30 दिसंबर 2009

नए वर्ष के पहले ये संकल्प कर लें

हालांकि नये वर्ष की शुभकामनाओं का आदान-प्रदान तो कल के बाद शुरू होना चाहिए, इस कारण आज किसी को शुभकामनाएँ नहीं।
हाँ, आप सभी से आग्रह है, निवेदन है
नये वर्ष में विमर्श के नाम पर किसी विवाद को जन्म न देने का।
अपने दिलों से दूसरों के प्रति नफरत का भाव न आने देने का।
सबके प्रति प्रेम, स्नेह का भाव बनाये रखने का।

शायद कठिन कार्य है......इसीलिए आज ही निवेदन है। कल का पूरा दिन और रात के बारह बजे तक का समय है विचार करने के लिए। सोचिएगा कि आज के समाज को किस बात की सबसे अधिक आवश्यकता है?
कल रात के बाद से नये संकल्प के साथ नये वर्ष की शुरुआत करिएगा। ऐसा होगा न!!!!


लोकतंत्र की सार्थकता के लिए पहल करे चुनाव आयोग

उत्तर प्रदेश विधान परिषद् के स्थानीय निकाय के लिए चुनावी प्रक्रिया चल रही है। प्रत्याशियों का चयन हो चुका है, नामांकन प्रक्रिया हो चुकी है अब बस मतदान का इंतजार है। इसी इन्तजार के बीच मतदाताओं के खरीद-फरोख्त की प्रक्रिया आसानी से चल रही है। (इसे एक आरोप कहा जा सकता है किन्तु यही सत्य है)


टिकट का वितरण हुआ और कुछ दलों के बारे में यहाँ तक सुनने में आया कि धन का सहारा लेकर प्रत्याशियों का चयन किया गया। बहरहाल यह मुद्दा नहीं है, मुद्दा तो यह है कि इन चुनावों में गिने-चुने मतदाता होते हैं जो अपने मत से प्रत्याशियों में से एक विधान परिषद् सदस्य का चुनाव करते हैं। मतदाताओं के ग्रामीण क्षेत्र से होने के कारण और किसी न किसी रूप में सरकार के अधीन होने के कारण उनके प्रभावित होने की आशंका बनी रहती है। ऐसे में यदि कोई धनपति व्यक्ति प्रत्याशी के रूप में सरकार चला रहे दल से होता है तो उसके जीतने की सम्भावना बढ़ जाती है।

मतदाताओं के खरद-फरोख्त की घटनाएँ आधुनिक लोकतन्त्र में होती आ रहीं हैं ऐसे में यह सुनना अजीब नहीं लगता कि फलां प्रत्याशी ने उस मतदाता को इतने रुपयों में खरीद लिया है। सवाल यह उठता है कि इस खरीद फरोख्त में हम लोकतन्त्र को कहाँ ले जाना चाहते हैं? क्या अब चुनाव में खड़ा होना या फिर चुनाव लड़ना बस धनपतियों के वश की बात रह गई है? धन के आगे क्या अब मत की कोई कीमत नहीं रह गई है?

यदि विगत वर्षों के चुनावों पर निगाह डालें तो आसानी से ज्ञात होगा कि चुनावों में बढ़ते जा रहे धनखर्च को चुनाव आयोग भी स्वीकार कर चुका है। बढ़ते धन-बल ने आम आदमी को भी चुनावी प्रक्रिया की ओर आकर्षित किया है। अब जिस व्यक्ति के पास लक्जरी कारों का काफिला है, चार-छह बन्दूकधारियों का लाव-लश्कर है, उसी के प्रति आकर्षण खुदबखुद बढ़ जाता है।

एक ओर आम मतदाता चुनाव में बढ़ते धनबल के प्रति चिन्तित है दूसरी ओर निर्वाचन आयोग की ओर से इस ओर कोई भी, किसी भी तरह की कार्यवाही होती नहीं दिखती है। लगता है अब वह जमाना चला गया जबकि पैदल चलकर प्रत्याशी मत की आकांक्षा में मतदाता के द्वारे-द्वारे जाते थे। अब कारों, हैलीकाप्टरों के द्वारा मतदाता को लुभाने का प्रयास किया जाता है और जो बच जाते हैं उन्हें नोटों की ताकत के सहारे खरीदने की कोशिश की जाती है। इसके बाद भी यदि झोली भरती नहीं दिखती है तो बन्दूकें तो हैं ही।

चुनावों में आ रही इस अव्यवस्था को निर्वाचन आयोग ही रोक सकता है। उसे चाहिए कि वह चुनावों में बढ़ रहे धनबल को रोकने को कार्य करे। इसके लिए उसे प्रत्याशियों को निर्देश देने होगे कि वे कम से कम चुनावी खर्च के द्वारा अपना चुनाव पूरा करें। चुनाव आयोग स्वयं ही प्रत्येक चुनाव में चुनावी खर्च को बढ़ा देता है। आखिर ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अब बिना कारों के, बिना बसों के, बिना हैलीकाप्टरों के चुनाव प्रचार नहीं हो सकता है?

ऐसा भी नहीं है कि धन के रोक का असर किसी एक प्रत्याशी के ऊपर पड़ेगा। धन के कम से कम प्रयोग का असर तो सभी के ऊपर समान रूप से पड़ेगा।

चुनाव आयोग आज अपनी भूमिका को चुनाव करवाने, मतदान करवाने, परिणाम घोषित करने तक ही सीमित क्यों कर बैठा है? उसे लोकतन्त्र की खातिर ही सही कुछ कड़े कदम उठाने ही होगे। चुनावों में कार्य करती सरकारी मशीनरी, धनबल, हथियारों का बढ़ता प्रयोग, आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों का प्रत्याशी बनना आदि ऐसे उदाहरण हैं जिनको चुनाव आयोग की असफलता के रूप में देखा जा सकता है। इस ओर ध्यान देने की नहीं अपितु कुछ कड़े और सार्थक कदम उठाने की जरूरत है।

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चित्र साभार गूगल छवियों से

28 दिसंबर 2009

मनुष्य प्रत्येक जन्म में मनुष्य के रूप में ही जन्मता है!!!

आजकल किसी चैनल पर एक सीरियल दिखाया जा रहा है जिसमें अपने पूर्व जन्म के बारे में मालूम किया जा सकता है। हालांकि हमने यह सीरियल आज तक और अभी तक एक बार भी, बिलकुल भी नहीं देखा है किन्तु अपने अन्य देखने वालों से ज्ञात हुआ है कि इसमें व्यक्ति अपने पूर्व जन्म के बारे में बहुत कुछ जान जाता है।

इस सीरियल के अलावा भी कई बार समाचार-पत्रों के द्वारा अथवा समाचारों के द्वारा पता लगता है कि अमुक स्थान पर अमुक व्यक्ति को अपने पूर्व जन्म का आभास हुआ है।
हमें पूर्व जन्म की स्मृति होने अथवा न होने के संदर्भ में कुछ भी नहीं कहना है। इस बारे में हमारा स्वयं का कोई अनुभव भी नहीं है इस कारण इस विषय में कुछ भी कहना मुश्किल है। इस सबके बाद भी एक विचार ने इस छोटी सी पोस्ट को लिखने को विवश किया।
अभी तक जितने लोगों के पूर्वजन्म के बारे में सुना, इस सीरियल के द्वारा जिन लोगों के पूर्व जन्म के बारे में पता चल रहा है उससे एक बात सौ फीसदी पता चली कि सभी अपने पूर्व जन्म में मनुष्य ही होते रहे हैं।
पोस्ट के द्वारा बस इतनी सी जानकारी चाहते हैं कि प्रत्येक मनुष्य अपने पूर्व जन्म में मनुष्य ही क्यों होता दिखता है, महसूस करता है? क्यों नहीं वह स्वयं को कोई जानवर, पक्षी, कीड़ा, मकोड़ा आदि होता महसूस करता है?
ऐसा धर्म ग्रन्थों में कूट-कूट कर लिखा है कि मानव तन बड़े ही जतन से मिलता है और इसका सदुपयोग करना चाहिए। इसके बाद भी पूर्व जन्म की घटनाओं में हमें आज तक मनुष्य के अपने पूर्व जन्म में मनुष्य बनने की जानकारी मिली है।
क्या कोई बतायेगा कि ऐसा क्यों होता है? वर्तमान में पैदा हुआ मनुष्य अपने पूर्व जन्म में कोई जानवर आदि क्यों नहीं होता?

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चित्र गूगल छवियों से साभार

23 दिसंबर 2009

यदि चित्र देखने की इच्छा है तो इन्हें भी देख लें

आज हमारी छोटी बहिन सोनिया ने एक मेल करके अमिताभ बच्चन की वे तस्वीरें भेजीं जो उनको "पा" फिल्म का "औरों" बनातीं हैं
हमने सोचा कि आपको भी इन तस्वीरों से रूबरू करा दें, संभव हो कि आप लोगों ने इन्हें देख रखा हो, फिर भी......
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पढ़ के तो देखो - गद्य और पद्य का अद्भुत साम्य है नयी कविता


समय की स्थिति भी बड़ी अजब है, कभी एकदम पास, बहुत ही आराम से गुजरता लगता है और कभी उसकी रफ्तार को पकड़ पाना सम्भव नहीं होता। कैसे दिन शुरू होकर कब रात के आगोश में आ जाता है इसका अंदाज ही नहीं हो पाता है।
सुबह उठे तो तरोताजा और मन में बहुत कुछ कर गुजरने का जज्बा। दिन का गुजरना शुरू और गुजरना शुरू मन के ख्यालों का। शाम तक आते-आते ख्यालों में थकावट और मन भी चाहने लगता है आराम का पल। इसके साथ ही आने लगता है विचार आने वाली सुबह का और फिर नये सिरे से कुछ नया करने का विचार।
अब देखिये लगता है कि अभी दो-एक दिन पहले ही मनाया था नये वर्ष का उत्सव और अब फिर मनाने को तैयार खड़े हैं। कितनी जल्दी ये समय अपनी सीमा रेखा को पा लेता है पता ही नहीं चल पाता। हमारा सोचा हुआ, मन में विचार किया हुआ सभी कुछ वैसा का वैसा दिखाई पड़ता है।
उत्साह है तो बहुत कुछ न कर पाने का मलाल भी है। सब कुछ भुला कर यह भी ख्याल है कि अब नये वर्ष में ऐसा नहीं होने देंगे। जो कुछ अधूरा रह गया है उसे जल्द से जल्द पूरा करेंगे। फिर वही सपने, फिर वही वादे और फिर वहीं क्रियाकलाप। फिर कुछ काम होंगे पूरे और कुछ रह जायेंगे अधूरे, फिर आयेगा एक और नया वर्ष और देगा हमें कुछ नया करने का संदेश।
हर बार हम कुछ नया पाकर भुला देंगे पुराने को और चल पड़ेंगे फिर कुछ नया पाने को। यही जीवन का क्रम है, यही जीवन का सत्य है। यदि यही सत्य है, यही क्रम है तो फिर विमर्श कैसा, फिर संशय कैसा?
चलिए याद रखते हुए बीते पल हम तैयारी करें आने वाले पल को सँवारने की और मन में विश्वास पैदा करें सोचे हुए कामों को पूरा करने का, जो है अधूरा उसे पूर्ण करने का।

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अब यही सब पढ़िये नयी कविता के अंदाज में---
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समय की स्थिति भी
बड़ी अजब है,
कभी एकदम पास,
बहुत ही आराम से
गुजरता लगता है
और कभी
उसकी रफ्तार को पकड़ पाना
सम्भव नहीं होता।
कैसे दिन शुरू होकर
कब रात के आगोश में आ जाता है
इसका अंदाज ही नहीं हो पाता है।
सुबह उठे तो तरोताजा
और मन में
बहुत कुछ कर गुजरने का जज्बा।
दिन का गुजरना शुरू
और
गुजरना शुरू मन के ख्यालों का।
शाम तक आते-आते
ख्यालों में थकावट और
मन भी चाहने लगता है
आराम का पल।
इसके साथ ही
आने लगता है विचार
आने वाली सुबह का
और फिर
नये सिरे से
कुछ नया करने का विचार।
अब देखिये लगता है कि
अभी दो-एक दिन पहले ही
मनाया था
नये वर्ष का उत्सव
और अब
फिर मनाने को तैयार खड़े हैं।
कितनी जल्दी ये समय
अपनी सीमा रेखा को पा लेता है
पता ही नहीं चल पाता।
हमारा सोचा हुआ,
मन में विचार किया हुआ
सभी कुछ वैसा का वैसा दिखाई पड़ता है।
उत्साह है तो
बहुत कुछ न कर पाने का मलाल भी है।
सब कुछ भुला कर
यह भी ख्याल है कि
अब नये वर्ष में ऐसा नहीं होने देंगे।
जो कुछ अधूरा रह गया है उसे
जल्द से जल्द पूरा करेंगे।
फिर वही सपने,
फिर वही वादे
और फिर वही क्रियाकलाप।
फिर कुछ काम होंगे पूरे
और कुछ रह जायेंगे अधूरे,
फिर आयेगा एक और नया वर्ष
और देगा हमें
कुछ नया करने का संदेश।
हर बार हम कुछ नया पाकर
भुला देंगे पुराने को
और चल पड़ेंगे
फिर कुछ नया पाने को।
यही जीवन का क्रम है,
यही जीवन का सत्य है।
यदि यही सत्य है,
यही क्रम है
तो फिर विमर्श कैसा,
फिर संशय कैसा?
चलिए याद रखते हुए बीते पल
हम तैयारी करें
आने वाले पल को सँवारने की
और मन में विश्वास पैदा करें
सोचे हुए कामों को पूरा करने का,
जो है अधूरा उसे पूर्ण करने का।
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कहिए, नयी कविता कुछ इसी तरह ही तो लिखी जा रही है, है न? पसंद भी इसी तरह की कविता की जा रही है। आपको यह पसंद आई या नहीं?


21 दिसंबर 2009

आत्मविश्वास और साहस की पहचान है ये खिलाड़ी..शाबास

अभी पिछले दिन ताऊजी के खुल्ला खेल फर्रुखावादी को देख रहे थे। समीर भाई के आयोजन में खेले जाने वाले खेल में एक चित्र देखा जिसको एक दूसरे चित्र ने ढाँक रखा था। सवाल जिस चित्र के बारे में पूछा गया था उस चित्र का जितना हिस्सा दिख रहा था उससे साफ जाहिर था कि ये किसी खिलाड़ी का चित्र है और ऐसा खिलाड़ी जो पैर से विकलांग होने के बाद भी लम्बी कूद में भाग ले रहा है। इसके बाद भी कृत्रिम पैर का हिस्सा जिस तरह से दिख रहा था उससे एक प्रकार की शंका भी उत्पन्न हो रही थी। कभी भ्रम होता कि कहीं ऐसा तो नहीं कि लम्बी कूद में भाग लेने वाले खिलाड़ी की आड़ में कुछ और दिख रहा हो?





वैसे शायद आम चित्र होता या आम सवाल होता तो इसके जवाब के लिए हमें कोई कौतूहल न होता किन्तु चित्र में छिपी महिला खिलाड़ी को देखकर उसके जवाब को बिना देखे नहीं रहा गया। (कृपया महिला शब्द पर ध्यान न दें, हमारा कौतूहल उस खिलाड़ी को लेकर था जो पैर से विकलांग-जैसा सोच रखा था-होने के बाद भी लम्बी कूद में हिस्सा ले रहा था।)

जवाब देखा तो आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। महिला खिलाड़ी पैर से विकलांग थी और इसके बाद भी लम्बी कूद में हिस्सा ले रही थी। चित्र के जवाब के साथ उस खिलाड़ी का पूरा परिचय बताने सम्बन्धी लिंक भी दी गई थी। समीर जी को उनके सहयोगी डाक्टर झटका सहित इस कार्य के लिए बधाई।



उस खिलाड़ी का नाम है Annette Roozen, जिसका जन्म 11 मार्च 1976 को हुआ था। लगभग सोलह वर्ष की होने पर उसका एक पैर हड्डी के कैंसर के कारण घुटने के ऊपर से काटना पड़ा। बाद में कृत्रिम पैर के साथ उन्होंने एथलैटिक्स की तैयारी शुरू की और परिणाम आपके सामने है। (लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ें)




ज्यादा कुछ न कहते हुए उनके आत्मविश्वास और साहस को नमन। आप भी साथ में दी गई लिंक के द्वारा उनके बारे में देख-पढ़ सकते हैं। (एक लिंक यहाँ भी है, इसे भी देख सकते हैं)

साथ में दिया गया वीडियो उनके वीजिंग में हुई प्रतियोगिता में भाग लेने का है। (यह लिंक वीडियो के लिए है)

कृपया देखें अवश्य। ऐसे लोगों को देखकर प्रेरणा मिलती है।


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चित्र गूगल छवियों से साभार लिए हैं। इसके अलावा अन्य सभी लिंक का उपयोग करने का भी आभार व्यक्त करते हैं।

20 दिसंबर 2009

करते रहो ब्लोगिंग पर कोई मतलब भी तो निकले..


आज फिर मन व्याकुल हुआ, ब्लाग पर लेखन किसके लिए और किस तरह का? इधर जब से ब्लाग पर आना हुआ लगातार इसी प्रश्न से दो-चार होना पड़ रहा है। समझ नहीं आता कि कौन सा विषय, कौन सा मुद्दा ब्लाग के अनुरूप है? यह चिन्ता ही कहीं जा सकती है जो चिन्तन पर भारी पड़ रही है।
चिन्तन इस बात का कि क्या सही है और क्या गलत और चिन्ता इस बात की कि ब्लाग के अनुरूप क्या सही, क्या गलत? चिन्तन और चिन्ता में एक प्रकार का शाब्दिक अन्तर मात्र है परन्तु उसके अर्थ में भारी अन्तर सा महसूस होता है।

कहा जाता है कि चिन्ता चिता समान है और चिन्तन व्यक्ति को गम्भीरता प्रदान करता है। इसी चिन्तन में समय व्यतीत करते-करते ब्लाग पर आ गये किन्तु लगा कि विषय को गम्भीरता नहीं दे सके। देश की समस्याओं की चर्चा करना, आतंकवादियों की चर्चा करना, अल्पसंख्यकों की चर्चा करना, महिलाओं के मुद्दों की चर्चा करना, दलितों की चर्चा करना आदि-आदि ब्लाग के स्वभाव के अनुरूप नहीं हैं।
चिन्ता इसी बात की है कि हम जा कहाँ रहे हैं, क्या चाह रहे हैं, माँग क्या रहे हैं? यह चिन्ता सिर्फ हमारी अकेले नहीं होनी चाहिए, हर उस व्यक्ति की होनी चाहिए जो अपने को भारतवासी कहता है। ब्लाग, हमें लगता है कि वह सशक्त माध्यम है जिसके द्वारा हम अपनी बात को बहुत से लोगों के पास एक बार में पहुँचा सकते हैं। इस माध्यम का उपयोग सिर्फ चुटकुलों के लिए, चित्रों के प्रदर्शन के लिए, कुछ हँसी-हंगामे के लिए न होकर गम्भीर मुद्दों पर देश का ध्यान आकर्षित करने के लिए भी होना चाहिए।
फिलहाल तो ऐसा हमारा ख्याल है और ब्लाग पर आये हुए हमें अभी एक वर्ष और कुछ माह ही बीते हैं। ऐसी अल्पावधि में किसी तरह की राय देना उन लोगों के लिए बुरा व्यवहार होगा जो ब्लाग में मठाधीश की हैसियत से जमे बैठे हैं। एक जिम्मेवार ब्लागर होने की दृष्टि में क्या यह आवश्यक नहीं होना चाहिए कि कुछ ऐसा भी लिखा जाये जो समाज के हित में हो, देश के हित में हो? पर नहीं, मात्र टिप्पणियों की संख्या बढ़ाते रहना ही ब्लागिंग नहीं (हमारी दृष्टि में)
बहरहाल, देख जाये तो ब्लाग एक प्रकार की डायरी की तरह काम कर रहा है। इसमें व्यक्ति जो चाहे वह लिखे, जैसा चाहे वो लिखे। हम नहीं होते हैं किसी को राय देने वाले क्योंकि बिना माँगे मिलने वाली राय हमें भी मंजूर नहीं। इसके बाद भी यह ध्यान रखना होगा कि ब्लाग मात्र अपने विचारों के प्रदर्शन का माध्यम न बने, इसके द्वारा समाज हित की, देश हित की बात भी कर लिया जाया करे तो बेहतर होगा। चिन्तन और चिन्ता में यही अन्तर बहुत है।

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चित्र गूगल से साभार

19 दिसंबर 2009

नींद इसी ‘तो’ ने उड़ा रखी है

‘कसाब बयान से पलटा’ इस खबर ने नींद ही उड़ा दी। मन में जो सवाल कसाब की गिरफ्तारी के समय से घुमड़ रहे थे वहीं आपके सामने---
‘‘क्या नौ आतंकवादियों को मार देने के बाद हमारे सैनिकों के पास एक गोली कसाब के लिए नहीं बची थी?’’
‘‘कसाब के द्वारा हम किन सबूतों को इकट्ठा करने की खोखली बातें कर रहे हैं?’’
‘‘यदि सबूत मिले भी और सभी सबूत पाक के खिलाफ हुए तब भी हमारी सरकार क्या करेगी?’’
‘‘किसी प्रकार वकीलों की जिरह और अदालत में प्रस्तुत किये सबूतों के आधार पर यदि कसाब छूट गया तो?’’

नींद इसी ‘तो’ ने उड़ा रखी है। सभी के सामने मय सबूतों के पकड़े गये अपराधी के साथ न्याय करने में हमारी व्यवस्थाओं की यह स्थिति है तो आम आदमी को मिलने वाले न्याय के बारे में सिर्फ सोचा जा सकता है।
नींद अभी भी उड़ी है कि कसाब बयान से पलटा और बच गया ‘तो’!!!!!
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चित्र साभार गूगल से लिया है

17 दिसंबर 2009

बलात्कार के लिए समूचा पुरूष समाज दोषी नहीं


बलात्कार की चर्चा और समूचे पुरुष वर्ग के ऊपर उँगली न उठे यह कैसे सम्भव है? महिला के साथ बलात्कार करने वाला पुरुष समाज के हिस्से के रूप में तो आ सकता है किन्तु उसे समूचे पुरुष समाज का प्रतिनिधि नहीं समझा जाना चाहिए।

छेड़छाड़, बलात्कार, यौन शोषण आदि की तमाम सारी घटनाओं के होने के पीछे पुरुष मानसिकता को दोषी मान लिया जाता है, जबकि यह पूर्णतः सही नहीं है। बलात्कार के पीछे का मनोविज्ञान कठिन भले ही हो किन्तु उसे समझना कदापि कठिन नहीं लगता है।

बलात्कार के पीछे मन की विकृत भावना तो काम करती ही है साथ ही समाज में चल रहे यौन उन्मुक्त व्यवहार की भी भूमिका को कम करके नहीं आँका जा सकता है। महिला-पुरुषों का आपस में घुलमिल कर कार्य करना भले ही उनके आपसी सम्बन्धों में यौन को, सेक्स को शामिल नहीं करता हो किन्तु उनके आसपास के लोग किसी भी स्त्री-पुरुष के मध्य सिर्फ और सिर्फ सेक्स सम्बन्धों को तलाशते हैं। यही खोजबीन ही दोषी को यौन अपराध की ओर ले जाती है। इसके अतिरिक्त विपरीत लिंगी की ओर से मिलती उपेक्षा के चलते भी इस तरह के अपराधों को बल मिला है।

परिवार में पति-पत्नी के मध्य के शारीरिक सम्बन्धों में मधुरता की कमी ने भी पुरुष को तथा स्त्री को अवैध सम्बन्धों की ओर मोड़ा है। ऐसी स्थिति में भी बलात्कार जैसे अपराध समाज में देखने को मिलते हैं।

सवाल यह उठता है कि क्या समाज से बलात्कार कम नहीं होंगे या फिर समाप्त नहीं होंगे? जवाब खोजते समय हम इस अपराध की जड़ तक पहुँचने का प्रयास नहीं करते हैं। जिस तरह से अब हमारी जीवनशैली होती जा रही है वहाँ पर हमने सम्बन्धों की, रिश्तों की गरिमा को समाप्त सा कर दिया है। घरों में भी हम एक दूसरे के प्रति अविश्वास की भावना रखने लगे हैं। इसके ठीक उलट अब वह समाज देखने को नहीं मिलता है जहाँ मोहल्ले में लड़के-लड़कियों के मध्य भाई-बहिन सा स्नेह हुआ करता था। हालात ये हैं कि अब घर के भाई-बहिनों को भी शक की निगाह से देखा जाता है।

महिला हिंसा को रोकने का सबसे आसान तरीका आपसी प्रेम-स्नेह को पुनः स्थापित करना ही है। सम्बन्धों और रिश्तों में आती कड़वाहट से ही अपराधों में लगातार वृद्धि हो रही है। इन्हीं अपराधों के मध्य विकृत मानसिकता वाले व्यक्ति महिलाओं को अपना निशाना बना लेते हैं।

कहा भी गया है कि अपराधी हमेशा कमजोर कड़ी पर वार करता है। महिलाएँ शिक्षित होने के बाद भी स्वयं को कमजोर मानकर ही अपने कार्य को अंजाम देतीं हैं। उन्हें स्वयं अपनी ताकत को समझना होगा साथ ही भावनात्मकता से परे सामने वाले की मानसिकता को भी परखना होगा।


समूचा पुरुष वर्ग महिला विरोधी नहीं है, समूचे पुरुष बलात्कारी मानसिकता वाले नहीं हैं, सभी पुरुषों के मन में नारी देह की लालसा नहीं है कुछ इस तरह की सोच रखकर भी पुरुष समाज को अपना मानना होगा। यह भी समझना होगा कि इन्हीं अच्छे सोच वाले पुरुषों की नकल करके कुछ विकृत मानसिकता वाले पुरुष महिलाओं को अपना निशाना बनाने को तैयार बैठे हैं। बचना इन्हीं से है और पहचानना भी इन्हीं को है।

16 दिसंबर 2009

खुश भी होइए, दुःख भी मनाइए इस घटना पर


घटना उत्तर प्रदेश के महोबा की है। यह घटना 8 दिसम्बर 2009 के अमर उजाला में पढ़ने को मिली। समाचार था कि उन्नीस बेटियों के बाद बेटे की मुराद पूरी हुई। समझ नहीं आया कि ऐसे समाचार पर रोया जाये या कि खुश हुआ जाये?

रोना इस कारण से कि
आदमी एक बेटे की चाहत में बेटियों को पैदा करते-करते जनसंख्या में वृद्धि करता जाता है।
आदमी बेटियों को अभी भी बेटों से कम करके आँक रहा है।
एक बेटे के लिए उन्नीस बेटियों का जन्म और एक स्त्री के शरीर पर एक प्रकार का अत्याचार।

खुश होने का मन इस कारण कर रहा था कि
कुछ स्त्रोतों से ज्ञात हुआ कि उस व्यक्ति ने किसी भी बच्चे के गर्भ में आने पर उल्ट्रासाउंड करवा कर लिंग का पता नहीं किया।
किसी भी कन्या भ्रूण की हत्या करने का प्रयास नहीं किया।
किसी भी बेटी को मारने का प्रयास नहीं किया।
समाचार के अनुसार पनवाड़ी के ग्राम स्योड़ी के चतुर्भुज अहिरवार का विवाह 1985 में लालकुँवर के साथ हुआ था। शादी के दो वर्ष बाद से लेकर अभी तक उसने कुल 20 बच्चों को जन्म दिया। पहली उन्नीस बेटियों में से आठ की मृत्यु हो चुकी है।
बच्चियों के भरण-पोषण के लिए चतुर्भुज ने गाँव छोड़ कर दिल्ली में ढेरा जमा लिया था और वहीं से प्रतिमाह बच्चियों की परवरिश के लिए पैसे भेजता रहता था।
बड़ी बेटी का किसी तरह विवाह करने के बाद भी बेटे की चाहत कम नहीं हुई। परिणामतः बीसवें बच्चे के रूप में उन्हें बेटा प्राप्त हुआ।
सामुदायिक केन्द्र में बेटे के जन्म देने के बाद लालकुँवर को जननी सुरक्षा योजना के अन्तर्गत 1400 रुपये का चेक भी दिया गया।
इस पोस्ट का उद्देश्य समाचार देना नहीं वरन् यह है कि ऐसी घटनाओं पर क्या किया जाये?
खुश हुआ जाये कि किसी भी रूप में इन दम्पत्ति ने कन्याओं की हत्या नहीं की या फिर दुःखी हुआ जाये कि विकास की राह पर चलने के बाद भी बेटे की चाहत बिलकुल कम नहीं हुई है?
कुछ भी हो यह तो स्पष्ट है कि उन्नीस में से शेष बची ग्यारह बेटियों के सामने अभाव तो रहता ही होगा और अपनी शारीरिक विकास की राह में अवरोध तो पाती ही होंगी। शिक्षा, भोजन, वस्त्र, चिकित्सा आदि का संकट तो रहता ही होगा। इन सबसे बचने का उपाय क्या होगा? यही दुःख होने की बात है।

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चित्र साभार गूगल छवियों से

10 दिसंबर 2009

शाबास - बेटियों ने पिता को दिया कन्धा




उत्तर प्रदेश के छोटे से जनपद जालौन में लड़कियों द्वारा ऐतिहासिक कदम उठाया गया। पुत्र के न होने की दशा में पुत्रियों ने अपने पिता की अर्थी को कंधा दिया साथ ही मुखग्नि भी दी।
प्रदेश में बुन्देलखण्ड क्षेत्र को हमेशा से पिछड़ा सिद्ध करने की साजिश होती रही है। ऐसे में इस क्षेत्र में इस प्रकार की घटना यह दर्शाती है कि इस क्षेत्र के लोग यदि अपनी परम्पराओं और संस्कार का निर्वहन करना जानते हैं तो वे रूढ़ियों को तोड़ने में भी विश्वास रखते हैं।
इस घटना में विशेष बात यह रही कि सभी ने लड़कियों के इस कार्य की सराहना की। किसी के द्वारा भी विरोध के स्वर सुनाई नहीं दिये।
वाकई ऐसी लड़कियाँ मिसाल हैं। शाबास...........
(यह घटना दिनांक 10 दिसम्बर 2009 के अमर उजाला, बुन्देलखण्ड संस्कारण में प्रकाशित की गई है।)

05 दिसंबर 2009

मंहगाई के कारण बदला मुहावरा - माईक्रो पोस्ट

मंहगी होती दाल और सस्ते होते चिकन के कारण बहु-प्रचलितए लोकप्रिय मुहावरे ‘‘घर की मुर्गी दाल बराबर’’ को बदलने का मन करता है। अब यह मुहावरा इस प्रकार होना चाहिए---

‘‘घर की दाल मुर्गी बराबर’’

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कहिए सही है न!!!!
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चित्र गूगल से साभार

01 दिसंबर 2009

अपना कान अपने दांतों से दबाने की तरकीब - थोड़ी सी मस्ती हो जाए!!!

कई बार ऐसा होता है और सभी के साथ ही ऐसा होता होगा कि जब मन में मस्ती करने का ख्याल आता होगा। अपने कार्य, अपने पद, अपनी प्रतिष्ठा, सामाजिक प्रस्थिति के कारण कई बार हम अपनी जीवन-शैली को कृत्रिमता का आवरण ओढ़ा देते हैं।


खुल कर, मुँह फाड़कर हँसना चाहते हैं, पर नहीं हँस सकते, लोग क्या कहेंगे, यही सोच कर होंठों को इधर-उधर करके ही हँसने की औपचारिकता कर लेते हैं।

बच्चों के साथ खूब उठापटक करना चाहते हैं; गली में, पार्क में, छोटे-छोटे मैदानों में धमाचैकड़ी करते बच्चों के साथ हम भी अपना बचपन याद करना चाहते हैं पर नहीं कर पाते। लोग क्या कहेंगे की सोच हम पर हावी हो जाती है।
यार-दोस्तों के साथ बैठ कर वही पुराने तरीके से हँसी-ठठ्ठा कर लेते हैं पर यह भी देखते हैं कि कहीं कोई और दूसरा न देख लें, नहीं तो सारी इज्जत का कचरा हो जायेगा।

इस पर गुलाम अली द्वारा गायी हुई ग़ज़ल का एक शेर याद आ रहा है-


अंदाज अपने देखते हैं आइने में वो,
और ये भी देखते हैं कि कोई देखता न हो।



अपने जीने में हम क्यों इतनी औपचारिकता, कृत्रिमता लाते जा रहे हैं, बता नहीं सकते? बात-बात पर संस्कृति-सभ्यता का ज्ञान बघारा जाता है। कदम-कदम पर श्लीलता-अश्लीलता की दुहाई दी जाती है। हर काम के पीछे इज्जत खराब न हो जाये का भूत दौड़ाया जाता है। आपस में एक चुटकुला भी सुनाया जाता है तो यह सोचकर कि कहीं इससे हमारी इज्जत मिट्टी में न मिल जाये।

अरे! कभी तो किसी काम को बस आनन्द के लिए किया जाया करे। क्या आवश्यक है कि हर काम में हम आदर्श स्थापना की कोशिश करें? क्यों अपेक्षा करें कि हमारे काम हमें आदर्शवादी-सिद्धान्तवादी घोषित करते रहें?

मौका मिले तो हम भी मुँह फाड़कर हँसें। अवसर आये तो हम भी अपने आपको दूसरों को हँसाने-गुदगुदाने से चूकें नहीं। मस्ती के दो पल भी हमें काम के बोझ से मुक्ति दिलाते हैं। दिमाग में चल रहे टेंशन को दूर करने में मदद करते हैं।

यही सोचकर कि ब्लाग पर बौद्धिकता के बीच कुछ मस्ती के लिए भी समय निकालकर आप सबको अपने साथ शामिल किया जाये। (हमारे दोस्तों और सहयोगियों में तथा अन्य परिचितों में हमारी छवि हँसोड़ की बनी है और हमें कभी इस बात की चिन्ता नहीं रही कि हमारे हँसने-हँसाने के कारण हमारी स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ेगा? आज भी इतना ठठ्ठा मार के हँसते हैं कि बस........................) हमने औरों की देखादेखी एक ब्लाग बना दिया ‘‘थोड़ी सी मस्ती हो जाये!!!!’’ अपने ब्लाग पर ऐसा करते तो हमें सुधरने की सलाह भी मिलती इसलिए यह एक प्रयास, वो भी अपनी खुशी के लिए, आपके आनन्द के लिए, हम सभी की मस्ती के लिए।




एक निवेदन है कि इस ब्लाग पर बस मस्ती ही होगी, किसी तरह का बौद्धिक नहीं। इसलिए कृपया वे लोग तो इस ब्लाग पर कतई न आवें जिन्हें बात-बात पर बौद्धिकता प्रकट करने की तथा ग्रहण करने की बीमारी है। बौद्धिक, अतार्किक, श्लील-अश्लील, सांस्कृतिकता-असांस्कृतिकता, मजाक, शोभायमान-अशोभनीय जैसी विकट शब्दावली को जानने वाले भी इसपर आने से बचें। यक केवल मस्ती के लिए है, हो सकता है कि किसी न किसी दिन कोई मस्ती भरा प्रसंग आपको अश्लीलतापूर्ण लगे और बस हो जाये ब्लाग का पोस्टमार्टम और हमारा भी। यहाँ आने के पहले दिमाग को अलग रखना होगा। सोचना और विचार करने की आजादी यहाँ नहीं होगी। इसके जानकारों को यहाँ आने से खतरा हो सकता है।



एक चुटकुला और लम्बी सी बकवास बन्द-----



एक दोस्त दूसरे से-क्या तुम अपने दाँतों से अपना कान दबा सकते हो?
दूसरे ने कहा-नहीं।
पहले ने कहा कि वह ऐसा कर सकता है।
दूसरे ने पूछा-कैसे?
पहले वाले ने अपनी बत्तीसी (नकली दाँत) निकाली और कान दबा लिया।



यहाँ पहले की तरह ही चर्चा होगी, मस्ती के लिए यहाँ भी आइयेगा।

आज भी अनाड़ी हैं ब्लॉग के मामले में

ब्लाग पर आये हुए डेढ़ वर्ष से ज्यादा होने को आया है, तीन सौ से ऊपर पोस्ट अपने इसी ब्लाग पर लगा चुके हैं। इसके अतिरिक्त दूसरे सामुदायिक ब्लाग के अलावा भी अपने दूसरे ब्लाग पर भी समय-समय पर कुछ न कुछ पोस्ट करते रहते हैं। इतने सबके बाद भी लगता है कि अभी भी हमें कुछ नहीं आता है।
बहुत बार समझने का प्रयास किया कि ब्लाग पर पोस्ट करने का तरीका (विषय-सामग्री को लेकर) क्या है? क्या पोस्ट करें, क्या नहीं? कौन सा विषय सबको लाभान्वित करेगा, कौन से विषय से लोगों को दिक्कत होगी? किन समस्याओं का ब्लाग पर उठाया जाना सही है और किस तरह की भाषा-शैली यहाँ उचित रहेगी?

ऐसे बहुत से प्रश्न लगातार मन में उठते रहते हैं और इन्हीं के बीच हम कुछ न कुछ पोस्ट करने का तरीका निकाल लेते हैं। चलने की कोशिश में कई बार लड़खड़ाकर गिरना भी होता है किन्तु सँभल भी जाते हैं, सँभाल भी लिया जाता है।
आज इस पोस्ट के द्वारा यही सवाल कि आखिर ब्लाग पर सही लेखन किसे ठहराया जाये? किस प्रकार की सामग्री का प्रदर्शन किया जाये? किस भाषा-शैली का प्रयोग किया जाये?
(अभी बिजली ने इतना ही मौका दिया है, कालेज से आने के बाद के लगभग बीस मिनट, उतने में आप सभी को परेशान करने आ गये। अब हमारी समस्या सुलझा दीजिएगा।)
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चित्र साभार गूगल छवियों से