29 जुलाई 2026

तकनीकी दौर में भी गुरु की प्रासंगिकता

 

भारतीय संस्कृति में आदिगुरु के रूप में पूजनीय महर्षि वेद व्यास के जन्मदिन के रूप में मनाया जाने वाला पर्व गुरु पूर्णिमा हमारी महान ज्ञान परम्परा के स्मरण का पवित्र अवसर है. भारतीय संस्कृति में अनादिकाल से गुरु-शिष्य परम्परा का गौरवशाली स्थान रहा है. इसी कारण से अज्ञानता के अंधकार को चीरकर मानवता को विवेक-मुक्ति का मार्ग दिखाने वाले गुरुओं के सम्मान में आषाढ़ मास की पूर्णिमा को श्रद्धा और उल्लास के साथ गुरु पूर्णिमा पर्व मनाया जाता है.

 

भारतीय संस्कृति में ज्ञान को एक तरह की ऊर्जा के रूप में परिभाषित किया गया है. भारतीय मनीषियों ने इसे जीवन की समग्रता को जानने-समझने की एक प्रक्रिया माना है. इसे ऐसी चेतना बताया है जो गुरु मुख से शिष्य के हृदय की ओर संचरित होती है. गुरु-शिष्य की इस परम्परा में ज्ञान और आचरण में किसी तरह का विभेद स्वीकारा नहीं गया है. कथनी और करनी में विभेद न होने को ही शिक्षा माना गया है. गुरु-शिष्य परम्परा के कारण भारतीय संस्कृति में गुरु का सम्मान सामाजिक शिष्टाचार के रूप में स्वीकार्य नहीं रहा है बल्कि इसे आध्यात्मिक साधना के रूप में स्वीकारा गया है. गुरुब्रह्मा गुरुविष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः, गुरुः साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः के रूप में यह बताया गया है कि समस्त शक्तियों का ज्ञान और उनका बोध कराने वाला माध्यम गुरु ही है और ऐसा माध्यम ईश्वर से भी उच्च पद पर है. गुरु ही है जो इंसान के भीतर की कुंठा, अहंकार, अज्ञानता, लालच, विद्वेष आदि को समाप्त करता है. उसके ऐसे परिष्करण से ही किसी भी शिष्य की आंतरिक प्रतिभा पूर्ण रूप से प्रस्फुटित होने लगती है.

 

समय के साथ गुरु-शिष्य परम्परा में भी परिवर्तन देखने को मिले हैं. इक्कीसवीं सदी के संदर्भ में देखें तो सम्पूर्ण विश्व तकनीकी विकास, उपभोक्तावाद, वैश्वीकरण आदि के दौर से गुजर रहा है. आज का युग सूचनाओं का युग बन गया है. इंटरनेट, गूगल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आदि के इस दौर में ज्ञान किसी एक व्यक्ति के अधिकार क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा है. हर हाथ में डिवाइस ने एक क्लिक पर व्यक्ति के सामने वैश्विक जानकारी का भंडार लगा दिया है. यहाँ यह समझना बहुत आवश्यक है कि हमारे सामने एक क्लिक पर जानकारी आ रही है अथवा ज्ञान? हमें इस तकनीकी रफ़्तार वाले युग में यह भी समझना होगा कि उँगलियों के सहारे स्क्रॉल करती जानकारी हमारे लिए वाकई लाभकारी है अथवा हम अनावश्यक जानकारियों का भंडार-गृह बनते जा रहे हैं? तकनीकी के बदलते दौर में, शिक्षा के बदलते आयामों के युग में लोगों के मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या इस तकनीकी युग में गुरु की प्रासंगिकता शेष है?

 

इस प्रश्न के उत्तर के पूर्व हम सभी को वर्तमान सन्दर्भों में सूचनाओं का, आँकड़ों का सुलभता से मिलना और उसके उपयोग के बारे में सोचना, विचार करना पड़ेगा. भले ही तकनीकी माध्यमों से सूचनाएँ, आँकड़े, जानकारियाँ कितनी भी सुलभता से क्यों न उपलब्ध हो जाएँ किन्तु वे कभी भी ज्ञान का, बोध का का स्थान नहीं ले सकती हैं. अब जबकि मशीनी तकनीकी से जानकारियाँ तो उपलब्ध हो जा रही हैं मगर उनके उपयोग पर, उनके समायोजन पर, व्यक्ति के समन्वय पर, इंसानी चरित्र पर सवालिया निशान तो लग ही रहे हैं. तीव्र तकनीकी विकास के चलते जिस तरह से आज का युवा उन्मादित होकर भटकता; सोशल मीडिया के भ्रामक मायाजाल में फँसा हुआ; एकाकीपन से भरा हुआ; मानसिक अवसाद से गुजरता हुआ; तनाव से जूझता दिख रहा है तब वास्तविक गुरु की आवश्यकता और अधिक महसूस होने लगी है.

 

आज शिक्षा व्यवस्था को एक व्यावसायिक उत्पाद बना दिया गया है; शिक्षण संस्थानों को पाठ्यक्रम पूरा करवाने और डिग्री बाँटने का केन्द्र बना दिया गया है; चरित्र निर्माण, मूल्य-शिक्षा, नैतिकता, समन्वय, भावनात्मकता आदि का लोप होता दिखने लगा है तब समझ आ रहा है कि आधुनिक शिक्षा प्रणाली ने केवल सफल व्यक्ति बनाने का प्रयास किया है न कि संवेदनशील मनुष्य बनाने का. ऐसे व्यावसायिक दौर में गुरु-शिष्य का पवित्र रिश्ता विक्रेता और क्रेता के रूप में बदलता जा रहा है. कोचिंग संस्थानों, शिक्षा के बाजार ने सम्बन्धों की, रिश्तों की मर्यादा को, गरिमा को नष्ट कर दिया है. इस विकृति के बीच गुरु पूर्णिमा का पर्व मूल जड़ों की ओर लौटने की प्रेरणा देता है. यह पर्व हमें इस बात का भी एहसास कराता है कि भारतीय संस्कृति में केवल मनुष्य को ही गुरु के रूप में नहीं स्वीकारा गया है बल्कि प्रकृति, जीव-जन्तु, घटनाओं आदि को भी गुरु रूप में स्वीकारा गया है.

 

आज के डिजिटल युग में गुरु को वेदों, शास्त्रों, पौराणिक ग्रंथों के ज्ञाता  के रूप में नहीं बल्कि एक मार्गदर्शक, परामर्शदाता, जीवन-प्रशिक्षक की भूमिका में देखने की आवश्यकता है. समय बदलने के साथ-साथ गुरु का स्वरूप, उसकी भूमिका में भी परिवर्तन लाने की आवश्यकता है. आज भले ही ऑनलाइन माध्यमों से शिक्षण कार्य सम्पन्न होने लगा हो किन्तु यह समझना होगा कि तकनीकी प्रगति के बीच भी गुरु-शिष्य के बीच का मानवीय रिश्ता, संवेदना, नैतिक ऊर्जा का संस्कार विलुप्त न हो पाए. एक वास्तविक गुरु केवल विषयों को पढ़ाने का काम नहीं करता है बल्कि वह विद्यार्थियों के मन में उठने वाले संशयों का शमन करता है. अपने शिष्यों को सही और गलत के बीच का भेद समझा कर संकटकाल में नैतिक संबल प्रदान करता है. वर्तमान सन्दर्भों में ऐसे गुरुओं की आवश्यकता है जो तकनीकी कौशल के साथ-साथ करुणा, सहानुभूति, सहनशीलता, सहयोग, सामाजिक उत्तरदायित्व आदि जैसे मानवीय मूल्य भी सिखाएँ.

 

कह सकते हैं कि गुरु पूर्णिमा का पर्व अतीत की वंदना करने का ही नहीं बल्कि भविष्य के प्रति संकल्पित होने का दिन भी है. यह पर्व हमें याद दिलाता है कि भले ही युग बदल जाए, तकनीक विकसित हो जाए, जीवन की प्राथमिकताएँ बदल जाएँ परंतु मानव जीवन में गुरु की आवश्यकता सदैव रहेगी. व्यक्ति को सही दिशा देने के लिए एक प्रकाशपुंज, मार्गदर्शक, गुरु का होना अनिवार्य है. जब तक समाज में अज्ञान, द्वेष, अहंकार, भटकाव आदि रहेगा तब तक गुरु की प्रासंगिकता भी रहेगी.

26 जुलाई 2026

ध्यान देना कि तुम्हारा कोई मित्र अकेला न हो जाए

नीट के कारण प्रोटेस्ट शुरू हुआ,

नीट पेपर लीक के चलते जान गँवाने वाले बच्चों के लिए प्रोटेस्ट किया गया,

इस्तीफ़ा भी हो गया.

 

अभी नीट का रिजल्ट आया है, सफल बच्चों को प्रवेश नहीं मिला है. NTA द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार NEET UG 2026 में कुल 11.21 लाख (11,21,185) बच्चों ने क्वालीफाई किया है. इन सभी बच्चों को MBBS में प्रवेश तो नहीं ही मिलेगा क्योंकि इसकी सीटें एक-सवा लाख के आसपास हैं.

 

अब प्रोटेस्ट समर्थक लोग सजग होकर इस तरफ़ ध्यान दें कि प्रवेश न मिल पाने के कारण कोई बच्चा अपनी जान न गँवाए. अभी पेपर लीक जैसे राक्षस ने कुछ बच्चों को निगल लिया, अब दूसरा राक्षस मुँह खोले खड़ा है. आरक्षण के चलते बहुत से योग्य बच्चे प्रवेश से वंचित होंगे, अब इनकी सुरक्षा करनी होगी, उनके आत्मबल को बढ़ाना होगा.

 

प्रोटेस्ट में उछलते, कूदते, सरकार को गाली देते, सुरक्षा कर्मियों को पीटते बच्चो…. अब अपने साथियों पर ध्यान देना. नेतागीरी करने वाले अपनी रोटियाँ सेंककर निकल लिए. ध्यान देना कि तुम्हारा कोई मित्र अकेला न हो जाए; हताश-निराश होकर कोई ग़लत कदम न उठा ले


25 जुलाई 2026

बात को समझो

आरक्षण विरोधी नेताओ, तुमको एक रास्ता दिखा दिया गया है इस उत्पाती आन्दोलन के द्वारा निकले इस्तीफे से. सरकार ने एक इशारा कर दिया है कि उत्पात के द्वारा भी समाधान हो सकता है. यदि एक इस्तीफ़ा हो सकता है तो आरक्षण भी हट सकता है. यदि नीट पेपर लीक के कारण जान गँवाने वाले बच्चों को इस्तीफ़े का आधार बनाया जा सकता है तो बहुत से प्रतिभाशाली बच्चों ने आरक्षण के कारण जान गँवाई है, इसे भी आरक्षण समाप्ति का आधार बनाया जा सकता है.

 

जंतर-मंतर के हंगामे से, इस इस्तीफे से न तो पेपर लीक की घटनाएँ रुकनी हैं, न शिक्षा व्यवस्था में कोई बहुत बड़ा सुधार होने वाला है. हाँ आरक्षण को लेकर एक और आन्दोलन शुरू करने का अवसर मिल गया.

विचार करो अब पूरे घटनाक्रम पर, पिछले कुछ बयानों पर तब दिखाई पड़ेगा कि जहाँ तुम लोगों का सोचना बंद होता है, उससे कहीं आगे जाकर अगले का सोचना शुरू होता है.

 

समझे…???

 


23 जुलाई 2026

मिली भगत की आशंका

जंतर मंतर पर सीजेपी का धरना-अनशन कार्यक्रम शुरू होने के तीन-चार दिन बाद से ही हम ये विचार कर रहे थे कि यहाँ सबकुछ हो रहा है पर इनका हुल्लड़ नहीं हो रहा है. हमें इसलिए ऐसा लग रहा था क्योंकि हमारा व्यक्तिगत विचार ये है कि यह सब कुछ तमाम राजनैतिक दलों और सरकारी तंत्र की मर्जी से ही हुआ है.

 

ग़ौर करिए, अनशन करते वांगचुक को हॉस्पिटल भेजना रहा हो, संसद तक मार्च करना रहा हो आदि संसद के मानसून सत्र के ठीक पहले हुआ. मिलीभगत से चलने वाले आन्दोलन से राजनैतिक शून्यता की तरफ़ जाते नेताओं को संजीवनी मिली, एथेनॉल, मंदिर चढ़ावा चोरी से लोगों का ध्यान भटका, नेता जी और चढ़ावा चोरी अभियुक्त के बीच 900 से अधिक कॉल का मामला छिप गया, दल-बदल को लेकर किसी तरह का कोई मसला न रहा, हंगामे के बीच पेपर लीक और इस्तीफ़ा भी बौना नजर आने लगा.

 

हमारे व्यक्तिगत विचार में बहुत सी बातें हैं जिन पर यहाँ की बजाय अपने ब्लॉग पर लिखेंगे. अब ये मंच जोकरों का, बददिमाग़ों का, संकुचितों का अड्डा बनता जा रहा है, जहाँ सबके सब अपनी ही व्यक्तिगत कुंठित सोच के सहारे प्रत्येक परिदृश्य को देखने लगे हैं. यदि आप लोगों ने ग़ौर किया हो तो हंगामा करने वाले नेतागीरी करते हुए पुलिस बल पर हावी हुए और पिट गए वे मासूम बच्चे जो शिक्षा व्यवस्था को सुधारे जाने का ख्वाब लेकर आए थे. आंदोलनकारियों का एक मुखिया सेहत के नाम पर हॉस्पिटल में, एक बर्गर खाने के आरोप में बाहर, एक मंत्री से मिलने की बेताबी में अलग.

 

बात इतनी भी नहीं, यदि विपक्षी दल वाक़ई में कोई बदलाव चाहते तो एकजुट रहते मगर नहीं. सभी इस आन्दोलन का लाभ लेने की मंशा में एकदूसरे पर ही आरोप लगाने लगे. दो दलों ने तो इसे भाजपा-कांग्रेस की मिलीभगत बता दिया क्योंकि युवराज ने आकर सबको पीछे कर दिया. सोचिए आप लोग ख़ुद के व्यवहार पर. हम-आप इन राजनैतिक दलों की कठपुतली मात्र हैं. हमारी-आपकी सोच से कहीं आगे जाकर ये सोचते-काम करते हैं. ये सब एक हैं और यदि आपस में कोई दुश्मन है तो हम और आप ही.

 

विचार करियेगा.


22 जुलाई 2026

शब्दों का भटकाव

सम्भवतः आप सभी को ‘शब्द विस्तार’ और ‘शब्द संकुचन’ का अर्थ और उदाहरण की जानकारी होगी.

इसके अलावा अभिधा, लक्षणा, व्यंजना के बारे में बहुत से लोगों ने पढ़ा होगा.

 

उक्त दो के बारे में जानकारी न होने के कारण लोग भटक-भटक कर न जाने कहाँ पहुँच जा रहे हैं. इसी तरह कुछ शब्द अपने आपमें ही एक पहचान बन जाते हैं और व्यक्ति अपनी मानसिक संकुचन की स्थिति में उस शब्द की पहचान के इर्द-गिर्द डोलता-भटकता रहता है. इसे ऐसे समझें कि हमारे आसपास में एक हैं जिनको किसी कारणवश ‘बंदरवा’ से कभी सम्बोधित किया गया था. स्थिति ये है कि आज भी यदि बंदरवा बोल दें तो सब उसी एक व्यक्ति से इसका अर्थ जोड़ देते हैं.

 

कुछ इसी तरह से कल से कुछ भटकन हमारी एक पोस्ट पर है. समझ नहीं पा रहे हैं कि कल को इनकी नाली में, किचेन की सिंक में, बाथरूम के कोने में, बरामदे में ‘कोई विशेष जीव’ टहलता दिखेगा तो ये भटकते लोग क्या कहेंगे, क्या करेंगे? जिस विशेष जीव का नाम वर्ग विशेष के लोगों की भावनाओं को आहत न होने देने के कारण नहीं लिख रहे हैं, उस विशेष जीव को पालेंगे-पोसेंगे या फिर वही ट्रीटमेंट देंगे, जो उसे हमेशा से दिया जाता रहा है? मानसिकता को, दृष्टि को कम से कम इतना तो खुला रखना चाहिए कि भटकने के बाद भी सबकुछ समझ आए, साफ़ दिखे.


20 जुलाई 2026

हाथ अगरबत्ती, पैर मोमबत्ती...

कॉलेज टाइम में सींकिया टाइप लौंडों को रंगबाजी दिखाते समय काव्य-पंक्तियाँ स्वतः ही उभरती थीं....

"हाथ अगरबत्ती,

पैर मोमबत्ती,

सीना संदूक,

गाँ@@ बन्दूक,

......

......"

आज ये पंक्तियाँ फिर अनायास ही उभर आईं, जब कोकरोचों के विरोध प्रदर्शन में देखने-सुनने को मिला कि संसद को उखाड़ देंगे, देश को नेपाल बना देंगे, प्रधानमंत्री को संसद में घुस कर मारेंगे, रंडुओं को देश कैसे दे दिया आदि-आदि. ऐसे विचार रखने वाले कथित प्रेशर ग्रुप के सामने शिक्षा मंत्री का ही क्या, किसी छात्र-संघ के पदाधिकारी का भी इस्तीफ़ा नहीं होना चाहिए. विपक्षी दलों की चाल एक बार फिर सरकारी दृढ़ता के सामने विफल हुई, ये अच्छी बात है. कम से कम पढ़े-लिखे लोगों को इस बात को समझना चाहिए.

 

एक तरफ इसरो जैसी सरकारी, स्थायी नौकरी को छोड़कर 35-36 वर्ष के दो युवकों ने अन्तरिक्ष में अपनी उड़ान को सिद्ध किया, दूसरी तरफ ऐसे युवा हैं जिनको कोकरोच बने रहने में गर्व हो रहा है; संसद उखाड़ने के मंसूबे हैं; देश को नेपाल बनाने की मानसिकता है. ऐसे युवाओं में पुलिस की लाठी के साथ-साथ जनमानस के जूते भी पड़ने चाहिए थे.

 

इन्हीं के लिए फिर कहेंगे...

"हाथ अगरबत्ती,

पैर मोमबत्ती,

सीना संदूक,

गाँ@@ बन्दूक,

......

19 जुलाई 2026

प्रेरणास्रोत हैं ये दो युवा

युवाओं के लिए आदर्श होने चाहिए ये दो युवा और इनकी पूरी टीम.

 

स्काईरूट एयरोस्पेस के द्वारा 'विक्रम-1' को 18 जुलाई 2026 को प्रक्षेपित किया गया. यह भारत का पहला पूर्णतः निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल रॉकेट है. श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से इसका सफल परीक्षण किया गया. इसके पहले स्काईरूट का पहला ऐतिहासिक सब-ऑर्बिटल मिशन विक्रम-एस था. इसे 18 नवंबर 2022 में 'प्रारंभ' नामक मिशन के अंतर्गत प्रक्षेपित किया गया था. इस प्रोजेक्ट ने भारत के निजी स्पेस सेक्टर के लिए रास्ते खोले थे.

 

आपको बताते चलें कि स्काईरूट एयरोस्पेस के संस्थापक इसरो के दो पूर्व युवा वैज्ञानिक पवान कुमार चंदना (उम्र- 35 वर्ष) और नागा भरत डाका (उम्र- 36 वर्ष) हैं. उन्होंने 2018 में हैदराबाद स्थित प्राइवेट स्पेस स्टार्टअप की शुरुआत की थी.

 

एक ये ज़ेन-जी हैं और एक वे हैं जो कॉकरोच बने घूम रहे हैं.

 


14 जुलाई 2026

अनावश्यक युद्ध में घिरी वैश्विक व्यवस्था

अमेरिका और ईरान के बीच चले आ रहे तनाव का अंत दिखता नहीं है. वर्तमान परिदृश्य में इनके युद्ध ने समूचे विश्व की नींद उड़ा रखी है. दोनों देश कभी युद्ध में होते हैं तो कभी कूटनीतिक प्रयास में लगे होते हैं. कभी युद्धविराम जैसी स्थिति सामने आती है लेकिन यह स्थायी रूप में नहीं रहती है. युद्धविराम के कुछ दिनों बाद पुनः वही युद्ध का माहौल नजर आने लगता है. दोनों देश अपनी-अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने लग जाते हैं. युद्धविराम का होना और फिर अचानक से युद्ध; एक अस्थायी युद्धविराम और फिर वही दुश्मनी; एक तरह का अनावश्यक युद्ध. आखिर इस युद्ध का मतलब क्या है? यदि युद्ध ही करते रहना है तो थोड़े-थोड़े अन्तराल पर युद्धविराम जैसे कदम क्यों उठाये जाते हैं?

 

अमेरिका और ईरान युद्ध के पीछे उनकी आंतरिक राजनीति, उनका लम्बा संघर्षमय इतिहास समझ आता था. इसमें 1979 की इस्लामिक क्रांति के पश्चात् ईरान ने स्वयं को अमेरिकी विरोधी घोषित कर दिया था. ऐसा करना उसकी शासन व्यवस्था की वैचारिक नींव था. इसी तरह अमेरिका अपने रणनीतिक हितों के लिए महत्वपूर्ण तेल मार्गों पर अपना नियंत्रण रखना चाहता था. इन दोनों के अपने-अपने निजी मकसद होने के कारण वर्तमान में चल रहे इस युद्ध का कोई स्पष्ट सैन्य मकसद नहीं है. यही कारण है कि दोनों देश बजाय एक-दूसरे को जीतने के, एक-दूसरे को अपनी सैन्य क्षमता दिखा रहे हैं. अब यह युद्ध स्वयं को सर्वोच्च सिद्ध करने की लड़ाई बन गया है. अमेरिका भले ही दिखावे के लिए यह चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह बंद कर दे किन्तु उसका मूल मकसद तेल मार्ग पर अपना नियन्त्रण स्थापित करना है. इसी तरह ईरान स्वयं को महाशक्ति के रूप में स्थापित करने के लिए अमेरिकी साम्राज्यवाद को नकारता रहता है.

 



दोनों देशों के अपने-अपने नितांत निजी, व्यक्तिगत मकसद होने के कारण यह युद्ध रुकता रहता है, चलता रहता है. दोनों देशों के मध्य युद्धविराम की घटनाओं को देखकर ऐसा आभास होता है कि जैसे ही दोनों में से किसी को भी यह एहसास होता है कि हमले खुद के लिए ही हानिकारक बने हुए हैं तो वे स्वतः ही युद्ध से अपने-अपने को पीछे खींच लेते हैं. ये और बात है कि वैश्विक परिदृश्य में इसे युद्धविराम के रूप में देखा जाने लगता है. तात्कालिक मुद्दों के आधार पर, अपनी-अपनी स्थिति के आकलन के आधार पर बनी व्यवस्था के आधार पर युद्धविराम तो होता है किन्तु किसी तरह की दीर्घकालिक व्यवस्था न होने के कारण युद्धविराम टिक नहीं पाता है. देखा जाये तो दोनों देशों के बीच मतभेद की मूल समस्याओं का कोई ठोस समाधान नहीं निकाला जाता है; परमाणु कार्यक्रम, विस्तारवादी नीति आदि का बना रहना दोनों के लिए ही समस्या बना रहता है. ऐसे में युद्धविराम अस्थायी रूप धारण कर लेता है. किसी भी बिंदु पर टकराहट का, मतभेद का अवसर मिलते ही दोनों देश अपनी-अपनी ताकत का प्रदर्शन करने लगते हैं.  कभी परमाणु कार्यक्रम के नाम पर, कभी तेल मार्ग होर्मुज़ के नाम पर, कभी तेलवाहक जहाजों के नाम पर युद्ध का दुष्चक्र चलता ही रहता है. ऐसे में लगता है कि इन दोनों देशों का उद्देश्य युद्ध जीतना नहीं है, दूसरे को हराना नहीं है बल्कि सामने वाली शक्ति को कमजोर करते हुए खुद को वर्चस्ववादी साबित करना है. अपने आपको अपने देश के नागरिकों के सामने एक हीरो के रूप में पूरी मजबूती के साथ दिखाना है.

 

इन दोनों देशों के अहं के कारण, इस अनावश्यक संघर्ष के कारण से आज पूरा विश्व एक अभूतपूर्व संकट से घिरा हुआ है. इनके बीच चलते युद्ध का सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है और इसके केन्द्र में कच्चे तेल का बना होना है. दुनिया के कुल कच्चे तेल उत्पादन का बहुत बड़ा भाग मध्य पूर्व द्वारा नियंत्रित किया जाता है. इन दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने के कारण फारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (जलडमरूमध्य) जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर खतरा मंडराने लगता है. इन रास्तों से दुनिया का लगभग एक-तिहाई तेल गुजरता है. ऐसे में युद्ध के कारण यहाँ से कच्चे तेलवाहक जहाजों का आवागमन बाधित होता है और वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगती हैं. तेल का मँहगा होना अर्थात परिवहन, विनिर्माण, दैनिक उपयोग की वस्तुओं आदि की कीमतों में वृद्धि हो जाना. यह स्थिति किसी भी विकासशील अथवा गरीब देश के लिए किसी आपदा से कम नहीं होती है. यह युद्ध भले हो दो देशों के मध्य नजर आ रहा है किन्तु ऐसा है नहीं. इसमें कई वैश्विक और क्षेत्रीय ताकतें भी किसी न किसी रूप में शामिल हैं. इस कारण से इस युद्ध के द्वारा किसी तीसरे विश्व युद्ध की आहट लगातार गूँजती ही रहती है. इन दोनों देशों  के मध्य के हमले, मिसाइलों, ड्रोनों का सञ्चालन पूरी मानवता के लिए खतरनाक नजर आते हैं. इसके चलते अनेक देशों का खर्च अपने नागरिकों के जीवन-यापन पर व्यय होने के बजाय हथियारों की खरीद में व्यय होने लगता है. हथियारों की इस अंधी दौड़ ने पूरे विश्व को असुरक्षित बना दिया है.

 

आज जब वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन, भुखमरी, आपदाएँ, बीमारियाँ, आर्थिक असमानता आदि जैसी वास्तविक चुनौतियाँ हैं, जिनसे सबको मिलकर लड़ना चाहिए, तब पूरा विश्व किसी बड़े वैश्विक तनाव के साये से गुजर रहा है. यह युद्ध उदाहरण है राजनीतिक हठधर्मिता का, अनावश्यक अहं का, आपसी अविश्वास का, साम्राज्यवादी मानसिकता का. इस तरह के अनावश्यक कदमों से किसी भी देश का भला नहीं होने वाला है, किसी भी देश के नागरिकों का हित नहीं होने वाला है. काश कि ये दोनों देश भी इस बात को समझ लें कि इस युद्ध का अंतिम परिणाम जय-पराजय के रूप में नहीं निकलना है. इसलिए वैश्विक शांति के लिए एक स्थायी विकल्प तलाशा जाये. जब तक शांति का स्थायी स्वरूप निर्मित नहीं होता है, तब तक यह अनावश्यक नाटक चलता रहेगा. वैश्विक व्यवस्था, निर्दोष नागरिक, निरीह मानवता इसकी कीमत चुकाती रहेगी.

 


12 जुलाई 2026

वृक्षारोपण में गणित

आज शाम एक ऐसे परिचित मिले जो बात-बात पर कटाक्ष करने की आदत से भरे-पूरे हैं. मिलते ही बिलबिलाये कि आज तुम्हारे कॉलेज में कितनी संख्या में पौधारोपण हुआ?

 

हम समझ रहे थे कि ये सवाल उनके मुँह से काहे निकल भागा है. बिना रुके अगले ही पल उनके मुँह पर ही जवाब दे मारा कि सत्तर हजार.

 

जवाब सुनते ही महोदय एकदम सन्न रह गए. इसकी भी एक वजह ये थी कि वे लालबुझक्कड़ के चिलगोजों में शामिल हैं. उनकी हालत देखकर और उनको किसी आपदा में जाने के पहले ही बताया कि हम ठहरे विज्ञान-गणित के विद्यार्थी.... बड़े से बड़े सवाल 'मान' लेने भर से निपटा दिए, बड़ी से बड़ी प्रमेय भी इसी 'मान' ने हल करवा दीं, सो यहाँ भी मान लिया कि एक गड्ढा बराबर एक हजार पौधे. इस हिसाब से सत्तर गड्ढों में सत्तर हजार पौधे लगे.

 

कुछ खिसियाकर इधर-उधर की पटकना शुरू किया उन्होंने तो कहा कि ज्यादा न बकबकाओ.... न तो कोष्ठक में बंद करके शून्य से गुणा कर देंगे.

 

बेचारे खी-खी करके भागते नजर आये.

 


11 जुलाई 2026

मूड फ्रेश करने वाली सीरीज

आम तौर पर फिल्म/वेब सीरीज देखना न के बराबर होता है. महीनों के हिसाब से देखना होता है. इधर कई महीने बाद मित्रों के कहने पर और मोबाइल पर आती रील्स को देखकर एक वेब सीरीज 'प्रीतम एंड पेड्रो' देखने का मौका निकाला. मित्रों ने इस सीरीज के केन्द्र में रखी गई 'साइबर एक्टिविटी' को देखने के कारण ही हमसे भी इसे देखने को कहा. चूँकि फिल्मों/वेब सीरीज का देखना न के बराबर होता है, इसीलिए इन पर लिखना भी न के बराबर होता है. साइबर के नाम पर बनी इस सीरीज को देखने के बाद लगा कि बच्चे के अपहरण की घटना को आड़ बनाकर साइबर एक्टिविटी को जबरिया ठूँसा सा गया है. 


असल बात जो हमें बतानी है वो ये कि सीरीज तो मंत्री के बेटे 'बिन्नी' के अपहरण  के दस मिनट बाद ही निपट जाती मगर दो-तीन बड़ी-बड़ी कमियों/गलतियों के कारण छह भागों तक भागती रही.




==>> सबसे बड़ी ग़लती ये है कि साइबर एक्सपर्ट लगातार मोबाइल के सहारे ही अपराधी को पकड़ने की कोशिश करता है; संदिग्ध लोगों के मोबाइल के सहारे आगे बढ़ता है; बिन्नी का लैपटॉप खँगालता है; उसके एक गेम खेलने की बात पकड़ता है मगर उसके माता-पिता से उसके मोबाइल के बारे में नहीं पूछता है. यदि पूछ लेता तो तुरंत ही वह बिन्नी को खोज निकालता. ऐसा इसलिए क्योंकि अंत में जब बिन्नी को खोज लिया जाता है तो वह घर में ही मोबाइल ही चला रहा होता है.


==>> दूसरी ग़लती ये पकड़ में आई कि बिन्नी के अपहरण के बाद के दृश्य में घर में पुलिस के साथ खोजी कुत्ते भी टहलते दिख रहे हैं मगर वे बिन्नी को सूँघ कर खोज नहीं पाते हैं.


==>> तीसरी एक और गलती कि अपहरण करने वाले व्यक्ति की बातें सुनी जाती हैं, उससे बात की जाती है, बिन्नी की ऊँगली कटी हाथ की फोटो देखी जाती है मगर कोई भी उससे नहीं कहता कि बिन्नी से बात करवाओ.


ये गलतियाँ मुख्य इसलिए लगीं क्योंकि बिन्नी को खोजने में एक साइबर एक्सपर्ट लगा होता है और एक क्राइम ब्रांच का एक्सपर्ट, इसके बाद भी ये जरा-जरा सी बातें उनके दिमाग में क्यों नहीं आती? कह नहीं सकते कि इन गलतियों पर जानबूझकर ध्यान नहीं दिया गया या फिर सीरीज को साइबर एक्टिव दिखाने के लिए गलतियाँ देखी ही नहीं.


सीरीज को मजे के लिए देखा जाये तो ठीक है. ये सोचकर तो बिलकुल न देखा जाये कि साइबर क्राइम, साइबर सिक्योरिटी, साइबर एक्टिविटी के रूप में कुछ नया देखने को मिलेगा. हलकी-फुलकी, कहीं हँसी-मजाक, कहीं संवेदना के साथ यह सीरीज मूड फ्रेश कर सकती है.


07 जुलाई 2026

मन में घुसती अश्लीलता

जिस तरह से अश्लीलता, सेक्स, नंगपन, कामुकता आदि को ग्लोरिफाई करके मोबाइल के माध्यम से रील्स बनाकर, लाइव शो के रूप में, गीत-संगीत-कार्यक्रम के द्वारा लोगों के दिमाग में घुसाया जा रहा है, उस पर रोक लगाने की आवश्यकता है. चौबीस घंटे नग्न/अर्धनग्न देह, यौन-सम्बन्धों में लिपटे दृश्य, अश्लीलता में रचे संवाद, कामुकता में रचे हाव-भाव के निर्बाध प्रदर्शन, प्रसारण के दुष्परिणाम की को अभी हम लोग गम्भीरता से समझ नहीं रहे हैं. फुटकर-फुटकर में सामने आती कुछ घटनाओं पर रोना रो लेते हैं, कुछ विरोध प्रदर्शन कर लेते हैं, कुछ अपराधियों की ठुकाई कर लेते हैं और अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं.

 

समाज में फैलता जा रहा लिजलिजापन धीरे-धीरे हमारे परिवारों में, हमारे दिल-दिमाग में भी फैलता जा रहा है. किसी बेटी, महिला के साथ होने वाली किसी अमानुषिक घटना पर अपना रोष प्रकट कर लेते हैं, कुछ कठोर विचाराभिव्यक्ति कर लेते हैं और फिर वापस उसी लिजलिजेपन में लोट लगाने लगते हैं. लगभग मुफ्त के भाव से मिलते इंटरनेट से मुफ्त में मिलती कामुकता, नग्न देह, सेक्स को रोके जाने के लिए हम सबको जागना होगा. यदि आज ऐसा करने को न उठे तो कल को दरिंदगी वाली घटना का शिकार.......?????????

 

समझे??

 


03 जुलाई 2026

आस्था और श्रीराम जन्मभूमि मंदिर

श्रीराम मंदिर की चढ़ावा चोरी की घटना के बाद से जिसकी भी श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में आस्था में कमी आई है वे सब हमारी नजर में व्यक्तिगत विचार में चोर ही हैं, संकुचित मानसिकता के हैं. असल में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर से वे दिल से कभी जुड़े ही नहीं थे. यदि एक चढ़ावा चोरी की घटना के बाद से मंदिर में आस्था कम अथवा न रखने वालों के खुद के घर में ही कोई भाई-बेटा-बहिन-बेटी चोर-नशेड़ी निकल जाये तो ऐसे लोग क्या करेंगे?

 

पाँच-दस व्यक्तियों (जो अपने ही अम्मा-पिताजी की औलाद होते हैं) में से किसी एक के चोर निकल आने पर क्या ऐसे लोग उस घर को छोड़ देंगे? क्या परिवार के शेष व्यक्तियों पर भी संदेह कर लेंगे? घर के मालिक (दादा-दादी, बाप-अम्मा) को ही कटघरे में खड़ा कर देंगे? असल में यहाँ (श्रीराम मंदिर में) बात घर की नहीं है न, इसलिए सबको ज्ञान आ रहा है. अपने घर के नशेबाज, जुआरी, हत्यारे व्यक्ति में भी ऐसे लोगों को निर्दोष व्यक्ति ही नजर आता है. ऐसे दोगले लोगों के कारण ही अब वे लोग उछल रहे हैं जिन्होंने कभी भी श्रीराम के अस्तित्व को नहीं स्वीकारा, कभी मंदिर के पक्ष में कोई बात नहीं की.


30 जून 2026

व्यक्तिगत स्वतंत्रता या नैतिक पतन

वर्तमान में भारतीय समाज एक तरह के वैचारिक और सांस्कृतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है. यह स्थिति न केवल चिंताजनक है बल्कि इस पर विचार करने की आवश्यकता है. आधुनिकता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, प्रगतिशीलता आदि का नाम लेकर वर्तमान समाज जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है, वहाँ नैतिक मूल्यों का पतन ही दिखता है. हास्य के नाम पर, मनोरंजन के रूप में अमर्यादित आचरण को दर्शाया जा रहा है. किसी कॉमेडी शो में एक युवक द्वारा अपनी महिला मित्र को बिरयानी खिलाने के बदले कीमत वसूलने की बात करना, किसी अन्य मंच से एक डॉक्टर युवती द्वारा शवों के साथ संवेदनहीन मजाक करने की स्वीकारोक्ति, किसी और कार्यक्रम में हास्य के नाम पर अपने माता-पिता के अंतरंग पलों में शामिल होने की बात कहना विवेकशून्यता को दर्शाता है. यह स्थिति इसलिए और भी भयावह लगती है क्योंकि इस प्रकार की फूहड़ता, अश्लीलता सार्वजनिक रूप से परोसी जा रही है और समाज का पढ़ा-लिखा युवा वर्ग खुलकर तालियाँ बजाते हुए खुद को कूल, प्रगतिशील साबित कर रहा है.

 

देखा जाये तो इस तरह की नैतिक गिरावट केवल मनोरंजन के मंचों तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में भी प्रवेश कर चुकी है. हाल ही में किशोरों और युवाओं के उजागर हुए चैट इसकी अलग ही कहानी कहते हैं. इनमें सहपाठी लड़कियों और महिलाओं के बारे में जिस स्तर की अश्लील, अमर्यादित बातें की गई हैं, उन्हें कोई भी सभ्य व्यक्ति अकेले में पढ़ते हुए भी शर्म से पानी-पानी हो जाए. यहाँ चिंताजनक यह है कि इस विकृत संवाद में केवल लड़के ही नहीं बल्कि लड़कियाँ भी समान रूप से शामिल हैं. यह इस बात का संकेत है कि डिजिटल क्रांति ने युवाओं से आत्मनियंत्रण, मर्यादा, शालीनता को पूरी तरह से छीन लिया है. इसी का दुष्परिणाम है कि इंटरनेट पर आए दिन निजी पलों के, अन्तरंग सम्बन्धों के वीडियो लीक तो होते ही हैं, उनको देखने की चाह रखने वालों की संख्या भी बहुत बड़ी होती है. यह समाज में बढ़ती वासना, अश्लीलता का परिचायक है.

 

समाज में फैलती जा रही इस विभीषिका ने केवल युवा-वर्ग को ही अपनी गिरफ्त्त में नहीं लिया है बल्कि इसने  पारिवारिक और वैवाहिक संस्थाओं को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है. पारिवारिक रिश्ते इसी विकृत मानसिकता की भेंट चढ़ रहे हैं. रिश्तों की मर्यादा को तार-तार करने वाली घटनाएँ अब रोजमर्रा की बातें हो गई हैं. एक युवक का अपनी ही सास से विवाह करना, किसी युवक द्वारा अपनी भाभी को पाने की हवस में अपने ही मासूम भतीजे की बेरहमी से हत्या कर देना, विवाहेतर सम्बन्धों की खुलेआम स्वीकार्यता और अपने जीवन-साथी की हत्या करवा देना दिखाता है कि वासना ने इंसान को पथभ्रष्ट कर दिया है. रिश्तों की इस संवेदनहीनता का वीभत्स रूप तब दिखता है जब एक माँ अपने शारीरिक सम्बन्धों में बाधक बनते अपने ही बच्चे के हाथ-पैर तोड़े जाने और उसकी जान लिए जाने को मूकदर्शक बनकर देखती रहती है.

 

सबसे बड़ा प्रश्न तो यही है कि आखिर समाज इस स्थिति पर पहुँचा कैसे? यह मानसिक पतन, सामाजिक विकृति एकाएक हो नहीं ही आई होगी. आधुनिकता के झूठे मुखौटे, सूडो-फेमिनिज्म, अत्यधिक व्यक्तिवाद, पारम्परिक परिवार व्यवस्था का अंधविरोध, विवाह संस्था के ऊपर दैहिक सम्बन्धों को वरीयता, खुलेपन की आड़ में यौन-सम्बन्धों को अपनाने आदि ने इस पतन की नींव रखी है. व्यक्ति की असीमित, अनियंत्रित स्वतंत्रता ने सामाजिक ढाँचे को ही खोखला कर दिया है. रिलेशनशिप, सिचुएशनशिप, लिव-इन, फ्रेंड्स विद बेनेफिट्स आदि ने मूलतः व्याभिचार, अनैतिकता, अश्लीलता को सामाजिक स्वीकृति दे दी है. इससे धीरे-धीरे परिवार व्यवस्था बिखरने लगी और नई पीढ़ी संस्कार, नैतिकता, मर्यादा आदि से मुक्त होने लगी. इस भटकाव का असर यह हुआ है कि आज के युवाओं को यह अहसास ही नहीं कि वे कुछ गलत कर रहे हैं. एक साथ कई जगह सम्बन्ध बनाना, बार-बार साथी बदलना, किसी भी एक व्यक्ति या संस्था के प्रति वफादार न रहना, मर्यादा, शालीनता की सीमाओं को पार करना अब उनकी नजर में कोई गलती नहीं है. इसके उलट उन्होंने संस्कार, मर्यादा, शालीनता आदि को ही मज़ाक बना दिया है; इनका पालन करने वाले को पिछड़ा, दकियानूसी बताया है. समाज के प्रबुद्ध वर्ग ने इस नकारात्मकता का विरोध करने के बजाय चुप्पी साधे रखी है परिणामतः सार्वजनिक मंचों से फूहड़ता, अश्लीलता का सहज स्वरूप हमारे घर-परिवारों तक आ चुका है.

 

हम सभी को यह समझना होगा कि उच्छ्रंखल, अनुशासनहीन, अमर्यादित आचरण का परिणाम सुखद नहीं होने वाला है. हमारे देश की सामाजिक संरचना पश्चिमी देशों जैसी नहीं है बल्कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में बिना आत्म-अनुशासन के, बिना पारिवारिक सहयोग के, बिना सुदृढ़ नैतिक मूल्यों के समाज को व्यवस्थित और शांतिपूर्ण रख पाना पूरी तरह संभव नहीं है. पश्चिमी सभ्यताओं की नक़ल के नाम पर हमारे समाज में फूहड़ता ही फैलती जा रही है, उन देशों जैसा अनुशासन, उनके जैसी जीवन-शैली, उनके जैसा सिविक सेंस हमारे समाज में कदाचित देखने को नहीं मिलता है. सोचने वाली बात है कि जब समाज से शर्म, मर्यादा, शालीनता, संस्कार, सम्मान आदि पूरी तरह समाप्त हो जाएंगे तो समाज में अपराध, मानसिक अवसाद, अविश्वास, अश्लीलता, फूहड़ता का ही साम्राज्य दिखाई देगा. यदि हम आज भी बिना सँभले आधुनिकता के नाम पर ऐसे ही आत्मघाती मार्ग पर चलते रहे तो आने वाले समय में हमें सामाजिक और मानवीय विनाश का सामना करना पड़ेगा, यह समय जागने का, अपनी जड़ों की ओर लौटने का, मर्यादाओं को पुनः स्थापित करने का है.


27 जून 2026

भाजपा का कमजोर पक्ष

भाजपा के संदर्भ में हम एक बात बहुत शुरुआती दौर से कहते आए हैं कि इनके पास ऐसी टीम का घनघोर अभाव है जो भाजपा के ख़िलाफ़ फैलाई जाने वाली अफ़वाहों, इसके विरुद्ध सेट किए जाने वाले नैरेटिव आदि को समाप्त कर सकें. उनके बारे में स्थिति को स्पष्ट कर सकें. ऐसा एक-बार नहीं कई बार हुआ और हर बार भाजपा को बैकफुट पर आते देखा गया. ऐसा ही एक षड्यंत्र विरोधियों द्वारा फिर रचा गया, फिर एक अफवाह फैलाई गई श्रीराम मंदिर में चढ़ावा-दान की चोरी को लेकर. दान की चोरी को लेकर स्थिति स्पष्ट हुई और चढ़ावा चोरी के सम्बन्ध में आरोपितों को जेल. बावजूद इसके विरोधियों द्वारा अपना षड्यंत्र चालू है.

 

ये ध्यान रखना होगा कि श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण ने इसके विरोधियों की प्रतिष्ठा पर चोट की है; मुस्लिम आक्रांताओं के उस अहं को धूल चटाई है जिसके दम पर वे हिन्दू आस्थाओं पर कब्जा किए रहे. इन लोगों को फूटी आँख नहीं सुहा रहा कि श्रीराम जन्मभूमि मंदिर वैश्विक स्तर पर न केवल आस्था का बल्कि भारतीय सांस्कृतिक पहचान का केन्द्र बन गया. चढ़ावा की चोरी निश्चित रूप से मानवीय स्वभाव-जनित सोच के रूप में सामने आई है साथ ही इसमें विरोधी साजिश की भी आशंका है. जाँच चले, पूरी गम्भीरता से चले और बड़े से बड़ा दोषी भी न छूटे. इसके साथ ही विरोधियों की अफवाहों से, षड्यंत्र से बचने की आवश्यकता है.

 

मंदिर को गिराकर बने ढाँचे को मिटाकर मंदिर तो पुनः बना लिया गया है किंतु आस्था-प्रतिष्ठा के धूमिल हो जाने पर उसे बनाया जाना मुश्किल है.


25 जून 2026

श्रीराम मंदिर के प्रति आस्था का सवाल

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के दान और चढ़ावे की चोरी सम्बन्धी जो मामला सामने आया है, उसे लेकर उन श्रद्धालुओं को, उन हिन्दुओं को नैराश्य भाव के रसातल में जाने से ख़ुद को बचाना होगा, जो श्रीराम के प्रति, जन्मभूमि मंदिर के प्रति गहरी आस्था रखते हैं. गम्भीरता से विचार करियेगा, कालखण्ड, परिस्थिति के बदलते ही मौकापरस्त लोग, स्वार्थी लोग तत्काल बदल जाते हैं. ऐसे में उनका बदलना कोई आश्चर्य की बात नहीं, जिनके हाथों में मंदिर की सम्पूर्ण व्यवस्था सौंपी गई. निश्चित ही उन सभी लोगों के लिए ये मामला कष्टप्रद है जिन्होंने निस्वार्थ भाव से श्रीराम जन्मभूमि के लिए संघर्ष किया था, कष्ट सहे थे, अपना सर्वस्व न्योछावर किया था लेकिन उनको धैर्य नहीं छोड़ना है, संयम नहीं खोना है, आस्था से विलग नहीं होना है.

 

ये समय, ये मामला भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन जैसा प्रतीत हो रहा है. लाखों नौजवानों ने निस्वार्थ भाव से आज़ादी के लिए संघर्ष किया; हजारों परिवारों ने अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया; जान की परवाह किए बिना असंख्य लोग मौत को गले लगा गए और हमें आज़ादी दे गए. इसके बाद हुआ क्या? कुछ विशेष लोग सत्ता पर बैठे; कुछ ख़ास लोगों के हाथ में अधिकार आए; कुछ लोगों को ताक़त मिली और फिर शुरू हुआ भ्रष्टाचार का खेल. आज़ादी के बाद मिली सत्ता ऐसे लोगों के लिए राजशाही का माध्यम बनी; धन-वैभव संकलित करने का साधन बनी; पीढ़ियों के लिए लाभ की विषय-वस्तु बनी. इन लोगों ने युवाओं के संघर्ष को भुला दिया; अंग्रेजों से लड़ने वालों को विस्मृत कर दिया. ऐसा ही कुछ श्रीराम जन्मभूमि मंदिर मामले में हो रहा है.

 

ध्यान रखो, भले लोगों ने राजनीति से दूरी बनाई तो अपराधी, बाहुबली इसमें घुसकर सरकार चलाने लगे. ऐसे ही यदि निस्वार्थ आस्थवान लोग श्रीराम जन्मभूमि मंदिर से दूर हुए तो यहाँ भी भ्रष्टाचारी, म्लेच्छ सोच के लोग स्थापित हो जाएँगे. जैसे आज देश की हालत के लिए रोना रोया जाता है, कल को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के लिए रोया जाएगा.


22 जून 2026

बच्चों के जीवन से खिलवाड़ बंद हो

लखनऊ के एक कोचिंग सेंटर की आगजनी की घटना में एक दर्जन से अधिक बच्चों की असमय मृत्यु हो गई. इस घटना से भले ही एकबारगी व्यवस्था का लचर होना सामने आया हो मगर हम अभिभावकों का भी असंवेदित होना सामने आया है. ये सच है और ऐसा सच है जो बहुत ही कड़वा है. असल में अब ऐसा माहौल बनता  जा रहा है या कहें कि हम सबकी आदत हो गई है कि किसी भी दुर्घटना के लिए सीधे-सीधे शासन-प्रशासन को जिम्मेदार बताकर हम स्वयं दोषी होने के पाप से मुक्त होने की कोशिश करने लगते हैं. ऐसी हर दुर्घटना के बाद दोषियों को चिन्हित किया जाने लगता है; सम्बंधित को गैर-कानूनी बताया जाने लगता है; अधिकारियों की अक्षमता की पहचान की जाने लगती है मगर आगे के लिए हम कोई सबक नहीं लेते हैं. ऐसा लगता है जैसे हम सभी ने यह मान लिया है कि समाज में होने वाली किसी भी दुर्घटना के लिए सिर्फ और सिर्फ तंत्र ही दोषी है, व्यवस्था ही जिम्मेदार है. बच्चों से सम्बंधित किसी भी दुर्घटना के बाद भी अभिभावकों में किसी भी तरह की सजगता उपजती नहीं दिखती है, ऐसा क्यों?   

 

यदि इसी आगजनी की बात करें तो अभिभावकों ने अपने ही बच्चों को वहाँ प्रवेश दिलाया था. वे किसी दूसरे ग्रह से आये बच्चों को लेकर वहाँ नहीं गए थे, ऐसे में क्या उनकी जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि सम्बंधित संस्थान की स्थिति का आकलन कर लेते? महत्त्वाकांक्षा की आड़ में हमने अपनी ही बच्चों के जीवन से खिलवाड़ करना शुरू कर दिया है. उनके उज्जवल भविष्य बनाने के लिए कोचिंग सेंटर्स को एकमात्र उपाय मानते हुए हम सभी एक तरह की अंधी दौड़ में शामिल हो गए हैं. अभिभावकों द्वारा भारी-भरकम रकम चुकाना ही उनका कर्तव्य बन गया है. कोचिंग में प्रवेश के नाम पर बच्चों को वहाँ भेजना भी एकमात्र उद्देश्य रह गया है. एकबारगी भी संभवतः किसी अभिभावक द्वारा कोचिंग संचालकों से वहाँ के सुरक्षा मानकों को लेकर कोई सवाल नहीं किया जाता है. कोचिंग में सुरक्षा सम्बन्धी क्या उपाय किये गए हैं, इस बारे में भी कोई पूछताछ नहीं करने की मानसिकता बनी हुई है. दिमाग में एक विचार गहराई से बिठा लिया गया है कि कोचिंग संचालक से ज्यादा सवाल-जवाब उनके बच्चे को वहाँ से बाहर का रास्ता दिखा देगा. ऐसी सोच के चलते लोग अकारण ही बच्चों को असुरक्षित माहौल में धकेल देते हैं.

 


आज जिस तरह का माहौल चारों तरफ दिखता है
, उसमें बच्चों के घर से बाहर निकलते ही हम अभिभावकों के मन में तमाम तरह की अनिश्चिन्ताओं, आशंकाओं का बनना शुरू हो जाता है. आये दिन कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में दुर्घटनाओं का होना देख भी रहे हैं. ऐसे में क्या अभिभावकों की कोई जिम्मेदारी नहीं? कोचिंग सेंटर में, किसी संस्था में प्रवेश करवा देना, मोटी फीस जमा कर देना, बच्चों के आवागमन के लिए स्कूटी, गाड़ी आदि खरीदवा देना आदि से कर्तव्य की इतिश्री नहीं हो जाती है. यह समझना चाहिए कि बच्चे आपके ही हैं, कहीं किसी पेड़ से तोड़कर नहीं लाये हैं, कहीं किसी दूसरे ग्रह से नहीं उतरे हैं, तब उनके प्रति, उनकी सुरक्षा के प्रति ऐसी लापरवाही क्यों? कुछ ऐसा ही बच्चों की किसी भी परीक्षा के लिए देरी को लेकर भी है. यदि अभिभावकों को लगता है कि सम्बंधित परीक्षा उनके बच्चे के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, उसके कैरियर के लिए महत्त्वपूर्ण है तो समय का ध्यान करके निकलना चाहिए.

 

शासन-प्रशासन को, व्यवस्था को, तंत्र को सुधरना नहीं है; हम-आपके हाथ में नहीं है कि उसे सुधार सकें तो कम से कम खुद ही सुधर जाएँ. अपनी हठधर्मिता में, शासन-व्यवस्था को दोषी ठहराने की मानसिकता में कम से कम अपने बच्चों की ज़िन्दगी से, उनके भविष्य से आप लोग ही, अभिभावक लोग ही खिलवाड़ करना बंद कर दीजिये. लखनऊ कोचिंग की आज की दुर्घटना और इससे पहले भी हुई अनेकानेक दुर्घटनाओं से हम सबको ही सबक सीखने की आवश्यकता है. इन दुर्घटनाओं के बाद कम से कम हम लोग ही जागें क्योंकि तंत्र तो फिर सो जायेगा. अपने बच्चों को न केवल शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से मजबूत बनायें. विपरीत परिस्थितियों में धैर्य रखने की, संयम से उससे निपटने की राह बनाने की तरकीब सिखाएँ. असामान्य स्थिति में न केवल स्वयं को बचाने की बल्कि अपने साथियों को भी निकालने की कला सिखानी होगी. समय बहुत ही निरंकुश है और उसकी आपदाओं से बचने का रास्ता हमें ही बनाना होगा, अपने बच्चों को सिखाना होगा.

 

ऐसी किसी भी दुर्घटना के लिए सिर्फ व्यवस्था को दोषी बता देना कहीं न कहीं हम लोगों का अपने आपको दोष-मुक्त करने जैसा है. यह घटना कोई पहली घटना नहीं है, इससे पूर्व भी अनेक घटनाएँ हो चुकी हैं, जिनमें हमारे नौनिहालों ने असमय मौत को गले लगा लिया. कम से कम अब तो हम लोगों को जागना होगा. प्रशासन के बजाय, व्यवस्था के बजाय हम लोगों को ही सजग-सचेत होना पड़ेगा. तंत्र तो अपनी खाना-पूरी करके फिर से अपनी उसी चाल में, उसी ढर्रे पर लग जायेगा मगर हम लोगों को अपने बच्चों के जीवन को, उन्के भविष्य को बचाने के लिए जागना ही होगा. 

19 जून 2026

क्या बेरोजगार का अर्थ सरकारी नौकरी न मिलना है?

क्या बेरोजगार का अर्थ सरकारी नौकरी न मिलना है?

किसी और के बजाय यदि अपनी ही बात करें.... तो कृपया बताया जाये कि हम कब बेरोजगार रहे, कब हमें रोजगार वाला माना जायेगा?

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==>> 1995 में एम.ए. करते ही डी.वी.कॉलेज में अंशकालिक प्रवक्ता के रूप में अर्थशास्त्र विषय में अध्यापन कार्य आरम्भ कर दिया था.

==>> इसके पश्चात् 2002 तक डी.वी.कॉलेज में ही हिन्दी विषय में अध्यापन कार्य अंशकालिक प्रवक्ता के रूप में किया.

==>> दिसम्बर 2005 से लेकर मार्च 2019 तक गांधी महाविद्यालय में हिन्दी विषय में मानदेय प्रवक्ता के रूप में कार्यरत रहे.

==>> मार्च 2019 से अभी तक गांधी महाविद्यालय में ही हिन्दी विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के रूप में स्थायी नियुक्ति मिलने के पश्चात् कार्यरत हैं.

==>> 1995 से लेकर अभी तक की समयावधि में बीच में कुछ समय ऐसा भी आया जबकि किसी तरह की नौकरी नहीं की बल्कि लेखन से, कुछ फुटकर कार्यों से, स्वयंसेवी संस्थाओं के लिए किये कार्यों से आमदनी होती रही.


16 जून 2026

व्यक्तिगत स्वतंत्रता या नैतिक पतन

वर्तमान में भारतीय समाज एक तरह के वैचारिक और सांस्कृतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है. यह स्थिति न केवल चिंताजनक है बल्कि इस पर विचार करने की आवश्यकता है. आधुनिकता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, प्रगतिशीलता आदि का नाम लेकर वर्तमान समाज जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है, वहाँ नैतिक मूल्यों का पतन ही दिखता है. हास्य के नाम पर, मनोरंजन के रूप में अमर्यादित आचरण को दर्शाया जा रहा है. किसी कॉमेडी शो में एक युवक द्वारा अपनी महिला मित्र को बिरयानी खिलाने के बदले कीमत वसूलने की बात करना, किसी अन्य मंच से एक डॉक्टर युवती द्वारा शवों के साथ संवेदनहीन मजाक करने की स्वीकारोक्ति, किसी और कार्यक्रम में हास्य के नाम पर अपने माता-पिता के अंतरंग पलों में शामिल होने की बात कहना विवेकशून्यता को दर्शाता है. यह स्थिति इसलिए और भी भयावह लगती है क्योंकि इस प्रकार की फूहड़ता, अश्लीलता सार्वजनिक रूप से परोसी जा रही है और समाज का पढ़ा-लिखा युवा वर्ग खुलकर तालियाँ बजाते हुए खुद को कूल, प्रगतिशील साबित कर रहा है.

 

देखा जाये तो इस तरह की नैतिक गिरावट केवल मनोरंजन के मंचों तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में भी प्रवेश कर चुकी है. हाल ही में किशोरों और युवाओं के उजागर हुए चैट इसकी अलग ही कहानी कहते हैं. इनमें सहपाठी लड़कियों और महिलाओं के बारे में जिस स्तर की अश्लील, अमर्यादित बातें की गई हैं, उन्हें कोई भी सभ्य व्यक्ति अकेले में पढ़ते हुए भी शर्म से पानी-पानी हो जाए. यहाँ चिंताजनक यह है कि इस विकृत संवाद में केवल लड़के ही नहीं बल्कि लड़कियाँ भी समान रूप से शामिल हैं. यह इस बात का संकेत है कि डिजिटल क्रांति ने युवाओं से आत्मनियंत्रण, मर्यादा, शालीनता को पूरी तरह से छीन लिया है. इसी का दुष्परिणाम है कि इंटरनेट पर आए दिन निजी पलों के, अन्तरंग सम्बन्धों के वीडियो लीक तो होते ही हैं, उनको देखने की चाह रखने वालों की संख्या भी बहुत बड़ी होती है. यह समाज में बढ़ती वासना, अश्लीलता का परिचायक है.

 

समाज में फैलती जा रही इस विभीषिका ने केवल युवा-वर्ग को ही अपनी गिरफ्त्त में नहीं लिया है बल्कि इसने  पारिवारिक और वैवाहिक संस्थाओं को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है. पारिवारिक रिश्ते इसी विकृत मानसिकता की भेंट चढ़ रहे हैं. रिश्तों की मर्यादा को तार-तार करने वाली घटनाएँ अब रोजमर्रा की बातें हो गई हैं. एक युवक का अपनी ही सास से विवाह करना, किसी युवक द्वारा अपनी भाभी को पाने की हवस में अपने ही मासूम भतीजे की बेरहमी से हत्या कर देना, विवाहेतर सम्बन्धों की खुलेआम स्वीकार्यता और अपने जीवन-साथी की हत्या करवा देना दिखाता है कि वासना ने इंसान को पथभ्रष्ट कर दिया है. रिश्तों की इस संवेदनहीनता का वीभत्स रूप तब दिखता है जब एक माँ अपने शारीरिक सम्बन्धों में बाधक बनते अपने ही बच्चे के हाथ-पैर तोड़े जाने और उसकी जान लिए जाने को मूकदर्शक बनकर देखती रहती है.

 

सबसे बड़ा प्रश्न तो यही है कि आखिर समाज इस स्थिति पर पहुँचा कैसे? यह मानसिक पतन, सामाजिक विकृति एकाएक हो नहीं ही आई होगी. आधुनिकता के झूठे मुखौटे, सूडो-फेमिनिज्म, अत्यधिक व्यक्तिवाद, पारम्परिक परिवार व्यवस्था का अंधविरोध, विवाह संस्था के ऊपर दैहिक सम्बन्धों को वरीयता, खुलेपन की आड़ में यौन-सम्बन्धों को अपनाने आदि ने इस पतन की नींव रखी है. व्यक्ति की असीमित, अनियंत्रित स्वतंत्रता ने सामाजिक ढाँचे को ही खोखला कर दिया है. रिलेशनशिप, सिचुएशनशिप, लिव-इन, फ्रेंड्स विद बेनेफिट्स आदि ने मूलतः व्याभिचार, अनैतिकता, अश्लीलता को सामाजिक स्वीकृति दे दी है. इससे धीरे-धीरे परिवार व्यवस्था बिखरने लगी और नई पीढ़ी संस्कार, नैतिकता, मर्यादा आदि से मुक्त होने लगी. इस भटकाव का असर यह हुआ है कि आज के युवाओं को यह अहसास ही नहीं कि वे कुछ गलत कर रहे हैं. एक साथ कई जगह सम्बन्ध बनाना, बार-बार साथी बदलना, किसी भी एक व्यक्ति या संस्था के प्रति वफादार न रहना, मर्यादा, शालीनता की सीमाओं को पार करना अब उनकी नजर में कोई गलती नहीं है. इसके उलट उन्होंने संस्कार, मर्यादा, शालीनता आदि को ही मज़ाक बना दिया है; इनका पालन करने वाले को पिछड़ा, दकियानूसी बताया है. समाज के प्रबुद्ध वर्ग ने इस नकारात्मकता का विरोध करने के बजाय चुप्पी साधे रखी है परिणामतः सार्वजनिक मंचों से फूहड़ता, अश्लीलता का सहज स्वरूप हमारे घर-परिवारों तक आ चुका है.

 

हम सभी को यह समझना होगा कि उच्छ्रंखल, अनुशासनहीन, अमर्यादित आचरण का परिणाम सुखद नहीं होने वाला है. हमारे देश की सामाजिक संरचना पश्चिमी देशों जैसी नहीं है बल्कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में बिना आत्म-अनुशासन के, बिना पारिवारिक सहयोग के, बिना सुदृढ़ नैतिक मूल्यों के समाज को व्यवस्थित और शांतिपूर्ण रख पाना पूरी तरह संभव नहीं है. पश्चिमी सभ्यताओं की नक़ल के नाम पर हमारे समाज में फूहड़ता ही फैलती जा रही है, उन देशों जैसा अनुशासन, उनके जैसी जीवन-शैली, उनके जैसा सिविक सेंस हमारे समाज में कदाचित देखने को नहीं मिलता है. सोचने वाली बात है कि जब समाज से शर्म, मर्यादा, शालीनता, संस्कार, सम्मान आदि पूरी तरह समाप्त हो जाएंगे तो समाज में अपराध, मानसिक अवसाद, अविश्वास, अश्लीलता, फूहड़ता का ही साम्राज्य दिखाई देगा. यदि हम आज भी बिना सँभले आधुनिकता के नाम पर ऐसे ही आत्मघाती मार्ग पर चलते रहे तो आने वाले समय में हमें सामाजिक और मानवीय विनाश का सामना करना पड़ेगा, यह समय जागने का, अपनी जड़ों की ओर लौटने का, मर्यादाओं को पुनः स्थापित करने का है.

 


13 जून 2026

प्रेरणा, समर्पण, उत्कृष्टता के प्रतीक जसपाल राणा

जसपाल राणा भारतीय खेल जगत में एक ऐसा नाम रहा है जो निर्विवाद रहा है. उनकी उपलब्धियों को समस्त देशवासियों ने सदैव ही सराहा है. उस दौर में जबकि देश में निशानेबाजी को खेलों की मुख्यधारा में बहुत कम स्थान मिला हुआ था, तब जसपाल राणा ने अपनी पिस्तौल के अचूक निशाने के बल पर तिरंगे को वैश्विक मंचों पर लहराया. उन्होंने न केवल व्यक्तिगत रूप से अभूतपूर्व सफलताएँ हासिल कीं बल्कि अपनी सक्रिय खेल यात्रा से अलग हटकर एक उत्कृष्ट कोच के रूप में देश को नए चैंपियन भी दिए. अपने इसी जूनून और समर्पण के चलते वे जर्मनी के म्यूनिख में आयोजित अंतरराष्ट्रीय शूटिंग प्रतियोगिता से भारतीय दल के साथ लौट रहे थे. यात्रा के दौरान उन्हें सीने में दर्द और बेचैनी की शिकायत हुई. भारत लौटने पर चिकित्सकों ने उनके हृदय की जाँच कर उपचार आरम्भ किया. तीव्र हृदयाघात और उससे उत्पन्न जटिलताओं के कारण तमाम चिकित्सकीय प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका और 49 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया.

 

28 जून 1976 को उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तर प्रदेश) के उत्तरकाशी में जन्मे जसपाल राणा का पालन-पोषण अनुशासन और खेल को महत्व दिए जाने वाले परिवार में हुआ. उनके पिता नारायण सिंह राणा स्वयं भी निशानेबाजी के उत्कृष्ट खिलाड़ी रहे, साथ ही द्रोणाचार्य पुरस्कार से भी सम्मानित हुए. अपने पिता के मार्गदर्शन और कड़े प्रशिक्षण के कारण उन्होंने मात्र 12 वर्ष की उम्र में अपनी पहली राष्ट्रीय निशानेबाजी प्रतियोगिता में भाग लिया और लगातार आगे ही बढ़ते रहे. उनको अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान 1994 में इटली के मिलान में आयोजित 46वीं विश्व निशानेबाजी चैंपियनशिप में मिली. वहाँ उन्होंने जूनियर वर्ग की 25 मीटर पिस्तौल स्पर्धा में न केवल स्वर्ण पदक जीता बल्कि विश्व रिकॉर्ड की बराबरी भी की. इसके पश्चात् 1994 के हिरोशिमा एशियाई खेलों में उन्होंने 25 मीटर सेंटर फायर पिस्तौल स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर धमाका कर दिया. पदक जीतने का यह सिलसिला 1998 (बैंकाक) और 2002 (बुसान) के एशियाई खेलों में भी जारी रहा.

 



निशानेबाजी में उनके चमकते कैरियर के बीच एक दौर ऐसा भी आया जबकि खेल आलोचकों ने उनको समाप्त घोषित कर दिया था. अपनी आलोचनाओं के बीच जसपाल राणा 2006 के दोहा एशियाई खेलों को यादगार बनाकर आलोचकों के मुँह बंद कर दिए. उन्होंने दोहा एशियाड में तीन स्वर्ण पदक तो जीते ही साथ ही 590 अंकों के साथ विश्व रिकॉर्ड की बराबरी भी की. खेलों में उनके अद्वितीय योगदान, उनकी खेल प्रतिभा को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1994 में मात्र 18 वर्ष की उम्र में अर्जुन पुरस्का से सम्मानित किया.

 

सक्रिय खेल से संन्यास लेने के बाद भी जसपाल राणा निशानेबाजी से दूर नहीं हुए. उन्होंने देहरादून में जसपाल राणा शूटिंग एकेडमी की स्थापना कर उभरते हुए निशानेबाजों को तराशने लगे. भारतीय जूनियर शूटिंग टीम के मुख्य कोच के रूप में उनके कार्यकाल को निशानेबाजी का स्वर्णकाल माना जाता है. उनकी कोचिंग शैली अत्यंत व्यावहारिक और वैज्ञानिक थी. वे तकनीकी प्रशिक्षण के साथ-साथ खिलाड़ियों के मानसिक विकास, आत्मविश्वास और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को भी विकसित करते थे. उनका मानना था कि निशानेबाजी में शारीरिक कौशल के साथ मानसिक संतुलन भी महत्वपूर्ण है. इसी कारण उनके खिलाड़ी कठिन परिस्थितियों में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन करने में सक्षम थे. उन्होंने निशानेबाजों के मन से विदेशी खिलाड़ियों का खौफ समाप्त किया. ओलम्पिक, एशियाई, राष्ट्रमंडल अथवा विश्वस्तरीय निशानेबाजी प्रतियोगिताओं में भारतीय खिलाड़ियों की चमकदार नींव रखने वाले जसपाल राणा ही हैं.

 

मनु भाकर, सौरभ चौधरी, अनीश भानवाला, चिंकी यादव, ईशा सिंह, सम्राट राणा आदि निशानेबाजों ने जसपाल राणा की मेहनत और विश्वास को ओलम्पिक सहित अन्य वैश्विक मंचों पर रोशन किया. निशानेबाज मनु भाकर ने 2024 के पेरिस ओलम्पिक में कुल दो पदक जीते. सौरभ चौधरी ने एशियाई खेल 2018 में मात्र 16 वर्ष की उम्र में स्वर्ण पदक जीतने वाले सबसे युवा भारतीय निशानेबाज बने. अनीश भानवाला ने राष्ट्रमंडल खेल 2018 में मात्र 15 वर्ष की उम्र में स्वर्ण पदक जीता. इसके अलावा चिंकी यादव ने विश्व कप 2021 में दो स्वर्ण पदक तथा सम्राट राणा ने 2025 की विश्व चैंपियनशिप में जूनियर स्तर पर स्वर्ण और रजत पदक जीते. युवा खिलाड़ियों की प्रतिभा को निखारने और उन्हें वैश्विक चैंपियन बनाने के उनके इसी समर्पण के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा खेल कोचिंग के सर्वोच्च सम्मान द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

 

जसपाल राणा का महत्व केवल उनके द्वारा जीते गए पदकों की संख्या तक सीमित नहीं है. उनका असली योगदान उस विश्वास में है जो उन्होंने देश के असंख्य युवाओं में जगाया. उनके पहले भारत में निशानेबाजी को एक मँहगे और संभ्रांत वर्ग के खेल के रूप में देखा जाता था. जसपाल राणा ने अपनी कड़ी मेहनत से यह साबित किया कि यदि दृढ़ संकल्प हो तो सीमित संसाधनों के बावजूद विश्व पटल पर विजय प्राप्त की जा सकती है. उनकी खेल यात्रा सिखाती है कि खेल का मैदान छोड़ने के बाद भी एक खिलाड़ी का देश के प्रति कर्तव्य समाप्त नहीं होता. खेल के प्रति उनका जुनून अंतिम साँस तक उतना ही जीवंत रहा जितना नब्बे के दशक में उनकी पिस्तौल से निकलने वाली गोलियों में हुआ करता था. उनका जीवन संघर्ष, परिश्रम, उत्कृष्टता का प्रेरक उदाहरण है. उन्होंने खिलाड़ी के रूप में देश को गौरव दिलाया और प्रशिक्षक के रूप में भविष्य की पीढ़ियों को सफलता का मार्ग दिखाया. आज भले ही सशरीर उनकी उपस्थिति नहीं है किन्तु उनके द्वारा तैयार किए गए खिलाड़ी, उनके द्वारा स्थापित प्रशिक्षण केन्द्र, खेल जगत में उनकी अमूल्य विरासत उन्हें सदैव जीवित रखेगी. भारतीय निशानेबाजी का इतिहास उनके योगदान से सदैव आलोकित रहेगा और वे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा, समर्पण और उत्कृष्टता के प्रतीक बने रहेंगे.


09 जून 2026

पत्रों की अनमोल धरोहर

कुछ चीजें अचानक ही सामने आती हैं और तब उनकी ऐतिहासिकता का, उनके अनमोल होने का भान होता है.



चित्र में प्रदर्शित डाक लिफाफा हरेक के लिए महत्त्व का नहीं है. घर के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में वर्षों से बंद सामान को खोला-टटोला गया कि यदि किसी काम का समझ आएगा तो रखा जायेगा
, अन्यथा कबाड़ी के हवाले किया जायेगा. इसी क्रम में हमारे बाबा जी से सम्बंधित बहुत सारे पत्र मिले; परिजनों के पत्र, उनके मित्रों के पत्र. इसी में एक पत्र यह भी मिला. 1934 में लिखे इस पत्र के समय बाबा जी कक्षा दस में थे. उरई में राजकीय पुस्तकालय के बगल में जो पुरानी इमारत है, उस समय वहीं  राजकीय विद्यालय चला करता था. कालांतर में यही राजकीय संस्था जीआईसी के पुराने भवन में संचालित होने लगी थी. यहाँ हमारे परिवार की तीन पीढ़ियों को पढ़ने का अवसर मिला, बाबा जी, उसके बाद हमारे चाचा जी और मामा जी, तथा उसके बाद हम और हमसे छोटा भाई.


इस पत्र को बाबा जी के किसी मित्र ने कोंच से भेजा था और इस लिफाफे में जो पत्र है, उसमें उन्होंने अपनी मानसिक व्यथा का वर्णन एक कहानी के रूप में किया है. बाबा जी को उसे भेजने के पीछे उनके मित्र का उद्देश्य उनकी व्यथा को पढ़ना-समझना और उस कहानी को संशोधित करना था. पठन-पाठन-लेखन की आनुवंशिक परम्परा बाबा जी से शुरू होकर पिताजी से चलती हुई हमारे बाद की पीढ़ी अर्थात् हमारी बेटियों तक पहुँच गई है.