12 नवंबर 2019

सम्बन्ध निर्वहन का आधार है आपसी जूनून

अक्सर मन में सवाल उठा करते हैं कि व्यक्ति आपस में सम्बन्ध क्यों बनाता है? आपस में दोस्ती जैसी स्थितियों की सम्भावना वह क्यों तलाशता है? क्यों दो विपरीतलिंगी आपस में प्रेम करने लग जाते हैं? क्या ऐसा होना प्राकृतिक है? क्या ऐसा मानवीय स्वभाव की आवश्यकता के चलते किया जाता है? यदि ऐसी स्थितियाँ प्राकृतिक हैं, यदि ऐसा होना मानवीय स्वभाव है तो फिर संबंधों में, रिश्तों में, प्रेम में अलगाव क्यों आ जाता है? क्यों आपसी ताने-बाने में कटुता आ जाती है? क्यों दो प्रेम करने वाले, मधुर सम्बन्ध रखने वाले लोग आपस में एक-दूसरे से मिलना-जुलना तक पसंद नहीं करते? यदि दो लोगों का आपसी मेल प्राकृतिक है तो संभव है की उनमें होने वाला अलगाव भी प्राकृतिक हो? संभव है कि किसी भी व्यक्ति के जीवन की अनिश्चितता की तरह ही संबंधों में, रिश्तों में भी अनिश्चितता रहती हो? जीवन की अनिश्चितता को जानते-समझते हुए भी व्यक्ति अपने भविष्य के लिए, अपने परिजनों के भविष्य के लिए जैसे उस अनिश्चितता को जीत लेना चाहता है. ठीक इसी तरह से व्यक्ति के क्रिया-कलाप देखकर उसकी मानसिकता, उसके हाव-भाव देखकर लगता है जैसे वह संबंधों को, रिश्तों को भी सदा-सदा के लिए अपने नियंत्रण में ले लेना चाहता है. 


कतिपय व्यक्तिगत संबंधों के निर्वहन के पश्चात्, अपने आसपास के अनेक संबंधों के आगे बढ़ने, उनमें व्यवधान आने के अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर ऐसा महसूस होता है जैसे संबंधों, रिश्तों का भी अपना एक जीवन होता है. इस जीवन में उसी समय तक स्फूर्ति, तरलता बनी रहती है जब तक कि उनको आगे बढ़ते रहने का कोई आधार मिलता रहे. जैसे किसी भी व्यक्ति को अपने जीवन में आगे बढ़ने के लिए किसी तरह के लक्ष्य की आवश्यकता होती है, उसके लिए किसी तरह के जूनून की आवश्यकता होती है. कुछ इसी तरह का सन्दर्भ रिश्तों, संबंधों के निर्वहन से लिया जा सकता है. जब तक दो संबंधों के बीच आपस में जूनून जैसा कुछ नहीं है, तब तक उनके आगे बढ़ते रहने की सम्भावना पर संशय बना रहता है. इसी तरह संबंधों, रिश्तों में भविष्य के प्रति किसी तरह का लक्ष्य होना भी आवश्यक है, बिना इसके सम्बन्ध निर्वहन की तरलता में कमी आती है. ऐसा नहीं कि लक्ष्य के लिए किसी स्वार्थ का होना ही हो, ऐसा नहीं कि लक्ष्य के लिए किसी तरह के आर्थिक आधार का होना आवश्यक हो. लक्ष्य का आधार, उसका स्वरूप किसी भी तरह का हो सकता है. लगातार मिलते रहने की ललक, मिलकर कुछ नया करने की भावना भी इसी तरह का लक्ष्य कहा जा सकता है. इस तरह के लक्ष्य का निर्माण आपसी जूनून से ही संभव होता है. यही जूनून सम्बन्ध निर्वहन की आधारशिला होता है.  

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