30 जुलाई 2009

बात-बेबात राय देने वालों का क्या करें?

अधिकतर देखने में आता है कि किसी भी बात को, वस्तु को, व्यवस्था को बनाने में बहुत मेहनत लगती है। इस मेहनत के ठीक उलट उस व्यवस्था अथवा निर्मित वस्तु को बिगाड़ने में, उसमें कमी निकालने में किसी प्रकार का समय नहीं लगता है। इसी तरह जितने जतन से उस व्यवस्था का निर्माण होता है, उसी के ठीक उलट बड़ी ही आसानी से सलाहों की पेटी थमा दी जाती है।
देखा जाये तो यह हमारे देश की व्यवस्था की पहचान बन गई है। राजनीति हो या समाज के किसी भी छोटे से तबके का सवाल, सभी जगह इस स्थिति को देखा जा सकता है। वृहद स्तर पर राजनीति में देखा गया है कि किसी प्रकार की विदेश नीति सम्बन्धी, देश हित सम्बन्धी, बजट सम्बन्धी निर्णय हों या फिर कोई भी बात, वे लोग भी अपनी राय देते दिखते हैं जिन्हें इन सबका ककहरा भी ज्ञात नहीं होता है।
अहम से अहम मुद्दों पर ऐसी राय दी जाती है मानो हम से अच्छा विचारक कोई है ही नहीं। ऐसा ही समाज में होता है। आपको कोई काम करना है मिस्टर फलां से पूछिए चाहे न पूछिये, उन्हें तो अपनी राय देनी है। घर का बड़े से कड़ा सामान आना हो या फिर छोटे से छोटा कोई काम हो ये रायचन्द टाइप (जिसका नाम रायचन्द हो वो क्षमा करे) लोग अपनी राय देने हाजिर।
अब आप मानो या न मानो ये तो राय देते ही रहेंगे। आपकी किस्मत कि इनकी राय से आपको कितना लाभ और कितनी हानि हो रही है। बहुत कुछ न कहेंगे, इन्हीं रायचन्दी टाइप लोगों के कारण किस तरह की स्थिति बनती है, इसका एक छोटा सा उदाहरण।

एक आदमी ने मिठाई की दुकान खोली। दुकान के ऊपर बोर्ड लगाया - ‘‘यहाँ ताजी मिठाई मिलती है।’’
उद्घाटन हुआ नहीं कि एक रायचन्द जी पधार गये। बोर्ड पर निगाह मारी और बोले - ‘‘क्यों, इस बोर्ड पर यह ‘यहाँ’ क्यों लिखा रखा है? जब दुकान यहीं है तो यहाँ की क्या जरूरत? इसे मिटवाओ।
दुकान वाले को लगा कि बात तो सही है। जब दुकान यहीं है तो यहाँ लिखा होने की क्या जरूरत? उसने बोर्ड से यहाँ मिटवा दिया।
दो-तीन दिनों में एक और राय देने वाले आ पहुँचे। बोर्ड पर निगाह गई। अब लिखा था - ताजी मिठाई मिलती है।
बोले - ‘‘ये ताजी क्या होता है? क्या मिठाई बासी भी बेचते हो? या दूसरे लोग बासी मिठाई बेचते हैं? मिठाई तो तुम ताजी ही बेचते हो, इस शब्द को मिटवाओ।
दुकान वाले ने सोचा कि बात तो सही है। मिठाई तो ताजी ही बेच रहे हैं फिर ताजी लिखने की क्या जरूरत? उसने उस शब्द को भी मिटवा दिया।
अब बोर्ड पर लिखा था -‘‘मिठाई मिलती है।’’
दो-चार दिन बाद एक और महाशय पधारे राय देने। बोर्ड देखा और बोले -‘‘क्या भाई! तुम केवल मिठाई ही तो बेचते हो फिर इसे लिखने की क्या जरूरत है? हाँ, मिठाई के अलावा और भी कुछ बेच रहे होते तो लोगों को बताने की जरूरत थी। इसे हटवाओ।’’
मिठाई वाले ने सोचा कि ये बात भी सही है। हम तो केवल मिठाई ही बेचते हैं तो इसे लिखवाने की क्या जरूरत? उसने मिठाई शब्द भी मिटवा दिया। अब बोर्ड पर लिखा था -‘‘मिलती है।’’
कुछ दिन बीते एक और राय देने के लिए आ टपके। बोर्ड की ओर ताकते ही बोले -‘‘इतना बड़ा बोर्ड और केवल इतना लिखा है ‘मिलती है।’ अरे! मालूम भी तो चले कि क्या मिलता है। इस बोर्ड पर लिखवा दो ‘‘यहाँ ताजी मिठाई मिलती है।’’

दुकानदार अपना सिर पीट कर रह गया। अब आप ही बताओ कि वो क्या करे ऐसे रायचन्दों का या फिर हम क्या करें, देश क्या करे ऐसे महान राय देने वालों का?

29 जुलाई 2009

यदि मसला टिप्पणियों के लेनदेन का न हो तो

जी हाँ, यही सत्य है। आज की पोस्ट का पहला वाक्य वही है जो हमारा आज का शीर्षक है ‘‘यदि मसला टिप्पणियों के लेनदेन का न हो तो।’’
आज जरूरत इसलिए लिखने की पड़ी क्योंकि पिछले कई दिनों से एक न एक ब्लाग पर टिप्पणियों को लेकर लिखी गई पोस्ट पढ़ने को मिल रही है। पढ़ने के बाद लोगों का बड़ी ही मासूमियत और आदर्शवादी ढंग से यही कहना है कि नहीं टिप्पणियों के लेन-देन जैसी कोई बात नहीं है। विचार अच्छे हों और पोस्ट उम्दा हो तो टिप्पणी स्वयं ही मिलती है।
हो सकता है कि यह सत्य हो पर पूर्ण सत्य नहीं है। इसका उदाहरण इस बात से लगाया जा सकता है कि कोई-कोई तो ऐसा लिख रहा है कि बस समझो कि लिख ही रहा है। इसके बाद भी टिप्पणी पाये जा रहा है क्योंकि वह भी लगातार देता रहता है।
बहरहाल हमारा यह मुद्दा नहीं है कि क्या करा जा रहा है और क्या नहीं किया जा रहा है। हमने जब ब्लाग पर लिखना शुरू किया था तो कहीं पढ़ रखा था कि पोस्ट छोटी हो, विचारों से भरी हो, किसी उद्देश्य को लेकर लिखी गई हो आदि-आदि।
यह भी पढ़ा था कि नये ब्लागर को प्रोत्साहित करने के लिए भी टिप्पणी करने जरूर जायें। सोचा था कि शायद ब्लाग संसार में आने/बसने का यह भी एक दस्तूर है सो आज भी निभाये जा रहे हैं। नये ब्लागर को टिपियाते हैं भले ही प्रतिष्ठित ब्लागर के ब्लाग पर न टिपिया पायें।
अब काम की बात जिसके कारण यह पोस्ट लिखी। हमारे एक अंकल है - डा0 आदित्य कुमार, स्थानीय महाविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग में अध्यक्ष हैं। विचारों से जागरूक और समकालीन मुद्दों पर खुली सोच रखने वाले।
हाल ही में उन्होंने एक ब्लाग (Pearls of Thoughts) बना कर अपने विचार लिखने शुरू किये। कई विद्वान ब्लागर की तरह ही उनका भी मानना है कि पोस्ट छोटी हो तो ज्यादा पढ़ी जायेगी। इसी सोच में उन्होंने छोटी-छोटी पोस्ट लिखना शुरू किया। अभी तक की सारी पोस्ट समसामयिक मुद्दों पर, वर्तमान विषयों पर, समाज-देश की समस्याओं पर आधारित रहीं।
इसके बाद भी उनकी पोस्ट पर टिप्पणियों की संख्या एक-दो ही रही। कारण....??? एक कारण तो हमे स्पष्ट है कि वे अभी ब्लाग के मामले में नये-नये हैं और इस कारण ब्लाग के गुरुओं को, मठाधीशों को पहचान नहीं सके हैं। नये होने के कारण टिप्पणी देने के मामले में भी कई बार अनजाने ही गलतियों का शिकार हो जाते हैं। हालांकि हमें भली-भांति पता है कि उनके लिए टिप्पणियों को पाने का उतना महत्व नहीं है जितना कि इस बात का है कि वे अपने विचारों को किस तरह से सामने रखते हैं।
हमारा और उनका सम्बन्ध ठीक उसी तरह से है जैसे कि एक बाप-बेटे का होता है। इस कारण से हमें और भी शिद्दत से महसूस हुआ कि ब्लाग पर कोई कुछ भी कहे टिप्पणियों का भी अपना एक अलग व्यापार है। वही पुराने समय की वस्तु विनिमय वाली स्थिति। अपना सामान हमें दो, हमसे अपने काम का सामान खरीदो।
इस पोस्ट का मतलब कतई ये नहीं था कि आप सब दिखावे के लिए टिप्पणी करने जायें। हाँ आपको लगे कि पोस्ट पर कुछ सार्थक लिखा है तो अवश्य ही अपनी बात रखें। इससे उनको भी अच्छा लगेगा।
आश्चर्य तो इस बात का है कि ब्लाग संसार में सबको प्रोत्साहित करने वाले समीर भाई भी यहाँ से अनजान हैं। क्या आप सब भी इस ब्लाग से अनजान हैं?
फिर वही बात कि ‘‘यदि मसला टिप्पणियों के लेन-देन का न हो तो’’ यहाँ भी जायें और.....

28 जुलाई 2009

बहुत कुछ है विचार, चिंता करने को....सोचिये...

सच का सामना.....लगता है जैसे भारतीय परिवारों पर किसी भूत का साया आ गया हो? सबको चिन्ता हो गई है कि परिवार न टूटने पायें। अपने परिवार को बचा नहीं पा रहे हैं देश के परिवारों को बचाने की चिन्ता है।


अब क्या है उनका जिनका धर्म है धन कमाना। आज के जमाने में कहा भी गया है कि ‘‘बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया।’’ अब ऐसी हालत में कौन सुनेगा कि परिवार टूट जायेंगे?

एक और बात, जिनको लगता है कि इस कार्यक्रम से परिवार टूट जाने का डर है वे बतायें कि क्या अभी तक देश में परिवार नहीं टूट रहे थे? क्या अभी भी लोग अपने माता-पिता, बच्चों से अलग नहीं रह रहे थे? फिर अभी ही इतनी हाय तौबा क्यों?

दूसरी बात कि यदि परिवार की अवधारणा पुष्ट है तो क्या वह एक एंकर, एक कलाकार और एक पालीग्राफिक मशीन के सहारे ध्वस्त हो जायेगी?

तीसरी बात कि परिवार टूटने का खतरा उन लोगों को होना चाहिए जिन्होने इस कार्यक्रम में भाग लेना स्वीकारा है। देखने वालों को डर किस बात का है? यदि सवाल पूछा जा रहा है कि क्या आप अपनी बेटी की उम्र की लड़की से शारीरिक सम्बन्ध बनाने की इच्छा रखते हैं। इस सवाल के सच या झूठ में आपके परिवार के किस व्यक्ति का सच झूठ सामने आ रहा है?

यदि सवाल है कि क्या आप किसी गैर मर्द के साथ शारीरिक सम्बन्ध बना सकतीं हैं बशर्ते आपके पति को पता न चले? इस सवाल के सच, झूठ से परेशान वे पति-पत्नी हों जो एक करोड़ के लिए वहाँ बैठे हैं। हमारे पेट में दर्द क्यों हो रहा है?

चौथी बात जिन्हें वाकई समाज के बिगड़ने-बनने की चिन्ता है वे इस बात की चिन्ता करें कि कैसे महिलाओं, लड़कियों, बच्चियों की इज्जत सुरक्षित रखी जा सके?
कैसे गर्भ में आने वाली बच्ची को धरती पर भी लाया जा सके?
कैसे बूढ़े माँ-बाप की सेवा की जा सके? ताकि कोई अपने माता-पिता के मरने की दुआ न करे।

चिन्ता करे इस बात की कि कैसे पति-पत्नी के रिश्ते में आत्मीयता, विश्वास कायम रखा जा सके?
चिन्ता हो इस बात की कि कैसे हम सोच में बदलाव लायें कि माँ, बहिन, बेटी, पत्नी के अलावा शेष महिलाओं को मादा न समझें, शारीरिक उपभोग की वस्तु न समझें।

हम चर्चा करें इस बात पर कि कैसे हर पेट को रोटी मिले, कैसे हर तन को कपड़ा मिले, कैसे हर परिवार को छत मिले?
हम चर्चा करें रात-दिन खटने वाले मजदूर वर्ग की। हम चर्चा करें समाज में गिरते भाईचारे की। हम चर्चा करें समाज में बढ़ते अपराध की। युवाओं में फैलती नशेबाजी और अन्य आपराधिक गतिविधियों की चिन्ता करें।

इन सबके बीच आती है वही बात कि उन्हें कमाना है रुपया और हमें कमाना है प्रचार। कैसे यह सब हो?

सीट पर बैठे कलाकार के रूप में हम स्वयं को क्यों देखते हैं? सवालों के अश्लील, खुले स्वरूप को हम स्वयं से पूछता हुआ क्यों देखते हैं? एंकर के द्वारा दी जाती चेतावनी को हम अपने लिए क्यों मानते हैं?

कहीं ऐसा तो नहीं कि हम सब भी वही सोचते और करते हैं जिनको वे कलाकार या सेलीब्रिटी एक करोड़ के बहाने हमारे घर-घर तक पहुँचा रहे हैं? पति-पत्नी के बीच पहुँचा रहे हैं? हमारे बच्चों के बीच हमारी छिपी हुई असलियत को दिखा रहे हैं?

कहीं न कहीं कुछ तो है नहीं तो सामाजिक सरोकारों से जूझते देश में, जमीनी सच्चाइयों से लड़ते देश में, रोजी-रोटी की जंग में हमें सिर्फ सच का सामना ही क्यों दिखाई दे रहा है? सोचिए........

26 जुलाई 2009

नाम तेरे कितने नाम??

सुबह-सुबह मोबाइल ने बजना शुरू किया। गुस्सा बहुत आया। रात को सोच कर सोये थे कि देर तक सोयेंगे पर कमबख्त मोबाइल। मन मार कर आने वाले को हाय-हैलो बोला गया। हैलो बोलते ही हमें और तेज गुस्सा आया। दूसरी तरफ वाले ने जो नाम बताया वह हमारे घर में तो क्या दूर-दूर तक न तो रिश्तेदारी-नातेदारी में था और न ही पास-पड़ोस में।
यह सोच कर कि गलत नम्बर है, पूछा किस नम्बर को लगाया है? जवाब में हमारा ही नम्बर बताया गया। फिर पूछा किसने दिया? अबकी जो जवाब मिला उससे लगा कि बात तो हम ही से करनी है।
दरअसल हम कुछ दोस्त मिल कर एक एसोसिएशन बनाये हैं और लोगों को उससे जोड़ने का काम चल रहा है। ‘पी-एच0डी0 होल्डर्स एसोसिएशन’ नाम से इस एसोसिएशन में विशेष रूप से पी-एच0डी0 वालों को ही जोड़ा जा रहा है। उसी से जुड़ने के लिए उस तरफ से फोन था।
सामने वाली महिला थी, फिर उससे शालीनता से पूछा कि नम्बर तो हमारा है पर इस नाम का यहाँ कोई नहीं है। जब उसने हमारे दोस्त का नाम बताया कि फलां श्रीमान ने कहा था कि इस नाम वालों से बात कर लें तो पूरी स्थिति पता चल जायेगी। यदि आप कहते हैं कि इस नम्बर का यहाँ कोई नहीं है तो सारी।
अब हमारी समझ में पूरी बात आ गई। जोर की हँसी आई किन्तु अपनी हँसी को रोक कर कहा बताइये क्या जानकारी चाहिए? हम वही बोल रहे हैं जिनका नाम आपको फलां श्रीमान ने बताया है। उस तरफ एक पल को खामोशी छा गई। हम समझ गये कि नाम को लेकर संशय कायम है। हमने तब उनको समझाया कि हमारा ही नाम कुमारेन्द्र है और आप सही व्यक्ति से बात कर रहीं हैं।
आपको पता कि वो मैडम किससे बात करना चाहतीं थीं? वो बात करना चाहतीं थीं ‘कुमारी इन्दिरा’ से। उनके यह बताते ही हम समझ गये कि बेचारे कुमारेन्द्र को संधि-विच्छेद करके कुमारी इन्दिरा बना दिया गया है।
ऐसा अकसर हमारे नाम को लेकर होता रहा है। कभी नादानी में तो कभी प्यार में तो कभी चुहल में। हमारा एक मित्र है संदीप। वैसे तो वह हमें कुमारेन्द्र ही बुलाता है पर जब कभी अपने मूड में होता है तो कुम्मू ही बुलाता है।
हमारे इन्हीं दोस्त के रिश्ते के एक भाई हैं। उनको मालूम है कि हमारा नाम कुमारेन्द्र है पर वे आज भी हमें रामेन्द्र बुलाते हैं और सुनने वाला भी समझ जाता है कि बात हमारी हो रही है।
कालेज के दौरान हमारा एक साथी था, उसने भी हमारे नाम के अलग-अलग हिस्से करके एक अलग ही नाम बना दिया था। यहाँ उस समय कालेज के समय का लड़कपन, चुहलबाजी ही काम करती थी। उसने हमारे नाम को चार हिस्सों में बाँट दिया था - कुमार, इन्द्र, सिंह, सेंगर। इसके बाद इसको अंग्रेजी के शार्टफार्म में बनाकर पुकारता था। ‘किस’ (KISS) - कुमार का K, इन्द्र का I, सिंह का S, सेंगर का S।
इसी तरह और भी कई तरह से लोग उच्चारण में गलती करके नाम के कई रूप बनाते रहे हैं पर मोबाइल से बात करने वाली महिला ने जो नाम दिया उसने तो हमें भी घुमा दिया।

वाह! कैसे हो (कैसी हो) कुमारी इन्दिरा?

23 जुलाई 2009

फ्री में मिले तो दो दे दो

कल हम मित्रों की आम बैठकी लगी। इधर-उधर हल्की-फुल्की चर्चा, मनोरंजन, हँसी-ठहाके और कुछ बिन्दुओं पर गरमागरम बहस। पर इतनी ही गरम जिससे सम्बन्धों पर असर न पड़े। चर्चा होत-होते बीच-बीच में किसी का उदाहरण किसी की खिंचाई।
खिंचाई और छीछालेदर के मामले में तो देश में दो-तीन बिन्दु बड़े ही ऊँची रेटिंग वाले हैं। राखी सावंत, मल्लिका सहरावत, मीडिया और मीडिया के लिए फिल्मी गपशप।
अब नौजवानों की चर्चा हो और आज की अविवाहित महिला के स्वयंवर की बात न उठे सम्भव ही नहीं। बात चूँकि गम्भीर मुद्दे के रूप में नहीं हो रही थी, आखिर राखी ही गम्भीर नहीं है इस मुद्दे पर।
सवाल उठा कि क्या वाकई राखी शादी करेगी?
जवाब आया क्या ये भी सच का सामना है?
देखा सवाल के बदले जवाब। हा..हा...हू..हू हुई और फिर एक जुमला उछला कि चलो कम से कम एक लड़की ने कुछ लड़के वालों के दिमाग को तो ठिकाने लगा दिया।
इस पर भी एक कटाक्ष तैरा-जिनका ठिकाना नहीं था वही आये हैं इस ठिकाने पर। फिर हा..हा।
क्या सही है, क्या गलत इस पर कोई चर्चा नहीं हुई। राखी की चर्चा हो और सही गलत का आकलन किया जाये तो बस। क्या देश में मुद्दों की कमी रह गई है?
चाय-वाय पी गई और सब अपने-अपने घरों को रवाना हुए। रात को हमने सोचा कि क्या सामाजिक बदलाव इसी तरह से आता है। एक और चैनल है जहाँ पर लड़के-लड़कियाँ अपने साथी को ढँूड रहे हैं। इस तरह से शादी कितने घरों में हो रही है? कितने लड़के वाले हैं जो अपने अहम को इस कदर त्याग रहे हैं? कितनी लड़कियाँ हैं जो बोल्ड होकर शारीरिक सम्बन्धों तक की चर्चा कर ले रहीं हैं?
इस सबके बाद भी लगता है कि सामाजिक बदलाव आया है। हमारे समाज में शादी-प्यार को लेकर कुछ बदलाव भी आया है। जहाँ नहीं आया है वहाँ लाया जा रहा है। जहाँ छूट दे दी गई हैं वहाँ बदलाव अतिवाद का शिकार हुआ है।
इसी अतिवाद पर छूट पर एक चुटकुला सुनाकर बात समाप्त करते हैं।
एक बार गाँव का एक भोला-भाला आदमी शहर खरीददारी करने को आया। उसको गाँव के एक-दो पढ़े-लिखे लोगों ने बताया कि शहर में ठगी बहुत होती है। सामान का जो भी दाम बताया जाये उसके आधे पर ही उस चीज को लेना।
आदमी को सबसे अधिक जरूरत थी एक छाते की। उसने दुकान वाले से पूछा छाता कितने का?
दुकान वाले ने उसका दाम सौ रुपये बताया।
आदमी बोला कि पचास में देना हो तो दो।
दुकान वाले ने सोचा मोल-तोल से बचो, उसने छाता अस्सी रुपये में देना चाहा।
गाँव वाला बोला चालीस में देते हो तो दो।
दुकान वाले ने फिर दाम कम किये, आदमी ने फिर दाम आधे बताये। अन्त में दुकान वाला बोला बाबा तुम छाता अब दस रुपये में ही ले लो।
आदमी ने फिर कहा पाँच में देना हो तो दो।
दुकान वाला गुस्से से बाला कि बाबा ज्यादा सिर न खाओ, तुम इसे फ्री में ही ले जाओ।
आदमी ने पूरी मासूमियत से कहा तो फिर दो दे दो।

22 जुलाई 2009

जूते खाए, जूते उतरे, कपड़े उतरे, क्या नंगे ही रहोगे? कुछ करो..

आप कलाम साहब को जानते हैं? कलाम साहब माने मिसाइल मैन। कलाम साहब माने सादगी। कलाम साहब माने कर्मशीलता। कलाम साहब माने हमारे पूर्व राष्ट्रपति। अब भी नहीं समझे? अरे आप लोग तो समझ गये पर वे अमेरिका वाले तो समझें। समस्या तो उन्हीं की है।
जाँच समझते हैं आप? अरे, वह कपड़े उतार कर होने वाली नहीं। अरे, वह जो छोटे में परीक्षा के दौरान नकल न करने देने के लिए होती थी, वह भी नहीं।
वह भी नहीं जो सामान्य तौर पर सुरक्षा के लिए होती है। वह जाँच जिससे आम आदमी को गुजरना होता है। अरे! फिर आप अपने पर ले गये। आपकी बात नहीं, आप तो समझते हैं जाँच को पर उन अमेरिका वालों को कौन बताये कि जाँच क्या होती है? उन्हें क्या मालूम क्या आम और क्या खास?
जूते उतारना क्या होता है? मालूम है? हाँ वही जो पूजा करते समय उतारते हैं। जी हाँ, कभी-कभी मारने के
लिए भी उतारना पड़ता है। कभी अतिविशिष्ट लोगों के सामने भी उतारना पड़ता है। अरे! यही बात तो......। यही तो हमें नहीं मालूम थी। हम तो समझते थे कि किसी मंदिर में, किसी पूजा आदि स्थल पर ही जूते उतारते हैं। हाँ, कभी मार-पीट के लिए भी उतारे हैं पर तब जब हमारे न पड़े हों।
अब हमें मालूम हो गया कि अतिविशिष्ट लोगों के सामने भी जूते उतारे जाते हैं। कभी-कभी कपड़े भी उतारे जाते हैं। (शायद अपना ही देश होने के कारण बच गये, नहीं तो जार्ज साहब से पूछो)
चलिए उनकी अपनी शंका है, 9/11 के बाद से। सभी आतंकी लगते हैं अब तो उन्हें। अरे भई बहुत नुकसान हुआ था। बुरा क्यों मानते हो, कलाम साहब हमारे लिए हैं सादगीपूर्ण, हमारे लिए हैं पूर्व राष्ट्रपति, हमारे लिए हैं मिसाइल मैन। क्या कहा मिसाइल मैन? उफ!!!! डर यहीं से पैदा होता है। विद्वान हैं, प्रतिभासम्पन्न हैं, तकनीक भी है, आज भी कार्यरत हैं क्या पता कितनी छोटी सी मिसाइल बना ली हो और.....बूम।
हमारे लिए आदर्श हैं पर उनका तो अमेरिका चला जाता। (वैसे अमरीकियों को खुद अपनी सभ्यता नहीं मालूम, तमाम देशों के लोगों से बने-सँवरे हैं, उसी पर गर्व????) देश बचाने को क्या सिर्फ सेना की जरूरत होती है? क्या ये सिर्फ सुरक्षाबलों का काम है? अरे! एक एयरलाइन्स ने ऐसा कर दिया तो हमें उसकी देश-भक्ति पर गर्व करना चाहिए। हम लोग भी तो देश-भक्ति पर गर्व करते हैं।
नहीं करते? देखो अभी ही किया। कलाम साहब ने जाँच होने दी, हमने कोई ठोस कार्यवाही नहीं की। वह भी तब जब उनकी विदेश मंत्री देश में टहल रहीं हैं।
हमारे एक प्रधानमंत्री विदेश में मृत्यु को प्राप्त होते हैं पर हम देश-भक्ति पर गर्व करते हैं। सम्बन्ध न खराब हों आज तक सही रिपोर्ट सामने नहीं लाये।
पूरे साठ घंटे करामात होती रही। हमारे लोग मरते (सारी...शहीद) होते रहे और अब हम कसाब की पहचान करवाने में ही मस्त हैं। है न देश-भक्ति का नमूना?
हमार विमान दूसरे देश तक ले जाया गया। हमने क्या किया? सब चलता है....।
और गिनायें.....????
ये भी तो एक प्रकार की देशभक्ति है कि अभी जूते ही उतरे हैं, पड़े तो नहीं हैं। अब पड़ ही जायेंगे तभी कुछ करेंगे, तब तक कहेंगे....ये देश है वीर जवानों का.......।

17 जुलाई 2009

अब तो नंगे घूमो, ये भी सच का सामना है

अभी हाल ही में टीवी पर एक कार्यक्रम शुरू हुआ ‘सच का सामना’। पहले लग रहा था कि कार्यक्रम में कुछ विशेष होगा किन्तु जब आये दिन इसके ट्रेलर दिखाये गये और बाद में इसकी पहली ही कड़ी के कुछ अंशों को देखा तो लगा कि हम भारतीय भी विकास की राह में कुछ ज्यादा ही आगे आ गये हैं।
21 सवाल और फिर सच और झूठ का निर्णय। अन्त में सब कुछ सच्चा तो एक करोड़ नहीं तो टाँय-टाँय फिस्स। सवाल कोई ऐसे नहीं जो आपकी मेधा का परीक्षण करें। सवाल ऐसे नहीं जो आपकी क्षमता को सिद्ध करें। सवाल वे भी नहीं जिनसे आपकी सामाजिक स्थिति का आकलन होता हो। इसके अलावा सवाल ऐसे भी नहीं जिनके माध्यम से कहा जा सके कि आपने सच का सामना करने की हिम्मत जुटाई।
सवाल ऐसे के परिवार टूट सकें। सवाल ऐसे कि परिवार बिखर सकें। सवाल इस दर्जे के कि आपस में अविश्वास पैदा हो सके। सवाल वो जो कलह मचवा दें। एक बानगी-
क्या आपने अपने पिता को चाँटा मारा?
क्या आप अपनी बेटी की उम्र की लड़की से शारीरिक सम्बन्ध बना चुके हैं?
क्या आप सार्वजनिक स्थल पर निर्वस्त्र हुए हैं?
आदि-आदि।
इस कार्यक्रम की पहली (शायद पहली ही थी) कड़ी में जब कार्यक्रम देखना शुरू किया तो सीट पर बैठी महिला पाँच लाख जीत चुकी थी। एक सवाल पूछा गया कि क्या आप किसी दूसरे आदमी के साथ शारीरिक सम्बन्ध बना सकतीं हैं, यदि आपके पति को इसका पता न लग सके? एक-दो क्षण के विचार करने के बाद उस महिला का जवाब था नहीं।
एक आवाज उभरी जिसने पालीग्राफ का परिणाम बताया और सभी ने सुना ‘आपका जवाब सही नहीं है।’ महिला सन्न रह गई, कहा नो...नो। पास में बैठे उसके पति ने अपने सिर पर हताशा से हाथ फेरा। चश्में को सिर पर चढ़ा कर अपनी आँखों को हाथों से ढँका। (कई जानकारों का कहना है कि पोलीग्राफ टेस्ट भी विश्वसनीय नहीं है)
एंकर ने महिला को सीट से उठाकर उसके पति और अन्य परिवारीजनों के पास तक पहुँचाया, साथ ही परिवार के सुखी रहने की बधाई दी। बधाई....सुखी परिवार की। जब वहाँ सवाल रहा हो शारीरिक सम्बन्ध का, बच्चों का साथ मिले इस कारण शादी को स्वीकारते रहने का तो सोचा जा सकता है कि परिवार कितना सुखी होगा?
आखिर ऐसे सवालों के द्वारा हम किस सच का और किस हिम्मत का सामना करने की बात कर रहे हैं?
अपने आपको नंगा दिखाने का प्रयास हमारी हिम्मत है?
अपनी बहू-बेटियों को, लड़को को सरेआम सबके सामने नंगा करवा देना क्या सच का सामना है?
ऐसे कार्यक्रमों में एक करोड़ जीतने के बाद किस तरह की बधाई देंगे? शाबास, अपनी बेटी की उम्र वाली लड़की से सेक्स करने की बधाई। अपने पिता को थप्पड़ मारने की बधाई। किसी के साथ भी कुछ भी कर गुजरने की हिम्मत रखने की बधाई।
यही सब है जो हमें बताता है कि हम कहाँ जा रहे हैं। इस तरह के सवालों के बाद परिवार में पर्दे में रखने जैसा बचा ही क्या है? अब एक आराम तो है कि घर में नये दम्पत्ति के लिए किसी तरह के संकोच की जरूरत नहीं। सब जाने हैं कि बन्द कमरे में पति-पत्नी करते क्या हैं। जगह की कमी के कारण सब एकसाथ लेटो-बैठो। सब लोग सब जानते हैं, सबक सामने ही करने लगो। (यही तो कहते हैं ऐसे कार्यक्रमों का समर्थन करने वाले कि आजकल सभी को पता है कि सच क्या है)
चलिए सच के लिए अब नंगा होकर घूमा जाये क्योंकि सभी को मालूम है कि कपड़ों के भी इन्सान नंगा ही है।

14 जुलाई 2009

टिप्पणी के लिए तपस्या

सुबह-सुबह उठकर टहलने के लिए घर से बाहर निकले। सब तरफ वही रोज जैसा माहौल था। कुछ भी खास नहीं लगा बस एक चीज को छोड़ कर। सामने के पेड़ (पेड़ कहना बेकार है पर मन बहलाना है) के नीचे एक महात्मा टाइप के व्यक्ति बैठे दिखे। पहले सोचा कि कोई सुबह का टहलुआ होगा जो थक कर पेड़ की छाया में (अभी धूप ही कहाँ है) बैठ गया होगा।
पर नहीं....वे महाशय थक कर नहीं बैठे थे। वे तो आसन जमाये बाबाजी के बताये करतबों को करने में जुटे थे। हम अपनी यात्रा पर निकल गये। बापस लौटे तो महाशय जमे थे। ध्यान नहीं दिया सोचा लम्बी कलाबाजी करने का विचार है। बाद में कालेज के लिए लगभग 10 बजे निकले तो भी वे साहब अपने स्थान पर डटे थे।
अब हम थोड़ा सकते में आये। लगा कहीं कोई चार सौ बीस तो नहीं जो मोहल्ले के आदमियों के अपने-अपने काम पर जाने का इन्तजार कर रहा हो और बाद में महिलाओं को बेवकूफ बना दे। (क्षमा करियेगा, इस दौर में महिलाओं को बेवकूफ बनाना आसान नहीं) हमने उनके पास जाकर उनका शरीर खटखटाया। उन्होने अपने द्विनेत्रों में से एक नेत्र को कष्ट देकर हमें निहारा और अपना सिर हिलाया।
हमने कहा कैसे?
बोले साधना कर रहे हैं।
हम फिर बोले किस बात की?
वे बोले बच्चा सवाल ज्यादा नहीं।
हमें खिसियाहट छूटी। कहा अभी तो दूसरा ही सवाल था, इतने में ही थक गये। सच-सच बताओ कि चक्कर क्या है, नहीं तो पुलिस को बुलाते हैं।
अबकी बार दोनों नेत्रों को पूरी तरह से खोलकर वे बोले अपने आप से परेशान हैं। ब्लागिंग की दुकान चलाते हैं। चाहे जैसा माल बेचो कोई आता ही नहीं।
हम समझ गये कि टिप्पणी का मामला है। लगता है नया-नया व्यापार में उतरा है। शायद हमारे कुछ पुराने मठाधीशों को व्यापार करते देख लिया होगा।
हमने कहा कि इससे क्या होगा?
बोला किसी ने बताया है कि इस पेड़ के नीचे बैठ कर अच्छे-अच्छों को ज्ञान प्राप्त हुआ है। शायद हमें भी हो जाये।
हमने कहा यार हम तो पिछले दस-बारह साल से यहाँ रह रहे हैं, हमें तो ऐसा कुछ नहीं लगा।
वो बोला तभी तुम कितनी पा जाते हो। अरे उन्हें देखो....।
हम मतलब समझ गये। हमने कहा तुम तपस्या में लगे रहो। टिप्पणी पा सको या नहीं पर एक रोजगार जरूर पा लोगे।
वो फिर अपनी तपस्या में लग गया और हम आपके लिए पोस्ट करने लायक कुछ सामग्री की खोज में निकल पड़े।
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(आज किसी तरह के गम्भीर मसले पर लिखने का मन नहीं हो रहा था और पिछले कुछ दिनों से ब्लाग पर टिप्पणियों को लेकर खूब लिखा गया। सोचा हम भी कुछ हल्का सा इस पर लिख दें। अब अपनी छोटी सी बुद्धि में इतना ही हल्का आ पाया। आपको बताने की जरूरत नहीं एक हल्का-फुल्का सा मजाकिया लहजा है। कोई दिल से न लगाये, आजकल वैसे भी दिल बड़ा कमजोर है। आशा है कि इतना हल्का तो आप लोग उठा लेंगे।)

11 जुलाई 2009

आज बड़े कमीने लग रहे हो ! ! ! !

‘कमीना’.....‘कमीने’....चौंक गये आप? जी हाँ चौंकना स्वाभाविक है क्योंकि हमारे समाज में ये शब्द एक गाली के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। अभी शायद (शायद की जरूरत है?) ऐसी स्थिति आई नहीं है कि इस शब्द को भद्रजनों की भाषा-शैली में शामिल किया जाये।
गाली तो गाली ही होती है या समय के साथ उसका भी परिष्कृत रूप सामने आता है? यह सवाल एक हमारे मन में ही अकेले नहीं घुमड़ता होगा, कभी न कभी, कहीं न कहीं आपको भी परेशान करता होगा। अब करता रहे परेशान तो करे जिसको ये शब्द समाज में प्रचलित करने हैं वे तो कर ही रहे हैं।
इस बात से थोड़ा सा इतर....आपको ‘सेक्सी’ शब्द के बारे में क्या विचार आता है? कुछ सालों तक इस शब्द के मायने कुछ अलग थे। इस शब्द के उच्चारण में एक प्रकार की झिझक देखने को मिलती थी। आज.....आज ये शब्द हम बड़े हि बेधड़क होकर इस्तेमाल करते हैं। बड़े बैठें हों या फिर छोटे इस शब्द ‘सेक्सी’ के प्रयोग में कोई शर्म किसी को नहीं है।
और तो और सेक्सी शब्द के मायने अब इस रूप में बदले हैं कि हम अपने नन्हे-मुन्नों के लिए भी इस शब्द को प्रयोग करने लगे हैं। कोई विशेष ड्रेस पहना देख कर, किसी विशेष प्रकार के करतब दिखाने पर हम अपने छोटे-छोटे बच्चों के लिए अकसर कह देते हैं कि इस ड्रेस में बड़ा सेक्सी लग रहा है, लगता है। अकसर हम इस शब्द को मजाक के रूप में भी इस्तेमाल कर लेते हैं ‘और क्या हाल है, बड़े सेक्सी बने घूम रहे हो?’
इस शब्द की सहज स्वीकार्यता के सापेक्ष देखा जाये तो क्या ‘कमीना’ शब्द इतना सहज स्वीकार्य है? या हो पायेगा? हो पायेगा का जवाब शायद कोई भी न दे पाये क्योंकि हमारे फिल्मी संसार ने लगभग स्वीकार्यता की स्थिति में तो इस शब्द को लाकर खड़ा कर दिया है। याद है वो गाना - ‘मुश्किल कर दे जीना, इश्क कमीना’, यह गाना बच्चे-बच्चे की जुबान पर चढ़ा था, चढ़ा है।
अब इस गाने का विकास-क्रम बढ़ा। अब एक फिल्म आ गई है ‘कमीने’....। स्वीकार्यता की ओर एक और कदम। जैसे हमारे विचार से सेक्सी शब्द की स्वीकार्यता बढ़ी थी ‘मेरी पैंट भी सेक्सी, मेरी शर्ट भी सेक्सी........’ से। अब मित्रों में आपस में चर्चा होगी चल कमीने देख आते हैं। माँ के पूछने पर बेटी-बेटे कहेंगे-माँ दोस्तों के साथ कमीने देखने जा रहे हैं।
कई बार इस तरह के शब्दों के प्रयोग करने में उसका अर्थ न मालूम होने की स्थिति होती है पर यह भी उनके लिए होती है जो कम पढ़े-लिखे या निरक्षर होते हैं। जैसे हमारे एक मित्र के घर काम वाली बाई आती थी। वह जब भी अपने सात-आठ साल के बच्चे की कोई शरारत या फिर किसी हरकत का बखान करती तो बड़े ही गर्वोक्ति भरे अंदाज में कहती ‘लला ने ऐसो कर दओ, बड़ो हरामी है.....या बड़ो हरामी होत जा रओ, अपयें मन की करन लगो है अब’.....बगैरह-बगैरह। जब एक दिन उसको बताया कि इस शब्द का क्या अर्थ होता है तो उसने फिर इसका इस्तेमाल करना बन्द कर दिया।
क्या काम वाली बाई की तरह ही इन फिल्म वालों की स्थिति है? क्या ये लोग भी इन शब्दों के अर्थ नहीं समझते? क्या अब समाज में विकृत मानसिकता को ही फैलाने का चलन काम करेगा?
हो कुछ भी अब आने वाले समय में इस तरह के वाक्यों से भी रू-ब-रू होने की सम्भावना है ‘‘देखो-देखो मेरे बेटे को, इस ड्रेस में कितना कमीना लग रहा है।’’ ‘‘आज गजब हो गया, तुम्हारे कमीनेपन ने तो मजा बाँध दिया।’’
क्या आप इसके लिए तैयार हैं?

10 जुलाई 2009

विज्ञापन का ज़माना है, ज़रा देख कर फँसना

आज हम मित्रों के बीच विज्ञापनों को लेकर चर्चा चल रही थी। किस प्रकार के विज्ञापन दिखाये जा रहे हैं, उनका प्रस्तुतिकरण इस ढंग का हो रहा है कि कई बार अपने आसपास से भी आँखें चुराना पड़ता है।
एक महानगर का हाल बतायें। वहाँ एक नर्सिंग होम के ऊपर बड़ा सा बोर्ड टँगा देखा जिस पर लगा विज्ञापन कुछ इस तरह का संदेश देता दिखा-क्या आप माहवारी से परेशान हैं? आप वाकई गर्भाशय निकलवाना चाहतीं हैं?..... आगे और भी कई लाइन लिखीं थीं जो स्पष्ट रूप से यही साबित करने का प्रयास कर रहीं थीं कि आप (महिलायें) प्रति माह होने वाली माहवारी से परेशान हैं तो अपना गर्भाशय निकलवा लें।
इसके अलावा और भी बहुत से विज्ञापन टी0वी0 और प्रिंट मीडिया के माध्यम से हमारी आँखों के सामने से गुजरते हैं जो सही बात को तो सही सिद्ध करते हैं कई बार गलत बात को भी सही सिद्ध करने का प्रयास करते दिखते हैं।
आपस की चर्चा के दौरान हमने एक पुरानी छोटी सी कहानी सुनाई जो विज्ञापन की सत्यता पर एक अच्छा खासा कमेंट है। हम इसे जितनी बार भी सुनाते हैं उतनी बार ही मजा आता है। आप भी सुन लीजिए इस बार ये कहानी-

मृत्युलोक से मर कर एक आदमी यमराज के सामने उपस्थित हुआ। यमराज ने चित्रगुप्त जी से उसका लेखा-जोखा माँगा तो चित्रगुप्त जी ने बताया कि महाराज आप भूल रहे हैं। अब लोकतन्त्र है, अब आपके हाथ में नहीं है कि किसे स्वर्ग भेजना है और किसे नर्क? अब यह तो आदमी तय करेगा कि उसे जाना कहाँ है? मानवाधिकार का सवाल जो है। चित्रगुप्त जी के ऐसा बताने पर यमराज ने कहा कि ठीक है इस आदमी के ऊपर ही छोड़ दो कि इसे स्वर्ग चाहिए या नर्क?
आदमी से पूछा गया तो उसने कहा कि महाराज हमें एक बार स्वर्ग तथा नरक दोनों जगह दिखा दो। हम देखने के बाद ही फैसला करेंगे कि हमें कहाँ जाना है?
यमराज ने कहा कि ठीक है लोकतन्त्र में सभी की बात सुनी जाती है तो इस आदमी की बात को सुना जाये। उस आदमी को स्वर्ग तथा नर्क दिखाने का इन्तजाम किया गया।
पहले स्वर्ग देखने की इच्छा के कारण उसको स्वर्ग दिखाया गया। उस आदमी ने देखा कि स्वर्ग में अप्सरायें भी हैं, परियाँ भी हैं। कुछ जवान हैं, कुछ वृद्ध हैं। सारे सुख हैं, सुविधायें हैं पर थोड़ी कमी सी है। कारें चल रहीं हैं पर बिना एसी की हैं। बँगले बने हैं पर ठीक से साफ नहीं हैं। हर तरह के ऐशोआराम हैं। इसके बाद भी कुछ न कुछ कमी भी है।
अब आदमी ने नरक की तरफ प्रस्थान किया। देखा कि वहाँ परियाँ, हूरें तो नहीं हैं पर सभी सेवा करने वालीं दासियाँ स्मार्ट हैं, जो नौकर भी काम कर रहे हैं वे बिना किसी आलस के मुस्तैद हैं। इधर भी कारें चल रहीं हैं। बड़े-बड़े भवन बने हैं। लोगों के काम करने में उत्साह है। कहीं भी किसी के साथ मारपीट नहीं की जा रही है। किसी को खौलते कड़ाहे में उबाला नहीं जा रहा है। किसी को आरी से काटा नहीं जा रहा है। कुल मिला कर सभी सुख-सुविधायें दिख रहीं थीं।
आदमी ने बापस आकर यमराज से पूछा सरकार नरक में भी इतनी सुविधायें क्यों? यमराज ने कहा आजकल मानवाधिकार वाले परेशान करने लगे हैं। अल्पसंख्यक आयोग परेशान करता है। राजनेता परेशान करते हैं। सबसे बचने के लिए अब हमने नरक में यातनायें देना बन्द कर दिया है। अब यहाँ भी हमको सुख-सुविधाओं का ध्यान देना होता है।
उस आदमी ने स्वर्ग-नरक की सुविधाओं की आपस में तुलना करके यमराज से कहा कि महाराज हमें नरक में भेज दो। यमराज ने कहा सोच लो फिर न कहना। बापसी का कोई प्रावधान नहीं है। आदमी ने बिना किसी संशय के नरक में जाना स्वीकार किया।
यमरारज के कहने पर उसको नरक में डाल दिया गया। जैसे ही वह नरक के भीतर पहुँचा देखता क्या है जगह-जगह खौलते तेल के कड़ाहे चढ़े हैं, जिनमें आदमी खौल रहे हैं। पापियों को आरी से काटा जा रहा है। किसी को हाथियों से कुचला जा रहा है। हर तरफ चीख पुकार मची है।
यह देख आदमी घबरा गया। उसने चिल्ला कर यमराज को पुकारा और कहा महाराज ये तो हमारे साथ धोखा है। नरक जैसा दिखाया गया था वैसा नहीं है।
यमराज ने कहा कि ये असलियत है, जो तुमको दिखाया गया था वो तो विज्ञापन था। यदि ऐसा न करें तो नरक में आयेगा कौन और स्वर्ग में भी तुम जैसे पापी इकट्ठा हो जायेंगे।।

जमाने में और भी ग़म हैं समलैंगिकता के सिवाय

एक निर्णय, समलैंगिकता पर और देश भर में बहस का माहौल। इसके साथ एक और तस्वीर, वह ये कि आज बारिश में भीगते एक बूढ़े को देखा। काँपता बदन, किसी तरह से एक फटे अंगोछे से ढाँकने का असफल प्रयास कर रहा था।
मंदिरों और मस्जिदों के सामने हाथ फैलाये छोटे-छोटे मासूम बच्चों को देखा। एक-एक रोटी के लिए, ये बच्चे वाकई जरूरतमंद थे, वे नहीं जो किसी मार के डर से भीख माँग रहे हों।
आज समाचार देखा कि अस्पताल में अभी भी डायरिया से बच्चे दम तोड़ रहे हैं। डाक्टरों के पास समय नहीं, दवाइयों का टोटा है।
आपने भी सुनी होंगी कुछ इसी तरह की खबरें।
कहीं किसी के लुटने की, कहीं किसी के साथ बलात्कार की, कहीं किसी दहेज हत्या की, कहीं किसी आत्महत्या की।
कहीं कोई जूझ रहा होगा रोटी, पानी, घर, बिजली की समस्या से। कोई जूझ रहा होगा अपने रोजगार के लिए। कोई लड़ रहा है भ्रष्टाचार से। कोई असाध्य बीमारी से जूझ रहा है। किसी के सामने भूख की समस्या है।
देखा जाये तो ये ऐसी समस्याएँ हैं जिनका समाधान चुनावी घोषणा-पत्रों में होता है। अब हम इन समस्याओं से ऊपर उठकर दूसरे प्रकार की समस्याओं को सुलझाने में लगे हैं। उनमें से एक समस्या समलैंगिकता को कानूनी समर्थन दे देने की है।
चलिए समस्या से निपटा जाये...जी हाँ अभी इसी समस्या से निपटा जाये क्योंकि बाकी समस्यायें तो आदमी के पैदा होने से मरने तक बनी ही रहतीं हैं।

08 जुलाई 2009

समलैंगिक गीत - कली कली से, भौंरे भौंरों पर मंडराते मिलेंगे

महकते उपवन में नये निजाम मिलें गे
कली कली से, भौंरे भौंरों पर मँडराते मिलें गे। ।

चोरी-चोरी जो प्यार के गीत गाते थे,
आँखों-आँखों में ही बस गुनगुनाते थे।
खुल्लम खुल्ला होगी अब इजहारे-मुहब्बत,
प्रेम-प्यार की नित नई इबारत लिखें गे

बाप बेटियों के सोयें चादर तान के,
आयाम देखो उनकी स्वच्छन्द उड़ान के।
क्यों घबराते हो उनके रिश्तों को लेकर,
नहीं इससे उनके पैर भारी मिलें गे

शर्म की बात करते हो नादान हो,
होगा क्या सोच कर क्यों परेशान हो?
बेलौस होकर मदमस्त रहेंगे जोड़े,
कूड़े के ढेर पर नहीं नवजात मिलें गे

अभी तक पड़े थे हाशिये पर जो,
करते हैं याद उन वेद-पुराणों को,
बात कुछ हजम नहीं होती मेरे यार,
‘पॉप कल्चर’ वाले क्या वेद-पुराण पढ़ें गे


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ये कविता मात्र व्यंग्य है। इसमें कविता का मीटर तलाशने वाले कृपया अपनी मगजमारी न करें। कविता के नाम पर कविता कहने का आरोप न लगायें। बस पढ़ें और यदि मजा आया हो तो मजा लें।

05 जुलाई 2009

समलैंगिक साथी - अब खोजो रिश्तों के नए नाम

अभी सुबह-सुबह एक समाचार पढ़ा कि दिल्ली के एक प्रोफेसर साहब अदालत के समलैंगिकों के समर्थन में दिये गये आदेश से बड़े खुश हैं। अब वे अपने लड़के के लिए किसी लड़की की नहीं बल्कि एक लड़के की ही तलाश करने लगे हैं। उनको अभी तक डर लग रहा था अब वह डर मिट गया है।
समाचार पढ़ा, दिमाग में एक कीड़ा कुलबुलाया। वैसे इस विषय पर तो समूचे देश में गर्मागरम बहस चल रही है इस कारण अभी हम बहस के मूड में नहीं हैं। हम सोच रहे हैं कि समाज में समलैंगिकों के सम्बन्धों को आने वाले समय में सहजता से स्वीकार लिया गया तो हमें बहुत से नये रिश्तों को सम्बोधित करने वाले शब्दों को खोजना होगा।
शब्द निर्माण की प्रक्रिया भी सहजता से चलती रहती है। अब इन सम्बन्धों को लेकर भी नये शब्दों का निर्माण करना होगा। घर के किसी ‘क’ लड़के ने अपने किसी मित्र ‘ख’ लड़के को ही अपना जीवन साथी बनाया तो वह ‘ख’ व्यक्ति उस घर का क्या होगा। बहू या दामाद या कुछ और? (वैसे दामाद का तो सवाल ही नहीं होता क्योंकि वह तो लड़की का पति होता है।) अपने परिचितों को उन घरों के लोग ‘क’ एवं ‘ख’ शख्स को किस रिश्ते के सम्बोधन से मिलवाया करेंगे?
‘क’ लड़के को चाचा, भैया, मामा आदि पुकारने वाले उसके जीवन साथी ‘ख’ शख्स को किस प्रकार सम्बोधित करेंगे?
इसी तरह किसी घर की ‘अ’ बिटिया अपनी महिला मित्र ‘ब’ को अपना जीवन साथी बनाती है तो उसका रिश्ता उसके घर वाले किस रूप में पुकारेंगे? ‘अ’ को मौसी कहने वाले बच्चे ‘ब’ को क्या मौसा कहेंगे? ‘अ’ को बुआ कहने वाले क्या ‘ब’ को फूफा कहेंगे?
रिश्तों को पुकारने की समस्या तो है ही साथ ही दूसरी समस्या एक और आयेगी। वह होगी बहू, दामाद का निर्धारण करने की, ससुराल जाने की, विदाई की।
कोई इसे भले ही पुरातनपंथी कहे पर सत्य यह है कि बेटे की शादी के बाद बहू विदा होकर अपने ससुराल आती है। बिटिया को घर से बारात लेकर आये दामाद के साथ विदा किया जाता है। मान भी लिया जाये कि दोनों नौकरीपेशा हैं फिर भी भले ही एक दिन के लिए ही सही, इस परम्परा का निर्वाह होता है।
अब हमारे दिमाग में समस्या उपजी कि दो लड़को का आपस में जीवन साथी के रूप में स्वीकारे जाने पर कौन सा परिवार किसको विदा करेगा और कौन विदा करवा कर दूसरे लड़के को अपने घर ले जायेगा? यही स्थिति दो लड़कियों को लेकर भी होगी। बहू की मुँह दिखाई, अन्य दूसरी नेग रस्में कैसे निपटाई जायेंगीं? (चलिये रस्मों को लेकर तो सोचा जा सकता है कि हम आधुनिक हो गये हैं, इन्हें छोड़ा भी जा सकता है।)
हम तो समाचार पढ़ कर ही सोच में पड़ गये कि बेचारे प्रोफेसर साहब अपने लड़के के लिए लड़का तो खोजने लगे, माना मिल भी जायेगा पर दूसरे लड़के के घर वाले भी तो लड़का खोज रहे होंगे, ऐसे में कौन बारात लायेगा? कौन विदा करवा कर दूसरे लड़के को अपने घर ले जायेगा?
उफ! हम क्यों बेकार में मगजमारी कर रहे हैं? जिनकी समस्या है वही निपटेंगे। हम सोच रहे हैं कि नये रिश्तों के नये नामकरण के लिए शब्द खोजने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाये। पता नहीं हमारा दिया कौन सा शब्द चलन में आ जाये और हम भी प्रसिद्ध हो जायें।
कोई कुछ भी कहे, समलैंगिक सम्बन्धों की वकालत उन सभी लोगों को अनिवार्य रूप से करनी चाहिए जो जनसंख्या नियंत्रण और कन्या भ्रूण हत्या निवारण के लिए काम कर रहे हैं। इस नये सम्बन्ध से जनसंख्या रुकेगी और बच्चे ही नहीं होंगे तो कन्या भ्रूण हत्या होने का सवाल ही नहीं। हाँ, दहेज की समस्या और दहेज के लिए प्रताड़ना के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता और महिला हिंसा...........पता नहीं?
चलिए इसमें कुछ तो अच्छा है.........। जय हो.........

03 जुलाई 2009

समलैंगिकता कानूनी - भविष्य कैसा होगा?

समलैंगिकता पर अदालत का आदेश आया तो देश में उत्साह और आक्रोश का मंजर व्याप्त हो गया। समझ नहीं आया कि इस मुद्दे पर कहा क्या जाये? यह वाकई मानव की विजय है जिससे उसको समानता का अवसर मिला या फिर यह हमारी मानसिकता के बीमार होने का परिचायक है?
अदालत ने कहा कि संविधान के समानता के अनुच्छेद के कारण इस प्रकार का आदेश देने का बल मिला; आदमी की भावनाओं को महत्व दिया। हमारे राजनेताओं ने और फिल्मी हस्तियों ने भी इसका समर्थन करते हुए समलैंगिकों को बधाई दे डाली। उन लोगों का यहाँ तक कहना था कि आधुनिकता के माहौल में हमें बदलना होगा।
चलिए मान लिया जाये
कि सेक्स के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। समलैंगिक गतिविधियों से एड्स रुकेगा या नहीं, अन्य बीमारियाँ होंगीं या नहीं, अपराधबोध कम होगा या नहीं यह तो बाद की बात है पर देखा जाये तो आधुनिक होने का दम्भ और बढ़ जायेगा।
सभी की अपनी मर्जी है कि वह अपनी शारीरिक संतुष्टि का रास्ता स्वयं चुने पर क्या अप्राकृतिक रास्ता चुनने की अनुमति दी जानी चाहिए? हमारे देश में विवाह को सिर्फ शारीरिक संतुष्टि के लिए ही नहीं स्वीकारा गया। विवाह के पीछे का मकसद सेक्स और संतानोत्पत्ति रहा है। आज दो व्यक्तियों (समलैंगिकों) के मध्य का प्यार सेक्स आधारित ही है। क्या इससे विवाह और परिवार की अवधारणा खण्डित नहीं होती है?

इसके अलावा जो लोग इस निर्णय की वकालत यह कहते हुए घूम रहे हैं कि हमें व्यक्तियों की भावनाओं का ख्याल भी रखना चाहिए; संविधान में भी समानता का अधिकार दिया गया है; किसी के साथ कानूनी डंडा हमेशा प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए वगैरह...वगैरह। वे लोग आज के समाज की स्थिति देख कर थोड़ा इस ओर भी सोचें।
आज हम देखते हैं कि आधुनिकता में अंधे होकर बाप बेटी से, श्वसुर बहू से, भाई बहिन से, लड़का अपनी माँ, मौसी, चाची, मामी जैसे पवित्र सम्बन्धों, रिश्तो से भी सेक्स की भूख मिटा रहा है। कल को (आज से दस-बीस वर्ष बाद) यदि इसी मानसिकता के लोग ज्यादा हो गये तथा समाज में इस तरह की घटनायें और भी तेजी से बढ़ने लगीं तब उसके बाद की स्थिति की कल्पना कीजिए।
ये लोग भी सड़को पर इन्हीं समलैंगिकों की तरह आन्दोलन करेंगे कि बाप की शादी बेटी से, भाई की शादी बहिन से होने दी जाये; माँ, मौसी, चाची, मामी आदि सम्बन्धों को परिवार के लड़को, बेटों, के साथ रहने दिया जाये; श्वसुर को बहू का पति घोषित किया जाये। तब निश्चय ही अदालत वर्ष 2009 के कल के अपने फैसले की नजीर पेश करते हुए यही फैसला देगी कि सभी की समानता का ख्याल रखते हुए ऐसा गैरकानूनी नहीं है। किसी को भी किसी के साथ सेक्स सम्बन्ध बनाने की, किसी को किसी के साथ रहने की आजादी है।

आधुनिकता में पले-बढ़े हम इस निर्णय पर भी सड़को पर जश्न मनायेंगे। अपनी जीत साबित करेंगे। इस निर्णय पर आज वाकई विचार करने की जरूरत है।

(सभी फोटो यहाँ से साभार लीं हैं)

01 जुलाई 2009

कॉलेज जाने में वो जोश नहीं रहा अब

आज पहली जुलाई है। पहली तारीख का अपना अलग महत्व है और वह भी तब जब कि इस दिन आपको अपने कालेज जाना हो। बचपन में स्कूल के दिनों में इन्तजार रहता था कि कब गर्मियों की छुट्टियाँ हों और कब स्कूल से पीछा छूटे।
छुट्टियाँ होते ही मौज-मस्ती, धूम-धमाका होता था। आज के बच्चों की तरह नहीं कि इन दिनों में भी काम का बोझ लादे घूम रहे हैं। कुछ दिनों की उठापटक के बाद लगता था कि जल्दी से स्कूल खुलें ताकि नई ड्रेस पहनने को मिले, नई किताबें, कापियाँ, पेन्सिल आदि मिलें। नये-पुराने दोस्तों का मिलना हो।
आज वैसा एहसास होता है जबकि कालेज खुलता है पर वो जोश नहीं रहता। कारण अब बचपन नहीं रहा। अब हम बड़े हो गये और बडे होने के साथ-साथ हमने बेमतलब की तमाम औपचारिकता अपने ऊपर थोप ली है। आज कालेज जाना है क्योंकि ये एक रुटीन काम है। जाना है, लोगों से हाय-हैलो होगी, छुट्टियाँ कैसे गुजरीं, कहाँ-कहाँ कापियों का मूल्यांकन करने गये, कहाँ कितना पेमेंट मिला, वेतन वृद्धि का क्या हुआ, बजट में इनकम टैक्स के बारे में क्या होगा, सेवानिवृत्ति की आयु 62 वर्ष से बढ़ा कर 65 वर्ष की जायेगी या नहीं आदि-आदि।
लगता है कि मासूमियत हम कहीं गहरे तक दफन कर चुके हैं। सम्बन्धों में नितांत औपचारिक होते जा रहे हैं। इसी कारण से अब कालेज जाने का जोश नहीं है। बस जाना है तो जाना है।