विगत कुछ समय से महसूस हो रहा है जैसे नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी राजनीतिक विमर्श
से अधिक मंचीय विमर्श में विश्वास करने लगे हैं. उनके कार्यक्रम में खुला मंच, किसी कलाकार की तरह से उनकी
उपस्थिति और फिर उसके बाद राजनीतिक मुद्दों को छोड़ बाकी सब. उनके द्वारा जनहित
चर्चा की जाती सी नजर आती है मगर उसके पीछे हाव-भाव,
भाषा-शैली आदि अमर्यादित, अशालीन रूप में होती है. ऐसा वे
अनजाने में नहीं करते, अचानक से ऐसा नहीं होता, एक-दो बार भी ऐसा नहीं होता बल्कि पूरी योजना के साथ लगभग प्रत्येक
कार्यक्रम में ऐसा किया जाने लगा है.
अभी इंदौर में छात्रों की गूँज कार्यक्रम में एक हास्य कलाकार को बुलाकर मोदी
जी की मिमिक्री करवाना, राहुल गांधी का पूरी सक्रियता से सहयोग करना विवाद उत्पन्न
करने वाला कृत्य नहीं होता यदि वह मिमिक्री फूहड़ता के स्तर तक न पहुँचती. यह बात
अपने आपमें अजीब ही है कि छात्रों के मुद्दों के नाम पर नेता प्रतिपक्ष के मंच पर एक
हास्य कलाकार न केवल प्रधानमंत्री की मिमिक्री करे बल्कि प्रधानमंत्री की ओर से किसी
कार्यक्रम में एक बुजुर्ग महिला को कुर्सी देने के आग्रह को भी निहायत भोंड़ेपन से
प्रदर्शित करे. यह समझा जा सकता है कि राजनीति में अपने विरोधियों के बयानों का, उनकी नीतियों का, उनकी कार्यशैली का विरोध किया जाये, उन पर कटाक्ष
किया जाये मगर यह समझ से परे है कि किसी बुजुर्ग महिला को कुर्सी दिलवाने वाली बात
का फूहड़ता से मजाक बनाया जाये; उसे सेटिंग जैसी शब्दावली के साथ प्रस्तुत किया
जाये.
राजनीतिक क्षेत्र में इन दिनों भाषाई, चारित्रिक, नैतिक गिरावट लगातार देखने को मिल रही है लेकिन नेता
प्रतिपक्ष के मंच से ऐसा होना राजनीति के तेजी से गिरते जा रहे स्तर को प्रदर्शित
करता है. यह स्तरहीनता न केवल राजनीति को फूहड़ बना रही है बल्कि समाज से
संवेदनशीलता को समाप्त कर रही है. देखा जाये तो राहुल गांधी के मंच से ऐसा पहली
बार नहीं हुआ है. उनकी तरफ से प्रधानमंत्री सहित अनेक उच्च पदस्थ लोगों पर
अमर्यादित भाषाई हमला करना, सरकार की नीतियों का अशालीन रूप से
मजाक बनाना आम बात है. जनमानस को भली-भांति याद होगा, कुछ समय पहले इटली की प्रधानमंत्री
मेलोनी का अमर्यादित ढंग से उल्लेख उनके मंच से ही किया गया था.
यहाँ विचारणीय ये होना चाहिए कि आखिर राजनीति में अब अशालीन भाषा, अमर्यादित आचरण, फूहड़ हाव-भाव,
व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप को स्थान क्यों मिलने लगा है? क्या संविधान के अनुच्छेद 19 में मौलिक
अधिकार के रूप में अभिव्यक्ति की आज़ादी को रखने का ये दुष्परिणाम है? संविधान के अनुच्छेद 19(1)(A) में सभी भारतीय नागरिकों को वाक और
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है. यहाँ वाक और अभिव्यक्ति की
स्वतंत्रता का अर्थ एक भारतीय नागरिक द्वारा लिखकर, बोलकर, छापकर, इशारे से या किसी
अन्य तरीके से अपने विचारों को व्यक्त करने से है. यद्यपि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(2) में उन सीमाओं का भी उल्लेख है जिनके द्वारा
अभिव्यक्ति की आज़ादी पर कुछ हद तक प्रतिबन्ध लगाया गया है तथापि आये दिन नेताओं
द्वारा इसका अतिक्रमण किया जाता है. वे भूल जाते हैं कि संविधान ने उनको
अभिव्यक्ति की आज़ादी इसके लिए दी है कि वे सरकार की निरंकुशता पर सवाल उठा सकें, जनता के विरुद्ध होने वाले कार्यों का
विरोध कर सकें, लोकतान्त्रिक
व्यवस्था का हनन करने वालों के खिलाफ आवाज़ बुलंद कर सकें. इन मूल बातों को भुलाकर
उनके द्वारा व्यतिगत आक्षेप लगाये जाने लगते हैं, एक-दूसरे के निजी जीवन को सार्वजनिक रूप से कलंकित
किया जाने लगता है.
हाल के दिनों में आरोप-प्रत्यारोप का, बयानबाजी करने का,
सार्वजनिक सभाओं के साथ-साथ सदन में बोलने का स्तर गिरता ही नजर आया है. पिछले दिनों
दिल्ली के जंतर-मंतर पर चले धरना प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री को न केवल
सार्वजनिक रूप से अश्लील गालियाँ दी गईं बल्कि उसके पोस्टर तक भी प्रदर्शित किये
गए. इन भद्दी और अश्लील गालियाँ देने वालों में लड़के-लड़कियाँ, दोनों ही शामिल रहे. उनके इस अशालीन और फूहड़
कृत्य को हल्का-फुल्का मजाक कहा गया, कुछ लोगों द्वारा तो इसे जेन-जी की ताकत बताते हुए उनकी सहज अभिव्यक्ति
बताया गया. कहने का तात्पर्य यह कि सार्वजनिक रूप से गाली-गलौज को भी इसके चलते
स्वीकार्यता प्रदान कर दी गई क्योंकि ऐसा राजनीतिक रूप से प्रधानमंत्री के खिलाफ, किसी नेता के खिलाफ, किसी दल विशेष के खिलाफ ऐसा
किया जा रहा था. इस तरह की सोच, ऐसे कृत्य राजनीति के बिगड़ते
स्वरूप को और विषाक्त बना रहे हैं. इसमें सभी दलों का योगदान है, किसी का कम तो किसी का ज्यादा. राजनीतिक दल अब
विरोधी दल को प्रतिस्पर्धी के बजाय शत्रु के रूप में देखने लगे हैं. उनके बीच का यह
शत्रुभाव अब समाज में भी प्रवेश करने लगा है.
राहुल गांधी के मामले में ऐसा लग रहा है जैसे लम्बे समय से सत्ता की परिधि से
दूर होने के कारण, तमाम तरह के
चुनावों में लगातार मिलती पराजय से वे सही और गलत का निर्णय करना भूल गए हैं. उनको
यह नहीं भूलना चाहिए कि वे देश के एक प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवार के सदस्य हैं; एक
बहुत पुराने दल के नेता हैं इसके साथ ही नेता प्रतिपक्ष हैं. उनके द्वारा उपयोग की
जाने वाले अशालीन भाषा, घटिया
शब्दावली तात्कालिक तालियाँ बजवा दे, सस्ती लोकप्रियता हासिल करवा दे किन्तु इससे न केवल लोकतान्त्रिक मर्यादा
का हनन होता है बल्कि देश की छवि को भी धक्का लगता है. ऐसे में हाल-फिलहाल भले ही
राहुल गांधी खुले मंच से भाषाई, व्यावहारिक, सामाजिक मर्यादा को तिलांजलि देते नजर आ रहे हों किन्तु व्यापक रूप में यहाँ
सभी राजनैतिक दलों को,
सभी जिम्मेवार राजनैतिक व्यक्तियों को आपसी सामंजस्य बनाकर विचार करना होगा कि
कैसे राजनीति में भाषा की, व्यवहार की शालीनता बनी रहे.

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