19 अक्टूबर 2026

यूरोपीय अराजकता और भारतीय सन्दर्भ

अक्टूबर माह जहाँ एक तरफ भारतीय राजनीतिक सन्दर्भों में चर्चा के केन्द्र में है वहीं विदेश की धरती पर लगी असंतोष की आग में सुलग रहा है. इधर भारत में वोट चोरी पर विपक्ष लगातार आन्दोलित है तो उधर फ्रांस, इटली सहित अनेक विकसित देशों की सड़कों पर अराजकता फैली है. विरोध प्रदर्शन की आड़ में अराजकता के शिकार यूरोप के आधा दर्जन से अधिक देशों ने एकसाथ सामाजिक और आर्थिक उथल-पुथल को देखा. इन देशों में फैले जनाक्रोश का कारण बढ़ती मँहगाई, शिक्षा की बदतर स्थिति, सार्वजनिक सुविधाओं में कमी आना आदि रहा है. इनके चलते यहाँ की युवा पीढ़ी सड़क पर उतर कर आन्दोलन करने को विवश हुई. यथोचित कारणों से उपजे जनाक्रोश को अराजकतावादी ताकतों ने हिंसक बनाकर मूल कारणों को नेपथ्य में धकेल दिया.

 

आन्दोलनकारी युवाओं के साथ अराजक ताकतों के शामिल हो जाने से फ्रांस में स्थिति सर्वाधिक रूप से विध्वंसक हुई. पेरिस सहित कई शहरों में आगजनी, तोड़फोड़, लूटपाट और हिंसक झड़पों ने उग्र रूप धारण कर लिया. यहाँ की हिंसक घटनाओं का असर इसके पड़ोसी देश इटली पर भी पड़ा और यहाँ मिलान सहित अनेक शहरों में नागरिकों का गुस्सा फूट पड़ा. जीवनयापन के बढ़ते खर्च के विरुद्ध शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन हिंसक झड़पों में बदल गया. इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी को यह स्पष्ट करना पड़ा कि विरोध जताना नागरिकों का अधिकार है लेकिन शहरों को बर्बाद करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. फ्रांस और इटली के साथ-साथ स्पेन, पुर्तगाल, ऑस्ट्रिया, बेल्जियम जैसे देश भी इस समय तीव्र असंतोष की चपेट में हैं. इन देशों में विरोध का मुख्य कारण मँहगाई, आवास की समस्या, शिक्षा व्यवस्था की बदहाल स्थिति ही बताया जा रहा है.  

 


यूरोप में फैली इस अराजकता को भारतीय सन्दर्भों में देखने की आवश्यकता है. यहाँ एक बड़ा राजनीतिक वर्ग ऐसा है जो लम्बे समय से केन्द्र की स्थिर सरकार को सड़क पर अराजकता फैलाकर अस्थिर करने के प्रयास में लगा हुआ है. इस वर्ग से सम्बंधित अगुआ व्यक्तित्व आये दिन भारत के पड़ोसी देशों नेपाल
, बांग्लादेश की हिंसक गतिविधियों का समर्थन करते देखे जाते हैं. जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग जेन-जी के उग्र आन्दोलन के द्वारा संसद को उखाड़ फेंकने की मानसिकता के साथ व्यवस्था को बाधित करने का काम करते हैं. अब उन्हीं के द्वारा रिजीम चेंज करने की, फ़्रांस जैसी आग लगने की बात कहना अराजकता के संकेतक हैं.

  

राजनीतिक सन्दर्भों से इतर भी यूरोप के देशों में सुलग रही असंतोष की इस आग के दूरगामी प्रभाव हमारे देश पर भी पड़ना स्वाभाविक है. यूरोपीय बाजारों की उथल-पुथल का असर भारत के निर्यात, आईटी सेक्टर, अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ सकता है. वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता बढ़ने से निवेश और पूँजी प्रवाह भी प्रभावित हो सकते हैं, जिससे हमारे लघु और मध्यम उद्योगों को झटका लग सकता है. वैश्विक बाजारों में यदि अनिश्चितता का दौर आता है तो इसका प्रभाव भारतीय शेयर बाजार और विदेशी मुद्रा भंडार पर भी पड़ेगा. भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से भी वैश्विक शक्तियों के मध्य भारत को अपनी प्राथमिकताओं को नए सिरे से निर्धारित करना पड़ सकता है.

 

विदेश में फैली इस अराजकता ने देश के आंतरिक परिप्रेक्ष्य में इसे समझने और तुलनात्मक अध्ययन करने का अवसर प्रदान किया है. यह विचारणीय है कि आखिर क्यों दुनिया के सबसे पुराने और समृद्ध कहे जाने वाले देश आज गम्भीर अस्थिरता की चपेट में हैं? आखिर भारत ने अपनी विशाल आबादी, विविधता और जटिल सामाजिक ताने-बाने के बावजूद स्वयं को किस तरह अराजकता से सुरक्षित बनाये रखा है? यह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि विगत लम्बे समय से भारत को भीतर और बाहर से अस्थिर करने के प्रयास किये जा रहे हैं; यहाँ अराजकता फैलाने के मंसूबे लगातार बनाये जा रहे हैं. आज भले ही कुछ राजनीतिक अराजक तत्त्व देश के लोकतंत्र पर, यहाँ की लोकतांत्रिक प्रणाली पर सवाल उठाते हैं; यहाँ की संवैधानिक संस्थाओं के विरुद्ध अविश्वास का वातावरण बनाने का प्रयास करते हैं; अनावश्यक मुद्दों के द्वारा नागरिकों को भ्रमित करने का काम करते हैं मगर उनको समझना होगा कि भारत की सफलता का सबसे बड़ा आधार उसका मजबूत और समावेशी लोकतांत्रिक ढाँचा ही है. यही ढाँचा समय-समय पर चुनावों, बातचीत से, लोकतान्त्रिक ढंग से जनता के असंतोष को शांत करने की आन्तरिक क्षमता रखता है. देश में मजबूत पारिवारिक मूल्यों, सामाजिक ताने-बाने और कल्याणकारी योजनाओं का एक ऐसा सुरक्षाचक्र उपस्थित है जो नागरिकों के जीवनयापन की बुनियादी आवश्यकताओं को सुरक्षित रखने का कार्य करता है.

 

देखा जाये तो यूरोप के नागरिकों विशेषकर युवाओं ने स्वयं को बेसहारा महसूस किया है. इसके उलट भारत की प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था ने नागरिकों में एक विश्वास बनाये रखा है कि लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों के दायरे में कानून व्यवस्था से खिलवाड़ न हो सकेगा. वैश्वीकरण और सूचना क्रांति के इस दौर में भी भारत की वैचारिक और सांस्कृतिक सहनशीलता ने समाज को टूटने से बचाया है. यूरोपीय देशों की अस्थिरता, भारत के पड़ोस में व्यापक अस्थिरता बनी रहने और देश को भी अराजकता की आग में झोंकने के कथित प्रयासों के बाद भी यहाँ का लोकतान्त्रिक, सामाजिक ढाँचा सुरक्षित बना रहा. तमाम सारी विपरीत स्थितियों के बाद भी देश के नागरिक हितों पर आँच न आने देना इस बात का प्रमाण है कि विकास जैसे भौतिक पैमानों से किसी राष्ट्र की स्थिरता का निर्धारण नहीं होता है. किसी भी देश की स्थिरता उसके सामाजिक मूल्यों, मजबूत संस्थागत ढाँचे, स्पष्ट संवाद, लोकतान्त्रिक व्यवस्था और समावेशी शासन प्रणाली आदि के द्वारा निर्धारित होती है. इनके द्वारा ही किसी भी देश को अराजकता से बचाकर उसकी सम्प्रभुता, एकता, सुरक्षा आदि को अक्षुण्य रखा जा सकता है. अनेकानेक इंडेक्स के सहारे अपने नागरिकों का हित और खुशियाँ तलाशते पश्चिमी देशों को हमारे देश से बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है.


13 अक्टूबर 2026

एसआईआर का भ्रामक विरोध

लोकतंत्र में विरोध करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार होता है किन्तु उस विरोध का उद्देश्य अराजकता फैलाना हो, समाज को गुमराह करना हो तो ऐसे विरोध को अवसरवाद कहा जाता है. बिना ठोस प्रमाण के ऐसे विरोधी स्वर देश का विपक्ष उठाने में लगा है. इस स्वर में वोट चोरी, निर्वाचन आयोग आयुक्त का इस्तीफा सुनाई दे रहा है. सड़कों पर कांग्रेस सहित अनेक दल एसआईआर को खारिज करने और इसके लागू होने के बाद सम्पन्न विधानसभा चुनावों को भंग करने की बात भले कर रहे हों मगर सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई याचिका में वे एसआईआर की वैधता को स्वीकार करते हैं. याचिका में कहा है कि इसका उद्देश्य एसआईआर की वैधता को चुनौती देना नहीं है. सोचने वाली बात है कि यदि इसे चुनौती देना, खारिज करवाना उद्देश्य नहीं है तो सड़कों पर अराजक रूप से उतर कर जनता को भ्रमित क्यों किया जा रहा है? ऐसे में आंदोलन की वास्तविकता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है कि वह वास्तव में मतदाताओं के अधिकारों के लिए है या फिर दलों द्वारा अपनी राजनीतिक जमीन को बचाने के लिए है.

 

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण अर्थात एसआईआर को लेकर जो राजनीतिक उत्पात सा काटा जा रहा है, उसमें पूछा जाना चाहिए कि यदि लाखों मतदाताओं के नाम गलत ढंग से काट दिए गए हैं तो वे असली मतदाता हैं कहाँ? उन प्रभावित मतदाताओं द्वारा किसी भी रूप में अपनी शिकायतों को किसी सम्बंधित अधिकारी के समक्ष रखा गया है? मान लिया जाये कि वे सभी मतदाता इसके लिए सक्षम नहीं हैं तो शोर मचाने वाले विपक्षी दलों को ऐसे मतदाताओं के दस्तावेजों, विवरणों को प्रस्तुत करते हुए निर्वाचन अधिकारियों से स्पष्टीकरण माँगें. मंचों से लाखों वोट कटने की बात करना, इसकी आड़ में सड़कों पर अराजकता फैलाना किसी भी रूप में उचित नहीं है. जो लोग इस अनावश्यक विरोध में अपना भी स्वर मिला रहे हैं क्यों उन्होंने विचार किया है कि क्या यह एसआईआर पहली बार हो रहा है? क्या मतदाता सूची में से पहली बार मतदाताओं के नाम हटाये गए हैं? क्या बिना पुनरीक्षण के पुरानी मतदाता सूची को ही बनाए रखना औचित्यपूर्ण है? आखिर नए नागरिक वयस्क होंगे, मतदाता बनेंगे, उनको सूची में शामिल किया जायेगा; मृत व्यक्तियों के नाम हटेंगे. इसी तरह से दोहरी प्रविष्टियों, स्थान परिवर्तन के कारण भी मतदाता सूची का पुनरीक्षण होता है. ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या इन बिन्दुओं के आधार पर नाम हटाने को वोट चोरी कहा जाएगा? हाँ, ये सत्य है कि पुनरीक्षण के नाम पर मनमाने ढंग से नाम काटने का अधिकार किसी को नहीं. यदि किसी पात्र मतदाता का नाम कटता है तो उसकी अपील पर सुनवाई अवश्य होनी चाहिए.

 

ज्ञानेश कुमार का इस्तीफ़ा माँगने वाले विपक्षियों का आरोप है कि मतदाताओं के नाम हटने का लाभ भाजपा को मिला है; उसको वोट न देने वालों के नाम काटे गए हैं. इस हास्यास्पद आरोप पर विपक्षी दल स्वयं ही बता पा रहे कि वे किस आधार पर दावा कर रहे कि भाजपा को वोट न देने वालों के ही नाम काटे गए हैं. क्या विपक्ष के पास ऐसे आँकड़े हैं? इस बात को विपक्षी दलों द्वारा उठाये जाने का आधार वे अवैध नागरिक हैं जिनका नाम मतदाता सूची से हटाया गया है. देश का संविधान भारतीय नागरिकों को ही मतदान का अधिकार प्रदान करता है. विदेशी नागरिक, वे चाहे किसी भी देश के क्यों न हों, भारत में निवास करने के कारण भारतीय मतदाता नहीं हो सकते. यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि विगत वर्षों में रोहिंग्या, बांग्लादेशी शरणार्थियों के नाम पर अवैध नागरिकों की संख्या देश में बढ़ी है. यदि ऐसे लोगों का किसी भी तरीके से मतदाता सूची में नाम अंकित हो गया था और जाँच के बाद यह सत्यापित होने पर उनके नाम को हटाया जाना वोट चोरी कैसे हो गया?

 

ज्ञानेश कुमार को दोषी ठहराते हुए उनकी आलोचना करने, इस्तीफ़ा माँगने वाले विपक्ष को स्मरण होना चाहिए कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त के रूप में उनका कार्यकाल फरवरी 2025 से शुरू हुआ और विपक्षी दल इससे पहले के विधानसभा, लोकसभा चुनावों में पराजित होते रहे हैं. अपने आरोपों की सत्यता के लिए विपक्ष को प्रमाण देना चाहिए न कि सड़क पर हंगामा मचाना चाहिए. केवल यह कह देना उचित नहीं कि निर्वाचन आयोग निष्पक्ष नहीं. यह बताना होगा किस प्रकार किसी दल विशेष को अनुचित लाभ दिया गया. यदि किसी मामले में संस्थागत प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं तो उनकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जाँच अवश्य होनी चाहिए किन्तु बिना पर्याप्त आधार के सड़क पर अराजकता फैलाते हुए इस्तीफे की माँग करना कोई समाधान नहीं है.

 

एसआईआर पर यदि किसी भी तरह की विसंगति है तो उसका समाधान नारे लगाकर नहीं, इस्तीफ़ा माँग कर नहीं, देश में अराजकता फैलाकर नहीं, झूठे दावों के साथ नहीं बल्कि तथ्यों के आधार पर निकल सकता है. यदि वाकई में पात्र मतदाताओं के नाम गलत ढंग से हटाए गए हैं तो उनको तत्काल शामिल किया जाए. यदि नाम नियमानुसार हटे हैं तो उनको वोट चोरी कहकर संवैधानिक संस्था पर आरोप न लगाया जाए.

 

लोकतंत्र में मतदाता सूची देश के नागरिकों के मताधिकार का आधार है. इसलिए उसका निष्पक्ष और पारदर्शी होना अत्यावश्यक है. इसके लिए निर्वाचन आयोग, सरकार के साथ-साथ विपक्षी दलों को भी सजग रहने की आवश्यकता है. इसलिए एसआईआर का विरोध विपक्ष को करना है तो प्रमाणों के साथ करे न कि किसी की फीलिंग के आधार पर. यहाँ सरकार को एक बात ध्यान रखनी होगी कि देश को ऐसा लोकतंत्र चाहिए जहाँ फर्जी मतदाताओं के लिए कोई स्थान न हो किन्तु वास्तविक नागरिक भी अपने मताधिकार से वंचित न रहे. इसी तरह विपक्षी दलों को भी इसका स्मरण रहे कि चुनावी राजनीति में बिना प्रमाण किया गया विरोध, अराजक रूप से पैदा किया गया शोर क्षणिक लाभ तो दे सकता है किन्तु विश्वसनीयता, स्थायित्व पैदा नहीं कर सकता है.

 


07 अक्टूबर 2026

एआई पर नियन्त्रण आवश्यक

इंसान ने सदैव ही नवोन्मेषी बनकर समाज में अपने अस्तित्व को आगे बढ़ाया है. इसके चलते श्रम को सरल बनाने के लिए मशीनों का अविष्कार किया गया. अब ऐसा दौर सामने आया है जहाँ मशीन केवल काम ही नहीं कर रही है बल्कि इंसान के दिमाग की नकल भी कर रही है. कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-एआई) के द्वारा ऐसा ही हो रहा है. उसके द्वारा लिखना, कलाकारी करना, गीत-संगीत रचना, प्रश्नों के उत्तर देना, निर्माण करना, अनुसंधान में सहायक होना आदि सहजता से हो रहा है. पिछले कुछ समय से एआई पर जिस तरह से इंसान की निर्भरता बढ़ी है, उसके माध्यम से जिस तरह से कार्यों का सम्पादन करवाया जा रहा है, उसे देखते हुए ऐसा लग रहा है जैसे भविष्य एआई का ही है.  

 



एआई कपोल-कल्पना का विषय नहीं है बल्कि उसने लगभग सभी क्षेत्रों में अपनी जगह बना ली है. इसी में अब एआई से एक कदम आगे निकल कर एआई एजेंट सक्रिय हो गया है. यह एक ऐसा स्वायत्त सॉफ्टवेयर प्रोग्राम है जो किसी कार्य को पूरा करने के लिए स्वयं निर्णय लेता है और कार्य करता है. यह मनुष्य के हस्तक्षेप बिना कार्य करता है. एआई दुनिया की इस तेजी ने जहाँ सम्भावनाओं के अनेक द्वार खोले हैं वहीं आशंकाओं को भी खड़ा किया है. क्या इंसान ने ऐसी तकनीक विकसित कर दी है जिस पर भविष्य में उसका नियंत्रण ही न रहेगा? यह सवाल आशंका भर नहीं है. इस पर दुनिया के अनेक प्रमुख एआई वैज्ञानिक, तकनीकी विशेषज्ञ सार्वजनिक रूप से चेतावनी भी दे चुके हैं. इनका कहना है कि अत्यंत उन्नत एआई भविष्य में मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए जोखिम बन सकता है. इस क्षेत्र में काम कर चुके जेफ्री हिंटन, जिन्हें एआई का गॉडफादर कहा जाता है, ने गूगल छोड़ने के बाद एआई के संभावित खतरों को लेकर सार्वजनिक चेतावनी देते हुए कहा था कि जिस गति से एआई प्रणालियाँ विकसित हो रही हैं उससे उनके दीर्घकालीन परिणामों को लेकर पर्याप्त सावधानी बरतना जरूरी है. ओपनएआई कम्पनी के डेविड रॉबिन्सन ने अक्टूबर 2026 में इस्तीफा देकर कहा था कि एआई बेहद तेजी से ताकतवर हो रहा है लेकिन सुरक्षा और नियन्त्रण के सिस्टम उस रफ्तार से विकसित नहीं हो रहे हैं. इसी तरह से एन्थ्रोपिक के जैकोब कॉक्सन ने सितम्बर 2026 में एआई उद्योग छोड़ दिया. उनका कहना था कि एआई क्षेत्र में खतरनाक और अनियंत्रित सिस्टम तैयार किए जा रहे हैं. बिल गेट्स ने सितम्बर 2026 में चेतावनी दी थी कि बिना नियमन के एआई गलत हाथों में पड़कर एक अरब मौतों का कारण बन सकता है. एलन मस्क भी लगातार कहते आ रहे हैं कि अत्यधिक उन्नत एआई मानवता के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर सकता है और इसे परमाणु हथियारों से भी अधिक खतरनाक माना जा सकता है. इन सम्भावनाओं के बीच एक बात बिलकुल सही है कि एआई के रूप में ऐसी तकनीक विकसित हुई है जिसकी क्षमताएँ तेजी से बढ़ रही हैं जबकि उसके प्रभावों को समझने, नियन्त्रित करने की क्षमता उतनी तेजी से विकसित नहीं हुई है.

 

देखा जाये तो एआई का सबसे बड़ा खतरा उसका गलत इस्तेमाल है. डीपफेक के माध्यम से नकली तस्वीर या वीडियो तैयार करना अब कठिन नहीं रह गया. झूठी सूचनाओं को बड़े पैमाने पर फैलाना, लोगों की मानसिकता को प्रभावित करना, साइबर हमले करना, धोखाधड़ी करना, तकनीक को हैक करना आसान हो गया है. सम्भव है कि भविष्य में एआई द्वारा इन कामों को और अधिक प्रभावी बना देने से व्यक्तिगत निजता, राष्ट्रीय सुरक्षा के सामने चुनौतियाँ खड़ी हो जाएँ. यदि एआई प्रणालियाँ, एआई एजेंट भविष्य में स्वायत्त हो गए, अपने लक्ष्य तय करने, रणनीति बनाने, संसाधनों का उपयोग करने में सक्षम हो गए तो यह कहना कठिन होगा कि वे मानव हितों के अनुरूप ही कार्य करेंगे. इसी बिन्दु पर आकर विशेषज्ञ सजग होने की बात करते हैं, चेतावनी देते हैं. ऐसी स्थिति में सरकारों, तकनीकी कम्पनियों, विशेषज्ञों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. एआई को बाजार की ताकतों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है. एआई प्रणालियों के लिए पारदर्शिता, परीक्षण, जवाबदेही, सुरक्षा आदि के स्पष्ट नियम होने चाहिए ताकि भविष्य में न केवल इंसानों के लिए बल्कि तकनीक, उद्योग, राष्ट्रीय सुरक्षा, चिकित्सा, अन्तरिक्ष, विमानन, बैंकिंग आदि-आदि क्षेत्रों में खतरनाक स्थितियाँ उत्पन्न न हो सकें. 

 

इन सबके बाद भी एआई को लेकर भय का वातावरण नहीं बनाया जाना चाहिए. इसकी सहायता से असाध्य-गम्भीर रोगों की पहचान हुई है; नई दवाओं का विकास हुआ है; कृषि, जलवायु, पर्यावरण सम्बन्धी जानकारी बेहतर हुई है; विज्ञान-प्रौद्योगिकी-चिकित्सा-रक्षा-शिक्षा-उद्योग आदि क्षेत्रों में नए रास्ते खुले हैं. सवाल यह होना चाहिए कि एआई का विकास किस रूप में हो? इंसान ने आग, बिजली, परमाणु ऊर्जा, इंटरनेट आदि शक्तिशाली तकनीकें विकसित की हैं और इनके अनियंत्रण ने समाज में विध्वंस फैलाया है. एआई को इससे आगे निकल कर समझने की आवश्यकता है क्योंकि इसके द्वारा ऐसी प्रणालियाँ विकसित हो रही हैं जो इंसानी बौद्धिक क्षमताओं से आगे निकल रही हैं. भविष्य में एआई इंसानों को खत्म करेगी या मानव जीवन को बेहतर बनाएगी, इसका उत्तर आज किसी के पास निश्चित रूप से नहीं है. लेकिन एक बात तय है कि इसका भविष्य प्रयोगशालाओं में निर्धारित नहीं होगा. यदि इसका उपयोग स्वार्थ, राजनीतिक नियंत्रण, युद्ध, दुष्प्रचार, अपराध आदि के लिए होगा तो निश्चित रूप से इसका भविष्य भयावह होगा किन्तु यदि इसको मानवीय विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा, जनहित में लगाया गया तो यह तकनीक क्रांतिकारी उपलब्धि बन सकती है.

 

आज हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह है कि जिस बुद्धिमत्ता को हम कृत्रिम रूप दे रहे हैं उसके लिए हम अपनी प्राकृतिक बुद्धिमत्ता को न खो दें. एआई से डरने का समय नहीं, उसके प्रति निश्चिन्त होने का भी समय भी नहीं बल्कि उससे सावधान रहने का समय है. उसके पूर्णतः विकसित होने, पूर्णतः स्वतंत्र होने से पहले उसके नैतिक परिणामों पर गम्भीरता से विचार करने का समय है. वर्तमान में वास्तविक समय और मूल प्रश्न तकनीक का नहीं बल्कि उसके नियंत्रण का है.


27 सितंबर 2026

ताई बाई का जालौन स्थित महल गिरा

खबर सुनने को मिली है कि ताई बाई के जालौन स्थित महल का एक बड़ा हिस्सा गिर गया है.
बहुत से लोग ताई बाई को ही नहीं जानते होंगे. बहुतों ने उनके बारे में सुना ही नहीं होगा. वे 1857 की क्रांति की एक महान वीरांगना और प्रथम महिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थीं.

सोचने वाली बात ये है कि हम लोग अपने पूर्वजों के प्रति, अपने बलिदानियों के प्रति सम्मान का भाव क्यों नहीं रख पा रहे हैं? क्यों उनके प्रति उदासीन बने रहते हैं? अब कुछ दिन मीडिया में आने के लिए उनके क्षतिग्रस्त महल को लेकर स्यापा होगा और फिर सबकुछ वैसे ही शांत हो जाएगा, जैसे उनकी प्रतिमा स्थापित करने वाले मुद्दे पर हुआ.



25 सितंबर 2026

वोट चोरी का अनर्गल आरोप

देश में कोई पहली बार तो SIR हो नहीं रहा है. पहला विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) सन 1952 के आम चुनाव के दौरान किया गया था.


अबकी बार इतने विरोध का कारण क्या है?


यदि ज्ञानेश कुमार ने अपने दम पर भाजपा के विरोधी मतदाताओं के नाम कटवा दिए तो ऐसे व्यक्ति को विशेष सुरक्षा देकर किसी बड़े काम में लगाना चाहिए क्योंकि यह तो त्रिकालदर्शी हुआ. यह तो मतदाता सूची पढ़कर ही बता देता है कि कौन भाजपा को वोट करेगा, कौन नहीं करेगा. अरे, दिमाग से पैदल लोगो, एक बात पर गौर करो कि SIR के लिए सम्बंधित लोगों की जानकारी को क्या ज्ञानेश कुमार ने अपने घर पर भर दिया? जानकारी देते समय सभी से, तुम विरोधियों से भी, तुम्हारे बाप-अम्मा, दादा-दादी, नाना-नानी आदि-आदि की जानकारी लेकर क्या गलत किया जा रहा?


रही बात वोट चोरी की तो ज्ञानेश कुमार तो आये फरवरी 2025 में और तुम लोग चुनाव हार रहे 2014 से. अब SIR तुमको इसलिए बेकार लग रही, काहे कि अवैध वोटर कट गए, वे बाहर हो गए, जिनको अपने बाप-दादा का पता नहीं. जिन अवैध घुसपैठियों को तुम सबने अपना बाप बना रखा था, उनके भागने की स्थिति बनते देख तुमको देश का सिस्टम बेकार लगने लगा.


दिमाग लगाना सीखो, न कि आरोप.

 


24 सितंबर 2026

सेवा संकल्प अभियान को लेकर उत्साह नहीं

भारतीय जनता पार्टी द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सेवा और समर्पण के 25 वर्षों को संदर्भित करते हुए 'सेवा संकल्प अभियान' का आयोजन किया जा रहा है. यह मोदी जी के जन्मदिन 17 सितम्बर से शुरू होकर पूरे एक माह अर्थात 17 अक्टूबर तक चलना है. इस अभियान के आयोजन हेतु उत्तर प्रदेश में सरकार के स्तर से निर्देश जारी किये गए हैं. इस आयोजन में शासन-प्रशासन पूरी तत्परता के साथ जुटा हुआ है. शिक्षा संस्थानों, गैर-सरकारी संस्थाओं आदि पर एक तरह से कार्यक्रम थोप दिया गया है. ठीक है, भाजपा द्वारा अपने एक वरिष्ठ व्यक्ति के सम्मान में इस कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है, इसे लेकर कोई तर्क-वितर्क नहीं करेंगे क्योंकि घर-परिवार की तरह पार्टियाँ भी अपने पदाधिकारियों को, अपने वरिष्ठजनों के सम्मान में कुछ न कुछ करती रहती हैं.

 



इस बात में दोराय नहीं कि मोदी जी बहुत ही गम्भीरता और गहराई से जनता के मनोभावों को समझे हुए हैं. राजनीति के जो भी कदमताल हैं, उनसे भी वे भली-भांति परिचित हैं. यहाँ व्यक्तिगत स्तर पर हमें जो बात खटक रही है, वो यह कि ऐसी स्थिति के बाद भी मोदी जी की सहमति इस अभियान के लिए है. इधर विगत कुछ समय से जिस तरह से मोदी-विरोध का माहौल बना हुआ है, उसके चलते मोदी जी की छवि से लगातार खिलवाड़ किया जा रहा है. ऐसे में मोदी जी को स्वयं ही अपने जन्मदिन पर सम्बंधित लोगों को ससम्मान इस अभियान को स्थगित करने के लिए निर्देशित करना चाहिए था. मोदी जी को यहाँ स्वतः संज्ञान लेते हुए इस कारण से इस अभियान को स्थगित करना चाहिए था क्योंकि इस महीने भर के कार्यक्रम में पूरा सरकारी तंत्र तो व्यस्त है ही, इसके साथ-साथ शिक्षण संस्थानों के भी व्यस्त बने रहने की सम्भावना है.

 

भाजपा द्वारा, उसके पदाधिकारियों द्वारा इस अभियान को लेकर भले ही कुछ भी कहा जाये मगर वास्तविकता यह है कि इस अभियान से न केवल पार्टी की बल्कि मोदी जी की, योगी जी की छवि को धक्का लगा है. भाजपा को, ऐसे अभियान को बनाने वालों को विचार करना था कि इस देश ने कोरोना काल में मोदी जी के कहने पर शंख-थाली बनाये थे; दिए जलाये थे; और भी अनेक अवसरों पर मोदी जी के विचारों का सम्मान किया गया. अब जबकि विपक्षियों द्वारा उनके विरोध में माहौल निर्मित किया जा रहा है, उसमें ऐसे कार्यक्रम सहयोगी ही बनते नजर आ रहे हैं. कुछ समय पहले वैश्विक संकट के समय में मोदी जी द्वारा पेट्रोल-डीजल की कम से कम खपत करने को कहा गया था और यहाँ ढाई सौ मोटरसाइकिल वाराणसी से बड़नगर तक की यात्रा पर निकली हैं.

 

जबरिया थोपे गए से कार्यक्रमों को लेकर भले ही कोई सामने कुछ न कहे, सार्वजनिक रूप से कुछ न बोले मगर अंदरूनी रूप में इससे लोग खुश नहीं हैं. हाँ, कुछ तानाशाह मानसिकता वाले उच्चाधिकारियों को, संस्था प्रमुखों को अपनी भड़ास निकालने का मौका अवश्य मिल गया है.

 


21 सितंबर 2026

मंचीय राहुल की अशालीनता

विगत कुछ समय से महसूस हो रहा है जैसे नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी राजनीतिक विमर्श से अधिक मंचीय विमर्श में विश्वास करने लगे हैं. उनके कार्यक्रम में खुला मंच, किसी कलाकार की तरह से उनकी उपस्थिति और फिर उसके बाद राजनीतिक मुद्दों को छोड़ बाकी सब. उनके द्वारा जनहित चर्चा की जाती सी नजर आती है मगर उसके पीछे हाव-भाव, भाषा-शैली आदि अमर्यादित, अशालीन रूप में होती है. ऐसा वे अनजाने में नहीं करते, अचानक से ऐसा नहीं होता, एक-दो बार भी ऐसा नहीं होता बल्कि पूरी योजना के साथ लगभग प्रत्येक कार्यक्रम में ऐसा किया जाने लगा है.

 

अभी इंदौर में छात्रों की गूँज कार्यक्रम में एक हास्य कलाकार को बुलाकर मोदी जी की मिमिक्री करवाना, राहुल गांधी का पूरी सक्रियता से सहयोग करना विवाद उत्पन्न करने वाला कृत्य नहीं होता यदि वह मिमिक्री फूहड़ता के स्तर तक न पहुँचती. यह बात अपने आपमें अजीब ही है कि छात्रों के मुद्दों के नाम पर नेता प्रतिपक्ष के मंच पर एक हास्य कलाकार न केवल प्रधानमंत्री की मिमिक्री करे बल्कि प्रधानमंत्री की ओर से किसी कार्यक्रम में एक बुजुर्ग महिला को कुर्सी देने के आग्रह को भी निहायत भोंड़ेपन से प्रदर्शित करे. यह समझा जा सकता है कि राजनीति में अपने विरोधियों के बयानों का, उनकी नीतियों का, उनकी कार्यशैली का विरोध किया जाये, उन पर कटाक्ष किया जाये मगर यह समझ से परे है कि किसी बुजुर्ग महिला को कुर्सी दिलवाने वाली बात का फूहड़ता से मजाक बनाया जाये; उसे सेटिंग जैसी शब्दावली के साथ प्रस्तुत किया जाये.

 



राजनीतिक क्षेत्र में इन दिनों भाषाई, चारित्रिक, नैतिक गिरावट लगातार देखने को मिल रही है लेकिन नेता प्रतिपक्ष के मंच से ऐसा होना राजनीति के तेजी से गिरते जा रहे स्तर को प्रदर्शित करता है. यह स्तरहीनता न केवल राजनीति को फूहड़ बना रही है बल्कि समाज से संवेदनशीलता को समाप्त कर रही है. देखा जाये तो राहुल गांधी के मंच से ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. उनकी तरफ से प्रधानमंत्री सहित अनेक उच्च पदस्थ लोगों पर अमर्यादित भाषाई हमला करना, सरकार की नीतियों का अशालीन रूप से मजाक बनाना आम बात है. जनमानस को भली-भांति याद होगा, कुछ समय पहले इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी का अमर्यादित ढंग से उल्लेख उनके मंच से ही किया गया था.

 

यहाँ विचारणीय ये होना चाहिए कि आखिर राजनीति में अब अशालीन भाषा, अमर्यादित आचरण, फूहड़ हाव-भाव, व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप को स्थान क्यों मिलने लगा है? क्या संविधान के अनुच्छेद 19 में मौलिक अधिकार के रूप में अभिव्यक्ति की आज़ादी को रखने का ये दुष्परिणाम है? संविधान के अनुच्छेद 19(1)(A) में सभी भारतीय नागरिकों को वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है. यहाँ वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ एक भारतीय नागरिक द्वारा लिखकर, बोलकर, छापकर, इशारे से या किसी अन्य तरीके से अपने विचारों को व्यक्त करने से है. यद्यपि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(2) में उन सीमाओं का भी उल्लेख है जिनके द्वारा अभिव्यक्ति की आज़ादी पर कुछ हद तक प्रतिबन्ध लगाया गया है तथापि आये दिन नेताओं द्वारा इसका अतिक्रमण किया जाता है. वे भूल जाते हैं कि संविधान ने उनको अभिव्यक्ति की आज़ादी इसके लिए दी है कि वे सरकार की निरंकुशता पर सवाल उठा सकें, जनता के विरुद्ध होने वाले कार्यों का विरोध कर सकें, लोकतान्त्रिक व्यवस्था का हनन करने वालों के खिलाफ आवाज़ बुलंद कर सकें. इन मूल बातों को भुलाकर उनके द्वारा व्यतिगत आक्षेप लगाये जाने लगते हैं, एक-दूसरे के निजी जीवन को सार्वजनिक रूप से कलंकित किया जाने लगता है.

 

हाल के दिनों में आरोप-प्रत्यारोप का, बयानबाजी करने का, सार्वजनिक सभाओं के साथ-साथ सदन में बोलने का स्तर गिरता ही नजर आया है. पिछले दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर पर चले धरना प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री को न केवल सार्वजनिक रूप से अश्लील गालियाँ दी गईं बल्कि उसके पोस्टर तक भी प्रदर्शित किये गए. इन भद्दी और अश्लील गालियाँ देने वालों में लड़के-लड़कियाँ, दोनों ही शामिल रहे. उनके इस अशालीन और फूहड़ कृत्य को हल्का-फुल्का मजाक कहा गया, कुछ लोगों द्वारा तो इसे जेन-जी की ताकत बताते हुए उनकी सहज अभिव्यक्ति बताया गया. कहने का तात्पर्य यह कि सार्वजनिक रूप से गाली-गलौज को भी इसके चलते स्वीकार्यता प्रदान कर दी गई क्योंकि ऐसा राजनीतिक रूप से प्रधानमंत्री के खिलाफ, किसी नेता के खिलाफ, किसी दल विशेष के खिलाफ ऐसा किया जा रहा था. इस तरह की सोच, ऐसे कृत्य राजनीति के बिगड़ते स्वरूप को और विषाक्त बना रहे हैं. इसमें सभी दलों का योगदान है, किसी का कम तो किसी का ज्यादा. राजनीतिक दल अब विरोधी दल को प्रतिस्पर्धी के बजाय शत्रु के रूप में देखने लगे हैं. उनके बीच का यह शत्रुभाव अब समाज में भी प्रवेश करने लगा है.

 

राहुल गांधी के मामले में ऐसा लग रहा है जैसे लम्बे समय से सत्ता की परिधि से दूर होने के कारण, तमाम तरह के चुनावों में लगातार मिलती पराजय से वे सही और गलत का निर्णय करना भूल गए हैं. उनको यह नहीं भूलना चाहिए कि वे देश के एक प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवार के सदस्य हैं; एक बहुत पुराने दल के नेता हैं इसके साथ ही नेता प्रतिपक्ष हैं. उनके द्वारा उपयोग की जाने वाले अशालीन भाषा, घटिया शब्दावली तात्कालिक तालियाँ बजवा दे, सस्ती लोकप्रियता हासिल करवा दे किन्तु इससे न केवल लोकतान्त्रिक मर्यादा का हनन होता है बल्कि देश की छवि को भी धक्का लगता है. ऐसे में हाल-फिलहाल भले ही राहुल गांधी खुले मंच से भाषाई, व्यावहारिक, सामाजिक मर्यादा को तिलांजलि देते नजर आ रहे हों किन्तु व्यापक रूप में यहाँ सभी राजनैतिक दलों को, सभी जिम्मेवार राजनैतिक व्यक्तियों को आपसी सामंजस्य बनाकर विचार करना होगा कि कैसे राजनीति में भाषा की, व्यवहार की शालीनता बनी रहे.


20 सितंबर 2026

विकास की ओर मुफ़्त में अग्रसर हैं हम सब

यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाये जाने की अधिसूचना के बाद से दोनों तरफ से तर्क-वितर्क मचा हुआ है. सरकार और उसके समर्थक अपना पक्ष रख रहे हैं, इस शुल्क के विरोधी अपनी बात कह रहे हैं. यद्यपि इसको 15 अक्टूबर से अमल में आना है तथापि इस पर अभी से कुछ दुकानदारों की नकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिलने लगी है. वैसे सरकार द्वारा लेनदेन पर लगने वाले शुल्क के बारे में अपनी ही कहानी कही जा रही है मगर उस कहानी के पीछे खुद के द्वारा मुफ्त वितरण के बोझ को नहीं देखा जा रहा है.

 

आइये, इसकी तुलना कीजिए जरा,

एक के लिए वार्षिक खर्च लगभग बीस हज़ार करोड़ रुपए. दूसरे के लिए मासिक खर्च लगभग सोलह हज़ार करोड़ रुपए. जी हाँ, सही से पढ़ा है आपने इस बहुत बड़े अंतर को.

 

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) पर केन्द्र सरकार हर महीने औसतन 16,000 करोड़ रुपए से 17,000 करोड़ रुपए खर्च करती है. इस योजना के लिए सालाना करीब 2.03 लाख करोड़ रुपए से लेकर 2.13 लाख करोड़ रुपए का आवंटन किया जाता है. इसमें देश के पात्र राशन कार्डधारकों को प्रति व्यक्ति 5 किलो मुफ्त राशन दिया जाता है.

 

इसके उलट MDR (मर्चेंट डिस्काउंट रेट) को पूरी तरह मुफ्त रखने या इसे चलाने पर सालाना करीब 20,000 करोड़ रुपए से लेकर 20,700 करोड़ रुपए का कुल परिचालन खर्च आता है. इसके बाद भी शुल्क पहले वाले पर लगा दिया गया अर्थात यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाया गया है.

 

एक और आँकड़े पर यदि निगाह डाली जाये तो पता चलेगा कि अनुमानित रूप में देश की जनसंख्या लगभग 147 करोड़ है और PMGKAY के अन्तर्गत मुफ्त राशन पाने वालों की संख्या लगभग 81 करोड़ है. सोचिए, आधे से ज़्यादा जनसंख्या (लगभग 55%) मुफ़्त का राशन ले रही है. विकास की ओर मुफ़्त में अग्रसर हैं हम सब.

 


16 सितंबर 2026

शुल्क का बोझ आएगा ग्राहकों के ऊपर

कराघात (Impact of Tax) और करापात (Tax Incidence) के बारे में क्या आपने पढ़-सुन रखा है? जिसने पढ़-सुन रखा है वह सहजता से यूपीआई लेनदेन सम्बन्धी मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) के सच को समझ सकता है. सरकार द्वारा एक अधिसूचना जारी करके यूपीआई लेनदेन पर कुछ शुल्क लगाये जाने के बारे में जनता को बताया है. इसमें बताया गया है कि इसमें दो हजार रुपये तक के लेनदेन को किसी भी तरह के शुल्क से मुक्त रखा गया है, साथ ही इसके ऊपर के लेनदेन पर लगने वाले शुल्क को भी दुकानदारों से लिया जायेगा, न कि ग्राहकों से.

 

दो हजार रुपये से अधिक के लेनदेन पर तो शुल्क लगाया ही गया है, भले ही वह देखने में बहुत कम समझ आ रहा हो; जारी अधिसूचना की भाषा में भले ही यह शुल्क उपभोक्ता को नहीं देना है किन्तु सोचिए एक पल को कि क्या यह शुल्क दुकानदार देने को तैयार होगा? आज भी क्रेडिट कार्ड से भुगतान करने की स्थिति में दुकानदार लगने वाले टैक्स को ग्राहक की तरफ मोड़ देता है. कुछ इसी तरह की स्थिति यहाँ भी बनेगी. शुल्क चाहे दस रुपये आये या अधिकतम तीन सौ रुपये, उसे दुकानदार के द्वारा ग्राहक पर ही आरोपित कर दिया जायेगा. उदाहरण के लिए आप कोई सामान लेते हैं जो पच्चीस-पचास हजार रुपये का है. इस पर लगने वाला शुल्क सौ-दो सौ रुपये होगा और यह अधिकतम तीन सौ रुपये निर्धारित कर दिया गया है. निश्चित समझिये कि यह अतिरिक्त रुपये भी आपको ही चुकाने होंगे.

 

यूपीआई के कारण बैंकों पर, सरकार पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ की कहानी कहने से पहले देश में मुफ्त में बँटने वाली रेवड़ियों की भी गिनती कर लेना, उससे पड़ने वाले आर्थिक बोझ का भी वजन कर लेना. जनहित के नाम पर मुफ्त के राशन से लेकर लाड़ली-लाड़ला किया जा सकता है; स्कूटी, मोबाइल, टेबलेट किया जा सकता है, बैंक खातों को समय-समय पर भरा जा सकता है, उसी तरह प्रत्येक यूपीआई लेनदेन को भी जनहित में स्वीकारा जा सकता है.

 


10 सितंबर 2026

अस्सी के दशक में पहुँचने की भेड़चाल

'अस्सी' को काशीनाथ सिंह ने 'काशी का अस्सी' लिख कर प्रसिद्ध कर दिया था, अब फेसबुक की भसड़ में अस्सी के दशक का पुनर्पाठ किया जा रहा है. जिसे देखो वो अपनी अस्सी के दशक की फोटो बनाये-चिपकाये पड़ा है. इसमें हास्यास्पद स्थिति ये है कि ऐसे लोग जिनका जन्म भी अस्सी के दशक में नहीं हुआ था, वे भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सहयोग से बाकियों की बुद्धि ख़राब करने में लगे हैं.

 

ठीक है, तकनीक का आनंद उठाना चाहिए, जीवन में इस तरह से हलके-फुल्के पलों को भी जीना चाहिए मगर क्या ही अच्छा और सुखद महसूस होता यदि जिन्होंने अस्सी के दशक का खुशनुमा जीवन जिया है, जीवंत ज़िन्दगी का आनन्द उठाया है, वे लोग बजाय AI से बनी अथवा अपनी असली फोटो लगाने के स्थान पर उन दिनों की स्मृतियों को लिखते. गर्मी की छुट्टियों की तफरी, आम का स्वाद, तरबूज-खरबूज का रस, छतों पर बैठकर एकसाथ भोजन का मजा, लालटेन की रौशनी में पढ़ाई, रामलीला में जगह घेरने की कवायद, मैदान पर खेलने को जगह बनाने की कुश्ती, दोस्तों के संग शैतानियों का साम्राज्य खड़ा करना, कॉमिक्स की दुनिया में खो जाना, राजन-इकबाल सीरीज के साथ जासूस बन जाना, किराये की साईकिल लेकर धुरंधर हवावाजी करना आदि-आदि कितना कुछ था बताने को, लिखने को.

 

इन सबके बजाय उन दिनों के लोगों ने भी चित्र चिपकाना, झूठे चित्र बनाना पसंद किया. शायद लिखने से ज्यादा आसान लगा होगा AI से फोटो बनवा कर चिपका देना या फिर एल्बम से फोटो निकाल उसकी कॉपी लगा देना.


07 सितंबर 2026

बच्चों के सपने और मौत के सौदागर

दिल्ली में इमारत का गिरना किसी ढाँचे का गिरना नहीं हुआ बल्कि उन अनगिनत सपनों का विध्वंस हुआ है जो उसमें रहने वाले बच्चों की आँखों में पल रहे थे. इमारत गिरने की इस त्रासद घटना के बाद हम सबके सामने एक गम्भीर और झकझोर देने वाला प्रश्न खड़ा हो गया है कि क्या इस हादसे के बाद भी हम कुछ सीखने की स्थिति में हैं या फिर एक-दूसरे पर दोषारोपण करते हुए अपने बच्चों के लिए किसी अन्य बड़े शहर में रहने की व्यवस्था तलाशते रहेंगे? इमारत में रहने वाले बच्चे थे, पढ़ने के लिए आये थे. उनकी आँखों में सपने थे और एक पल में ही वे सब ध्वस्त हो गए. सोच कर देखिये एक पल को कि उसी इमारत में हमारा-आपका बच्चा रहने गया होता? अब ये भी सोचिये कि पिछले कुछ सालों ने अचानक से ये भेड़चाल क्यों दिखाई देने लगी कि सबको बड़े से और बड़े की तरफ दौड़ना है, वो भी अपने जीवन को दाँव पर लगाकर? क्या हमारी यह अंधी दौड़ इतनी कीमती है कि इसके बदले में हम अपने बच्चों की ज़िन्दगी को दाँव पर लगा दें?

 

पिछले कुछ वर्षों में हमारे सामाजिक ताने-बाने और सोच में एक अजीब सी भेड़चाल देखने को मिली है. हर कोई बड़े से बड़े शहर और बड़े से बड़े संस्थान की तरफ भागना चाहता है. यह अंधी दौड़ इस हद तक पहुँच चुकी है कि लोग अपने जीवन को ताक पर रखने से नहीं हिचकिचा रहे हैं. कभी बेहतर शिक्षा के नाम पर, कभी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के नाम पर, कभी नौकरी के लिए की जाने वाली तैयारी के नाम पर हम अपने बच्चों को मशीन बनाते जा रहे हैं. हम उन्हें एक साधारण और संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देने के बजाय उनको बहुत-बहुत बड़ा आदमी बनने के लिए, सर्वाधिक सफल व्यक्ति बनने के लिए प्रोत्साहित करने से ज्यादा एक तरह की आग में झोंक रहे हैं. बड़े से बड़े संस्थान में पढ़ाने की सनक, बड़े से बड़े शहर में रहने की जिद ने बच्चों के जीवन को एकआयामी बना दिया है, परिवारों को असंवेदित कर दिया है. कम से कम खर्च में अधिक से अधिक पा लेने की जुगाड़ में वे भविष्य की तरफ नहीं देखते हैं. ऐसे में बच्चे भी, परिवार के द्वारा की जाने वाली अनथक कोशिशों के बीच कम से कम संसाधनों में रहने को, जीवन जीने को मजबूर होते हैं.

 

ऐसा नहीं है कि छोटी जगह के बच्चों को महानगरों में, उच्च स्तरीय संस्थानों में पढ़ने का अवसर नहीं मिलना चाहिए. इसका अर्थ यह भी नहीं कि उनके प्रतिष्ठित सेवाओं में जाने का अधिकार नहीं, उनके लिए तैयारी करने का विकल्प नहीं. यहाँ भाव यह है कि आखिर इसके लिए हमारे बच्चे ही क्यों असमय काल का शिकार बनें? बहुधा होता यही है कि अभिभावक कहीं पीजी के नाम पर, कहीं हॉस्टल के नाम पर अपने बच्चों को किन हाथों में, किस सुरक्षा व्यवस्था में, किस भोजन व्यवस्था के बीच छोड़ आते हैं, उन्हें खुद पता नहीं होता है. उनका बच्चा कितना सुरक्षित है, उसकी जान कितनी सुरक्षित है इसके प्रति बहुत ज्यादा खोजबीन से ज्यादा प्राथमिकता इस बात की रहती है कि कम से कम व्यय से अधिक से अधिक सुविधाओं को बटोर लिया जाये. यहीं आकर हम माता-पिता ही अपने बच्चों के जीवन का सौदा कर आते हैं. इस सौदे में हमें सिर्फ बच्चों का सफल परिणाम चाहिए होता है. हम उसकी तैयारी के बारे में जानकारी लेते हैं, कोचिंग की जानकारी लेते हैं, उसकी परीक्षा के बारे में पूछते हैं, उसके परिणामों की चर्चा कर लेते हैं मगर कभी उसके स्वास्थ्य के बारे में, उसकी जीवन-शैली के बारे में, उसकी सुरक्षा के बारे में चर्चा भी नहीं करते हैं. विगत वर्षों में कभी बिल्डिंग में आग लगने के कारण, कभी बेसमेंट में किसी आपदा के कारण बच्चों की जान चली गई तो कभी अत्यधिक मानसिक दबाव के चलते भी हमारे-आपके बच्चों ने मौत का रास्ता अपना लिया. सोचने वाली बात है कि आखिर जरा सी भेड़चाल में नुकसान किसका हुआ?

 

हमें यह कड़वा सच स्वीकार करना होगा कि शिक्षा के इस दौर में हमसे, आपसे और हमारे बच्चों से एक बड़ा व्यापार किया जा रहा है. कोचिंग माफिया, हॉस्टल संचालक और महानगरों के भू-माफिया इस व्यवस्था से अकूत धन कमा रहे हैं, भारी-भरकम मुनाफा ले रहे हैं. उन्हें हमारे बच्चों की जान की कोई परवाह नहीं है. ऐसी किसी भी आपातकालीन या त्रासद स्थिति में जब हादसे होते हैं तो ये तथाकथित बड़े संस्थान और व्यवस्था के व्यापारी रिश्वत और रसूख के सहारे आसानी से बच निकल जाते हैं. अंततः सब कुछ खोने वालों में सिर्फ और सिर्फ हम और आप होते हैं. जो बच्चे हमने खो दिए या जो युवा इस अंधी व्यवस्था की भेंट चढ़ गए उनकी अमूल्य जान की भरपाई दुनिया की कोई ताकत नहीं कर सकती.

 

यह समय केवल आँसू बहाने का नहीं, दोषारोपण करने का भी नहीं बल्कि गहरे आत्मसंज्ञान का है. क्या हम अपने बच्चों को इसलिए महानगरों की इन खौफनाक गलियों में भेजते हैं कि वे किसी लापरवाही की भेंट चढ़ जाएँ? क्या सफलता का पैमाना सिर्फ बहुमंजिला इमारतों में दम तोड़ते सपने होने चाहिए? यदि हमने अब भी बच्चों की जान और सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं दी तो ऐसे हादसों पर लगाम लगने वाली नहीं है. सपनों के व्यापारी अपना व्यापार करते रहेंगे और हम-आप उनके स्वप्न-जाल में फँसकर उनका शिकार बनते रहेंगे.  

 

03 सितंबर 2026

बेटी के जन्म पर खुशियों भरा पल

समाज में फ़ैल रही नकारात्मकता के बीच ऐसी खबरें निश्चित रूप से सकारात्मकता भरा वातावरण उत्पन्न करती हैं. आवश्यकता इस तरह की खबरों को अधिक से अधिक प्रसारित करने की है, इनसे सीख लेने की है.
++




साभार : दैनिक जागरण
03.09.2026
कानपुर संस्करण

31 अगस्त 2026

लेखन को लेकर चलती उथल-पुथल

बहुत वर्षों से लेखन कार्य किया जा रहा है. सैकड़ों की संख्या में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक लेख प्रकाशित भी हुए. छोटे-बड़े समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं ने स्थान दिया. इसके साथ-साथ अनेक पुस्तकों का भी प्रकाशन हुआ. इनके द्वारा अपने जनपद में और जनपद से बाहर भी एक पहचान भी बनी. इन सबके बाद भी कई बार मन में उथल-पुथल सी मची रहती है. इसके चलते कई बार लेखन में नियमितता नहीं रह पाती है. कई मित्र समय से उनको लेख न भेज पाने के कारण टोकते भी हैं. यह हमारे लेखन के प्रति उत्प्रेरक का काम करता है. अनेक सुधिपाठक भी समय-समय पर लेखन में आये अवरोध के सम्बन्ध में जानकारी लेते रहते हैं, लिखने को प्रोत्साहित करते रहते हैं.

 

बावजूद इसके बहुत बार लगता है कि इस लेखन का अर्थ क्या है? इतने विषयों पर लिखे-प्रकाशित हो चुके लेखों का, पुस्तकों का अभीष्ट क्या है? हम अपने लेखन से लोगों को, समाज को क्या दे रहे हैं ये तो एक बात है ही, लोग, समाज हमारे लेखन से ले क्या रहा है, यह भी एक बात है. कई बार लगता है कि हमने लिखा, किसी ने प्रकाशित किया, कुछ लोगों ने पढ़ा और फिर वह लेख हमारे संग्रह का हिस्सा बन गया. खुद को अल्पकालिक ख़ुशी हुई और फिर आसपास ज्यों की त्यों स्थिति. किसी भी तरह का कोई बदलाव नहीं. किसी भी तरह का कोई प्रभाव नहीं. (हाँ, इक्का-दुक्का लोग ऐसे हैं जिन पर प्रभाव हुआ मगर वे कुल लेखन के अनुपात में नगण्य ही कहे जायेंगे.)

 

इधर सोशल मीडिया में, विशेष रूप से फेसबुक में लोगों की अतिशय निर्बाध सक्रियता ने सोच-समझ वाला बिन्दु ही मिटा दिया है. अब पूर्वाग्रहयुक्त मानसिकता से काम हो रहा है, उसी के अनुसार विचार बन रहे हैं, लोग प्रभावित हो रहे हैं. ऐसे समय में खुद को खुद में ही समेट लेने का मन करता है. सिर्फ स्वयं के लिए लिखना, जब मन करे तब लिखना, जो मन करे वो लिखना. न प्रकाशन का मोह, न लोगों तक पहुँचने की उत्कंठा. वैराग्य जैसा भाव समझ आता है कई बार हमें अपने भीतर.


26 अगस्त 2026

कालखण्ड परिस्थितियों का भी ध्यान रखा जाये

"शुरू करो अंताक्षरी लेकर हरि का नाम,

समय बिताने के लिए करना है कुछ काम."

इन दो पंक्तियों को बहुत से लोगों ने अपना स्वर दिया होगा बचपन में. इसकी दूसरी पंक्ति को लोग आज भी दोहराते रहते हैं कि समय बिताने के लिए करना है कुछ काम. इस काम में कभी आ जाता है सनातन धर्म, कभी आ जाते हैं हिन्दू रीति-रिवाज, कभी आ जाती हैं महिलाएँ, कभी आ जाते हैं हिन्दू धार्मिक ग्रंथ, कभी आ जाती है मनुस्मृति.

 


यहाँ एक साधारण सा प्रश्न है जो आए दिन दिमाग़ को दही करता रहता है कि आज से हज़ार
, दो हज़ार साल बाद के समाज में आज की आरक्षण व्यवस्था को लेकर संदेह जताना कितना सही होगा? उस समय ये कहना कितना सही होगा कि हज़ार, दो हज़ार साल पहले के समाज में संविधान नामक ग्रंथ में कितनी अराजक व्यवस्था थी कि एक वर्ग के लोग उच्च अंक पाने के बाद भी बाहर रहते थे और एक दूसरे वर्ग के लोग निगेटिव अंकों के बाद भी प्रवेशित हो जाते थे?

 

जिस कालखण्ड को देखा नहीं गया, जिस समय के मानव-धर्म को समझा नहीं गया, उस दौर के संवैधानिक नियमों का अध्ययन नहीं किया गया तक उस कालखण्ड को, उसके नियमन को, उसके मनीषियों को दोष देना समझ से परे है. प्रत्येक कालखण्ड की अपनी व्यवस्थाएँ रहीं हैं और उनके अनुपालन के लिए ही नियम बनाये जाते रहे हैं. याद करिए कोरोना का दौर जब एक परिवार के सदस्य आपस में एक-दूसरे को छूने से बच रहे थे. क्या ये छुआछूत वाला समाज कहा जाएगा?

 

कालखण्ड, परिस्थितियों, समाज का अध्ययन किए बिना पक्ष या विपक्ष में कुछ भी कहना एक प्रकार का पूर्वाग्रह है. ध्यान रखिए, समय बिताने के लिए भले ही कुछ काम करना पड़ा हो मगर फिर अगला काम पहले वाले के अंतिम अक्षर से ही शुरू हुआ है. याद करो उस अंताक्षरी को.

 


24 अगस्त 2026

लोलक की तरह सक्रिय न रहें

लोलक वाली घड़ी हम सबने देखी होगी. अभी भी बहुत से लोगों के घरों में होगी भी. एक बात पर गौर किया है, इस घड़ी का लोलक बराबर चलता है, क्रियाशील रहता है मगर पहुँचता किसी मंजिल पर नहीं. एक और बात पर गौर करिए कि जिस घड़ी से यह लगा होता है, उस घड़ी का समय निर्धारण करने में इसका कोई योगदान नहीं होता है. ये बस इधर से उधर डोलता रहता है. कुछ ऐसी स्थिति आरक्षण हटाओ की माँग करने वाले हमारे सक्रिय, जीवंत, ऊर्जावान, शक्तिशाली, तेजस्वी, प्रतिभावान युवा साथियों ने बना ली है. इतनी मेहनत करने का, इधर से उधर भागदौड़ करने का, लगातार सक्रिय रहने का भी तब तक कोई अर्थ नहीं जब तक कि आप समय निर्धारण के योग्य नहीं हो जाते.

 



समझिये तो कि आरक्षण हटेगा कैसे? क्या-क्या संवैधानिक कदम उठाने होंगे? किस तरह की प्रक्रिया को अपनाना पड़ेगा? और भी तमाम प्रश्न हैं जो बहुत जटिल हैं, कठिन हैं. उनका समाधान किये बिना आप सबकी, हम सबकी ऊर्जा, सक्रियता इसी लोलक की तरह ही रहेगी.

 

बाकी आप सभी समझदार हैं, विचार करियेगा हमारी बात पर.

 


21 अगस्त 2026

आरक्षण पर हो पुनर्विचार

इन दिनों आरक्षण एक ज्वलंत मुद्दा बनकर उभरा हुआ है. विगत कई दशकों से यह एक ऐसा विषय बना हुआ है जिस पर बौद्धिक, राजनीतिक और सामाजिक मंचों पर लगातार बहस होती रही है. एक सवाल बार-बार उठता रहा है कि क्या आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था अपने मूल उद्देश्यों को पूरा करने में सफल हो सकी है? आरक्षण की विगत यात्रा पर नजर डालें तो स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है कि इसके कारण अब समाज में असंतोष और विभेद पनपने लगा है. स्वतंत्रता के तुरंत बाद भारतीय समाज एक तरह की विषमता और भेदभाव में जकड़ा हुआ था. हाशिये पर खड़े वर्गों को समानता दिलाने के लिए, उनको मुख्यधारा में जोड़ने के लिए संविधान निर्माताओं ने सामाजिक और आर्थिक स्तर पर समावेशी प्रावधान की कल्पना की. इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 15(4), 15(5), 16(4) और 16(4ए) में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए शिक्षा और सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण की व्यवस्था लागू की. सामाजिक विभेद को दूर करने के साथ-साथ आर्थिक विषमता को दूर करने के उद्देश्य से 103वाँ संविधान संशोधन (2019) लागू करके आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण का नया प्रावधान जोड़ा गया.

 



कालांतर में आरक्षण सम्बन्धी स्थिति में मंडल आयोग की सिफारिशों के बाद अन्य पिछड़ा वर्ग को भी शामिल किया गया. आरक्षण सम्बन्धी व्यवस्था को लेकर, इसके क्रियान्वयन को लेकर समाज में असंतोष भी उपजता रहा. ऐसे में न्यायालयों द्वारा भी समय-समय पर इसकी समीक्षा की गई. इंद्र साहनी बनाम भारत संघ (1992) के ऐतिहासिक निर्णय ने आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तक तय की तथा क्रीमीलेयर की अवधारणा को जन्म दिया. इसके अलावा एम. नागराज (2006)  मामले में स्पष्ट किया गया कि प्रमोशन में आरक्षण देते समय प्रशासनिक दक्षता को बनाए रखना आवश्यक है. इसके बावजूद अनेक विसंगतियों ने इस व्यवस्था को आलोचनाओं के घेरे में खड़ा कर दिया है. प्रवेश परीक्षाओं, नौकरियों में सामान्य श्रेणी के अभ्यर्थियों को अत्यधिक अंक लाने के बावजूद बाहर होना पड़ता है जबकि कम अथवा ऋणात्मक अंक पाने के बाद भी आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी चयनित हो जाते हैं. अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए क्रीमीलेयर सीमा निर्धारित किये जाने के बाद भी सम्पन्न परिवारों की कई पीढ़ियाँ ही लाभान्वित हो रही हैं. एससी/एसटी वर्ग में क्रीमीलेयर व्यवस्था लागू न होने के कारण इस वर्ग के उच्च पदस्थ परिवार ही आरक्षण का दोहन कर रहे हैं. ऐसी स्थिति के कारण यह व्यवस्था न्यायसंगत प्रतीत नहीं हो रही. आरक्षण का जो उद्देश्य निर्धारित किया गया था वह समस्त जरूरतमंदों तक पहुँचने के स्थान पर सीमित परिवारों तक सिमट गया है. ऐसी अनेकानेक विसंगतियों के कारण आरक्षण की व्यापक और निष्पक्ष समीक्षा होने की माँग उठने लगी है. आलोचकों का सुझाव है कि जाति आधारित आरक्षण को धीरे-धीरे समाप्त करके उसके स्थान पर आर्थिक आधार पर आरक्षण को लागू किया जाये.

 

यदि सैद्धांतिक अथवा व्यावहारिक रूप से केन्द्र सरकार कभी आरक्षण व्यवस्था को पूरी तरह हटाने का विचार करती है तो यह राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी दृष्टि में एक अभूतपूर्व चुनौती होगी. इसके लिए सरकार को अनेक स्तरों पर चरणबद्ध कानूनी, विधायी कदम उठाने होंगे. सरकार को सबसे पहले संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से संविधान संशोधन विधेयक पारित कराना अनिवार्य होगा. यहाँ ध्यान रखना होगा कि संविधान के अनुच्छेद 368(2) के अनुसार यदि कोई ऐसा संशोधन किया जाता है जो देश के संघीय स्वरूप को प्रभावित करता है तो उसे देश की कम से कम आधी विधानसभाओं से साधारण बहुमत द्वारा अनुमोदित कराना पड़ता है. चूँकि राजनीतिक रूप से देश के विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों, विभिन्न विचारधाराओं की सरकारें कार्य करती हैं इसलिए राज्य स्तर पर इस प्रकार की सहमति प्राप्त करना केन्द्र सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती होगी.

 

संविधान संशोधन सम्बन्धी कदम के साथ-साथ न्यायिक स्तर पर भी सरकार को जवाबदेह होना पड़ेगा. देश के उच्चतम न्यायालय द्वारा सुनिश्चित किया जाता है कि संविधान की मूल भावना और सामाजिक न्याय का सिद्धांत आहत न हो. यदि कोई कानून अथवा संशोधन समानता के मूल अधिकार की अवधारणा को पूरी तरह समाप्त करने का प्रयास करता है तो उसे न्यायिक समीक्षा के द्वारा असंवैधानिक घोषित किया जा सकता है. ऐसे में केन्द्र सरकार को न्यायालय के समक्ष यह सिद्ध करना होगा कि यह कदम देश के हित में किस प्रकार आवश्यक है और इसके विकल्प के रूप में अन्य कौन सी नीतियाँ क्रियान्वित की जाएँगी. इन औपचारिक और विधायी कदमों के अलावा सरकार को देश की सामाजिक, राजनीतिक स्थिति पर भी विचार करना होगा. आरक्षण अब सामाजिक स्तर सुधारने, वंचित वर्गों को लाभान्वित करने की दृष्टि से कम, राजनीतिक लाभ के लिए ज्यादा प्रभावी माना जाने लगा है. ऐसे में आरक्षण हटाने मात्र के विचार से ही सामाजिक असंतोष, हिंसक प्रदर्शन, राजनीतिक अस्थिरता देश को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती है, देश में गम्भीर आंतरिक अशांति फैल सकती है. जातिगत आरक्षण को हटाना, आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू करना केन्द्र सरकार और नीति निर्माताओं के लिए संवेदनशील संतुलन साधने जैसी चुनौती है.

 

विगत वर्षों की लगभग असफल आरक्षण व्यवस्था को देखने के बाद सामान्य वर्ग के, प्रतिभावान युवाओं की आकांक्षाओं, वैश्विक मानकों, योग्यता आधारित व्यवस्था की माँग को दरकिनार नहीं किया जा सकता वहीं दूसरी ओर सामाजिक न्याय के संवैधानिक संकल्प को भी नहीं छोड़ा जा सकता है. ऐसे में आरक्षण व्यवस्था को गतिशील और पारदर्शी बनाया जाए, क्रीमीलेयर नियमों को कड़ाई से लागू किया जाए ताकि वास्तविक जरूरतमंदों को इसका लाभ मिले. शिक्षा, नौकरी के लिए आरक्षण के साथ-साथ प्रतिभाओं को भी अवसर दिया जाये. नीति-नियंताओं को, राजनीतिज्ञों को ध्यान रखना होगा कि अब समय आ गया है कि राजनीतिक संकीर्णता से ऊपर उठकर ऐसी राष्ट्रीय नीति पर विचार किया जाए जो योग्यता का सम्मान करे और वंचितों को संबल प्रदान करे.


11 अगस्त 2026

हिन्दी के पंचम वर्ण का प्रयोग

हिन्दी की जितनी दुर्दशा, दुर्गति हम हिन्दी वालों ने की है, उतनी तो शायद लॉर्ड मैकाले की औलादों ने भी नहीं की होगी. इधर सोशल मीडिया के स्थानीय संस्करणों में उरई  का एक वीडियो तैरने में लगा है, जिसमें एक विद्यालय के नाम को लेकर पत्रकारिता आजमाई जा रही है. पत्रकारिता के नाम पर अब तो किसी डिग्री की, डिप्लोमा की, किसी संस्थान की, कैमरे की आवश्यकता ही नहीं, बस जेब में हाथ डाला, मोबाइल निकाला और बन गए पत्रकार. ऐसे ही किसी पत्रकार महोदय द्वारा एक द्वार का वीडियो बनाया गया और सोशल मीडिया पर उछाल दिया गया. इस उछाल के साथ एक सवाल भी चिपका दिया गया मगर बिना किसी ज्ञान के साथ,  बिना किसी व्याकरण की जानकारी के.


समस्या अकेले उन महाशय की नहीं, समस्या उनके साथ उछलते अनेक ज्ञानियों की है जिन्होंने हिन्दी व्याकरण तो छोड़िए, हिन्दी से भी उतना ही नाता रखा है, जितना घर-बाजार में बोलने के काम आता है. हिन्दी व्याकरण से, उसके सामान्य रूप से, वर्णों से, वर्णमाला के वर्गों से, पंचम वर्णों से, उनके प्रयोग से कोई लेना-देना नहीं है. लॉर्ड मैकाले की दुनिया में विचरण करते इन लोगों को हिन्दी की सामान्य जानकारी ही नहीं और ऐसे लोग ही इधर-उधर हिन्दी के प्रति सवाल उठाते हुए उसे बदनाम करने का काम करते रहते हैं.

 



यहाँ उस वीडियो से, उस नाम से, उस विद्यालय से सन्दर्भ भले हो  मगर उनकी चर्चा किये बिना सीधे-सीधे हिन्दी के वर्गों, पंचम वर्णों के बारे में कुछ सामान्य जानकारी दे दें. इसी से अंदाजा लगा लिया जायेगा कि उस वीडियो की, विद्यालय के लिखे नाम की वास्तविकता क्या है. हिन्दी वर्णमाला में स्वर, व्यंजन के बारे में तो आपको जानकारी होगी ही और संभवतः उनको भी जानकारी होगी जो उस वीडियो के आसपास भटक रहे हैं.

 

अब हिन्दी वर्णमाला के स्वर, व्यंजन पर चर्चा करने के बजाय चर्चा करते हैं वर्गों की. यहाँ सामान्य रूप से ये वर्ग स्वीकार्य हैं....

क वर्ग = इसमें आते हैं क, ख, ग, घ, ङ  

च वर्ग = इसमें हैं च, छ, ज, झ, ञ

ट वर्ग = इस वर्ग में हैं ट, ठ, ड, ढ, ण

त वर्ग = इसमें हैं त, थ, द, ध, न

प वर्ग =  इसमें प, फ, ब, भ, म

 

अब बात करते हैं लिखने में इनके प्रयोग की. जिस शब्द ‘गांधी’ की बात हो रही है, जो ‘गान्धी’ लिखा हुआ है. इसी से समझा जाये. जब किसी शब्द को लिखने में उस वर्ग के पंचम वर्ण का प्रयोग होता है तो वह उसी वर्ग के वर्ण के ठीक पहले अर्धरूप प्रयोग किया जाता है. जैसे ‘गांधी’ में ‘ध’ के पूर्व पंचम वर्ण का प्रयोग किया जाना है तो यहाँ देखना होगा कि ‘ध’ है त वर्ग का और त वर्ग का पंचम वर्ण है ‘न’ इसलिए हिन्दी व्याकरण के अनुसार ‘गांधी’ में ‘ध’ के पूर्व इस वर्ग का पंचम वर्ण ‘न’ अर्धरूप में आएगा अर्थात ‘आधे न’ के रूप में. इसलिए सही शब्द होगा ‘गान्धी’. लेखन में और टाइपिंग में सहजता बनाने के लिए पंचम वर्ण को आधा लिखने के स्थान पर अनुस्वार (अर्थात बिन्दु के रूप में) लगाया जाना मान्य किया गया है. इसलिए सर्वमान्य रूप में ‘गान्धी’ को ‘गांधी’ लिखा हुआ ही सही समझा जाने लगा है. (वैसे वीडियोधारी पत्रकार महोदय और उनके संगी-साथियों के लिए अनुस्वार, अनुनासिका शब्द भी अपरिचित होंगे. इस पर बाद में.)

 

इस विद्यालय के बोर्ड में आगे ‘इण्टर’ लिखा हुआ है. पता नहीं पत्रकार महाशय के कैमरे ने इसे गलत क्यों नहीं बताया? सम्भव है कि वे इसे ‘इंटर’ लिखे जाने का समर्थन करते हुए ‘इण्टर’ को गलत बता देते. यहाँ भी एक मिनट रुककर पंचम वर्ण और वर्ग के साथ समझ लें तो आने वाले समय में बहुत से इण्टर कॉलेज बचे रहेंगे कैमरे से. ‘इण्टर’ को देखिये और समझिये. यहाँ आधा वर्ण आना है ट वर्ग के पहले, ऐसे में इसी वर्ग का पंचम वर्ण आधा होकर लगेगा. अब गौर करिए ट वर्ग पर, इसका पंचम वर्ण है ‘ण’ और इसे ही आधा होना है. अब यह ‘ट’ के पहले आधा होगा तो सही शब्द होगा ‘इण्टर’. बाकी तो ये है कि टाइपिंग और लेखन की सहजता के लिए इसे ‘इंटर’ भी लिखा जाने लगा है. यह भी सही है. इस सही का तात्पर्य यह कतई नहीं कि ‘इण्टर’ गलत है.

 

हाँ, ये याद रखियेगा कि गांधी या गान्धी के स्थान पर गाँधी अवश्य ही गलत है. ऐसा इसलिए क्योंकि गांधी में स्वर अनुनासिका (चन्द्रबिन्दु) के स्थान पर अनुस्वार (बिन्दु) का है. नहीं हो रहा हो विश्वास तो चन्द्रबिन्दु (अनुनासिका) और बिन्दु (अनुस्वार) का उच्चारण करके देखना, सही शब्द पकड़ में आ जाएगा. हिन्दी का सम्मान न कर सकें, उसके प्रति आप ज्ञानवान न बन सकें तो कम से कम हिन्दी का अपमान तो न करें.