30 सितंबर 2008

कविता संग्रह ब्लॉग पर

बहुत दिनों से सोच रहे थे की अपने कविता संग्रह को ब्लॉग-मित्रों के पढने के लिए लाया जाए. कई बार कोशिश की किंतु कुछ आलस और कुछ दूसरे कामों के कारण मौका नहीं लग सका या कहें कि मौका निकाल नहीं सके. अब बहुत कोशिशों के बाद अपने कविता संग्रह "हर शब्द कुछ कहता है" को आप सबके सामने ला रहे हैं. हालांकि ये प्रयास अभी भी अधूरा ही कहा जायेगा क्योंकि अभी संग्रह की सभी कविताओं को एक साथ ब्लॉग पर प्रकाशित नहीं किया जा सका है. अपनी तमाम सारी व्यस्तताओं के बीच कविताओं को नित्य ही पोस्ट करने की कोशिश होगी ताकि आप साहित्य प्रेमियों को किसी तरह का अवरोध जैसा न लगे।

कविता लेखन में पारंगत नहीं हैं बस एक प्रयास भर है, कैसा है इसका आकलन पुस्तक-पाठक कर चुके हैं अब आप ब्लॉग-पाठकों की बारी है. अच्छी से अधिक इसकी कमियों पर ध्यान दिलाईयेगा जिससे आगामी संकलनों में इन गलतियों को सुधारा जा सके. इस संकलन "हर शब्द कुछ कहता है" की कवितायें एक-एक करके प्रकाशित करेंगे, आप पढिये, आनंद लीजिये और यदी कमी दिखे तो जरूर बताइए. शेष आप लोगों के सामने है...........

29 सितंबर 2008

राजनीतिक आतंकवाद

पिछले कई माह देश के लिए बम के धमाके लाते रहे. हरेक धमाकों में लोग मरते रहे और राजनीति जिन्दा होती रही. हर धमाके के बाद पुलिस, जांच संगठन, सरकारें, मंत्री आदि बड़ी तेजी दिखाते नजर आए. लगा कि एक झटके में आतंक फैलाने वाले पकड़ लिए जायेंगे पर जब तक किसी तरह की सफलता मिलती तब तक एक और धमाका हो जाता. धमाकों पर धमाके और बयान पर बयान, आतंक और राजनीति एक साथ चलती रही। समझ नहीं आ रहा था कि जैसे आतंकवाद से राजनीति हो रही है या फ़िर राजनीति के कारण ये आतंकवाद फ़ैल रहा है।

कुछ भी हो पर नेताओं ने अपने-अपने स्तर पर अपनी जानकारी देनी शुरू कर दी. किसी को लग रहा था कि पकिस्तान का हाथ है, कोई कह रहा था कि सिमी अपना जाल फैला रहा है किसी का कहना था कि इस संगठन पर प्रतिबन्ध सही है तो कोई कह रहा था कि यदि सिमी पर प्रतिबन्ध है तो बजरंग दल पर भी प्रतिबन्ध होना चाहिए. जितने मुंह उतनी बातें, अब सबका ध्यान इस तरफ़ था कि किस दल पर क्यों और किस तरह का प्रतिबन्ध लगे? अब जांच बंद हो गई, सुरक्षा का बंदोबस्त ढीला कर दिया गया. बस आतंकियों को मौका मिला और फ़िर धमाका.............

अब फ़िर शुरू हुई जांच, बयानवाजी, प्रतिबन्ध की बातें बगैरह-बगैरह........... इन सबके बीच कभी मन में आता है कि कौन सफल रहा "आतंकी" जो धमाके करके दहशत फैला रहे हैं या फ़िर "राजनेता" जो इसी दहशत का लाभ उठा कर भेदभाव को और हवा दे रहे हैं?

सुरक्षा व्यवस्था तो सफल है ही नहीं पर सोचना होगा कि कौन सफल है आतंकवाद या राजनीति?

जाने चले जाते हैं कहाँ?

जाने वाले जाने चले जाते हैं कहाँ? ये पंक्तियाँ किसी गाने की हैं पर आज भी हमारे किसी खास के कहीं दूर चले जाने पर मन के किसी कोने में गूंजती रहतीं हैं. देश के दो दिग्गज अपनी जीवन-यात्रा को पूरा कर हमारे बीच से चले गए और हमें ख़बर तक नहीं हो सकी. क्या हम संवेदना-शून्य हो गए हैं या फ़िर हमने अपनी संकुचित दुनिया से बाहर देखना छोड़ दिया है? ये भी हो सकता है कि मीडिया के सहारे बैठे हम लोगों को अपने क्षेत्र से बाहर की ख़बर तब तक नहीं मिलती है और मीडिया कभी-कभी कुछ ख़बरों को आम समझ कर छोड़ देता है।
यदि देखें तो अपने-अपने क्षेत्र के इन दो व्यक्तित्वों में भुलाने जैसी कोई बात नहीं है. इनमें एक हैं साहित्य-जगत का जाना-माना नाम प्रभा खेतान का और दूसरे हैं गायकी में अपना अहम् मुकाम बनाने वाले महेंद्र कपूर. मेरे विचार से महेंद्र कपूर को तो सभी जानते होंगे क्योंकि उन्हों ने अपने मधुर गीतों के द्वारा अपनी अलग पहचान बनाई. 'मेरे देश की धरती' हो या फ़िर 'नीले गगन के तले' या फ़िर और भी दूसरे गीत सभी के सहारे महेंद्र कपूर ने अपनी अलग जगह बनाई. इसके ठीक उलट प्रभा खेतान को साहित्य से जुड़े लोग ही जानते होंगे, इसमें भी थोड़ा शक इस बात का है कि जो तथाकथित लेखक बन गए हैं वे भी इस नाम से अनजान होंगे. यदि नाम सुना भी होगा तो उनको मालूम नहीं नहीं होगा कि प्रभा जी का साहित्य को क्या योगदान है?

यहाँ मेरा मकसद प्रभा जी के साहित्यिक योगदान की चर्चा करना नहीं है वरन ये बताना है कि एक ऐसे व्यक्तित्व को जिसने नारी-अस्मिता के लिए सकारात्मक लड़ाई लदी, स्त्री-विमर्श के क्षेत्र में सीमोन दा बोउआर के नाम की अलख जगा कर पुरूष समाज को कोसा जाता है, उन सीमोन की प्रसिद्द पुस्तक The Second Sex का हिन्दी अनुवाद "स्त्री उपेक्षिता" प्रभा खेतान ने ही किया था. और भी बहुत कुछ है बताने को इनके बारे में पर अभी नहीं................. मीडिया की नजरों में शायद इन दोनों लोगों की अहमियत कुछ कम थी या कहें कि थी ही नहीं इस कारण महेंद्र कपूर को तो समाचारों में स्थान मिला पर प्रभा जी इससे अछूती रह गईं।

फिलहाल मीडिया तो ग़लती करता ही रहेगा कारण टी आर पी का सवाल है पर हम सब जो प्रभा खेतान के नाम से परिचित हैं, महेंद्र कपूर की आवाज़ से मोहित हैं, इन दोनों शख्सियतों को श्रद्धांजलि देते हैं.

28 सितंबर 2008

रिश्तों की गरिमा

आज लगभग एक सप्ताह के बाद ब्लॉग दुनिया में लौटना हो पाया. इधर कुछ नितांत निजी कार्यों में इतना उलझ गए कि कंप्यूटर के दर्शन ही न हो सके और इसी कारण से ब्लॉग दुनिया से भी दूरी बनी रही. इस बीच बहुत कुछ ऐसा भी हुआ कि सोचते ही रहे कि कुछ न कुछ लिख दिया जाए पर व्यस्तताओं ने ऐसा करने नहीं दिया।
बहरहाल अब लौटे हैं तो कुछ कहने के लिए ही............... एक दो घटनाओं ने मन को थोड़ा विचलित किया और लगा कि क्या अब समाज में रिश्तों का कोई मोल नहीं बचा है? रिश्तों की गरिमा इस कदर ख़तम होती जा रही है कि अब भाई-भाई एक दूसरे का दुश्मन है, बाप-बेटे में रंजिश का माहौल है, माँ-बेटे के बीच तना-तनी है, बहिन-भाई के बीच रिश्तों की पवित्रता संदेहास्पद हो गई है. इसे हो सकता है कि कुछ लोग मेरे मन की बयानवाजी कहें पर आँखें खोल कर जब हम समाज में देखते हैं तो हमें परदे के पीछे छिपे ऐसे कई शैतान नजर आ जाते हैं जो रिश्तों को खोखला करने में लगे हैं।
इन्ही सब के बीच याद आ गई फ़िल्म "रंग दे वसंती", वैसे आप कहेंगे कि इस फ़िल्म में रिश्तों के सन्दर्भ में ऐसा क्या खास था. यहाँ फ़िल्म कि कहानी उतनी महत्ता नहीं रखती जितनी कि उसके भीतर छिपी एक और कहानी की महत्ता है. नौजवानों को लेकर रची-बसी इस फ़िल्म में भ्रष्टाचार से निपटने के अपने तरीके को दर्शाया गया है, यहाँ ये विचारणीय नहीं है. यदि इसके दूसरे पहलू को ध्यान दिया जाए तो ज्ञात होगा कि एक ऐसा संदेश जो शायद फ़िल्म निर्माता, कहानीकार या निर्देशक ने भी ध्यान में नहीं रखा होगा.....और वो है उन सारे दोस्तों का एक साथ मिल कर काम करना.
अपने दोस्त की मौत का बदला लेने का उन लड़कों का तरीका ग़लत हो सकता है पर ये जानते हुए कि इसका अंत जेल है (मौत भी हो सकता है) सभी दोस्तों ने एक साथ मिल कर घटना को अंजाम दिया. वैसे सभी के नजरिये अपने-अपने होते हैं और इनके बीच अपनी-अपनी सोच भी होती है. हो सकता है कि हमारी इस सोच से इत्तेफाक रखने वाले कम हों पर आज जब कि रिश्तों में खटास बुरी तरह आ गई हो उस समय इस तरह के कुछ चित्र (फिल्मों के अलावा दैनिक जीवन में भी मिल जाते हैं) आशान्वित करते हैं कि ऐसे लोग ही रिश्तों को ज़िंदा बनाए रखेंगे।
अभी इतना ही, कुछ व्यस्तता कम हुई है हो सका तो कल फ़िर मिलेंगे.

22 सितंबर 2008

ये देश है वीर जवानों (दंगा फसादों) का

एक गीत देश में होने वाली हर शादी में बजता दीखता है "ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का....." क्यों बजता है इस पर चर्चा नहीं कर रहे हैं. बहुत साल पहले इसी गीत की तर्ज़ पर देश के नेताओं पर एक गीत लिखा था, अज के हालातों ने फ़िर पुरानी डायरी पलट कर वही गीत आप लोगों के सामने रखने को मजबूर किया. आइये आप लोग भी "ये देश है वीर जवानों का..." की धुन के साथ नेताओं के गीत का आनंद उठायें.

ये देश है दंगा, फसादों का,
घोटालों का, बेईमानों का,
इस देश का नेता.....ओये...
इस देश का नेता शातिर है,
बस जीता अपनी खातिर है।
ओ॥ओ...ओ॥ओ..ओ....

कहीं शोर मचा है मन्दिर का,
कहीं गूँज उठी है मस्जिद की,
कहीं तड-तड गोली....
कहीं तड-तड गोली चलतीं हैं,
बस खून की नदियाँ बहतीं हैं।

कुर्सी ही इनका सपना है,
अरे देश कौन सा अपना है,
चाहे देश हमारा..... ओये
चाहे देश हमारा मिट जाए,
पर कुर्सी इनको मिल जाए।

ओ...ओ...ओ...ओ...ओ....

ये देश है दंगा फसादों का,
घोटालों का...........

(बुरा न लगे किसी को और गाओ ये देश था वीर जवानों का.......ये देश है वीर जवानों का........ये देश रहेगा वीर जवानों का......)

20 सितंबर 2008

कब तक चलेगा ये सब?

फ़िर धमाके, फ़िर मौतें.......................उफ़....क्या कहें? क्या लिखें?.............कितनी बार वही सब लिखें?..........हर बार किसी को आरोपी बताया जाएगा......किसी के बहाने किसी और को ताना दिया जाएगा........किसी की मौत पर कोई रोटी सकेगा.......किसी को वोट बैंक खिसकता दिखेगा........कोई किसी पर निशाना साधेगा..........कोई अपनों के जाने के ग़म में रोयेगा......कोई आतंक के सफल होने पर हंसेगा..............और हम?..........हम सब किसी के आंसू......किसी के दुःख..........किसी की मौत पर कुछ लिखने का रास्ता तलाशेंगे।
क्या वाकई हम सब लोगों के दुःख में लिखते रहने का ही काम करेंगे? हम जब तक दवाब बनाने का काम नहीं करेंगे तब तक वोट बैंक, तुष्टिकरण, क्षेत्रवाद, जातिवाद आदि-आदि के कारण ये दर्द भारी घटनाएँ सामने आती ही रहेंगी.
बहरहाल बिना कुछ कहे आतंकी घटनाओं के शिकार लोगों को विनम्र श्रद्धांजलि.

16 सितंबर 2008

इप्टा उरई ब्लॉग पर

सभी को नमस्कार सहित ये जानकारी कि ब्लॉग परिवार में एक सदस्य को और बढ़ा दिया है. इधर कई दिनों से ब्लॉग पर आना नहीं हो सका, लग रहा था कि कुछ खाली-खाली सा है. इस बीच अपने शहर की रंगमंच की, विचार क्रांति की संस्था इप्टा (भारतीय जन नाट्य संघ, Indian People's Theatre Assocoation) के महासचिव राज पप्पन जी से मिलना हुआ (वैसे वे हमारे पारिवारिक सदस्य ही हैं) बातों-बातों में उनको ब्लॉग की खूबियाँ बता कर इस तरफ़ प्रेरित किया. परिणाम आज ही नज़र आया। अभी-अभी उनको ब्लॉग पर उतार कर आपसे मिलने आया.

राज पप्पन जी ने ये ब्लॉग अभी इप्टा उरई के नाम से बनाया है, जिसमें वे शहर में होने वाली इप्टा की गतिविधियों को लाया करेंगे. यदि बाद में जरूरी हुआ तो वे अपने ब्लॉग के साथ भी आयेंगे. फिलहाल आज तो उन्हों ने कुछ पोस्ट नहीं किया है पर हमने शहर में इप्टा की गतिविधियों को बहुत पास से देखा है, आपको जल्दी-जल्दी कुछ अच्छा देखने को मिलता रहेगा. आप लोग इस ब्लॉग पर http://iptaorai.blogspot.com/ के रास्ते से प्रवेश कर सकते हैं.

11 सितंबर 2008

पहले सामजिक स्थिति को सुधारना होगा

आज दो-तीन दिन बाद ब्लॉग पर लौटना हुआ. इधर कुछ अजीब तरह की व्यस्तता रही. इसी बीच कुछ काम मिला लोगों से मिलने-जुलने का, वो भी अजीब से विषय को लेकर. सरगर्मी हर तरफ़ छाई रही कि दस तारीख को वैज्ञानिक परीक्षणों के कारण प्रलय आने वाली है, सारी धरती नष्ट हो जायेगी. अपनी सामाजिक शोध संस्था "समाज अध्ययन केन्द्र" (SOCIETY STUDY CENTRE) के द्वारा एक छोटा सा सर्वे करने में लग गए. आश्चर्य तो तब हुआ कि पढ़े-लिखे समाज में आज भी ऎसी बातों पर जयादा ध्यान दिया जाता है जिनका कोई भी सर-पैर नहीं होता है। इससे अधिक आश्चर्य की बात तो ये है कि एक ओर तो हम पढ़े-लिखे होने का दम भरते हैं और दूसरी तरफ़ किसी भी आपदा से बचने के लिए उपाय न करके पूजा-अर्चना या फ़िर ज्योतिष के चक्कर में पड़ जाते हैं.

इस वैज्ञानिक घटना को लेकर भी यही सब होता रहा. लोगों में भय रहा और पंडितों-पुरोहितों ने नक्षत्रों का भय दिखा कर अपना उल्लू सीधा किया. यहाँ पंडितों को बढावा देने का काम हमारे तेज-तर्रार मीडिया ने भी किया. समाचार-पत्रों में ख़बरों के अनुसार एक-दो स्थानों पर बच्चों ने डर के कारण आत्महत्या कर ली. मीडिया ने यह दिखाने के कि वैज्ञानिकों के परीक्षण के क्या परिणाम होंगे यह दिखाने में अधिक दिलचस्पी दिखाई कि धरती किस समय नष्ट होगी, कैसे नष्ट होगी?

इस तरह के वैज्ञानिक परीक्षण क्या सिद्ध करेंगे ये तो वैज्ञानिक ही बता पाएंगे पर जहाँ तक व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि भारत जैसे देशों को अभी कई वर्षों तक ऐसे परीक्षणों से दूर रहने की जरूरत है. बताया जा रहा है कि इस परीक्षण में भारत ने भी चार करोड़ डालर की धनराशी खर्च की है. यदि एक पल को मान लिया जाए कि इस महाप्रयोग से ज्ञात हो जाएगा कि धरती का जन्म कैसे हुआ, किस तरह अन्य चीजों का विकास हुआ तो उससे किस तरह की तरक्की हो सकती है? एक ऐसे देश में जहाँ अभी भी एक बड़ी आबादी खाने-पीने की समस्या से जूझ रही है, एक बहुत बड़ा भाग अपनी आजीविका के लिए भाग-दौड़ कर रहा है, एक बहुत बड़ा भाग बीमारियों से लड़ रहा है, पोलियो, एड्स, कैंसर आदि जैसी अनेकानेक बीमारियाँ प्रतिदिन जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा समाप्त कर रहीं हो वहाँ इस तरह के प्रयोग पर करोड़ों डालर की रकम खर्च कर देना मेरी दृष्टि में उपयोगी नहीं है।

यदि हम अपने देश की स्थिति पर नजर डालें तो पता चलेगा कि जितना भाग स्वस्थ लोगों का है उससे अधिक बड़ा भाग विकलांगों, परेशानो, बीमारों, भ्रष्टाचारियों, घूसखोरों आदि का है पहले सरकार इस तरफ़ ध्यान दे कि इनकी उत्पत्ति कैसे हुई? इनके जन्म कहाँ से हुआ और इनको रोकने का उपाय क्या हैं? यदि हम स्वस्थ समाज देने के प्रयोग में सफल हो सके तो उसके बाद धरती-आकाश-चाँद-तारों-मंगल आदि के रहस्यों को खोजना सुखद प्रतीत होगा. तब तक हम किसी भी प्रयोग पर प्रलय आने की आशंका से ही डर कर जीवन जीते रहेगे.

07 सितंबर 2008

काव्य-पंक्तियों के द्वारा

आज इप्टा के एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में जाने का अवसर मिला. संवेदनाओं का सूखा और बुंदेलखंड का किसान विषय पर एक गोष्ठी का आयोजन भी किया गया था. शहर के प्रबुद्ध वर्ग के लगभग सभी लोग वहां उपस्थित थे. अच्छे वक्ता, अच्छे कवि, अच्छे श्रोता भी अपनी उपस्थिति दर्शा रहे थे. ऐसे अवसर एक बार में मित्रों के मेल-मिलाप के मंच का निर्माण भी करते हैं. अपने साहित्यिक मित्रों, सांस्कृतिक साथियों और अन्य लोगों के साथ विविध विषयों पर चर्चा भी हुई.

बात-बात के बीच, गोष्ठी में वक्ताओं द्वारा, कवियों, शायरों द्वारा काव्य रचनाओं, पंक्तियों को भी सुनाया गया. कुछ ने अपनी लिखी सुनाईं, कुछ ने विषय के अनुरूप दूसरे रचनाकारों की रचनाएं सुनाईं. कुछ पंक्तियाँ ऐसी होतीं हैं कि दिल को छू जातीं हैं। यहाँ भी कुछ पंक्तियों ने दिल को छू लिया. ऐसी ही कुछ पंक्तियाँ आपके साथ भी बाँटना चाह रहे हैं. गौर फरमाइयेगा-

एक मित्र ने आज के हालातों पर बात करते-करते कुछ पंक्तियाँ पढीं, आज के सन्दर्भ में बड़ी ही सार्थक लगीं-

राजा ने कहा रात है,
रानी ने कहा रात है,
प्रजा बोली रात है........
ये सुबह-सुबह की बात है।

जावेद की कविता गाँवों के किसानों, कुम्हारों, मजदूरों का मार्मिक चित्रण करती दिखी। उसकी कुछ पंक्तियाँ आपकी नजर हैं।

कोई लेता नहीं घडे, दीवाली के दिए।
अब किसानों ने सदा को चाक धोकर रख दिए।
पनघट सूने, पनिहारिन भी दिखती नहीं।
अब पथिक भी जा रहे हाथ में थर्मेस लिए।

किसानों की दशा को दिखाते एक मित्र की पंक्तियाँ थी कि

कोई नहीं आकर गाँवों की ख़बर है लेता,
भूखे पेट सोते उसी के बच्चे, जो सभी को अन्न है देता।

कार्यक्रम का सञ्चालन कर रहे युशुफ इश्तिहाक ने बीच-बीच में काव्य पंक्तियों से गोष्ठी को प्रभावी बना दिया। एक दो पंक्तियाँ उनकी भी अच्छी लगीं.

उनको तो अपना घर सजाना था,
मेरे घर का लुटना एक बहाना था।

इसके अतिरिक्त बहुत सारी पंक्तियों ने अपना रंग दिखाया। बाक़ी कभी बाद में। आज की अपनी पोस्ट का समापन बुन्देलखण्ड की गरिमा, उसके शौर्य आदि को दर्शाते एक गीत के मुखड़े से (ये पूरा गीत यहाँ गया गया, कभी आपको भी सुनवायेंगे, ये गीत बुन्देलखण्ड की अपनी अलग कहानी कहता है)

बुन्देलखण्ड की सुनो कहानी,
बुंदेलों की बानी में।
पानीदार यहाँ का पानी,
आग यहाँ के पानी में।

05 सितंबर 2008

शिक्षा, शिक्षक दिवस

इस देश की कितनी बड़ी विडम्बना है कि हम अपनी संस्कृति को भुला कर पश्चिमी संस्कृति का अनुसरण करते जा रहे हैं. विभिन्न भारतीय पर्वों, त्योहारों को मनाने के स्थान पर "डे" मनाने लगे हैं. अपनी परम्परा को त्याग कर पाश्चात्य परम्परा का अनुकरण करने लगे हैं. किस बात को कहा जाए किसे नहीं ये बात भी अब समझ से परे हो गई है. हम ख़ुद तय नहीं कर पा रहे हैं कि हमें चाहिए क्या है? हर बात में सबके अपने-अपने तर्क, अपने-अपने मशविरे हैं.
आज का दिन है जिसे हम लोग शिक्षक दिवस के रूप में मनाते हैं। ये आयोजन इसलिए नहीं कि हम अपनी संस्कृति को भूल कर पाश्चात्य संस्कृति की तरफ़ जा रहे हैं, ये आयोजन तो याद दिलाता है उस महान व्यक्तित्व की जिसने अपने अभावों को दरकिनार कर शिक्षा के चरम को छुआ. अनेक तर्कों से अपने ज्ञान से भारतीय दर्शन की एक नई इबारत लिखी. भरतीय दर्शन को एक पहचान दी, देश की शिक्षा व्यवस्था को सुधरने के उपाय दिए.
कभी-कभी शर्म तो इस बात पर आती है कि ये वो देश है जहाँ अच्छी बातों का समर्थन करने वाले कम, बाल की खाल निकलने वाले बहुत मिल जायेंगे। ब्लॉग के मारों का क्या कहना, वे तो बाल की खाल निकालते हैं उस खाल में फ़िर एक बाल पैदा करते हैं और फ़िर उसमें से खाल निकालते हैं. जहाँ हम शिक्षक दिवस को टीचर्स डे कहने लगे हों, सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन को पाश्चात्य सभ्यता से रंगा मानने लगे हों वहां सेक्स एजुकेशन को लेकर क्या समझाया जाए?
टीचर बहुत हैं जो सेक्स की सिक्षा दे रहे हैं पर उचित दंग से नहीं, प्रोग्शालायें बहुत हैं पर फैला रहीं हैं एड्स और तमाम यौन संक्रामक बीमारियाँ. बहरहाल भटकाईए अपने बच्चों को चोरी-छिपे रहस्यों को समझने की दुनिया में और बना दीजिये यौन रोगी. पुराने लोग अपनी बात न करें जो सालों बिता देते थे खिड़की और छत पर ताका-झांकी करने में, ये नै जेनरेशन है जो कच्ची उमर में पके फल खा रही है. क्या सर्वे रिपोर्ट्स नहीं पढ़ते? चलिए कौन किसे समझाए....जब टीचर उपलब्ध हैं......प्रयोगशालाएं उपलब्ध हैं तो कमी कहाँ है? जानकारी की बुराई करने वाले ही परदे के पीछे बैठ कर रंगीन किताबों के रंगीन चित्रों में अपनी तृप्ति करते हैं, इन्टरनेट कैफे की आड़ वाली सीट पर बैठ कर रंगीन फिल्मों का मजा लेते हैं, इन्टरनेट पर गिने चुने शब्दों के सहारे, गिने चुने ब्लॉग के सहारे अपनी तृप्ति का साधन खोजते हैं और कहते हैं कि क्या जरूरत है सेक्स एजुकेशन की? वाह री सिक्षा व्यवस्था.....वाह रे उसके ऐसे हर जगह उपलब्ध शिक्षक.

03 सितंबर 2008

सेक्स एजुकेशन की जरूरत

अभी पिछले दिनों अपने एक मित्र की शोध पत्रिका कृतिका के लिए यौन शिक्षा (SEX EDUCATION) पर एक लेख लिखने का आदेश सा मिला. मित्र हैं तो आदेश सिरोधार्य हुआ पर पशोपेश में रहे की इस विषय पर क्या और कैसा लिखा जाए? बहुत कुछ खंगाला पर वो नहीं मिला जो हम चाह रहे थे। इस बीच कुछ ऐसा भी देखने पढने को मिला की एक बारगी लगा कि वाकई इस देश में अब यौन शिक्षा की जरूरत बहुत बढ़ गई है.

सेक्स एजुकेशन को सिर्फ़ आदमी-औरत के शारीरिक संबंधों तक सीमित करके नहीं देखें तो हम इसकी महत्ता को समझ पायेंगे. चूंकि हमारे मित्र को पता है कि हम ब्लॉग पर भी इस लेख को चिपका सकते हैं तो उन्हों ने फिल्मी डिरेक्टर की तरह हमारे ऊपर विश्वास की सख्ती कर दी कि पत्रिका प्रकाशित होने के पहले इस लेख को ब्लॉग पर पोस्ट नहीं करोगे।

इस कारण से उस लेख को ज्यों का त्यों कुछ दिन बाद लिखेंगे पर सेक्स एजुकेशन की जरूरत के बारे में इतना समझ लें कि इस शिक्षा की जरूरत बच्चों को ये बता कर करनी होगी कि हमारे शरीर के किन-किन अंगों को हमें किसी दूसरे के सामने प्रदर्शित नहीं करना है. अक्सर देखा गया है कि 6-7 वर्ष तक के बच्चों में अपने यौनांगों को लेकर एक तरह की उत्सुकता रहती है. वे किसी न किसी बहाने आपस में, खेल-खेल में ही एक दूसरे के यौन्नंगों का निरीक्षण-परीक्षण करते हैं. उनकी इसी जिज्ञासा का लाभ समाज के बहसी भेडिये उठाते हैं और हमारे बच्चे नसमझी में यौन शोषण का शिकार हो जाते हैं।

चलिए अभी इतना ही, बाकी बस इतना समझिये कि ये कहना कि सेक्स एजुकेशन जानवरों को तो कोई नहीं देता फ़िर भी वे अपनी नस्ल को बढ़ा रहे हैं, एक दूसरे के साथ संसर्ग कर रहे हैं, ख़ुद को धोखा देना होगा. हमें मात्र नस्ल नहीं बढानी है, मात्र शारीरिक संबंधों को नहीं सिखाना है हमें बताना है कि पति-पत्नी के संबंधों में विश्वास क्या है? पारिवारिक जिम्मेवारियां क्या हैं? बच्चों की परिवरिश क्या और कैसी हो? इस कारण सेक्स एजुकेशन को लागू होना चाहिए या नहीं ये बाद की बात है पर कंडोम, बिंदास बोल.....आज का फ्लेवर क्या है जैसे विज्ञापनों और पीली पन्नियों में बिकती किताबों, नेट पर घूमती रंगीन दुनिया से सेक्स को समझते बच्चों को उसका असल मतलब तो समझाना ही होगा.

कार्टूनी गब्बर-ठाकुर

अभी-अभी अपने एक मित्र के मोबाईल पर एक फ़िल्म का कार्टून संस्करण देखा. वाकई कमाल है. सोचा क्यों न आप लोगों के साथ भी उसे बाँट लिया जाए. फ़िल्म शोले के गब्बर और ठाकुर के ऊपर फिल्माया गया ये सीन आपको भी हंसायेगा। उन सभी के प्रति आभार जिन्होंने इस कार्टून वीडियो को बनाया और हम सबको दिखलाने के लिए जारी किया.

02 सितंबर 2008

जिम्मेवार हम ही हैं

बिहार में पानी अपनी तबाही मचा रहा है, लोग बचने के लिए जद्दो-जहद कर रहे हैं जो बचे हैं वे अपनी राजनीती के लिए जद्दो-जहद कर रहे हैं. पानी की तबाही एकाएक नहीं आई होगी, क्या समस्या रही क्या कारण रहे ये भी उतना अहम् है जितना की ये कि सरकार या प्रशासन किस स्तर का सहयोग कर रहे हैं. देखा जाए तो पानी के बारे में प्रचिलित एक लोकुक्ति को हम लोगों ने लगभग भुला दिया है और वो ये कि पानी रास्ता मांगे तो उसको दे दो, यदि उसे पूछना पड़ेगा तो तबाही आयेगी

कहने का तात्पर्य ये कि पानी हमेशा से अपनी चाल से बहता हुआ आनंद देता रहा है. ऐसा नहीं है कि पहले तबाही या बाढ़ नहीं आती थी पर तब ये स्थिति प्राकृतिक होती थी. अब ये स्थिति हम लोगों ने बना दी है. कभी हम बाढ़ के शिकार होते हैं तो कभी हम सूखे के शिकार बन जाते हैं. अभी बिहार की दुखद स्थिति किसी से छिपी नहीं है. क्या इस के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ सरकार या प्रशासन ही जिम्मेवार है? क्या हमारा कोई दोष नहीं दीखता है? यहाँ मेरा मकसद सरकार/प्रशासन की गलतियों को छिपाना नहीं है, अपने दोषों को बताना भी है. हमने स्वार्थ में अंधे होकर ये भी नहीं देखा कि हम किस बेदर्दी से वृक्षों को काटते जा रहे हैं, जमीन का बेतरतीब अधिग्रहण करते जा रहे हैं. नदियों के किनारे, छोटे-छोटे नालों के किनारे भी हमने कब्जा लिए, पानी को रास्ता दिया नहीं और चाहते हैं कि वो अपनी धारा की गति भी न बढाये। यहाँ मनुष्य के एक छोटे से वर्ग के लालच का दुष्परिणाम पूरा बिहार झेल रहा है.

गाँवों के गाँव पानी की चपेट में हैं, लाखों आदमी बहते पानी के साथ बह रहा है और हम अभी भी इस कोशिश में हैं कि कहाँ से किसकी जमीन कब्जाई जा सकती है, कहाँ से किसके नाम पर बाढ़ की सहायता राशि लूटी जा सकती है. बहरहाल हालत हमें हमेशा कुछ न कुछ सिखाती है पर हम सीखते नहीं हैं. इस हादसे से भी न सीखे तो कब सीखेंगे?

01 सितंबर 2008

ब्लॉग पर पेंटिंग

आप लोग सोच रहे होंगे कि हमतो जावेद की चित्रकारी के पीछे ही पड़ कर रह गए हैं. ऐसा नहीं है, जब जावेद से अपनी पेंटिंग को ब्लॉग के द्वारा नेट पर लाने का अनुरोध किया (हालाँकि एक बार बड़ा संकोच भरी जानकारी जावेद ने चाही थी पर फ़िर वे शांत रह गए) तो जावेद बड़े सकुचाये थे. अपने ब्लॉग के द्वारा हम नेट के जलवे देख चुके थे और इसी कारण हमारी इच्छा थी कि ब्लॉग का कुछ सदुपयोग हो जाए. यही सोच कर जावेद का ब्लॉग बनाया और उनकी पेंटिंग को उसके माध्यम से सबके सामने लाने का विचार बनाया. अपनी पिछली पोस्ट पर भी आप सबसे उनकी चित्रकारी की चर्चा की थी आज फ़िर कर रहे हैं. उनकी एक पेंटिंग उनके ब्लॉग पर लगा दी है. आगे भी धीरे-धीरे उनकी अन्य पेंटिंग उनके ब्लॉग पर आती रहेंगी.

असल बात ये है कि जावेद ने आज तक पेंटिंग को व्यावसायिक रूप से नहीं किया है इस कारण उनकी तमाम सारी पेंटिंग को इकठ्ठा करने में दिक्कत आ रही है. जैसे-जैसे पेंटिंग एकत्र होती रहेगी वैसे-वैसे आपके सामने आती रहेंगी. 10000 से अधिक पेंटिंग बनाने वाले जावेद ने आज तक किसी भी पेंटिंग की फोटो अपने पास नहीं रखी है। स्वभाव से भोले-भाले जावेद की पेंटिंग के नमूने उनके प्रशंसकों के माध्यम से इकठ्ठा किए जा रहे हैं इस कारण थोड़ा समय लगेगा पर जल्दी ही लगभग सारी पेंटिंग को ब्लॉग पर लगा दिया जाएगा.

एक दिन में लगभग 100 पेंटिंग बनाने वाले जावेद को हम लोग प्रोत्साहित कर रहे हैं कि वे अब कुछ काम व्यावसायिक रूप से करें जिससे उससे प्राप्त धन को वे अपने छात्रों पर खर्च कर सकें। जावेद ने अभी तक लगभग 20000 के आसपास बच्चों को चित्रकारी सिखाई है और वो भी निःशुल्क.

अब आप लोग सहयोग करियेगा, जो लोग पेंटिंग में रूचि रखते हैं वे नेट के द्वारा भी पेंटिंग बनाने का ऑर्डर जावेद को दे सकते हैं. ये प्रयास हम लोगों का है जिसमें आपके सहयोग की जरूरत है. इससे आर्थिक तंगी से गुजरते कलाकार की कला सुरक्षित रहेगी. यदि ऐसा होता है तो मुझे लगेगा कि मेरा ब्लॉग के रूप में आना सफल रहा. लिखना तो कागज़ पर हो ही रहा था यहाँ आकर कोई बड़ा तीर नहीं चला लिया.