27 जून 2008

ब्लॉग अब समाचार-पत्रों पर भी

ब्लॉग अब समाचार-पत्रों पर भी आने लगे हैं. हो सकता है कि पहले भी ब्लॉग के बारे में समाचार-पत्रों में लिखा जाता रहा हो पर इस बार मैंने जो देखा वो मेरे लिए अचम्भा ही था. समाचार-पत्र में अब ब्लॉग पर लिखी पोस्ट को छापा जा रहा है. यह कारनामा मैंने कानपुर से प्रकाशित होने वाले समाचार-पत्र "अमर उजाला" में देखा है. विगत तीन-चार दिन से अमर उजाला अपने बदले हुए कलेवर के साथ पाठकों के सामने आ रहा है. इसी बदली हुई हवा में अमर उजाला ने प्रत्येक दिन दो ब्लॉग की पोस्ट को छापना शुरू किया है. अब पता नहीं ये अच्छा संकेत है या नहीं पर इस बात की खुशी हुई कि ब्लॉग को अब इन्टरनेट पर ही लोग नहीं देख पा रहे हैं वल्कि उसको समाचार-पत्र के पाठक भी देख-पढ़ सकते हैं. निश्चय ही ये खुशी की बात है. हालाँकि अभी दो ब्लॉग-पोस्ट ही इस समाचार-पत्र में आ रही हैं पर एक शुरुआत हुई है जो दूर तक अपना असर दिखायेगी.

26 जून 2008

हड़ताल की समस्या

बड़े जोर-शोर से कई सारे लोगों की भीड़ ने जिन्दावाद-मुर्दावाद करते हुए शहर में हलचल मचा दी। दुकानदार अपनी-अपनी दुकान बंद कर इधर-उधर भागने लगे हैं। सड़कों पर टहलते लोग भी सर छुपाने की जगह देखने लगे। लोगों को डर लग रहा था कि कहीं किसी तरह का बलवा न हो जाए। भीड़ पूरी ताकत के साथ चीखती हुई शहर को बंद करा रही थी, जो दुकान, स्कूल बंद नही करता उसके साथ मारपीट भी हो रही थी। एकाएक भीड़ के नेतानुमा इन्सान ने भीड़ का मुंह सरकारी संपत्ति की ओर मोड़ दिया। अब भीड़ सरकारी संपत्ति की ओर दौड़ पड़ी।


आगे क्या हुआ यह बताने के पहले आपको बताते चलें कि यह भीड़ किस बात के लिए है, क्यों हंगामा कर रही है, क्यों दुकानों आदि को बंद करा रही है, क्यों अब सरकारी संपत्ति की ओर मुड रही है? ये भीड़ है नए-नए ब्लोगर्स की जिन्होंने एक संघटन बना कर अपनी पोस्ट पर टिप्पणी न करने वालों के विरुद्ध आन्दोलन खड़ा कर रखा है। इनकी मांग थी कि नए ब्लोगर्स की प्रत्येक पोस्ट पर कम से कम दस टिप्पणी जरुर होनी चाहिए यदि ऐसा नहीं होता है तो सरकार इस तरह की व्यवस्था करे कि प्रत्येक पोस्ट पर दस टिप्पणियां प्रकाशित हों। जब आश्वासन के बाद भी नए ब्लोगर्स की पोस्ट पर पर्याप्त टिप्पणियां नहीं मिलीं तो नए ब्लोगर्स के संगठन "नव-ब्लोगर्स संघर्ष मोर्चा" ने हड़ताल कर शहर में हंगामा शुरू कर दिया।


अब भीड़ की बात, भीड़ अपनी पूरी ताकत से अब कुछ अलग करने के विचार में आ गई। सरकारी संपत्ति होती ही ऐसी है कि उसमें चाहे आग लगाओ, चाहे तोडो , चाहे उसको चुरा ले जाओ, न तो अपना नुकसान होता है, न अपने रिश्तेदारों का, न अपने मित्रों का। सरकारी संपत्ति का नुकसान करने का बाद सीना तान कर, ताल ठोंक कर अपने कारनामों का बखान मीडिया के सामने करो कोई कुछ करने वाला तो है नही हाँ आपके नेता बनने के चांस बढ़ जाते हैं। इसी नेतागीरी के चक्कर में मैं जोश में सबसे आगे जाकर सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के लिए दौड़ पड़ा। सामने एक सरकारी बस, पोस्ट ऑफिस दिख रहा था, सोचा अब तो हीरो बन ही गए। इससे पहले की किसी भी चीज को हाथ लगते सामने से अचानक कई सारे पुलिस वाले प्रकट हो गए। घबरा कर कुछ समझ में नहीं आया, इससे पहले कि हम भाग पाते पुलिस वालों ने हमें घेर लिया। हमारे भागने के सारे के सारे प्रयास धरे के धरे दिखने लगे। हम न तो भाग पा रहे थे न ही बचाव के लिए चिल्ला पा रहे थे। पुलिस वालों ने हमें पकड़ कर हिलाना-डुलना शुरू कर दिया। मैं घबरा कर कुछ करता इससे पहले मेरी नींद खुल गई, देखा मेरा छोटा भाई मुझे जगा रहा है।
जागने पर ख़ुद को हक्का बक्का पाया। जब ख़ुद को सामान्य स्थिति में पाया तो सोचने लगा कि हमारे देश में हो भी तो यही रहा है। किसी भी बात पर कोई भी हड़ताल करना शुरू कर देता है। बिना यह देखे कि किसी तरह की तोड़-फोड़ समस्या का हल नहीं वल्कि समस्या को और बढ़ाना है। हम बिना इस बात की परवाह किए कि हमारे द्वारा नुकसान करी जा रही संपत्ति हमारी ही है, हम तोड़-फोड़ करते रहते हैं। सर झटक कर बिस्तर से उठ बैठा और सोचने लगा कि कहीं ऐसा न हो कि फ़िर से सपने में "नव ब्लोगर संघर्ष मोर्चा" ट्रेन रोकने को निकल पड़े।

23 जून 2008

क्या हल है इस सामाजिक अव्यवस्था को सुधारने का?

कभी-कभी आपस में खाली बैठकी करते हुए लोगों में एक चर्चा ज्यादा रहती है कि समाज की जो स्थिति है वो सुधरेगी या नहीं? सुधरेगी तो कब? कौन सुधारेगा? इन बेवजह की चर्चाओं में आदमी का एक लंबा समय निकल जाता है। समझ नहीं आता कि समय काटने के लिए चर्चा की जाती है या फ़िर किसी तरह का बदलाव लाने के लिए चर्चा की जाती है?

इस विषय पर लिखने का विचार दो घटनाओं को देखने के बाद आया। एक तो सरकार के एक मंत्री महोदया ने आदेश दिया कि यदि किसी नावालिग़ बच्चे को गाड़ी चलते देखा जाए तो उसके माता-पिता का ड्राइविंग लाइसेंस समाप्त कर दिया जाए। दूसरी घटना थी फ़िल्म रंग दे वसंती का एक बार फ़िर देखना। इन दो घटनाओं के अलग-अलग पहलु हैं, दोनों की अपनी-अपनी अलग-अलग सोच है पर यदि सार देखें तो पता चलेगा कि दोनों समाज की समस्या से प्रभावित हैं।

पहली घटना के बारे में तो यही कि सरकार को तब तक किसी भी विषय पर कदम उठाने की जरुरत महसूस नहीं होती जब तक कि बात सर के ऊपर से न गुजरने लगे। ऐसा नहीं है कि सोलह साल से कम के बच्चे अचानक ही गाड़ी चलाने लगे हों। ट्राफिक पुलिस को भी दिख रहा है कि किसी स्कूल की ड्रेस पहने कोई भी बच्चा सोलह साल से कम उमर का ही होगा, पर न तो उसको टोका जाता है न ही उसके माता-पिता को और न ही उसके स्कूल के स्टाफ को। अब जब बच्चे चोट-चपेट का शिकार होते हैं तो सब जागरूक हो जाते हैं।

यहाँ सवाल ये उठता है कि क्या घर पर अब माता-पिता के पास इतना भी समय नहीं रह गया है कि वे देख सकें कि उनका लाडला क्या कर रहा है, कहाँ जा रहा है, किससे मिल रहा है? पहले हम जागें तब ही सरकार जागेगी।

दूसरी घटना सीधे-सीधे सरकार से सम्बंधित है। सरकार में जिस तरह का एक ढांचा बन गया है उसको देख कर लगता नहीं है कि हालत सुधरने वाले हैं। रिश्वतखोरी का आलम चरम पर है, भ्रष्टाचार चरम पर है, अधिकारी के पास समय नहीं है कि वह जनता से सीधे-सीधे मुखातिब हो सके। अब इस तरह के हालातों में आम आदमी क्या करे? प्रशासन मौन है, किसी भी अपराध पर उसको सबूत चाहिए वो भी वह लाकर दे जिसके साथ ग़लत बर्ताव हुआ है। इन हालातों में कुछ उत्साही लोग समाज को बदलने का कार्य करने को आगे बढ़ते हैं, काम भी करते हैं पर समाज में उसको स्वीकार्यता नहीं मिलती है। हालातों से मजबूर ऐसे लोग जूनून की हद तक काम करते हैं, किसी भी कदम को उठा लेते हैं। यदि सरकार, प्रशासन के अहित की बात नहीं होती है तो वह खामोश रहता है और यदि उसकी पोल खुलती नज़र आती है तो वही हाल होता है जो रंग दे वसंती में होता है। वैसे इस तरह के क्रांतिकारी बदलाव के बाद प्रशासनिक परेशानी, दवाब सहने का सबसे ताजातरीन उदाहरण बुन्देलखण्ड के बांदा की संपत पाल का लिया जा सकता है।

अब आप ही बताएं कि क्या हल है इस सामाजिक अव्यवस्था को सुधारने का?

20 जून 2008

आप भी अपना मत दें

बहुत दिनों से सरकार का ढुलमुल रवैया परमाणु समझौते को लेकर देखा जा रहा है। कभी लेफ्ट से डरना कभी चुनाव से डरना, कभी बैठक कभी आश्वासन, किसी तरह की कोई नीति ही नहीं। ऐसे समय में लगा की देश के लोगों को भी इस समझौते के अच्छे-बुरे का ज्ञान होना चाहिए। अपने ब्लोगर-मित्रों से इस बारे में राय जानने की दृष्टि से आज से पोल का शुभारम्भ किया है। इस मुद्दे पर आप भी अपना मत दें।

आगे अन्य मुद्दों पर भी जनमत किया जाएगा।

19 जून 2008

पेट्रो कीमतों की सच्चाई

बहुत सोच-विचार के बाद आज इस विषय पर लिखने जा रहा हूँ। पेट्रो एक ऐसा शब्द हो गया है जिसके नाम सा आज सरकार भी घबडा रही है ऐसे विषय पर लिखना पेट्रो पदार्थों की तरह ही ज्वलनशील है। मंहगाई, सब्सिडी के नाम पर, अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार का दवाब दिखा कर सरकार ने पेट्रो पदार्थों के दाम बेतहाशा बढ़ा दिए। मूल्यों में वृद्धि कितनी सही है कितनी ग़लत ये तो सरकार ही अच्छी तरह से बता सकती है पर समाचारों के माध्यम से, मीडिया के द्वारा जो खबरें छन-छन कर सामने आ रहीं हैं उनसे तो लगता है की मूल्यों में बढोत्तरी ज्यादती ही है।

हमारे देश के आसपास यदि नज़रों को दौडाया जाए तो पता चलेगा की हम लोग पेट्रोल, डीजल के दाम अपने पड़ोसी देशों की तुलना में अधिक चुका रहे हैं। हमारी सरकार के प्रतिनिधि इस बात पर बयानवाजी करते हैं की हमारे यहाँ टेक्स अधिक है, इस कारण से पेट्रो पदार्थों के दाम अधिक हैं। आगे और कुछ कहने के पहले आप लोग भी एक निगाह अन्य पड़ोसी देशों के पेट्रो पदार्थों की कीमतों पर भी डाल लें।

कोलम्बो-------------- पेट्रोल- रु० 49.20 डीजल - रु० 30.20

काठमांडू ------------- पेट्रोल-रु० 49.20 डीजल - रु० 35.13

कराची --------------- पेट्रोल- रु० 42.38 डीजल - रु० 30.99

ढाका ---------------- पेट्रोल - रु० 38.74 डीजल - रु० 23.84

इन स्थानों के अनुपात में हमारे देश में पेट्रोल पचास रुपये से अधिक तथा डीजल चालीस रुपये से अधिक चल रहा है। दाम की ये ऊहापोह अभी भी सरकारी ऊहापोह का नतीजा है। लेफ्ट की धमकी, नजदीक आते लोकसभा चुनाव की आहट, वोट बैंक के खिसकने का डर सरकार को भी दाम निर्धारण करने में स्थिर नहीं होने दे रहा है। कभी पचास पैसा घटने की ख़बर आती है तो कभी एक रुपया तो कभी लगता है की दाम कम नहीं होंगे।

अब ये तो थी पेट्रो पदार्थ बिकने की स्थिति, दूसरा पहलू है पेट्रो कंपनियों के लाभ का। देश में काम कर रहीं पेट्रो कंपनियों ने गत वर्ष सारे टेक्स चुकाने के बाद भी इतना मुनाफा कमाया कि आंकडे देख कर मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। आप लोग भी थोड़ा अपनी आंखों को मेरी तरह कष्ट दीजियेगा।

ओ एन जी सी (ONGC)-------------------- 15642 करोड़ रुपये

आई ओ सी एल (IOCL)-------------------- 7499 करोड़ रुपये

गेल (GAIL)------------------------------- 2387 करोड़ रुपये

बी पी सी एल (BPCL)---------------------- 1805 करोड़ रुपये

ओ आई ऐ एल (OIAL)--------------------- 1640 करोड़ रुपये

एच पी सी एल (HPCL) ---------------------1511 करोड़ रुपये

ये सारे लाभ सभी तरह के टेक्स निकल देने के बाद हैं। अब ऐसे में कोई बताये कि अंतर्राष्ट्रीय दवाब कहाँ और किस तरह का है? पेट्रो कंपनियों को लाभ चाहिए और वो उसे प्राप्त कर ले रहीं हैं। नेताओं को चुनावों में पैसा चाहिए जो बड़े-बड़े व्यापारियों, उद्योगपतियों से मिलता है तो जाहिर सी बात है सरकार उनकी मदद करेगी कि जनता की? जनता को यदि अपनी जेब पर वजन नहीं देना है तो उसे ख़ुद अपनी बचत का तरीका निकालना होगा। अपने खर्चों में कटौती करना होगा, सरकार की, मंत्रियों की, नेताओं की, शासन-प्रशासन की गाडियां तो दौड़ती ही रहेंगी।

मीडिया क्या दे रहा है?

वाह भाई वाह! क्या कहने! एक लम्बी-चौडी बहस के बाद, जद्दोजहद के बाद मीडिया ने आरुषि हत्याकांड की दम निकल ही ली। एक मासूम सी बच्ची जो अपनी जिंदगी के हसीं लम्हों को देखने के पहले ही खामोश हो गई, वहीँ मीडिया अपनी पूरी ताकत लगा कर ऐसे प्रसारण करता रहा जैसे कि वो सारे घटनाक्रम की तफ्तीश कर रहा हो। यहाँ किसी तरह की भावनात्मकता का भी ख्याल नहीं रखा गया, किसी तरह की सामाजिकता का ख्याल भी नहीं रखा गया। प्रत्येक चैनल इस बात को साबित करने में लगा था कि वो जो दिखा रहा है वही सत्य है बाकि सारे के सारे लोग झूठे हैं।

इसके अतिरिक्त बेशर्मी तो इस बात की है कि हमारे भारतीय समाज में एक विशेषता है कि यहाँ मरणोपरांत किसी भी व्यक्ति के दोषों की चर्चा नहीं की जाती है, उसके चरित्र को लेकर किसी भी तरह के सवाल नहीं खड़े किए जाते हैं, पर यहाँ तो ये भी हुआ। मासूम सी बच्ची के शारीरिक संबंधों तक की चर्चा इस प्रकार खुले आम हो रही थी मानो कि सब कुछ मीडिया की नज़रों के सामने होता रहा हो। इस सब से भी लोगों को रस नही आ रहा था तो हमारा आधुनिक बोलीवुड सबसे ऊपर जाकर आरुषि हत्याकांड पर फ़िल्म तक बनाने की सोचने लगा।

सवाल ये नहीं कि मीडिया ने क्या दिखाया? मीडिया को क्या दिखाना चाहिए था? मीडिया ने सही किया या ग़लत? ये सारे सवाल मीडिया कर्मियों की रोजी-रोटी से जुड़े हैं। उन्हें अपने आपको सुर्खियों में बने रहने के लिए इस तरह के हथियारों का प्रयोग करना होता है, पर असली सवाल इस बात का है कि क्या समाज में सिर्फ़ मीडिया ही बाकी रह गया है? मीडिया के क्षेत्र में नौकरी करने वाले क्या इन्सान नहीं हैं? मीडिया की सारी कवायद इस तरह के घटनाक्रम पर आकर ही क्यों रुक जाती है जहाँ किसी न किसी रूप में सस्पेंस हो, किसी न किसी रूप में सेक्स की खुशबू छिपी हो? क्यों मीडिया समाज को दिशा देने वाले लोगों को इतना अधिक सामने नहीं लाती है?

यह तर्क या कुतर्क सही हो सकता है कि मीडिया वही दिखा रहा है जो आदमी देखना चाह रहा है, तो क्या ऐसे में समाचारों की गरिमा को समाप्त कर दिया जाए? क्या मीडिया मी आड़ में मानवता को समाप्त कर दिया जाए? क्या आपसी संबंधों की गर्माहट को व्यावसायिकता की आड़ में समाप्त कर दिया जाए? सवाल बहुत हैं पर उसके जवाब भी उतने ही हैं। यदि इस ब्लॉग को या इस पोस्ट को किसी भी रूप में कोई भी मीडिया से जुडा व्यक्ति पढ़े तो इन सवालों का जवाब अपने भीतर, अपने परिवार के भीतर, अपने रिश्तों के भीतर, अपनी मानवीयता के भीतर जरूर खोजे। तब पता चलेगा कि लोग मीडिया से क्या चाह रहे हैं और मीडिया उन्हें क्या दे रहा है?

16 जून 2008

मंहगाई पर वानर प्रयास


देश में मंहगाई इस समय अपनी रफ्तार का जलवा दिखा रही है। इस रफ्तार के वशीभूत सरकार भी अपना जलवा दिखा रही है। रोज़ ही किसी न किसी मंत्री, सरकारी प्रवक्ता का बयान आ जाता है कि मंहगाई पर काबू करने के प्रयास किए जा रहे हैं और शीघ्र ही इससे निजात,राहत मिलने की सम्भावना है। सरकार की ऐसी बयान वाजियाँ देख कर बहुत पुरानी पर ऐसे हालातों पर सटीक बैठती एक कहानी याद आ जाती है।

कहानी एक जंगल की है, एक बन्दर की है। होता ऐसा है कि जंगल में सालों-साल से शेर का ही शासन चला आ रहा होता है। लोकतंत्र की खुशबु सूंघ कर जंगल के तमाम सरे जानवरों ने फ़ैसला किया कि अब जंगल में भी चुनाव होना चाहिए। हमारे बीच के किसी जानवर को भी राजा बनने का अवसर मिलना चाहिए। जानवरों के एक प्रतिनिधिमंडल ने शेर से मुलाकात की और अपनी बात उसके सामने रखी। शेर को बुरा तो लगा किंतु राजशाही के सामने सिर उठाते लोगों की ताकत देख कर वह भी चुनाव करवाने को तैयार हो गया।

जानवरों ने सर्वसम्मति से अपना एक नेता चुनने का मन बनाया जिससे शेर को आसानी से हराया जा सके। लम्बी मंत्रणा और बैठक के बाद तय किया गया कि बन्दर को चुनाव में प्रत्याशी बनाया जाए। (बन्दर की विशेषताओं की चर्चा यहाँ नहीं करते हैं) सरे जानवरों ने पूरी ताकत प्रचार में लगा दी। मतदान का दिन आया, सरे जानवरों ने मन से बन्दर के पक्ष में वोट डाले। परिणाम जैसा कि तय था राजा शेर हार गया।

बन्दर ने पूरे ताम-झाम के साथ सत्ता संभाली और जंगल पर शासन करने लगा। एक दिन शेर ने आम जानवर की तरह टहलते हुए अपने भोजन के लिए बकरी के बच्चे का शिकार कर डाला। बकरी बड़ी परेशां, उसको कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे, क्या न करे? बकरी हर कोशिश के बाद जब परेशान हो गई तो उसने अपने राजा बन्दर के सामने मदद की गुहार लगाई। जब बन्दर ने सुना कि बकरी के बच्चे को शेर उठा कर ले गया है तो उसके हाथ-पैर फूल गए। चूँकि वह सारे जानवरों के वोट से चुना गया था, सत्ता का मजा भी नहीं खोना चाहता था इस कारण मरता क्या न करता बकरी के बच्चे को शेर से छुडाने के लिए चल पड़ा।

बन्दर डर भी रहा था और बकरी को दिखाना भी चाहता था कि वह बिना डरे उसके बच्चे को शेर से छुडा लाएगा। बन्दर कभी इस पेड़ पर कभी उस पेड़ पर। कभी उछल कर एक पेड़ पर कभी उछल कर दुसरे पेड़ पर चढ़ जाता। कई घंटों तक बन्दर इधर से उधर पेड़ पर छलांग लगते हुए सारे जंगल में कूदता रहा। जहाँ शेर होता वहाँ नहीं जाकर यहाँ वहाँ उछलता रहा। नीचे बकरी अपने बच्चे की सुरक्षा को लेकर परेशान बन्दर के साथ-साथ दौड़ती रही। आख़िर जब उसने देखा कि बन्दर बस इधर से उधर छलांग ही लगा रहा है तो बकरी ने मिमियाते हुए कहा "राजा साहब, हमारे बच्चे को बचा लो, नहीं तो शेर उसको मार डालेगा।"

बन्दर डर भी रहा था और कुछ न कर पाने की झेंप भी थी, उसने बकरी पर रोब झाड़ते हुए डांट कर कहा- "क्यों बेकार में शोर कर रही हो? क्या मैं कोशिश नहीं कर रहा हूँ? तुम्हारे बच्चे को छुडाने के लिए सारे जंगल में कूदता घूम रहा हूँ। कोशिश में तो कोई कमी नहीं है, मौका मिलते ही छुडा लूंगा। तुमको लगता है जैसे ये आसान काम है।" बन्दर की डांट के बाद बकरी खामोश हो गई। चुपचाप अपने घर लौट कर अपने बन्दर राजा और अपने भाग्य को कोसने लगी। उधर बकरी का बच्चा मदद के आभाव में शेर के जबडों में फंसा दम तोड़ गया।

सरकार का यही रवैया है, जनता जबडों फंसी पिस रही है, सरकार, मंत्री इधर से उधर उछल-कूद कर रहे हैं। प्रयास कुछ भी नही हो रहे हैं और दिखाया ऐसे जा रहा है जैसे बहुत मेहनत हो रही है। आम जनता का बकरी के बच्चे सा हाल है।

14 जून 2008

रोज़ एक कविता, रोज़ एक पाठक

चेन्नई के डॉ०एस० सुब्रहमंयन 'विष्णुप्रिया' हिन्दी भाषा के उन्नायक और विलक्षण प्रचारक के रूप में कार्य कर रहे हैं। "हिन्दी ह्रदय" नामक संस्था के संचालक 'विष्णुप्रिया' जी जनवरी 2004 से नित्य एक कविता हिन्दी में लिखते हैं और एक नए पाठक को सुनाते हैं। "रोज़ एक कविता, रोज़ एक पाठक" नाम से चलाये जा रहे विष्णुप्रिया जी के इस अभियान में हिन्दी कविता प्रतिदिन पाठक को सुनाये जाने के साथ-साथ डाक से नित्य नए सदस्य को भेजी भी जाती है। इसके अतिरिक्त इसका अंग्रेजी अनुवाद कर चेन्नई के गैर-हिन्दी भाषी साहित्यकारों को भेजा जाता है।
विष्णुप्रिया जी को इस काम की प्रेरणा ब्राजील की राजधानी रियो-डी-जिनेरो में पुर्तगाली भाषा के प्रचार में लगे हसबेन सेन जोस के अभियान से मिली। जोस ने भाषा प्रचारक के रूप में सन् 1906 में रोज एक कविता पुर्तगाली भाषा में लिख कर जनता के बीच बांटना प्रारम्भ किया। धीरे-धीरे इस अभियान का इतना प्रभाव हुआ कि दक्षिणी अमेरिका के देशों की स्पैनिश राजभाषा से इतर एकमात्र दक्षिणी अमेरिका देश ब्राजील की राष्ट्रभाषा पुर्तगाली है। इस बात से प्रेरित होकर चेन्नई के विष्णुप्रिया जी हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने के लिए इस अभियान को चलाने में लगे हैं।
रोज एक कविता लिखने के पीछे विष्णुप्रिया जी का किसी तरह का स्वार्थ नहीं है न ही वे साहित्य-इतिहास में किसी तरह से अपना नाम चाह रहे हैं। हिन्दी भाषा के उन्नयन को लेकर उनका जूनून प्रशंसनीय है।

ब्लॉग परिचय

पहले-पहल मैं सोचा करता था कि आख़िर ऐसी कोई तरकीब तो होगी जिससे अपनी बात को इंटरनेट के माध्यम से सबके बीच में लाया जा सके। चूँकि लिखने का शौक बचपन से था इस कारण हमेशा यही प्रयास करता रहता कि जो भी लिखा जाए वह सबके सामने आ सके। तमाम सारे पत्र-पत्रिकाओं में छपने के बाद इंटरनेट पर आने की अकुलाहट बढ़ने लगी। क्या होगा, कैसे होगा, कब होगा इसी उधेड़बुन में दिमाग दौड़ता रहता। अपने कुछ मित्रों से इस सम्बन्ध में चर्चा की पर परिणाम ज्यों का त्यों रहा।

कई दिनों की इंटरनेट खोज-बीन का परिणाम निकला कि ब्लॉग-लेखन के बारे में पता चला, फ़िर क्या था लगा जिसे अंधे के हाथ बटेर लग गई हो। धनाधन ब्लॉग बना दिया, लिखना भी शुरू हो गया, मजा आने लगा तो विषय के अनुसार अलग-अलग ब्लॉग बना डाले। अपने विचारों के लिए खासतौर से यही ब्लॉग बनाया "रायटोक्रेट कुमारेन्द्र"। एक-दो पोस्ट के बाद लगा कि ये एक अच्छा माध्यम है अपनी बात को अधिक से अधिक लोगों तक ले जाने के लिए, साथ ही हिन्दी लेखन को भी प्रोत्साहन मिलेगा। कुछ इसी तरह का सोच कर अपने वैभवशाली क्षेत्र बुन्देलखण्ड के वैभव, उसकी शान, उसकी संस्कृति को सामने लाने के उद्देश्य से "बुन्देलखण्ड" ब्लॉग बनाया, जिस पर http://bundeli.blogspot.com/ के द्वारा बुन्देलखण्ड के बारे में देखा-पढ़ा जा सकता है।

इसी तरह साहित्य-प्रेमी ब्लॉग-मित्रों के लिए साहित्य से संबंधित ब्लॉग "स्पंदन" बनाया। इस ब्लॉग में हिन्दी भाषा की साहित्यिक पत्रिका "स्पंदन" में प्रकाशित रचनाओं के साथ-साथ अपनी एवं अपने रचनाकार मित्रों की रचनाओं को स्थान देने का प्रयास है। इस ब्लॉग पर http://sahitykar.blogspot.com/ की सहायता से जाया जा सकता है।

जब ब्लॉग-लेखन की तरफ़ जा रहा था तो लग रहा था कहीं ऐसा न हो कि ये उत्साह या शौक दो-चार दिनों में ही न खत्म हो जाए पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। दिन प्रति दिन इस तरफ़ उत्साह और बढ़ता गया। एक के बाद एक ब्लॉग का बनते जाना इसी का परिणाम है। इसी उत्साह के वशीभूत आज एक और नए ब्लॉग का निर्माण कर दिया है। इस ब्लॉग को नाम दिया है "दस्तावेज़" तथा इस ब्लॉग में वे जानकारियां देने का प्रयास होगा जो हमारे लिए जरूरी होती हैं पर वे हमारे पास अक्सर होती नहीं हैं। इसको ऐसे समझा जा सकता है जैसे हमें सूचना अधिकार का प्रयोग करना है पर नियमावली नहीं है, वेतन आयोग के बारे में चर्चा करनी है पर कोई सामग्री नहीं है, या इसी तरह के अनेक उदाहरण हो सकते हैं। इस तरह की जानकारी यहाँ देने का काम किया जाएगा, वैसे इंटरनेट पर सब उपलब्ध है पर हम लोग आपस में जानकारियां लेने- देने का काम करें तो ज्ञान और बढेगा कम नहीं होगा। "दस्तावेज़" को http://dastawez.blogspot.com/ की मदद से देखा जा सकता है।

वाकई कमाल है ब्लॉग-लेखन, इस बात को इसमें उतरने के बाद ही समझा जा सकता है। अपने ब्लॉग-संसार को विस्तार देने के साथ-साथ अपने मित्रों एवं सहयोगियों को भी इस ओर प्रेरित कर रहा हूँ ताकि हिन्दी ब्लॉग-संसार समृद्ध हो सके एवं हिन्दी लेखन की ओर अधिक से अधिक लोग प्रेरित हो सकें। http://drharshendra.blogspot.com/ से Voice of Harshendra को तथा http://talk2poll.blogspot.com/ के द्वारा Forward INDIA को देखा जा सकता है। ब्लॉग के साथी बढ़ते जायें, लोग आपस में अपने विचार बांटते जायें ऐसा मेरा विचार है। आप लोगों को ये कहाँ तक सही लगेगा पता नहीं पर सोचता हूँ कि सही ही लगेगा।

12 जून 2008

हिन्दी ब्लॉग-लेखन में कोई स्टार क्यों नहीं है?

हमारे एक मित्र हैं, टी० वी० के पत्रकार हैं, उन्हें इस बात की चिंता सता रही है कि आजकल ब्लॉग लेखन के बढ़ते शौक में हिन्दी लेखन के प्रति "स्टार" क्यों नहीं आ रहे हैं। पहले तो समझ में नहीं आया कि मेरा मित्र का तात्पर्य क्या है? पूछने पर बताया कि जिस तरह अंग्रेजी लेखन (ब्लॉग) में नामी फिल्मी सितारे उतर आए हैं, कई अन्य क्षेत्र के लोग भी अंग्रेजी में ब्लोग्या रहे हैं (आज तो समाचार मिला कि अपने लालू जी भी मैदान में उतर आए हैं पोपकोर्न खाकर) ऐसे लोग हिन्दी में क्यों नहीं आते? एक पल को लगा कि बात तो सही कह रहा है पर क्या कहें, आजकल हिन्दी की बात करना तो ऐसा है जैसे किसी आतंकवादी को घर में शरण दे रखी हो।
मित्र चूँकि टी० वी० की दुनिया से जुड़े हैं इस कारण दिखावे की परम्परा पर ज्यादा विश्वास करते हैं। उनकी चिंता अपनी जगह सही थी पर क्या किसी फिल्मी हस्ती या किसी नेता के हिन्दी में लिखने से ही हिन्दी ब्लॉग संसार समृद्ध मन जाएगा, इस सवाल पर वो जरा चकराए। यही सवाल हिन्दी प्रेमियों को हिम्मत देता है कि क्या हिन्दी इतनी गई-गुजरी है कि उसकी उन्नति के लिए किसी भी ऐरे-गिरे का सहारा लेना पड़ेगा?
अब बात आती है हिन्दी के स्टार की तो ये बात अंग्रेजी में लिखने वाले क्या जाने कि हिन्दी ब्लॉग लेखन में कितने-कितने महारथी हैं जो ब्लॉग को लोकप्रियता दिला रहे हैं। फ़िर यदि बात स्टार की है तो कौन स्टार है कौन नहीं इस बात का फ़ैसला लेने वाले अंग्रेजी ब्लॉग-प्रिय क्यों हैं? क्या किसी हिन्दी ब्लॉग-प्रेमी ने अंग्रेजी ब्लॉग पर नुक्ताचीनी की है? वैसे ये बात अंग्रेजी ब्लॉग-प्रेमी भी जानते हैं कि यदि हिन्दी लेखन वाले अपनी पर आ गए तो किसी का भी पोस्टमार्टम कर सकते हैं।
फिलहाल हर एक वो इन्सान जो इस समय किसी न किसी रूप में हिन्दी के विकास में काम कर रहा है वो स्टार है, क्योंकि अंग्रेजों के भारत छोड़ने के बाद भी उनके अवशेष देशी अंग्रेजों के रूप में हमारे बीच जिंदा रह गए हैं। यही अवशेष खाते इस देश का हैं और बजाते किसी और देश का हैं, इसी कारण से हिन्दी अपने ही देश में उपेक्षित है और इसी बात का फायदा उठा कर देशी अंग्रेज पूछते हैं कि हिन्दी ब्लॉग-लेखन में कोई स्टार क्यों नहीं है?

09 जून 2008

साहित्य की धारा

इस समय किसी अन्य विषय पर कुछ लिखने का मन नहीं कर रहा था। बैठे-बैठे सोचा क्यों न इस बार कुछ साहित्यिक हो जाए। वैसे साहित्य के लिए मैंने एक ब्लॉग http://spandanhindi.blogspot.com/ अलग बना रखा है। उसमे अभी अपनी लघुकथाएँ लिखी हैं। इस बार यहाँ उन्ही का मजा लीजिये। एक लघुकथा है भूख तथा दूसरी लघुकथा जो एक माँ की बेबसी को केन्द्र बना कर लिखी थी वो है माँ की ममता

आशा है आप लोग साहित्य की इस धारा का भी आनंद उठाएंगे।

भारत (इंडिया) में गाँव नहीं बसता

नमस्कार, दो-तीन दिन हो गए, कंप्यूटर के द्वारा अपने ब्लॉग-संसार में विचरण नहीं कर सका। इसका कारन मेरा आलस या किसी तरह की व्यस्तता न होकर मेरा स्वयं ऐसी दुनिया में विचरण करना रहा जहाँ कंप्यूटर तो दूर लाईट के दर्शन ही चौबीस घंटों में शायद ही चौबीस मिनट को होते हों।............. आपको आश्चर्य हो रहा होगा कि मैं ऐसी किस दुनिया में हो आया? घबराइये नहीं मैं इस धरती से दूर नही गया था (वैसे आजकल टी० वी० मैं लगातार दूसरी दुनिया के सबूत दिखाए जा रहे हैं) मैं गया था अपने गाँव। गाँव भी आना-जाना पड़ता है, आख़िर अभी हम लोगों की जड़ें गाँव से जुडी हुई हैं।

गाँव जाकर लगा कि हमारी नज़रों मैं अब गांवों की तस्वीर रह ही नहीं गई है, इसको आसानी से साहित्य में, फिल्मों में, मनोरंजन में, राजनीती में, व्यापार में देखा जा सकता है। हर क्षेत्र में अब गाँव की तस्वीर समाप्त है। हर आँख में शहर है, तड़क-भड़क है, हाई-फाई जीवन-शैली है, रंगीनियाँ हैं, करोड़ों-अरबों की बातें हैं। ये सब अभी गांवों में नहीं है। गाँव में अभी भी सूखा है, कठिन जीवन-शैली है, एक-एक रोटी के लिए जद्दोजहद है, ऐसी कोई भी स्थिति अब हमारी चर्चाओं में नहीं है।

अब आप देखिये हमारी फिल्मों आदि को जो कहा जाता है कि हमारे समाज का प्रतिविम्ब है, क्या यही है हमारा समाज? पहले थोडी सी चर्चा कर लें इस समाज की जो हम देखना चाह रहे हैं या कहें कि हमें दिखाया जा रहा है। हमारे आसपास ऐसे लोग हैं जो अब आम आदमी की परिभाषा से ऊपर उठ कर विशेष की परिभाषा में शामिल हो चुके हैं। ऐसे लोगों को महिमा-मंडित करने में लगा है हमारा मीडिया, हमारी फिल्में। यहाँ आकर थोड़ा सा रुकिए और सोचिये कि क्या ऐसा सम्भव है कि संसार में अब धनी लोग ही रह गए है? कारों के काफिलों से सजे लोग ही बचे हैं? घरों में लाखों के जेवरात से लदी-सजी महिलाएं ही रह रहीं हैं? समाज अभी भी ऐसे लोगों के कम से कमतर प्रतिशत में है, अधिसंख्यक लोग अभी भी वे लोग हैं जो दो जून की रोटी की चिंता में लगे हैं, रोजगार की चिंता में लगे हैं, सिर के ऊपर एक छत की आशा में लगे हैं। फ़िर जो दिख रहा है वो क्या है, कहीं हमारी अंतरात्मा की तृष्णा तो नहीं?

कुछ भी हो अभी उस समाज का चित्र बाकी है जो हमारे समाज की वास्तविकता है। गांवों में या शहरों में रहता ऐसा वर्ग अधिसंख्यक है। फिलहाल बिना भटके अभी बात गाँव की, यहाँ बुन्देलखण्ड में विगत चार वर्षों से मानसून ने अपना रौद्र रूप दिखलाया है। सूखा लगातार आदमियों की जीवन-लीला को समाप्त कर रहा है। जिसे मौसम न मिटा सका उसको भूख ने मर डाला। एक-दो लोग नहीं परिवार के परिवार कल के हाथों में ख़ुद को सौंप रहे हैं। आख़िर वे भी क्या करें? यहाँ एक समय को रोटी नही, पीने को पानी नही, हमारा बीस हजारी सेंसेक्स कहता है कोल्ड-ड्रिंक पियो, सोडा की बोतल खोलो। किसानों को अपने गेंहू का उचित मूल्य नहीं मिल रहा क्योंकि सरकार सोचती है कि उसकी व्यवस्था एकदम सही है और इसी की आड़ में पिज्जा संस्कृति में गेंहू को कौडी के मोल में खरीदा जा रहा है। गाँव का छोटा किसान अभी इतना सक्षम नही हुआ है कि अपना साधन लेकर शहर की मंडियों में जा सके।

ऐसी तस्वीर एक मेरे गाँव की नहीं हजारों-हजार गांवों की है। एक बुन्देलखण्ड में ही नहीं देश के तमाम हिस्से में यही स्थिति है। किसानों की सुध लेने वाला कोई भी नहीं है, सब अपने-अपने शेयर के उठने-गिरने में लगे हैं। कोई अभी सास-बहू सीरियलों की तड़क-भड़क में अपनी तृष्णा को मिटा रहा है। कोई कारों के मंहगे विज्ञापन देखकर ही अपने घूमने का मजा ले रहा है। फ़िर सोचिये कितनों के पास है ये स्थिति, कितनी नारियाँ हैं ऐसी जो हमें दिखाई जा रहीं हैं?

हमेशा हमने पढ़ा है, सुना है कि भारत गांवों में बसता है। अब गांवों में जाकर लगता है कि हो सकता है भारत गांवों में बसता हो पर आज के भारत (इंडिया) में गाँव नहीं बसता है।

06 जून 2008

मीडिया-मीडिया का खेल

आइये मीडिया-मीडिया खेलें, क्या कहा खेल नहीं सकते, क्यों, क्या हुआ? आजकल कुछ भी करना कठिन हो सकता है पर मीडिया-मीडिया खेलना सबसे सरल है। बस करना इतना है कि किसी भी एक समस्या/किसी एक ख़बर को चुन लीजिये। क्या........... कोई समस्या ही नहीं, कोई ख़बर ही नहीं। कोई बात नहीं समस्या या ख़बर न भी हो तो भी चलेगा। वैसे भी मीडिया वालों के पास कौन सी ख़बर रहती है। किसी पहलवान को लगातार दिखाते रहना क्या ख़बर है? धारावाहिक की स्टोरी बताना क्या ख़बर है? फिल्मों की गपशप दिखाना क्या ख़बर है? जो ख़बर न भी हो उसको ब्रेकिंग न्यूज़ बताना क्या ख़बर है? यदि मीडिया के लिए ये सब खबरें हो सकती हैं तो हम भी ख़बर पैदा कर मीडिया-मीडिया खेल सकते हैं।
चलिए हम आपको बताते हैं कि करना क्या है। किसी भी घटना जिसके बारे में न तो आपको पता हो और न किसी अन्य को उसको चुन लीजिये। जैसे कि किसी दिन आपकी काम वाली बाई नहीं आती या किसी दिन आपके यहाँ ढूध देने वाला नहीं आता या इसी तरह की तमाम सारी बातें जो आपको लगती हो कि ख़बर बनने लायक हैं, चुन लीजिये और हो जाइये पोस्टमोर्टुम करने को तैयार।
अब आप निकल पढिये इस तरह से कि जो घटना हुई है उस पर आपसे अधिक जानकारी किसी के पास नहीं है। इसी के साथ तैयार करिये तमाम सरे उल्टे-सीधे सवाल जिनका इस घटना से कोई लेना देना न हो पर लगे ऐसा जैसे इसी घटना से संबंधित हैं। मसलन यदि आपकी बाई नहीं आई है तो आपका मीडियापन चालू हो कुछ इस तरह -
आज काम वाली बाई नहीं आई है, तो आपको क्या लगता है कि क्या घर का काम नहीं होगा?
आपको क्या लगता है कि बाई क्यों नहीं आई?
क्या काम वाली बाई को कोई दूसरा काम मिल गया या उसके द्वारा ये अल्टीमेटम है अपनी पगार बढाने को?
ऐसे एक नहीं अनेक सवाल हैं जो आपके मन में घूम रहे होंगे चलिए आपको लिए चलते हैं सीधे अपने संवाददाता मिस्टर एक्स के पास जो खड़े हैं इस समय बाई के घर के सामने, ठीक बाई के घर के सामने।
(यहाँ आपको अब करना ये है कि एकदम से बाई की समस्या या उसके घर के भीतर का हाल नही बताना है, थोडी देर इधर-उधर की बात करिये, ऐसे दिखाइए जैसे आपने समस्या का हल निकल लिया है और किसी भी समय सबके सामने धमाका कर देंगे, तब तक पब्लिक को विज्ञापन का जायका दिलवाइये)
हाँ तो आप देख रहे हैं कि बाई के घर के सामने कितनी भीड़ जमा है, लगता है बाई के न आने की समस्या से बहुत सारेलोग परेशां हैं। हम आपको बाई के घर की ये तस्वीरें सबसे पहले दिखा रहे हैं, एकदम एक्सक्लूसिव सिर्फ़ हमारे ब्लॉग टी० वी० पर। आइये देखते हैं कि बाई के न आने पर लोगों की क्या प्रतिक्रिया है?
सबसे पहले आपसे, आज जब आपके घर बाई नहीं आई तो आपको पता कैसे लगा? सबसे पहले आपने क्या किया? (क्या ये बाई आपके घर काम नहीं करती है आप मीडिया को देख कर जमा हैं)
चलिए आपको बताते चलें कि बाई के न आने की गंभीर हरकतें आजकल हमारे समाज में बहुत होने लगीं हैं। आप भी हमारे साथ भाग लीजिये और अपनी राय से हमें अवगत करायें। हमारा इस घटना को लेकर आज का सवाल है कि क्या बाई के न आने की समस्या से घर की महिलाओं को दिक्कत हो रही है?
हमारे जवाब हैं
(अ) हाँ
(बी) नहीं
(सी) महिलाओं को काम करने की जरूरत है
(डी) बाई के न आने से पुरुषों को काम करना पड़ता है
आप अपना जवाब हमे एस एम् एस से भेजें। अपना जवाब देने में लिखें BAI अ बी सी या डी और भेजें 420420 पर, या फोन करें 2008420 पर और अपनी राय से अवगत करायें।
आपको क्या लगता है कि ये समस्या छोटी है? हम जल्दी ही पर्दाफाश करेंगे बाई के आज न आने का राज तब तक लेते हैं एक छोटा सा ब्रेक।
कहिये आप सब कर सकते हैं ये सब या नहीं? मीडिया आजकल और कर क्या रही है? याद करें तो पाएंगे कि विगत कई दिनों से आरुशी-हेमराज हत्याकांड में मीडिया भी तो यही कर रही है।

05 जून 2008

पर्यावरण सुरक्षित कैसे रहेगा?


मानव के धरती पर आने के पहिले पर्यावरण ने अपनी सहज, सुंदर उपस्थिति दर्ज करवाई थी। धीरे-धीरे मानव विकास करता गया एवं पर्यावरण को विनाश की तरफ़ ले जाता गया। धरती के वस्त्रों के रूप में प्रसिद्ध जंगल काट डाले गए, जीवन-दायनी नदियाँ कचरे के रूप में परिवर्तित कर दी गईं, हरे-भरे बाग़-बगीचे रेगिस्तान बना दिए गए। हरियाली को मिटा कर आदमी ने ख़ुद अपने लिए संकट पैदा किया है। आज मानसून, बारिश को तरसता आदमी, सूखे की समस्या, खाद्य संकट से जूझता आदमी ख़ुद ही अपनी हालत का जिम्मेवार है।
एक तरफ़ जहाँ आदमी ने हरियाली को मिटाया है वहीं दूसरी तरफ़ उसने अपने ऐसो-आराम के समान जुटा कर पर्यावरण संकट को ही बढाया है। सुख-सुविधाओं के इन उपकरणों के कारण आज सारा विश्व ग्लोबल वार्मिंग के दौर से गुजर रहा है । पूरे विश्व-ब्रह्माण्ड का तापमान विगत वर्षों में बढ़ गया है । ग्लेशियर्स पिघल रहे हैं। हिमालय नग्न होता जा रहा है। बेमौसम की वारिश, ओलों की मार एवं मौसम की अनियमितता-ने सारी प्रकृति को विनाश के आसपास ला खड़ा कर दिया। हिम ग्लेशियर्स पिघलने से सारा जल समुद्र में और समुद्रों का स्तर ऊँचा होने की संभावना है । जैसे-जैसे यह स्तर बढ़ेगा, किनारे के शहर पूरे विश्व में डूबने की कगार पर आने लगेंगे। रेगिस्तान में पिछले वर्ष हुई वर्फबारी, समतल मैदानों मे आती सूखे की आपदा, सब कुछ मानव जनित है।
उत्तर-प्रदेश के बुन्देलखण्ड में विगत चार वर्षों से पड़ते सूखे ने भी लोगों की आंखों से पट्टी नहीं उतर पाई। अभी भी पानी का दोहन बुरी तरह से किया जा रहा है। पेड़-पौधों को लगाया नहीं जा रहा है, नदियों में लगातार कचरा बहाया जा रहा है, तब कैसे अपेक्षा की जाए कि बारिश होगी, सूखा दूर होगा, हरियाली आएगी, पर्यावरण सुरक्षित रहेगा?
अब करने होंगे प्रयास
पहली बात तो हम सभी को इस बात को स्वीकारना होगा कि पर्यावरण के संकट हेतु हम लोग ही जिम्मेवार हैं। अब एक-दूसरे को दोष देने के स्थान पर हम ख़ुद पहल करते हुए पौधे लगाना शुरू करें, जो भी पौध लगाएं यह ध्यान रखें कि वह दिखावटी न हो बल्कि फलदार हो।
पौधा लगा कर ही अपनी जिम्मेवारी से मुक्त न समझें, पूरी तरह से उस पौधे के बड़े होने तक उसकी देखभाल करें।

हम ख़ुद इस तरफ़ बढें तथा अन्य लोगों को भी इस कार्य के लिए प्रोत्साहित करें।
मात्र एक-दो पौधों के सहारे नहीं हजारों-हजार पौधों से ये संकट मिटेगा, इसलिए एक-दो नहीं कई-कई पौधे लगाएं।

गंदगी-कचरा यदि हमें परेशां करता है तो सोचो क्या ये धरती को परेशानी, नुकसान नहीं देता होगा? गंदगी को जहाँ तक सम्भव हो उपयुक्त स्थान पर ही डालें, इधर-उधर न फेंकें।
नदियों से हमें पानी के
साथ-साथ तमाम तरह के पदार्थ भी प्राप्त होते हैं, अतः नदियों को भी प्रदूषण से बचने का प्रयास करें।
चलिए अब बंद कर रहे हैं, आप सब ख़ुद समझदार हैं, इतने से ही समझ लेंगे। वैसे भी एक-दो दिन तो धूम रहेगी पर्यावरण बचाने वालों की क्यों कि पर्यावरण-दिवस जो आ रहा है। अरे हम भी तो इसी कारण लिख रहे हैं, पर आप अमल कितना कर रहे हैं?

03 जून 2008

पैसे दो दर्शन करो

भेजा है बुलावा तूने शेरा वालिये,
माँ के दरवार में सब मिल कर गाओ रे,
तुने मुझे बुलाया शेरा वालिये, मैं आया, मैं आया शेरा वालिये,
प्रेम से बोलो जय माता की, सारे बोलो जय माता की,
न……न……न……. हैरान न होइए, अभी माता का कोई व्रत या अनुष्ठान नहीं आया है, ये जयकार या गीत बता रहे हैं कि किस तरह लोग गाते-बजाते माँ के दरवार में जाया करते हैं.
इधर एक ख़बर आई है कि अब माँ के दरवार में दर्शन के लिए अपनी-अपनी अंटी ढीली करनी होगी. बोर्ड ने फ़ैसला किया है कि अब माँ के दर्शन के लिए जो पैसे को देगा उसको दर्शन जल्दी सुलभ होंगे. आख़िर माँ के नाम का व्यापर वे लोग भी कर रहे हैं, अब जाकर माँ ने उनकी बुद्धि खोली है कि पैसे लो और दर्शन करवाओ.
धर्म के नाम पर सारे देश में तमाशा चल रहा है फ़िर बोर्ड वाले करने लगे फ़िर हो-हल्ला क्यों? भगवन का नाम लेकर बड़े-बड़े कामों को एक झटके में करा दिया जाता है, दूसरी तरफ़ धनवान लोगों ने हर जगह अपनी सत्ता स्थापित की है, ऐसे में देवता रह जाए ये उनको गवारा नहीं. समाज का कोई भी क्षेत्र हो हर जगह पैसे का, पैसे वालों का बोलबाला है. लोगों को लगता था कि अभी भगवन का स्थान ऐसा है जहाँ पर अमीर-गरीब का फर्क नहीं है, पर विगत कुछ समय की स्थितियों ने दर्शाया है कि भगवन के दर्शनों पर भी अमीरों का पहरा है. चाहे अमिताभ का दर्शन करना रहा हो, अमर सिंह का दर्शन करना हो, अनिल-मुकेश अम्बानी का दर्शन करना हो या फ़िर अन्य राजनेताओं-फिल्मी हस्तियों का दर्शन करना रहा हो सब धन की आभा में सिमट कर रह गया.
चलो अब एक बात साफ हो गई कि कोई कहे कुछ भी पर भगवन के ठेकेदारों ने भगवन को भी कब्जे में कर लिया है. यही सारी स्थितियां आस्था पर भी चोट करती दिखाई देती हैं. माँ के प्रताप का फल उठाने के लिए अमीर-गरीब वैष्णो देवी पहुचता है पर पैसे के चक्कर में कतार में ही लगा रहता है इससे उसके अन्दर कितनी आस्था रहेगी, कितनी निराशा रहेगे ये वो ख़ुद ही बता नहीं सकता.
यहाँ बस एक बात ही याद आती है कि मन चंगा कठौती में गंगा।

02 जून 2008

मीडिया की उठा-पटक

आज बैठे-बैठे टी०-वी० पर निगाह मारी कि चलो समाचार ही देखे जायें। इधर मैं टी-वी देखने से बचता भी हूँ, खास तौर से समाचारों से और सास-बहु जैसे सीरियलों से। दोनों एक जैसे ही हो गए हैं। जैसे सीरियल वालों के पास स्टोरी नहीं है दिखाने को, ठीक उसी तरह समाचार चैनलों के पास समाचार नहीं हैं बताने को। घुमा फिर कर एक ही सवाल, बार-बार एक ही तरह के समाचार। इधर कुछ दिनों से तो हद तब हो गई जबकि ख़ुद को न्यूज़ चैनल बताने वाले या तो रामायण, महाभारत काल की खोज में लग गए या फ़िर बताने लगे कि हनुमान कौन सी भाषा बोलते थे।

न्यूज़ दिखाने के नाम पर कभी धरती पर खतरे को दिखाया जाता तो कभी कलियुग के अवतार 'कल्कि' के अवतरित होने की स्टोरी दिखाई जाती। यदि इन सब से न्यूज़ चैनल की टी आर पी नही बढती तो खाली के नाम पर कई-कई घंटे बर्बाद कर दिए जाते। एक-दो नहीं तमाम सारी घटनाएँ हैं जो दिखा रहीं हैं कि मिशन के नाम पर शुरू हुई पत्रकारिता ने अपना क्या हाल कर लिया है। हद तो तब हो जाती है जब ब्रेकिंग न्यूज़ के चक्कर में गुड-गोबर कर दिया जाता है।

फिलहाल इन सब में किसी तरह का बदलाव आता नहीं दिख रहा है क्यों कि टी आर पी के चक्कर में ये मीडिया वाले न तो राष्ट्र हित देखते हैं न ही परिस्थिति। देखा जाए तो इधर न्यूज़ से आम आदमी उसी तरह गायब होता जा रहा है जैसे कि हिन्दी फिल्मों से आम आदमी गायब हो रहा है। बुन्देलखण्ड में सूखे से हजारों लोग बेघर हुए पर मीडिया ने अपने लाभ भर के लिए स्टोरी दिखाई जबकि बिना बुलाये अमिताभ बच्चन के घर के सामने दिन-रात खड़े रहे, मानो किसी देव-पुरूष का अवतरण होने वाला हो। वैसे मेरा पूरा विश्वास है कि यदि कभी धोखे से भी इस भारत-भूमि पर देव-पुरूष का अवतरण होगा तो शायद मीडिया वाले उसको तवज्जो नहीं देंगे क्योंकि उससे ज्यादा विज्ञापन एवं टी आर पी तो फिल्मी सितारे ही दिला देंगे।

हाँ तो बात हो रही थी आम आदमी के गायब होते जाने की, आम आदमी की फिक्र है किसे? राजनेताओं के सामने समस्या है किसी भी तरह कुर्सी पाने की। पहले कुर्सी मिले तब आम आदमी की तरफ़ देखा जाए। इसी तरह मीडिया को सेलिब्रिटी से फुरसत मिले तो वो आम आदमी की तरफ़ देखे। फिल्मी सितारों का मन्दिर जाना हो या कहीं विदेश जाना हो सब कुछ खबर बनता है। किसी की मौत हो जाए या किसी से बलात्कार हो मीडिया को चटपटी ख़बर बना कर दिखाना है। इन सबको देख कर लगता है कि हम लोग मानवीयता की सीमा रेखा से कहीं ऊपर जा चुके हैं, संवेदनाओं के धरातल से कहीं दूर निकल चुके हैं तभी तो हमें किसे की चीख परेशां नहीं करती, किसी के आंसू रुलाते नहीं, किसे भूखे की ख़बर से टी आर पी नहीं बनती।

इसी मीडिया की उठा-पटक में एक ख़बर आपको देते चलें कि शिल्पा शेट्टी भी अपना ब्लॉग बना चुकी हैं। ख़बर मीडिया से मिली, क्या आपके ब्लॉग बनाने की ख़बर किसी को हुई थी? या किसी अन्य के ब्लॉग बनाने की ख़बर मीडिया से आपको लगी थी? नहीं न, हमारे ब्लॉग बनाने की ख़बर भी किसी को नहीं हुई, सिवाय हमारे। हाय मीडिया! हमारे ब्लॉग बनाने की भी ख़बर हमारे ब्लॉग-मित्रों को कर देते।

01 जून 2008

आरक्षण के विवाद ने अपना सिर उठाया

मंडल कमीशन के हंगामेदार प्रदर्शन के बाद एक बार फ़िर आरक्षण के विवाद ने अपना सिर उठाया है। आरक्षण किसे हो? कितना हो? कैसा हो? इस पर हमेशा से एक व्यापक बहस की जरूरत रही है। शिक्षा से लेकर नौकरी तक आरक्षण का विवाद पसरा हुआ है। हाल-फिलहाल की स्थिति को देख कर लगता भी नहीं है कि ये विवाद इतने आसानी से निपटेगा।
आरक्षण को लेकर विवादों का रूप अलग -अलग है। कहीं एडमीशन को लेकर विवाद है तो कहीं ख़ुद को जातिगत आरक्षण देने का विवाद है। वर्तमान में राजस्थान में गुर्जर वर्ग का विवाद इसी का उदाहरण है। आरक्षण से मिलने वाले लाभों को देख कर कोई भी स्वयं को आरक्षित कोटे में लाना चाहेगा। ठीक भी है सभी को अपने-अपने स्तर पर लाभ लेने की चाह होती है पर क्या कभी इस बात पर विचार होता है कि लाभ संवैधानिक हों? शायद नहीं। न तो हम लोग, जो लाभ लेने की चाह रखते हैं और न वे लोग, जो लाभ दिलवा पाने सी स्थिति में होते हैं, इस ओर विचार करते हैं।
गुर्जरों का आरक्षण का लाभ लेने को होता प्रदर्शन तथा प्रदर्शनों में मरते लोगों के ऊपर होती राजनीति से किसी का भला होता नहीं दिखता। राजनेताओं ने भी इस मुद्दे पर अपनी-अपनी रोटियां सेकनी शुरू कर दी हैं। अच्छा होता कि सभी राजनीतिक दल आपस में बैठ कर संवैधानिक रूप से इस समस्या का हल निकलते। गुर्जरों की राजस्थान में सामाजिक स्थिति, आर्थक स्थिति आदि को देख कर उनको आरक्षण पर विचार किया जाता।
राजनेताओं के अलावा ख़ुद गुर्जर समुदाय के नेताओं को भी चाहिए था कि वे भी इस बात पर विचार करते कि क्या उनकी स्थिति वास्तव में इस लायक है कि उनको आरक्षण का लाभ दिया जाए या ये सारी कवायद मात्र नौकरी, चुनाव आदि के लिए हो रही है। सिर्फ़ सरकारों का ही नहीं हमारा भी कुछ फ़र्ज़ है कि हम राष्ट्र निर्माण में अपना सकारात्मक योगदान दे।