30 नवंबर 2008

जागो मानव

अपनी दीदी डॉ0 हर्षिता कुमार की लिखी कविता आपके लिए............इधर मुंबई की घटना ने इस तरह व्यथित कर डाला कि कुछ लिखने का मन नहीं कर रहा था। ब्लॉग की यात्रा की तो लगभग हर जगर मुंबई की ही घटना दिख रही है। लग रहा है कि सब इससे बुरी तरह प्रभावित हैं। बहरहाल दुःख को भूलना ही पड़ेगा............चलिए अभी हमारी दीदी की कविता का आनंद लीजिये...............

हे चिर अविनाशी घट-घट व्यापी,
तेरे पूजन को तत्पर हैं सारे दानव,
दिखते नहीं एक भी मानव।
होती जो इनमें थोड़ी सी मानवता,
ह्रदय इनका भी द्रवित होता, पसीजता।
नहीं हैं ये चिंतित या शर्मसार,
होता न कभी इनको दुःख अपार।
करते नहीं ये क्षमा याचना भी,
अपने उन अक्षम्य कार्यों की,
जो वे करते हैं प्रतिपल।
बहाने में रक्त स्वजनों का,
लगता नहीं उन्हें एक भी पल।
दीखता है उन्हें केवल स्वार्थ,
जानते नहीं वो ये यथार्थ।
कर्म उन्हों ने किए जो अब तक,
घटित हो जो उनके संग कल तब।
करेंगे किससे फरियाद,
कौन सुनेगा इनकी पुकार।
अब भी है वक्त सुधरने का,
दानव से मानव बनाए का।
सुन वाणी अंतर्मन की,
जो है भयभीत सहमी और डरी।
करो जाग्रत कि मानवता की,
हुई प्रशंसा सदैव से ही।

29 नवंबर 2008

जीत हुई या हार??????

आतंक के 59 घंटे बीते, आतंकवादियों को मार गिराया. कहा जा रहा है कि ये हमारी जीत है. हमने आतंक का मुंह तोड़ जवाब दिया है. क्या वाकई ये हमारी जीत है? एक पल को रुकिए.............आप ये न सोचिये कि हमें इस बात की खुशी नहीं कि हमारे जांबाज़ सैनिकों ने आतंकियों को मार गिराया. हमारा मकसद इससे उलट दूसरी तस्वीर को दिखाना है. ज़रा गौर करिए पूरे वाकये पर फ़िर पता चलेगा कि ये हमारी जीत है या कि अभी तक की सबसे बड़ी हार????? शायद आपके मन में भी इसी तरह के प्रश्न-चिन्ह बन गए होंगे, पर सत्य यही है. हम किसी भी तरह जीते नहीं हारे हैं. हम जीते इस बात से हैं कि हमारे सैनिकों ने उन स्थानों को खाली करवा लिया है जो आतंकियों के कब्जे में थे। बस इसी खुशी में हम वास्तविकता को न भूल जाएँ,
ज़रा सोचिये इन तीन दिनों से पहले के बम धमाके या फ़िर कोई भी दूसरी आतंकी वारदात. पहले भी हमने आतंकियों की हरकतों पर अपने लोगों को खोया है. आतंकवादियों के बमों, गोलियों से लोगों ने अपने प्राण गँवाए हैं, आतंक की वारदातें लगातार होती रहीं हैं. आतंकी घटना के बड़े या छोटे होने का आकलन करें तो अपने देश और विदेश की बहुत सारी घटनाएं याद आ जायेंगीं। यदि अन्य आतंकी घटनाओं को हमने सहा है और मुकाबला कर जीता है तो यहाँ हार कैसे?
इसी बिन्दु पर आकर पिछली घटनाओं और इस घटना को देख लें तो सच भयावहता के साथ सामने खडा हो जायेगा. पहले जो भी आतंकी हमले हुए उनमे आतंकवादियों ने भीड़ को निशाना बनाया. गोली या बम के सहारे लोगों की जान ले ली और भाग गए. ट्रेन में, बस में, टेक्सी में, साइकिल में या किसी होटल आदि में विस्फोट किए और भाग गए। भले ही भागते में पकडे गए हों पर वारदात करने के बाद वे भागे. यहाँ क्या हुआ.......................... आतंकी तीन दिनों तक हमारी सेना के जवानों के साथ मोर्चा लेते रहे.
हमारा अति जागरूक मीडिया इस घटना की समाप्ति के तुंरत बाद नुक्सान का तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के हवाई हमले की चर्चा करने लगा। हो सकता है कि वहां का नुकसान हमारे इस नुक्सान से बहुत अधिक रहा हो पर वहां भी क्या हुआ? आतंकवादियों ने हवाई जहाज लिया और वर्ल्ड ट्रेड सेंटर से टकरा दिया. सभी मारे गए, इमारत नष्ट हो गई, व्यापक नुक्सान हुआ पर क्या आतंकियों ने उनकी सुरक्षा से टकराने की हिम्मत की? यहाँ अब इस घटना को देखें, उँगलियों पर गिने जाने वाले आतंकवादियों ने 59 घंटों तक मोर्चा लिया। अधिसंख्यक रूप से गोला-बारूद होटल के अन्दर लेजाकर युद्ध सा किया, हमारी सागरिक शक्ति, खुफिया शक्ति का मखौल बनाया.
सेना के जवानों, कमांडो और अन्य सैनिकों के होते हुए भी कुछ आतंकी सारे देश की साँस को रोके रहे. एक पल को इस स्थिति की कल्पना कीजिए कि यदि ऐसा ही कुछ देश के कुछ और बड़े शहरों में एक साथ हुआ होता तो????????? या ये सारे देश में हंगामा करने का रिहर्सल हो तो???????? क्या अब आपकी आँखें खुलीं???? क्या ये वाकई हमारी जीत है???? सोचिये कि हमारी सैन्य शक्ति की परीक्षा लेने कुछ आंतकवादी आए और वे सफल रहे. उन्हों ने कई महीनों के प्लान से समझ लिया कि देश में कहीं भी घुस जाना और कहीं का भी नक्शा पता कर लेना, सुरक्षा व्यवस्था को चकमा दे देना मुश्किल नहीं है. जो सारे विश्व को मुश्किल लगता था (हमारी सेना की ताकत, उसके लड़ने की शक्ति) उसको भी इन आतंकियों के सहारे उनके सरगनाओं ने समझ लिया है। अब बातों से नहीं लातों से काम करने की जरूरत है. सबूतों को जुटा कर रखने की नहीं सबूतों को दिखा कर हिम्मत जुटाने की जरूरत है, अब सहयोग मँगाने की नहीं शक्ति आजमाने की जरूरत है, अब शान्ति की नहीं युद्ध की जरूरत है.
सोचिये फिरसे कि यदि कल को यही सब एक साथ देश के कई शहरों में हुआ तो उसका परिणाम क्या होगा???? दस आतंकियों ने छकाया 59 घंटे तो इनकी अधिक संख्या होने पर क्या होगा????
(ये कहना आसान है कि हम डटकर मुकाबला कर लेंगे, ये आदर्शवादी बातें हैं। पूछिए उनके घरों से जिन्हों ने अपने घर का चिराग खोया है. बातें करना आसान है पर...........)

28 नवंबर 2008

उफ़! किया क्या जाए?

उफ़!!! क्या कहा जाए???? क्या किया जाए??? अभी पूरी तरह से आतंकवादियों से निपट नहीं सके और शुरू हो गया सभी का इस मामले में अपनी पीठ ठोंकना और दूसरे को गरियाना. राजनैतिक दलों से तो वैसे भी उम्मीद नहीं थी, मीडिया के रोल को लेकर भी थोड़ा सा क्षोभ रहा. पहले बात राजनैतिक दलों की, अभी तक जब ख़तरा मंडरा रहा था तब किसी नेता ने अपना मुंह नहीं खोला. अब पकिस्तान का पूरा-पूरा हाथ दिखने के बाद तो सभी को साँप सूंघ गया. सबसे ज्यादा तो कष्ट उन्हें हुआ होगा जो पिछले कई वर्षो से हिंद-पाक की दोस्ती की दुहाई देते-देते नहीं थक रहे हैं, हर साल अपने देश को भुला कर सीमा पर मोमबत्तियां जला रहे हैं.

हम नौजवानों को जिन्हों ने आजादी के बहुत साल बाद अपनी आँखें इस देश में खोलीं, उन्हों ने तो पाकिस्तान को सिर्फ़ नफरत की राजनीति करते देखा है. अब वे बूढे लोग जिनकी आंखों और आंतों में दम नहीं बचा है, अपने कांपते हाथों से पाकिस्तान की जय कर रहे हैं वे बताएँगे कि हम किस आधार पर उनके सुर में सुर मिलाएँ? सवाल इस समय ये चर्चा करने का नहीं कि कौन क्या कर रहा है, सवाल ये कि अब किया क्या जाए???? क्या इसी तरह मार खाकर, चुप बैठ कर, फिरसे पाकिस्तान के साथ सहयोगात्मक रवैया अपनाया जाए? क्या पाकिस्तान के साथ दोस्ती का पैगाम फ़िर आदान-प्रदान किया जाए? इस घटना की जांच में उससे सहयोग लिया जाए? यह सत्य हो सकता है कि युद्ध किसी समस्या का हल नहीं पर यह भी सत्य है कि एक अन्तिम युद्ध शान्ति की स्थापना कर देगा.

देश के राजनेताओं की चर्चा करना उसी तरह ग़लत होगा जैसे किसी पढ़े-लिखे को कक्षा एक की पुस्तक पढ़वाना. आप सब समझदार हैं समझ गए होंगे. अब सभी चुनाव को देखते हुए इस मुद्दे पर विचार देने लगे हैं. रही बात मीडिया की तो उनकी तारीफ़ इस बात पर कि जान पर खेल कर उनके पत्रकारों ने प्रसारण किया. यहीं आकर हमारा मत मीडिया के साथ समता नहीं रखता। जिस तरह से आतंकी घटना हो रही थी, जिस तरह की तैयारी से उन्हों ने देश पर हमला किया, जिस तरह वे सिर्फ़ हमला करने नहीं वल्कि हमारी सेना, सुरक्षा से लड़ने का मन बना कर आए थे उसको देख कर क्या ये नहीं लगता कि वे सब आधुनिक संचार उपकरणों से लैस होंगे?

इसके बाद भी मीडिया ने अपना प्रसारण जारी रखा. ये बात अलग है कि मीडिया बराबर इस बात को दोहराता रहा कि ये सीधा प्रसारण नहीं है पर जो दिखाया जा रहा था वो सब घटनास्थल पर तो हो ही रहा था. कब कमांडो कार्यवाही हुई, कब कमांडो शहीद हुए, कब ग्रेनेड चला, कब कहाँ कितनी आग लगी, कब आतंकवादी ने बंधक को मारा.............आदि-आदि, ये सब भले ही सीधे प्रसारण में नहीं आ रहा था पर कुछ पलों के बाद तो आ ही रहा था. क्या आतंकियों को इसकी सूचना नहीं जा रही होगी? मोबाइल की बरामदगी ने तो बात को और भी स्पष्ट कर दिया है............................बहरहाल, मीडिया अपनी पीठ ठोंक रही है.............बस प्रसारण दिखा कर. क्या वे लोग याद हैं जो आतंकी गोली का शिकार होकर शहीद हुए..................आम नागरिक, विदेशी यात्री, पुलिसकर्मी?

यहाँ देख कर लगता है की आज मीडिया और नेता एक श्रेणी में खड़े हैं। एक अपने हाथ में कैमरा और माइक लिए है और एक बिना माइक और कैमरे के खडा है. एक सीधा प्रसारण दिखा रहा है, एक सीधे प्रसारित हो रहा है. एक अपने विज्ञापन के लिए प्रसारण कर रहा है एक अपने वोट के लिए. दोनों अपनी-अपनी पीठ ठोंक रहे हैं.........

फ़िर वही बात निकलती है, उफ़!!!!!! क्या किया जाए????????

27 नवंबर 2008

शोक आक्रोश



शोक आक्रोश आक्रोश आक्रोश
आज टिपण्णी नहीं साथ चाहिये । इस चित्र को अपने ब्लॉग पोस्ट मे डाले और साथ दे । एक दिन हम सब सिर्फ़ और सिर्फ़ हिन्दी ब्लॉग पर अपना सम्मिलित आक्रोश व्यक्त करे । चित्र आभार


ये पोस्ट साभार http://pachaaspratishat.blogspot.com/ से ली है.

कहाँ छुपे हो राज ठाकरे??????

कल देर रात से एक ख़बर सभी चैनलों पर सभी के दिल की धड़कन को रोके है......................................

  • मुंबई में देश का सबसे बड़ा आतंकी हमला...................
    अभी तक हुए हमले में मारे गए लोगों की संख्या.............(ये संख्या बताने में हम असमर्थ हैं क्योंकि ये लगातार बदती ही जा रही है)
    हमले में घायल हुए लोग ..................... (
    इसका भी हल मृत लोगों जैसा ही है, लगातार बढ़ रहे हैं)
  • आतंकवादी पाकिस्तान के हैं..................ऐसा उनके पास से मिले मोबाइल और कल बरामद हुए एक हैण्ड ग्रेनेड से ज्ञात हुआ..............

इसके अलावा और भी जो जानकारी है वो तो आपको समाचारों से पता चल ही रही होगी.................इस पोस्ट में ऐसा कुछ नहीं है जो इस आतंकी वारदात के बारे में बता सके. इत्तेफाक देखिये, आज सोचा था की कुछ बाल-साहित्य पर लिखा जायेगा क्योंकि यही एक ऐसा विषय है जिस पर कम से कम लिखा जा रहा है पर देखिये विडम्बना कि लिखना पड़ा कुछ अलग...................

फिलहाल पोस्ट पर आते हैं जैसा कि आप शीर्षक देख कर ही समझ गए होंगे कि ये अलग तरह की पोस्ट है........... वेंडरों को मारने वाले, टेक्सियों को तोड़ने और उनके चालकों को मारने वाले, निर्दोष, निरीह परीक्षार्थियों की बेरहमी से पिटाई करने वाले, उत्तर भारतीयों को अपना निशाना बनाने वाले, भैया लिखा केक काट कर अपनी नफ़रत दर्शाने वाले, आमची मुंबई का नारा बुलंद करने वाले, मुंबई हमारी है किसी के बाप की नहीं के पोस्टर लगाने वाले........................और भी बहुत कुछ मुंबई के लिए और उत्तर भारतीयों के विरोध में करने वाले राज ठाकरे और उनके कार्यकर्ता अब कहाँ हैं???????????????

  • मनसे कहाँ है????????
  • अब उनकी मुंबई क्या उनकी मुंबई नहीं है???????
  • सैकड़ों की संख्या में मरने वालों के लिए उनकी आंखों में आंसू नहीं हैं???????
  • शहीद होने वाले पुलिस और जंग करती सेना के साथ गोली खाने के लिए उनके सीने कहाँ हैं??????????
  • इसी तरह वे लोग कहाँ हैं जो सोते-जागते पाकिस्तान प्रेम का राग आलापते हैं???????
  • वे लोग अब क्या कहेंगे जो इस्लामिक आतंकवाद को हिन्दुओं के दिमाग की उपज बताते हैं????????
  • वे लोग अब खामोश क्यों हैं जो अकारण ही कांग्रेस को शांतिप्रियता लाने वाली सरकार बताते हैं??????
  • इस तरह से हुए हमले के लिए कौन जिम्मेवार है???????
  • महाराष्ट्र सरकार अब खामोश क्यों है????????
  • आतंकवादी कितनी आसानी से मुंबई में घुस आए और सुरक्षा एजेंसी किस अंधेरे में खोईं रहीं????

बहुत कुछ है इस पर कहे जाने को पर अभी मौका नहीं है.........................अब देखना है कि पकडे कितने आतंकवादी जाते हैं????? हमारे देशवासी किस हद तक अपने लोगों को खोते हैं?????? सरकार (केन्द्र और राज्य की) किस हद तक तत्परता दिखाती हैं??????? सवाल बहुत हैं पर अभी जवाब का इंतज़ार नहीं अभी तो ग़म के आंसू हैं, सिसकियाँ हैं, रुंदन है............

26 नवंबर 2008

ब्लॉग पर सामाजिक व्यवस्था

आज की ये पोस्ट कुछ ख़ास तो नहीं बस यूँ ही बैठे-बैठे ब्लॉग की यात्रा करते-करते दिमाग में एक विचार आया और लगा कि आप लोगों से भी ये विचार बाँट लेना चाहिए. अपने ब्लॉग पर पोस्ट करने के अलावा बहुत सा समय दूसरे ब्लॉग की यात्रा करने में भी लग जाता है. इस दौरान बहुत से ब्लॉग से कुछ जानकारियाँ भी मिल जातीं हैं और कुछ ब्लॉग से बहुत कुछ सीखने को मिल जाता है. बहरहाल वे मित्र क्षमा करेंगे जिनके ब्लॉग की यात्रा करने के बाद भी उस पर टिप्पणी नियमित रूप से या बिल्कुल भी नहीं कर पाते हैं. ये अभी हमारे समय को इस तरफ़ ज्यादा न लगा पाने के कारण हो रहा है. ब्लॉग पर टिप्पणी करने से अधिक हम उनको पढने में ज्यादा लग जाते हैं...पुनः क्षमा चाहते हैं।
इधर ब्लॉग यात्रा के दौरान देखा है कि यहाँ भी एक तरह की सामाजिक व्यवस्था अनजाने ही काम करती है. किसी किसी पोस्ट पर ढेरों टिप्पणी और किसी किसी पोस्ट पर एक-दो टिप्पणी झांकती सी दिखतीं हैं. यहाँ ये नहीं कहना है कि सभी पढने वाले सभी पोस्ट पर टिप्पणी करें पर देखा गया है कि किसी विषय विशेष पर टिप्पणी करने या न करने की स्थिति बनती दिखती है. जहाँ लगता है कि ये विषय विवादित है वहा टिप्पणियों की संख्या कम हो जाती है और किसी सर्व-ग्राह विषय को हंस कर स्वीकार किया जाता है. ये स्थिति भी समाज की तरह ही अपना प्रभाव दिखाती है। समाज में हम भी उस मुद्दे पर किसी तरह का कमेन्ट करने से बचते हैं जिस पर सामजिक स्थिति अपनी स्वीकार्यता नहीं देता है. इसी तरह लोगों को अधिक से अधिक अपनी तथा अपने विचारों की तरफ़ आकर्षित करने की दृष्टि से उन विचारों का समर्थन करते अधिक दीखते हैं जिन पर समाज अपनी आम राय बना देता है.
यहाँ आकर लगता है कि ब्लॉग क्या अपने आपको सामने लाने का मंच है या फ़िर सही को सही और ग़लत को ग़लत बताने का मंच है. हो सकता है कि ब्लॉग पर नए-नए होने के कारण अभी यहाँ के तौर-तरीकों से परिचित न हो पायें हों पर इतना तो पता चल ही गया है कि ब्लॉग पर कुछ ऐसा तो पकता है जो यहाँ भी लोगों को अपनी प्रस्थिति अपनी इमेज बनाने को प्रेरित करता है.

जो लोग नियमित ब्लॉग यात्रा करते हैं उनको विषय बताने की जरूरत नहीं है..........उनको इतना इशारा बहुत है. बहरहाल जो दिखा लिख दिया शेष तो सही ग़लत सभी के साथ है.

25 नवंबर 2008

ऐसा कब तक होगा....?????

आज कई दिनों बाद ब्लॉग पर आना हुआ, कुछ घरेलू व्यस्तता रही, कुछ दूसरे जरूरी काम. एक-दो दिन ब्लॉग की सैर की थी और कुछ पर जाकर टिप्पणी भी की पर अपने ब्लॉग पर कुछ भी लिखना नहीं हुआ. इधर देश में चुनावों की, साध्वी की, क्रिकेट की, कुछ घोटालों की चर्चा आम है ठीक यही स्थिति ब्लॉग पर भी है. इन सब मुद्दों के बीच ब्लॉग भी गर्म रहा. सबसे ज्यादा मुद्दा साध्वी का छाया रहा, कुछ लोगों की निगाह में ये हिन्दुओं को बदनाम करने की साजिश है तो कुछ की निगाह में ये जायज है. एक ब्लॉग पर तो बड़ी गरमागरम बहस चल रही थी. टिप्पणी भी बड़ी उत्तेजक थीं।

बहरहाल ये कहना कि ये हिन्दुओं को बदनाम करने की साजिश है या ये कहना कि जो किया जा रहा है वो सही है एकदम से उसी तरह निर्णय देना होगा जैसे कि आरुशी हत्याकांड में दिया जा रहा था। यहाँ एक बात तो साफ़ है कि ये पूरा घटनाक्रम एकदम ये साबित करने में लगा है कि साध्वी आतंकवाद का नया नाम है और हिन्दुओं ने भी आतंकवाद का सहारा ले लिया है. अब किसी को आतंकवाद के साथ मुस्लिम या इस्लामिक शब्द लगाने की जरूरत नहीं है. यहाँ कुछ कहने के पहले, अपने निर्णय देने के पहले कुछ बातों को भी ध्यान में रखना होगा. इस्लामिक आतंकवाद का शिगूफा अमेरिका द्वारा छोड़ा गया था. यदि ब्लॉग पाठकों को याद हो तो वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आक्रमण के पहले जब भी भारत आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान के कारनामे दिखता था तो अमेरिका और उसके पिछलग्गू देश इसे भारत की झूटी दलील कह कर ठुकरा देते थे. अपने ऊपर हुए आक्रमण के बाद अमेरिका ने खुले शब्दों में इस्लामिक आतंकवाद की मुखालफत की। तब किसी नेता या धर्मनिरपेक्ष की जुबान नहीं खुली.

देखा जाए तो देश में किसी भी तरह से मुस्लिम तुष्टिकरण का जो खेल खेला जा रहा है वो देश को विकास के नहीं विनाश के रास्ते पर ले जा रहा है।

  • जब भी किसी नेता, धर्मनिरपेक्ष के पुजारी, किसी साहित्यकार, प्रबुद्धजन के मुंह से दंगों की भयावहता की चर्चा होती है तो सिर्फ़ और सिर्फ़ गुजरात दंगों की बात होती है. यहाँ क्या इन लोगों को 1984 के सिख दंगों की याद नहीं आती?
  • जब भी आतंकवादियों को छोड़ने की बात आती है तो विमान अपहरण के बाद छोड गए आतंकवादी कि याद आती है तब ये लोग सईद काण्ड को भूल जाते हैं. ऐसा क्यों?
  • बयानवाजी की चर्चा होने पर मोदी के बयान तो याद रहते हैं पर कोंग्रेस के नेताओं की जुबान को याद क्यों नहीं किया जाता?
  • मारे गए लोगों की याद में ईसाई समुदाय याद आता है पर दो शब्द गोधरा काण्ड में मारे गए हिन्दुओं के लिए नही निकलते हैं, क्यों?
  • तोड़-फोड़ करने में काला दिन याद आता है बाबरी मस्जिद के गिरने से पर तमाम हिन्दू आराध्यों के, पूज्य स्थलों पर अतिक्रमण क्यों नहीं दीखता है?
  • हज के लिए जाने के लिए ढेरों-ढेर सुविधाएँ मिल जातीं हैं पर अमरनाथ यात्रा के लिए किराए की जमीन के लिए भी लाठियां खानीं पड़तीं हैं, क्यों?
  • हिन्दू के नाम पर बिना सबूत के पकड़े गए कुछ लोगों को मकोका लगा कर जमानत विहीन कर दिया जता है वहीं तुष्टिकरण के नाम पर कुछ आंतकवादी चुनाव लड़ने तक की तैयारी करने लगते हैं, क्यों?
  • बिना सबूत के साध्वी हिन्दू होने के कारण जेल में है और दूसरी तरफ़ अफज़ल पूरी तरह सजा पाने के बाद भी जेल में सुकून से रह रहा है, क्या ये मुस्लिम तुष्टिकरण नहीं?

ऐसे एक-दो नहीं अनेक उदाहरण हैं जो दर्शाते हैं कि किसी न किसी रूप में हिन्दुओं का शोषण और मुस्लिमों के साथ तुष्टिकरण की नीति अपनाई जाती रही है. परिवार-नियोजन को लेकर भी स्वास्थ्य विभाग की निगाह भी मुस्लिमों के ऊपर बेहद इनायत रूप में होतीं हैं. यहाँ सवाल ये नहीं कि क्या किया जाए क्या नहीं, सवाल ये है कि कब तक मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति अपने जाती रहेगी? देश एक है तब क़ानून एक क्यों नहीं? यदि साध्वी दोषी है तो बीच चौराहे पर खड़े करके गोली मार देनी चाहिए पर यदि वो निर्दोष है तो इस जिल्लत की कीमत कौन चुकायेगा?

जो लोग बात करते है कि मुस्लिमों को बदनाम किया जाता है तो ऐसे लोगों के साथ हम भी हैं पर क्या ये सत्य नहीं है कि इस समय हमारा देश ही नहीं समूचा विश्व ही इस्लामिक आतंकवाद का शिकार नहीं है? एक आतंकवादी को बचाने के लिए किस-किस तरह से दांव-पेंच चलाये जाते है ये तो नेता ही अच्छी तरह जानते होंगे पर जो दीखता है वो ये कि अभी तक इतने कम सबूतों के बाद भी किसी मुस्लिम आतंकवादी के ऊपर इतना सख्त क़ानून नहीं लगा जितना साध्वी और उसके साथियों के ऊपर लगाया गया है. अभी तक तमाम कथित धर्मनिरपेक्ष लोगों के लिए, कथित साहित्यकारों के लिए, कथित प्रबुद्ध जनों के लिए, कथित समाज सेवकों के लिए आतंकवाद के पहले "मुस्लिम" शब्द बड़ा ही कष्टकारी होता था आज यही लोग पूरी ताकत से हिन्दू आतंकवाद चिल्लाते दिख रहे हैं.

फिलहाल तो ऐटीएस को सबूत तो मिल ही नहीं रहे हैं पर कुछ ब्लॉग पाठकों की पहुँच एटीएस तक जरूर है तभी एक ब्लॉग पर उसकी लिंक को एटीएस तक पहुंचाने की धमकी दी जा रही थी. इस मुद्दे पर बहुत कुछ है लिखने को पर अभी इतना ही क्यों कि ये मुद्दा यदि हिन्दुओं को सोचने को विवश कर रहा है (यदि कोई वाकई हिन्दू होने का दावा बिना किसी भय के करता है तो) और दूसरी तरफ़ कुछ फिरकापरस्त लोगों को प्रसन्न होने का अवसर भी दे रहा है. अब उनको कहने का मौका मिला है कि हिन्दू भी आतंकवादी है................पर अभी सबूत का इंतज़ार है. (सरकार चाहेगी तो मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए मकोका की तरह सबूत भी बना लेगी)

19 नवंबर 2008

ये बच्चे हिंदुस्तान के हैं.......

"मैं नहीं जानता कि दिन क्या है?
मैं नहीं जानता कि रात क्या है?
मैं ये भी नहीं जानता कि क्या सुबह, क्या शाम?
मैं नहीं जानता रात के तारे-चांदनी?
मैंने नहीं देखी सुबह की ओस?
मैं नहीं जान सका कब उगा सूरज गुलाबी रंग में
और कब ढल गया फ़िर वो गुलाबी रंग में?
मैं नहीं जानता......??????????"
नहीं जनाब ये कोई कविता नहीं..........न ही किसी कवि की कल्पना है. ये हकीकत है आज के भारत देश में टहलते उन बच्चों की जो अपने बचपन को भुला कर किसी न किसी रूप में स्वयं को मजदूर की श्रेणी में शामिल कर दे रहे हैं. सुबह की टहल के बाद किसी जगह पर चाय पीने के लिए रुके आपके कदमों की आहात के नीचे किसी बालक का बचपन दबा होता है. शाम को दिन भर की थकान मिटाने के लिए किसी फास्ट-फ़ूड की दूकान पर खड़े होकर चटपटी जायकेदार चीजों के जूठे बर्तनों के नीचे किसी का बचपन सिसक रहा होता है.
क्या यही भारत का भविष्य है????? क्या यही हमारे भावी-भाग्य-विधाता हैं?????? सोचिये. बाल मजदूरों की बढ़ती संख्या से समाज को चिंतित होना चाहिए पर ऐसा नहीं हो रहा है. सबको स्वार्थ-पूर्ति में रत देखकर लगता है कि सरकार के क़ानून बनाने से पहले हमें ख़ुद एक तरह के क़ानून को अमल में लाना होगा. हमें अपने कामों के लिए बच्चों को मजदूर के रूप में तलाश करने की आदत को त्यागना होगा. घर के किसी भी काम के लिए काम वाली बाई के साथ उसके बच्चों से काम लेने की प्रवृत्ति को छोड़ना होगा. और भी बहुत है जो हम आसानी से कर सकते हैं और वो भी बिना किसी परेशानी के.
चलिए हम सब समाज सेवा का बीडा न उठाएं, किसी गरीब के बच्चों को पढ़ने-लिखाने या उनको जिम्मेवार नागरिक बनाने की कसम न खाएं, किसी बाल-मजदूर को मुक्त करने का जोखिम न लें पर क्या इतना भी करना हमारे लिए मुश्किल है कि हम ख़ुद किसी बच्चे से काम न लें?
ये तो मुश्किल नहीं बस मन में संकल्प लें और जुट जाएँ कि आज नहीं तो कल हमारा देश, समाज बाल-मजदूर के अभिशाप से मुक्त होगा। तब हम बड़ी ही शान से कह सकेंगे.............."ये बच्चे हिन्दुस्तान के हैं, ये बच्चे अपनी शान के हैं..................................."

18 नवंबर 2008

बेटियों के लिए........

कल अपने एक रिश्ते के बड़े भाई के इलाज के सम्बन्ध में एक नर्सिंग होम में कुछ मेडिकल टेस्ट के लिए जाना पड़ा. दिल से सम्बंधित कुछ गंभीर परेशानी थी, सबके आशीर्वाद से उनको ज्यादा दिक्कत नहीं हुई (कहा जाए तो दूसरा जीवन पाया है ऐसा डाक्टर का कहना था) बहरहाल कई सारे टेस्ट के बाद जब स्थिति काबू में लगी तो शरीर को कुछ आराम की मुद्रा में लाकर वहाँ पडी सीट पर टिका दिया. कुछ इधर-उधर देखने की प्रक्रिया में नजर एक पोस्टर पर गई. उस पोस्टर पर बेटे और बेटियाँ शीर्षक से एक कविता लिखी थी.
अपना क्षेत्र कन्या भ्रूण हत्या निवारण वाला ही है इस कारण उस कविता पर विशेष गौर दिखाया। कविता पहले भी किसी से सुन रखी थी तब भी उस कविता के रचनाकार का नाम पता नहीं चल पाया था और अब कल भी कविता सामने पोस्टर के रूप में छपी होने के बाद भी उस पर उसके रचनाकार का नाम नहीं दिख रहा था.
बहरहाल कविता हमें उस समय भी बहुत मार्मिक लगी, आज भी लगी और जब तक बेटे-बेटियों का भेद समाप्त नहीं होता तब तक उस कविता की मार्मिकता समाप्त नहीं होगी. आप भी उस कविता पर एक निगाह जरूर डालियेगा. कविता के रचनाकार को साधुवाद..................
बेटे और बेटियाँ
बोए जाते हैं बेटे
और उग आतीं हैं बेटियाँ,
खाद-पानी बेटों में
और लहलाहातीं हैं बेटियाँ,
एवरेस्ट की ऊँचाइयों तक ठेले जाते हैं बेटे
और चढ़ जातीं हैं बेटियाँ,
रुलाते हैं बेटे
और रोतीं हैं बेटियाँ,
कई तरह गिरते और गिराते हैं बेटे
और संभाल लेतीं हैं बेटियाँ,
सुख के स्वप्न दिखाते हैं बेटे
जीवन का यथार्थ होतीं हैं बेटियाँ,
जीवन तो बेटों का है
और मारी जातीं हैं बेटियाँ.

सूखते जा रहे हैं सम्बन्ध

जीवन भागदौड़ का नाम है. अभी क्या काम है और अगले ही पल क्या काम निकल आए पता नहीं? अभी कल ही आए और आज फ़िर जाना पडा. ये भागदौड़ ही आदमी के जीवन का हिस्सा है. आने-जाने का ये सिलसिला इंटरव्यू से शुरू हुआ और अब शादी-विवाह के कार्यक्रमों तक जा पहुँचा. शादियों में आने-जाने का अपना ही एक मजा है. घर-परिवार के अपने बड़े-बुजुर्गों से जब उनके समय की शादियों के बारे में सुनते हैं तो लगता है की क्या वाकई लोगों के पास इतना समय होता था कि वे लोग तीन-तीन, चार-चार दिन तक बारात का आनंद उठाते रहते थे? और क्या लोगों में खातिरदारी का इतना जज्बा होता था कि इतने दिनों तक खातिरदारी करते रहते थे?

हमारे लिए तो हो सकता है कि ये बातें इतनी विस्मयकारी न हों क्योंकि किसी न किसी रूप में गाँव से घर-परिवार से बराबर संपर्क बना रहा. ये बातें उन लोगों के लिए अवश्य ही विस्मयकारी हो सकतीं हैं जिन्हों ने आज की शादियाँ देखीं हैं. बारात का आना, लड़के वालों का अपना नखरा दिखाना, किसी तरह सौदेबाजी की तरह से सभी रस्मों का निर्वहन करना...................और बस लगभग 10-12 घंटे में शादी का संपन्न हो जाना. अब ये हो गई है शादी. अब न तो पता लगता है कि कौन लड़की का चाचा है, न पता चलता है कि कौन लड़के का जीजा है, न पता चले कि कौन बुआ, कौन मौसी है.............न पता ये कि कौन साला-कौन साली है. संबंधों की अहमियत समाप्त हो जाने के कारण उनका महत्त्व ख़ुद व ख़ुद समाप्त हो गया है.

अब तो रिश्ते में मजाक का सम्बन्ध होने के बाद भी मजाक करने से डर लगता है, साली के साथ छेड़छाड़ करने से भी डर लगता है, जीजा को अपना महत्त्व दिखने से डर लगता है, साले पर राब गांठने से डर लगता है.........देखा जाए तो सभी तरह के संबंधों में एक तरह का डर सा पैदा हो गया है. इसके पीछे एक बहुत बड़ा कारण शादी-विवाह को भी व्यावसायिक रूप से संपन्न किया जाना है. लेन-देन के कारण अब आत्मीयता ही नहीं आ पाती है. एक-एक रस्म, एक-एक काम का पहले से ही हिसाब तय कर दिया जाता है. ये तक तय हो जाता है कि किस सम्बन्धी का स्वागत किस तरह और कौन करेगा. क्या इस तरह से आपस में आत्मीयता रह सकती है?

(आप लोग ये न समझियेगा कि एकाएक इंटरव्यू से लौटने के बाद आध्यात्म जाग गया है..........दरअसल एक शादी के बारे में पता चला और उसके परिणाम के बारे में भी पता चला. जहाँ शादी के मात्र तीन माह बाद ही पति-पत्नी में तलाक की प्रक्रिया अपनायी जाने लगी. तब लगा कि ये संबंधों का ही ह्रास है कि जन्म-जन्मान्तर के संबंधों की स्थापना करने वाला देश अब लिव-इन-रिलेशन जैसे संबंधों की वकालत कर रहा है. )

15 नवंबर 2008

आ गए है बापस

सभी ब्लॉग-मित्रों को नमस्कार. अपनी 100 वीं पोस्ट के तुंरत बाद ही पारिवारिक वैवाहिक कार्यक्रम में व्यस्त हो गए. दो दिन बाद ही फुर्सत पाये तो एक डाक मिली जिसके द्वारा मालूम पडा कि हमें एक इंटरव्यू देने जाना है.......14 नवम्बर को. महत्वपूर्ण इंटरव्यू था इस कारण पूरी तैयारी से जुट गए. ब्लॉग बंद कर दिया, मेल देखनी बंद कर दी, पोस्ट पर जाकर टिप्पणी करनी बंद कर दी................अब आप सबके बीच आज ही इंटरव्यू देकर लौटे हैं. विगत 10-15 दिनों का कोटा जल्दी ही पूरा होगा.
इंटरव्यू अच्छा हुआ पर जैसा कि हर जगह का हाल है यहाँ ही वही हाल था. परिणाम जो होगा आपको बताएँगे..........अभी बस इतना ही..........शेष कल से. तब तक सबको अच्छे फल प्राप्ति के लिए शुभकामनायें.

01 नवंबर 2008

सौंवीं पोस्ट, मेरी प्रिय कविता

नमस्कार, आप सबके सामने अपनी सौंवीं पोस्ट ला रहे हैं। चूंकि देश में बहुत सारे विषयों पर चर्चा है करने को पर पिछली पचासवीं पोस्ट की तरह किसी दुखद घटना को सामने नहीं लाना चाह रहे हैं इस कारण आप सबके सामने अपनी लिखी अनेक कविताओं में से सबसे प्रिय कविता रख रहे हैं। आप भी उसका रसास्वादन करिए और उस संसार में विचरण कर आइये जहाँ से आने के बाद लाख कोशिशों के बाद कोई भी नहीं जा सकता।
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हर बात सुहानी लगती थी, उस प्यारे से बचपन में।
हम मौज मस्त में डूबे थे उस प्यारे से बचपन में॥
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वो प्यारे संगी साथी सारे, वे गाँव की धूल भरी गलियां।
ओढ़ के चादर अल्ल्हड़ता की, गलिओं में दौड़ा करते थे।।
खेतों की वो हरियाली से, मन का मतवाला हो जाना।
वो बाग़ बगीचों की मस्ती, पेड़ों पर झूला करते थे॥
सुहानी भोर की प्यारी धुन, ढलती शाम का मस्त समां।
सब कुछ अलबेला लगता था, उस प्यारे से बचपन में॥
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सावन के बलखाते झूलों से, उड़ करके नभ को छू लेना।
काले बादल की रिमझिम में, मस्ती में भीगा करते थे॥
थक करके जब भी आयें हम, माँ के आँचल की छाँव मिले।
दादी से किस्से सुन-सुन कर, सपनों में उड़ते रहते थे॥
पंछी की तरह से उड़ जाना, बहती नदिया जैसा बहना।
सब कुछ कितना मासूम सा था, उस प्यारे से बचपन में॥
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जीवन के तंग झमेलों में फंस, भूले बचपन की मुस्कानें।
न दौड़ सके फ़िर बागों में, फ़िर बारिश में न भीग सके॥
रुपया, पैसा, रोटी, कपड़ा, इस चक्रव्यूह में उलझ गए।
बचपन रूठा, घर भी छूटा, माँ के आँचल में फ़िर सो न सके॥
याद सुहाने बचपन की अब, इस दिल को धड़का देती है।
सिरहन सी मचती है तन में, मन को चंचल कर जाती है।।
थके हुए इस टूटे दिल की, अब तो इतनी ख्वाहिश है।
ले जाए फ़िर से कोई हमें, उस प्यारे से बचपन में॥