14 April 2021

जीतने की कोशिश और हार जाने का डर

जीतने की कोशिश और हार जाने का डर. ऐसा कब होता है? जब प्रतिद्वंद्वी आपका अपना अभिन्न हो. यह भले अजूबा सा लगे मगर आजकल ऐसा बहुत होने लगा है जबकि प्रतिद्वंद्वी आपका अपना ख़ास, आपका अपना विशेष होता है. इन दिनों कुछ ऐसी ही स्थिति से गुजरना हो रहा है. कहा जाये तो खुद से ही लड़ना हो रहा है, खुद को ही हराना है और खुद से ही जीतना है. अजीब सी असमंजस की स्थिति है, जहाँ न जीतने की ख़ुशी है और न हारने का ग़म. 

क्या कहें और क्या लिखें बस आज अचानक बैठे-बैठे मन कर गया कुछ कहने का तो यही लिख दिया. बाकी सब कुशल से है ही.


वंदेमातरम्

2 comments:

  1. ओह , आज शायद सब ही ऐसी परिश्थिति से गुज़र रहे .

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  2. बहुत सुन्दर और सार्थक ।
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    ऐसे लेखन से क्या लाभ? जिस पर टिप्पणियाँ न आये।
    ब्लॉग लेखन के साथ दूसरे लोंगों के ब्लॉगों पर भी टिप्पणी कीजिए।
    तभी तो आपकी पोस्ट पर भी लोग आयेंगे।

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