वर्तमान में भुगतान के सम्बन्ध में या कहें कि लेनदेन के लिए यूपीआई का उपयोग
क्रांतिकारी स्तर पर होने लगा है. यूपीआई अर्थात यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस के चलते
होने वाले डिजिटल भुगतान ने प्रत्येक क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा दी है.
फुटपाथ पर लगने वाली छोटी-छोटी दुकानें हों, बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल हों या फिर
व्यक्तिगत लेनदेन हो, सभी
जगहों पर कुल पलों में भुगतान करने की इस सुविधा ने देश को डिजिटल लेनदेन में वैश्विक
स्तर पर अग्रणी सिद्ध किया है. समाज के प्रत्येक वर्ग के बीच लोकप्रिय इस
प्लेटफ़ॉर्म को लेकर उस समय बहस की स्थिति दिखाई दी जबकि यूपीई लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट
रेट सम्बन्धी बदलावों की बात सरकारी स्तर से की जाने लगी. यद्यपि सरकारी स्तर से
इसे आम नागरिकों के लिए निशुल्क रहने की बात कही गई तथापि डिजिटल भुगतान में किसी भी
प्रकार का शुल्क लगाया जाना भारतीय अर्थव्यवस्था कई दूरगामी प्रभाव अवश्य ही छोड़ेगा.
यूपीआई पर शुल्क लगाए जाने को यदि सरकारी दृष्टि से देखें तो यह उनके बुनियादी
ढाँचे को दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता, मजबूती प्रदान कर सकता है. इसका कारण यह है कि वर्तमान
में इस नेटवर्क
के भुगतान में बैंकों, फिनटेक कंपनियों
और नेशनल पेमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया का योगदान रहता है. प्रतिदिन करोड़ों रुपये
के लेनदेन को पूर्ण पारदर्शिता के साथ संचालित करने के लिए उच्च स्तरीय नेटवर्किंग
व्यवस्था की, साइबर सुरक्षा
सहित अन्य प्रणालियों की आवश्यकता होती है. ऐसे में शुल्क रहित व्यवस्था के कारण इन कंपनियों
और बैंकों को सरकारी सब्सिडी पर निर्भर रहना पड़ रहा है. यदि शुल्क व्यवस्था लागू होती
है तो इन कंपनियों और बैंकों का सशक्त राजस्व मॉडल विकसित हो सकेगा जिसका उपयोग सर्वर
क्षमता बढ़ाने, तकनीकी विफलताओं
को रोकने, साइबर सुरक्षा को बढ़ाने में किया जा सकता है. ऐसा होने से यूपीआई के उपयोगकर्ताओं
को सुरक्षित रखा जा सकता है.
यूपीआई लेनदेन के सम्बन्ध में शुल्क लगाये जाने का एक कारण अति-लघु लेनदेन के चलते
सर्वर पर, बैंकिंग व्यवस्था पर पड़ने वाले अत्यधिक दबाव का नियंत्रित होना भी
बताया जा रहा है. यह प्रथम दृष्टया उचित भी प्रतीत होता है क्योंकि हम सभी लोग
बहुधा बहुत छोटी-छोटी राशियों के लिए भी बार-बार यूपीआई का प्रयोग करते हैं. इस
प्रकार का लेनदेन,
भुगतान भले ही डिजिटल रूप में हो रहा होता है किन्तु इसका बोझ बैंकिंग नेटवर्क पर
पड़ता है. सम्भव है कि उचित शुल्क के लगाये जाने के बाद उपयोगकर्ता स्वयं को
नियंत्रित करते हुए आवश्यकता के अनुसार ही अपने लेनदेन को निर्धारित करेंगे. इससे
जहाँ एक तरफ नेटवर्क और बैंकिंग व्यवस्था पर अनावश्यक भार में कमी आ सकती है साथ
ही डिजिटल नेटवर्क दक्षता में सुधार होने की सम्भावना है.
ऐसा नहीं है कि यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाया जाना सिर्फ लाभकारी ही होगा.
इसके कुछ हानियाँ भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं, जिननके चलते सरकार को इसके लागू किये जाने पर विचार करने की
आवश्यकता है. देश में जिस तरह से लोगों ने डिजिटल भुगतान व्यवस्था को अपनाया है यह
नागरिकों के विश्वास को दर्शाता है. ऐसे में यदि शुल्क लगाया जाता है तो सम्भव है
कि इसका सबसे बड़ा नुकसान देश के डिजिटल समावेशी अभियान को हो. देश की बहुत बड़ी
जनसंख्या डिजिटल माध्यम को इसके पूरी तरह निशुल्क, आसान और सुरक्षित रहने के कारण अपनाया है. ऐसे में
यदि शुल्क लगता है तो सम्भव है कि बहुत बड़ी संख्या में लोग वापस नकदी आधारित अर्थव्यवस्था
को अपना लें. ऐसा विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में होने की आशंका अधिक है
क्योंकि वहाँ डिजिटल साक्षरता अभी विकास के क्रम में है. डिजिटल भुगतान व्यवस्था
में शुल्क का लगाया जाना इन लोगों को डिजिटल प्लेटफॉर्म से दूर कर सकता है.
यूपीआई भुगतान के दौर में देखने में आया है कि व्यापारिक स्तर पर अनेक जगहों
पर टैक्स चोरी पर एक तरह का नियंत्रण लगा है. शुल्क का लगाया इसे पुनः प्रभावित कर
सकता है. सरकार की ओर से भले ही इस शुल्क को बड़े व्यापारियों का बड़े-बड़े भुगतान के
सम्बन्ध में लगाने की बात कही जा रही हो किन्तु आर्थिक क्षेत्र में यह सहजता से
देखा जाता है कि व्यापारी अपने ऊपर पड़ने वाले अतिरिक्त भार को ग्राहकों पर डाल देते
हैं. शुल्क लगाये जाने की स्थिति में भी ऐसा हो सकता है. इससे यूपीआई के स्थान पर नकद
भुगतान की माँग बढ़ेगी,
जिससे कर चोरी को बढ़ावा मिलने की आशंका है. इसके अलावा देश को कैशलेस बनाने का जो सपना केन्द्रीय
स्तर पर देखा गया है उस पर नकारात्मक असर पड़ सकता है. नोटों की छपाई, उनका परिवहन, प्रबंधन आदि में सरकार को भारी
लागत उठानी पड़ती है. इस लागत को डिजिटल भुगतान ने बहुत हद तक कम कर दिया था. अब
जबकि यदि डिजिटल भुगतान पर शुल्क आरोपित किये जाने से डिजिटल भुगतान में गिरावट का
आना सरकार की उस लागत बढ़ा सकती है जो नोटों के सन्दर्भ में आती है.
निष्पक्ष रूप से देखा जाये तो डिजिटल भुगतान को पूरी तरह न तो सब्सिडी पर बनाये
रखा जा सकता है और न ही इसे किसी तरह के भारी-भरकम शुल्क के साथ बनाये रखा जा सकता
है. भारत जैसी विशाल और विविधतापूर्ण अर्थव्यवस्था में सरकार को मध्यम मार्ग अपनाने
का व्यावहारिक समाधान सोचना चाहिए. प्रयास यह किया जाये कि आम नागरिकों के व्यक्ति
से व्यक्ति सम्बन्धी लेनदेन को तथा छोटे, मध्यम स्तर के व्यापारियों को शुल्क से मुक्त रखा जाए. बहुत बड़े व्यावसायिक
लेनदेन पर, कॉर्पोरेट भुगतानों
पर शुल्क का आरोपण किया जाना चाहिए. यहाँ ध्यान देने वाला तथ्य यह है कि पारदर्शिता
और जन-सहभागिता डिजिटल भुगतान का आधार है. ऐसे में यदि देश में डिजिटल क्रांति को
बनाये रखना है तो प्रयास यही होना चाहिए कि एक तो जनता में किसी तरह का भ्रम न
फैले, दूसरे उनके
विश्वास पर शुल्क का बोझ किसी तरह की चोट न करे.
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