30 नवंबर 2021

पान के बारे में उपयोगी जानकारी

पीठ दर्द, कमर दर्द, हड्डियों में दर्द इलाज में सबसे पहली चीज प्रिस्क्रिप्शन में होती है - कैल्शियम सप्लीमेंट। पहले जब मार्केट में सप्लिमेंट्स टेबलेट नहीं थे तब लोगों की हड्डियाँ, दांत कैसे दुरुस्त रहते थे?


ये बात बहुत कम लोग जानते हैं कि ताम्बूल (पान) इन तमाम समस्याओं में अत्यंत लाभकारी है। हमारे सारे परंपरागत विधि विधान में ताम्बूल का प्रयोग होता है। पान के पत्ते में बहुत ज्यादा मात्रा में कैल्शियम होता है। पान का पत्ता बहुत ही गुणकारी होता है।


इसमें एंटी ऑक्सीडेंट के गुण होते हैं। इसके अलावा पान के पत्ते में क्लोरोफिल बहुत ज्यादा होता है। इसके जूस से कई तरह की बीमारियां भी ठीक होती हैं। सर्दियों में इसका जूस पीने से मौसमी बीमारियों से भी बचाव होता है। इसे लेने से पाचन तंत्र भी ठीक रहता है। इसलिए भारतीय आहार में पान को विशिष्ट स्थान प्राप्त है। परंपरागत ही नहीं बल्कि शहरों में भी रात को खाना खाने के बाद पान खाने का चलन आज भी जीवित है।


पान के पत्तों में अवसाद दूर करने के गुण भी होते हैं यानि कि ये एक अच्छा Anti depressants है। इसके पत्ते stress-reliever का काम करते हैं। इसमें thiamine, niacin और carotene भी होता है जो हमारी सेहत के लिए बहुत महत्वपूर्ण तत्व हैं। आजकल ग्रीन जूस में पान के पत्ते का खूब प्रयोग होता है।




26 नवंबर 2021

हिंसक होता बचपन

इन्सान की मूल प्रवृत्ति हिंसक है. आदिमानव से लेकर वर्तमान महामानव बनने तक के सफ़र में इन्सान ने बहुत कुछ छोड़ा, बहुत कुछ अपनाया मगर वो अपनी हिंसक प्रवृत्ति को नहीं छोड़ सका. किसी भी इन्सान को जन्म से लेकर मृत्यु तक किसी भी तरह के पाठ्यक्रम में हिंसा करना नहीं सिखाया जाता है जबकि प्रत्येक कालखंड में, उम्र के अलग-अलग पड़ाव पर उसे प्यार, स्नेह, अपनत्व, अहिंसा, शांति आदि के पाठ बराबर पढ़ाये, रटाये जाते हैं. आवश्यक नहीं कि कोई इन्सान किसी के साथ मारपीट करके ही अपनी हिंसात्मक प्रवृत्ति को सामने लाये. उसके हावभाव, उसके बोलचाल, उसकी क्रियाविधि आदि से भी उसके हिंसक होने के प्रमाण मिलते हैं. सड़क चलते किसी वस्तु में पैर की जबरदस्त ठोकर मार देना, बगीचे, पार्क आदि में टहलते समय अनावश्यक रूप से किसी छड़ी, डंडी आदि के द्वारा पेड़ों-पौधों की पत्तियों-फूलों को गिरा देना आदि भी इसी तरह की मनोवृत्ति का परिचायक है.


वर्तमान परिदृश्य में ऐसा बहुतायत में देखने को मिलने लगा है कि बच्चे भी हिंसात्मक प्रवृत्ति को अपनाते देखे जाने लगे हैं, यह चिंताजनक है. पहले खेलकूद के दौरान, स्कूल में आपसी प्रतिद्वंद्विता के दौरान, किसी भी बात पर खुद को आगे रखने की चेष्टा में एक-दूसरे से झगड़ जाना, एक-दूसरे से लड़ जाना बचपने की आम प्रवृत्ति होती थी. ऐसा न केवल दोस्तों में वरन सगे भाई-बहिनों के बीच भी देखने को मिलता था. ऐसा कभी सुनाई भी नहीं देता था कि कोई बच्चा किस दूसरे बच्चे की हत्या महज इसलिए कर देता है कि उसकी मृत्यु से स्कूल में छुट्टी हो जाएगी. ये सिर्फ चिंताजनक स्थिति नहीं है वरन बालमन-मष्तिष्क के शोध करने की स्थिति है कि आखिर उनके दिमाग में इस तरह की हत्यारी हिंसात्मक प्रवृत्ति का जन्म कैसे, कब, क्यों होने लगा है? यदि इस तरह की मनोवृत्ति बच्चों में पनपने लगी तो समाज में अपराधियों का जन्म बचपन से ही होने लगेगा, जिसे एकबारगी भले ही शिक्षा या फिर किसी तरह के अनुशासन के द्वारा बढ़ने न दिया जाये पर वो कभी न कभी अपना स्वरूप दिखा ही देगा. वर्तमान में जिस तरह से तकनीक का विकास होने के साथ-साथ आमजनमानस की आवश्यकता बन गया है, उस दौर में टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर, इंटरनेट आदि को समाप्त कर पाना, नकार देना संभव ही नहीं है. तो क्या माना जाये कि इनके माध्यम से हिंसात्मक प्रवृत्ति बच्चों में पनपने दी जाये?




वर्तमान जीवनशैली को देखा जाये तो वह कंक्रीट के जंगल में सिमट कर रह गई है. इस जीवनशैली में न तो खेलकूद के मैदान बचे हैं, न ही रिश्तों की बुनियाद. ऐसे में बचपन फुट और मीटर की नाप में सिमट कर रह गया है. खेलने के लिए उसके सामने गैजेट्स हैं, रिश्तों के नाम पर उसके सामने या तो कार्टून्स हैं या फिर कोई पालतू जानवर. आपसी सामंजस्य बनाने से ज्यादा उसे सिखाया जाता है कि उसे उसके साथी से अधिक अंक कैसे लाना है. सहयोग करने की बजाय उसे समझाया जाता है कि उसका समय सबसे ज्यादा कीमती है, जिसे बर्बाद न किया जाये. रिश्तों के प्रति संवेदित होने के बजाय उसे समझाया जाता है कि सारे सम्बन्ध-नाते मतलब के हैं. इस अकेलेपन और गैजेट्स के सहारे अपने बचपन को घुटते देखते बच्चों के भीतर इंसानी मूल प्रवृत्ति पनपने लगती है. यह प्रतिकूल स्थिति और उसकी आक्रामकता लोगों का ध्यान अपने प्रति खींचने के लिए बच्चों से आपराधिक कृत्य करवा बैठती है.


आवश्यकता आज इसकी है कि बच्चों को कमरे से बाहर खेलने-कूदने के लिए भेजा जाये. खेलने-कूदने से उन बच्चों के भीतर पनप रहे आक्रोश, हिंसा, अराजकता को बाहर निकल जाने का अवसर मिलेगा. उनके शैक्षणिक बोझ को कम करके उनके मानसिक विकास की तरफ गौर किया जाये. इससे न केवल वे अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकेंगे वरन अपने आसपास के वातावरण को, मानसिकता को समझने में परिपक्व हो सकेंगे. अभिभावकों को समझना होगा कि उनके बच्चे ही उनकी अनमोल निधि हैं, जिसका विकास पारिवारिक संरचना में सम्मिलित रहकर ही किया जा सकता है. इसके अलावा सहज, सरल जीवनशैली को अपनाकर भी बच्चों को हिंसा से, हिंसात्मक वृत्ति से बचाया जा सकता है.


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23 नवंबर 2021

एकांत का सौन्दर्य

बहुत बार मन करता है एकदम एकांत में रहने का. तकनीक के दौर में सबकुछ सर्वसुलभ होने के बाद भी मन का इस तरह की सोच रखना लोगों के लिए आश्चर्य का विषय हो सकता है. असल में तकनीक ने यदि सबको पास लाने का काम किया है तो निजी जीवन में हस्तक्षेप करवाने का भी काम किया है. तकनीक के बढ़ते और सुलभ होते प्रभावों ने इन्सान के खुद से जुड़ने की संभावनाओं को समाप्त सा किया है. सार्वजनिक जीवन में रहने वालों का तो एक-एक पल किसी न किसी रूप में जनमानस से जुड़ा होता है पर ऐसे लोग जो नितांत व्यक्तिगत जीवन का निर्वहन करते हैं वे भी तकनीक की सुलभता के कारण एकांत खोजते हैं. ऐसे लोगों के एकांत खोजने वाली स्थिति और हमारे मन के द्वारा एकांत में जाने की स्थिति में बहुत अंतर है. सार्वजनिक जीवन की समागमता के कारण बहुत सारे संपर्क स्थापित हो जाते हैं और ऐसे में तकनीक की सुलभता ने सबकुछ सार्वजनिक सा कर दिया है. नया सोचने का, नया करने का, नया स्थापित करने का, खुद से खुद का संपर्क स्थापित करने का समय निकाल पाना मुश्किल सा लगने लगता है. ऐसे में एकांतवास, अज्ञातवास का अपना महत्त्व है, इसे समझना आवश्यक है.




एकांत शब्द बहुत से लोगों के लिए भयावहता का अनुभव कराता होगा. बहुत से लोगों के लिए यह सोच पाना ही संभव नहीं कि कोई व्यक्ति अकेले कैसे रह सकता है? अपने आपको अपने से कैसे जोड़ सकता है? तकनीक भरे इस दौर में बिना किसी गैजेट्स के कैसे रह सकता है? असल में एकांत अपने आपमें एक मधुर स्थिति है, बस इसे समझने की आवश्यकता है. यहाँ पहले तो यही समझना पड़ेगा कि एकांत का अर्थ यहाँ अकेलेपन से नहीं, किसी तन्हाई से नहीं वरन अपने अन्दर से अपने को जोड़ने का नाम एकांत है. यहाँ एकांत का मतलब सूनापन नहीं, सुनसान सा जीवन नहीं वरन अपने भीतर के संगीत को सुनना है, अपने अन्दर के समाज को पहचानना है. इस एकांत से बहुत से लोग आजीवन कोई सम्बन्ध स्थापित नहीं कर पाते हैं. दुनिया भर से सम्बन्ध बनाये रखने वाले लोग अपने भीतर के समाज से बहुत कटे-कटे से रहते हैं. सामाजिक गतिविधियों में सक्रियता से भाग लेने वाले बहुतेरे लोग अपने भीतर की गतिविधि से साम्य नहीं बना पाते हैं, उसके संगीत का आनंद नहीं उठा पाते हैं. यहाँ एकांत का अर्थ खुद का खुद से सम्मिलन है. यह किसी जंगल में जाने जैसा नहीं है, किसी गुफा में जाने जैसा नहीं है, किसी अँधेरे में जाने जैसा नहीं है. इस एकांतवास का सम्बन्ध अपने भीतर की ऊर्जा को नए रूप में बाहर लाने का नाम है. आत्मविश्वास को और सशक्त बनाने का नाम एकांतवास है.


कभी एक स्थिति पर विचार कीजिये, जब हम घर में निपट अकेले हों. घर-परिवार का कोई सदस्य न हो. आस-पड़ोस वाला भी कोई न हो. कोई यार-दोस्त भी उस समय न हो, बस हम ही हम हों तब भी हम अपने आपमें सामाजिकता का निर्वहन करते रहते हैं. कहने का तात्पर्य यह कि उस निपट अकेलेपन में भी हम न तो रसोई में नहाने का काम करते हैं. न ही फ्रिज में या कपड़ों की अलमारी में जूते-चप्पल रखने का काम करते हैं. न बाथरूम को बेडरूम की तरह इस्तेमाल करते हैं. उस अकेलेपन में, उस एकांत में भी हम अपने भीतर के समाज के सामने सबकुछ सामाजिकता के साथ संपन्न करते हैं. एक ऐसे समय में जबकि आप निपट अकेले हों तब भी आपका अपने घर के भीतर असामाजिक न होना सिद्ध करता है कि हम अपने भीतर के समाज को जिन्दा बनाये हुए हैं. कुछ इसी तरह की स्थिति को एकांतवास में इन्सान को अपने आपको जिन्दा रखने के लिए करनी चाहिए. समयांतराल के साथ-साथ कभी-कभी अपनाया जाने वाला एकांतवास यदि व्यक्ति पूरी ईमानदारी के साथ व्यतीत करता है तो वह अपने भीतर की उस ऊर्जा से ओतप्रोत हो जाता है, जिस ऊर्जा को वह सामाजिक-पारिवारिक कर्तव्यों को पूरा करते रहने की अंधाधुंध होड़ में, दौड़ में भुला चुका होता है.


एकांतवास में किसी जागरूक, सजग, सक्रिय व्यक्ति का जाना उसे और सक्रियता प्रदान करता है. ऐसी स्थिति में उसका साक्षात्कार खुद से होता है. ऐसे समय में ही वह अपने शौक, अपनी खूबियों को पल्लवित करने का काम करता है. यहाँ उसके द्वारा यह ध्यान रखना आवश्यक होता है कि वह जिन स्थितियों से बचने के लिए, उनसे उबरने के लिए एकांतवास की राह चला है वहाँ उन स्थितियों को साथ लेकर न आये. एकांतवास में अपने से अपने का साक्षात्कार व्यक्ति को अपने शक्ति से परिचित करवाता है. गैजेट्स पर निर्भर बने रहने की उसकी पराधीनता को तोड़ने का भी काम करता है. देखा जाये तो जीवन का सञ्चालन व्यक्ति खुद करता है. तकनीकी संपन्न गैजेट्स उस सञ्चालन को सरल-सहज बनाने का काम करते हैं. ऐसे में यदि व्यक्ति खुद से खुद का परिचय करना चाहता है, एकांतवास का लाभ अपने लिए, भविष्य के लिए लेना चाहता है तो उसे ऐसे कृत्रिम गैजेट्स वाले जीवन से बचने की कोशिश करनी चाहिए. यदि कोई ऐसा कर ले जा रहा है तो वह एकांतवास का सदुपयोग करके खुद को एक नई ऊर्जा के साथ समाज-निर्माण में लाने का ही कार्य करता है.


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20 नवंबर 2021

संबंधों-रिश्तों का सच क्या है?

ज़िन्दगी बहुत ही छोटी होती है, इसे समझने की आवश्यकता है. बहुतायत में देखने को मिलता है कि समाज में लोग आपस में संबंधों का, रिश्तों का ख्याल नहीं करते हैं. उनके लिए संबंधों, रिश्तों का अर्थ महज किसी आयोजन में, शादी-ब्याह में मुलाकात से होता है, यदि बहुत कुछ तो चंद रुपयों की मदद को ऐसे लोग संबंधों-रिश्तों के रूप में परिभाषित करने लगते हैं. किसी ने यदि कहा है कि ज़िन्दगी चार दिन की है तो इस बारे में खोज करनी चाहिए कि क्यों किसी ने कहा कि ज़िन्दगी महज चार दिन की है? ऐसे कौन से बिंदु-तत्त्व उसके द्वारा खोजे गए कि ज़िन्दगी को महज चार दिन का माना गया?


इन चार दिनों के पीछे क्या अवधारणा रहो होगी, इसकी व्याख्या यहाँ नहीं करनी है. यहाँ हमारा मंतव्य महज इतना है कि इतनी सी छोटी ज़िन्दगी में भी आपस में तनाव, वैमनष्यता आखिर किसलिए. किसके लिए? यदि सभी लोग आपस में शांति, प्यार, स्नेह से अपना समय व्यतीत करने लगे तो संभव है कि आपसी तनाव दूर हो जाये. आखिर आपस में तनाव का कारण क्या है, कभी किसी ने इस पर विचार करने की कोशिश की है? यदि हम देखें तो हमारे आपसी तनाव की मूल वजह अपेक्षाओं का होना और उनका पूरा होना, न होना है. आखिर हम अपेक्षा किसलिए और क्यों रखते हैं? क्या इसलिए कि सामने वाला व्यक्ति हमारा परिचित है? क्या इसलिए कि सामने वाले को हम अपना सम्बन्धी मानते-समझते हैं? क्या इसलिए कि सामने अले से हमारा कोई रिश्ता है?


यदि यही है तो फिर समाज एक भयंकर ग़लतफ़हमी का शिकार है. आखिर संबंधों का, रिश्तों का बनाया जाना किसलिए होता है? क्या इसलिए कि हमारे काम सहजता से होते रहें? सोचियेगा इस पर. शायद जवाब मिले.


16 नवंबर 2021

ब्लॉगिंग का वो सुनहरा दौर

ब्लॉगिंग करते हुए उस समय तक लगभग चार साल हो गये थे। उस समय के सक्रिय एग्रीगेटर पर हमारे ब्लॉग की उपस्थिति होने लगी थी। उन्हीं दिनों रात के लगभग 11 बजे मोबाइल पर अपरिचित नम्बर से कॉल आई। एक महिला का गम्भीर स्वर उभरा। चंद औपचारिकताओं के बाद, परिचय के बाद उन्होंने ब्लॉग बनाने में मदद करने को कहा। हमारी समझ में न आया कि ब्लाॅग जगत के तमाम नामचीन महारथियों को छोड़ वे हमसे क्यों मदद चाह रहीं हैं?


फिलहाल बाकी सोचा-विचारी बंद करके उनके इस कदम की, सोच की सराहना उनसे ही की। इसका कारण उनका लगभग 65-70 वर्ष की आयु का होना था। बहुत खुशी हुई हमें उनका ब्लॉग बनवाने पर, उस सम्बन्ध में मदद करने पर। उनको यह स्पष्ट कर दिया था कि हम खुद ब्लॉग संसार के विद्यार्थी हैं, जितना सीख सके उतनी सहायता अवश्य कर देंगे। उसके बाद उनके लगातार फोन आते रहे, घंटों के हिसाब से वे मोबाइल से ही अपनी समस्या का समाधान प्राप्त करतीं।


उनको बार-बार यह निवेदन करने के बाद कि हम देर रात जागते रहते हैं, काम करते रहते हैं वे हर बार बड़े संकोच भाव से क्षमा करने की बात करतीं।  खुशी की बात ये कि उन्होंने बहुत जल्दी ब्लॉग लेखन की तमाम समस्याओं को सुलझा लिया। ब्लॉग लेखन की तमाम बारीकियों को सीख लिया। जल्दी ही उनके कई ब्लॉग पूरी सक्रियता, गम्भीरता से पाठकों के बीच लोकप्रिय हो गये।


सुखद ये है कि वे आज भी पूरी तरह से, नियमित रूप से ब्लॉग लेखन में सक्रिय हैं। साहित्यिक रचनाओं के साथ-साथ बाल साहित्य पर उनका बहुत ही सराहनीय कार्य है। हम आज भी प्रयास करते हैं कि अधिक से अधिक लोग ब्लॉग लेखन में सक्रिय हों। इसके लिए लोगों को प्रेरित भी करते हैं, अपनी सामर्थ्य भर मदद भी करते हैं।


आप भी बनाइए अपना ब्लॉग और शुरू करिए लेखन। आखिर कुछ न कुछ तो लिख ही रहे हैं न।


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15 नवंबर 2021

हमारे लेखन के प्रति आपके विश्वास ने लगातार लिखने को प्रेरित किया है

हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग की सूची आ गई है. प्रसन्नता की बात है कि आप सभी के पढ़ते रहने के कारण, लेखन हेतु प्रोत्साहित करने के कारण हमारा ब्लॉग रायटोक्रेट कुमारेन्द्र भी इस सूची में है.

कुल 107 ब्लॉग को इस सूची में सम्मिलित किया गया है. पूरी सूची आप इस लिंक से देख सकते हैं.



सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग सूची में आये अन्य ब्लॉग-लेखकों को भी बधाई-शुभकामनाएँ.

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ब्लॉग लेखन वर्ष 2008 से नियमित रूप से चल रहा है. लेखन एक बात है, उससे बड़ी बात है कि आप सुधिजनों, शुभेच्छुओं द्वारा लगातार इसे पढ़ा भी जा रहा है. यहाँ कहें कि महज पढ़ा ही नहीं जा रहा है, उससे एक कदम आगे आकर हमें सराहा जा रहा है, प्रोत्साहित किया जा रहा है. ऐसा इसलिए क्योंकि आये दिन हमारे मित्र, हमारे सहयोगी, हमारे शुभचिंतक, हमारे पाठक, हमारे परिजन आदि विषय, मुद्दे बताते, सुझाते हैं लिखने के लिए. आप सभी के इस स्नेह, प्यार, हमारे लेखन के प्रति आपके विश्वास ने लगातार लिखने को प्रेरित किया है. ऐसे में ब्लॉग को मिलने वाला सम्मान आपका सम्मान है, आपका स्नेह है.

हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग की सूची में आपका यह ब्लॉग विगत कई वर्षों से लगातार सम्मिलित हो रहा है. इसके लिए आप सभी की शुभकामनायें हमारी शक्ति बनी हैं. आप सभी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने योग्य न तो हम हैं और न ही हमारे पास शब्द हैं. यही कामना है, आकांक्षा है कि आप अपना यह स्नेह, प्यार, विश्वास लगातार, सदैव हम पर, हमारे लेखन पर, हमारे ब्लॉग पर बनाये रहिएगा.

हमारे मीडिया के मित्रों ने ब्लॉग की इस उपलब्धि को अपने-अपने मंचों पर स्थान दिया है. उनके स्नेह और सहयोग की अपेक्षा सदैव के लिए है.








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12 नवंबर 2021

राष्ट्रीय पक्षी दिवस पर कुछ चित्र

भारत के मशहूर पक्षी विज्ञानी और प्रकृतिवादी डॉ. सलीम अली के जन्मदिवस के अवसर पर प्रत्येक वर्ष देश भर में राष्ट्रीय पक्षी दिवस मनाया जाता है. डॉ. सलीम का जन्मदिवस 12 नवम्बर को मनाया जाता है. भारत सरकार द्वारा उनको सम्मानित करते हुए उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय पक्षी दिवस घोषित किया है.


डॉ. सलीम अली का जन्म 12 नवम्बर 1896 में बॉम्बे के एक सुलेमानी बोहरा मुस्लिम परिवार में हुआ था. वे विश्वविख्यात भारतीय पक्षी विज्ञानी और प्रकृतिवादी के रूप में प्रसिद्द हैं. उनकी प्रारंभिक शिक्षा सेंट जेवियर्स कॉलेज, मुंबई में हुई. बाद में उन्होंने बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) के सचिव डबल्यू. एस. मिलार्ड की देख-रेख में पक्षियों पर गंभीर अध्ययन करना शुरू किया. अपने इसी अध्ययन के दौरान उन्होंने असामान्य रंग की गौरैया की पहचान की थी.


उनका निधन 27 जून 1987 को 91 साल की उम्र में हुआ. इनके नाम पर बॉम्बे नैचुरल हिस्ट्री सोसाइटी और पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा कोयम्बटूर के निकट अनाइकट्टी नामक स्थान पर सलीम अली पक्षी विज्ञान एवं प्राकृतिक इतिहास केन्द्र स्थापित किया गया.


डॉ. सलीम के बारे में कुछ विशेष बिन्दु.

डॉ. सलीम अली को भारत में पक्षी मानव के नाम से भी जाना जाता है.

उन्होंने पक्षियों से सम्बंधित अनेक पुस्तकें लिखी हैं. बर्ड्स ऑफ़ इंडिया इनमें सबसे लोकप्रिय पुस्तक है.

डाक विभाग ने इनकी स्मृति में डाक टिकट भी जारी किया है.

वर्ष 1958 में सलिम अली को पद्मभूषण तथा 1976 में पद्मविभूषण से अलंकृत किया गया था.


आज भारतीय पक्षी दिवस के अवसर पर हमारे द्वारा क्लिक किये गए कुछ चित्र. इन चित्रों को अपनी घुमक्कड़ी के दौरान लिया गया है.

















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08 नवंबर 2021

माँ अन्नपूर्णा की चोरी गई प्रतिमा वापस आई

कौन कहता है कि आसमान में छेद नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो. ये पंक्ति कार्य करने को प्रेरित करती है. यह बात केवल व्यक्तियों पर लागू नहीं होती बल्कि शासन, प्रशासन, संस्थाओं आदि पर भी लागू होती है. किसी भी काम को करने के प्रति यदि सकारात्मकता है, पारदर्शिता है, ईमानदारी है तो ऐसा संभव नहीं कि वह कार्य सफल न हो. कुछ ऐसा ही इस बार भारत सरकार के प्रयासों से देखने को मिला.


वाराणसी से लगभग 100-150 वर्ष पहले माँ अन्नपूर्णा की पवित्र प्रतिमा को असामाजिक तत्वों द्वारा चोरी करके कनाडा पहुँचा दिया गया था. कालांतर में इस प्रतिमा की पहचान भारतीय मूल के किसी लेखक द्वारा की गई. यह प्रतिमा भारत की आस्था से जुड़ी है. इस संबंध में जैसे ही भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जानकारी मिली उन्होंने कनाडा सरकार से संवाद स्थापित किया. उनके प्रयासों से भारत और कनाडा सरकार के बीच परस्पर संवाद बना रहा. इसका सुफल यह रहा कि माँ अन्नपूर्णा की इस प्रतिमा को ससम्मान भारत मँगवाया गया.




माँ अन्नपूर्णा की इस प्रतिमा में माँ के एक हाथ में खीर की कटोरी और दूसरे हाथ में चम्मच है. यह प्रतीक है समाज को भूखे पेट न रहने देने का, सभी के लिए भोजन उपलब्धता है. 15 नवम्बर को इस प्रतिमा की प्राण स्थापना काशी में की जाएगी. इससे पूर्व यह प्रतिमा दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा काशी विश्वनाथ विशिष्ट क्षेत्र विकास परिषद को सौंपी गई है. जिसके बाद पुनर्स्थापना यात्रा के माध्यम से माँ अन्नपूर्णा 18 जिलों में भक्तों को दर्शन देते हुए 14 नवम्बर को काशी पहुँचेगी. इसके बाद अगले दिन (15 नवम्बर) देवोत्थान एकादशी के पावन अवसर पर श्रीकाशी विश्वनाथ धाम के नवीन परिसर में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ विधि-विधान से प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा करेंगे.




05 नवंबर 2021

फाउंटेन पेन के प्रति प्रेम आज भी है : फाउंटेन पेन दिवस विशेष

मानवीय सभ्यता के विकास में बहुत सारे उपकरणों का आविष्कार हुआ. इन उपकरणों ने मानव जीवन को बहुत प्रभावित किया है. ऐसे ही अनेक उपकरणों में एक उपकरण पेन है. किसी समय में इशारों के द्वारा आपसी वार्तालाप किया जाता था. कालांतर में जब इशारों के द्वारा, कतिपय रेखाचित्रों के द्वारा, निशानों के द्वारा, चिन्हों के द्वारा वार्तालाप में अवरोध सा उत्पन्न होने लगा या कहें कि बहुत सी बातों को सामने वालों तक पहुँचाना संभव नहीं हो सका तो फिर भाषा का विकास हुआ. इस भाषा के साथ-साथ लिपि की आवश्यकता भी हुई. भाषा, लिपि के विकास के साथ-साथ उसको आम जनमानस तक लिखित रूप में पहुँचाने के लिए उपकरण की आवश्यकता महसूस हुई. इसी आवश्यकता ने कलम का आविष्कार किया.


लेखन के लिए उपयोग किए जाने वाले इस उपकरण ने अपने पूरे इतिहास में बहुत सारे बदलावों को देखा है. किसी समय में पत्थरों, पेड़ों की लकड़ियों, पक्षियों के पंखों आदि के द्वारा कलम को बनाकर लेखन कार्य किया गया. स्याही के लिए विभिन्न प्रकार के पौधों के पदार्थ, जानवरों आदि के अर्क का उपयोग किया गया. स्याही बन जाने के बाद को कलम के रूप में मिला उपकरण एक तरह का डिप पेन था अर्थात इसको स्याही में डुबो-डुबो कर लिखा जाता था. यह स्थिति लम्बे समय तक बनी रही. आविष्कारों के प्रति सजग मानव ने अंततः लेखन के लिए एक नया उपकरण खोज लिया, जिसे बार-बार स्याही में डुबोने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी. इसी को वह पेन या कहें कि फाउंटेन पेन कह सकते हैं, जिसका परिष्कृत रूप आज हम सबको देखने को मिल रहा है.




ऐसा ऐतिहासिक स्वरूप से देखने को मिलता है कि सन 1636 में फाउंटेन पेन अस्तित्व में आया. फाउंटेन पेन को रोमानिया के पेट्राचे पोएनारू द्वारा डिजाइन किया गया था. जिसमें धातु की निब के साथ स्याही भरने के लिए एक टंकी लगी हुई थी. इसके आविष्कार से कई सुविधाएँ प्राप्त हुईं. न तो बार-बार कलम छीलने की आवश्यकता हुई और न बार-बार निब को स्याही में डुबोने की समस्या का सामना करना पड़ा. इस तरह के आविष्कार के आने से लेखन की दुनिया हमेशा के लिए बदल गई. ऐसा माना जाता है कि फाउंटेन पेन का सबसे पहला रूप प्राचीन मिस्रवासियों द्वारा 3,000 ईसा पूर्व में इस्तेमाल किया गया था. इन्हें स्टाइलस कहा जाता था. स्याही में डुबोए जाने के कारण इन्हें डिप पेन कहा गया.कालांतर में 17वीं और 18वीं शताब्दी के दौरान धातु वाले निब वाले लेखन कलमों के उपयोग का उल्लेख मिलता है.

 

फाउंटेन पेन के लगातार उपयोग में बने रहने के कारण सन 2012 से फाउंटेन पेन डे को मनाना शुरू किया. नवम्बर माह के पहले शुक्रवार को इसके लिए निर्धारित किया गया है. इस दिन को मनाने का उद्देश्य दिन-प्रतिदिन के जीवन में फाउंटेन पेन के उपयोग को बढ़ावा देना, उसके उपयोग के प्रति लोगों को प्रोत्साहित करना, लिखावट को सुन्दर बनाना रहा है. आज जबकि आधुनिक समय में लेखन के लिए वरीयता में, प्राथमिकता में फाउंटेन पेन नहीं है फिर भी बहुतायत में फाउंटेन पेन का उपयोग महत्वपूर्ण आधिकारिक कार्यों के लिए किया जाता है. इसके साथ-साथ बहुत से पेन संग्रह प्रेमी आज भी बाज़ार में, दुकानों में फाउंटेन पेन को तलाशते घूमते-भटकते देखे जाते हैं.


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