31 मई 2008

वैमनश्यता का वातावरण अब नहीं टिकने वाला।

आज एक समाचार ने सुखद एहसास कराया, वो यह कि देश की राजधानी में हजारों की तादाद में मुस्लिम भाइयों ने एक साथ जुट कर आतंकवाद के खिलाफ विगुल फूंका। सुखद इस कारण नहीं कि मुस्लमान एक साथ आए (क्योंकि मीडिया ने ये भ्रांति फैला रखी है कि समाज मुसलमानों को आतंकवादी मानता है) खुशी इस बात पर हुई कि अब आतंकवादी किसी भोले भले मुस्लमान को मजहब के नाम पर हिंसा की ओर नहीं ले जा सकेंगे।

आतंकवाद का सबसे बड़ा हथियार किसी भी वर्ग का उसको मदद करना ही होता है, चाहे वो उसको किसी भी रूप में मिले। मजहब, कुरान, अल्लाह का नाम लेकर खून खराबा करते लोगों को भी अब समझ में आ जाएगा कि उनके द्वारा फैलाया जा रहा वैमनश्यता का वातावरण अब नहीं टिकने वाला।

28 मई 2008

बधाई हो, मंगल पर पहुँचने की?

बधाई हो, मंगल ग्रह पर आदमी की पहुँच के लिए। संसार के तमाम सारे वैज्ञानिकों के लिए ये बड़ी ही खुशी का दिन होगा? होना भी चाहिए, आख़िर अरबों, खरबों डॉलर लगा कर मंगल की धरती को छीने का सौभाग्य मिला है। भले ही ये सौभाग्य किसी मशीन के सहारे से मिला हो पर मिला तो सही। वैसे भी आदमी की ज़िंदगी मशीन से क्या कम है? चलने, फिरने, खाने, पीने, हंसने आदि के लिए मशीन की जरूरत आम हो गई है।

फिलहाल मुद्दे से भटकने की जरूरत नहीं है, बात हो रही है मंगल को छू लेने की। सवाल ये उठता है कि हम क्या हासिल करेंगे मंगल को खंगाल कर? ये तो साफ दिख रहा है कि वहाँ वर्तमान में पानी या किसी प्रकार का जीवन नहीं दिखाई दे रहा है। ऐसी स्थिति में वहाँ की धूल फांकने से क्या हासिल होगा? जहाँ तक बात मंगल पर आदमी को बसाने की है तो ये इतना आसन काम नहीं है। एक रोकेट को भेजने में कितना खर्च आता है ये सभी को मालूम है, तब बिना वजह परेशां होकर इधर उधर भटकने से क्या मिलेगा?

हाँ, इस मंगल के अभियान से एक बात तो सीखी जा सकती है और वो ये कि हम अभी भी न चेते तो हमारी धरती का भी वही हाल होगा जो मंगल का दिख रहा है, धूल ही धूल बस धूल ही धूल। यहाँ वैज्ञानिकों को सोचना होगा कि ऐसा तो नहीं कि मंगल पर कभी जीवन रहा हो, जैसा वहाँ कि जमीन की स्थिति को देख कर लग रहा है, और धरती के आदमियों की तरह वे उसे बर्बाद कर ख़ुद भी समाप्त हो गए हों? आख़िर मंगल की सतह पर दिखते नदियों, झीलों के निशान क्या साबित कर रहे हैं?

हम मंगल, चाँद पर जाने की सोचने के स्थान पर धरती को हरा भरा बनने का प्रयास करें। आदमी को किसी और जगह बसाने के स्थान पर धरती पर ही थोड़ी सी जगह दे दे, लाखों लाख धन को बर्बाद करने के स्थान पर आदमी के स्वास्थ्य को सुधारने में लगाएं तो मानव का कुछ भला होगा।

पर पता है काली खोपडी वाला आदमी इतनी आसानी से नहीं मानने वाला, जब धरती पर भी धूल ही धूल दिखेगी, पानी, नदियों, झीलों के बस निशान ही रहेंगे तब हम सब चिल्ला चिल्ला कर कहेंगे बधाई हो, मंगल पर पहुँचने की।

25 मई 2008

इतनी परेशानी क्यों?

मेरे ब्लॉग पर स्त्री विमर्श विमर्श के पीछे क्या छिपा है के बाद नारी शक्ति को बहुत बुरा लगा. किस बात का बुरा लगा, क्या जो लिखा गया वो झूठ है? स्त्री विमर्श के नाम पर चल रहा गोरखधंधा क्या है ये समझने की जरूरत है. आख़िर ये तय किया जाए कि स्त्री विमर्श है क्या? ये सही है कि इस विमर्श को लेकर पुरूष को परेशान होने की जरूरत नहीं, पर क्या ये सत्य नहीं कि स्त्री विमर्श के नाम पर समाज में स्त्री-पुरूष के बीच खाई को पैदा किया जा रहा है?
पहली बात ये कि विमर्श किस बात का? महिला को घर की नौकर समझने का या किसी नारी को तरक्की करने का? किसी भी स्थिति में नारी को घर पर काम करने वाला समझना नितांत ग़लत है. यदि कोई महिला परिवार की सेवा करती है, उसका मतलब ये नहीं की वो कामगार है. परिवार को, बच्चों की देखभाल अपने आप में एक बड़ी जिम्मेवारी होती है, इस बात को पुरूष समाज आसानी से नहीं समझ सकता. पर आज विमर्श के नाम पर स्त्री-पुरूष को आपस में लड़ाने का काम किया जा रहा है.
कुछ भी हो स्त्री विमर्श की वास्तविकता बताने पर उन्ही नारियों को ज्यादा कष्ट होता है जो किसी न किसी रूप में विमर्श के नाम पर अपना झंडा बुलंद करना चाहती हैं. इन स्त्री विमर्श वकालातियों से एक ही सवाल की क्या वे अपनी पुत्री के लिए उसी तरह का संसार चाहती हैं जिसकी वकालत वे दूसरी नारियों के लिए करती हैं?

24 मई 2008

स्त्री विमर्श के पीछे

भूमन्दलीकरण के इस दौर में जब समाज में स्त्री विमर्श की चर्चा की जाती है तो स्त्री विमर्श की वास्तविकता और कल्पना के मध्य बारीक सी रेखा विश्व स्तर पर दिखाई देती है. इसी बारीक अन्तर के मध्य चार घटनाओं को स्त्री विमर्श के साथ रेखांकित किया जाना भी अनिवार्य प्रतीत होता है. सन् १७८९ की फ्रांसीसी क्रांति जिसने समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व के नैसर्गिक अधिकारों को लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के रूप मे प्रतिष्ठित किया. सन् १८२९ का राजा राममोहन राय का सती प्रथा विरोधी कानून जिसने स्त्री को मानव के रूप में स्वीकारा. तीसरी यह कि सन् १८४८ में ग्रिम्के बहिनों ने तीन सौ स्त्री पुरुषों की सभा के द्वारा नारी दासता को चुनौती देकर स्त्री विमर्श की आधारशिला रखी और चौथी घटना सन् १८६७ में स्टुअर्ट मिल द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट में स्त्री के वयस्क मताधिकार का प्रस्ताव रखा जिसने स्त्री को भी मिलने वाले कानूनी और संवैधानिक अधिकारों को बल दिया. इन घटनाओं में ध्यान देने योग्य यह है की पूर्व हो या पश्चिम, स्त्री विमर्श की सैधांतिक आधारशिला पुरुषों द्वारा ही तैयार की गई जिस पर आधुनिक स्त्रियों द्वारा स्त्री विमर्श को आन्दोलन बना कर नारी स्वरूप को विकृत करने का प्रयास किया जा रहा है.
स्त्रियों ने अपनी स्थिति को सुद्रण किया, स्वयं को शिक्षा, राजनैतिक अधिकारों, संवैधानिक अधिकारों से परिचित करवाया तो इसी शक्ति का प्रयोग उसने स्वयं को संस्कारों, परिवारों से मुक्त कर देने में किया. यह विडम्बना है कि आज की नारी स्त्री विमर्श की, स्त्री शक्ति की सफलता इस बात पर मानती है की वह एक साथ कितने पुरुषों की शारीरिक शक्ति का परीक्षण कर सकती है. वह सोचती है की पुरूष वेश्यालय कब बनेंगे. आज स्वतंत्र घोषित कर चुकी नारी की चाह अपने परिवार की लडकी का भविष्य बनाने में नहीं वरन यह ध्यान देने में है कि कहीं असुरक्षित यौन संबंधों से वह एड्स का शिकार न हो जाए. वह परिवार में रह कर पिता, पति, पुत्र के रूप में अपना शासक पाकर स्वयं को शोषित समझती है किंतु वह इस बात में संतुष्टि पाती है की वह अविवाहित रह कर प्रत्येक रात कितने अलग अलग पुरुषों का भोग कर सकती है, अपने मांसल शरीर के पीछे नचा सकती है.
शारीरिक – मानसिक और भावनात्मक रूप से स्त्री शक्ति की पहरुआ नारियों ने स्त्री विमर्श को स्त्री स्वतंत्रता को नारी देह के आसपास केंद्रित कर दिया है. पुरूष वर्ग के विरोध में खड़ी नारी शक्ति स्वयं को नारी हांथों में खेलता देख रही है. यदि कुछ वास्तविकताओं को ध्यान में रखा जाए तो महिलाओं को मिलते अधिकार, शिशु प्रजनन अधिनियम, अपनी मर्जी से परिवार को सीमित रखने का अधिकार, तलाकशुदा नारी को बच्चा पाने का कानूनी अधिकार आदि महिलाओं के यौन प्रस्तुतीकरण से सम्भव नहीं हुआ है. गे-कल्चर, स्पर्म बैंक, सरोगेत मदर्स, ह्यूमन क्लोनिंग की संभावनाओं ने स्त्रियों की आजादी को नया आयाम दिया है तो उसे भयाक्रांत भी किया है. टी वी की सेत्युलैद चमक और परदे की रंगीनियाँ स्त्री को आजादी की राह का सपना तो दिखा सकती हैं पर आजादी नहीं दिला सकती है. तभी तो अपने उत्पाद को बेचने के लिए निर्माता वर्ग किसी नग्न महिला को ही चुनता है.कम से कमतर होते जा रहे वस्त्रों ने नारी वर्ग को उत्पाद सिद्ध किया है. स्त्री विमर्श के नाम पर देह को परोसा जा रहा है. पुरूष निर्मित आधार तल पर खड़े होकर, स्वयं को उत्पाद बना कर, देह को आधार बना कर स्त्री विमर्श, नारी मुक्ति की चर्चा करमा भी बेमानी सा लगता है. स्त्री विमर्श की आड़ में नारी को सपना दिखा रही नारी जात को विचार करना होगा की स्त्री अपनी मुक्ति चाहती है तो क्या पुरूष वर्ग के विरोधी के रूप में? यहाँ विचार करना होगा की बाजारवाद के इस दौर में स्वयं को वस्तु सिद्ध करती नारी किस स्वतंत्रता की बात करना चाह रही है?
( साहित्यिक पत्रिका ‘कथा क्रम’ अप्रैल-जून २००८ में प्रकाशित लेख “स्त्री विमर्श के पीछे क्या छिपा है?” का अंश। पूरे लेख के लिए देखें http://www.kathakram.in/)

16 मई 2008

बुंदेलखंड की यात्रा

ओरछा
बुंदेलखंड का दर्शनीय स्थल है। यहाँ के लाला की अपनी एक महान गाथा है। आन, बान, शान के लिए कैसे जिया जाता है, कैसे मरा जाता है कोई लाला हरदोल से सीखे। बुंदेलखंड के पानीदार पानी की एक नहीं अनेक कहानियाँ हैं जो आज भी एक मिसाल हैं।










विकास के नाम पर विनाश की दौड़

धरती को विनाश की कगार पर पहुचाने के बाद भी हम किसी दूसरे ग्रह पर जीवन की तलाश मे माथापच्ची करते दिख रहे हैं. विकसित देशों की नक़ल करके भारत के वैज्ञानिक भी चाँद और मंगल की और भागने की कोशिश कर रहे हैं. यह क्या विकास की दौड़ है भारतीयों की? अपने को अभी खाने को पर्याप्त रोटी नहीं मिल पा रही है, बीमारों को उचित इलाज नहीं मिल पा रहा है, बच्चों को सही शिक्षा नहीं मिल पा रही है, आम आदमी को सुरक्षा नहीं मिल पा रही है और हम हैं कि चाँद की तरफ दौड़ रहे हैं. आख़िर ये दौड़ किसके लिए? चाँद पर जीवन की तलाश किसके लिए? विकास से लेकर विनाश तक की दौड़ उनके लिए है जो संतृप्त हैं, हम अभी अपने अस्तित्व को तलाश रहे हैं. विकास के नाम पर विनाश की इस दौड़ से हमे कुछ भी हासिल होने वाला नहीं….सिवाय पछताने के.

14 मई 2008

शाबास तुम बम फोड़ते रहो हम मरने को तैयार हैं

पिंक सिटी कुछ स्वार्थी लोगों के कारण लाल हो गई. तमाम लोग परिवार को रोता बिलखता छोड़ कर चले गए. किसे कहा जाएगा इसका जिम्मेवार? कोई दोष देता है नेताओं को, कोई दोष देता है पुलिस को, कोई दोष देता है पड़ोसी देशों की पोलिसी को. आख़िर कोई भी हो पर जिम्मेवार तो है, क्या सोचा है कहीं हम ही तो नहीं?
देश चलाने वाले नेताओं को चुनता कौन है? हम…
जाति धर्मं पर लड़ने को तैयार होता कौन है? हम…..
देश की तरक्की सोचे बिना बहाता कौन है? हम….
तो सोचो जिम्मेवार कौन?
सरकारें तो हर दुर्घटना के बाद देश मे कला अध्याय जुड़ गया कह कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती हैं. इंदिरा गांधी की हत्या हुई तब काला अध्याय जुड़ गया, राजीव गाँधी की हत्या हुई तब काला अध्याय जुड़ गया, जब बाबरी मस्जिद गिरी तब काला अध्याय जुड़ गया , गुजरात दंगे हुए तब काला अध्याय जुड़ गया, संसद पर हमला हुआ तब काला अध्याय जुड़ गया, अयोध्या, अक्षरधाम आदि मंदिरों पर धमाके हुए तब काला अध्याय जुड़ गया ….कितने काले अध्याय जुड़ते रहेंगे देश के साथ. क्या इनका कोई हल होगा या आतंकी बम फोड़ते रहेंगे और हमारी सरकारें काले अध्याय जोड़ कर अगले हमले का इंतजार करती रहेंगी.
शाबास तुम बम फोड़ते रहो हम मरने को तैयार हैं।

04 मई 2008

दलित विमर्श को समझने की जरूरत है

साहित्य में समाज की तरह दलित विमर्श को विशेष महत्त्व दिया जा रहा है। देखा जाए तो दलित विमर्श को अभी भी सही अर्थों में समझा नहीं गया है। दलित विमर्श के नाम पर कुछ भी लिख देना विमर्श नहीं है। साहित्यकार को ये विचार करना होगा की उसके द्वारा लिखा गया सारा समाज देखता है। दलित साहित्यकार दलित विमर्श को स्वानुभूती सहानुभूति के नाम देकर विमर्श की वास्तविक धार को मोथरा कर रहे हैं। अपने समाज का मसीहा मानने वाले महात्मा बुद्ध को क्या वे स्वानुभूती या समनुभुती अथवा सहानुभूति के द्वारा अपना रहे हैं? महात्मा बुद्ध तो एक राजपरिवार के सदस्य थे उनहोंने न तो दुःख देखा था न ही किसी तरह का कष्ट सहा था फ़िर दलितों के लिए निकली उनकी आह को दलित अपना क्यों मानते हैं? दलित विमर्श के बारे में यदि गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो यह अपनी धार खो देगा।