी की शुभकामनायें देते हैं। (रात का वक्त इसीलिए चुना कि पूरे दिन का जायजा लिया जा सके। कहीं राम के नाम पर कोई पिटा तो नहीं? राम के नाम पर कोई पकड़ा तो नहीं गया? राम के नाम पर किसी की भावनायें आहत तो नहीं हुईं? राम के नाम पर किसी को रासुका तो नहीं लगी? नहीं कुछ भी ऐसा नहीं दिखा.................उफ!)
चलिए अभी तक तो ऐसा कुछ भी होता नहीं लगा............तो आप लोग रामनवमी की शुभकामनायें स्वीकार करे, बिना पूर्वाग्रह के और दिल से बोलें ‘‘जय श्री राम’’ (कहीं ये तो साम्प्रदायिक नहीं?)
चुनावी चकल्लस-
--------------------------------- नोट बटेंगे, वोट मिलेंगे,
खुलेआम सब काम करेंगे।
डर होगा, तुमको होगा,
हम बेफिक्र मस्त रहेंगे।
करले जो करना है जिसको,
हमतो अपना काम करेंगे।
शोर मचेगा, मचने दो,
हम सबको झूठा कर देंगे।
02 अप्रैल 2009
कहाँ खोती जा रही है संवेदना?
संवेदनाओं का समाप्त होता जाना तो आसानी से देखा जा रहा है साथ ही यह भी दिख रहा है कि अब समाज में उन सारी बातों को भी मजाक का, हास्य का विषय बना दिया जाता है जिस पर किसी के भी आँसू आ सकते हैं। आजकल आप रिएलिटी शो (हास्य वाले) देखिए, देखकर ऐसा लगता है कि जबरन हम पर हँसी थोपी जा रही हो।
इन्हीं हास्य या कहें फूहड़ शो में हास्य के नाम पर ऐसे-ऐसे मुद्दों को भी उठाया जाता है, हास्य का विषय बनाया जाता है जिन पर हमें संवेदित होना चाहिए। आपने अवश्य ही गौर किया होगा कि इन शो में किसी की मौत को भी हास्य का विषय बना दिया जाता है, श्मशान घाट पर होने वाली अंतिम क्रियाविधि में भी हास्य तलाशा जाता है, दर्शकों के सामने परोसा जाता है।
यह हास्य के विषय हैं? ऐसे विषयों पर क्या हँसी आनी चाहिए? एक पल को वह स्थिति सोचिए किसी के परिवार में किसी का देहान्त हो गया है और हम ऐसे किसी दुःख वाले पल को हास्यमय बना रहे हैं।
इसी तरह से इन हास्य कार्यक्रमों में कभी किसी विकलांग की चाल-ढाल, उसके बोलने के ढंग को भी हास्य का विषय बनाकर पेश किया जाता है। इस तरह के कार्यक्रम जब कोई विकलांग व्यक्ति देखता होगा तो सोचिए उस पर, उसके परिवार पर क्या गुजरती होगी?
हम सब आजकल इन सब चीजों के मायामोह से मुक्त हो गये हैं। हमने संवेदना, अपनेपन को, रिश्तों को समाप्त कर दिया है। मायामोंह से विरत रहने की बातें तो गीता में भी कही गईं हैं, हमने अब जाकर मानी हैं। चलिए चलते हैं किसी भीड़-भाड़ वाली जगह पर, किसी ऐसी जगह पर जहाँ से हमें किसी की मौत से किसी की विकलांगता से कोई हास्य प्राप्त हो सके। हमें तो हँसाना है, किसी को दुःख होता हो तो हो।
चुनावी चकल्लस- दाँव-पेंच की राजनीति, राजनीति के दाँव हैं,
सत्ता का संग्राम है, मचा आपस में घमासान है।
आपाधापी मची सभी में, लगी हुई काँव-काँव है,
कोई बाँटे नोट कहीं, किसी के मुख में आग है।
01 अप्रैल 2009
क्या हमें मूर्ख दिवस मनाना आता है?
आज एक अप्रैल है, अप्रैल फूल दिवस। लोगों को मूर्ख बनाने का दिन। इस दिन की शुरुआत हमारे देश में कैसे हुई इसका तो विशेष ज्ञान नहीं है पर बचपन से ही देखते आ रहे हैं कि इस दिन बच्चे तो बच्चे बड़े भी अपनी कारगुजारियों से लोगों को मूर्ख बनाने का प्रयास करते हैं।
मनोरंजन और मस्ती के नाम पर ही इस दिन की शुरुआत की गई होगी, ऐसा हमारा मानना है। विदेश से आई इस परम्परा में वहाँ की भागदौड़ भरी दिनचर्या से समय निकालने के लिए कोई न कोई बहाना चाहिए होता है। इसके ठीक उलट हमारे देश में विभिन्नताएँ सर्वत्र व्याप्त हैं। इसी विविधता के कारण हमारे यहाँ विविध प्रकार से मस्ती, मनोरंजन होता रहता है।
बहरहाल हमने तो हर अच्छी-बुरी परम्परा को स्थान दिया है, इस मूर्ख दिवस को भी स्वस्थ मनोरंजन के नाम पर स्वीकार किया था। इधर अब कुछ समय से देखने में आ रहा है कि इस दिन का नाम लेकर कुछ आपत्तिजनक मजाक, कुछ व्यक्तिगत टिप्पणियाँ करने की कुप्रथा शुरू हो गई है। मूर्ख बनाने के नाम पर लोगों से किसी की दुर्घटना को समाचार, किसी के देहान्त का भद्दा मजाक, किसी को अन्य किसी प्रकार की बुरी खबर देने का चलन शुरू हो गया है। मूर्ख दिवस के नाम पर यह गलत है।
हमें याद है किसी समय हमारे शहर में आज के दिन एक कवि सम्मेलन हुआ करता था। इसमें भाग लेने वाले कवियों के बीच से एक कवि को अन्त में महामूर्खाधिराज की पदवी दी जाती थी। लोगों को पूरे वर्ष इसका इन्तजार रहता था और बिना किसी बैर-भाव के इसमें कवियों और श्रोताओं की भागीदारी रहती थी। अब आलम ये है कि इस आयोजन का अन्त हो गया है, वह भी एक मजाक के दर्दनाक अन्त के कारण।
चलिए मस्ती, मजाक को दिवस हम सब मस्ती के साथ मनायें, बिना किसी को कष्ट और परेशानी दिए। बिना किसी की भावनाओं को आहत किये, बिना किसी को दुःख पहुँचाये। देखा जाये तो किसी भी पर्व का महत्व उसके द्वारा हर्ष, उल्लास मनाने से है न कि किसी को कष्ट पहुँचान से। क्या आज का मूर्ख दिवस हम इस विचार के साथ मना सकेंगे कि कोई हमारे किसी भी कदम से हताहत न हो, परेशान न हो, दुःखी न हो?
चुनावी चकल्लस- लड़ो न झगड़ो तुम, एक पद की खातिर,
कुछ तो शर्म करो इस देश की खातिर।
वार्ताओं के दौर बन गये हैं हमारी नियति,
सुलह से एक नेता चुनो देश की खातिर।।