30 जून 2009

राखी ने बनाया अप्रैल फूल....????

राखी ने बनाया अप्रैल फूल....????

इस वीडियो को हमारे एक मित्र ने भेजा था। इधर समझ नहीं आ रहा था कि आप लोगों तक इसे कब भेजा जाये। तभी खबर मिली कि राखी स्वयंवर कर रही है। लगा कि कहीं फूल तो नहीं बनाया जा रहा है? बस मौका यही समझ आया इस वीडियो को दिखाने का।

(यह बस एक मजाक के तौर पर है, यदि किसी की भावनायें आहत हों तो हम क्षमा चाहते हैं।)

26 जून 2009

अरुण ये आरक्षणमय देश हमारा

बचपन में अपनी शिक्षा के दौरान एक कविता पढ़ी थी ‘अरुण ये मधुमय देश हमारा, जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।’ आज इस कविता की प्रथम दो पंक्तियों में कुछ शब्द बदले-बदले से लगे। वर्तमान परिदृश्य में ये पंक्तियाँ कुछ इस तरह से दिखीं ‘अरुण ये आरक्षणमय देश हमारा, जहाँ पहुँच कुछ खास को ही मिलता एक सहारा।’
इन देशभक्ति के भावों से ओत-प्रोत पंक्तियों में शब्दों का फेरबदल देश के नीति नियंताओं के कारण से करना पड़ रहा है। आये दिन समाचार मिलता है कि अब यहाँ भी आरक्षण लागू किया जायेगा। देश में शायद ही कोई क्षेत्र बाकी होगा जहाँ आरक्षण लागू न किया गया हो?
महिलाओं के लिए आरक्षण, विधायिका में आरक्षण, नौकरियों में आरक्षण, शिक्षा में आरक्षण, सरकारी क्षेत्र में आरक्षण, निजी क्षेत्र में आरक्षण जिधर निगाह डालो बस आरक्षण। ऐसा सोचा औश्र लगा कि अब देश क्या आरक्षण की बैशाखी पर ही चलेगा? अच्छे अंक पाने वाला सवर्ण बच्चा प्रवेश को तरसता है और कम से कमतर अंक आने के बाद भी आरक्षण का लाभार्थी डाक्टर या इंजीनियर या और भी कुछ बन कर निकलता है।
अच्छा है, देश के पिछड़े वर्ग को विकास की मुख्यधारा में आने का अवसर मिल रहा है। अवसर समान रूप से मिलें तो बेहतर पर ऐसा नहीं है। क्रीमीलेयर वाले क्रीम का मजा ले रहे हैं शेष तो वहीं के वहीं हैं। सोचा कि पता करें कि आरक्षण कहाँ नहीं है? हर जगह तो आरक्षण है....तभी ध्यान आया नहीं!!! हर जगह आरक्षण अभी नहीं है।
अब? यदि हर जगह आरक्षण नहीं है तो विकास कैसे होगा? पिछड़े तबके को विकास की मुख्यधारा में आने का अवसर कैसे मिलेगा? पता तो कर लीजिए कि कौन से क्षेत्र हैं जिनमें आरक्षण लागू नहीं है। एक क्षेत्र तो है जन्म का क्षेत्र और दूसरा है श्मशान। अभी हमारे देश में मरने और पैदा होने पर आरक्षण लागू नहीं है।
अब होना ये चाहिए कि किसी भी शहर अथवा जिले में (जैसा सरकार को सुविधाजनक और सहज लगे) यह व्यवस्था लागू हो कि पूरे दिन पैदा और मरने का रिकार्ड रखा जाये। दिन की समाप्ति पर आरक्षण के अनुसार पैदा और मृत्यु का हिसाब लगाया जाये। वर्गानुसार पैदा करने और मृत्यु की संख्या का निर्धारण किया जाना चाहिए।
यदि सभी वर्गों का समान प्रतिनिधित्व न हो तो किसी भी तरह से उन वर्गों के लोगों में से जन्म, मृत्यु की संख्या की भरपाई की जानी चाहिए। आखिर देश के विकास का सवाल है। वर्गों के विकास की मुख्यधारा में लाने का सवाल है। कोशिश हमें ही करनी होगी........चलिए प्रयास करते हैं, आन्दोलन करते हैं।

23 जून 2009

हाँ, मैं दुआ करता हूँ कि मेरी माँ मर जाये

‘‘हाँ, मैं दुआ करता हूँ कि मेरी माँ मर जाये।’’ आपको सुन कर कुछ अजीब सा नहीं लगा? सम्भवतः लगा होगा। लगना भी चाहिए क्योंकि आज के जमाने में शायद ही कोई पुत्र या पुत्री ऐसे होगे जो अपनी माता के मरने की दुआ करते होंगे।
इसके बाद भी कुछ ऐसा सुनने को मिला। सुन कर हमें भी बड़ा ही अचम्भा हुआ। उस व्यक्ति से पूछा कि ऐसा क्यों? जवाब मिला तो और भी चैंकाने वाला। उसने बताया कि वह एक प्राइवेट कम्पनी में काम करता है, शादीशुदा है। घर में पिता न होने के कारण घर की जिम्मेवारियों का बोझ उसी के सिर पर है।
काम के बाद जब घर लौटता है तो लगभग रोज का नियम है कि उसकी माँ और पत्नी की खटपट का तनाव घर पर दिखाई पड़ता है। पत्नी को समझाते-समझाते थक चुका है पर वह मानती नहीं। माँ को जिस प्रकार से समझा सकता था समझा चुका, उन पर अब बुढ़ापे का साया है, किसी बात को मानती नहीं। खुद समझ नहीं आता कि क्या किया जाये?
उसके परिवार के अन्य सदस्यों के बारे में पता किया तो मालूम हुआ कि वह, उसकी पत्नी, माँ और उसका एक छोटा सा बेटा है। छोटे से परिवार में वह नहीं चाहता कि उसकी पत्नी और माँ की खटपट का असर उसके बच्चे पर पड़े। माँ को छोड़ कर अलग नहीं रह सकता। पत्नी को अब और समझाया नहीं जा सकता। रोज-रोज की खटपट से वह तनाव में रहता है और इसका असर उसके काम पर भी पड़ रहा है।
क्या करे, कुछ कह भी नहीं सकता, कुछ कर भी नहीं सकता। माँ का अनादर होते भी नहीं देख सकता, माँ को दुखी भी नहीं देख सकता। इसलिए दुआ करता हूँ कि माँ को भगवान उठा ले।
पूरा दिन सोचते रहे कि क्या सही है और क्या गलत? सोच को अपने से दूर करने के लिए आप लोगों पर यह पोस्ट थोप दी। सह लीजिए इसे भी अन्य पोस्ट की तरह।

19 जून 2009

क्या सबूत है बलात्कार न करने का?

एक सवाल पर निवेदन वही कि पूर्वाग्रह छोड़ें और जवाब दें।

एक स्त्री और एक पुरुष पूर्ण सहमति के बाद शारीरिक सम्बन्ध बनाते हैं। संसर्ग के बाद वह स्त्री उसी पुरुष पर बलात्कार का आरोप लगाती है। जाँच के बाद महिला से शारीरिक सम्बन्ध बनाया जाना भी सिद्ध होगा क्योंकि ऐसा हुआ है।

इस स्थिति में उस पुरुष के पास क्या तरीका है यह सिद्ध करने के लिए कि उन दोनों के मध्य सेक्स आपसी सहमति, पूर्ण सहमति से हुआ है?

18 जून 2009

हाँ..हाँ..महिलाएं भी करतीं हैं बलात्कार

इस देश में जहाँ माना जाता है कि हर दो-चार मिनट पर एक महिला बलात्कार का शिकार होती है वहाँ कोई चर्चा नहीं होती और जब एक अभिनेता ऐसा करता है तो सारे देश में चर्चाओं के, बहस के दौर शुरू हो जाते हैं। (यहाँ बलात्कार का दीर्घ अर्थ न निकाल कर उसे शारीरिक सम्बन्ध ‘सेक्स’ के रूप में ही प्रयुक्त किया गया है)

शाब्दिक अर्थों में बलात्कार विस्तृत अर्थ रखता है और यदि इस दृष्टि से देखा जाये तो समाज में हर महिला और पुरुष बलात्कार का शिकार होते हैं। इस समय चर्चा का सन्दर्भ एक वाक्य पर आधारित है और वह है कि ‘बलात्कार केवल पुरुष ही नहीं करते महिलायें भी बलात्कार करतीं हैं।’

यह वाक्य कल मीडिया की सुर्खियों में बना रहा और इसे बलात्कार के दोषी अभिनेता शाइनी आहूजा की पत्नी ने उछाला था। इस पूरे प्रकरण को लेकर कल एनडीटीवी के न्यूज प्वाइंट में अच्छी खासी बहस देखने को मिल रही थी। इस कार्यक्रम के संचालक रवीश ने अनुपम आहूजा के उक्त वाक्य के सन्दर्भ में जानकारी चाही तो वहाँ चर्चा में शामिल तीन लोगों में से एक महोदय ने कानून की दो धाराओं (शायद धारा 356 और 357) का जिक्र करते हुए बताया कि कानून में इस तरह की किसी भी सम्भावना को स्वीकारा नहीं गया है कि एक महिला बलात्कार करे। उन सज्जन का कहना था कि एक महिला न तो किसी महिला से न ही किसी पुरुष से बलात्कार कर सकती है।

इस बात को रवीश ने भी बार-बार दोहराया और इसी बात पर जोर दिया कि कोई भी महिला बलात्कार नहीं कर सकती है। यहाँ हमारा स्पष्ट रूप से मानना है कि एक महिला भी बलात्कार कर सकती है और करती भी है। इस सम्बन्ध में हम पहले भी प्रिंट मीडिया के द्वारा अपनी बात को उदाहरण सहित रख चुके हैं। यहाँ बलात्कार का अर्थ जोर-जबरदस्ती या फिर किसी तरह की शाब्दिक छींटाकशी नहीं वरन् शारीरिक सम्बन्ध से है। हो सकता है कि जिस प्रकार के उदाहरण हमने देखे हैं आप में से बहुतों ने देखे होंगे परन्तु हम कभी-कभी बहुत सी बातों का खुलेआम जिक्र नहीं करना चाहते हैं।

उदाहरण तो कई एक हैं पर बात शुरू करना चाहेंगे उन दिनों से जब हम ग्वालियर से स्नातक की शिक्षा (वर्ष 1990-91) ग्रहण कर रहे थे। ग्वालियर के मेडीकल कालेज के गल्र्स हास्टल के पास से हफ्ते दस दिनों में किसी ताँगे वाले के, किसी मिस्त्री के, किसी अन्य छोटे से कारीगर या फल आदि वाले के अर्द्ध-बेहोशी में, पूर्ण मूच्र्छावस्था में पाये जाने के समाचार मिलते रहते थे। हम लोग इन समाचारों का बड़े ही उन्मुक्त अंदाज में अपना अर्थ निकाला करते थे। हम लोगों का सीधे-सीधे किसी ताँगे वाले या मिस्त्री से कोई सम्पर्क नहीं था इस कारण हम मित्र मंडली में बहुत से लोग इन समाचारों पर कान नहीं दिया करते थे। हालांकि कभी-कभी अपने हास्टल के पास के मिस्त्रियों या अन्य छोटे दुकान वालों से इन समाचारों की चर्चा करते तो वे भी गल्र्स हास्टल के आसपास भी न जाने की बात करते, कान पकड़ते दिखते।

स्नातक के दूसरे वर्ष के अन्त में हमारा पाला इसी तरह की दुर्घटना के शिकार अपने कालेज के एक चपरासी के बेटे से पड़ गया, जो ताँगा चलाता था। उसने जो कहानी बयान की उसे सुन कर लगा कि महिलायें भी एक प्रकार का गैंग रेप करतीं हैं। हास्टल में रहने वालीं लड़कियाँ किसी न किसी बहाने से कभी ताँगे वाले को, कभी किसी मैकेनिक को कभी आटो वाले आदि को हास्टल के अन्दर ले जातीं और फिर वह कितनी-कितनी लड़कियों की शारीरिक भूख मिटाकर स्वयं को बेहोशी में पहुँचा कर बाहर आता।

पहले लगा कि कोई लड़की कैसे ऐसा कर सकती है? क्या उसे अपनी इज्जत की, अपने परिवार की मर्यादा की चिन्ता नहीं? क्या इन लड़कियों को पकड़े जाने का डर नहीं?
ये सवाल सवाल ही बने रहे किन्तु समाज में इस तरह की घटनाओं में और भी बढ़ोत्तरी होती रही। फिर तो आये दिन समाचार सुनने को मिलने लगे कि फलां अमीर औरत अपने पति से संतुष्ट नहीं, वह किशोरों को अपना शिकार बना रही है। इस तरह के समाचार अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी सुनाई पड़ने लगे हैं।

देखा जाये तो शरीर की अपनी एक माँग है और इसी कारण समाज में विवाह जैसी संस्था का निर्माण हुआ था। अब लगता है कि जैसे सेक्स की चाह सिर्फ आदमी को ही रहती है। औरत तो बिना शारीरिक माँग के अपना जीवन निर्वाह करती है।

यह एक सार्वभौम सत्य की तरह से है कि यदि औरत चाह ले तो उसकी मर्जी के बिना कोई भी उसके साथ सेक्स नहीं कर सकता है। औरत यदि चाह ले तो किसी को भी सेक्स के लिए आमंत्रित कर सकती है। कुछ अन्तर्राष्ट्रीय हस्तियों के अपने ड्राइवर, रसोइयों, गार्डों से शारीरिक सम्बन्ध इसी बात का परिचायक हैं जो उनकी मुत्यु के बाद ही सामने आ रहे हैं। इसके ठीक उलट एक क्लिंटन कांड हुआ था जो तुरन्त ही सामने आ गया।

इस विषय पर काफी लम्बा लेखन हो गया। इसे क्रमशः वाली स्थिति में ही रख छोड़ा जाये। अभी बहुत कुछ है कहने को, बस पूर्वाग्रह से ग्रसित न हुआ जाये।

16 जून 2009

बलात्कार के पीछे का मनोविज्ञान समझो या एक दूसरे को कोसते रहो

पिछले दो-तीन दिनों में देश में दो ऐसी घटनायें हुईं जो समाज की स्थिति के बारे में सोचने को विवश करतीं हैं पर क्या कोई सोच भी रहा है? एक नाबालिग लड़की के साथ गैंग रेप और एक अभिनेता द्वारा अपनी नौकरानी से बलात्कार। दो खबरें......जी हाँ समाज के लिए अब इस तरह की घटनायें खबरें मात्र ही रह गईं हैं।
गैंगरेप का शिकार हुई लड़की के साथ न्याय हो इसके लिए उसके स्कूल की छात्राओं ने अन्य नागरिकों के साथ मिल कर रैली निकाली। अभिनेता को तुरन्त ही पुलिस हिरासत में ले लिया गया। इन सबके बाद भी सवाल उठता है कि ऐसा होता क्यों है? आदमी-औरत के बीच का रिश्ता शरीर पर आकर ही क्यों रुकता है? अकेली लड़की या औरत क्यों अपने शरीर की कीमत चुकाती है? इस पर एक लम्बी और सार्थक बहस की अवश्यकता है पर सवाल वही कि शुरुआत करे कौन?
अब समाज में जब भी स्त्री-पुरुष की चर्चा होती है तो दोनों पक्ष अपनी-अपनी आँखों पर पूर्वाग्रह का चश्मा चढ़ा लेते हैं उसके बाद बहस में भाग लेते हैं। इस तरह की बहस से किस प्रकार का परिणाम तो प्राप्त होता नहीं है, हाँ आपसी मतभेद और बुरी तरह निकल कर सामने आ जाते हैं।
बलात्कार करने वाले के लिए हमेशा से फाँसी की सजा की माँग की जाती रही है। हमारा इस मामले में मत अलग है। हो सकता है कि आज के लोकतन्त्र में इस सजा का कोई भी पक्षधर न हो पर होना यह चाहिए कि बलात्कारी का लिंग काट दिया जाये। बलात्कार किसी भी स्थिति में हुआ है वह एक महिला के शरीर से, उसके मानसिक और सामाजिक स्तर से छेड़छाड़ की स्थिति है, इसे किसी भी कीमत पर स्वीकारा नहीं जाना चाहिए।
इधर इन घटनाओं के साथ एक सवाल और भी खड़ा हुआ, जैसा कि अभिनेता ने कहा कि उसके और नौकरानी के मध्य शारीरिक सम्बन्ध बने थे किन्तु आपसी सहमति से। अब सोचिए कि यदि कल को यह साबित हो जाये कि उस अभिनेता और उसकी नौकरानी ने सहमति के बाद शारीरिक सम्बन्ध बनाये तब क्या होगा? अदालत के पूर्व आदेशों के चलते तब सजा सम्भव नहीं। हमारा मानना है कि ऐसी स्थिति के सामने आने के बाद भी दोनों को सजा होनी चाहिए यदि दोनों में से कोई एक भी शादीशुदा है।
एक बात और, इसे महिलायें जरा गम्भीरता से और बिना किसी पूर्वाग्रह के पढ़े और समझ कर अपनी राय स्पष्ट करें कि क्या एक स्वस्थ महिला के साथ एक ही पुरुष बलात्कार कर सकता है? याद रखें कि महिला को किसी तरह का नशा नहीं है, किसी तरह से कमजोर नहीं है और आदमी भी अकेला है। यहाँ हमारा मानना है कि एक अकेला आदमी एक स्वस्थ अकेली महिला से किसी भी स्थिति में बलात्कार नहीं कर सकता है। इस बात को वे लोग बड़ी ही आसानी से समझ सकते हैं जो शारीरिक सम्बन्ध बना चुके हैं।
स्त्री-पुरुष के जननांग प्रकृति ने इस तरह से बनाये हैं कि बिना आपसी तालमेल और सहमति से शारीरिक सम्बन्ध कायम होना सम्भव ही नहीं। (यहाँ हमारी किसी भी बलात्कारी की तरफदारी करने की मंशा नहीं है)
बलात्कार समाज का वह कोढ़ है जिसके द्वारा आदमी तो फायदा उठा ही रहा है तथाकथित आधुनिक ललनायें भी फायदा उठा रहीं हैं।
बलात्कार के मनोविज्ञान को समझने के लिए पहले हमें अपने मन का विज्ञान समझना होगा। कम कपड़ों में लड़की, पहनावा आदि किसी भी रूप में इस प्रकार की घटनाओं के उत्प्रेरण नहीं हैं, हाँ अवसर की सम्भावना व्यापक होती है। रात के अँधेरे में सड़क पर जाती हर अकेली लड़की के साथ बलात्कार नहीं होता है। रात को टहलने वाला हर पुरुष बलात्कार करने की नीयत से ही नहीं टहलता है। अवसर की तलाश में रहते हैं वे लोग जो अपनी मानसिकता में किसी भी स्त्री-शरीर से सम्बन्ध बनाना चाहते हैं।
यदि ऐसा न होता तो विगत दिनों में घटित हुई कुछ घटनाओं ने हमें शर्मशार न किया होता। इन घटनाआ में मुर्दाघर में स्त्री-लाशों के साथ सेक्स, पिता द्वारा पुत्री के साथ सेक्स, बहिन द्वारा भाई के साथ, भाई द्वारा बहिन के साथ सेक्स, पुत्र और माता के आपसी शारीरिक सम्बन्ध, अन्य रिश्तों का सेक्स सम्बन्धों में बदल जाना शामिल है।
समाज कहाँ जा रहा है पता नहीं? कब तक ऐसा होगा पता नहीं? रिश्ते कब तक सेक्स की भूख मिटायेंगे पता नहीं? हम कब तक पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर बस इसी तरह मसाला खोजते रहेंगे? हम कब तक समाज को इन दरिंदों के हाथ में सौंपे रहेंगे?
कोई जवाब है क्या? या बस महिलायें पुरुष को और पुरुष महिलाओं को जिम्मेवार ठहराते रहेंगे?

14 जून 2009

चलिए समोसे खाते हैं

‘समोसा’ यह शब्द सुनाई देते ही मुँह में स्वाद बन जाता है, जीभ चटखारे मारने लगती है। और मारे भी क्यों नहीं, समोसा है ही इतना लाजवाब। इस लाजवाब समोसे के किस्से भी लाजवाब हैं। समोसे के जानकार अपने-अपने ढंग से इसके किस्सों को सुनाते रहते हैं।
अभी हाल में एक खबर सुनने में आई कि समोसा एक हजार वर्ष का हो गया है। आज इससे सम्बन्धित और थोड़ा सा समाचार-पत्र में भी पढ़ने को मिला। पढ़कर आश्चर्य हुआ कि बर्गर, पिज्जा से टक्कर लेता हमारा समोसा इतनी उम्र का हो गया है।
ऐसा कहा जाता है कि समोसा सबसे पहले मध्य एशिया से दसवीं शताब्दी में चलन में आया। भारत में इसका आना तेरहवीं, चैदहवीं शताब्दी में हुआ, जब भारत आने वाले व्यापारी इसे अपने साथ लेकर आये।
वैसे भारत में समोसे के होने के प्रमाण अमीर खुसरो (1253-1325) की रचनाओं के माध्यम से तथा चैदहवीं शताब्दी में यात्री इब्नबतूता द्वारा प्रस्तुत वृत्तांत और सोलहवीं शताब्दी के मुगलकालीन दस्तावेज ‘आइने अकबरी’ में हुए जिक्र से मिलते हैं। अमीर खुसरो की यह पहेली तो जग प्रसिद्ध है कि ‘‘जूता पहना न था, समोसा खाया न था’’, इस पहेली का उत्तर है- ‘‘तला न था’’।
इस पहेली स्पष्ट है कि इस कालखण्ड (तेरहवीं, चैदहवीं शताब्दी) में समोसा चलन में आ चुका था। इसको और भी सही रूप में इससे भी प्रमाणित किया जा सकता है कि अमीर खुसरो ने अपनी रचना में लिखा भी है कि घी में तला हुआ स्टफ्ड मीट वाला समोसा शाही परिवार के सदस्यों और अमीरों का लोकप्रिय व्यंजन था। वैसे भी चैदहवीं शताब्दी के यात्री इब्नबतूता ने अपने वृत्तांत में लिखा भी है कि ‘मोहम्मद बिन तुगलक के दरवार में भोजन के दौरान मसालेदार मीट और बादाम स्टफ करके तैयार किया गया समोसा परसा गया, जिसे लोगों ने बड़े ही चाव से खाया।’
समोसे का इतिहास कुछ भी रहा हो परन्तु इसके स्वाद के सभी दीवाने रहे हैं। देश के अलावा विदेशों में भी इसे उसी चाव से खाया जाता है जैसे कि हम पिज्जा और बर्गर आदि को स्वाद लेकर खाते हैं। यह बात और है कि हम जिस तरह तला-भुना समोसा अधिक पसंद करते हैं पश्चिम में ऐसा नहीं है। वहाँ के लोग कम तला-भुना पसंद करते हैं इस कारण से वे लोग बेक किया हुआ समोसा खाना पसंद करते हैं।
समोसा अपनी कितने भी देशों की, कई सदियों की यात्रा भले ही कर चुका हो किन्तु उसके आकार में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं हुआ है। अपने शुरुआती दिनों में भी यह तिकोना बनता था और आज भी यह तिकोना बनता है। जगह और स्वाद ने इसके मसाले को अवश्य ही प्रभावित किया है। समोसे का सबसे प्रचलित और सर्वमान्य रूप तो मसालेदार आलू से भरा समोसा ही है किन्तु बड़ी दुकानों में यह पनीर और मेवे से भी भरा हुआ पाया जाता है। पंजाबियों को चटपटा समोसा पसंद है तो गोवा में मीट भरा समोसा ज्यादा पसंद किया जाता है। मीठे के शौकीन लोगों के लिए मीठा और चाइनीज क्यूनीज पसंद करने वालों के लिए नूडल्स स्टफ समोसे भी बनाये जाते हैं।
समोसे की बढ़ती हुई लोकप्रियता को देखकर अब कम्पनियाँ समोसे को फ्रोजन फूड के रूप में भी पेश कर रहीं हैं। यदि मान लें कि समोसा दसवीं शताब्दी के मध्य में ही अवतरित हुआ तो अभी तक की चटखारेदार यात्रा और लाजवाब स्वाद के बाद जाहिर सी बात है कि उसे कम्पनियाँ अपने फायदे के लिए भी इस्तेमाल करेगीं।
जिसे जो करना हो करे अब इस पोस्ट के बाद समोसे खाना पक्का है। क्या आप भी स्वाद बनाने लगे?


12 जून 2009

यादें हमारे अतीत को जिन्दा रखतीं हैं

कभी-कभी कोई बहुत पुरानी चीज, कोई सामान, कोई किताब सामने आती है तो गुजरे हुए सारे लम्हे एक-एक करके याद आते हैं। आज सामान सही करते वक्त अपनी पुरानी अटैची को खोला तो बचपन की बहुत सी यादें ताजा हो गईं। कुछ तो सामान ऐसा था कि देख कर स्वयं पर हँसी आ रही थी कि इसे क्यों सँभाल कर रखा है?
संग्रह करने की आदत बहुत छोटे से ही हमारे बाबाजी ने डलवायी थी। वे अकसर कहा करते थे ‘‘सकल चीज संग्रह करो, कोऊ दिन आवै काम।’’ हालाँकि हमारे द्वारा संग्रह की गईं वे वस्तुएँ न तो बचपन में पुनः काम आईं थीं और न ही आज काम आने लायक बचीं हैं।
इन सामानों में कुछ चित्र थे जो हमने अखबारों, मैगजीनों, पुरानी किताबों आदि से काटे थे। एक छोटा-मोटा सा एलबम था जिसमें उन चित्रों को सजाया गया था। कुछ डाक टिकट भी निकले तो कुछ सिक्के, एक आना, दो आना के। यह सब हम मित्रों के द्वारा, भाई बहिनों के द्वारा आपसी आदान-प्रदान के बाद इकट्ठा हुए थे।
इन्हीं में एक सामान ऐसा भी मिला जिसके द्वारा अपनी एक दुर्घटना याद आ गई। पहली-पहली बार साइकिल चलाने के समय बुरी तरह जा भिड़े थे एक दीवार से। यह घटना है जब हम कक्षा 5 में पढ़ रहे थे, सन् 1982-83 की बात होगी। दीवार के आसपास गिट्टी-पत्थर का ढेर और बगल में बिजली का खम्बा। टक्कर इतनी तेज थी कि सिर से खून निकलना शुरू हो गया और हाथ-पैर में अच्छी-खासी खरोंचें आ गईं। साइकिल टूटी सा अलग।
सामान था टूटी हुई साइकिल का पैडल। उस समय घर की साइकिल तो चलाने को मिलती नहीं थी, चलाना तो दूर की बात छूने को भी नहीं मिलती थी। स्कूल जाते समय एक छोटी सी दुकान पड़ती थी जो किराये पर साइकिल देता था। बस हम तीन-चार मित्रों ने पैसे जोड़कर एक साइकिल किराये पर ले ली। सीखने-सिखाने में गिरे, चोट खाई, खुद टूटे और साइकिल भी तोड़ी।
साइकिल वाला पिताजी से परिचित था, डर लगा कि कहीं यह शिकायत न कर दे कि हम लोगों ने साइकिल किराये पर ली थी। उसकी चिरौरी की और उसे किसी तरह मना लिया कि वह घर पर खबर न करे। होते-होते सब कुछ ठीक रहा। हम पैडल तोड़ चुके थे, साइकिल वाले से तो कह दिया कि कहीं चलाते में गिर गया है पर डर था कि कहीं वह इधर-उधर पड़ा न देख ले इस कारण हम अपने साथ घर ले आये। बाद में फेंकने को मन इस कारण नहीं हुआ कि जब भी उसे देखते तो अपने पहली बार साइकिल चलाने को याद कर लेते।
और भी दूसरा सामान देख कर लगा कि हम किस तरह अपनी यादों के भँवर में लिपटे होते हैं जो हमें रुलातीं भी हैं और हँसातीं भी हैं। यही यादें ही हैं जो हमें आज भी अपने अतीत से जोड़े हैं, अपनी विरासत से जोड़े हैं।

11 जून 2009

मदद करो नहीं तो हमें कहना पड़ेगा "भिक्षाम देहि"

एक बहुत ही गम्भीर समस्या आन खड़ी हुई है, आप सबके सामने इसके समाधान के लिए खड़े हैं। आप सबको जैसा कि ज्ञात होगा कि शब्दकार का संचालन मार्च में शुरू किया गया था। आप सबके सहयोग से ही इस ब्लाग का संचालन किया जाना सुनिश्चित किया था। सहयोग भी मिला। अपनी ओर से भी आप सबके पास तक पहुँचने का प्रयास किया। बस समस्या यहीं आकर खड़ी हो गई।
हुआ यह कि यह समझ में नहीं आ रहा था कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को शब्दकार में प्रकाशन के बारे में कैसे बताया जाये? चूँकि शब्दकार में आलेखों, कहानियों, कविताओं आदि का प्रकाशन किया जाना तय किया गया था। जैसा कि किसी भी नई-नई चीज के बारे में होता है हमने भी इस ब्लाग का प्रचार करना शुरू किया।
प्रचार के तरीके में हमें सबसे सरल और सहज तरीका आप तक पहुँचने का लगा टिप्पणी। बस यही सोच कर हमने आप सबक ब्लाग पर जाकर टिप्पणी के माध्यम से शब्दकार के बारे में प्रचार करना शुरू कर दिया। हमें लग रहा था कि हम अपने व्यक्तिगत ब्लाग का प्रचार तो कर नहीं रहे हैं इस कारण सभी का पर्याप्त सहयोग प्राप्त होगा। किन्तु ऐसा नहीं हुआ। बहुत से लोगों को हमारा यह तरीका नागवार गुजरा। कई लोगों ने तो अपना सहयोग भी प्रेषित किया किन्तु अधिसंख्यक लोगों ने तो ई-मेल के द्वारा इसका विरोध किया। कई लोगों ने तो टिप्पणी को प्रकाशित करना तक उचित नहीं समझा।
इसके बाद लगा कि हो सकता है कि लोग टिप्पणी के द्वारा सिर्फ और सिर्फ अपने ब्लाग पर पोस्ट की गई सामग्री के बारे में ही बात करना पसंद करते हों। और हमारा इस प्रकार से शब्दकार का प्रचार करना उन्हें अच्छा न लग रहा हो। बस यही सोच कर हमने इस रचनात्मक ब्लाग का प्रचार ई-मेल के माध्यम से करने का मन बनाया।
बड़ी ही संयत भाषा में लोगों के लिए एक संदेश बनाया और मेल के माध्यम से इस ब्लाग का प्रचार करना शुरू किया। एक व्यक्ति को एक बार ही मेल किया। यह नहीं कि मेल कर-करके परेशान कर डाला हो किन्तु नतीजा वही ढाक के तीन पात! रचनायें तो प्राप्त हुईं नहीं लोगों ने इस तरीके का भी विरोध करना शुरू कर दिया। दो-तीन लोगों ने तो साइबर क्राइम में मामला ले जाने जैसी धमकी भी दे डाली।
तब लगा कि हम कोई अपराध कर रहे हैं इस तरह के ब्लाग का संचालन करके। हमारी तो सोच थी कि इसी बहाने हिन्दी भाषा, हिन्दी साहित्य के लिए कुछ करने का एक छोटा सा प्रयास हो जायेगा। पर.................
बहरहाल अब समस्या यह है कि हम क्या करें जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक शब्दकार के प्रकाशन की सूचना पहुँचा सकें? प्रचार का क्या माध्यम अपनायें कि लोगों की रचनायें अधिक से अधिक प्राप्त हो सकें? आप लोग भी समस्या के समाधान में हमारी मदद करें अन्यथा कि स्थिति में कहीं हमें इस ब्लाग की खातिर, हिन्दी भाषा की खातिर, हिन्दी साहित्य की खातिर यह न कहते घूमना पड़े (ब्लाग दर ब्लाग)
‘‘भिक्षाम देहि, भिक्षाम देहि’’
‘‘या खुदा ब्लाग के नाम पर एक रचना दे दे’’
"जो दे उसका भी भला, जो न दे उसका भी भला’’ वगैरह-वगैरह।

ड्रेस कोड क्यों, देह दर्शन जरूरी है

कभी अंग्रेजी राज हमारे देश में होने के बाद जब स्वतन्त्रता मिली और विदेशी ताकतों द्वारा हमें दोयम दर्जे का समझा जाता रहा उस समय हमारे देश को मदारियों, बाजीगरों का देश कहा जाता था। अब आज के हालात देखते हैं तो लगता है कि हमारा देश बाजीगरों, मदारियों का देश तो है ही साथ में विवादों का भी देश है। यहाँ किसी भी बात पर विवाद खड़ा कर देना हम लोगों की आदत में शामिल है।
कभी हम विवाद करते हैं आपसी सम्पत्ति के नाम पर, कभी विवाद होता है गली में कब्जें के नाम पर, कभी हम विवाद करते हैं अपनी हनक को स्थापित करने के लिए। ये विवाद इतने छोटे होते हैं कि इन पर कभी-कभी विचार करने मात्र से भी हँसी आती है। कुछ विवाद ऐसे होते हैं जिनका अपना अलग से कोई अस्तित्व नहीं होता है किन्तु हम उनको भी एक स्वरूप दे डालते हैं।
कुछ विवादों का स्वरूप तो इस तरह का होता है कि लगता ही नहीं कि वो कभी निपट भी सकेगे या नहीं? वर्तमान में महिलर विधेयक, स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, राष्ट्रभाषा हिन्दी, आरक्षण आदि-आदि ऐसे विवाद हैं जो आसानी से सुलझते नहीं दिखाई देते हैं।
इन विवादों की कड़ी में (पहले से चला भी आ रहा है, लड़कियों के लिए ड्रेस कोड) कल इस चिरपरिचित विवाद को हवा दी कानपुर के एक महिला कालेज की प्राचार्या ने। उन्होंने लड़कियों के लिए ड्रेस कोड लागू किया साथ ही यह भी नियम बना दिया कि कोई भी छात्रा कालेज में मोबाइल नहीं लायेगी।
इधर उनका यह नियम लागू करना था कि उधर मीडिया ने अपना भोंपू बजाना शुरू कर दिया। कई महिला मुक्ति समर्थक इस नियम की खिलाफत और समर्थन करने लगे। लोगों को तुरन्त इस पर अपना उल्लू सीधा होता दिखाई देने लगा।
जब भी देश में कालेज में ड्रेस कोड को लेकर चर्चा होती है तो हमें एक बात समझ में नहीं आती कि जब इण्टरमीडिएट तक छात्र-छात्रायें यूनीफार्म पहन कर आ सकतीं हैं तो ऐसा क्या हो जाता है कि वे उच्च शिक्षा के लिए एक तय यूनीफार्म पहन कर नहीं आ सकते हैं? यह बात अकेले लडकियों पर लागू नहीं होती, लडकों को भी इस श्रेणी में शमिल किया जाता है। इस बात का विरोध अवश्य हो कि कोई भी कानून एक वर्ग विशेष या फिर एक लिंग विशेष को लेकर न बनाया जाये।
अब यहाँ विरोध क्यों? कालेज तो लड़कियों का अकेले है ऐसे में वहाँ की प्राचार्या किसी लड़के पर इस नियम को कैसे लागू कर सकती है?
जहाँ तक कपड़ों का सवाल है यह बात तो सभी को स्वीकारनी होगी कि आधुनिकत के वशीभूत लड़के और लड़कियाँ इस प्रकार के कपड़े पहने रहे हैं कि वे कपड़े पहनने के बाद भी नग्न नजर आते हैं। महिलायें विशेष रूप से अपने अंगों को दिखाने का काम करतीं हैं तो लड़के अपनी मसल्स को दिखा कर लड़कियों को आकर्षित करने की चेष्टा करते हैं।
इस लघु वस्त्र संस्करण और देह उघाड़ू फैशन के लिए यदि किसी को जिम्मेवार समझा जाये तो वह अभिभावक हैं और मानसिकता भी है। अभिभावक अपनी आँखों पर पट्टी चढ़ा कर यह देखना भूल जाते हैं कि उनके पुत्र-पुत्री ने किस प्रकार के कपड़े पहने हैं। कपड़े पहने भी हैं या फिर कपड़ों के भीतर से भी नंगई झाँक रही है।
मानसिकता इस कदर बिगड़ गई है कि कम कपड़े पहन कर कोई भी लड़का-लड़की समझती है कि उसने विपरीत लिंगी को पटा लिया है। लड़के-लड़कियों में बढ़ती सेक्स के प्रति कामना ने भी समाज में कपड़ों को कम से कमतर किया है।
ड्रेस कोड के नाम पर हंगामा उस समय उचित है जबकि यह केवल लड़कियों पर लागू हो। कालेज में एकसमान यूनीफार्म के नाम पर हंगामा गलत है। यह केवल विरोध के नाम पर विरोध है। एकसमान यूनीफार्म का अपना एक विशेष महत्व है। यह बात और है कि अपनी हाँकने के चक्कर में हम कुछ अमूल्य ज्ञान बिसारते जा रहे हैं, एक संस्कृति का क्षरण करते जा रहे है।

10 जून 2009

पिटो-पिटो किंतु संयम बरतो...

पिछले वर्ष जब 2 अक्टूबर को अन्तर्राष्ट्रीय शांति दिवस घोषित किया गया तो लगा कि शायद अब अपना देश ही गाँधी जी के विचारों को आत्मसात कर ले। कुछ मामलों में किया भी और कुछ में तो एकदम विस्मृत भी कर दिया। ये तो भला हो मुन्ना भाई का कि उसने नई पीढ़ी को बताया कि गाँधी जी अहिंसा का किस प्रकार प्रयोग करते थे वरना अभी तक तो समझा जाता था कि अहिंसा का अर्थ एक गाल पर तमाचा और दूसरे पर भी तमाचा है।
इधर हाल ही में गाँधी जी के विचार सत्य होते दिखे। जब हम आस्ट्रेलिया में पिटे तो भी हमने विरोध नहीं किया। दो-चार बार और पिटे और मीडिया ने खबर बनाई कि नस्लभेद के कारण ऐसा हो रहा है तो हमारी सरकार के नुमाइंदों ने कहा कि आस्ट्रेलिया को नस्लभेदी कहने की जल्दबाजी न करें। हम मान गये, आखिर गाँधी जी की अहिंसा का सवाल था।
उधर आस्ट्रेलिया में हमले होते रहे, कार फोड़ी जातीं रहीं, लड़के फोड़े जाते रहे और हम शान्त रहे। आखिर गाँधी जी की आत्मा का सवाल था। हम तो शान्त रहे पर आस्ट्रेलिया में मामला कुछ समझ न आया। एक गाल के बदले दूसरा गाल तो हाजिर है, दूसरे गाल पर भी पड़े तो पीठ हाजिर, पीठ पर पड़े तो पेट हाजिर, पेट पर भी पड़ने लगे तो अभी परिवार में हैं माँ-बाप-भाई-बहिन-बीवी-बच्चे अपना-अपना गाल, पीठ, पेट देने के लिए।
यह सब भी दिया पर आस्ट्रेलिया के लोग थे कि गाँधी जी की अहिंसा का और हम लोगों के कुछ न कुछ हाजिर करते रहने का इम्तिहान लेते ही जा रहे थे। सब कुछ देने के बाद इज्जत भी दी। ये सब तो हमारे पास पर्याप्त था सो दिया पर कारें कहाँ तक देते? जान तो कई दे सकते हैं पर बेचारे पढ़ने गये बच्चों के सामान तो निश्चित ही होगा, वो कैसे बार-बार देते रहते?
बस यहीं बात बिगड़ गई। मार और पड़ने लगी। भारतीयों को पिटते देख आस्ट्रेलिया के वे चुगद से लोग भी हमें पीटने लगे जिनके बारे में कहा जा सकता है कि ‘‘हाथ अगरबत्ती, पैर मोमबत्ती, सीना संदूक, XXXX बंदूक, जिन्दगी है झंड, फिर भी है घमंड, क्योंकि XXXX’’ (इसमें कुछ ऐसे शब्द और ऐसी पंक्तियाँ हैं जिन्हें यहाँ लिखना शोभा नहीं देगा) अब जब हर कोई मारने लगा तो भारतीयों को लगा कि शायद गाँधी जी का गिव एण्ड टेक का मामला फेल हो रहा है। बस फिर क्या था, भारतीय छात्रों ने भी टोली बना कर गश्त करना शुरू कर दिया। मौका मिला तो एक-दो को पीट दिया (समाचारों में ऐसा सुना, क्या पता ये भी आस्ट्रेलियाइयों की एक चाल हो?)
ऐसा समाचार जैसे ही हमारे देश में पहुँचा हमारे नेताओं के तो हाथ-पैर फूल गये। उन्हें लगा कि अरे! ये क्या हो गया? भारतीयों ने भी जवाब देना शुरू कर दिया। इससे तो गाँधी जी की अन्तर्राष्ट्रीय छवि पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा। अभी तो यूपी में गाँधी के नाम पर ही सत्ता परिवर्तन करना है।
आनन-फानन बयान जारी किया गया कि भारतीय छात्र संयम रखें, वहाँ पढ़ने गये हैं पढ़ने पर ध्यान लगायें न कि बदला लेने पर। अब मंत्रियों को कौन बताये कि पिटते-पिटते पढ़ाई नहीं हो पाती है।
एक बयान हमारी ओर से भी कि अपने देश की शिक्षा को भूल कर विदेश शिक्षा लेने गये हो तो पूरी तरह से तप कर ही लौटो। बिना पिटे कैसे पकोगे? सोना जितना आग में जलता है उतना ही निखरता है। पिटाई की आग में अभी से निखरोगे तभी तो कम्पलसरी सिटीजनशिप मिलेगी। पिटो, पिटो और पिटो, देश का नाम रोशन करो। सरकार तो गाँधी जी का नाम रोशन कर ही रही है लगातार हमले सह-सह कर। इस आशा में शायद महाशक्ति की ओर से आने वाले 2 अक्टूबर को अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति दिवस पर कुछ मिल जाये?

09 जून 2009

भाषा के प्रति भी सजग रहना होगा हमें

हिन्दी भाषा की वैज्ञानिकता पर शायद ही किसी को सन्देह होगा। यह सम्पूर्ण विश्व की एकमात्र ऐसी भाषा है जो जैसी बोली जाती है वैसी ही लिखी जाती है और जैसी लिखी होती है वैसी ही पढ़ी जाती है। इसकी वैज्ञानिकता का एक आधार यह भी है कि इस भाषा के वर्ण क्रमिक रूप से उच्चारित होते हैं। इस भाषा के उच्चारण में आप स्वयं अनुभव करिए कि स्वरों का उच्चारण भी क्रमिक रूप से होता है और व्यंजनों का उच्चारण भी क्रमिक रूप से होता है। 

क वर्ग के वर्ण क, ख, ग, घ आप बोलकर देखिए, आपको स्वयं अहसास होगा कि इन वर्णों की ध्वनि कण्ठय है। इसी प्रकार अन्य वर्गों के वर्णों को उच्चरित करिए और हिन्दी भाषा का आनन्द लीजिए। 

च वर्ग --- च, छ, ज, झ --- तालव्य ध्वनि 

ट वर्ग --- ट, ठ, ड, ढ --- मूर्धन्य ध्वनि 

त वर्ग --- त, थ, द, ध --- दन्त्य ध्वनि 

प वर्ग --- प, फ, ब, भ --- ओष्ठय ध्वनि 

इन पाँच वर्गों के वर्णों की ध्वनियाँ क्रमशः कण्ठय, तालव्य, मूर्धन्य, दन्त्य तथा ओष्ठय हैं। इतना क्रमबद्ध उच्चारण हमारी समझ में (जितना पढ़ कर समझा है) किसी अन्य भाषा में नहीं है। 

अकसर देखा गया है कि हम हिन्दी के लिखने में मात्रा, वर्तनी आदि का उतना ध्यान नहीं रखते हैं। हमें इस बात का तनिक भी भान नहीं होता है कि हम कुछ न कुछ गलत भी लिख रहे हैं। यहाँ ब्लाग या फिर यूनीकोड में लिखी जा रही हिन्दी की चर्चा न करें तो बेहतर होगा क्योंकि यहाँ पर हिन्दी लिखने की अपनी कुछ सीमायें हैं। हम हिन्दी के गलत लेखन की बात करें आम लेखन में जहाँ हम जानबूझ कर, जल्दबाजी में या फिर नासमझी में गलती कर बैठते हैं। 

आम तौर पर हम लेखन में ‘अ’ तथा ‘इ’ के प्रयोग की भूलें, हृस्व के स्थान पर दीर्घ और दीर्घ के स्थान पर हृस्व स्वर की भूल, स्वर/मात्रा की भूल, ‘ए’, ‘ऐ’ की भूल, ‘ओ’, ‘औ’ की भूल, ‘ई’, ‘यी’ की भूल, अनुस्वार (बिन्दु) अनुनासिक (चन्द्रबिन्दु) के प्रयोग सम्बन्धी भूलें करते हैं। यहाँ इन भूलों के बारे में विस्तार से न बता कर आपके सामने कुछ उदाहरणों को रखेंगे जिनसे ज्ञात होगा कि हम कहाँ और कैसी भूलें करते हैं और उनसे कैसे अर्थ से अनर्थ होता है। 

कटक --- सेना, कंटक --- काँटा (देखा आपने बस एक बिन्दु का कमाल कैसे अर्थ बदल गया) 

आधी --- आधे से सम्बन्धित, आँधी --- तेज हवा 

रग --- नस, रंग --- हरा, पीला, लाल आदि रंग 

कही --- कहा गया हो, कहीं --- स्थान 

हंस --- पक्षी, हँस --- हँसने की क्रिया  

ये एक बहुत छोटा सा उदाहरण है इस बात को दिखाने का कि कैसे एक छोटे से बिन्दु मात्र से अर्थ का बदलाव कैसे होता है। वर्तमान में लिखने में हम अनुस्वार, अनुनासिक का ध्यान बिलकुल भी नहीं रख रहे हैं। हम तो गलती कर रहे हैं हम अपने छोटों की इन गलतियों पर भी ध्यान नहीं दे रहे हैं। धीरे-धीरे यही गलतियाँ हमारे व्यवहार में ओर लेखन को प्रभावित करतीं हैं तथा भाषा को भी विकृत करतीं हैं। कुछ वर्णों को हम भूलते जा रहे हैं और उसका कारण भी हमारी भाषा के प्रति उदासीनता है। 

आप खुद सोचिए कि कैसे एक छोटा सा दशमलव विशाल से विशाल संख्या को भी प्रभावित कर देता है। हम गणित में दशमलव के प्रयोग के प्रति बड़े ही सजग रहते हैं तो फिर भाषा के सुधार के लिए सजग क्यों नहीं रहते? भाषा हमारे विचारों-भावों की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है, कल को ऐसा न हो कि हम अपनी वैज्ञानिक भाषा के तमाम सारे शब्दों, मात्राओं का विलोपन करवा कर अर्थ का अनर्थ करवा दें। आज सँभलें, अभी सँभलें। श्रीमान शास्त्री जी के आदेशानुसार शुद्ध एवं अशुद्ध शब्दों की सूची शीघ्र ही पोस्ट कर देंगे।

सौ-सौ जूता खाएँ, तमाशा घुस के देखें

हमारे क्षेत्र में एक कहावत आम तौर पर इस्तेमाल की जाती है ‘‘सौ-सौ जूता खायें, तमाशा घुस के देखें’’। इस कहावत का जन्म कब और कैसे हुआ यह तो पता नहीं पर हम भारतीयों के ऊपर यह बिलकुल सटीक बैठती है। हम हर जगह किसी न किसी रूप में मार खाते रहते हैं और उसके बाद भी सुधरने का नाम नहीं लेते हैं।
अभी हाल में आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हमले हुए हमने विरोध का एक मरा-मरा सा स्वर दिखाया और फिर से कतार में लग गये कि विदेश जाने के लिए कैसे भी वीसा मिल जाये। विदेश का लालच हमें बरबाद तो करता ही है सारी दुनिया में शर्मसार भी करता है।
ऐसा नहीं है कि आस्ट्रेलिया में हुए हमले पहली बार हुआ भारतीयों पर हमला है। इससे पहले भी भारतीयों के विदेश में पिटने और बेइज्जत होने के समाचार आते रहे हैं। और तो और हमारे मंत्रियों को भी नहीं बख्शा जाता है। इसके बाद भी हम विदेश के लिए लालायित रहते हैं।
एक सवाल उन सभी भारतीयों से जो विदेश में हैं या फिर विदेश जाने के लिए अपनी जीभ लपलपाते रहते हैं कि विदेश में नौकरी करने या फिर पढ़ने का इतना मोह क्यों?
हम आज तक इस बात को नहीं समझ सके कि ऐसा क्यों? या तो कहिए कि हमें अवसर ही नहीं मिला। एक बात अवसर भले ही न मिला हो पर मन में कभी विदेश नौकरी करने या फिर पढ़ने का विचार आया भी नहीं। विदेश की नौकरी क्या बस पैसों के लिए? भौतिक सुख-संसाधनों की प्राप्ति के लिए? आरामतलब जीवन व्यतीत करने के लिए?
माना कि हमारे देश में अव्यवस्था को बोलबाला है; भ्रष्टाचार की अति हो सकती है; घूसखोरी कदम-कदम पर व्याप्त है; बिजली-पानी-रोटी-कपड़ा-घर जैसी मूलभूत सुविधाओं की कमी है, परेशानी है तो क्या बस इसी बात पर देश को छोड़ विदेशियों की नौकरी की जायेगी?
यह तो वही बात हो गई कि अपने माँ-बाप सुन्दर नहीं हैं तो सुन्दर से दिखने वाली हीरोइन-हीरो को अपना माँ-बाप कहने लगे। अपने माता-पिता ज्यादा ज्ञानवान नहीं हैं तो विश्व के सर्वश्रेष्ठ बुद्धिमान को ही अपना माता-पिता बताने लगे।
सोचिए कि विदेशी ताकतें ताकत किसकी दम पर बनी हैं? हम भरतीयों की प्रतिभा की दम पर। इसके बाद भी हम भारतीयों को कहीं भी सम्मान प्राप्त क्यों नहीं है? दो-चार देशों में होते हमलों से समूचे विश्व को ताकत मिलेगी और कल को समूचे विश्व में भारतीय पिटने के लिए प्रसिद्ध हो जायेंगे।
सुख-सुविधाओं की प्राप्ति यदि बेइज्जती की कीमत पर हो तो ऐसी कीमत देनी कबूल न की जाये। एक बार एकजुट होकर समूचे विश्व को बताना होगा कि विश्व के सभी विकसित राष्ट्रों के पीछे हम भारतीयों का हाथ है, यदि एक झटके में इस हाथ को खींच लिया तो विकसित देश से अविकसित देश होने में बहुत ज्यादा समय नहीं लगेगा। पर क्या हम भारतीय ऐसा कर पायेंगे? कम्पलसरी सिटीजनशिप के लिए लार गिराते, ग्रीन कार्ड के लिए पिटाई सहते भारतीयों को ऐसा करने का विचार मन में भी नहीं आता होगा।
इसी कायरता के कारण, सुखों की लालसा के कारण, तृष्णा के कारण ही बुजुर्गों का कहना सही लगता है कि ‘‘सौ-सौ जूता खायें, तमाशा घुस के देखें’’।

08 जून 2009

हम अब वाकई आधुनिक बन चुके हैं

एक पुत्री द्वारा अपनी माँ का कत्ल; कारण था अपने प्यार में बाधक बनना। यहाँ थोड़ा सा खटकना होता है कि लड़की के प्यार में माँ का बाधक होना? प्यार में बाधक होना तो तब होता जबकि लड़की किसी एक ही लड़के से प्यार करती। समाचार के अनुसार तो लड़की के घर पर उसके परिवारीजनों की अनुपस्थिति में कई लड़के आते थे।
अब देखिए इस समाचार का एक और पेंच; कई लड़के आने की बात समाचार वालों को कहाँ से ज्ञात हुई? या तो परिवार के लोगों ने बताया या फिर मुहल्ले वालों ने बताया। अब यदि घर वालों ने बताया तो वे अभी तक अपनी लड़की पर लगाम क्यों नहीं लगा पाये? और यदि मोहल्ले वालों ने इस बात को बताया है तो क्या यह सम्भव है कि घर वालों तक इसकी खबर न पहुँची हो?
अब सोचिए कि इन दोनों ही स्थितियों में घर वालों को अपनी बेटी की करतूत तो पता ही थी।
इस घटना पर कई ब्लाग पर सवाल उठाये गये। सामाजिक कारण, चिन्तन के आधार तलाशने के प्रयास किये गये। क्या वाकई अभी भी हम चिन्तन के लिए ही बैठे हैं? इस पूरे मामले पर कुछ भी कहना अपने आपको सामंतवादी सिद्ध करवाने के समान होगा। फिर भी.......
इस पूरे प्रकरण को बिना इस पूर्वाग्रह के कि घटना के परिदृश्य में एक लड़की है देखा जाये तो आसानी हो सकेगी नहीं तो वही ढाक के तीन पात।
पहली बात कि लड़की के रंग-ढंग एकाएक तो बदले ही नहीं होगे। होता है घरों में अक्सर कि हम कुछ ज्यादा ही आधुनिक बनने का प्रयास करते हैं और फिर अचानक ही ऐसी ठोकर खाते हैं। पहनावा यहीं आकर सवाल खड़े करता है, चाहे वह लड़के का हो या फिर किसी लड़की का।
अकसर देखा गया है कि आधुनिक कहलाने के चक्कर में हमारे घरों के बच्चों के कपड़ों में एक प्रकार की फूहड़ता आती जाती है। धीरे-धीरे इस प्रकार की फूहड़ता उनके व्यवहार में शामिल होने लगती है। अपने बच्चों के विपरीत लिंगी मित्रों के प्रति ज्यादा जानकारी न रखने का भाव, इस बात पर प्रसन्न होना कि हमारे लड़के की बहुत सी महिला मित्र हैं या फिर कि हमारी लड़की के बहुत से पुरुष मित्र हैं, समानता का नाटक करते हुए, आधुनिकता का दम्भ भरते हुए अपने बच्चों का रात-रात भर घर से बाहर रहने को स्वीकार करना भी हमें परेशानी में डालता है।
महिला-पुरुष के भेदभाव के कारण भी इस प्रकार की विसंगतियाँ मिलना आम हो गईं हैं। अब आप चाह कर भी अपने बच्चों के विपरीत लिंगी रिश्तों को रोक नहीं पा रहे हैं। एक ओर खुद के फूहड़ कहलाने का खतरा, दूसरी ओर अपने ही बच्चें का विरोध सहने का डर। इसी डर में हम अपने बच्चों के मित्रों की जाँच-पड़ताल करना भी उचित नहीं समझते हैं। (यहाँ बच्चों की मदद करना या फिर उनको सलाह देना कुछ लोगों को सामंतवाद का पोषण करना दिखता है, ब्लाग पर भी बहुत से लोग इस प्रवृत्ति के हैं)
इसके अलावा आधुनिक जीवन-शैली ने हमें और भी विकृत किया है। घर में महिलाओं का आपस में तालमेल ज्यादा होता है। यह देखने में आता है कि उम्र में व्यापक अन्तर के बाद भी दो महिलाओं में ज्यादा घुलमिल कर बातचीत होती है। इसी के साथ-साथ अपने आपको ज्यादा आधुनि बनाने के प्रयास में माँ-बाप अपने बच्चों के माँ-बाप न बन कर उनके मित्र बनना पसंद करने लगे हैं। आपस में महिला-पुरुष मित्रों को लेकर किया जाता हँसी-मजाक, साथ के लड़के-लड़कियों को लेकर की जाती चुहल के कारण भी इस तरह के संदेह बच्चों के मन में आते हैं कि अपने माता-पिता ही इस प्रकार के सम्बन्धों के हिमायती हैं।
अभी भी हमारे भारतीय समाज को फिल्मों के माता-पिता बनने में बहुत समय लगेगा, जहाँ लड़के को उसका बाप ही अपनी प्रेमिका को पाने के लिए उकसाता है, गुंडों से लड़वाता है। लड़की को उसकी ही माँ प्रोत्साहित करती है कि वह रातों को अपने प्रेमी से मिलने जाया करे। (हर दूसरी-तीसरी फिल्म इसी तरह के दृश्यों से भरी रहती है।)
कुल मिला कर इस पुराण में इतना कुछ है कि जितना कहा जाये उतना कम है। समाज में अभी तक जो बोया गया हम अब उसे काटने को तैयार रहें। सम्बन्धों के खुलेपन के हम ही हिमायती रहे हैं। खुले सेक्स जीवन को हमने ही अपनाया है। एक से अधिक सेक्स सम्बन्धों पर हम ही गर्व करते हैं। बिन ब्याही माओं को हमने ही प्रोत्साहन दिया है। नारी शक्ति के नाम पर हमने ही रिश्तों को तोड़ने को बल दिया है। वासना के लिए हम ही रिश्तों की गरिमा को नष्ट करते आये हैं। क्या-क्या नहीं किया हमने समाज में खुद को एक शक्ति बनाने के लिए? खुद को आधुनिक कहलवाने के लिए?
अब फसल लहलहा रही है तो दुख क्यों? खुशी मनाओ हमारे सपूत अब सक्षम सेक्स जीवन जीने लायक हो गये हैं। हमारी बच्चियाँ बहु-सेक्स सम्बन्धों का निर्वाह करने के लिए किसी अन्य पर निर्भर नहीं रह गईं हैं। अब वे स्वतन्त्र हैं और हम सब खुश हैं....चलो अब नये और बहु-संक्स समृद्ध भारत का निर्माण होने लगा है।

06 जून 2009

हालत सुधरने के बाद दोबारा शुरू.....

आज लगभग दस दिनों के बाद उपचार के द्वारा ठीक होकर काम करने लायक हो सके हैं। इस अवधि में न तो अपनी मेल देखी जा सकीं और न ही किसी तरह की पोस्ट लिखी गई। शब्दकार का भी संचालन भी नहीं किया जा सका। आखिर समस्या ही काफी बड़ी समझ में आ रही थी। हमारी तो समझ के बाहर थी, विशेषज्ञों की समझ में भी नहीं आ रही थी। कैसे भी करते न करते समस्या कुछ हद तक पकड़ में आई और निदान के बाद दोबारा काम चलाने का प्रयास किया जा रहा है।

समस्या हमें लेकर नहीं, हमारे कम्प्यूटर को लेकर थी। पता नहीं किस बात पर नाराज हो गये कि शुरुआत ही नहीं करना चाहते थे। कम्प्यूटर सुधारने वाले को दिखाया तो वह सीपीयू को अपने साथ क्लीनिक ले गया पर वह भी कुछ बता पाने की स्थिति में नहीं था। हम भी बड़े चिन्तित थे कि पता नहीं कौन सी बीमारी लग गई?

इधर आश्वासन पर आश्वासन मिलने के बाद कल देर शाम (रात कह दें तो ठीक रहेगा) हमारे कम्प्यूटर ने मुस्कराना शुरू किया।

आज अब अपनी शुरुआत फिर से हो रही है। यह तो तय बात है कि हमारा इन्तजार तो कोई भी नहीं कर रहा होगा फिर भी अपनी खुशफहमी के लिए ही...............आप सबको अपनी बातों से परेशान नहीं कर सके, आप सब हमारे इन्तजार में सूखकर काँटा हो गये, हमारे लिए आपने पलक-पाँवड़े बिछा रखे हैं और देखो हम आ गये। (खुश रहने को गालिब ये ख्याल अच्छा है)

इस अवकाश की अवधि में देश में भी बदलाव आया है सम्भवतः ब्लाग देश में भी बदलाव आया हो? महिला लोकसभा अध्यक्ष देश को मिली, महिलाओं के विकास की बात सोची जा सकती है। लेकिन इसके साथ ही देश के दूसरे नागरिकों पर हमले, मारपीट की घटनायें भी बढ़ीं हैं (आस्टेलिया में) इस पर भी विचार किया जाना चाहिए। क्या मात्र भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए किसी दूसरे देश के लिए काम करना, मार भी खाते रहना जायज है? (इस पर बहुत कुछ है कहने को, कभी बाद में)

आज की शुरुआत के लिए बस इतना ही..............अभी बहुत कुछ शेष पड़ा है असे निपटा लें फिर आते हैं। (वैसे भी कौन सा कोई इन्तजार कर रहा है।)