31 अगस्त 2009

फ़िर एक ब्लॉग की चर्चा की है आपसे


हमेशा की तरह अपने यार दोस्तों की मंडली के साथ बैठे हुए गपशप हो रही थी। किसी मुद्दे पर गरमागरम बहस तो किसी पर सार्थक चिन्तन। हर तरह की बातें हो रहीं थीं। इस समय लगभग सभी दोस्त किसी न किसी दौर से गुजर रहे हैं। कोई नौकरी में नियमित होने के दौर से, कोई नौकरी में तरक्की के दौर से। किसी को बढ़े वेतन की चिन्ता हो रही है तो कोई पिछले महीनों के वेतन का भुगतान न होने के कारण परेशान है।
इन्हीं सबके बीच पता नहीं किस विषय को लेकर चर्चा छिड़ी तो उन तमाम सारे बिन्दुओं पर रोचक यादें आपस में बाँटीं गईं जो किसी न किसी के साथ पहली बार के रूप में सामने आईं थीं। यह शायद भागदौड़ का नतीजा था या कहें कि ज्यादा व्यस्तता में हम कुछ सुकून के पल चाहते हैं जो हमें यार दोस्तों के साथ आसानी से मिल जाते हैं। इसी कारण से किसी चुहल के कारण से या किसी को परेशान करने के कारण से इस तरह के विषयों का आदान प्रदान होने लगा।
किसी ने अपने पहली बार अपने पिता से मार खाने का किस्सा सुनाया तो किसी ने बाहर पहली बार पिटने की कहानी सुनाई। किसी ने बताया कि पहली बार लड़कियों के साथ डिग्री कालेज में पढ़ने पर उसकी क्या हालत हुई थी तो किसी ने बताया कि क्लास की सबसे स्मार्ट लड़की ने पहली बार उससे नोट्स माँगे तो उसे कैसा लगा था। किसी ने अपनी पहली ट्रेन यात्रा के बारे में बताया तो किसी ने पहली बार लिफट में ऊपर नीचे होने पर हुई गुदगुदी को बताया।
कैसे तीन चार घंटे और चाय के तीन दौर निकल गये पता ही नहीं चला। जब अन्दर से अम्मा की आवाज आई तब लगा कि बहुत देर हो गई है। यादों में डूबते उतराते हम सभी दोस्त अपने अपने घर को चल दिये। बैठकी तो हमारे ही घर पर लगी थी सो हमें कहीं नहीं जाना था पर दिमाग जरूर इधर उधर चलने लगा। थोड़ा बहुत सोच विचार कर अपने दिमाग को ठंडा किया और अपने दूसरे कामों में लग गये।
काम दूसर भले कर रहे थे पर दिमाग में एक फितूर बैठ गया था। इसको हवा अगले दिन हमारे कुछ खास दोस्तों ने दी जो हमारे ब्लाग के नियमित पाठक हैं। हमारी सोच को आयाम मिलता दिखा। हमारे दोस्तों ने कहा कि इस विषय पर एक ब्लाग बनाओ जिसमें लोग अपने पहले एहसास को आपस में बाँटें। कैसा लगा पहली बार जब कुछ काम किया। मसलन पहली बार किसी की सहायता की, पहली बार कोई कविता कहानी लिखी, पहली बार कुछ सामग्री छपी, पहली बार स्कूल में गये, पहली बार साइकिल, स्कूटर, कार आदि चलाना शुरू किया, पहली बार मासूमियत भरी चोरी घर में की, पहली बार अपनी गलती को किसी और के सिर पर डाला आदि आदि।
हमें लगा कि हाँ ऐसा हो सकता है। हम आपस में इतना सब कुछ आदान प्रदान करते हैं तो अपने पहले एहसास को क्यों नहीं बाँट सकते? बस ऐसा सोच कर बहुत दिनों की सोचा विचारी के बाद एक ब्लाग बना दिया पहला एहसास। इसे सामुदायिक ब्लाग के रूप में संचालित करना है। जो saathi सदस्य बनना चाहे वह हमें ई मेल करदे या फिर अपने पहले एहसास को हमें लिख भेजे।
आशा यही करते हैं कि आप सबका सहयोग मिलेगा और अवश्य ही मिलेगा। क्या आपको अपने पहले एहसास को हमसे बाँटना सुखद नहीं लगेगा?

30 अगस्त 2009

इनका हल हो आपके पास तो हमें भी बताएं

देश में विवादों के साथ रहने का कुछ शौक सा हो गया है। किसी न किसी प्रकार से विवाद होना चाहिए। इसी तरह हमारे देश के सत्तासीन कुछ इस तरह के कामों को करते हैं कि हमें बहुत हैरानी होती है। हो सकता है कि ये हमारा संकुचित नजरिया हो पर कई बार हमें ये नहीं समझ में आता कि इससे फायदा क्या है?
इस पोस्ट को इसीलिए रख रहे हैं कि हम समझ नहीं पा रहे हैं कि गरीबी, मँहगाई, बेरोजगारी, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, असाध्य बीमारियाँ, आतंकवाद, सीमापार विवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषा विवाद आदि से जूझते देश को इनसे क्या लाभ होगा?
आपको पता हो तो हमें भी समझायें।

  • यदि यह ज्ञात हो जाये कि हिन्दुस्तान विभाजन का असली जिम्मेवार कौन था?
  • यदि हम पता लगा लें कि मंगल पर पानी है, जीवन है?
  • यदि चाँद के रहस्यों का पता चल जाये?
  • यदि नेता जी सुभाषचन्द्र जी की मौत का रहस्य खुल जाये?
  • यदि पता चल जाये कि लालबहादुर शास्त्री जी की मौत किस कारण से हुई?
  • यदि हम कई कई परमाणु बम बना डालें?
  • यदि मालूम पड़ जाये कि गाँधी जी ने मरते समय कौन से शब्द बोले थे?
  • यदि ज्ञात हो जाये...................

सवाल बहुत हो सकते हैं और जवाब भी बहुत। पर एक सवाल वही कि तमाम समस्याओं से जूझते देश की प्राथमिकता क्या हों?
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(उक्त सवालों से किसी की भावनायें आहत हों तो हम क्षमा चाहते हैं क्योंकि हमारा इरादा किसी को दुख देने का नहीं है। वैसे भी इस देश में भावनाओं को ठेस जल्दी पहुँचती है।)

28 अगस्त 2009

आइये आपको बताएं व्यस्त कैसे रहा जाता है


आपको पता है कि खाली समय में क्या किया जाता है? नहीं न? तो आप अपने आसपास क्यों नही देखते हैं? आपके आसपास ही इतना सब हो रहा है और आप कहते हैं कि आपको नहीं पता।
हाँ, ये बात और है कि आप कहेंगे कि हम खाली ही नहीं रहते। चलिए मान लिया, पर क्या किसी भी समय खाली नहीं रहते? घबराइये नहीं, ये सच का सामना नहीं है जो सवाल पे सवाल पूछे जा रहे हैं। बात ये है कि आप खाली तो रहते ही होंगे किसी न किसी समय तब?
आइये, देखिऐ, आपके सामने कुछ उदाहरण हैं जो खाली समय का सदुपयोग करना सिखा रहे हैं। एक किताब लिख दीजिए या फिर एक बयान जारी कर दीजिए या फिर कोई ऐसी बात कर दीजिए जिसके विरोध में बहुत लोग हों।
जसवन्त सिंह ने किताब लिखी विवाद हुआ। संथानम वैज्ञानिक ने परमाणु परीक्षण पर बयान दिया विवाद जारी। ये हैं तरीके व्यस्त रहने के।
आपके पास भी बहुत कुछ है। भई आपको लगता है कि आपके कहने से मीडिया नहीं जुटेगी तो कोई बात नहीं। अच्छा सा चाय पानी का इंतजाम करिए फिर देखिए। मीडिया को क्या चाहिए खबर, अब खबर कोई भी हो चलेगा।
बस अब तो आ गया आपकी समझ में कि करना क्या है। अपने पड़ोसी की बुराई करिए। पड़ोस में आने जाने वालों की गाड़ियों को पंचर करिए। आसपास खेलते बच्चों को परेशान करिए। और भी बहुत कुछ है करने को।
हाँ, आपने सही कहा कि आप किताब क्यों नहीं लिख सकते, आप बयान क्यों नहीं दे सकते? दीजिए बिलकुल दीजिए, हम नहीं रोकते हैं। बाद में न कहिएगा कि डंडे पड़े। कहाँ पड़े ये तो आप ही बतायेंगे। हम बता देगे तो आपका भी मजा खराब होगा।
चलिए देखिए अपने आसपास कुछ छोटी छोटी बातें और हो जाइये व्यस्त। हम भी चले व्यस्त होने।

27 अगस्त 2009

हाय हमने क्यों न लिखी ऐसी किताब

देश में जसवंत सिंह के कारण फिर जिन्ना भूत सामने आ खड़ा हुआ। विवाद मचाने वालों ने विवाद मचाया, कार्यवाही करने वालों ने कार्यवाही की पर आम आदमी को क्या मिला?
दाल आज भी पहुँच के बाहर है, जान पर खतरे अभी भी हैं, महिलायें घर बाहर असुरक्षित अभी भी हैं फिर इस प्रकरण से बदला क्या है?
सोचिए कि आज के परिप्रेक्ष्य में सबसे आवश्यक क्या है? आम आदमी को सुरक्षा, रोजी, रोटी, मकान, वस्त्र या फिर देश विभाजन के कारक और कारण, परमाणु समझौते की असलियत, अन्तरराष्ट्रीय कानून पर विचार?
समझ नहीं आता कि देश में समय समय पर विवादों का साया क्यों आ जाता है? क्या यह सब एक पब्लिसिटी स्टंट से अधिक कुछ नहीं है? क्या बेकार हो चुके, हाशिये पर आ चुके लोगों के पुनः चर्चा में आने का हथियार है?
कुछ तो है जो हमें दिखाई, सुनाई नहीं दे रहा है। कुछ तो है जिसे हम देखना, सुनना नहीं चाह रहे हैं।
चलिए छोड़िये रोटी की चिन्ता, छोड़िये दाल की बातें, भूल जाइये अपनी जानमाल की सुरक्षा, भुला दीजिए कि आपकी बेटी अभी भी घर से बाहर है आखिर हमें चिन्ता करनी है कि देश को किसने बँटने दिया।
हमें चिन्ता इस बात की हो कि जिन्ना सेकुलर थे या नहीं।
हमें सोचना चाहिए कि गाँधी जी की भूमिका देश के बँटवारे में कैसी थी।
आखिर इसी सबसे तो आम आदमी को दो वक्त की रोटी मिलेगी। इसी से तो देश का आर्थिक विकास होगा। इन्हीं सबसे तो देश मंदी और मँहगाई के दौर से बाहर आयेगा। इन्हीं पर तो चिन्तन करके हम आतंकवाद पर काबू कर लेंगे।
आखिर देश के एक बड़े नेता की किताब है, बड़े नेता का चिन्तन है तो हमें इस पर सोचना ही होगा।
चलिए हम तैयार हैं इन सब बातों पर सोचने और विचार करने के लिए क्या आप तैयार हैं?

25 अगस्त 2009

बेटी जन्मी तो जश्न, बेटा जन्मा तो चूल्हा ठंडा



हो सकता है कि चित्र में दिया गया समाचार स्पष्ट रूप से पढ़ने में न आ रहा हो किन्तु उसका शीर्षक तो स्पष्ट है। हो सकता है कि बहुतों के लिए यह आश्चर्य का भी विषय हो किन्तु यह सत्य है। होना भी चाहिए क्योंकि....कारण सभी को स्पष्ट हैं।
यह पोस्ट बस यह बताने के लिए आज के इस दौर में जहाँ एक पुत्र के लिए कई कई बेटियों की बलि गर्भ में या फिर जिन्दा में दे दी जाती हो वहाँ इस तरह की बिरादरी भी है जो बेटी के जन्म पर उत्सव मनाते हैं और पुत्र के होने पर समूची बस्ती में चूल्हा नहीं जलाया जाता है।
खास बात यह भी है कि लड़की का हाथ माँगने के लिए लड़के वाले अच्छी खासी रकम ही नहीं देते वरन बिरादरी के खानपान का भी खर्चा उठाते हैं।
महिलायें घर का काम करने के साथ साथ परिवार के भरण पोषण के लिए धन का इंतजाम करना होता है। यह समुदाय भीख माँग कर अपना गुजारा करता है। इस समुदाय के पुरूष बच्चों को, मवेशियों को सँभलने का काम करते हैं।
फैजाबाद जनपद में इस समुदाय के लोगों की संख्या चार हजार के आसपास है। अनुसूचित जाति समुदाय के ये लोग बेटी को लक्ष्मी मान कर उसके जन्म पर प्रसन्न होते हैं पर सरकारी योजनाओं को इन पर प्रसन्न होने की फुर्सत नहीं। ये लोग अभी भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं।
बहरहाल इस समुदाय के लोग पुत्री के जन्म पर खुशियाँ मना कर आज के तथाकथित आधुनिक समाज के मुँह पर एक तमाचा ही जड़ते हैं। क्या हमारे समाज के पुत्र मोह में फँसे लोग इस ओर ध्यान देंगे?
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विशेष --- यह समाचार अमर उजाला दिनांक 25 अगस्त 2009 के अंक में प्रकाशित किया गया है।

सवाल....सवाल और बस सवाल....???


पिछले कुछ दिनों से पता नहीं क्यों मन किसी भी काम में नहीं लग रहा था। इसी कारण इतने दिनों ब्लाग से भी दूर रहे। सोचा शायद मन बदले किन्तु मन बदला तो नहीं खराब अवश्य हो गया। दो दिन से बराबर एक ही समाचार हर तरफ अपनी चर्चा बनाये है नकली खून।
क्या वाकई हम मनुष्य स्वार्थ में इस कदर अंधे हो गये हैं कि किसी दूसरे की जान की परवाह बिलकुल भी नहीं कर सकते?
समाज में अभी तक जो कुछ चलन में है या फिर जो कुछ चलन में था उस पर कहीं न कहीं हम ही आवरण डाल दिया करते हैं। कभी कोई बहाना बना कर कभी कोई तरीका दिखा कर।
बाप के बेटी से सम्बन्ध, बेटे के माँ से सम्बन्ध, भाई के बहिन से सम्बन्ध या फिर इसी तरह के आपसी सम्बन्धों में शारीरिकता को हमने कभी विमर्श का नाम दिया कभी आदमी औरत का रोना रोया।
खाद्य सामग्री में मिलावट, देश की सुरक्षा व्यवस्था में सेंध को हमने कभी आतंकवादियों की हिमाकत कहा तो कभी पड़ोसी देशों की कारीगरी।
आम आदमी का मौत को हमने कभी भी गम्भीरता से नहीं लिया और राजनेताओं की सुरक्षा में देश के आला दर्जे के जवानों को लगा हुआ देखा।
आम आदमी को भोजन न मिलते देखा और देश चलाने वालों का फाइव स्टार होटलों में पार्टियाँ करते भी देखा।
क्या क्या बतायें कि क्या क्या देखा? अब....अब क्या देखा?
नकली खून....नकली खून....नकली खून।
अब बस सवाल कि क्या वाकई इंसानियत पूरी तरह से मर चुकी है?
क्या हम अब भी स्त्री विमर्श, दलित विमर्श के नाम पर अपना दिमाग खर्च करते रहेंगे?
क्या हम इसे भी आधुनिकता का नाम देकर भुला देंगे?
क्या यह घटना भी जाँच के नाम पर ठंडे बस्ते का शिकार होगी?
क्या......क्या.....और क्या??? सवाल....सवाल और बस सवाल....???


16 अगस्त 2009

समस्या से जूझें या झंडा फहराएं?

अभी-अभी हम भारतवासी बरसते पानी के साथ अपना स्वतन्त्रता दिवस मनाकर उठे हैं। कितना सार्थक और कितना आवश्यक रह गया है हमारे लिए ध्वजारोहण करना? यह सवाल तब और भी प्रासंगिक लगने लगता है जब हम लगातार समस्याओं से जूझते हुए आगे बढ़ रहे होते हैं।
समस्याएँ भी ऐसीं कि जिनका हल है पर कोई निकालना ही नहीं चाहता। लोकतन्त्र की हालत यह है कि आम आदमी के लिए जीना मुश्किल है। रोटी-पानी के लाले हैं, घर की समस्या है, रोजगार की चिन्ता है, समस्या का हल करने वाले बैठे हैं पर उन्हें जेबें भरने से फुर्सत नहीं है, ऐसे लोकतन्त्र में किसे तमन्ना है कि वह तिरंगा फहराये?
हमने कई बार इस तरह की बातों को उठाया तो ज्यादातर लोगों की ओर से देशभक्ति से भरा जवाब मिलता है कि हमारे वीर शहीदों ने अपने प्राण गँवाने तक के बारे में नहीं सोचा और तुम जरा सी बिजली-पानी की समस्या का रोना लेकर बैठे हो। सच है, हमारे वीर-बाँकुरों ने अपनी जान की परवाह नहीं की पर किससे? फिरंगियों से, हम क्या अपने भारतीय फिरंगियों से लड़ने के लिए अभी तैयार हैं?

सवाल नहीं बस अपनी ही समस्या के बहुत छोटे-छोटे से हिस्से, उसके बाद फैसला आपका।

  • जनपद जालौन, चार सांसद, जिनमें एक लोकसभा के लिए शेष तीन राज्यसभा के लिए। लोकसभा के लिए चुने गये सांसद महोदय सपा के शेष तीनों राज्यसभा के मनोनीत सांसद बसपा के।
  • जनपद जालौन में चार विधानसभाएँ, चार विधायक चुने गये। एक विधायक (सदर) कांग्रेस के शेष तीन विधायक बसपा के। इनमें से एक विधायक राज्यमंत्री भी हैं। कांग्रेस विधायक प्रदेश कार्यकारिणी में भी शोभायमान हैं।
  • अब पूरे जनपद जालौन का तो नहीं बस यहाँ के मुख्यालय का हाल भी जान लीजिए (हो सकता है कि आपको बोर कर रहे हों पर स्वतन्त्रा दिवस पर इतना जश्न तो आवश्यक है)
  • उरई के पाँच मुहल्ले जहाँ ट्रांसफार्मर फुँकने से पिछले चार-पाँच-छह दिनों से बिजली नहीं आ रही है। अभी इनके बदलने के कोई आसार नहीं। अधिकारियों के कानों पर जूँ भी नहीं रेंगती।
  • अधिकारियों के पास मोबाइल हैं जिन्हें आफ न करने के सख्त निर्देश हैं। इस निर्देश का पूरा पालन होता है, आफ तो नहीं होते पर कोई उठाता भी नहीं। एकाध बार कोई सुन भी ले तो समस्या का निदान नहीं किया जाता, उलटे कहिए हड़का दिया जाये।
  • बिजली व्यवस्था का हाल यह है कि पूरे दिन में सुबह आठ से ग्यारह तथा दोपहर दो बजे से रात आठ बजे तक कटौती घोषित है। इसके बाद भी बिजली आने पर दो-चार घंटे तो जाना ही जाना है।
  • इसके बाद भी बिजली बिल की मार उसी पर जो नियम से जमा करता है। बजरिया जैसी जगह पर कटिया का आलम यह है कि वहाँ अधिकारी घुसने से भी डरते हैं, साम्प्रदायिक होने का खतरा है। सौहार्द्र बनाने के लिए बिजली चोरी करवाई जानी जायज है।
  • हाईटेंशन तारों का लगभग रोज ही टूटना होता है। रोज ही आदमियों का मरना तय है (शहीद नहीं होते हैं)
  • कानून व्यवस्था का हाल यह है कि सुबह नौ बजे भी हत्या होती है, शाम सात बजे भी हत्या होती है। अकेले में हत्या होती है, भरे बाजार हत्या होती है।
  • चोरी, चेन खींचना, जेब काटना तो उस तरह हैं जैसे खाने में अचार या चटनी।
  • जेल में तक हत्या का प्रयास होता है, अन्य करोबार का बाजार गर्म रहता है।

और बहुत कुछ है। यह हाल तो प्रशासन का है। शिक्षा जगत, चिकित्सा जगत, व्यापार, बैकिंग, डाकघर, नगर पालिका............कौन नहीं है जो स्वतन्त्र नहीं है कुछ भी कहने को, कुछ भी करने को। आखिर स्वतन्त्र है यानि की स्व का तन्त्र है जिसे मानना हो माने न मानना हो न माने।
इन सब पर लिखने बैठा जाये तो शायद इंटरनेट पर कुल स्पेस कम हो जायेगा पर इनकी कारगुजारियाँ समाप्त नहीं होंगीं।
अब बताइये ऐसे में कोई आम आदमी कैसे ध्वजारोहण करने के लिए आनंदित होगा? समस्याओं का पुलिंदा थामे कोई कैसे भारत माता की जय बालेगा? कौन कैसे वन्देमातरम कहेगा?

(वन्देमातरम तो कहना ही जुर्म है?)

नोट - तीन दिन बाद आज बिजली मिली है सो मन का गुबार निकाल रहे हैं। इसी कारण अभी तक आप सबसे दूर भी रहे।

11 अगस्त 2009

दुश्मन न करे दोस्त ने वो काम किया है....

एक पुराना गीत अकसर सुनाई देता है ‘‘मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे।’’ आज के हालात देखकर लगता है कि अब इसके बोल होने चाहिए ‘मेरे दोस्त तू मेरी दोस्ती को तरसे।’
हो सकता है कि आपमें से बहुतों को ये बुरा भी लग रहा होगा, विशेष रूप से उन्हें जिनके कुछ एक बहुत ही पक्के दोस्त आज भी हैं। उनको इस बात में सत्यता नजर आ रही होगी जिन्होने दोस्ती में अपनत्व महसूस नहीं किया होगा।
इसी माह हमने दोस्तों को समर्पित फ्रेंडशिप डे मनाया। हमेशा की तरह हम इस दिन से भी अलग रहे क्योंकि हमारा मानना है कि दोस्ती जाहिर करने का नहीं महसूस करने का नाम है। बिना जतलाये कुछ कर दिखाने का नाम है। बहरहाल, दोस्ती के लिए इस दिन लोगों को हाथ में रंगीन पटटे बाँधे देखा गया। गलबहिंयाँ करते देख गया। रेस्टोरेंट, पार्कों में डोलते देखा गया। रात को किसी बार में पीते और फिर थिरकते भी देखा गया। हो गया दोस्ती का सूत्रपात।
अब इतनी ही दोस्ती रह गई है। अन्त इस तरह की दोस्ती का होता है विश्वासघात पर। आजकल लगभग रोज ही देखने में आता है कि एक दोस्त ने दूसरे के साथ विश्वासघात कर दिया। एक दोस्त ने दूसरे दोस्त की हत्या कर दी, अपहरण करवा दिया। कारण पता लगता है तो कभी कोई लड़की, तो कहीं कारण धन होता है।
अब लोग कहेंगे कि समाज है तो ऐसा ही होगा। ऐसा नहीं है, समाज में आज भी दोस्ती निभाने वाले हैं, दोस्त के लिए जान देने वाले हैं पर इनकी संख्या कम होती जा रही है।
दोस्ती के नात पर दगा करते लोगों को देखकर कई बार एहसास होता है कि शायद इन्होंने दोस्ती को पहचाना ही नहीं, दोस्त को जाना ही नहीं। काश! इन लोगों को भी कोई दोस्त मिलता तो कम से कम दोस्ती का नाम तो बदनाम नहीं होता।
इस तरह की खबरों के बाद एक और गीत याद आता है ‘‘दुश्मन न करे दोस्त ने वो काम किया है, उम्र भर का गम हमें इनाम दिया है।’’

09 अगस्त 2009

आरक्षण के कोड़े मारना बंद करो, मैं माफ़ी मांगता हूँ

तीन-चार दिन पहले समाचारों में सुना कि संसद में आरक्षण को दस वर्ष के लिए और बढ़ा दिया गया है। हालांकि ये आरक्षण संसद के लिए है किन्तु विचार यह आया कि क्या देश अब आरक्षण के सहारे ही आगे बढ़ेगा? हम तो कहते हैं अवश्य बढ़े किन्तु क्या वाकई वास्तविक लोगों को इसका लाभ मिल भी रहा है?
देखा जाये तो इसका फायदा उसे बिलकुल भी नहीं हो पा रहा है जिसे इसका लाभ लेना चाहिए। आरक्षण की इस व्यवस्था से हो ये रहा है कि आम सामान्य वर्ग का वह व्यक्ति ज्यादा प्रभावित हो रहा है जिसके पास संसाधन नहीं हैं और दूसरी ओर आरक्षण की मार के कारण वह आगे भी नहीं बढ़ पा रहा है।
एक बहुत छोटा सा उदाहरण अभी सामने आया। यहाँ के एक स्थानीय महाविद्यालय में एम0ए0 में 60 सीटें निर्धारित हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि ज्यादातर विषयों में 60 सीटों में सामान्य वर्ग (सही रूप में कहें तो सवर्ण) के दस-बारह के आसपास ही छात्र प्रवेश ले पा रहे हैं। शेष सीटों पर आरक्षित वर्ग के छात्रों का कब्जा हो गया है। अब बताइये कहाँ रह गया पचास फीसदी आरक्षण का नियम? ऐसे में सवाल उठता है कि अब सामान्य वर्ग का छात्र पढ़ने के लिए कहाँ जाये?
इसके अलावा सामान्य वर्ग में बहुत से छात्र ऐसे हैं जो आर्थिक रूप से बहुत ही कमजोर हैं। उनके पास खाने को धन नहीं है वे पढ़ने के लिए कहाँ से संसाधन जुटायेंगे? ऐसे लोगों के लिए कोई योजना काम नहीं कर रही है।
इसी तरह अन्य उच्च शिक्षा में आरक्षण के कारण प्रवेश को लेकर समस्या बनी रहती है जिससे कई बार उच्चतम अंक लाने के बाद भी सामान्य वर्ग के व्यक्ति का प्रवेश नहीं हो पाता है और कम से कमतर अंक लाने वाला आरक्षित वर्ग का विद्यार्थी प्रवेश लेकर इंजीनियर, डाक्टर बनकर निकलता है। हताशा-निराशा के माहौल में सामान्य वर्ग के अधिकांश विद्यार्थी आत्महत्या तक कर लेते हैं।
इन दिनो यू0पी0 में सरकार की ओर से एक खेल और खेला जा रहा है। यहाँ की शिक्षा व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने की व्यवस्था के लिए महाविद्यालयों में मानदेय प्रवक्ताओं के पदों पर भर्तियाँ की गईं थीं। विगत सपा सरकार में मुलायम सिंह ने एक विधेयक के द्वारा सभी मानदेय प्रवक्ताओं को नियमित करने का प्रयास किया था। अपने प्रयास के पूर्व ही उनकी सरकार चली गई और चुनाव बाद बसपा सरकार ने यू0पी0 में अपने कदम जमाये।
कुछ दिनों तक तो आशा बँधी रही किन्तु अभी इसी सोमवार 02 तारीख को मायावती ने विधानसभा में उक्त विधेयक को समाप्त करने सम्बन्धी प्रस्ताव पेश कर दिया। इस प्रस्ताव के पारित हो जाने पर कोई भी मानदेय प्रवक्ता नियमित नहीं हो सकेगा।
इसके पीछे कारण बताया गया कि इन भर्तियों में आरक्षण का पालन नहीं किया गया है।

बेसिक शिक्षा विभाग में पदोन्नति के लिए भी आरक्षण लागू किये जाने से जूनियर शिक्षक अपने पूर्व के सीनियर शिक्षकों के सीनियर हो गये हैं। और बहुत से उदाहरण हैं जो समाज में वैमनष्यता के बीज बो रहे हैं।
अब सवाल उठता है कि क्या यह सब सही है? जो लोग इस पक्ष के हैं उनको इसमें कोई बुराई नहीं नजर आती। उनका कहना है कि पहले सवर्णों ने पिछड़ों पर अत्याचार किये हैं यह उसी का फल है।
यदि वाकई ऐसा है तो यह गलत है। हमारे सवर्ण पूर्वजों ने जो किया उसकी सजा पूरे वर्तमान सवर्ण समाज को क्यों? उन सवर्ण नौजवानों का क्या कसूर जिनके पुरखों ने भी कोई जुल्म नहीं किये थे, जो तब भी गरीब थे और आज भी गरीब हैं? फिर भी यदि सब इसी कारण है तो जैसे 1984 के सिख दंगों के लिए वरिष्ठ राजनेता माफी माँग कर बच गये, आपरेशन ब्लू स्टार के लिए माफी माँग लेने से उसके अगुआ को निर्दोष साबित समझा जा रहा है, जलियां वाला बाग हत्याकांड के लिए हम महारानी से माफी की मांग कर रहे थे, ठीक उसी तर्ज पर अपने वर्तमान के तमाम सवर्ण नौजवानों की स्थिति को देख कर हम भी माफी माँगने को तैयार हैं।
‘‘मैं कुमारेन्द्र सिंह सेंगर पूर्व में किये अपने सवर्ण बुजुर्गों द्वारा दलितों, पिछड़ों पर किये गये अत्याचार के लिए आज दिनांक 9 अगस्त 2009 को माफी मांगता हूँ। आरक्षण के कोड़े मारना बन्द करके उन गरीब सवर्णों की ओर भी ध्यान दो जो सिर्फ अपने सवर्ण होने की सजा काट रहे हैं। दलितों के मसीहाओ, पुरोधाओ, रहनुमाओ तुम हमारे सवर्ण बुजुर्गों की गलती को क्षमा करना। आज तुम सर्वोपरि हो, आज तुम महान हो, आज तुम सशक्त हो..........मैं तुम्हें झुक कर नमन करता हूँ, माफी मांगता हूँ।’’

(जब देश के बड़े-बड़े दिग्गज माफी मांग कर अपने पूर्व के अत्याचारों से बरी हो सकते हैं तो हम भी हो जायेंगे)
चलो अब कल का सूरज देखते हैं जो हम सवर्णों के लिए नई आजादी लेकर आयेगा। नया सवेरा लेकर आयेगा। शिक्षा, नौकरी, पदोन्नति, रोजगार लेकर आयेगा।

08 अगस्त 2009

अपने होटों पर सजाना चाहता हूँ

इधर पिछले पाँच-छः दिन से तबियत कुछ ज्यादा ही बिगड़ गई थी। हालत ये थी कि बैठा भी नहीं जा पा रहा था। लेते-लेते दिन कटे। आज कुछ हिम्मत करके आए। इन दिनों चुपचाप गाने-ग़ज़ल सुनते रहते थे। अपने पसंद की एक ग़ज़ल आपके लिए भी।

हलाँकि जगजीत सिंह हमारे बहुत अधिक पसंदीदा नहीं हैं फ़िर भी उनकी कुछ ग़ज़ल बहुत पसंद हैं। उनमे से एक ग़ज़ल आपके लिए

02 अगस्त 2009

अब तो दाल-रोटी खाने की औकात भी नहीं

अकसर बातचीत में यह सुनने में आता था कि चिन्ता की क्या बात है। इतना तो कर ही लेते हैं कि दो वक्त दाल-रोटी तो खा ही सकते हैं।
यह भी कह दिया जाता था कि गरीब का क्या है सूखी रोटी और प्याज-नमक के सहारे जिन्दगी काट लेता है।
अब क्या ऐसा सम्भव दिखता है?
कारण 96 रु0 किलो अरहर की दाल और 26 रु0 किलो प्याज। (यह आँकड़ा घटता-बढ़ता रहता है, घट कम ही रहा है।)
आज कोई विस्तार नहीं, कोई चर्चा नहीं। एक प्रकार का मौन..........।