14 फ़रवरी 2019

दुखद क्षण में संयम और सरकारी कार्यवाही की प्रतीक्षा


फिर एक आतंकी आत्मघाती हमला. इसे भले ही आतंकियों की कायराना हरकत कहा जाये, घटना की निंदा की जाए मगर सत्य यही है कि सरकार को आतंकियों के ठिकानों पर ताबड़तोड़ हमले करने ही होंगे. ये ठिकाने देश के बाहर के हो सकते हैं, देश के भीतर के भी हो सकते हैं. यदि ऐसे आतंकी हमलों का विश्लेषण किया जाये तो साफ़-साफ़ दिखाई देता है कि कहीं न कहीं इन आतंकियों को देश के भीतर से भी मदद मिलती है. ये जरूरी नहीं कि देश के भीतर से मिलने वाली मदद इन आतंकियों को किसी आर्थिक रूप में हो, किसी तरह से अस्त्र-शस्त्र के रूप में हो, किसी तरह के संरक्षण के रूप में हो. इनकी मदद के कई और रूप भी हो सकते हैं. आतंकवाद विरोधी गतिविधियों पर, सेना, सैनिकों के खिलाफ कदम उठाने वालों पर कार्यवाही करने सम्बन्धी कदमों पर देश में जिस तरह से राजनैतिक बयानबाजी होने लगती है, उसे देखकर भी इन आतंकियों के हौसले बढ़ जाते होंगे. इस तरह के राजनैतिक बयानबाजी से देश में जनसाधारण के बीच भी एक तरह से कई-कई गुट बन जाया करते हैं. इन्हीं गुटों का फायदा उठाकर ये आतंकी तत्त्व समाज के बीच ही आम नागरिक बनकर रहने लगते हैं. कहीं न कहीं ये नागरिक गुट ही अनजाने ही इन आतंकियों के मददगार साबित होने लगते हैं.


पुलवामा में हुए आज के आतंकी हमले के बाद ही राजनैतिक बयानबाजी आरम्भ हो गई है. ऐसे मौके पर जबकि सम्पूर्ण देश सैनिकों की शहादत पर दुःख व्यक्त कर रहा है तब राजनैतिक बयानबाजी आपसी कटुता दर्शाने के लिए नहीं होनी चाहिए. इस तरह से शोक के, दुःख के संवेदनशील अवसर पर न केवल राजनैतिक दलों को वरन मीडिया, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक चैनल्स को भी संयम बरतने की आवश्यकता होनी चाहिए. जहाँ एक तरफ राजनैतिक बयानबाजी से देश-विरोधी ताकतें अंदाज लगा लेती हैं कि कौन देश के साथ है और कौन देश के विरोध में. ऐसे बयानों से उनको आकलन करने में आसानी होती है कि सरकार किस स्तर तक की कार्यवाही कर सकती है. ऐसे ही बयानों के कारण आतंकियों के सरगना अपने कदमों के सम्बन्ध में अति-आत्मविश्वास से भर उठते हैं. और ये सब बयानबाजियाँ आतंकियों के पास तक पहुँचाने का काम बड़ी आसानी से इलेक्ट्रॉनिक चैनल्स द्वारा हो जाता है.

ऐसा नहीं है कि सरकार की नाकामी की चर्चा नहीं होनी चाहिए. ऐसा भी नहीं कि देश के ख़ुफ़िया तंत्र की असफलता की चर्चा न होनी चाहिए मगर इनका समय कम से कम वह तो नहीं होता है जबकि समूचा देश सैनिकों की शहादत पर स्तब्ध है. यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि क्या वाकई सरकार या ख़ुफ़िया तंत्र पूरी तरह से असफल ही हुआ है? यहाँ जिस तरह से नोटबंदी को आतंकी हमले से जोड़कर इस बार अनावश्यक बयान दिए जाने का काम होने लगा है क्या वे बताएँगे कि नोटबंदी के बाद किस तरह की आतंकी घटनाएँ सामने आई हैं? कितनी आतंकी घटनाएँ सामने आई हैं? असल में देश के अन्दर इस तरह का माहौल बन चुका है जहाँ सिर्फ दो धड़े ही दिखाई देते हैं. एक धड़े में सरकार या कहें कि भाजपा के समर्थक हैं दूसरे धड़े में वे लोग हैं जो किसी न किसी रूप में भाजपा सरकार को गिराना चाहते हैं, किसी भी घटना का दोष वर्तमान केंद्र सरकार पर थोपना चाहते हैं.

इस आतंकी हमले के बाद जोर-शोर से आतंकी ठिकानों को नष्ट करने की बात होने लगी है. यहाँ ध्यान रखने की आवश्यकता है कि इस देश में वही लोग भी हैं जो सरकार की सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत माँगते हैं. इसी देश में वे लोग भी हैं जो सेना को गाली देते हैं. इस देश में वे लोग भी हैं जो किसी सैनिक की शहादत पर भी अनर्गल बोल बोलने से नहीं चूकते हैं. इस देश में वे लोग भी साँस ले रहे हैं जो भारत के टुकड़े होने के नारे लगाते हैं. इसी देश में वे लोग भी हैं जो घर-घर से अफज़ल निकलने की बात करते हैं. वे भी इसी देश के नागरिक हैं जो हमारे दुश्मन पड़ोसी देश में जाकर देश की सरकार गिराए जाने की बात करते हैं. इसी देश में ऐसे लोग भी हैं जिन्हें हमारे सैनिकों के हत्यारे प्रमुख से गले मिलने में शर्म महसूस नहीं होती है. ऐसे में सोचने की आवश्यकता है कि ये लोग सरकार की आतंकी विरोधी कार्यवाही का किस स्तर तक समर्थन कर सकेंगे? ये भी सोचा-विचार जाना चाहिए कि सरकार की आतंकी कार्यवाही के शुरू होने पर ये लोग देश के भीतर किसी तरह की अशांति नहीं फैलायेंगे? इस पर भी विचार करने की जरूरत है कि देश की सेना बाहरी ताकतों से लड़ने का, उन्हें मिटाने का काम करने लगेगी ऐसे में देश की अंदरूनी ताकतों को हवा देने वाले देश-विरोधी कदम नहीं उठाएंगे? 

सैनिकों की शहादत पर किसी भी सच्चे देशभक्त का नाराज होना, आक्रोशित होना स्वाभाविक है. ऐसे मौके पर वह सरकार से कठोर से कठोर कार्यवाही किये जाने की माँग करता है, करनी भी चाहिए. यही वह क्षण होता है जहाँ शांत भाव से सरकार के कदम की प्रतीक्षा करनी चाहिए. यह शांति इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि वर्तमान में वह केंद्र सरकार है जिसके शासनकाल में आतंकी हमलों में जबरदस्त गिरावट आई है. यह भी एक तरह की खीझ है जो देश की बाहरी और अंदरूनी ताकतों में उत्पन्न हो चुकी है. देशवासियों को, राजनैतिक दलों को, मीडिया को ऐसे समय में संयम से काम लेते हुए सरकार के कदम की प्रतीक्षा करनी चाहिए. बाकी सरकार पर चिल्लाने के लिए आने वाला समय है ही फिर.


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