30 नवंबर 2009

वीभत्स पोस्ट हटा दी पर इन चित्रों का मजा लें-ये हमारा हिन्दुस्तान!!!

कल अपनी पोस्ट पर कुछ चित्र लगाये थे जो हमें मेल के द्वारा मिले थे। क्या सत्य है और क्या असत्य यह आकलन उन्हें करना है जो उनमें सत्य-असत्य को खोजने की कोशिश कर रहे हैं। हमें अपनी पोस्ट लगाने के बाद से कुछ फोन आये, उरई के दोस्तों और बाहर के मित्रों ने भी बताया कि क्या प्रतिक्रिया है उनकी इस पर।

दोपहर को खबर लगी कि टिप्पणी के द्वारा इस पोस्ट को हटाने के लिए कहा गया है। चूँकि हम उरई वालों की पूरी दोपहर (सुबह आठ बजे से रात आठ बजे के मध्य बिजली मात्र दो घंटे आती है, दोपहर में बारह बजे से दो बजे तक) लगभग बिना बिजली के ही बीतती है। ऐसा ही कुछ हमारे साथ भी होता है। इधर इनवर्टर भी साथ नहीं दे रहा है, और लैपटाप भी नहीं है कि दोपहर में नेट का सदुपयोग कर सकें, इस कारण अधिकतर रात को ही ब्लाग आदि पर समय देते हैं।


यह स्पष्टीकरण इस कारण से कि हमें पता चला था कि अदा जी ने अपनी टिप्पणी के माध्यम से इस पोस्ट को हटाने के लिए कहा था और अभी देखा तो उनकी कोई टिप्पणी यहाँ नहीं थी। हाँ, दो टिप्पणियाँ हटाई हुईं जरूर मिलीं। सम्भव है कि उनमें से एक अदा जी की होगी। वे इसे अन्यथा न लें, हम तो बेचारे बिजली के मारे।


हमें कई मेल भी मिलीं और अदा जी की मिटाई हुई टिप्पणी, तो हमने इस पोस्ट को हटा दिया है। किसी को आहत करना हमारा मकसद कभी नहीं रहा। अपनी निजी जिन्दगी में भी हमने प्रयास किया है कि किसी की भावनाएँ आहत न हों। प्रयास रहता है कि सभी के चेहरे पर मुस्कान रहे क्योंकि आज की भागदौड़ भरी जिन्दगी में आदमी हँसना ही भूल गया है। (बुरा न माने संसार में सिर्फ गधा ही नहीं हँसता है, बस मुँह नीचे किये ध्यानमग्न रहता है। चिन्तन करता रहता है। संसार का सबसे बड़ा बुद्धिजीवी!!!!)

पोस्ट को भले ही हटा दिया गया हो किन्तु इस सत्य को कैसे मिटायेंगे कि संसार के सबसे विकसित राष्ट्र में ऐसा होता है? विश्व में सबसे अधिक राष्ट्र-प्रेमी होने का उदाहरण हम इन्हीं के द्वारा देते हैं; काम के प्रति संकल्प भावना और निष्ठा का उदाहरण देना हो तो इन्हीं को याद करते हैं; सब कुछ तबाह हो जाने के बाद भी सबसे विकसित होने का उदाहरण देना हो तो यही याद आते हैं; किसी भी देश में सब कुछ अच्छा चलना दिखाना हो इन्हीं के गुणगान करते हैं, तो क्या इसे भुलाना आसान होगा कि यहाँ यह भी होता है?


चलिए भूलिए कि कहाँ क्या होता है? हम अपने में मगन रहें और अपने देश की मेरा भारत महान के संदर्भ में कुछ मजेदार फोटो का आनन्द लें। इनमें हँसी है, आनन्द है, मनोरंजन है। (हालांकि ये फोटो मेल से मिलीं हैं किन्तु नेट पर आसानी से उपलब्ध हैं। उपलब्धता-अनुपलब्धता न देखकर बस मूड हल्का करिए। अदा जी के साथ-साथ और जिन्हें भी पिछली पोस्ट पर आपत्ति रही हो, किसी का दिल दुखा हो, उन सभी से माफी माँगते हैं। अदा जी भी माफ करेंगीं, क्योंकि टिप्पणी हटा लेना उनके गुस्से को दर्शाता है।)


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भक्ति भाव से भरे भक्त बस वैतरणी पार करने को तैयार
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एक के साथ एक फ्री, बालकनी में सब फ्री
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मानव-श्रृंखला नहीं, मानव ट्रेन बना दी, देखी हमारी एकता
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रोको-रोको, चप्पल गिर गई, उठा लेने दो
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एक घाट पर पानी पीते शेर-बकरी
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पहले फुटबाल, फ़िर बम भोले
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हम हैं भदेश हिन्दुस्तानी, जो करो खुल के करो
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26 नवंबर 2009

कसाब साहब द्वारा पैदा किए घाव का जन्मदिन है आज


मुम्बई आतंकी हमले वाले कसाब साहब द्वारा पैदा गये घाव का जन्मदिन है आज 26 नवम्बर 2009 को।

सार्थक प्रयास कर चुकीं महिलाओं के बारे में जानना-बताना अपराध हो गया

स्त्री-विमर्श से जुड़ी हुई एक पुस्तक पढ़ी थी जिसमें समूची पुस्तक को दो भागों में बाँटा गया था। उसमें से एक शीर्षक को नाम दिया गया था ‘हंगामा है क्यों बरपा थोड़ा सा जो जी लेते हैं।’ कुछ इसी तरह की बात हुई हमारी पिछली पोस्ट पर जो चोखेर बाली पर लगाई थी। भारतीय स्वाधीनता से सम्बन्धित कुछ महिलाओं के नामों के बारे में चर्चा कर ली तो हंगामा सा मच गया।

पोस्ट बाहियात है; आगे से ऐसी पोस्ट का सामूहिक बहिष्कार हो; ऐसे विचारों के लिए अलग से ब्लाग बनाने तक का सुझाव दिया गया; अलग से पोस्ट तक लिख डाली गई, क्या वाकई इतनी हंगामी पोस्ट थी? एक साहब ने तो अपनी पोस्ट के द्वारा हमारी नीयत पर सवाल उठा दिये।

यह बात एकदम सही है कि यह ब्लाग सामुदायिक ब्लाग है और सार्थक चर्चा करता है। हम भी इसी कारण से यहाँ आये थे। रही बात अपनी पोस्ट पर किसी तरह की माफी माँगने की तो किसी तरह की गलत बात नहीं कही है और न ही महिला को अपमानित किया है। इस दृष्टि से माफी माँगने का सवाल ही नहीं, हाँ यदि ब्लाग के सूत्रधार कहें तो अपने आपको बापस कर सकते हैं या फिर वो चाहें तो हमारी सहभागिता को समाप्त कर दें। हमें किसी तरह की कोई आपत्ति नहीं।

रही बात हमारी समझ को लेकर तो एक बात स्पष्ट कर दें कि जो व्यक्ति नारी का सम्मान नहीं कर सकता उसे अपने मनुष्य कहलाने के बारे में सोचना होगा। महिलाओं की प्रशंसा में कुछ कह देना ही यदि स्त्री का सम्मान है तो हम उसे गलत मानते हैं। सम्मान, स्नेह दिल से उपजता है, प्रशंसा में दो-चार कविताएँ, कहानियाँ, आलेख लिख देने से नहीं।

जहाँ तक इस पोस्ट को यहाँ लगाने का हमारा मन्तव्य था तो बस इतना कि आज स्त्री-विमर्श को लेकर जिस तरह से पुरुष-विरोध का वातावरण निर्मित है, जिस तरह से एक सशक्त आन्दोलन कुछ उच्च वर्ग की महिलाओं के हाथों में सिमटकर रह गया है, उसको यह बताना था कि हमारे देश में ऐसी भी महिलाएँ हुईं हैं जिन्होंने महिलाओं की दशा को सुधारने का कार्य किया और आज उन्हें कितने लोग जानते हैं?

जहाँ तक बात है कि संघर्ष सभी के लिए चल रहा है तो क्या इस बात का कोई जवाब देगा (क्षमा करिएगा, सवाल नहीं पूछना है) जवाब नहीं, अपने मन में झाँक कर देखिए और अपने से पूछिए कि बाँदा की सम्पतपाल को जब नक्सली होने का आरोप लगाकर सताया जाने लगा तो कितनी नारीवादी समर्थक महिलाओं ने उसका साथ दिया?

किसी के ऊपर आरोप लगाना, बिना कुछ सोचे-समझे तोहमत लगा देना, बात की गम्भीरता को समझे बिना अपना निर्णय थोप देना आसान है। पोस्ट की मंशा को समझें या न समझें पर हमारी इस मंशा को समझें कि हमारा उद्देश्य नारी की महत्ता को कम करना नहीं था और न ही किसी महिला को अपमानित करने का।

रही बात आगे के लिए तो हमारा हमेशा से प्रयास रहा है कि सार्थक बहस हो। आज इतने सशक्त आन्दोलन के बाद भी, घर से बाहर निकलने की छूट के बाद भी, शिक्षा के समस्त साधन उपलब्ध होने के बाद भी लड़कियाँ पढ़ क्यों नहीं पा रहीं हैं? और एक वह समय था जब शिक्षा के साधन दुर्लभ थे और महिलाओं को घर से बाहर झाँकने भी नहीं दिया जाता था, ऐसे समय में भी महिलाएँ स्नातक स्तर की शिक्षा ग्रहण कर रहीं थीं। क्या बतायेगा कोई भी पहली महिला स्नातक का नाम? (फिर सवाल, फिर परीक्षा)

बहरहाल टिप्पणियों को देखकर अपने मन्तव्य को स्पष्ट करना जरूरी लगा। आगे ब्लाग सूत्रधार की मर्जी।

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यही पोस्ट चोखेर बाली पर भी है

25 नवंबर 2009

पुरुष-विमर्श : विमर्शों की श्रृंखला में एक नया विमर्श


आज शाम के समय अपने मित्रों के साथ बैठे हुए ब्लाग से सम्बन्धित चर्चा चल निकली। चिन्तन और चिन्ता जैसे विषय पर बात होते-होते विमर्श पर आ गई। हमारे एक मित्र डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव, जो दलित-विमर्श के क्षेत्र में जाना-पहचाना नाम बन गये हैं, ने स्त्री-विमर्श को लकर कुछ सवालों को उठाया। (इस समय वे स्त्री-विमर्श से सम्बन्धित पुस्तक का सम्पादन कार्य कर रहे हैं।)

हमारा काम स्त्री-विमर्श पर चल रहा है, इस कारण अपने मित्रों और दूसरे सहयोगियों, शुभचिन्तकों से इस बारे में राय ले लेते हैं। इसी क्रम में कई बार ऐसे मौके आये जब लगा कि स्त्री-विमर्श के साथ-साथ पुरुष-विमर्श की भी आवश्यकता है।

हमारे एक अन्य सहयोगी डा0 राकेशनारायण द्विवेदी ने कहा कि आप इसे पुरुष-विमर्श का नाम न दें, अन्यथा यह लगेगा कि आप स्त्री-विमर्श की प्रतिक्रिया स्वरूप इस विमर्श की चर्चा कर रहे हैं।

हो सकता है कि बहुत से स्त्री-विमर्श के पक्षधर लोगों को इस बात का समर्थन प्राप्त हो जाये पर किसी बिन्दु पर आकर विचार किया जाये तो समाज में पुरुष-विमर्श की भी चर्चा होनी चाहिए।

इससे पूर्व भी कई बार हमने यह प्रयास किये कि इस विषय पर चर्चा हो, आपस में बहस हो किन्तु इस विषय को मजाक में लेकर समाप्त कर दिया गया। आज अपनी मित्र-चर्चा के बाद जब हम उठे तो यह सोचकर ही उठे कि आज से इस विमर्श की शुरुआत की ही जायेगी। हालांकि करीब पाँच साल पहले हमारा इसी विषय पर एक आलेख प्रकाशित भी हुआ था और उसकी प्रतिक्रिया भी सार्थक रूप में सामने आई थी।

दरअसल जब भी पुरुष की बात की जाती है तो एक छवि ऐसी बनती है जो किसी भी दर्द से पीड़ित नहीं है, जिसके पास अमोध शक्तियाँ हैं, वो जो चाहे कर सकता है, समाज में वह सदा शोषक की स्थिति में रहता है, कोई पुरुष का शोषण नहीं कर सकता वगैरह-वगैरह किन्तु यही सर्वथा सत्य नहीं है।

जब भी पुरुष की बात होती है तो क्यों किसी विराट व्यक्तित्व का चित्र दिमाग में बनता है? अपने आसपास दृष्टि डालिए, क्या आपको कोई ऐसा पुरुष नहीं दिखता जो पीड़ित हो? क्या कोई ऐसा पुरुष नही समझ आता जिसका शोषण न हो रहा हो? क्या कोई ऐसा पुरुष आपकी निगाह में नहीं आता जो आपको पराधीन दिखाई देता हो? अवश्य ही दिखता होगा। मजदूर, घरों, कार्यालयों में काम करते नौकर, सड़क के किनारे छोटे-छोटे काम करते व्यक्ति, समाज के अन्य दूसरे छोटे-मोटे काम करते पुरुष भी तो शोषण का शिकार हैं।

आखिर क्यों इस तरह की छावि बनी है कि यदि पुरुष विमर्श की चर्चा होगी तो वह स्त्री-विमर्श के प्रत्युत्तर में ही होगी? यह क्यों सोचा जाता है कि यदि पुरुष-विमर्श की बात की जायेगी तो उसके पीछे पति-पत्नी वाला स्वरूप ही सामने आयेगा? पुरुष भी शोषित है, घर में भी है, बाहर भी है। उसके शोषण की स्थितियाँ अलग हैं। उन पर विचार करने की स्थिति भी अलग रही है।

वर्तमान में समाज के स्वरूप पर दृष्टि डालें तो भली-भांति ज्ञात होगा कि शोषक और शोषित के बीच अब लिंगभेद का जितना प्रभावी है, उसी तरह से प्रस्थिति भी प्रभावी है। आम आदमी आज हाशिए पर खड़ा दिखाई देता है। दलित वर्ग हाशिए पर ही दिखता है। मजदूर, आदिवासी, गरीब, लाचार पुरुष भी इस बात के अधिकारी हैं कि उनके साथ भी मनुष्य की तरह व्यवहार किया जाये। क्या इन लोगों के लिए पुरुष-विमर्श की आवश्यकता नहीं है?

एक बात और है कि समाज के आधुनिक संस्करण में परिवार में पति-पत्नी के मध्य भी विवाद की स्थिति रहती है। इस स्थिति के चलते परिवारों में स्त्री और पुरुष दोनों ही तनाव की स्थिति में रहते हैं। पत्नी भी प्रताड़ित है तो पति भी प्रताड़ित है। स्त्री भी परेशान है तो पुरुष भी परेशान है। समस्या दोनों ओर है। इस विमर्श को पुरुष-विमर्श के नाम से जानने में कौन सी बुराई है?

चलिए, आज से ही सही किन्तु ब्लाग पर पुरुष-विमर्श की शुरुआत की जा रही है। समाज के शोषित, दमित, प्रताड़ित पुरुषों के बारे में, उनकी प्रस्थिति के बारे में जानने-समझने का तथा उनमें चेतना का संचार करने, उनके व्यक्तित्व विकास के लिए भी प्रयास किया जायेगा (इनमें पत्नी पीड़ित पति भी शामिल हैं, परिवारीजनों से पीड़ित पुरुष भी शामिल हैं)

डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव को याद करवा रहे हैं, इस सम्बन्ध में उन्होंने लेख भेजने का वादा किया है।

ब्लाग को यहाँ से देखें। प्रतिक्रिया दें और राय भी भेजें। ऐसा नहीं है कि समाज पुरुषों का शोषण नहीं करता है, उसे आपको और हमें ही सामने लाना है। इस सम्बन्ध में मिलकर प्रयास करना है, सामाजिक चेतना का विकास करना है। आइये प्रयास करें और पुरुष-विमर्श के इस नये आन्दोलन में हमारे सहयोगी बनें।

जवाब तो मिला नहीं, मिला नसीहतों का पुलिंदा


कल अपनी पोस्ट में कुछ महिलाओं के नाम देकर बस यही जानना चाहा था कि नारीवाद की समर्थक महिलाएँ इन महिलाओं के बारे में जानतीं हैं या नहीं? यह किसी तरह का टेस्ट नहीं था क्योंकि टेस्ट लेने का हक हमें कदापि नहीं है, होना भी नहीं चाहिए।
इसी पोस्ट को चोखेरबाली ब्लाग पर भी लगाया था, यह सोचकर कि यहाँ नारी समर्थित मुद्दों पर बड़ी ही सार्थक चर्चा होती है तो शायद इन नामों के बारे में और सार्थक जानकारी प्राप्त हो। सोचना मात्र सोचना ही रहा ऊपर से ढेर सारी नसीहतें मिल गईं। नसीहत तो स्त्री-विमर्श को समझने तक की मिल गई। सत्य है इस विषय को समझना होगा क्योंकि स्वयं स्त्री-विमर्श के समर्थक इस विषय को न तो समझ पा रहे हैं और न ही समझा पा रहे हैं तो हम ठहरे मात्र छात्र, कैसे समझ सकते हैं?
एक बात हमें भी ज्ञात है कि आज के तकनीकी भरे दौर में जबकि गूगल महाराज तुरत ही हाजिर हो जाते हैं अपना ज्ञान का पिटारा लेकर, हम कैसे यह गुस्ताखी कर सकते थे कि कोई जानकारी चाहते? एक बात और हमें इन नामों के बारे में जानने की बस इतनी इच्छा थी कि शायद ब्लाग के पढ़े-लिखे लोगों के बीच से कुछ और सामग्री प्राप्त हो जाये, किन्तु खाली हाथ बापस आ गये।
पोस्ट में कहा था कि 25 तारीख को इसका जवाब देंगे, उसका कारण था हमारा बाहर जाना। बहरहाल बाहर जाना हुआ नहीं और पिछली पोस्ट में ऐसा कुछ था नहीं जो 25 तक रुका जाता, (वैसे भी कुछ देर बाद 25 होने वाली ही है) सो उसी पोस्ट के बारे में बताने आ गये।
अब बतायें भी क्या, बताने जैसा कुछ है भी नहीं, आप सभी हमसे ज्यादा समझदार हैं। सभी को पता है इस कारण से मात्र 1 लोगों ने हमारे ब्लाग पर और चोखेरबाली पर 8 लोगों ने आने की और अपने विचार देने की जहमत उठाई, सभी का आभार।
जवाब तो आपको पता ही है, नहीं पता तो गूगल जी हैं ही। पर इस पोस्ट के द्वारा यह तो पता ही लग गया कि इन महिलाओं के बारे में वास्तव में ज्यादा जानकारी हमारे पास नहीं है। यदि इनके स्थान पर किसी अन्य बाला का नाम होता तो उसकी जन्म कुंडली तक बनाकर बता दी जाती पर यहाँ जवाब को इतना गोलमोल दिया गया कि, बस पूछिये नहीं। इतने तरह के जवाब आये कि बहुत पुरानी एक घटना याद आ गई। उससे समझ आया कि यदि आपको किसी सवाल का जवाब नहीं मालूम और आप अपने को अज्ञानी भी सिद्ध नहीं करना चाहते तो किसी और मुद्दे को उठा दीजिए, बस असली मुद्दा गया पीछे और सामने आपकी बात!!!
घटना ऐसी है कि हम एक बार झाँसी रेलवे-स्टेशन पर बैठे हुए भोपाल जाने के लिए ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। उसी समय एक हमउम्र लड़के ने आकर कंधे पर जोर से हाथ मार कर हमें नाम से पुकारा। एकदम से हम हड़बड़ा तो गये किन्तु नाम का सम्बोधन सुन लगा कि कोई परिचित ही है। पलटकर देखा तो एक परिचित चेहरा मुस्कुरा रहा था। याद आया कि यह लड़का हमारे साथ कालेज में पढ़ता था। उस समय उसे बहुत यारी-दोस्ती नहीं थी, इस कारण से चेहरा तो याद आया किन्तु नाम को याद नहीं कर सके।
कालेज से निकले भी लगभग 6 या 7 साल हो गये थे तो आत्मीयता भी झलकी। उसने पूछा कि और क्या हाल है? हमने भी उसी प्रफुल्लता से जवाब दिया, बस मजे में।
फिर उसकी ओर से अगला सवाल धमाके के रूप में आया, पहचाना? हमने भी अतिरिक्त अपनत्व दिखाते हुए कहा अबे! तुम्हें नहीं पहचानेंगे? यही कहकर फँस गये, उसने तुरन्त कहा, बताओ कौन?
अब हम घबराये कि यदि नाम नहीं बता पाते तो अगले को लगेगा कि हम पहचान नहीं पा रहे और उसके जोश का उफान ठंडा हो जायेगा। तुरन्त बुद्धि दौड़ाते हुए अपने स्वर में तल्खी सी लाते हुए हमने कहा, इतनी छोटी बात कर दी, अब हम तुम्हें पहचानते हैं इसके लिए तुम्हारे नाम का सबूत देना होगा? जाओ हम तुम्हें जानते ही नहीं कि तुम कौन हो।
उसने तुरन्त हमारे कंधे पर दोनों हाथ रखे और कहा कि यार तुम्हारी यही अदा तो कातिल है। बुरा न मानो हम तो देख रहे थे कि तुम्हें अभी भी गुस्सा आता है या कि कालेज से निकलते ही शान्त हो गये?
उसके बाद हम दोनों बैठे-बैठे बात करते रहे। लगभग 50 मिनट के बाद हमारी गाड़ी आ गई और तब तक हमें उसका नाम भी याद आ गया। वह हमें ट्रेन में बिठाने आया तो हमने डिब्बे में चढ़ते हुए उसे उसका नाम बताया और अपना दर्शन उड़ेला, अबे दोस्तों के बीच नाम की जरूरत नहीं दिल की जरूरत होती है।

कुछ यही लगा अपनी पोस्ट की महिलाओं के नाम जानने में। पता है नहीं और पिला दिया गया लेक्चर ढेर सारा, हमारे दर्शन की तरह। ये स्थिति तब है जबकि सारे नाम भारतीय महिलाओं के हैं।
कहो तो पूछें फिर एक सवाल? नहीं जी अभी इतनी जल्दी नहीं, फिर कभी। तब तक महिला मोर्चा का गुस्सा थोड़ा ठंडा हो जाये। हाँ उन नामों की जानकारी तो खोजिए ही, अभी हमने बताया नहीं है। गूगल जी हैं न!
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चित्र गूगल से साभार

23 नवंबर 2009

स्त्री-विमर्श का झंडा बुलंद करने वाली महिलायें इन महिलाओं के बारे में भी जानें


स्त्री-चेतना के विकास के लिए आज स्त्री-विमर्श को प्रमुख माना जा रहा है। स्त्री-विमर्श क्या है और भारतीय संदर्भों में इसकी क्या उपयोगिता, क्या आवश्यकता है इसे समझने की आवश्यकता है। स्त्री-विमर्श को संदर्भित रूप में देखा जाये तो यह पश्चिम से आयातित शब्द है जिसने वहाँ की महिलाओं को स्वतन्त्रता प्रदान की। पश्चिम में एक समय वह भी आया जबकि स्त्री-विमर्श से जुड़े कई लोगों ने अपने आपको नारीवादी आन्दोलन से बापस कर लिया।
भारतीय संदर्भों में जब भी स्त्री-विमर्श की चर्चा की जाती है तो वह तुलसीदास से शुरू होकर आज की किसी प्रमुख हस्ती के साथ समाप्त हो जाती है। जो नारीवादी स्त्रियाँ अपने आपको स्त्री-विमर्श का पुरोधा मानतीं हैं वे बात-बात पर महिलाओं को रोके जाने के उदाहरण दिया करतीं हैं।
यहाँ यह बताना ज्यादा दिलचस्प होगा कि यदि कोई महिला विकास नहीं कर पाती है तो उसके पीछे पुरुष की भेदभाव भरी नीति काम करती है और यदि किसी महिला ने विकास कर लिया तो यह उसकी अपनी प्रेरणा, अपनी चेतना, अपना संघर्ष कहा जायेगा। कुछ भी हो महिलाओं ने हमारे देश में प्राचीन काल से ही सम्मानजनक दर्जा पाया है, उनके काम भी अविस्मरणीय रहे हैं।
यहाँ विवाद यह नही कि किसने क्या किया और किसने क्या नहीं करने दिया। आज की पोस्ट के द्वारा हम कुछ नाम आपके सामने रख रहे है, कृपया बतायें कि ये कौन हैं? इनका नाम किस क्षेत्र में उल्लेखनीय है? कहीं ऐसा तो नहीं कि पुरुष मानसिकता के कारण ये हमेशा हाशिये पर रहीं और स्वयं महिलाओं ने भी इनके बारे में जानने का प्रयास नहीं किया?
आग्रह विशेष रूप से स्त्री-विमर्श की पुरोधा महिलाओं से, जो बात-बात पर झंडा लेकर पुरुष समाज के विरुद्ध निकल पड़तीं हैं कि कहीं इन महिलाओं को आप लोगों ने भी तो विस्मृत नहीं कर दिया है?
इन महिलाओं के नाम इस प्रकार हैं--

1) हंसा मेंहता
2) राजकुमारी अमृत कौर
3) सरोजनी नायडू
4) अम्मू स्वामीनाथन
5) दुर्गाबाई देशमुख
6) सुचेता कृपलानी
7) रेणुका रे
8) लीला रे
9) पूर्णिमा बैनर्जी
10) कमला चैधरी
11) मालती चैधरी
12) दक्षयानी वेलायुदान

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आपकी सुविधा के लिए बता दें कि ये नाम स्वतन्त्रता के समय के हैं। हो सकता है कि आधुनिक ललनाओं ने इनके नाम भी न सुन रखे हों? आखिर उनकी आदर्श महिलाओं में ये नाम नहीं फिल्मी ग्लैमर गल्र्स के नाम होंगे?
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चलिए खोजिए इनका योगदान, हम तो 25 तारीख को बता ही देंगे।

हो न हो, महिलायें ही चाहतीं हैं कुमारी, सुश्री, श्रीमती जैसे संबोधन


सबसे पहले तो एक निवेदन कि इसको विवाद का विषय बिलकुल न बनायें; हाँ सार्थक बहस का विषय हो सकता है। बहुत ही असमंजस की स्थिति में इसे लिखने बैठे हैं, कारण स्पष्ट है कि आप कुछ भी कहो ऐसे विषय पर स्त्री-पुरुष दोनों की ओर से पूर्वाग्रह भरा रवैया रहता है।
मुद्दा यह है कि विगत कुछ वर्षों से जबसे देश में ‘स्त्री-विमर्श’ की बहार आई है तबसे महिलाओं को सम्बोधित करने वाले शब्दों जैसे कुमारी, सुश्री, श्रीमती को लेकर भी बयानवाजियाँ होतीं रहीं हैं और आज भी होतीं हैं। स्त्री-विमर्श जैसे गम्भीर और संवेदनशील विषय को भी पूर्वाग्रह के कारण विवादास्पद बना दिया गया है। यदि कोई पुरुष इस विषय पर लिख रहा है अथवा अपने विचार दे रहा है तो उसे या तो महिलाओं के समर्थन में कहना चाहिए अन्यथा की स्थिति में वह महिलाओं के प्रति दुरावस्था जैसी स्थिति को पालने का आरोपी है।
कुछ इसी तरह के आरोप महिलाओं के नाम के पूर्व लगाये जाने वाले सम्माननीय शब्दों को लेकर लगते रहे हैं। यह सर्वथा सत्य है कि समाज पुरुष प्रधान रहा है और बहुत सी व्यवस्थाएँ पुरुषों ने अपने मनानुकूल बना लीं। इनमें एक व्यवस्था महिलाओं की प्रस्थिति को पहचानने की सुविधा के चलते उसके नाम के पूर्व के शब्द-निर्धारण को लेकर भी रही हो। विवाहित एवं अविवाहित महिलाओं के नाम के पूर्व लगे शब्दों के द्वारा आसानी से पता चल जाता है कि फलां महिला शादीशुदा अथवा गैर-शादीशुदा है।
मसला यहाँ आकर फँसा कि हम ठहरे एक बहुत छोटी सी साहित्यिक पत्रिका स्पंदन के सम्पादक। अब हमें बहुत सी महिला रचनाकारों को रचनाओं की प्राप्ति हेतु, उन्हें पत्रिका प्रेषित करने के उद्देश्य से पत्र डालने होते हैं। कई बार उनसे सीधे सम्पर्क न हो पाने की स्थिति में उनका नाम, पता आदि किसी दूसरी पत्रिका से प्राप्त होता है। ऐसी दशा में कई बार यह ज्ञात ही नहीं हो पाता है कि अमुक महिला रचनाकार के नाम के आगे कौन सा शब्द लगा दिया जाये? हम भारतीयों को जन्म से एक संस्कार बड़ों और छोटों का सम्मान करने का भी दिया जाता है। इस कारण यह भी अच्छा नहीं लगता कि पते में सीधे नाम ही लिख दें।
इस असमंजस की स्थिति में कई बार हम महिलाओं के नाम के पूर्व माननीया ही लिखकर भेज देते हैं। कई बार ज्ञात न होने की स्थिति में सुश्री लगा देते हैं पर श्रीमती अथवा कुमारी लगाने से बचते हैं। विगत कई माह में भेजे गये पत्रों और पत्रिका के प्रत्युत्तर में कई महिला रचनाकारों, पाठकों की ओर से आपत्ति भी आई कि आप नाम के आगे सम्बोधन ठीक से नहीं लगाते हैं। किसी-किसी ने तो माननीया पर ही आपत्ति उठाई तो किसी ने सुश्री पर। अब समझ नहीं आया कि यदि महिला शादीशुदा है तो वह अपने पते में स्पष्ट करे अथवा सुश्री को स्वीकार करे।
यहाँ चूँकि विगत कुछ वर्षों से हम भी स्त्री-विमर्श जैसे विषय को अपने अध्ययन का विषय बनाये हैं इस कारण भी ऐसे मुद्दों को बड़े ही जोर-शोर से सबके सामने रखते हैं। लगा कि अब महिला-मुक्ति का जमाना है। नारी चेतना किसी भी रूप में कम नहीं है। महिलाओं ने अपने आन्दोलनों के कारण अपनी प्रस्थिति को उन्नत कर लिया है फिर वह क्यों पुरुषों के दिए सम्बोधन को स्वीकार किये है? क्या आवश्यक है कि आज शादीशुदा स्त्री अपने नाम के आगे श्रीमती लगाये?
जब हमारे पास आपत्तियाँ आईं, एक आपत्ति तो आज ही आई जिसमें कहा गया कि आप पुरुष जानबूझकर हम महिलाओं के साथ इस तरह का अन्याय करते हैं, तो हमें लगा कि इसे सबके सामने रखना ही उचित है कि कहीं महिलाएँ ही तो स्वयं को श्रीमती अथवा सुश्री या कुमारी के साँचे में फिट रखना चाहतीं हैं? आज नारी जागरूक है तो वह स्वयं तय करे कि उसके नाम के आगे क्या लगाया जाये? इस बात का भी ध्यान रखा जाये कि खाली नाम न लिखने को कहा जाये क्यों कि बड़ों का नाम खाली लिया जाना अभी हमारी सभ्यता नहीं है।
महिलाएँ चाहें तो जब तक इस समस्या का निदान नहीं हो जाता हमें सभी के नाम के आगे सुश्री लिखने की छूट प्रदान की जाये। हम कहाँ तक पता करते घूमेंगे कि कौन विवाहित और कौन अविवाहित है? यदि किसी के पास हल हो तो वह भी बतायें ताकि आगे के लिए इस समस्या से बचा जा सके।

21 नवंबर 2009

ये राजनीति है भैये, यहाँ सब चलता है......

ये हैं हमारे नये दोस्त................दिन गुजरे...............ये नहीं हैं हमारे दोस्त!!!! क्या हो गया ये? अरे भई ये समाज की हकीकत कम भारतीय राजनीति की हकीकत ज्यादा है। आज चर्चा गलियारों में चर्चा है मुलायम-कल्याण की। मुलायम का कल्याण तो उसी दिन हो गया था जिस दिन चुनाव आयोग ने सख्ती कर दी थी। इस ‘कल्याण’ को लेने का भी प्रयास किया किन्तु चारो खाने चित्त।
अब वास्तविकता का अध्ययन किये वगैर किसी और के सिर पर ठीकरा फोड़ देना अच्छी बात नहीं। मुलायम ने इस बात पर गौर नहीं किया कि जिस व्यक्ति ने अपनी आधारभूमि को आसानी से छोड़ दिया वह किसी और जमीन में कैसे पनप सकता है? भाजपा पहली बार छोड़ी गई तो कहा गया कि भाजपा के ताबूत में आखिरी कील कल्याण ही ठोकेंगे। बाद में कुछ भी नहीं हो सका (शायद ताबूत न मिला या कहें कि कील भी नहीं मिली) बहरहाल लौट के बुद्धू घर को आये। अब कैसे सफाई दें तो कहा कि अटल को एक उँगली दिखाई थी अब चारों उँगली से लड्डू खिला देंगे।
लड्डू खिलाया और जब तक वह अटल के मुँह में रहा तब तक तो भाजपा में रहे फिर कहना शुरू कि भाजपा पाँच सीट जीत कर दिखा दे तो मान जायें। मान गये जनाब............। अब मुलायम कठोर हुए तो कहने लगे कि हम भाजपा में भले ही नहीं हैं पर कोई भाजपा को मिटाकर दिखाये।
अब कोई राजनीतिक विश्लेषक बताये (सुभाष कश्यप जी, डी0डी0 बसु साहब कुछ मदद करिये) कि इस बात का क्या अर्थ निकाला जाये? मुलायम हों या फिर दूसरी पार्टियाँ, किसी न किसी रूप में मुस्लिम कार्ड खेल लेतीं हैं। कल्याण के आने से मुलायम का यह बँधा-बँधाया वोट-बैंक तो खिसका ही, साथ में साख भी खिसकी। चलो भैये क्या फर्क पड़ता है एक और बार जीभ ही तो लपलपानी है। लपलपाई और निकला कि कल्याण न कभी सपा में थे और न कभी रहेंगे।
लो जी, हो गया निर्धारण। अब बस, चुप बैठो और देखो कि आगे क्या होना है? यही तो राजनीति है, कौन कह गया कि राजनीति, सरकार, सत्ता जनता के लिए है। अरे भाई जनता के लिए है तो पर जनता के साथ खिलवाड़ करने के लिए।
खेलो...खेलो और जोर से खेलो, बिना रिकार्ड बनाये न मानना।
मुलायम अपना परिवार प्रेम नहीं देख पा रहे हैं और दोष किसी और को दे रहे हैं। थोड़ा सा महाभारत का समय याद करलें महाशय और अपने दल की हालत का भी जायजा ले लें, पता चल जायेगा।
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नोट विशेष क्षमायाचना सहित-ये सब पता नहीं किस झौंक में लिख गये। हमें ये सब तो लिखना ही नहीं था, क्षमा करना। (लिखना पड़ता है यह सब भी क्योंकि हमारे सांसद साहब भी सपा के हैं)
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चित्र साभार गूगल से लिया है।

20 नवंबर 2009

समीरलाल जी "पियो-पियो और जियो, जी भर के जियो"

आज कई दिन के बाद ब्लाग संसार को देखा और सुना। कई दिनों से मन भी नहीं लग रहा था और दूसरा कारण काम का बोझा भी आ गया था। आज इधर-उधर उल्टा-पुल्टा तो ब्लाग गुरू समीरलाल की पोस्ट देखी जो दारू और कविता से (शायद दारू नहीं कहेंगे, स्काच) ओतप्रोत थी। यह तो सभी को मालूम है कि समीर जी अपनी उड़नतश्तरी पर बैठ कर जब निकलते हैं तो अच्छे-अच्छों के विमान, जेट पीछे छूट जाते हैं।
इस बार भी यही हुआ। उनकी फोटो और फोटो के ऊपर बवाल???? अब बवाल क्या, न तो सरकार ने मचाया, न ही शराब बंदी करवाने वालों ने। बवाल मचाया हम ब्लागरों ने।
बवाल का कोई विशेष कारण होना भी नहीं चाहिए पर बना। देखा जाये तो समीर जी की कोई यही फोटो नहीं है शराब के साथ। विगत कई पोस्ट पर वे अपनी बातों और फोटों के द्वारा अपने स्काच प्रेम को दर्शा चुके हैं। तब अब बवाल क्यों?
अरे भाई हम सब कुछ न कुछ करते हैं पर कहने से डरते हैं। समीर जी ने इस बात को बेधड़क कह डाला, बस लोट गये साँप। इसे हम कुछ भी कहें पर संस्कृति का फर्क पड़ता है।
हम लोग अभी इस तरह का खुलापन उच्च वर्ग में देख रहे हैं। मध्य वर्ग शराब का शौकीन है पर सभी के सामने खुलकर नहीं। यही बात है जो अभी भी शराब को दबा-छिपा स्वीकारती है।
हम अपने शहर से ही इस बात को समझ सकते हैं। हमसे जो उम्र में बड़े हैं और जिनका हम सम्मान करते हैं उनके सामने शराब पीना तो दूर इस बात की भी चर्चा नहीं करते हैं कि हम शराब पीते हैं। ऐसा ही कुछ हमने अपने शहर के होटल में देखा है। यहाँ के रेस्टोरेंट में खाने के साथ आप शराब नहीं ले सकते। जबकि हमने इसके ठीक उलट नजारा मुम्बई में देखा। खाने की मेज, सभी तरह के लोग बैठे हैं और लगभग हर मेज पर शराब के गिलास।
यही अन्तर आज देखने को मिला समीर साहब की पोस्ट से। और आप देखिये कि कितनी आसानी से सभी कुछ दिखाने के बाद भी वे एक-दो कविताओं के माध्यम से आसानी से बचकर निकल भी गये। वाह रे समीर भाई!
पियो-पियो और जियो जी भर के जियो।

13 नवंबर 2009

नानाजी की चिट्ठियों का प्रकाशन शुरू

बिलासपुर के श्री हरिगोपाल गौड़ की बच्चों को सीख देतीं चिट्ठिया "नानाजी की चिट्ठियां" प्रकाशित की जा रहीं हैं। इन चिट्ठियों से आज भी बच्चे और हम बड़े भी बहुत कुछ सीख सकते हैं। चिट्ठियां इस ब्लॉग पर पढ़ी जा सकतीं हैं।

12 नवंबर 2009

नानाजी की चिट्ठियों का प्रकाशन ब्लॉग पर

श्री हरिगोपाल गौड़ ने दो वर्षों तक दैनिक लोकस्वर में उप-सम्पादक के रूप में कार्य किया था। लोकस्वर में उनकी साप्ताहिक प्रकाशित होने वाली ‘नानाजी की चिट्ठी’ ने बड़ी ही प्रतिष्ठा हासिल की थी। इस ब्लाग पर उनकी इन्हीं चिट्ठियों का प्रकाशन समय-समय पर किया जायेगा।
श्री हरिगोपाल गौड़ 31 मई 1988 को मध्यप्रदेश सरकार के शिक्षा विभाग से अंगेजी व्याख्याता तथा प्राचार्य पद पर अपनी सेवायें देने के बाद सेवानिवृत्त हुए। शासकीय इंजीनियरिंग महाविद्यालय में अंगेजी के सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्य प्रारम्भ करने वाले हरिगोपाल जी ने गुरुनानक उच्चतर माध्यमिक शाला, बिलासपुर, नेशनल कान्वेंट उच्चतर माध्यमिक शाला, खरसिया तथा बाल्को स्कूल, अमरकंटक में प्राचार्य के पद पर कार्य किया।
कार्य के प्रति समर्पण का भाव रखने वाले श्री गौड़ ने दो वर्षों तक दैनिक लोकस्वर में उप-सम्पादक तथा एक वर्ष दैनिक भास्कर बिलासपुर के उप-सम्पादक के रूप में कार्य किया। इसके अलावा उन्होंने कुछ वर्षों तक लखनऊ से प्रकाशित ‘नेशनल हेराल्ड’ और नागपुर से प्रकाशित ‘हितवाद’ के संवाददाता के रूप में अपनी सेवायें प्रदान कीं। नानाजी की चिट्ठी की तरह दैनिक भास्कर में उनके द्वारा सम्पादित बच्चों के पृष्ठ ‘इंद्रधनुष’ ने भी बहुत प्रशंसा प्राप्त की थी।
लेखन के प्रति विशेष रुचि रखने वाले श्री गौड़ की रचनायें शुरुआती दिनों से ही प्रकाशित होतीं रहीं हैं। उनकी पहली सानेट ‘रेमेम्ब्रेन्स’ सन् 1952 में ‘ब्लिट्ज’ में प्रकाशित हुई थी। उनकी लम्बी कविता ‘लाइट आफ द सोल’ महात्मा गाँधी द्वारा नाओखाली और उसके आसपास की पदयात्राओं के व्यापक प्रभाव पर लिखी गई है। उनके लेख, कहानी, कविता, लघुकथा महाविद्यालयीन पत्रिकाओं में, एम0पी0 क्रानिकल, भोपाल के संडे मैगजीन में प्रकाशित होतीं रहीं हैं।
आजकल वे अपने पहले उपन्यास ‘लाइफ हैज नो रिप्लाई’ के लेखन में व्यस्त हैं। इस उपन्यास में उनके जीवन का विविध रूपात्मक वृत्तान्त है।
सम्प्रति श्री हरिगोपाल गौड़ लायंस इंग्लिश हायर सेकेंडरी स्कूल, चाँपा में प्राचार्य के पद को सुशोभित कर रहे हैं।

10 नवंबर 2009

इतना बताइयेगा, और कितना सताइयेगा

हमारे शहर के मध्य में एक ऐतिहासिक तालाब स्थित है। प्रशासन द्वारा कई वर्ष पहले उसकी सुध लेते हुए कुछ सुन्दरीकरण का कार्य वहाँ करवा दिया था। इसके अन्तर्गत वहाँ वृक्षारोपण हो गया तथा पक्की सड़क का निर्माण भी किया गया। अब लोग इस तालाब के क्षेत्र में सुबह, शाम को सैर के लिए जाते हैं।
आजकल हम भी इन घूमने वालों में शामिल हैं। कल यहीं हमारी मुलाकात शहर के एक कवि श्री योगेश्वरी प्रसाद ‘अलि’ जी से हो गई। कुछ इधर-उधर के विषयों पर बहुत थोड़ी सी चर्चा हुई। इसी के दौरान उन्होंने कहा कि हमने भगवान के सामने एक छोटी सी अर्जी लगा दी है कि
‘‘इतना बताइयेगा,

और कितना सताइयेगा?’’


हमने कल वहीं घूमते-टहलते इस पर पूरी कविता बना डाली। (कविता कभी बाद में)
आज जब से समाचार-पत्र के माध्यम से पढ़ा कि हिन्दी में शपथ लेने पर थप्पड़ मिला तबसे यही दो पंक्ति दिमाग में घूम रहीं हैं।

राज ठाकरे के लिए तथा हिन्दी का अपमान करने वाले सभी भारतीयों-विदेशियों से एक यही गुहार -

‘‘इतना बताइयेगा,

और कितना सताइयेगा?’’

कपडे तो पहनती नहीं और लौंड्री का बिल एक लाख का

एक चुटकुला, उससे पहले एक निवेदन............. इस चुटकुले को बस चुटकुले की तरह ही लें, हमारी पुरानी पोस्ट के आधार पर आकलन न करें।
अभी-अभी हमारे मोबाइल पर हमारे एक मित्र का संदेश आया, पढ़ कर हँसी आई तो सोचा आपको भी हँसवा दें
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एक इनकम टेक्स अधिकारी कुछ कागज़ देख कर हँस रहा था।

क्लर्क ने पूछा, साहब, क्यों हँस रहे हैं?
अधिकारी ने कहा - मल्लिका शेरावत का रिटर्न है.
क्लर्क बोला - तो?
अधिकारी ने कहा - कपडे तो पहनती नहीं है और लौंड्री का बिल एक लाख का दिखाया है.

09 नवंबर 2009

माँ की बात मानते लड़कों को पसंद नहीं करतीं हैं लड़कियां???

कल रात पढ़ने के लिए बैठे तो कमरे में टी0वी0 पर आधुनिक भारत का विवाह सम्बन्धी कार्यक्रम या कहें कि भारत का आधुनिक विवाह सम्बन्धी कार्यक्रम देखा जा रहा था। कार्यक्रम के माध्यम से परफेक्ट ब्राइड को चुना जाना है। पढ़ने से ज्यादा लिखना हो रहा था इस कारण टी0वी0 के शोर से किसी तरह की बाधा उत्पन्न नहीं हो रही थी।

बाधा हमने स्वयं ही उत्पन्न की जब दिमाग ने लिखने वाली सामग्री से ध्यान हटाकर आधुनिक भारत के आधुनिक विवाहों के ऊपर लगाया। समाजशास्त्र के अध्ययन में विवाह के प्रकार पढ़ रखे थे। (इस बारे में बाद में) हमारे दिमाग ने कहा कि अब तो समाजशास्त्रीय परिभाषाओं से अलग हटकर भी विवाह हो रहे हैं, इन्हें क्या नाम दिया जायेगा?

दिमाग ने अलग विवाह के चलन का संकेत भेजा और हमने तुरन्त अपनी मेहनत करने के स्थान पर दिमाग को ही काम सौंपा ऐसे विवाहों के बारे में पता लगाने का। तुरन्त जवाब मिला, एक विवाह (अभी हुआ नहीं है) स्वयंवर के माध्यम से हुआ राखी सावंत का। दूसरा होने जा रहा था, पता नहीं हुआ कि नहीं, राहुल महाजन का। इन दो के कार्यक्रम को तो स्वयंवर की श्रेणी में रखा जा सकता है किन्तु कल रात जिस वैवाहिक कार्यक्रम को सुना (देख नहीं रहे थे) उसे समझ नहीं आया कि वाकई क्या नाम दिया जाये?

कुछ लड़कियाँ, कुछ लड़के, लड़कियों-लड़कों की मम्मियाँ और खेल शुरू, शादी-शादी। सवाल ये नहीं कि क्या कार्यक्रम है, क्या होना चाहिए, क्या विवाह है, कैसा होना चाहिए आदि-आदि। माथा तो तब ठनका जब कान में एक वाक्य घुसा कि फलां लड़के को (नाम याद नहीं) इस कारण कोई लड़की नहीं मिल सकी क्योंकि वो हर बात में अपनी माँ को महत्व देता है।

अब माथा ठनका तो पलटकर भी देखा (अबकी कार्यक्रम थोड़ा सा देखा) रिश्तों के पारखी भी बैठे थे (अरे भाई! कार्यक्रम विचित्र है तो जजों को जज कैसे कह दें, नाम भी विचित्र देंगे) उनमें से एक मलायका अरोरा थीं बोलीं कि आज की लड़कियों को बहुत ही अटपटा लगता है जब कोई लड़का उससे ज्यादा माँ को महत्व देता दिखता है। (हो सकता है कि शब्दों में कोई हेरफेर हो किन्तु भाव यही थे, क्षमा करेंगीं मलायका जी)

लगा कि ये कार्यक्रम भारत का आधुनिक विवाह नहीं है बल्कि वाकई आधुनिक भारत का विवाह कार्यक्रम है। जिस समाज में माँ से अधिक महत्व उस लड़की को दिया जाये जो अभी पत्नी भी नहीं बनी है या फिर ऐसी लड़की जो अभी पत्नी भी नहीं बनी है और माँ के नाम से ही अटपटा महसूस करती हो, उस समाज को आधुनिक के स्थान पर और क्या कहा जायेगा?

एक घटना तुरन्त याद आई उसे कह कर अपनी बात समाप्त करते हैं क्योंकि कितना भी समझाइये होगा वही ढाक के तीन पात।

घटना ये है कि महाविद्यालय के विद्यार्थियों के एक कार्यक्रम में दो साल पहले जाना हुआ। वहाँ एक प्रोफेसर साहब ने उनसे सवाल किया कि एक नाव में आप, आपकी माता और आपकी पत्नी जा रहे हों। नाव में किसी तरह से पानी भरने लगता है और किसी एक को नाव से उतार देने पर नाव डूबने से बच जायेगी तो आप किसे नाव से कूदने को कहेंगे?

इस पर कई जवाब मिले किन्तु एक जवाब ने चैंकाया कि हम भारत में ही रह रहे या कहीं और, जवाब था कि माता को क्योंकि माता अब बूढ़ी हो गईं हैं कितने साल जिन्दा रहेंगीं।


वाकई हम इक्कीसवीं सदी में आ गये हैं जहाँ माँ नाम के इन्सान को अब आउटडेटेड समझ कर हाशिये पर खड़ा किया जा रहा है। भला हो ऐसे समाज का, ऐसे नवजवानों का, ऐसी सोच का।

08 नवंबर 2009

उसके जिंदा होने ने बचाया अपराध बोध से

कल पूरी रात बड़ी ही असमंजस में बीती। एक अपराध बोध से ग्रसित महसूस कर रहे थे अपने आपको पर सुबह ने इस अपराध बोध को समाप्त कर दिया। रात को लगभग 8 बजे के आसपास एक पार्टी के लिए जाने की तैयारी चल रही थी। उसी समय आसपास के बच्चे किसी बिल्ली के बच्चे को लेकर चुहल करते समझ में आये। बच्चों का खेल समझकर अपने काम में लगे रहे।

थोड़ी देर के बाद बिल्ली के बच्चे को खोजने जैसी आवाजें सुनाई देने लगीं। बाहर निकल कर देखा और पूछा तो पता चला कि बिल्ली का बच्चा नाली में गिर गया है और निकल नहीं पा रहा है। हमें यह भली-भाँति मालूम था कि बच्चे बहुत ही होशियार हैं, वे बिल्ली के बच्चे को निकाल ही लेंगे। हम फिर अंदर आकर अपने काम में लग गये।

कुछ देर तक तो बच्चों की आवाजें आतीं रहीं और थोड़ी देर के बाद खामोशी सी छा गई। इस खामोशी में भी बिल्ली के बच्चे की मरियल सी रोने की आवाज सुनाई देती रही। जब थोड़ी देर बाद भी बिल्ली के बच्चे की आवाज नहीं थमी तो पूछने पर पता चला कि बिल्ली का बच्चा अभी भी नाली में फँसा है।

बच्चों से उसको न निकालने का कारण जाना तो उन्होंने बताया कि एक तो बिल्ली का बच्चा नाली में बहुत तेजी से दौड़ रहा है, दूसरे उसके द्वारा पंजा मार दिये जाने अथवा काट लिये जाने का भी डर है। पता चला कि बिल्ली का बच्चा इतना तो बड़ा है ही कि पंजा मार दे अथवा काट ले।

ऐसा जानकर हमने खुद उस बच्चे को निकालने की सोची। हमें मालूम था कि सरदी की रात में पानी में फँसे रहने के कारण हो सकता है कि रात में वह बच्चा मर जाये। अपने भतीजे को लेकर हमने नाली में छानबीन की तो उस बिल्ली के बच्चे को एक पत्थर के नीचे फँसा पाया। काफी मेहनत के बाद भी वह बाहर न निकला।

पत्थर सड़क को काटकर बहती नाली के ऊपर सीमेंट से जड़ा हुआ था और उसको उखाड़ने का मतलब था पत्थर का टूट तक जाना या फिर सड़क का खुद जाना। कई बार के प्रयासों के बाद भी जब वह बच्चा नाली से बाहर नहीं आया तो हमने अपने भतीजे से तथा पड़ोस के बच्चों से बिल्ली के बच्चे को निकालने की बात कह कर बाहर डिनर के लिए चले गये।

लौटने में लगभग साढ़े ग्यारह बज गये, लौटते ही अम्मा से पूछा तो पता चला कि उस बच्चे को निकाला नहीं जा सका है। अब हमें बड़ी चिन्ता हुई कि अब तो वह मर ही जायेगा। ध्यान से सुना तो उसके रोने की आवाज भी सुनाई दे रही थी। समझ नहीं आया कि क्या किया जाये? हमारी अपनी स्थिति ऐसी नहीं थी कि पीछे नाली तक जाकर उस बच्चे का हालचाल जानते।

मन मारकर सोने को लेट गये पर नींद न आये। बार-बार लगे कि खाने पर निकलने से पहले ही यदि पत्थर तोड़ दिया होता तो उस बच्चे को निकाला जा सकता था। सारी रात आँख लगती रही, खुलती रही। जब भी नींद खुलती बिल्ली के बच्चे के रोने की आवाज सुनाई देती। मन कचोटता और अपने को अपराधी मानता।

सरदी का मौसम, बाहर का सर्द वातावरण, नाली के पानी की ठंडक का सोच-सोच कर ही लगता कि सुबह तक वह बच्चा मर ही जायेगा। जैसे-तैसे सुबह हुई और हमने लगभग 6 बजे अम्मा को उस बच्चे की जानकारी लेने के लिए आवाज दी। छत पर जाकर पता किया तो आवाज अभी भी पीछे से आ रही थी।

पीछे वाले घर के लोगों को दो-तीन आवाजें देने पर वहाँ से एक-दो लोग बाहर आये। बिल्ली के बच्चे के बारे में पूछने पर कुछ पता न चला। हमारे साथ-साथ वे भी परेशान होने लगे। लगभग एक घंटे की और मशक्कत के बाद पीछे के दूसरे घर के सदस्यों के जागने पर पता लगा कि बिल्ली का बच्चा उनके घर में है।

रात में उन्होंने आवाज सुन कर पीछे का दरवाजा खोल उसे अपने घर में छिपा लिया था। यह जानकर साँस में साँस आई और स्वयं को एक अपराध बोध से मुक्त पाया। बिल्ली का बच्चा अभी भी उसी घर में है, रोने की आवाजें अभी भी आ रहीं हैं पर सुकून है कि वह जिन्दा है।

06 नवंबर 2009

त्रयोदशी संस्कार करवाने के पीछे के कारण

कल दीपक ने अपनी पोस्ट पर त्रयोदशी संस्कार की आवश्यकता को लेकर सवाल उठाया था। ऐसा ही सवाल हमारे मन में भी उठता है। सोचते हैं कि समाज का ये कैसा चलन है कि किसी के परिवार का कोई सदस्य चला गया और अन्य किसी को भोजन करवाया जाये।

इस प्रथा के पीछे के कारणों को बहुत लोगों से जानने का प्रयास किया, यहाँ तक कि बहुत से उन ब्राहमणों से भी जानना चाहा जो त्रयोदशी संस्कार को करवाते हैं पर कोई भी जवाब ऐसा नहीं मिला जिससे संतुष्ट हुआ जा सके।
कारण और निवारण की स्थिति के चलते दिमाग इस तरफ लगा ही रहता था। सामाजिक दायित्वों के निर्वहन में हमें स्वयं भी कई जगहों पर त्रयोदशी संस्कार में शामिल होने जाना पड़ता है। यहाँ भी मिलने-जुलने वालों से इस शंका के निराकरण की बात हो जाती है।

कई कारण सामने आये, हालांकि यह समझ नहीं आया कि इस संस्कार के लिए तेरह दिनों का प्रावधान क्यों किया गया? जो कारण हमने सोचे अथवा खोजे और जो कारण हमें बुजुर्गों से मिले उनके आधार पर हमने कुछ निष्कर्ष निकाले।

त्रयोदशी संस्कार के पीछे धार्मिक कारण, सामाजिक कारण, पारिवारिक कारण समझ में आये। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ऐसा माना गया है कि किसी के देहान्त के बाद उसके घर-परिवार को सांत्वना देने के लिए जाया जाता है। आम बोलचाल की भाषा में इसे ‘फेरा करना’ कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि फेरा करने के बाद उस घर में रुका नहीं जाता है। न रुकने के पीछे क्या कारण है यह तो स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं किन्तु ऐसा समझा जा सकता है कि जिस परिवार में उसके परिजन की मृत्यु हो गई हो वह किसी आगन्तुक के आवभगत की मानसिक स्थिति में नहीं होता है। हो सकता है कि इसी कारण से ऐसी मान्यता बना रखी हो।

यही मान्यता त्रयोदशी संस्कार के दिन भी लागू होती दिखती है। आज तो परिवहन के उन्नत साधन हैं। आदमी चाहे तो सैकड़ों किमी की दूरी को भी आसानी से पूरा कर सकता है। उस जमाने में जब कि परिवहन के साधन उपलब्ध नहीं थे, आदमी को कुछ किमी की दूरी के लिए भी घंटों यात्रा करनी होती थी, ऐसे में आने वालों को भूखे पेट बापस न होने देने के कारण उसके भोजन की व्यवस्था की जाती होगी। (मान्यताओं के अनुसार उसे रुकना भी नहीं है)

इसके अतिरिक्त एक और कारण जो समझ में आता है कि आज किसी के देहान्त का समाचार उसके समस्त रिश्तेदारों, परिजनों, सगे-सम्बन्धियों, मित्रों, आसपास के लोगों तक पहुँच जाता है। उस समय जब कि संचार माध्यम इतना तेज नहीं था तब सामाजिक रूप से समस्त लोगों तक इस बात की सूचना देने के लिए कि फलां-फलां व्यक्ति का देहान्त हो गया है और अब उसके उत्तराधिकारी के रूप में फलां-फलां लोग हैं। इस सूचना के पीछे यह भी कारण रहा होगा कि उस सम्बन्धित व्यक्ति की मृत्यु के बाद भी उसके नाम से किसी प्रकार का आर्थिक, सामाजिक अथवा किसी अन्य प्रकार का लेन-देन न किसा जा सके। मृत्योपरान्त उस व्यक्ति के नाम का दुरुपयोग कर कोई भी उसके किसी भी परिचित से धोखाधड़ी न कर सके, इस कारण एक निश्चित दिन सभी का उस घर के सदस्यों से मिलने का चलन शुरू किया गया होगा। अब आने वालों को कुछ न कुछ, भले ही जलपान रूप में ही, खिला कर ही बापस भेजा जाता होगा।

इसी तरह पारिवारिक मान्यताओं में यह भी विचार किया जा सकता है कि जिस परिवार में किसी व्यक्ति का देहान्त हुआ हो, यदि उसे तुरन्त ही अकेला छोड़ दिया जाये तो उस परिवार के सदस्यों की इस दुखद घटना की वजह से मानसिक स्थिति पर भी असर पड़ सकता है। शोककुल परिवार के व्यक्ति आने जाने वालों में व्यस्त रहें और अपने दुख को सभी के साथ बाँटकर हल्का भी कर सकें। इस कारण तेरह दिन किसी न किसी संस्कार को सम्पन्न किया जाता रहता है।

आज के संदर्भों में बात करें तो स्पष्ट है कि उक्त कारणों के अतिरिक्त अन्य दूसरे कारण भी खोजे जा सकते हैं, उक्त कारणों को भी किसी हद तक स्वीकार किया जा सकता है किन्तु आज भोजन करवाने की परम्परा का स्पष्ट कारण समझ नहीं आता है।

आने वाले को कुछ भी खिलाने-पिलाने की भारतीय परम्परा, समाज के लोगों को मृत्योपरान्त उत्तराधिकारियों की जानकारी, शोककुल परिवार को सांत्वना देने के लिए लगातार लोगों का मिलते-जुलते रहना तो कुछ हद तक समझ आता है किन्तु उक्त कारणों की किसी भी अंश तक स्वीकार्यता के बाद वही सवाल आज भी खड़ा रहता है कि आखिर त्रयोदशी के नाम पर भोजन करवाने की परम्परा क्यों? और तो और अब तो बड़े ही दिखावे के साथ भी इस परिपाटी को सम्पन्न किया जाता है।

कारण बहुत खोजे जो उस जमाने के हिसाब से सही समझ आते हैं जबकि साधन सम्पन्नता नहीं थी किन्तु आज के संदर्भों में इस संस्कार के द्वारा मानव क्या सिद्ध करना चाहता है पता नहीं? सवाल फिर भी वहीं है और वही है..............

05 नवंबर 2009

इन चित्रों को जरूर देखिएगा - आश्चर्यजनक हैं.....

इस पोस्ट में कुछ चित्र हैं आपके दर्शनों के लिए।
हमारी एक परिचित हैं अंजलि दीवान जीशिमला, हिमाचल प्रदेश में रहतीं हैं और शिमला में ही एक डिग्री कॉलेज में अध्यापन कार्य से जुड़ीं हैं
उन्हीं के द्वारा समय-समय पर मेल के द्वारा हमें बड़ी ही सुंदर-सुंदर तस्वीरें भेजी जातीं हैं। पिछले दिनों उनकी तरफ़ से बहुत से चित्र मिले। इन चित्रों में एक व्यक्ति को अदृश्य रूप में दिखाया गया हैये किसी ट्रिक फोटोग्राफी का कमाल नहीं है ही किसी तरह की कलावाजीये पेंटिंग का एक नायब नमूना है
आप भी आनंद लें कुछ चित्रों का, विशेष रूप से चित्र 4 तथा चित्र 5 का

(चित्र 1)

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(चित्र 2)

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(चित्र 3)
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(चित्र 4)
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(चित्र 5)

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कहिये आनंद आया? धन्यवाद अंजलि जी को.............

04 नवंबर 2009

300 वीं पोस्ट पर स्वरचित 100 वीं कविता - खामोशी

मालूम है कि लालच बुरी बला है किंतु 300 पोस्ट आज ही पूरी करने का लालच रोक नहीं सके और आपको फिरसे परेशान करने चले आए।

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300 वीं पोस्ट पर स्वरचित 100 वीं कविता। शायद आपको पसंद आए............ इस कविता को दिसम्बर 1997 में लिखा था।

खामोशी


एक निस्तब्धता
हम दोनों के बीच
सदियों से छाई है।
हम दोनों साथ चलते रहे
जाने कब से मगर
इस मौन को न तोड़ सके।
वह बात
जो मैं सुनना चाहता था
तुम्हारी आवाज़ में,
उसे नज़रों की भाषा में
पढ़ सके।
हमारी बात दिल की
दिल में ही रह गई,
एक खामोश मौन की
गहराइयों में बह गई।
तुम्हारे लबों पर,
तुम्हारे विचारों की लय पर
पहरा लगा था समाज का,
परदा पड़ा था
शर्म और लाज़ का,
पर मैं...मैं क्यों मौन रहा?
क्यों खामोशी का दामन थामे
यूँ चलता रहा?
हवा के हर झोंके ने,
बादलों की हर अँगड़ाई ने
छूकर पास से,
सिरहन मचाकर तन में
मौन को तोड़ना चाहा,
पर....
सफर यूँ ही खामोश कटता रहा।
आज फिर तुम्हारी नज़रों ने
संग ले इस सुहाने मौसम का
कुछ पूछना चाहा,
खामोश दर्प को तोड़ना चाहा।
नज़रों ने
नज़रों की निस्तब्धता को तोड़ा,
हम फिर भी
वैसे ही खामोश रहे,
नज़रों के सहारे ही
कुछ कहते रहे।
और चल पड़े अगले पल
वैसे ही खामोश, मौन,
निस्तब्धता लिए।
न पता कब तक
यूँ अनवरत,
शायद जनम-जनम तक,
इस जनम से उस जनम तक।

विचारों की प्रासंगिकता क्यों और किसके लिए होती है??

तीन सौ पोस्ट डेढ़ वर्ष में ही करने का हमारा लालच और मेल के द्वारा हमें मिला आदेश। यही कारण है कि आज दो पोस्ट लिखने के बाद भी इस पोस्ट को लिखने बैठ गये।
देखा जाये तो हमारे आसपास इतना कुछ होता रहता है कि प्रतिपल एक पोस्ट लिखी जा सकती है। अभी शाम को हम मित्र आपस में चर्चा कर रहे थे और चर्चा भी होने लगी एक ऐसे विषय पर जो आये दिन हमारे सामने से गुजरता है। किसी भी ‘महान व्यक्ति के विचारों की प्रासंगिकता’, यह ऐसा विषय है जो प्रासंगिक न होने के बाद भी प्रासंगिक है।
हम जब भी किसी व्यक्ति की जयंती आदि मनाते हैं तो उसके विचारों को याद करते हुए उसके विचारों को आज के लिए भी प्रासंगिक बताते हैं। अब प्रासंगिकता किस संदर्भ में होती है, यह समझ से बाहर हो जाता है। माना कि गाँधी जी के विचारों को ही लें, गाँधी जी को याद करते हैं और कहते हैं कि आज भी गाँधी जी के विचार प्रासंगिक हैं।
यदि प्रासंगिक हैं तो कौन मान रहा है? मात्र यह समझना कि आज यदि अहिंसा, प्रेम, भाईचारे को अपनाया जाये तो समाज में शांति रहेगी, सत्य हो सकता है किन्तु अपनाये कौन?
एक तरफ हम भाषण देकर निकले और दूसरी ओर लग गये हिंसा, अत्याचार, नफरत को फैलाने में। समझना होगा कि महान व्यक्तियों के विचार क्या किताबों, भाषणों, कार्यक्रमों आदि तक ही प्रासंगिक हैं? यदि ऐसा है तो यह कहना गलत है कि आज भी विचार प्रासंगिक हैं।
हाँ, हमारी दृष्टि में विचारों की प्रासंगिकता उस समय तक है जब तक कि स्वयं को समाज में स्थापित करना होता है, लोगों के बीच में स्वयं को बुद्धिजीवी सिद्ध करना होता है। चलिए ऐसा ही अपने आपको ब्लाग संसार पर सिद्ध करने के लिए हम भी कहे देते हैं कि फलां-फलां के विचार ब्लाग संसार में आज भी प्रासंगिक हैं।
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विशेष---अगले एक-दो घंटे में एक और पोस्ट को सहना पड़ेगा आप सभी को, आखिर तीन सौ का सवाल है। कृपया सहन कर लीजियेगा।
चित्र गूगल से साभार लिया गया है....

कैसे गुजर जाता है समय पता नहीं चलता????

आज ब्लाग पर आये हुए पूरा एक वर्ष और छह माह हो गये हैं। इन डेढ़ वर्षों में ब्लाग संसार के बहुत से खट्टे मीठे अनुभव रहे। कुछ नया करने का विचार आया, उन्हें अंजाम भी दिया। किसी काम में सफल रहे तो किसी काम में असफलता हाथ लगी। सफलता-असफलता को जीवन से ही सीखा है इस कारण किसी तरह की मानसिक दिक्कत नहीं हुई।
ब्लाग से जुड़े लोगों का सहयोग भी मिला और जितना हमसे हो सका हमने सहयोग देने का प्रयास किया। इधर बहुत से लोगों की हमसे इस सम्बन्ध में निराशा जैसी स्थिति ही रही कि हम उनकी पोस्ट पर टिप्पणी करने में बहुत ही कंजूस हैं। हो सकता है कि किसी के लिए यह सही हो किन्तु सभी के लिए नहीं।
जैसा कि हम स्वयं के लिए अनुभव करते हैं कि जब पहली-पहली बार ब्लाग पर आये तो न जाने कहाँ-कहाँ ब्लाग बना दिये पर अपनी आसानी और कुछ सुविधाओं के कारण ब्लागर के ब्लाग को ही चालू रखा। जब हम पोस्ट करते थे तो उस समय लगता था कि कौन हमारा लिखा पढ़ रहा है और कौन नहीं पढ़ रहा?
इसके पीछे अपना लिखा पढ़वाना नहीं वरन् यह लालच था कि हम ब्लाग की प्रकृति के अनुसार लिख भी रहे हैं अथवा नहीं? बाद में जैसे-जैसे ब्लाग से जुड़ते गये तो लगा कि हम शुरुआत से आज तक वह नहीं लिख सके जो लिखा जा सकता है। फिलहाल, जहाँ तक टिप्पणी का सवाल है तो पहले-पहल जो लालच हमें रहता था वहीं लालच हर नये ब्लागर को रहता होगा (पुराने ब्लागर को इस तरह की लालसा नहीं पालनी चाहिए....शायद) तो हमारा ज्यादा से ज्यादा विचार यह होता है कि नये लोगों की पोस्ट पर टिप्पणी की जाये और ऐसा करते भी हैं। (इस बात के लिए पुरान ब्लागर साथी क्षमा करेंगे)
वैसे हम पुराने ब्लागर साथियों की पोस्ट पर भी टिप्पणी कर देते हैं पर हमेशा हिम्मत नहीं होती। इसके पीछे उनकी कलम का ताकतवर तरीके से किसी भी विषय को प्रस्तुत करने का ढंग होता है। इस कारण बजाय टिप्पणी करने के हम उनसे कुछ न कुछ सीखने की कोशिश करने लगते हैं। (आज तक भी किसी न किसी की नकल करके ही ब्लाग पर लिख रहे हैं)
नये लोगों को टिप्पणी के द्वारा प्रोत्साहित करते ही रहे हैं साथ में नये-नये लोगों को ब्लाग बनाकर लेखन के लिए भी प्रोत्साहित कर रहे हैं। अभी तक लगभग 27 लोगों को ब्लाग बनवाकर ब्लाग संसार से जोड़ चुके हैं। इनमें से कुछ तो सक्रिय रूप से जुड़े हैं और कई सदस्य कुछ अन्तराल से अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं।
इधर कुछ न कुछ नया करने का लगातार प्रयास जारी है। शब्दकार और पहला प्रयास (दोनों सामुदायिक ब्लाग हैं) इसी का परिणाम हैं। अब आगे विचार है कि एक तो समाचार ब्लाग बनाया जाये जो विशेष रूप से बुन्देलखण्ड के समाचारों का प्रकाशन समय-समय पर किया करे। इसके अलावा दो ब्लाग और संचालित करने की योजना है। इस पर काम शुरू होते ही आप लोगों के सामने प्रस्तुत करेंगे।
हमेशा की तरह इस डेढ़ वर्ष के बालक का लड़खड़ा कर चलना जारी है। आप बस निगाह रखें के उसके चाल-चलन (ध्यान दें चाल-चलन) में किसी तरह का भटकाव न आने पाये। शेष समय तो अच्छी तरह से कट ही रहा है।
चित्र गूगल से साभार
विशेष ----
1 वर्ष 6 माह और ये पोस्ट है 298 वीं

आस्था के बदले डर का सैलाब??

कल एक काम से अपने मित्र के घर जाना हुआ, रास्ते में एक मंदिर पड़ता है हनुमान जी का। मूर्ति का दक्षिण मुख होने के कारण मंदिर के प्रति लोगों की अपनर श्रृद्धा है। मंगलवार तथा शनिवार को बहुत अधिक भीड़ रहती है।
इसी तरह से भीड़ को भक्तिभाव में लीन 2 तारीख को गुरु पूर्णिमा के अवसर पर भी देखा। एक दो नहीं पूरे वर्ष में कई अवसर ऐसे आते हैं जब भक्तिभाव पूरे जोरों पर रहता है। देश के मंदिर तथा पवित्र स्थानों पर भयंकर भीड़ जमा होती है।
यह नजारा केवल हिन्दुओं के पर्व, त्यौहारों पर ही देखने को नहीं मिलता है वरन् सभी धर्मों के लोगों के साथ ऐसा है।
यह सब देखकर मन में हमेशा से एक विचार आता रहा है कि ये लोग किस कारण से भगवान की इतनी भक्ति करते दिखते हैं; पूजा? इबादत करने में लगे रहते हैं? क्या किसी बात का डर है? अपने प्रियजनों के बिछोह का डर है? कुछ पाने की लालसा है? क्या है.....?
भगवान जैसे किसी भी अस्तित्व के पीछे यदि इतनी श्रृद्धा है तो फिर उससे डरकर अपराध कम क्यों नहीं करता इंसान? हत्यायें हो ही रहीं हैं! बलात्कार हो ही रहे हैं! कन्याओं की हत्यायें हो ही रहीं हैं! आतंकवाद है ही! लूटमार है ही! शोषण हो ही रहा है! कालाबाजारी चल ही रही है! और तो और अब तो मंदिरों तक से भगवान की मूर्तियों को, जेवरों को चुराया जाने लगा है।
यदि यह सब चल ही रहा है तो इतनी पूजा, आराधना, इबादत किस लिये? तीर्थ, हज किस लिए? कहीं ये आस्था के बदले डर का सैलाब तो नहीं?

03 नवंबर 2009

प्रकृति पर विजय करने की चाह में

कल रात को टी0वी0 पर समाचार देखते समय एक समाचार निगाह के सामने से गुजरा कि चीन में बर्फबारी हो रही है। समाचार के हिसाब से कोई विशेष बात तो नहीं थी किन्तु प्राकृतिक दृष्टि से बहुत ही विशेष बात लगी।
ज्ञात हुआ कि चीन ने कृत्रिम बारिश करवाने के लिए बादलों का निर्माण किया था। किसी केमिकल की अधिकता (मुन्ना भाई के शब्दों में केमिकल लोचा) के कारण बारिश तो नहीं हुई, बर्फबारी जरूर होने लगी।
अब ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि इस बर्फबारी से सूखा पड़ने की सम्भावना है। इसके साथ ही तापमान के शून्य से भी तीन से चार डिग्री तक नीचे जाने की सम्भाना है।
इसे कहते हैं प्रकृति पर विजय प्राप्त करने का दुष्परिणाम। धरती को संकट में डालकर मंगल और चन्द्रमा पर अपना अस्तित्व तलाशने की मारामारी करते मानव को अब भी शायद कुछ समझ न आयेगा?
चलो एक प्लाट हम भी चन्द्रमा पर खरीद ही डालें। आखिर धरती ऐसे ही मनुष्यों के कारण किसी दिन समाप्त हो जानी है।
अभी तो एक ही बात याद आ रही है कि यदि किसी काम में सफल हो गये तो मनुष्य की ताकत, मनुष्य की बुद्धि काम आ गई और यदि असफल हो गये तो भगवान को मंजूर नहीं था, प्रकृति ने साथ नहीं दिया। (बिलकुल भारतीय क्रिकेट टीम की तरह) वाह भई वाह!

02 नवंबर 2009

सरदार पटेल और इंदिरा की याद मे विचार-गोष्ठी

31 अक्टूबर को सरदार बल्लभ भाई पटेल जी की जन्मतिथि तथा इन्दिरा गाँधी की पुण्य तिथि थी। लगभग सारे देश में अलग-अलग प्रकार से दोनों महान व्यक्तियों से सम्ब्न्धित इस दिन को मनाया गया।
हमारे शहर के स्थानीय महाविद्यालय दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग में छोटी-छोटी गोष्ठियाँ, किसी तत्कालीन मुद्दे पर विचारों का आदान-प्रदान होता रहता है। इसके पीछे विभागाध्यक्ष डा0 आदित्य कुमार जी का विशेष योगदान रहता है। वे हमेशा युवाओं को कुछ नया करने की प्रेरणा देते रहते हैं।

बाएँ से डॉ० अनिल कुमार श्रीवास्तव (प्राचार्य) तथा डॉ० आदित्य कुमार (विभागाध्यक्ष)


इस दिन भी उनके ही प्रोत्साहन और उत्साह के कारण एक छोटी सी विचार गोष्ठी विभाग में आयोजित कर ली गई। वैसे हम राजनीति विज्ञान विभाग में नहीं हैं पर डा0 आदित्य जी का पितातुल्य स्नेह हमारे ऊपर सदा रहता है और उसी के वशीभूत हम भी अचानक विभाग में पहुँच गये। हमने भी विचार-गोष्ठी का आनन्द उठाया।
एक विशेष बात वहीं जाकर पता चली कि विभाग में कार्यरत युवा प्रवक्ता डा0 नगमा खानम का 31 अक्टूबर को जन्मदिन भी है। बस विचार-गोष्ठी भी हुई और जन्मदिन की पार्टी भी उड़ा ली।
गोष्ठी को संक्षिप्त में आपके सामने भी चित्रों सहित रखने का प्रयास है----
गोष्ठी की शुरुआत नगमा ने ही की। उन्होंने इन्दिरा गाँधी के दृढ़ चरित्र के बारे में बताते हुए आज की महिलाओं को उनके व्यक्तित्व से कुछ सीख लेने की सलाह दी।

बाएँ से - रणविजय, डॉ० नगमा खानम (राजनीति विज्ञानं विभाग, बर्थडे बेबी) डॉ० पूनम निरंजन (इतिहास विभाग)

बैठे हुए - डॉ० कांति जी (संस्कृत विभाग)


राजनीति विज्ञान विभाग के ही रविकान्त ने सरदार पटेल के बारे में बताया तो इसी विभाग के रणविजय ने इन्दिरा गाँधी के बारे में बताया। दोनों ही राजनीति विज्ञान में रिसर्च कर रहे हैं।
संस्कृत विभाग की डा0 कान्ति जी ने इन्दिरा जी के बारे में एक पंक्ति के द्वारा महत्वपूर्ण बात कह दी कि संसार में इंदिरा गाँधी ही एकमात्र ऐसी महिला हैं जिन्होंने इतिहास बदलने के साथ-साथ भूगोल भी बदल दिया।
विभागाध्यक्ष डा0 आदित्य कुमार ने दोनों शख्सियतों के बारे में बताते हुए रियासतों के एकीकरण तथा इमरजेंसी की स्थितियों के बारे में समझाया।
रक्षाअध्ययन विभाग के डा0 आर0 के0 निगम ने गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के बारे में बताते हुए इंदिरा गाँधी की कूटनीतिज्ञ क्षमता को विश्व में सबसे अलग स्वीकारा।

खड़े हुए बाएँ से - डॉ० अतुल प्रकाश बुधौलिया (अंग्रेजी विभाग) डॉ० वीरेन्द्र सिंह यादव (हिन्दी विभाग)

बैठे हुए बाएँ से - डॉ० आर० के० निगम (रक्षा अध्ययन विभाग) डॉ० अनिल कुमार श्रीवास्तव (प्राचार्य)


महाविद्यालय के प्राचार्य डा0 अनिल कुमार श्रीवास्तव ने दोनों महान व्यक्तित्वों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हमें इन लोगों की अच्छाइयों को सीखना होगा तथा बुराइयों को इस कारण याद रखना होगा कि हममें वे कमियाँ न आयें। उन्होंने पटेल को दृढ़ तथा दूरदर्शी बताया तो इंदिरा को जीवट महिला करार दिया। उन्होंने कहा कि एक यदि लौह पुरुष है तो दूसरी को लौह महिला कहा जा सकता है।
विचार-गोष्ठी में अंग्रेजी विभाग के प्रवक्ता डा0 अतुल प्रकाश बुधौलिया, हिन्दी विभाग के प्रवक्ता डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव, इतिहास विभाग की प्रवक्ता डा0 पूनम निरंजन, अर्थशास्त्र विभाग के प्रवक्ता डा0 आशीष अग्रवाल तथा हमने भी अपने संक्षिप्त विचार रखे।