24 सितंबर 2026

सेवा संकल्प अभियान को लेकर उत्साह नहीं

भारतीय जनता पार्टी द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सेवा और समर्पण के 25 वर्षों को संदर्भित करते हुए 'सेवा संकल्प अभियान' का आयोजन किया जा रहा है. यह मोदी जी के जन्मदिन 17 सितम्बर से शुरू होकर पूरे एक माह अर्थात 17 अक्टूबर तक चलना है. इस अभियान के आयोजन हेतु उत्तर प्रदेश में सरकार के स्तर से निर्देश जारी किये गए हैं. इस आयोजन में शासन-प्रशासन पूरी तत्परता के साथ जुटा हुआ है. शिक्षा संस्थानों, गैर-सरकारी संस्थाओं आदि पर एक तरह से कार्यक्रम थोप दिया गया है. ठीक है, भाजपा द्वारा अपने एक वरिष्ठ व्यक्ति के सम्मान में इस कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है, इसे लेकर कोई तर्क-वितर्क नहीं करेंगे क्योंकि घर-परिवार की तरह पार्टियाँ भी अपने पदाधिकारियों को, अपने वरिष्ठजनों के सम्मान में कुछ न कुछ करती रहती हैं.

 



इस बात में दोराय नहीं कि मोदी जी बहुत ही गम्भीरता और गहराई से जनता के मनोभावों को समझे हुए हैं. राजनीति के जो भी कदमताल हैं, उनसे भी वे भली-भांति परिचित हैं. यहाँ व्यक्तिगत स्तर पर हमें जो बात खटक रही है, वो यह कि ऐसी स्थिति के बाद भी मोदी जी की सहमति इस अभियान के लिए है. इधर विगत कुछ समय से जिस तरह से मोदी-विरोध का माहौल बना हुआ है, उसके चलते मोदी जी की छवि से लगातार खिलवाड़ किया जा रहा है. ऐसे में मोदी जी को स्वयं ही अपने जन्मदिन पर सम्बंधित लोगों को ससम्मान इस अभियान को स्थगित करने के लिए निर्देशित करना चाहिए था. मोदी जी को यहाँ स्वतः संज्ञान लेते हुए इस कारण से इस अभियान को स्थगित करना चाहिए था क्योंकि इस महीने भर के कार्यक्रम में पूरा सरकारी तंत्र तो व्यस्त है ही, इसके साथ-साथ शिक्षण संस्थानों के भी व्यस्त बने रहने की सम्भावना है.

 

भाजपा द्वारा, उसके पदाधिकारियों द्वारा इस अभियान को लेकर भले ही कुछ भी कहा जाये मगर वास्तविकता यह है कि इस अभियान से न केवल पार्टी की बल्कि मोदी जी की, योगी जी की छवि को धक्का लगा है. भाजपा को, ऐसे अभियान को बनाने वालों को विचार करना था कि इस देश ने कोरोना काल में मोदी जी के कहने पर शंख-थाली बनाये थे; दिए जलाये थे; और भी अनेक अवसरों पर मोदी जी के विचारों का सम्मान किया गया. अब जबकि विपक्षियों द्वारा उनके विरोध में माहौल निर्मित किया जा रहा है, उसमें ऐसे कार्यक्रम सहयोगी ही बनते नजर आ रहे हैं. कुछ समय पहले वैश्विक संकट के समय में मोदी जी द्वारा पेट्रोल-डीजल की कम से कम खपत करने को कहा गया था और यहाँ ढाई सौ मोटरसाइकिल वाराणसी से बड़नगर तक की यात्रा पर निकली हैं.

 

जबरिया थोपे गए से कार्यक्रमों को लेकर भले ही कोई सामने कुछ न कहे, सार्वजनिक रूप से कुछ न बोले मगर अंदरूनी रूप में इससे लोग खुश नहीं हैं. हाँ, कुछ तानाशाह मानसिकता वाले उच्चाधिकारियों को, संस्था प्रमुखों को अपनी भड़ास निकालने का मौका अवश्य मिल गया है.

 


21 सितंबर 2026

मंचीय राहुल की अशालीनता

विगत कुछ समय से महसूस हो रहा है जैसे नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी राजनीतिक विमर्श से अधिक मंचीय विमर्श में विश्वास करने लगे हैं. उनके कार्यक्रम में खुला मंच, किसी कलाकार की तरह से उनकी उपस्थिति और फिर उसके बाद राजनीतिक मुद्दों को छोड़ बाकी सब. उनके द्वारा जनहित चर्चा की जाती सी नजर आती है मगर उसके पीछे हाव-भाव, भाषा-शैली आदि अमर्यादित, अशालीन रूप में होती है. ऐसा वे अनजाने में नहीं करते, अचानक से ऐसा नहीं होता, एक-दो बार भी ऐसा नहीं होता बल्कि पूरी योजना के साथ लगभग प्रत्येक कार्यक्रम में ऐसा किया जाने लगा है.

 

अभी इंदौर में छात्रों की गूँज कार्यक्रम में एक हास्य कलाकार को बुलाकर मोदी जी की मिमिक्री करवाना, राहुल गांधी का पूरी सक्रियता से सहयोग करना विवाद उत्पन्न करने वाला कृत्य नहीं होता यदि वह मिमिक्री फूहड़ता के स्तर तक न पहुँचती. यह बात अपने आपमें अजीब ही है कि छात्रों के मुद्दों के नाम पर नेता प्रतिपक्ष के मंच पर एक हास्य कलाकार न केवल प्रधानमंत्री की मिमिक्री करे बल्कि प्रधानमंत्री की ओर से किसी कार्यक्रम में एक बुजुर्ग महिला को कुर्सी देने के आग्रह को भी निहायत भोंड़ेपन से प्रदर्शित करे. यह समझा जा सकता है कि राजनीति में अपने विरोधियों के बयानों का, उनकी नीतियों का, उनकी कार्यशैली का विरोध किया जाये, उन पर कटाक्ष किया जाये मगर यह समझ से परे है कि किसी बुजुर्ग महिला को कुर्सी दिलवाने वाली बात का फूहड़ता से मजाक बनाया जाये; उसे सेटिंग जैसी शब्दावली के साथ प्रस्तुत किया जाये.

 



राजनीतिक क्षेत्र में इन दिनों भाषाई, चारित्रिक, नैतिक गिरावट लगातार देखने को मिल रही है लेकिन नेता प्रतिपक्ष के मंच से ऐसा होना राजनीति के तेजी से गिरते जा रहे स्तर को प्रदर्शित करता है. यह स्तरहीनता न केवल राजनीति को फूहड़ बना रही है बल्कि समाज से संवेदनशीलता को समाप्त कर रही है. देखा जाये तो राहुल गांधी के मंच से ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. उनकी तरफ से प्रधानमंत्री सहित अनेक उच्च पदस्थ लोगों पर अमर्यादित भाषाई हमला करना, सरकार की नीतियों का अशालीन रूप से मजाक बनाना आम बात है. जनमानस को भली-भांति याद होगा, कुछ समय पहले इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी का अमर्यादित ढंग से उल्लेख उनके मंच से ही किया गया था.

 

यहाँ विचारणीय ये होना चाहिए कि आखिर राजनीति में अब अशालीन भाषा, अमर्यादित आचरण, फूहड़ हाव-भाव, व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप को स्थान क्यों मिलने लगा है? क्या संविधान के अनुच्छेद 19 में मौलिक अधिकार के रूप में अभिव्यक्ति की आज़ादी को रखने का ये दुष्परिणाम है? संविधान के अनुच्छेद 19(1)(A) में सभी भारतीय नागरिकों को वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है. यहाँ वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ एक भारतीय नागरिक द्वारा लिखकर, बोलकर, छापकर, इशारे से या किसी अन्य तरीके से अपने विचारों को व्यक्त करने से है. यद्यपि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(2) में उन सीमाओं का भी उल्लेख है जिनके द्वारा अभिव्यक्ति की आज़ादी पर कुछ हद तक प्रतिबन्ध लगाया गया है तथापि आये दिन नेताओं द्वारा इसका अतिक्रमण किया जाता है. वे भूल जाते हैं कि संविधान ने उनको अभिव्यक्ति की आज़ादी इसके लिए दी है कि वे सरकार की निरंकुशता पर सवाल उठा सकें, जनता के विरुद्ध होने वाले कार्यों का विरोध कर सकें, लोकतान्त्रिक व्यवस्था का हनन करने वालों के खिलाफ आवाज़ बुलंद कर सकें. इन मूल बातों को भुलाकर उनके द्वारा व्यतिगत आक्षेप लगाये जाने लगते हैं, एक-दूसरे के निजी जीवन को सार्वजनिक रूप से कलंकित किया जाने लगता है.

 

हाल के दिनों में आरोप-प्रत्यारोप का, बयानबाजी करने का, सार्वजनिक सभाओं के साथ-साथ सदन में बोलने का स्तर गिरता ही नजर आया है. पिछले दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर पर चले धरना प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री को न केवल सार्वजनिक रूप से अश्लील गालियाँ दी गईं बल्कि उसके पोस्टर तक भी प्रदर्शित किये गए. इन भद्दी और अश्लील गालियाँ देने वालों में लड़के-लड़कियाँ, दोनों ही शामिल रहे. उनके इस अशालीन और फूहड़ कृत्य को हल्का-फुल्का मजाक कहा गया, कुछ लोगों द्वारा तो इसे जेन-जी की ताकत बताते हुए उनकी सहज अभिव्यक्ति बताया गया. कहने का तात्पर्य यह कि सार्वजनिक रूप से गाली-गलौज को भी इसके चलते स्वीकार्यता प्रदान कर दी गई क्योंकि ऐसा राजनीतिक रूप से प्रधानमंत्री के खिलाफ, किसी नेता के खिलाफ, किसी दल विशेष के खिलाफ ऐसा किया जा रहा था. इस तरह की सोच, ऐसे कृत्य राजनीति के बिगड़ते स्वरूप को और विषाक्त बना रहे हैं. इसमें सभी दलों का योगदान है, किसी का कम तो किसी का ज्यादा. राजनीतिक दल अब विरोधी दल को प्रतिस्पर्धी के बजाय शत्रु के रूप में देखने लगे हैं. उनके बीच का यह शत्रुभाव अब समाज में भी प्रवेश करने लगा है.

 

राहुल गांधी के मामले में ऐसा लग रहा है जैसे लम्बे समय से सत्ता की परिधि से दूर होने के कारण, तमाम तरह के चुनावों में लगातार मिलती पराजय से वे सही और गलत का निर्णय करना भूल गए हैं. उनको यह नहीं भूलना चाहिए कि वे देश के एक प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवार के सदस्य हैं; एक बहुत पुराने दल के नेता हैं इसके साथ ही नेता प्रतिपक्ष हैं. उनके द्वारा उपयोग की जाने वाले अशालीन भाषा, घटिया शब्दावली तात्कालिक तालियाँ बजवा दे, सस्ती लोकप्रियता हासिल करवा दे किन्तु इससे न केवल लोकतान्त्रिक मर्यादा का हनन होता है बल्कि देश की छवि को भी धक्का लगता है. ऐसे में हाल-फिलहाल भले ही राहुल गांधी खुले मंच से भाषाई, व्यावहारिक, सामाजिक मर्यादा को तिलांजलि देते नजर आ रहे हों किन्तु व्यापक रूप में यहाँ सभी राजनैतिक दलों को, सभी जिम्मेवार राजनैतिक व्यक्तियों को आपसी सामंजस्य बनाकर विचार करना होगा कि कैसे राजनीति में भाषा की, व्यवहार की शालीनता बनी रहे.


20 सितंबर 2026

विकास की ओर मुफ़्त में अग्रसर हैं हम सब

यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाये जाने की अधिसूचना के बाद से दोनों तरफ से तर्क-वितर्क मचा हुआ है. सरकार और उसके समर्थक अपना पक्ष रख रहे हैं, इस शुल्क के विरोधी अपनी बात कह रहे हैं. यद्यपि इसको 15 अक्टूबर से अमल में आना है तथापि इस पर अभी से कुछ दुकानदारों की नकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिलने लगी है. वैसे सरकार द्वारा लेनदेन पर लगने वाले शुल्क के बारे में अपनी ही कहानी कही जा रही है मगर उस कहानी के पीछे खुद के द्वारा मुफ्त वितरण के बोझ को नहीं देखा जा रहा है.

 

आइये, इसकी तुलना कीजिए जरा,

एक के लिए वार्षिक खर्च लगभग बीस हज़ार करोड़ रुपए. दूसरे के लिए मासिक खर्च लगभग सोलह हज़ार करोड़ रुपए. जी हाँ, सही से पढ़ा है आपने इस बहुत बड़े अंतर को.

 

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) पर केन्द्र सरकार हर महीने औसतन 16,000 करोड़ रुपए से 17,000 करोड़ रुपए खर्च करती है. इस योजना के लिए सालाना करीब 2.03 लाख करोड़ रुपए से लेकर 2.13 लाख करोड़ रुपए का आवंटन किया जाता है. इसमें देश के पात्र राशन कार्डधारकों को प्रति व्यक्ति 5 किलो मुफ्त राशन दिया जाता है.

 

इसके उलट MDR (मर्चेंट डिस्काउंट रेट) को पूरी तरह मुफ्त रखने या इसे चलाने पर सालाना करीब 20,000 करोड़ रुपए से लेकर 20,700 करोड़ रुपए का कुल परिचालन खर्च आता है. इसके बाद भी शुल्क पहले वाले पर लगा दिया गया अर्थात यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाया गया है.

 

एक और आँकड़े पर यदि निगाह डाली जाये तो पता चलेगा कि अनुमानित रूप में देश की जनसंख्या लगभग 147 करोड़ है और PMGKAY के अन्तर्गत मुफ्त राशन पाने वालों की संख्या लगभग 81 करोड़ है. सोचिए, आधे से ज़्यादा जनसंख्या (लगभग 55%) मुफ़्त का राशन ले रही है. विकास की ओर मुफ़्त में अग्रसर हैं हम सब.

 


16 सितंबर 2026

शुल्क का बोझ आएगा ग्राहकों के ऊपर

कराघात (Impact of Tax) और करापात (Tax Incidence) के बारे में क्या आपने पढ़-सुन रखा है? जिसने पढ़-सुन रखा है वह सहजता से यूपीआई लेनदेन सम्बन्धी मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) के सच को समझ सकता है. सरकार द्वारा एक अधिसूचना जारी करके यूपीआई लेनदेन पर कुछ शुल्क लगाये जाने के बारे में जनता को बताया है. इसमें बताया गया है कि इसमें दो हजार रुपये तक के लेनदेन को किसी भी तरह के शुल्क से मुक्त रखा गया है, साथ ही इसके ऊपर के लेनदेन पर लगने वाले शुल्क को भी दुकानदारों से लिया जायेगा, न कि ग्राहकों से.

 

दो हजार रुपये से अधिक के लेनदेन पर तो शुल्क लगाया ही गया है, भले ही वह देखने में बहुत कम समझ आ रहा हो; जारी अधिसूचना की भाषा में भले ही यह शुल्क उपभोक्ता को नहीं देना है किन्तु सोचिए एक पल को कि क्या यह शुल्क दुकानदार देने को तैयार होगा? आज भी क्रेडिट कार्ड से भुगतान करने की स्थिति में दुकानदार लगने वाले टैक्स को ग्राहक की तरफ मोड़ देता है. कुछ इसी तरह की स्थिति यहाँ भी बनेगी. शुल्क चाहे दस रुपये आये या अधिकतम तीन सौ रुपये, उसे दुकानदार के द्वारा ग्राहक पर ही आरोपित कर दिया जायेगा. उदाहरण के लिए आप कोई सामान लेते हैं जो पच्चीस-पचास हजार रुपये का है. इस पर लगने वाला शुल्क सौ-दो सौ रुपये होगा और यह अधिकतम तीन सौ रुपये निर्धारित कर दिया गया है. निश्चित समझिये कि यह अतिरिक्त रुपये भी आपको ही चुकाने होंगे.

 

यूपीआई के कारण बैंकों पर, सरकार पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ की कहानी कहने से पहले देश में मुफ्त में बँटने वाली रेवड़ियों की भी गिनती कर लेना, उससे पड़ने वाले आर्थिक बोझ का भी वजन कर लेना. जनहित के नाम पर मुफ्त के राशन से लेकर लाड़ली-लाड़ला किया जा सकता है; स्कूटी, मोबाइल, टेबलेट किया जा सकता है, बैंक खातों को समय-समय पर भरा जा सकता है, उसी तरह प्रत्येक यूपीआई लेनदेन को भी जनहित में स्वीकारा जा सकता है.