30 अक्टूबर 2009

किफायती दिवस पर किफायती पोस्ट - एक पंक्ति का चुटकुला

समाचार-पत्रों के माध्यम से पता चला कि आज किफायती दिवस है। (सही क्या ग़लत क्या, पता नहीं?) इस कारण ये किफायती पोस्ट - एक चुटकुला -

"एक बुढ़िया बचपन में ही मर गई."

आप जानते हैं इस विचित्र पक्षी का नाम?

एक यात्रा के दौरान एक शहरी बाबू और एक ग्रामीण पास-पास बैठे थे। शहरी बाबू अपनी बातों से गाँव के लोगों को छोटा और कम बुद्धि वाला साबित कर रहे थे। बहुत देर से यह होता देखकर ग्रामीण से रहा नहीं गया।
उसने शहरी बाबू से कहा कि साहब हम गाँव के लोग भले ही कम पढ़े-लिखे होते हों पर अक्ल में किसी से कम नहीं होते।
शहरी बाबू को यह बात नागवार गुजरी। उन्होंने इसे साबित करने को कहा।
ग्रामीण ने कहा कि साहब आप हमारी एक पहेली का जवाब दे दो तो हम समझ जायेंगे कि शहर के लोगों से कम अक्ल वाले होते हैं गाँव वाले।
शहरी बाबू तैयार हो गये। पहेली को सुलझाने में शर्त का भी प्रावधान किया गया।
ग्रामीण ने कहा कि हम गाँव के हैं तो यदि हम पहेली का जवाब न बता सके तो हम आपको पचास रुपये देंगे और यदि आप सही जवाब न दे सके तो आप हमें सौ रुपये देंगे।
शहरी बाबू अपने घमंड के कारण तैयार हो गये और उन्होंने गाँव वाले से पहले पहेली पूछने को कहा।
गाँव वाले ने पहेली पूछी--

‘‘ऐसा कौन सा पक्षी है जो जब उड़ता है तो उसके तीन पैर होते हैं। जब जमीन में चलता है तो उसके दो पैर होते हैं और जब वह पानी में तैरता है तो उसका एक ही पैर होता है।’’

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शहरी बाबू पहेली का जवाब सोचने लगे, ऐसे विचित्र पक्षी के बारे में सोचने लगे। आप भी सोचिए और बताइये इस पहेली का सही जवाब। हारने-जीतने पर रुपये का कोई लेन-देन नहीं है।

29 अक्टूबर 2009

इनके प्रयास और मेहनत को भी सराहा जाए



आज शाम अपने मित्र डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव के साथ उनके घर पर बैठे हुए थे। बातें करने के दौरान ही पास पड़े हुए एक समाचार-पत्र के पन्ने पर नजर गई। समाचार का शीर्षक देखकर उसे पढ़े बिना नहीं रहा गया।
ज्यादा कुछ न कह कर आपके सामने उस समाचार की स्कैन कापी है। आप देखिये और समाज के इस वर्ग के दर्द का भी एहसास कीजिए।
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इसे भी ध्यान दें---आपको बतातें चलें कि शैक्षिक लोन सरकार द्वारा इस आश्वासन के साथ दिया जाता है कि देश में शिक्षा प्राप्त करने के लिए लिए जा रहे पाँच लाख रुपये तक के लोन पर किसी तरह की गारंटी की आवश्यकता नहीं है। इसके बाद भी सरकारी नौकर (बैंक कर्मचारी, अधिकारी, मैनेजर आदि) बिना गारंटी के किसी भी तरह से एजूकेशन लोन नहीं देते हैं।

28 अक्टूबर 2009

पहेली बूझी कितनों ने और मिला क्या..."बड़ा कौन?"

कल अपनी पोस्ट में एक पहेली पूछी थी कौन सा ब्लॉगर सबसे बड़ा है?
यह हमारी ओर से तो स्पष्ट था कि पहेली बस यूँ ही पूछी गई है। किसी सही अथवा गलत के निर्धारण की बात नहीं थी।
हाँ, कौन बड़ा है, इस बात पर हमें एक संस्मरण याद आता है जो याद नहीं कि किसी ने सुनाया था या फिर हमने कहीं पढ़ा था।
एक बार नेपोलियन अपने सेनानायकों के साथ खड़ा हुआ सेना का निराक्षण कर रहा था। बात की बात में कोई चर्चा लम्बाई (कद) को लेकर छिड़ गई। नेपोलियन के एक मुँहलगे सेनानायक ने, जो नोपोलियन के बगल में ही खड़ा था, कहा कि मैं आपसे बड़ा हूँ। (दरअसल उस सेनानायक का कद नेपोलियन से अधिक था।)
नेपोलियन ने उस सेनानायक को घूरा और धीरज के साथ जवाब दिया कि तुम मुझसे बड़े नहीं लम्बे हो।

पूछी गई पहेली के उत्तर भी मजेदार आने की सोचे थे, क्या हुआ आप ही जानें। सारी टिप्पणियाँ साथ में हैं।
हाँ, जिन महानुभावों ने इस पहेली को बूझने के लिए मेहनत की उनको प्रोत्साहन स्वरुप पुरस्कार दिया जाएगा.
सबको मिलेगा उनकी अगली पाँच पोस्टों पर हमारी और हमारे मित्रों की ओर से टिप्पणियों का शानदार इनाम।

Udan Tashtari said...
आपे हैं हुजूर!!

Dipak 'Mashal' said...
अरे चाचा जी, आपने स्पष्ट तो किया नहीं की किस केटेगरी में बड़ा ब्लॉगर ढूंढ रहे हैं? शेप में, की साइज़ में, धन में या उम्र में, पोस्टों में या कमेंट्स में, मसखरी में या गंभीरता में, जनचेतना में या मन बहलाव में, चिंतन में या दोषारोपण में, गद्य लेखन में या पद्य लेखन में, राजनैतिक रसूख में या लोगों के दिलों में पैठ में?कई और भी varieties हो सकती हैं। आप स्पष्ट कीजिये उसके बाद ही लोग सर्च कर पाएंगे....
गुस्ताखी माफ..
सादर
आपका भतीजा
जय हिंद

Neeraj Rohilla said...
तुम्हारा नाम तुम, हमारा नाम हम,
तुम बडे के हम, ;-)
बचपन में गली में ये खेल खूब खेला था बस उस समय किसी को बडे होने की चाह नहीं थी, सब पूछते थे "तुम पागल के हम", ;-)आभार,

M VERMA said...
जिसको उम्र से बडा माना
वो हकीकत में बडा नहीं निकला
जो लडखडा रहे थे वो तो
खडे पाये गये पर
जिसको मजबूती से खडा देखा
पास गया तो खडा नही निकला
अब आप ही से पूछता हूँ
आप से बडा कौन?

'अदा' said...
उम्र ,लम्बाई में, चौडाई में, ऊंचाई में.....
चिरकुट पना में...
किसमें बड़ा...तनी स्पष्ट कीजियेगा...
Vivek Rastogi said...
आज तो वही बड़ा ब्लॉगर है जो दूसरे की टांग खींचने में अभ्यस्त हो।
एक और पहेली इसके बाद ............ जवाब के लिए तैयार रहिएगा.....

गाँव में चलते हैं छः तथा सात रुपये के नोट

इस बार गंभीर सा नहीं, कुछ हल्का-फुल्का हो जाए.......

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एक गाँव में रात के समय एक शहरी ठग पहुँचा। उसने सोचा कि रात के अँधेरे में गाँव के किसी बूढ़े व्यक्ति को ठगा जाये। ऐसा सोच वह एक छोटी सी दुकान पर पहुँचा, दुकान पर एक बहुत ही बुजुर्ग व्यक्ति बैठा था।
उस शहरी युवक ने एक नोट देकर उस बूढ़े व्यक्ति से कहा-‘‘बाबा, छुट्टे दे दो।’’
बूढ़े ने देखा कि नोट तेरह रुपये का है। उसने कहा-‘‘बेटा ये नोट तो नकली है। अभी तक तेरह रुपये का नोट आया ही नहीं है।’’

युवक ने कहा-‘‘बाबा, नोट तो असली है। सरकार ने ये नया नोट चलाया है। अभी शहर में ही आ पाया है, गाँव तक आने में कुछ समय लगेगा।’’
बूढ़े व्यक्ति ने सहमति में सिर हिलाया और अंदर से दो नोट लाकर उस शहरी ठग को दिये। युवक ने नोट देखे और कहा-‘‘बाबा, ये क्या? एक नोट छह रुपये का और एक नोट सात रुपये का। ये तो नकली हैं।’’
बूढ़े ने कहा-‘‘नहीं बेटा, ये दोनों नोट असली हैं, अभी सरकार ने नये-नये चलाये हैं। गाँव में आ गये, शहर तक आने में समय लगेगा।’’

27 अक्टूबर 2009

एक पहेली हमारी भी बूझो...माइक्रो पोस्ट

एक साल से ऊपर हो गया है ब्लाग पर किन्तु अभी भी ब्लाग संसार पर दूसरों की नकल कर करके स्वयं को ब्लागर सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं।
इसी क्रम में बहुत दिनों से देख रहे थे कि ब्लाग पर पहेली बूझने-बुझाने का भी चलन सा बढ़ता जा रहा है, लगा कि ब्लागिंग में प्रसिद्धि पाने के लिए पहेली बुझाने-बूझने वाली पोस्ट भी लिखनी पड़ती है।
बस जी, इसी बात को गाँठ बाँधकर हम भी इस पोस्ट पर एक पहेली चटका दे रहे हैं।
बूझो तो जानें? सही जवाब पर इनाम भी है, लाजवाब.....
पहेली है---


कौन सा ब्लागर सबसे बड़ा है?

26 अक्टूबर 2009

घरों के भीतर भी घरों का बनना

इस धनतेरस पर अपनी अम्मा जी के लिए नया टी0वी0 हम भाइयों ने खरीदा। हमारे कमरे में और हमारे छोटे भाई के कमरे में अपना-अपना टी0वी0 है। अम्मा जी अपने मनपसंद कार्यक्रम अपनी दोनों बहुओं के साथ बैठ कर देख लेतीं। सुबह के समय को छोड़ कर अन्य किसी समय में कार्यक्रम देखने की दिक्कत उसी समय होती है जब किसी सीरियल अथवा कार्यक्रम को देखने में तीनों लोगों की एकराय नहीं हो पाती है।

सुबह अम्माजी को ही दिक्कत होती थी, वो भी इस कारण से कि अम्मा जी जल्दी उठने वालों में से हैं, शेष हम लोग थोड़ी देर से बिस्तर छोड़ने में विश्वास करते हैं। इस कारण से सुबह के समय अम्मा जी का इधर-उधर टहलना होता रहता था। हालांकि हमारे घर में कभी टी0वी0 के कार्यक्रमों को लेकर बहस-विवाद की स्थिति नहीं बनी पर कभी-कभी शाम को कार्यक्रमों के निर्धारण में असमंजस की स्थिति को बनते देखा गया।

अम्मा का सुबह का खालीपन और शाम के समय की असमंजसता को देखकर इस बार विचार किया गया कि अम्मा के कमरे में भी टी0वी0 हो। बस टी0वी0 आ गया अम्मा के कमरे में।

यहाँ विशेष बात टी0वी0 का आना नहीं रहा, विशेष हमें यह लगा कि अब एक घर में एक परिवार और उस एक परिवार में कई घर और उन कई घरों के बीच भी कई घर बन गये हैं। आप ही देखिये, हमारा एक ही घर, एक ही परिवार, उसमें एक अम्मा का, एक हमारा, एक भाई का घर अथवा परिवार बन गये हैं। कुल जमा सात-आठ लोग और टी0वी0 तीन।

पहले एक ही टी0वी0 था और हम कई लोग एकसाथ मिलकर देख लेते थे। यह स्थिति तमाम सारे चैनल आने के बाद भी रही। अब..............

यह एक हमारे घर की ही नहीं, घर-घर की कहानी है। समझ नहीं आया कि ये समाज का, परिवारों का विकास है अथवा विघटन? यह हमारे संस्कार का क्षरण है अथवा चैनलों का संवर्धन? यह हमारी संकुचित मानसिकता का परिचायक है अथवा हमारे वैश्वीकरण का प्रतीक?

इतिहास को भुला कर हम दिखाना क्या चाहते हैं???

बहुत-बहुत भटके पर कोई और न मिला। नहीं जी, ये हमारे दिले नादान का हाल किसी प्रियतमा के लिए नहीं है, हाल ये है हमारा ब्लाग और समाज के चलन पर। आज का दिन कुछ विशेष है क्योंकि किसी विशेष का जन्मदिन है। सम्भवतः किसी को याद भी नहीं है?

किसी को तो याद है तभी तो ब्लाग पर चर्चा भी है। गम्भीर विषयों पर, साहित्य के विविध पहलुओं पर अपनी व्यापक मौलिक सोच रखने वाले कृष्ण कुमार यादव जी ने शब्दकार पर गणेश शंकर विद्यार्थी जी पर एक आलेख लिखा है। यह आलेख इस महान व्यक्तित्व के बारे में दर्शाता है, समझाता है।

इसी के साथ समझाता है समाज के सोचने का तरीका। समाज में तीव्रता से आगे बढ़ने का चलन है, अपने से आगे वाले को कुचल कर भी। इस भागादौड़ में हम अपने देश के शहीदों को भूलते जा रहे हैं, भुलाते जा रहे हैं।

इसके लिए दोषी भी हम और आप ही हैं। देश के महापुरुषों की बात तो बाद में करें, यदि पूछा जाये कि हम में से कितने हैं जिन्हें अपने परिवार के पुरखों के नाम मालूम हैं? हो सकता है कि बाबा-दादी के माता-पिता या उनके बाबा-दादी के नाम तो पता हों उसके पूर्व का इतिहास कतई पता नहीं होगा। जब यह स्थिति हमारे परिवार को लेकर है तो सोचा जा सकता है कि देश के लिए शहीद हो जाने वालों का पूरा विवरण कौन याद रखने की जहमत उठायेगा?

देश के इतिहास पर निगाह डालिए तो पता चलेगा कि देश पर कुर्बान होने वाले एक-दो तो शहीद थे नहीं, पर याद हमें कितने हैं? बहुत से तो ऐसे भी रहे जिनके बारे में ज्ञात ही नहीं हो सका, उनकी बात को छोड़ दें, पर वे जो ज्ञात हैं हम आज उन्हें कितना याद कर ले रहे हैं?

वर्तमान में जो पीढ़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के पैकेज के पीछे भाग रही है उसे महात्मा गाँधी, नेहरू, भगत सिंह आदि दो चार नामों के अलावा कुछ और मालूम नहीं होगा।

अभी पिछले दिनों अपने एक कार्य के दौरान कुछ स्नातक और परास्नातक छात्र-छात्राओं से मिलना हुआ। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उनमें से अधिकतर को पता ही नहीं था कि सरदार पटेल का पूरा नाम क्या है? उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री कौन थे? आजाद हिन्द फौज के अन्य जाबाँज कौन थे? और तो और हास्यास्पद स्थिति तो तब हो गई जब युवा पीढ़ी ने राजनीति में अपना आदर्श राहुल गाँधी जैसे युवा को बताया पर वे ये नहीं बता सके कि राहुल गाँधी के बाबा का नाम क्या है?

इसी तरह की स्थिति हमारे बुन्देलखण्ड क्षेत्र की है। पृथक बुन्देलखण्ड राज्य के लिए संघर्ष का दम भरने वाले युवा जानते ही नहीं हैं कि बुन्देलखण्ड के लिए अपनी जान लड़ा देने वाली रानी लक्ष्मीबाई मूल रूप से कहाँ की थीं? वे नहीं जानते कि छत्रसाल, अभई, आल्हा, ऊदल, कौन थे? उन्हें नहीं मालूम कि बुन्देलखण्ड के लिए अंग्रेजों से युद्ध करने वाले राजाओं और नवाबों में कौन-कौन बुन्देलखण्ड से था? इस तरह अपने इतिहास से कटकर यहाँ का युवावर्ग पृथक बुन्देलखण्ड राज्य का संघर्ष करने की बात करता है।

कदाचित यह स्थिति किसी एक भग या क्षेत्र की नहीं, कमोवेश सभी जगह की है, पूरे देश की है। हमारी सरकारों ने पाठ्यक्रमों से हमारे इस गौरवाशाली अतीत को पूरी तरह से हटा दिया है, जहाँ ऐसा नहीं हुआ है वहाँ ऐसा करने का प्रयास है। स्थिति यदि यही रही तो आने वाले दिनों की पीढ़ी सिर्फ अपने माता-पिता का नाम ही याद रख सकेगी, वो भी इस कारण से क्योंकि उसके शैक्षिक प्रमाण-पत्रों पर उनका नाम अंकित होगा।

22 अक्टूबर 2009

मंहगाई, मंदी के कथित दौर में इस रोजगार की तरफ भी ध्यान दिया जाये

यह आश्चर्यजनक हो भी सकता है और नहीं भी; यह विश्वास करने योग्य हो भी सकता है और नहीं भी पर आश्चर्यजनक भी है और विश्वास करने लायक भी। पहले आप लोगों के सामने स्पष्ट कर दें कि ये जो कुछ भी हमें बताया गया है वह इस शर्त पर कि नाम न छापा जाये, जगह का नाम न छापा जाये कुल मिला कर ये कि पहचान न जाहिर की जाये। हमारा भी उद्देश्य कोई ‘सबसे पहले हमने दिखाया’ की तर्ज पर टी0आर0पी0 को बटोरना नहीं था सो अगले व्यक्ति के विश्वास को पुख्ता रखते हुए सत्यता बताते हैं।
अपने देश के ही एक प्रदेश का रेल्वे स्टेशन है। इस रेल्वे स्टेशन पर एक भिखारी पिछले कई वर्षों से भीख माँग कर अपना और अपने परिवार का गुजारा कर रहा है। उसका परिवार भी है इस बात की जानकारी तो उससे बात करने के दौरान पता चली। अभी तक जिसने भी देखा और जो भी देखता है वह जानता है कि वह भिखारी अकेला ही है।
उस भिखारी के भीख माँगने का अंदाज कोई निराला नहीं है, किसी तरह की कोई अतिविशिष्ट शैली भी नहीं है, शारीरिक विकलांगता भी नहीं है। यदि उस भिखारी के पूरे व्यक्तित्व में विशेष है तो वह है उसका परिवार। आपको बतायें कि उसके परिवार में दो पुत्र और एक पुत्री है। दोनों पुत्र इंजीनियर हैं और बैंगलौर तथा मुम्बई में अपनी-अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ रह रहे हैं। पुत्री मेडीकल की पढ़ाई कर रहीं है वो भी परास्नातक की, एम0एस0 की, अभी अविवाहित है।
और भी आश्चर्य वाली बात ये कि जिस शहर में वो भिखारी है उस शहर में उसकी तीन कोठियाँ हैं प्रत्येक की लागत कम से कम पच्चीस-तीस लाख के आसपास होगी।
ऐसा नहीं है कि उसके बच्चों को उसके पेशे के बारे में पता नहीं है, पता है और दोनों पुत्र उसे साथ भी कई बार ले गये पर अपने पेशे के प्रति वफादार भिखारी सप्ताह भर टिकने के बाद घर बापस आ जाता है।
इस पूरे कारोबार का फंडा समझाते हुए उस भिखारी ने बताया कि दिन भर में स्टेशन से कम से कम सौ-सवा सौ ट्रेनें आती-जाती हैं। यदि एक दिन में औसत सौ ट्रेनों में से ही भीख मिले और वो भी प्रति ट्रेन मात्र दस रुपये तो एक दिन में गिरी हालत में एक हजार रुपये पैदा हो जाते हैं। स्टेशन वालों को, सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने वालों को भी खिला-पिला देने के बाद दिन का लगभग आठ सौ-नौ सौ रुपये बच जाता है। इस तरह से महीने भर की आमदनी???? गजब लगभग चौबीस-पच्चीस हजार रुपये!!!!!
अब बताइये इतनी आमदनी प्रतिमाह वाले व्यक्ति के बच्चे इंजीनियर और डाक्टर नहीं बनेंगे तो क्या अपने पिता की तरह भीख माँगेगे? मंहगाई भरे मंदी के कथित दौर में इस रोजगार की तरफ भी ध्यान दिया जाये।

20 अक्टूबर 2009

लगे रहो मुन्ना भाई....!!!!

‘लगे रहो मुन्ना भाई’ इस नाम से एक फिल्म आई थी बाद में यह शीर्षक ही प्रसिद्ध हो गया। बाहर कितना प्रसिद्ध हुआ यह तो पता नहीं पर हम दोस्तों के बीच आपसी हँसी-मजाक के दौर में यह एक जुमले की तरह इस्तेमाल होने लगा।
पिछले कुछ समय से हम अपने एक मंत्री महोदय को देख रहे हैं कि वे शिक्षा व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन कर देने के मूड में लग रहे हैं। आये दिन किसी न किसी नये सिद्धान्त की खोज कर लाते हैं और दे मारते हैं भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर।
पहले अंक हटाओ ग्रेडिंग लाओ का नारा लगाते हुए बोर्ड की परीक्षा में ग्रेड सिस्टम लागू किया और आज समाचार सुनने में आया कि अब आई0आई0टी0 के द्वारा इंजीनियर बनने के लिए इंटरमीडिएट में 80 प्रतिशत अंक लाने होंगे। वाह भई वाह! क्या बात है। एक तो लड़के को राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा पास करने का जोर और अब उस पर अधिक से अधिक अंक लाने की बाध्यता, मतलब टेंशन पर टेंशन।
एक बात और मंत्री जी ने यह नहीं बताया कि आरक्षण की मिठाई खा रहे या कहें कि लालीपाप चूस रहे लोग कितने अंक लायें कि वे इस राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा में बैठ सकेंगे? यह तो सीधे-सीधे तय है कि उन्हें 80 प्रतिशत अंक नहीं लाने होंगे।
देखा आने एक राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा और अंकों का आधार? इसे कहते हैं मारामारी। जो सामान्य अंक ला देगा वह घुसपैठ करेगा सामान्य अंक के विद्यार्थी की सीट पर और यदि अंक नहीं आ सके तो आरक्षण तो है ही। ठीक यही स्थिति रहती है प्रवेश को लेकर। अंक आयेंगे, कम आये तो आरक्षण है न। (ठीक वही धुन ‘मैं हूँ न’।)
चलिए एक ओर देश के काबिल नौजवान अधिक अंक लाने के लिए मरते फिरेंगे (इन्हीं में से कुछ टेंशन के कारण सच में ही मर जाते हैं) और कुछ होनहार आरक्षण के सहारे ही अपनी नैया पार करते दिखेंगे।
मंत्री जी के इस तरह के निर्णय और सरकार के आरक्षण सम्बन्धी कई अन्य निर्णयों पर वही दोस्तों के बीच वाला जुमला तैरता दिखता है ‘‘लगे रहो मुन्ना भाई’’।

17 अक्टूबर 2009

चलिए औपचारिकता में ही स्वीकारें दीपावली की शुभकामनायें





दीपावली की सभी को सभी लोग शुभकामनायें देने में लगे हैं। इस बार भी वहीं हो रहा है जो हर बार होता है। अपने शुभचिन्तकों को शुभकामनायें देना और उनसे लेना। शाम को पूजन और आतिशबाजी के दौर।
लोगों को शुभकामनायें देने-लेने में लक्ष्मी जी के आगमन की अपेक्षा, सुख-समृद्धि आने की कामना। रात को आतिशबाजी के माध्यम से धन का अपव्यय, जुए की चालों के द्वारा भी धन का जाना।
इस बार कुछ नया सा भी लगा है, हमें विशेष रूप से लगा है पता नहीं पहले भी ऐसा हुआ है या नहीं, मिठाई तथा अन्य खाद्य पदार्थों के नकलीपन से बचने के सन्देशों का भी आदान-प्रदान होना। हमें याद नहीं पड़ता कि इससे पहले के त्यौहारों पर हमने मिठाई आदि के नकली होने की आशंका व्यक्त की हो?
ऐसी स्थिति में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब हम अपने अंदर की कालिख को, अन्दर के अँधियारे को मिटा नहीं पाये हैं तो दूसरों के अँधेरों को मिटाने की कामना किस आधार पर कर रहे हैं?
हमने नकली खाद्य-सामग्री के रूप में दूसरों की सुख-समृद्धि को नष्ट करने का प्रयास कर लिया है तो कैसे किसी और के सुखी होने की कामना कर सकते हैं?
क्या-क्या कहा जाये, कितना-कितना कहा जाये? खुशियों के नाम पर हम लोगों को जहर दे रहे हैं। आतिशी उमंग अब हमें प्रफुल्लित नहीं करती वरन् आपसी रंजिश की ओर ले जाती है। ऐसी स्थिति में त्यौहारों की औपचारिकता का निर्वाह हम लोग कर लेते हैं।
चलिये इसी परम्परा निर्वहन के रूप में आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें (पता नहीं हृदय कहाँ है?)
अन्य लोगों की तरह आपके लिए भी सन्देश---

ज्यादा आतिशबाजी के द्वारा पर्यावरण को नुकसान न पहुँचायें।
नकली मिठाई एवं अन्य खाद्य पदार्थों से बचें।

(कल से तो पर्यावरण को नुकसान पहुँचाना ही है, मिठाई के साथ-साथ दूसरी चीजों में भी नकलीपन लाना है। अरे! जब हमारे व्यवहार में नकलीपन आ गया है और तो और अब तो खून भी मिलावटी बेचना शुरू कर दिया तो इन संदेशों का क्या अर्थ है? फिर भी औपचारिकता का निर्वाह तो करना ही है।)
शुभ दीपावली ----- शुभ दीपावली

15 अक्टूबर 2009

माइक्रो पोस्ट - पानी के लिए भटके फिरें......

बचपन में एक दोहा पढ़ रखा था-
रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे, मोती, मानुष, चून।।

आज का दोहा, इसी सन्दर्भ में-
मानुष पानी राखते, बिन पानी सब सून।
पानी को भटके फिरें, धरती हो या मून।।


14 अक्टूबर 2009

हाय! सबूत दिए पर काम न आए


सुबह-सुबह उठकर दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होने के बाद चाय के घूँट के साथ आदतन जैसे ही समाचार पत्र हाथ में उठाया तो एकाएक हँसी छूट गई। समाचार कोई हास्य से सम्बन्धित नहीं था किन्तु हँसाने के लिए पर्याप्त था। समाचार था ‘‘मुंबई हमला-26/11 के मास्टरमाइंड हाफिज सईद के खिलाफ दो मामले खारिज, पाक की पैंतरेबाजी बेनकाब’’

आपको लगेगा कि सुबह-सुबह शायद हमारा पेट साफ नहीं हो पाया होगा और बदहजमी के कारण ही हमें ऐसे समाचार पर हँसी आ गई होगी। जी हाँ, सही सोचा आपने, बदहजमी तो अब होने लगी है ऐसे ही समाचारों से। देखिये न कितनी मेहनत करके हमारे देश के सत्ताधारी महामनों ने पाकिस्तान को सबूत दिये और पाकिस्तान ने कुछ भी नहीं किया।

हाय! अब क्या किया जाये, सारी मेहनत मिला दी मिट्टी में। रोना तो ऐसे रोया जा रहा है कि जैसे पाकिस्तान कोई कार्यवाही करता तो हम तुरन्त संधि के बल पर आरोपी को भारत बुलाकर सजा सुना ही डालते।

सबूतों का रोना क्यों रोया जा रहा है? एक साहब पकड़े गये कसाब, मेहमाननवाजी करवाये जा रहे हैं। हो सकता है कि मानवाधिकार जैसे संगठनों के भक्तों को बुरा लगे किन्तु होना यह चाहिये था कि ताज हमले के समय जैसे बाकी आतंकी गोलियों का शिकार होकर ढेर हो गये, एक इस कसाब का भी वही हाल कर देना चाहिये था। पकड़ कर ले आये थे सबूत इकट्ठा करने के लिए। करो और करो।

अरे! अभी तक कौन सा पहाड़ खोद डाला सबूत इकट्ठा करने के नाम पर? कोई एक-दो बार का हमला तो है नहीं। अब तो उनका भी खाना हजम नहीं होता होगा बिना हमला करे और हमारा तो खाना हजम होता ही नहीं है उनसे बिना जूते खाये; बिना उनसे दोस्ती का राग आलापे।

हमने सबूत तब भी इकट्ठा किये थे जब संसद पर हमला हुआ था। हमने तब भी सबूत दिये जबकि मुम्बई में धमाके हुए। हमने अब भी सबूत दिये जबकि कसाब को पकड़े रखा है। इसके पहले भी बात-बात पर सबूत ही तो दिये हैं। यदि देखा जाये तो हम लोग एक संग्रहालय बना सकते हैं आने वाली पीढ़ी को यह दिखाने के लिए कि देखो हमने कितने सबूत एकत्र किये, कितनी बार हमले सहे फिर भी दोस्ती का राग आलापना नहीं छोड़ा।
बहरहाल ये विषय ऐसा है कि जिस पर जितना भी लिखवा लो कम है। बात समाचार से शुरू हुई थी और उसी समाचार-पत्र के एक दूसरे समाचार से समाप्त करेंगे। अपनी हँसी को दबाते हुए मुख्य पृष्ठ के समाचार पढ़े और समाचार-पत्र का पृष्ठ पलटा तो फिर हँसी छूटी। अबकी समाचार-पत्र बन्द करके सबसे पहले पता लगाया कि कहीं आज 13 अक्टूबर को हास्य दिवस तो नहीं है। समाचार था ‘भारत पाकिस्तान से दोस्ती चाहता है’ और यह बयान था हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी का। कहिये है न हास्य और साथ में विद्रूपता भी?

13 अक्टूबर 2009

गाँधी नाम की लूट है, लूट सके तो लूट


इसी दो अक्टूबर को महात्मा गाँधी को समर्पण प्रदर्शन के भाव से राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) के पूर्व महात्मा गाँधी जोड़कर उसे मनरेगा बना दिया गया है। अब लगता है कि काम कुछ तेजी से हो सकेगा। नरेगा के द्वारा किस हद तक भ्रष्टाचार फैल गया है इसको किसी आँकड़े के द्वारा दर्शाने की आवश्यकता नहीं है।

ग्रामीण क्षेत्रों में कैसे काम हो रहा है और किस तरह का काम कागजों पर दिखा कर किन्हें भुगतान किया जा रहा है यह सभी को भली-भाँति ज्ञात है। यहाँ सवाल नरेगा के तहत काम और उसकी गुणवत्ता पर सवाल खड़ा करना नहीं है। सवाल है कि क्या नाम बदलने मात्र से अब योजना कारगर ढंग से कार्य करने लगेगी?

महात्मा गाँधी का नाम ले-लेकर अभी तक राजनीति की जा रही है पर क्या उनके सिद्धांत कायम हैं? हर बार अक्टूबर से लेकर जनवरी तक (गाँधी जी के जन्म से मरण तक) सिवाय कोरी गप्प के कुछ भी नहीं होता है। जो लोग आज उनके विचारों की प्रासंगिकता को लेकर विमर्श करते देखे जाते हैं वे स्पष्ट रूप से यह जान लें कि अब उनके विचारों की कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई है। (यह वाक्य बहुत से कथित गाँधी भक्तों को चुभेगा)

सत्यता यही है, हमारा चिवार किसी तरह के विवाद को जन्म देना नहीं है पर आप सभी खुद इसका आकलन कीजिए और बताइये कि क्या वाकई गाँधी जी और उनके विचार आज प्रासंगिक हैं? यदि हैं तो फिर इस तरह की वैमनष्यता क्यों? नरेगा के नाम पर गरीबों से छल क्यों? मृत्योपरान्त भी व्यक्ति को कागजों पर जिन्दा दिखला कर उसके नाम से भुगतान करते-करवाते रहना किस मानवता का प्रतीक है?

गाँधी ने कभी यह नहीं कहा था कि किसी गरीब को भूखे पेट सोने दो और तुम खुद भरपेट सो जाओ। माना कि हम पूरी तरह से किसी का भला नहीं कर सकते पर जिस हद तक किसी का भला होता हो तो करने में क्या समस्या है? नरेगा के द्वारा हुआ यह है कि देश का भ्रष्टाचार देश की सबसे छोटी नागरिक इकाई (आम ग्रामीण) के पास भी पहुँच गया है। यह तो गाँधी जी का सिद्धान्त नहीं है? गरीबों, मजदूरों के साथ इस तरह की अमानवीय हरकत किसी भी रूप में महात्मा गाँधी के प्रति श्रद्धा नहीं दर्शाती है।

दलितों के नाम पर, अल्पसंख्यकों के नाम पर, जाति के नाम पर, धर्म के नाम पर देश में राजनीति करने वाले किसी महान व्यक्तित्व का अनुकरण क्या करेंगे। वोट के लिए किसी भी हद तक कुछ भी कर गुजरने वालों से इसी बात की आशा की जा सकती है कि वे किसी महापुरुष के जन्म दिवस पर, जयन्ती पर उसको श्रद्धासुमन अर्पित करना न भूलें। हालांकि भागादौड़ी, आपाधापी, स्वार्थमय जीवन शैली के कारण लगता है कि कुछ महापुरुषों की तरह शेष भी विस्मृत कर दिये जायेंगे।
काम जैसे चल रहा था वैसे ही चलता रहेगा। आम आदमी यही कहता घूमेगा, भटकेगा-‘‘कोऊ नृप होये हमें का हानि, बेचो दूध मिला के पानी।’’

06 अक्टूबर 2009

कंक्रीट के जंगल में कुछ सुखद क्षण

पिछले कई दिन व्यस्तता भरे निकले। पहले हमारे मित्र डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव द्वारा आयोजित किये गये राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी में व्यस्त रहे उसके बाद अपने पारिवारिक कार्यक्रम में। परिवार में कोई विशेष समारोह आदि नहीं था बस हमारी छोटी बहिन और बहनोई मुम्बई में रह रहे हैं। विगत तीन वर्षों से उनका हमको मुम्बई बुलाने का काम होता रहा और हम यहाँ अपने आप में ‘बिजी विदाउट वर्क’ के फंदे में फंसे रहे।


(मेरीन ड्राइव की सैर, पत्नी और बिटिया के संग)

इस बार मौका लगाया और परिवार सहित अपने मित्र सुभाष के साथ मुम्बई यात्रा पर निकल पड़े। यात्रा बड़े ही आराम से हुई। छुट्टियाँ कम होने के कारण मुम्बई का दो-तीन दिनों का कार्यक्रम था। यह भी विचार करना था कि मोहित (हमारे बहनोई) को भी अपने काम से ज्यादा छुट्टियाँ न लेनी पड़ें।

(मित्र सुभाष, सफ़ेद शर्ट में; बहनोई मोहित, बहिन पूजा, पत्नी बच्ची को लिए गेट वे ऑफ़ इंडिया पर)


दो-चार जगह घूमे फिरे, मंदिर भी गये, समुद्र भी देखा। गेटवे आफ इंडिया को खड़ा पाया तो ताज होटल के घाव भी देखे। इसके अलावा माल संस्कृति का भी नजारा लिया। देश का सबसे बड़ा माल कहलाने वाले आरबिट में भी घूमा फिरी की। मुम्बई में भ्रमण के समय इमारतों का जंगल देखने को मिला। पुरानी भव्य इमारतें तो नई अत्याधुनिक तकनीक को दर्शातीं इमारतें। पत्थरों का कलात्मक प्रदर्शन तो काँच की सुंदर जगमगाहट।

(प्रसिद्द मॉल ऑर्बिट इसे देश का सबसे बड़ा मॉल कहते हैं)

समुद्र को बाँधते पुल, सड़कों का बोझ ढोते ओवर ब्रिज, घरों की नई परिभाषा रचतीं मल्टी स्टोरी बिल्डिंग्स, औद्योगीकरण, वैश्वीकरण का प्रदर्शन करते जगमगाते माल, दुकानें, भीड़ को अपने में समातीं लोकल ट्रेन और बसें, दौड़ते-भागते लोग, मशीनी जीवन आदि-आदि सभी कुछ यहाँ देखने को मिला। इस चकाचैंध के बीच असल जिंदगी भी दिखाई दी। झुग्गी-झोपड़ी में जीवन तलाशते लोग। भेलपूरी, पावभाजी, बड़ापाव आदि बेच कर अपना गुजारा करते लोग। लगा कि मुम्बई कंक्रीट का एक भव्य जंगल है जहाँ हर कोई अपने जीवन को गुजर-बसर के लिए ही जिये जा रहा है।

हाँ, ऐसे लोग भी हैं जो जीवन को जिन्दगी की तरह से जीते दिखे। अभावों से दूर, धन की, शानो-शौकत की जिन्दगी जीते लोग।

मुम्बई घूमना कम और अपने परिवार के एक अंग से मिलना ज्यादा था। नवी मुम्बई में बने उस निवास से भी प्रकृति का नजारा मन को बराबर लुभाता रहा। हरे-भरे पहाड़, छोटे-छोटे झरने, आसपास तैरते काले-काले बादलों ने एक पल को तो यह भी भुला दिया कि ये मुम्बई है।

(नवी मुंबई में घर के पास का प्राकृतिक दृश्य)

इसी तरह मुम्बई-पुणे एक्सप्रेस वे ने भी प्रकृति को बहुत ही पास से देखने का मौका दिया। खंडाला, लोनावला के आसपास स्थित हरे-भरे पहाड़, हाथ की पहुँच में तैरते बादल इस बात का आभास ही नहीं होने दे रहे थे कि हम मुम्बई में हैं।

(मुंबई-पुणे एक्सप्रेस वे पर प्रकृति का विहंगम दृश्य, बहिन, पत्नी और बिटिया के साथ)
बहरहाल कंक्रीट के जंगल में इस तरह की हरियाली ने मन को सुकून भी पहुँचाया।