आज सुबह ही इसे पोस्ट किया था, कुछ कारणों से इसे दोबारा पोस्ट करना पड़ रहा है। आशा है इस अतिरिक्त खुराक के लिए क्षमा करेंगे।
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सरकार का शपथ ग्रहण समारोह चल रहा था, सांसद जो अब मंत्री पद प्राप्त कर चुके थे, शपथ ले रहे थे। हम ऐसे कार्यक्रम देखने का प्रयास करते हैं, इस कारण से नहीं कि कोई विशेष रुचि है वरन् इस कारण से कि ऐसे कार्यक्रमों में कुछ न कुछ विशेष देखने को भी मिल जाता है। अपने सांसदों, मंत्रियों को भाषा के प्रति प्रेम बड़ी ही सुन्दरता से परिलक्षित होता है।
हिन्दी भाषियों का भी हिन्दी का गलत उच्चारण करना, गलत तरह से लिखना-बोलना हमें हैरत में डालता है। इस पोस्ट के द्वारा हमारा उद्देश्य कदापि हिन्दी सिखाना नहीं है न ही यह समझाना है कि सही हिन्दी क्या है, कैसे बोली-लिखी जाये। दरअसल हुआ यह कि कुछ दिनों पूर्व एक ब्लाग पर हिन्दी को लेकर की गई टिप्पणी पर सात मेल प्राप्त हुए, जिनके द्वारा कुछ सवाल उठाये गये थे। यहाँ हम पुनः स्पष्ट कर दें कि हमारा मकसद कतई किसी को हिन्दी सिखाने का नहीं है। बस थोड़ा सा प्रयास यह दिखाने का है कि ‘हम हिन्दीभाषी होने का भरते हैं दम और करते हैं हिन्दी को ही बेदम।’
कुछ छोटे-छोटे से उदाहरण आपके सामने हैं जो अपने आप बतायेंगे कि हम कितना सही प्रयोग करते हैं हिन्दी का बोलने और लिखने में।
बहुत से लोग ‘अनेक’ शब्द को भी बहुवचन बनाकर ‘अनेकों’ लिख देते हैं। यह गलत है, ‘अनेक’ तो खुद में बहुवचन है।
लिखने में ‘आशीर्वाद’ को ज्यादातर ‘आर्शीवाद’ लिखने की गलती की जाती है। ठीक इसी तरह की गलती ‘अन्तर्राष्ट्रीय’ को ‘अन्र्तराष्ट्रीय’ लिखकर की जाती है।
‘संन्यासी’ शब्द को ‘सन्यासी’ तथा ‘उज्ज्वल’ को ‘उज्जवल’ लिखने की गलती बहुत देखने को मिलती है।
‘उपलक्ष’ तथा ‘उपलक्ष्य’ का अर्थ अलग-अलग है फिर भी दोनों को अधिकतर एक ही अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है।
इसी तरह योजक शब्द ‘और’, ‘तथा’, ‘एवं’, ‘व’ सीधे-सीधे और के ही रूप में प्रयोग किये जाते हैं किन्तु यदि देखा जाये तो इनका प्रयोग अलग-अलग तरह से किया जाता है। (इस बारे में बाद में)
हम अब तो पत्र लिखना लगभग बन्द ही कर चुके हैं। जब लिखते थे और जो आज भी लिख रहे हैं वे अपने पत्र में अपने से बड़ों को सम्बोधित करने में इस प्रकार की गलती जरूर करते हैं। ‘पूज्य’ और ‘पूजनीय’ का अन्तर नहीं कर पाते हैं। सम्बोधन में ‘पूज्य’ अकेले ही प्रयोग किया जाता है, ‘पूज्यनीय’ शब्द गलत है। इसके स्थान पर ‘पूजनीय’ का प्रयोग किया जाना चाहिए।
इस तरह के और बहुत से शब्द हैं जो हम आमतौर पर गलत प्रयोग करते हैं। इसके अलावा लिखने और बोलने में बहुत बार हम शब्दों के क्रम पर और उसके रूप पर भी ध्यान नहीं देते हैं। गलत प्रयोग करते हैं किन्तु किसी के टोकने पर हिन्दी भाषी होने का कुतर्क करते हैं और अपनी ही बात को सही साबित करने का प्रयास करते रहते हैं। (यहाँ भी कुछ ऐसा ही होने वाला है।)
आपने देखा होगा कि हम आम बोलचाल के रूप में अधिकतर कहते दिखते हैं ‘‘पानी का गिलास उठा देना’’ या फिर ‘‘पानी की बोतल ला देना’’। सोचिए क्या वाकई ‘गिलास’ या ‘बोतल’ पानी के हैं?
इसी तरह हम कहते हैं ‘‘एक फूल की माला देना’’। क्या अर्थ हुआ इसका? ‘एक फूल’ की माला?
लिखने-बोलने की एक बहुत बड़ी गलती होती है जब हम लिखते-कहते हैं ‘महिला लेखिकायें’ या ‘महिला लेखिका’। यह गलती बड़े-बड़े हिन्दी पुरोधाओं को करते देखी है। यदि ‘महिला लेखिका’ है तो ‘पुरुष लेखिका’ भी कहीं होगी? अरे भाई ‘लेखिका’ तो अपने आप में महिला होने का सबूत है।
शब्दों के क्रम का गलत प्रयोग किस तरह हम करते हैं और पूरा-पूरा अर्थ बदल देते हैं, इसका एक उदाहरण देकर अपनी बात समाप्त करते हैं।
एक शब्द है ‘केवल’ और इसका गलत प्रयोग क्या-क्या गुल खिला सकता है, देखिएगा।
‘केवल’ मैं सवाल हल कर सकता हूँ।
(इसका अर्थ हुआ कि सवाल ‘मैं’ ही हल कर सकता हूँ।)
मैं ‘केवल’ सवाल हल कर सकता हूँ।
(इसका अर्थ हुआ कि मैं केवल ‘सवाल’ हल कर सकता हूँ और कुछ हल नहीं कर सकता हूँ।)
‘मैं सवाल ‘केवल’ हल कर सकता हूँ।
(इसका अर्थ होगा कि मैं सवाल को केवल ‘हल’ कर सकता हूँ, उसे समझा नहीं सकता हूँ।)
चलिए आज इतना ही, यह न सोचिएगा कि हम क्लास लेने लगे। हम तो हिन्दी के एक बहुत छोटे से विद्यार्थी हैं। गलती हम भी करते हैं और सीखने का प्रयास करते हैं। घमंड हमें भी अपने हिन्दी भाषी होने का है पर हिन्दी को बिगाड़ना हमें मंजूर नहीं। जिसे जो कहना हो कहे पर हिन्दी भाषी होने का कतई तात्पर्य यह नहीं कि हम हिन्दी सही लिखते-बोलते हैं। आशा है कि आप हमें भी हमारी गलती बतायेंगे।
23 मई 2009
हिन्दी भाषियों की गलतियाँ
हिन्दी भाषियों की गलतियाँ
सरकार का शपथ ग्रहण समारोह चल रहा था, सांसद जो अब मंत्री पद प्राप्त कर चुके थे, शपथ ले रहे थे। हम ऐसे कार्यक्रम देखने का प्रयास करते हैं, इस कारण से नहीं कि कोई विशेष रुचि है वरन् इस कारण से कि ऐसे कार्यक्रमों में कुछ न कुछ विशेष देखने को भी मिल जाता है। अपने सांसदों, मंत्रियों को भाषा के प्रति प्रेम बड़ी ही सुन्दरता से परिलक्षित होता है।
हिन्दी भाषियों का भी हिन्दी का गलत उच्चारण करना, गलत तरह से लिखना-बोलना हमें हैरत में डालता है। इस पोस्ट के द्वारा हमारा उद्देश्य कदापि हिन्दी सिखाना नहीं है न ही यह समझाना है कि सही हिन्दी क्या है, कैसे बोली-लिखी जाये। दरअसल हुआ यह कि कुछ दिनों पूर्व एक ब्लाग पर हिन्दी को लेकर की गई टिप्पणी पर सात मेल प्राप्त हुए, जिनके द्वारा कुछ सवाल उठाये गये थे। यहाँ हम पुनः स्पष्ट कर दें कि हमारा मकसद कतई किसी को हिन्दी सिखाने का नहीं है। बस थोड़ा सा प्रयास यह दिखाने का है कि ‘हम हिन्दीभाषी होने का भरते हैं दम और करते हैं हिन्दी को ही बेदम।’
कुछ छोटे-छोटे से उदाहरण आपके सामने हैं जो अपने आप बतायेंगे कि हम कितना सही प्रयोग करते हैं हिन्दी का बोलने और लिखने में।
बहुत से लोग ‘अनेक’ शब्द को भी बहुवचन बनाकर ‘अनेकों’ लिख देते हैं। यह गलत है, ‘अनेक’ तो खुद में बहुवचन है।
लिखने में ‘आशीर्वाद’ को ज्यादातर ‘आर्शीवाद’ लिखने की गलती की जाती है। ठीक इसी तरह की गलती ‘अन्तर्राष्ट्रीय’ को ‘अन्र्तराष्ट्रीय’ लिखकर की जाती है।
‘संन्यासी’ शब्द को ‘सन्यासी’ तथा ‘उज्ज्वल’ को ‘उज्जवल’ लिखने की गलती बहुत देखने को मिलती है।
‘उपलक्ष’ तथा ‘उपलक्ष्य’ का अर्थ अलग-अलग है फिर भी दोनों को अधिकतर एक ही अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है।
इसी तरह योजक शब्द ‘और’, ‘तथा’, ‘एवं’, ‘व’ सीधे-सीधे और के ही रूप में प्रयोग किये जाते हैं किन्तु यदि देखा जाये तो इनका प्रयोग अलग-अलग तरह से किया जाता है। (इस बारे में बाद में)
हम अब तो पत्र लिखना लगभग बन्द ही कर चुके हैं। जब लिखते थे और जो आज भी लिख रहे हैं वे अपने पत्र में अपने से बड़ों को सम्बोधित करने में इस प्रकार की गलती जरूर करते हैं। ‘पूज्य’ और ‘पूजनीय’ का अन्तर नहीं कर पाते हैं। सम्बोधन में ‘पूज्य’ अकेले ही प्रयोग किया जाता है, ‘पूज्यनीय’ शब्द गलत है। इसके स्थान पर ‘पूजनीय’ का प्रयोग किया जाना चाहिए।
इस तरह के और बहुत से शब्द हैं जो हम आमतौर पर गलत प्रयोग करते हैं। इसके अलावा लिखने और बोलने में बहुत बार हम शब्दों के क्रम पर और उसके रूप पर भी ध्यान नहीं देते हैं। गलत प्रयोग करते हैं किन्तु किसी के टोकने पर हिन्दी भाषी होने का कुतर्क करते हैं और अपनी ही बात को सही साबित करने का प्रयास करते रहते हैं। (यहाँ भी कुछ ऐसा ही होने वाला है।)
आपने देखा होगा कि हम आम बोलचाल के रूप में अधिकतर कहते दिखते हैं ‘‘पानी का गिलास उठा देना’’ या फिर ‘‘पानी की बोतल ला देना’’। सोचिए क्या वाकई ‘गिलास’ या ‘बोतल’ पानी के हैं?
इसी तरह हम कहते हैं ‘‘एक फूल का माला देना’’। क्या अर्थ हुआ इसका? ‘एक फूल’ की माला?
लिखने-बोलने की एक बहुत बड़ी गलती होती है जब हम लिखते-कहते हैं ‘महिला लेखिकायें’ या ‘महिला लेखिका’। यह गलती बड़े-बड़े हिन्दी पुरोधाओं को करते देखी है। यदि ‘महिला लेखिका’ है तो ‘पुरुष लेखिका’ भी कहीं होगी? अरे भाई ‘लेखिका’ तो अपने आप में महिला होने का सबूत है।
शब्दों के क्रम का गलत प्रयोग किस तरह हम करते हैं और पूरा-पूरा अर्थ बदल देते हैं, इसका एक उदाहरण देकर अपनी बात समाप्त करते हैं।
एक शब्द है ‘केवल’ और इसका गलत प्रयोग क्या-क्या गुल खिला सकता है, देखिएगा।
‘केवल’ मैं सवाल हल कर सकता हूँ।
(इसका अर्थ हुआ कि सवाल केवल ‘मैं’ ही हल कर सकता हूँ।)
मैं ‘केवल’ सवाल हल कर सकता हूँ।
(इसका अर्थ हुआ कि मैं केवल ‘सवाल’ हल कर सकता हूँ और कुछ हल नहीं कर सकता हूँ।)
‘मैं सवाल ‘केवल’ हल कर सकता हूँ।
(इसका अर्थ होगा कि मैं सवाल को केवल ‘हल’ कर सकता हूँ, उसे समझा नहीं सकता हूँ।)
चलिए आज इतना ही, यह न सोचिएगा कि हम क्लास लेने लगे। हम तो हिन्दी के एक बहुत छोटे से विद्यार्थी हैं। गलती हम भी करते हैं और सीखने का प्रयास करते हैं। घमंड हमें भी अपने हिन्दी भाषी होने का है पर हिन्दी को बिगाड़ना हमें मंजूर नहीं। जिसे जो कहना हो कहे पर हिन्दी भाषी होने का कतई तात्पर्य यह नहीं कि हम हिन्दी सही लिखते-बोलते हैं। आशा है कि आप हमें भी हमारी गलती बतायेंगे।
20 मई 2009
शान्ति चाहिए तो पत्नी की जी-हुजूरी करें
आज सुबह-सुबह समाचार-पत्र देखा तो चौंक से गये। एकबारगी लगा कि पहली अप्रैल तो निकले एक महीने से ऊपर हो चुका है फिर ऐसी खबर? सोचा शायद समाचार-पत्र वाले भी मजा लेने लग, चुनाव के परिणामों से हतप्रद होकर। .................पर सब गलत, समाचार एकदम सही था।
देश के सर्वोच्च न्यायालय ने साफ-साफ कहा है कि यदि सुखी जीवन व्यतीत करना हो तो पत्नी जो कहे उसे मानो। (यहाँ सम्भव है कि वही शब्द प्रयोग न हो सकें जो कहे गये पर उनका सार यही है) समाचार में आगे कहा गया कि उच्च्तम न्यायालय ने कहा कि यदि पत्नी कहे कि उधर मुँह फेर लो तो मुँह उधर ही फेर लो।
इस तरह का निर्णय न्यायालय ने एक तलाक के मामले में दिया। एकदम से विचार उन लोगों का आया जो महिलाओं को निरीह, अबला और शोषित बताते घूमते हैं। यदि यह बात किसी नेता, समाज सुधारक, साहित्यकार या फिर किसी अन्य ने कही होती तो अभी तक बवाल मच गया होता। (सम्भव है कि इस पर भी टीका-टिप्पणी हो क्योंकि पिछले दिनों एक न्यायाधीश के अपमान का मामला भी सामने आ चुका है)
सत्यता बहुत हद तक आज यह है भी। घरेलू हिंसा के रूप में महिलाओं के ऊपर होती हिंसा दिखती है, वह चाहे शाब्दिक हो, शारीरिक हो, मानसिक हो पर पुरुषों के ऊपर होती हिंसा कतई नहीं दिखती।
ऐसे एक दो नहीं कई घरों और पुरुषों को हम स्वयं व्यक्तिगत रूप से जानते हैं जो अपनी पत्नी और उसके मायके वालों से पीड़ित हैं। कई ऐसे निर्दोष परिवार भी हमारे सम्पर्क में हैं जो बिना किसी प्रकार की हिंसा करने के बाद भी दहेज प्रताड़ना के मुकदमे को झेल रहे हैं।
यह बात तो सौ फीसदी सही है कि समाज पुरुष प्रधान रहा और महिलाओं को दोयम दर्जे का समझा जाता रहा किन्तु अब भी यही बात लागू नहीं है। अब पुरुष महिलाओं को पूरा साथ दे रहे हैं। घर के कामों में भी हाथ बँटाया जा रहा है, बच्चों को भी सँभाला जा रहा है अन्य दूसरे कामों के द्वारा महिलाओं को सहयोग दिया जा रहा है।
अन्त में एक बात बस इसे विवाद न बनाइयेगा, आज महिला यदि तरक्की नहीं कर पाती है तो पुरुष को दोष देती है किन्तु यदि तरक्की कर जाती है तो उसके लिए पुरुष का बिलकुल भी सहयोग नहीं मानती।
क्या वाकई पुरुष बिलकुल सहयोग नहीं करते? एक पढ़ी-लिखी महिला को क्या उसके पिता ने शिक्षित होने में सहयोग नहीं किया? आज तमाम महिला ब्लागर हैं क्या वे सब बिना सहयोग के ऐसा कर रहीं हैं? आज तमाम सारी महिलायें अनेक क्षेत्रों में हैं क्या इसमें किसी भी पुरुष का बिलकुल भी सहयोग नहीं?
चलिए अब तो उच्चतम न्यायालय ने कह भी दिया नहीं भी कहा होता तो भी हम तो मान ही रहे थे कहना क्योंकि अभी शादी को बहुत वक्त नहीं हुआ और पुलिस से बड़ा डर लगता है। पता चलता लिया-दिया कुछ नहीं और डंडे पड़े सो अलग से.............
भइया मान भी जाओ...........जो कहे सो करो............समझे???
18 मई 2009
यादें कभी हंसाती हैं, कभी रुलातीं हैं
कई बार तन्हा बैठे हुए बहुत पुरानी बातें याद आतीं हैं। यादों का अपना ही मजा है। अकसर लोगों को कहते देखा जाता है कि ‘क्या बात है भूल गये क्या?’ या फिर कि ‘अब याद ही नहीं करते?’ इस याद करना/न करना और भूल जाने को लेकर ग़ज़ल गायक गुलाम अली द्वारा गायी एक ग़ज़ल का शेर हमेशा याद आता है ‘‘वो उन्हें याद करें जिसने भुलाया हो कभी, हमने उनको न कभी भुलाया न कभी याद किया।’’
क्या वाकई हम उन्हें ही याद करते हैं जिन्हें हम भुला चुके होते हैं? देखा गया है कि हम भले ही किसी को भुलायें या न भुलायें वक्त की मार हमें बहुत कुछ भुलाने को मजबूर कर देती है। इसके बाद भी बहुत से पल हमारे जीवन में कुछ इस तरह से गुजरे होते हैं कि हम अकसर उनको याद कर ही लेते हैं। ये बात भी है कि हम उन्हें भुलाये भी नहीं होते।
इन्हीं हसीन लम्हों के साये हमारे साथ सदा चलते रहते हैं जो कभी मनुष्य को मजबूत बनाते हैं कभी उसे कमजोर करते हैं। यादों का साथ यदि सुखद है तो व्यक्ति उन्हीं के साथ अपने को जुड़ा महसूस करता है। इसी तरह यदि हमारी यादों में अपने किसी विशेष की विशेष बातें जुड़ीं हैं तो वे हमारी आँखों को नम करतीं रहतीं हैं।
बचपन की बातें, माता-पिता का दुलार, बिछड़ गये यार-दोस्तों के साथ चुहल के पल हमें बैठे-बिठाये सताने को चले आते हैं। ये वो स्थितियाँ हैं जो लौट कर नहीं आतीं हैं। आज पीछे पलट कर देखते हैं तो अपने बहुत से साथियों से दशकों पुरानी बातें जुड़ी पातें हैं। फोटो एलबम में अपने बदले हुए चेहरों के साथ उनको फिर से खोजने की चाहत रहती है। कुछ ने तो अपनी दस्तक दी तो कुछ अभी भी नदारद हैं।
लोगों को कहते सुना था कि तकनीक ने, इंटरनेट ने दुनिया को छोटा कर दिया है, एक विश्व-ग्राम का रूप बन गया है। अब लगता है कि संसार अभी भी उतना ही व्यापक है या कहें कि अब और भी अधिक दूर हो गये हैं हम एक-दूसरे से। तकनीक ने हमें करीब तो किया है पर नजदीक नहीं ला सकी है। तकनीक ने समूचे विश्व को एक मुट्ठी में समेट दिया है पर भाईचारा समाप्त कर दिया है। यदि ऐसा न होता तो क्यों हमारे बिछड़े साथी अभी तक हमें न मिल सके?
आशा करते हैं कि यादों के सहारे ही अपने दोस्तों से मिलना न होता रहेगा। विश्व-ग्राम की किसी गली में उन सभी से मिलना हो सकेगा जो अभी तक नहीं मिल सके हैं।
17 मई 2009
भाजपा की हार - कारण और निवारण
वर्तमान चुनाव परिणामों ने मीडिया की, चुनाव सर्वे करवाने वाली संस्थाओं की, राजनेताओं की साथ ही साथ आम मतदाता की एक प्रकार से सिट्टी-पिट्टी गुम कर दी है। आज भले ही ‘सिंह इज किंग’ का नारा ठोंक कर कांग्रेस विजयी मुद्रा में ‘जय हो’ की जयकार कर रही हो पर सत्यता तो यह है कि उन्हें स्वयं इन परिणामों की अपेक्षा ही नहीं थी।
भाजपा भी स्वयं को शायद इस स्थिति में खड़ा नहीं देख रही थी। सत्ता के आसपास आने की चाह रखने से इस परिणाम को स्वीकार कर पाना ही उसके लिए कठिन साबित हो रहा है। भाजपा के लिए हार के कुछ कारण रहे और उन कारणों के कुछ परिणाम भी हैं। ये कारण और परिणाम अपना कर भाजपा आने वाले चुनावों में अपने आपको पुनः स्थापित कर सकती है।कारण एक-भाजपा द्वारा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की संकल्पना का निर्धारण करना।
निवारण-इस देश में जहाँ कि चारण-भाट परम्परा अभी तक कायम है, हम अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं, सांस्कृतिक वातावरण को पिछड़े और दकियानूसी होने की निशानी माना जाता हो वहाँ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को लोग कैसे पचा सकते हैं? भाजपा को आगे सफल होना है तो इस संकल्पना को छोड़ना होगा।
---------------------कारण दो-भाजपा के साथ राम का नाम जुड़ा है।
निवारण-भाजपा स्वयं सवाल करे कि राम हैं या थे कौन?
एक ऐसा काल्पनिक पात्र जो तुलसी दास द्वारा महिमामंडित किया गया। कांग्रेस द्वारा इस बात का हलफनामा अदालत में दिया भी गया था। एक ऐसा व्यक्ति जो अपनी पत्नी सीता का ही भाई था (ऐसा कांग्रेस के कम बोलने वाले बुजुर्ग नेता ने सहमत संस्था के द्वारा लोगों को समझाया था) एक ऐसा राजा जिसने शंबूक का वध किया और इस कारण से कि वह उस समय, कालखण्ड के अनुसार गलत कार्य कर रहा था। एक ऐसा पति जिसने बारबार अपनी पत्नी को किसी न किसी रूप में प्रताड़ित किया। एक ऐसा भाई जिसने अपने छोटे भाई को उकसा कर दूसरे भाई (रावण) की बहिन की नाक-कान कटवा दिये।
आखिर इस प्रकार के पात्र और वो भी काल्पनिक के लिए क्यों पूरे देश में उत्पात मचा रखा है।
भाजपा यदि वोट चाहती है तो राम नाम को सिरे से खारिज करना होगा।
-----------------कारण तीन-भाजपा ने हिन्दुओं की बात भी भारत देश में रखी।
निवारण-हिन्दुओं की बात करने के पहले भाजपा को हिन्दुओं के इतिहास को खंगालना चाहिए था। बर्बर जाति, कट्टर धर्म, आक्रांता, बात-बात पर अपने धर्म का बखान करने वाले, वर्षों तक अपनी संस्कृति के नाम पर सोने वाले की बात करना कहाँ की राजनीति है? एक ऐसा धर्म जो साम्प्रदायिक हो, जो कहता है कि हमें अपने हिन्दू होने पर गर्व है, जो बिना किसी भेदभाव के सभी धर्मों को मानता हो फिर भी वह मुसलमानों, ईसाइयों को डराता-धमकाता रहता हो.........और भी बहुत बुराइयाँ हैं हिन्दू होने में। तब इस प्रकार के लोगों की बात करके भाजपा ने देश में डर का वातावरण तैयार कर दिया है।
यदि भाजपा चाहती है कि वह भी निष्कंटक बड़े दल की तरह सत्ता में रहे तो उसके लिए आवश्यक है कि हिन्दू क्या है, कौन है बिलकुल ही भूल जाये।
----------------कारण चार-भाजपा के पास देश के लिए शहीद होने वाला परिवार नहीं।
निवारण-देश में जब सदा से ही राजनीति एक परिवार को केन्द्र में रखकर होती रही हो वहाँ कैसे सम्भव है कि बिना परिवार के सत्ता प्राप्त कर ली जाये? चाटुकारिता के नाम पर भाजपा के पास ऐसा कोई परिवार नहीं जिसके सदस्यों ने शहीद होना सीखा हो, भले ही वे आतंकवादी घटनाओं का शिकार हुए हों। आखिर जब परिवार के नाम पर चापलूसी इस देश में कायम है, गुलामी की आदत अभी भी हमारे खून से निकली नहीं है तब बिना परिवार के सत्ता पाना लोहे के चने चबाना है।
यदि भाजपा अपने आसपास निगाह दौड़ाये तो उसको संजीवनी मिल सकती है। वरुण और मेनका के रूप में एक परिवार एसके पास भी है जिसके नाम पर देशवासियों की आँखों को नम किया जा सकता है, गरीबी के बाद भी वोट को पाया जा सकता है।
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आज के लिए यही चार कारण पर्याप्त हैं क्योंकि वर्तमान परिदृश्य में यही चार मायने भी रखते हैं।
16 मई 2009
भाजपा की हार या कांग्रेस की जीत या.......
रात्रि के बजे हैं 11:20 और अभी-अभी टी0वी0 छोड़ कर उठे हैं। सारे दिन किसी न किसी रूप से परिणाम जानने की चाह बनी रही। चाह इस कारण से क्योंकि हमारे शहर में विद्युत व्यवस्था का आलम यह है कि दोपहर में 12 बजे जाने के बाद रात में आठ बजे ही घर में तारों के द्वारा प्रवेश करती है। तीन-चार दिनों से आलम और भी खराब था, पता नहीं चुनाव परिणामों के बाद सरकार बनवाने-बनाने का जिम्मा इसके ऊपर भी था। दोपहर को थोड़ी सी मशक्कत इन्वर्टर के साथ करने के बाद मिनट-मिनट को तो साथ देता किन्तु पूरी तरह साथ न दे सका। परिणामतः बीच रास्ते में उसको भी बन्द करना पड़ा।
दोस्तों, रिश्तेदारों एवं अपने राजनीतिक मित्रों को फोन कर-करके परिणामों को प्राप्त करते रहे। केन्द्र में जो सरकार सोची थी वही बनी बस अन्तर हमारी सोच में यह रहा कि बिना फोर्थ-फ्रंट के बन गई। भाजपा गठबंधन की जो हालत सोची थी लगभग वही हुई। बसपा सरकार की सोशल इंजीनियरिंग लगभग फेल साबित हुई। मुलायम ने अपनी इज्जत को काफी कुछ बचाये रखने का प्रयास किया।
जहाँ तक देश की दो सबसे बड़े दल कांग्रेस और भाजपा का सवाल है तो यह तो तय था कि किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलेगा। ऐसी स्थिति में भाजपा को सहयोग मिलना आसमान से तारे तोड़ने जैसा ही होगा।
भाजपा की स्थिति के बारे में हम कल अपनी पोस्ट पर राय ले भी चुके थे। अपने शहर में भी हम इस तरह से छोटे-छोटे सर्वे विविध विषयों पर करते-करवाते रहते हैं।
यदि हम इन चुनावों के नतीजों पर नजर दौड़ायें तो यह तो आश्चर्य होता है कि कांग्रेस को एकाएक इतनी सीटें क्यों और कैसे प्राप्त हो गईं? मीडिया और ‘‘अब’’ कांग्रेस दल के कथित प्रख्यात (.........) ये शब्द नहीं लिखेंगे, रासुका से डर लगता है, बयानबाजी करते घूम रहे हैं कि राहुल गांधी के प्रचार ने इतना बड़ा उलटफेर किया। क्या वाकई ऐसा है?
राहुल का दलित के घर जाना, खाना, सोना क्या मीडिया का मिला-जुला ड्रामा नहीं था?
मीडिया के द्वारा युवराज कहते रहने की सामंती सोच का परिणाम है कि बसपा के दलित वोट बैंक में सेंध (कुछ हद तक) काग्रेस सफल रही।
कांगेस की हार के पीछे भाजपा की असफलता भी बहुत प्रभावी रही। और देखा जाये तो भाजपा की असफलता के पीछे मीडिया का, मीडिया का और सिर्फ मीडिया का ही हाथ रहा। इस कारण के अलावा और भी दूसरे कारण रहे किन्तु वे इतने प्रभावी नहीं कहे जा सकते कि भाजपा की इतनी बुरी हार होती औश्र कांग्रेस की इतनी अच्छी जीत होती।
मीडिया द्वारा भाजपा के भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप करने से लेकर आज तक सिर्फ ‘‘भेड़िया आया, भेड़िया आया’’ जैसी बातें उछाली जातीं रहीं। आम जनता ने भी चैबीसों घंटे उसी बात को सुन-सुन कर मान लिया था कि भाजपा जैसा कोई भेड़िया आया है जिससे कांग्रेस जैसा ही कोई छुटकारा दिला सकता है।
इसके अलावा भाजपा का अपनी चिरपरिचित शैली को छोड़ कर अन्य दूसरे दलों जैसा ही काम करना शुरू करना भी हार का एक बड़ा कारण है। भाजपा ने कांग्रेसी शासन से ऊब चुके लोगों के सामने स्वयं को कुछ अलग तरह से प्रस्तुत किया था किन्तु इस लोकसभा चुनावों तक आते-आते भाजपा भी अपना कांग्रेसीकरण करवा चुकी थी। आम जनता किसी भी रूप में कांग्रेस का डुप्लीकेट नहीं चाहती थी। उसने डुप्लीकेट से अच्छा सीधे-सीधे मूल कांग्रेस को ही चुनना पसंद किया।
कारण हार के इसके अलावा और भी हैं जो सीधे ऊपर भेजे जायेंगे। हाँ यह तो तय हो चुका है कि यदि भाजपा को अब भारतीय राजनीति में अपने आपको फिर साबित करना है तो उसे अन्य दूसरे दलों की तरह तुष्टिकरण की नीति को छोड़कर अपना मूल स्वरूप ही अपनाना होगा। भाजपा को स्वयं समझना होगा कि उसके मूल रूप में हिंसा कदापि नहीं है। यह स्वरूप मीडिया द्वारा एवं अन्य राजनैतिक दलों द्वारा कृत्रिम रूप से बनाया गया है।
कुछ बातों पर विचार करके फिर उभर कर आया जा सकता है क्योंकि अभी कांग्रेस में एक-दो साल बाद प्रधानमंत्री को लेकर उठापटक होगी और उस समय भाजपा के पास अवसर होगा कि वह जनता को उसके द्वारा की गई गलती को दिखा सके।
15 मई 2009
दो लाइन की पोस्ट - एक सवाल
फिरसे एक छोटा सा सवाल -
भारतीय जनता पार्टी से मीडिया को,
राजनैतिक दलों को इतनी इलर्जी क्यों है?
13 मई 2009
लोकतंत्र की समाप्ति और हमारी बेताबी ड्रामा देखने की
लोकतन्त्र की आज समाप्ति हो गई। घबराइये नहीं, कोई सैनिक शासन लागू होने नहीं जा रहा है। आज चुनाव समाप्त हो गये हैं। अब आम जनता के हाथ से गेंद निकल कर नेताओं के पाले में पहुँच गई है। वैसे भी लोकतन्त्र चुनावों में पराजित हो ही चुका है; कम मतदान होने के कारण। सोचिए कि 45-50 प्रतिशत लोगों द्वारा लोकतांत्रिक व्यवस्था में आस्था जताना क्या लोकतन्त्र की पराजय नहीं है?
वैसे भी जितना लोकतन्त्र बचा था वह अब समाप्त हो गया है। अब नेताओं के मिलने-मिलाने के, बैठक करने के दौर, चाय-पानी के दौर शुरू हो चुके हैं। अब आम जनता के हाथ में इतना ही है कि वह खाली बैठे तमाश देखे और बाद में सरकार के पक्ष में या विपक्ष में अपनी राय व्यक्त करे।
कौन बनायेगा सरकार? कौन होगा प्रधानमंत्री? कौन-कौन होगा सरकार में शामिल? ये सवाल हैं जिनका उत्तर सिर्फ नेताओं के हाथ में ही है। (याद कीजिए चल रही लोकसभा के प्रधानमंत्री की नियुक्ति के बाद का पूरा ड्रामा) चलिए हाथ पर हाथ रखकर बैठिये और दो दिन बाद पूरे दिन टीवी के सामने बैठ कर अपना दिन खराब करियेगा। पूरे दिन में दस बारह कप चाय के सुड़कियेगा। जिनकी शादी हो गई है वे अपनी पत्नी की और जो अभी तक इससे लाभान्वित नहीं हुए हैं वे बार-बार चाय की फरमाइश करने पर घर की अन्य महिलाओं से फटकार सुनने को भी तैयार रहें।
परिणाम के बाद आप मुँह खोल कर ही अगले कदम का इंतजार करियेगा क्योंकि ये तय बात है कि नतीजा आपकी आशा के अनुरूप नहीं होगा। यही तो लोकतन्त्र है। (नहीं भाई लोकलतन्त्र नहीं कहिए)
आज इस बार की अन्तिम चुनावी चकल्लस-हमने अपनी चाल चल दी अब उनकी बारी,
देखो सरकार बनाने की आती किसकी बारी,
फैसला हो कुछ भी वे तय कर बैठे हैं,
होगा किसका दरबार और कौन होंगे दरबारी।
12 मई 2009
सवालों के जवाब चाहिए हैं आज......
इन दिनों ब्लाग पर कुछ विशेष विषयों को लेकर काफी कुछ लिखा जा रहा है। इस लेखन के पीछे क्या छिपा है यह तो लिखने वाले ही जाने पर यह तो साफ है कि समय के साथ चलते हुए लेखन भी अपनी टी0आर0पी0 जैसी व्यवस्था बना लेता है।
लेखन हो रहा है महिलाओं को लेकर; कोई महिलाओं की आयु विशेष को ध्यान में रखकर अपनी पोस्ट लिख रहा है। किसी के सामने प्रश्न रखे जा रहे हैं। कोई राम-सीता-रामायण को लेकर अपने विचारों की प्रस्तुति कर रहा है। अच्छा है कम से कम ब्लाग के माध्यम से ही सही महिलाओं की स्थिति पर चर्चा तो हो रही है।
चर्चा होना अच्छी बात है पर इस चर्चा के पीछे उद्देश्य अच्छा हो तो और भी अच्छी बात है। अकसर देखा गया है कि इस प्रकार की चर्चा में अपनी स्थिति के विकास और अपनी स्थिति को सही करने से अधिक चर्चा पुरुष वर्ग को दोष देने की, उसको कोसने की होती है। इस बात से तो कोई भी इंकार नहीं कर सकता कि समाज में पुरातनकाल से ही महिलाओं के साथ अलग तरह का व्यवहार होता रहा है। पर क्या हर बार इसी बात को दोहरा देने से, इसी व्यवस्था को लेकर समूचे पुरुष वर्ग को कोसते रहने से समस्या का हल निकल आयेगा?
अरे, महिला अपना शरीर दिखाती है बेशक दिखाये, पुरुष को उसको रोकने-टोकने का अधिकार नहीं होना चाहिए। अब इसी के ठीक उलट यदि किसी महिला के साथ कोई ज्यादती हो जाती है तो फिर वह घूम कर पुरुष वर्ग की शरण में ही क्यों आती है? बहरहाल सवाल बहुत हैं पर जवाब शायद ही किसी का प्राप्त हो। महिलायें अपनी किसी भी स्थिति के लिए सिर्फ और सिर्फ पुरुष को दोष देना जानतीं हैं। यहाँ एक बात गौर करने लायक है कि क्या समूचा पुरुष वर्ग ही दोषी है?
आज इस पोस्ट को लिखने का कारण भी यही है। कल एक समाचार पर निगाह पड़ी, जिसमें लिखा था कि एक बहू ने अपने ससुर को इतना मारा कि वह घायल होकर उपचार के दौरान मर गया। आपस में चर्चा के दौरान जब इस समाचार पर भी अपनी महिला मित्रों की राय ली तो उन सभी का एक सुर में कहना था कि अवश्य ही ससुर ज्यादती करता होगा। एक अन्य पहलू यह भी सामने आया कि जब पुरुष की पिटाई से कोई महिला मर जाती है तो चर्चा नहीं होती। कहने का आशय यह कि सब जायज है।
इसी बात पर बहुत पुरानी एक घटना, हमारे शहर की, याद आ गई। आज से लगभग 15 साल पहले की बात है, तब हमारे शहर में एक लड़के ने आत्महत्या कर ली थी। कारण था उसकी सगी बड़ी बहिन द्वारा उसका शारीरिक शोषण करना। उस समय शायद कोई भी इस बात को सहजता से स्वीकार नहीं कर पा रहा होगा कि कोई लड़की भी किसी लड़के का शारीरिक शोषण कर सकती है। आज भी गाहे-बगाहे उस चर्चा के दौरान लड़के को ही भला-बुरा कहा जाता है।
पोस्ट पर आज टिप्पणी नहीं चाहिए सवालों के जवाब चाहिए। जो भी जवाब दे, महिला हो तो और बेहतर, हाँ टिप्पणी की आज हमें चाह नहीं।
बहुत बार बलात्कार के सम्बन्ध में पुरुष मानसिकता को दोष दिया जाता है कि महिला का क्या कसूर, पुरुष फिर भी उस पर ताने मारता है। सवाल एक और यह कि किसी भी शादी में दहेज कम मिलने पर नवविवाहिता बहू को सास, ननद, जेठानी के ताने ज्यादा सुनने को मिलते हैं या फिर घर के पुरुषों के? सवाल यह भी कि शादी के बाद बहू की कोख जल्दी न भरने पर बाँझ, कुलटा, कुलबोरन जैसे बहुप्रशंसित शब्दों से बहू को कौन नवाजता है और क्यों? सवाल यह भी महत्वपूर्ण है कि आस-पड़ोस के लड़के और लड़की के अफेयर की खबर को मुहल्ले में प्रसारित करने का सबसे बेहतरीन कार्य कौन करता है, पुरुष या महिला? इस बात पर सवाल कि यदि आपके घर के लड़के की शादी जिस लड़की से होने वाली है और मालूम हो जाये कि उसके साथ बलात्कार हुआ था तो क्या उसको घर की बहू बना लिया जायेगा? (यह सवाल विशेष रूप से उन महिलाओं से जो नारी सशक्तिकरण के नाम पर झंडा बुलन्द करतीं हैं और पुरुषों को गाली देकर इतिश्री कर लेतीं हैं)
सवाल बहुत हैं पर इतने ही सवालों के जवाब बिना पूर्वाग्रह के मिल जायें यही बहुत है। किसी भी गलती के लिए किसी दूसरे के सिर पर ठीकरा फोड़ना आसान है। पिछले दिनों एक जगह पढ़ा कि महिलायें क्यों स्वयं ही अपना बदन दिखाने में लगीं हैं? इसका जवाब एक महिला द्वारा ही कुछ इस प्रकार दिया गया कि अभी तक पुरुष महिला के बदन को नग्न रूप में दिखा कर पैसे कमाता रहा। यदि अब एक महिला स्वयं अपने शरीर को दिखा कर खुद पैसे कमा रही है तो पुरुष को आपत्ति क्यों हो रही है? क्या वाकई इस सवाल का यही जवाब होना चाहिए?
दोषारोपण करने से पहले स्वयं महिलाओं को समझना होगा कि उन्हें अपना विकास करना है या फिर विकास के नाम पर सिर्फ और सिर्फ पुरुष विरोध करना है। इस प्रकार से अभी तक महिला का शोषण पुरुष करता आया था अब उसके साथ-साथ महिला भी महिला का शोषण करने में लग गई है।
संभावनाओं को तलाशते-तलाशते
मानव मन कहाँ-कहाँ सम्भावनायें तलाशता घूमता है स्वयं मनुष्य को ही नहीं पता होता है। इसी मानव-मन के वशीभूत हमारे नेतागण भी अपना काम करते दिखाई देते हैं। सम्भावनाओं को तलाशने का काम किसी भी रूप में हो, किसी भी प्रकार से हो। अब देखिए गाँधी परिवार का नाम ले-लेकर एक पुत्र अपनी सम्भावनायें तलाश ही रहा था कि एक और गाँधी परिवारी पुत्र ने अपना कदम राजनीति में रख दिया। अब ये दूसरे पुत्र अपनी सम्भावनायें तलाशते नजर आये।
एक को सम्भावनायें अपने पुरखों के नाम में दिखीं तो एक ने सम्भावनाओं की खोज हिन्दुओं के मुद्दे पर की। दोनों अपने-अपने तरीके से अपना विकास करने में लग गये। हालांकि इस सब के दौरान क्या-क्या हुआ यह हमारी चर्चा का विषय नहीं है। हमारा विषय सम्भावनाओं की तलाश करना-कराना है।
तेज-तर्रार गाँधी परिवार के वारिस ने अपने पिता सा स्वरूप दिखाया तो अन्य लोगों को उन्हीं में अपनी सम्भावनायें दिखाई देने लगीं। आनन-फानन अगले की सम्भावनाओं को रोक कर अपनी सम्भावनाओं के लिए रास्ता तैयार किया गया। रासुका जैसा कठोर कदम उठाकर दिखा दिया कि जहाँ जैसे भी सम्भव होगा हर एक की सम्भावनाओं को रोका जायेगा।
इस भागा-दौड़ी के बीच किसी तरह से अदालत ने छूट दी, एक अन्य ओर से रासुका से छुटकारा मिला तो सुप्रीम-कोर्ट तक में जाने की बात होने लगी। यहीं आकर लगा कि सम्भावनाओं को तलाशते-तलाशते हमारे नेतागण अपने आपसे ही मुँह चुराने लगेंगे। वरुण गाँधी न हो गया जैसे कि कोई विश्व के लिए खतरनाक आतंकवादी हो गया, रासुका नहीं लग पाई तो उच्चतम न्यायालय तक जाना पड़ेगा।
एक ओर अदालत से फाँसी की सजा पाया व्यक्ति है जो सुख-चैन भोग रहा है और दूसरी ओर शब्दों के कारण एक दूसरा व्यक्ति कोपभाजन का शिकार बन रहा है। इसी संदर्भ में देखा जाये तो वरुण को अब विवादास्पद बनाया जायेगा। नसबंदी से सम्बन्धित बयान को आप देख लीजिए। अब सवाल उठता है कि क्या यदि वरुण ने नसबंदी करवाने की बात कही तो क्या ऐसा करना अपराध है? क्या राष्ट्र-हित में कम संतान की अवधारणा सही नहीं है? सही-गलत कुछ भी हो बस चुनाव हों तो वोट-बैंक का भी ख्याल रखना पड़ता है। चाहे कोई देश का ख्याल रखे या न रखे सभी को वोट-बैंक का ख्याल रखना चाहिए। यही आज राष्ट्रधर्म है; इसी में सम्भावनायें छिपी हैं।
चलिए और क्या सम्भावनायें होंगीं ये तो नेता खोज ही लेंगे पर धर्म के नाम पर किसी को साम्प्रदायिक औश्र किसी को धर्मनिरपेक्ष की अवधारणा को तय करने का मानक भी निर्धारित करना होगा। अन्यथा की स्थिति में एक दिन सभी लोग वोट-बैंक बने नजर आयेंगे और हम अपनी-अपनी सम्भावनायें तलाशते दिखाई देंगे।
10 मई 2009
माँ का सम्मान भी व्यावसायिक बन गया
10 मई, ‘मदर्स डे’ मना लिया गया, माँ को याद कर लिया गया। इस पोस्ट के लिखने के बारे में उस दिन से ही विचार करना शुरू कर दिया था जिस दिन से समाचार-पत्रों में, टी0वी0 में इस दिन के लिए विज्ञापन दिखा। माँ एक अक्षर होने के बाद भी अपने आप में सम्पूर्णता लिए होता है। हिन्दी भाषा के अनुसार किसी भी रचना में वर्ण का महत्व होता है। एक वर्ण अपने आप में पूर्णता नहीं लिए होता है। दो या दो से अधिक वर्णों के योग से एक शब्द का निर्माण होता है; दो या दो से अधिक शब्दों के मेल से एक वाक्य की रचना होती है; दो या दो से अधिक वाक्यों के मेल से एक अनुच्छेद बनता है और इसी तरह एक पूरी रचना निर्मित हो जाती है।
इसके ठीक उलट माँ एक वर्ण होने के बाद भी सम्पूर्ण है। आज मदर्स डे से सम्बन्धित मैसेज देखकर (मोबाइल और ई-मेल पर) देखकर लगा कि माँ जैसा पावन रिश्ता भी आज व्यावसायिकता में रंग दिया गया है। हो सकता है कि बहुत से लोग हमारे विचारों से सहमत न हों (वैसे भी ऐसे लोगों का कोई इलाज नहीं) पर हमारा मानना है कि माँ के लिए सम्मान व्यक्त करने के लिए एक दिन विशेष का होना उसकी महत्ता को ही कम करता है।
बहुत से लोगों का मानना है कि कम से कम इस एक दिन के बहाने ही हम माँ के प्रति अपने मनोभावों को व्यक्त कर लेते हैं (ऐसा आज हमने कई लोगों से पूछ कर देखा और पता किया) क्या वाकई आज माँ के प्रति आदर सम्मान व्यक्त करने के लिए किसी दिन की जरूरत है?
देखा जाये तो इस प्रकार की संस्कृति का विकास विदेशी सभ्यता के कारण ही हममें विकसित हुआ। विदेशों में हमें इस बात की कतई जानकारी नहीं कि वहाँ इस प्रकार के रिश्तों की आपस में क्या अहमियत है (बाबा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची, मामा-मामी, भाई-भाभी, बहिन-बहनोई , माँ-पिता, पत्नी, अन्य रिश्ते) सम्भव है कि वहाँ की भागदौड़ भरी जिन्दगी में माँ के लिए भी समय न निकल पाता हो और इस तरह के एक दिन की अवधारणा का विकास हो गया हो?
हम यदि अपने देश की बात करें तो माँ का रिश्ता इस प्रकार का रिश्ता है जिसे किसी भी प्रकार से परिभाषित नहीं किया जा सकता है। कोई व्यक्ति अपने मन में रिश्तों के जितने भी रूप तय कर ले सभी को वह माँ में समाहित देख सकता है। एक व्यक्ति रिश्तों की गरिमा के जितने स्वरूप निर्धारित करले वह सब माँ के द्वारा देख सकता है। माँ के लिए दो-चार शब्द लिख देना, कविता लिख देना अवश्य ही उसके प्रति हम कुछ समर्पण जैसा ही भाव रखते हैं पर क्या उसे भी एक दिन में ही बाँधा जाये?
आज जब सभी प्रकार से रिश्तों की गरिमा नष्ट हो रही है, आपस में मधुरता समाप्त हो रही है, रिश्तों के नाम पर संशय के बादल घिरे रहते हैं इस विषम स्थिति में भी माँ अपने आँचल की छाँव में मन को शीतलता देती है। प्रातःकाल उठकर ही माँ को याद कर लेना उसके प्रति सम्मान व्यक्त करना है। माँ कोई गिफ्ट नहीं चाहती, माँ कोई औपचारिकता नहीं चाहती, माँ कोई समारोह नहीं चाहती, माँ अपने लिए कोई दिन विशेष नहीं चाहती....बस माँ के लिए आदर, उसके लिए सम्मान ही उसका समारोह है, उसका गिफ्ट है।
(जो नारी-समर्थक इस दिन को एक दिन नारी के सम्मान के रूप में परिभाषित करना चाहते हैं उनसे हाथ जोड़ कर निवेदन है कि कम से कम माँ को केवल नारी जैसे दो शब्दों में न बदलें, माँ सिर्फ माँ है; वह जननी है; पूज्या है; पावन है। उसे तर्क-वितर्क, विमर्श की घालमेल से दूर ही रखो)
06 मई 2009
सलाह दे क्या करें? - (एकाउंट तो फ़िर शुरू हुआ मगर डर भी लगता है)
पिछले दो दिन और आजका दिन कुल मिला कर तीन दिनों में तीन प्रकार की मानसिक स्थितियों से गुजरना पड़ा। ये स्थितियाँ ब्लाग से सम्बन्धित रहीं। परसों यानि कि 04 मई को अपने ब्लाग के एक वर्ष पूरा होने की खुशी आप सब लोगों के बीच बाँटी थी, मन में एक अजब अनुभूति सी हो रही थी।
कल यानि कि 05 मई को जब अपने एकाउंट को साइन इन करना चाहा तो पता चला कि एकाउंट डिसएबल्ड कर दिया गया है। हम तो हैरान रह गये कि ये हो क्या गया? पूरे दिन बड़ी ही ऊहापोह में बीता। समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो गया? गूगल द्वारा आई मेल से और आशीष जी द्वारा भेजे गये सहायता संदेश से (गूगल की मेल आशीष जी की मेल के बाद आई, आशीषजी ने गूगल की मेल के बारे में पूछा भी था। जब उसके बाद मेल आई तो लगा कि कहीं गूगल के संचालन में आशीष जी का भी तो हाथ नहीं है।)
सम्बन्धित लिंक द्वारा अपनी आपत्ति दर्ज करवा देने के बाद आज यानि कि 06 मई को हमारा एकाउंट पुनः शुरू कर दिया गया है। हालांकि कल ई-मेल के द्वारा अपनी पोस्ट को तो पब्लिश करवा दिया था पर लग रहा था कि यदि हमारा एकाउंट दोबारा बहाल न हुआ तो शेष ब्लाग का क्या होगा?
अब आज एकाउंट जब दोबारा शुरू हो गया है तब भी एक डर है खुशी के साथ-साथ। अब डर लग रहा है कि कहीं ऐसा ही आगे फिर न हो?
आज आप सब ब्लाग मित्रों से, विशेष रूप से उन मित्रों, महानुभावों से जो ब्लाग के साथ तकनीकी ज्ञान की क्षमता रखते हैं, इसकी कार्यप्रणाली को अच्छे से समझते-जानते हैं एक सलाह चाहते हैं। कृपया सही-सही मार्गदर्शन करिएगा।
हम अपने वर्तमान एकाउंट को रेडिफमेल (dr.kumarendra@rediffmail.com) के द्वारा साइन इन करते हैं। इस एकाउंट से साइन इन करते हैं और ई-मेल के लिए जीमेल पर बनी ई-मेल (dr.kumarendra@gmail.com) का उपयोग करते हैं। कहीं इसी कारण तो हमारा एकाउंट डिसएबल्ड नहीं किया गया? जहाँ तक गूगल की सेवा-शर्तों के उल्लंघन की बात है तो हमने कोई भी काम ऐसा नहीं किया है जिससे किसी भी शर्त का उल्लंघन होता हो।
हमने एक एकाउंट जीमेल (dr.kumarendra@gmail.com) के द्वारा भी बना रखा है। क्या अब इस प्रकार की बाधिता के बाद उसी एकाउंट के द्वारा साइन इन करना ठीक रहेगा?
जैसा भी सही लगे बताइयेगा। हम तो अभी भी किसी न किसी रूप में गूगल की इस प्रकार की कार्यवाही से डरे से हैं। यदि रेडिफमेल के द्वारा साइन इन करना ही इसकी मुख्य वजह है तो हम अपने सारे ब्लाग जीमेल एकाउंट पर ट्रांसफर कर लेंगे। समस्या हमारे समर्थकों और अन्य दूसरे सहयोगी ब्लाग्स को होगी कि उन्हें दोबारा हमारे लिए आमंत्रण भेजना होगा। हम समझते हैं कि यदि ट्रंसफर जैसा कुछ हुआ तो आप सब साथ रहेंगे।
आप सबकी सलाह की आवश्यकता है, जैसा हो बताइयेगा। उसी के अनुसार तैयारी करके फिर से हंगामा काटा जाये।
05 मई 2009
सारी एकाउंट हैज बीन डिसएबल्ड
गूगल को उनके कहे अनुसार सारी कार्यवाही कर दी है, देखो क्या होता है?
इस पोस्ट को मेल के द्वारा भेज रहे हैं माना कि यह तो पब्लिश हो जायेगी पर हमारे दूसरे ब्लाग का क्या होगा पता नहीं?
चलिए तब तक यही सही।
हो सकता है कि एक दो दिन में इस कमी को दूर न किया जा पाया तो हम दूसरा एकाउंट बनाकर आपके सामने हुगामा काटने आयेंगे।
04 मई 2009
ब्लॉग ने किया एक वर्ष का सफर पूरा
ब्लाग की टहल के दौरान भी बहुत कुछ देखने-सीखने-सोचने को मिला। कई ब्लाग तो प्रेरणा देते दिखे तो कई ने मन को निराश किया। यह भी सबका अपना-अपना स्वभाव है। क्या करियेगा?
इसके अतिरिक्त ब्लाग पर एक अपना नितांत निजी कार्य, एक प्रकार का स्टिंग आपरेशन सा किया गया, अन्य ब्लाग की गतिविधियों को केन्द्रबिन्दु बना कर। उसके परिणाम भी बड़े चैंकाने वाले रहे (परिणाम कभी और दिन) बड़े-बड़े सूरमा इस आपरेशन के द्वारा हमारी पकड़ में आये। (इनके बारे में बतायेंगे पर बिना नाम लिये)
चलिए अपनी बात इतनी ही, सब अपनी-अपनी तरह से काम करते हैं, किसी को बुरा मानने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। हाँ, यह ध्यान अवश्य रखा जाये कि उसके काम से किसी अन्य की भावनायें आहत न हों।
हमारे ब्लाग की दीर्घायु के लिए आप सब प्रार्थना करियेगा, हम तो प्रार्थना, कार्य कर ही रहे हैं।
03 मई 2009
निर्भर हैं पर विकास करेंगे
समाज को सुधारने का काम, समाज की स्थिति पर चर्चा, समाज में चल रही बुराइयों को दूर करने का प्रयास करना आदि ऐसी बातें हैं जिनपर अब हम लोग किसी भी प्रकार से जागरूकता नहीं दिखा रहे हैं। समस्याओं के सुधार के नाम पर हम चाहते हैं कि हमारी निजी समस्याओं का निस्तारण हो जाये। चर्चा के नाम पर हम इतना कर लेते हैं कि जहाँ कहीं भीड़ हो वहाँ अपनी वाहवाही करवाने की दृष्टि से कुछ सैद्धांतिक बातें कर लेते हैं। इन्हीं दो-चार कामों से हम समझते हैं कि हम समाज के प्रति अपना फर्ज निभा चुके।
समाज के प्रति अपने फर्ज को एक और रूप में भी हम निभाने का प्रयास करते हैं। इसमें हम किसी भी दूसरे के कार्यों के साथ स्वयं का तारतम्य बनाने का प्रयास करते हैं और बिना कुछ भी सोचे-समझे उसी के अच्छे-बुरे में सहयोगी बन जाते हैं।
क्या वाकई अब हम सबकी वैयक्तिक सोच समाप्त हो गई है? इस सवाल के पीछे कारण ये है कि वर्तमान चुनावी परिदृश्य में देखने में आया है कि हम अपनी सोच से इतर किसी दूसरे की सोच को महत्व देते दिखे हैं। यही हालत आज कमोवेश हम सभी की है। अविश्वास, अंधकार, निराशा आदि हमें इस कदर घेर चुके हैं कि किसी दूसरे की राय लिये बिना हम अपने कदम को भी सही नहीं ठहरा पाते हैं।
आप देखिये यह अधिकतर सभी के साथ होता होगा कि हमारे परिवार-पड़ोस-मित्र आदि का बच्चा अपनी रुचि के अनुसार नहीं वरन् अपने अभिभावकों, अध्यापको, साथियों, रिश्तेदारों के कहने से अपना कैरियर सँवारने का प्रयास करता है। किसी अन्य कोर्स के लिए दाखिला लेने के लिए भी वह किसी अन्य की सलाह का इंतजार करता है बजाय यह देखे कि स्वयं उसमें क्या क्षमता, क्या योग्यता है।
आज हमारे राजनैतिक दल भी कुछ ऐसा ही करते दिख रहे हैं। अपनी क्षमताओं को देखे बिना ही स्वयं को अगुआ मान रहे हैं। यही हमारे नीति-नियंता हैं, इनसे ही हमारे देश को प्रगति की राह पकड़नी है। क्या वाकई इस प्रकार की निर्भरतावादी सोच से देश का, समाज का, परिवार का, व्यक्ति का विकास सम्भव है?
चुनावी चकल्लस-रंग उनके बदले-बदले से लगे हैं,
दुश्मन भी दोस्त से लगने लगे हैं,
कहते हैं मन नहीं मतभेद थे हममें,
अब वे मतभेदों को भुलाने में लगे हैं।
01 मई 2009
परिवार कहाँ जायेंगे, रिश्ते कहाँ जायेंगे?
मौसम उसी तरह गर्म था जैसे कि आम तौर पर गर्मियों में होता है। लोगों के चेहरों पर थकान स्पष्ट रूप से देखने को मिल रही थी। सूरज जितनी तेजी हो सकती थी उतनी तीव्रता से अपनी आग को धरती पर भेजे दे रहा था। आदमी गर्मी से परेशान, भगवान को कोसता, मानव की अनियंत्रित गतिविधियों को गाली देता हुआ अपने कार्यों को अंजाम देने में लगा था।
कमरे में न तो कूलर था और छत पर टंगा पंखा भी बस चल रहा था, हवा तो खिड़कियों और दरवाजों से छनकर आ रही थी वही महसूस हो रही थी। लोगों की भीड़ बता रही थी कि लोगों को गर्मी में भी चैन नसीब नहीं है। यहाँ आना इन लोगों की शायद मजबूरी रही होगी नहीं तो दोपहर के बारह-एक गजे कौन परेशान होता है सरकारी चिकित्सालय में?
कमरा वैसे किसी डाक्टर का नहीं था। यहाँ मरीज के खून का नमूना लेकर उसकी जाँच की जाती थी। खून का नमूना देने वालों की भीड़ ही बता रही थी कि बीमारी किस कदर लोगों को परेशान किये है। सभी अपने-अपने तरीके से गर्मी से बचने का प्रयास कर रहे थे।
गर्माहट भरे और उन सरकारी कर्मचारियों के लिए झल्लाहट भरे क्षणों में दो वृद्धजनों के धीरे-धीरे से आने ने हमारा ध्यान उस और खींचा। एक स्त्री, एक पुरुष कदाचित् पति-पत्नी ही होंगे (उस समय अनुमान लगाया जो बाद में सही निकला) पति-पत्नी ही थे। दोनों की उम्र साठ के ऊपर जा चुकी थी और वृद्धावस्था अपना असर पूरी तरह से दिखा रही थी।
इस विषम सी स्थिति में भी बूढ़ी औरत अपने बीमार पति को किसी तरह सहारा देते उस कमरे तक ले आई थी। उस पुरुष की हालत देखकर लग रहा था कि वह काफी दिनों से बीमार चल रहा होगा और अब हालत जब बेकाबू लगी होगी तो इस सरकारी चिकित्सालय की ओर अपना रुख किया होगा।
हमें विशेष यह नहीं लगा कि दोनों वृद्ध अपने आपको किस तरह यहाँ एक दूसरे को सहारा देते हुए लाये होंगे वरन् जिस बात ने हमें चकित किया वह यह थी कि वह स्त्री बड़े ही मातृत्व भाव से उस पुरुष की देखभाल कर रही थी। कमरे में होने के बाद भी वह वृद्ध पुरुष के सिर को लगातार कपड़े से ढाँकती जाती थी, बीच-बीच में बड़े ही दुलार के साथ उसके सिर पर हाथ भी फिरा देती। पुरुष उस समय बड़े ही निरीह भाव से उसको देख लेता और बीच-बीच में अपनी आँखों की नमी को पोंछ भी लेता।
उस महिला का थोड़ी-थोड़ी देर में पानी ले आना, कभी साथ में लिये छोटे से पंखे से हवा करने लगना, कभी बातों के द्वारा उस व्यक्ति को सांत्वना देना और उस व्यक्ति के द्वारा भी बीच-बीच में पानी की बोतल से (जिसमें रखा पानी निश्चय ही गर्म हो चुका होगा) पानी निकाल कर उस महिला को देना, उसके हाथ से पंखा लेकर उसको हवा करने से रोकना, अपनी स्थिति को लेकर उस महिला को भी हिम्मत बँधाना बतला रहा था कि दोनों में किस कदर प्रेम-स्नेह है।
उन दोनों के आपसी क्रियाकलापों में वहाँ उपस्थित भीड़ से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। महिला बीच-बीच में अपने नम्बर के बारे में भी पूछ लेती। हम भी खाली बैठे थे बिन बुलाये दोनों के बीच में घुस गये तो मालूम हुआ कि दोनों का विवाह लगभग दस-बारह वर्ष की उम्र में हो गया था। इतना लम्बा साथ और सिर्फ एक बार दोनों में लड़ाई का होना बताता है कि संस्कार किस हद तक गहराई तक समाये हैं।
अपनी कहानी बताने में वृद्ध के चेहरे पर चमक आ गई तो महिला में नवयुवतियों जैसी शर्माहट आ गई। दोनों की बातों ने एक नया सबक सिखाया और लगा कि आज हम संयुक्त से एकल परिवारों में बँटे और अब एकल परिवारों को भी तोड़ने में लग गये हैं। शादी होने के चंद दिनों बाद ही लड़ाई-झगड़ा शुरू हो जाता है, तलाक तक होने लगता है। क्या और कैसा समाज खड़ा कर रहे हैं हम?
चुनावी चकल्लस-जीतते-जीतते हार गये, सदमा लगा,
हारते-हारते जीत गये, आनन्द छा गया,
पद-लोलुपता में हुआ गठबंधन दोनों में,
जनता को किसी से भी कुछ न मिला।