28 January 2019

पढ़-लिख कर भी तो खाने की जुगाड़ करनी पड़ेगी


बदन पर फटी बनियान, बिखरे-रूखे बाल, कंधे पर बोरी, जिसमें उसके द्वारा सड़क से, कूड़े से बटोर गया सामान भरा हुआ था. आँखों में डर का भाव लेकर उसने हाथ के इशारे से कुछ खाने के लिए पैसे की चाह में हाथ आगे बढ़ाया. अच्छी-खासी ठण्ड में एक फटी बनियान और हाफ नेकर के सहारे अपने जीवन को आगे खींचते हुए उस बालक को देखकर कंपकंपी छूट गई. पैसे चाहिए या कुछ खाना है? के सवाल पर अबकी उसके मुँह से शब्द निकले, भूख लगी है. ठेले वाले से उस बालक के मन का सामान देने को कहा तो लगभग तेरह-चौदह साल के उस बच्चे की आँखों में चमक आ गई. खाने का सामान लेकर वह पास के एक चबूतरे पर बैठकर अपनी भूख मिटाने लगा. सोचा ऐसे बच्चे शायद खाने का स्वाद लेते भी होंगे या बस अपना पेट भरकर फिर सड़क पर जिन्दगी की जंग से जूझने लगते होंगे.


ऐसे कई-कई बच्चों को उरई में और यहाँ से बाहर भी देखा है. इनसे बातचीत करके उनके परिजनों के बारे में, उनके माता-पिता के बारे में भी जानकारी की. कुछ मित्रों के साथ मिलकर ऐसे बच्चों के लिए शिक्षा की व्यवस्था की गई थी, प्रशासन द्वारा भी इस बारे में सकारात्मक कदम उठाये गए थे मगर वे बच्चे अपनी प्रकृति, स्थिति से शायद प्रसन्न थे, इसी कारण हम लोगों की व्यवस्था को ठुकराते हुए वापस अपनी दुनिया में लौट गए थे. अपनी उस दुनिया में लौटने के पीछे जितने जिम्मेवार वे थे, उतने जिम्मेवार उनके माता-पिता भी समझ आये थे. दिन भर नशा, जुआ आदि के चक्कर में फँसे उन बच्चों के माता-पिता और उनके घर को चलाने का एकमात्र माध्यम यही बच्चे और उनके द्वारा बटोर गया कूड़ा हुआ करता है. ऐसे बहुत सारे बच्चे आज न केवल शहर में बल्कि आसपास के दस-पंद्रह किलोमीटर के दायरे में कूड़ा बटोरने का कार्य करते देखे जा सकते हैं. 

ऐसे दृश्य देखकर भले ही आम नागरिक सरकार को दोष देने लगे, सरकारी नीतियों की बुराई करने लगे, व्यापारियों के प्रति कटु शब्द निकालने लगे मगर कई बार लगता है कि ऐसी व्यवस्था के बने रहने में हम नागरिक भी दोषी हैं. समाज के प्रति हम सबका भी कुछ न कुछ दायित्व है. उस दायित्व की पूर्ति न करते हुए हम सभी स्वार्थ में घिरे अपने-अपने परिजनों की, अपने-अपने परिवार की चिंता करने में लगे हुए हैं. यदि हम सभी नागरिक अपनी-अपनी जिम्मेवारी समझते हुए एक-एक बच्चे को शिक्षित करने का कार्य करने लगे तो ये समस्या भले ही समाप्त न हो पर कम अवश्य हो जाएगी.

अपनी भूख मिटा चुके उस बच्चे के चेहरे पर संतुष्टि का भाव देखकर उससे उसके परिवार के बारे में जानकारी ली. जैसा कि विश्वास था, वैसा ही परिवार निकला. वे दो भाई और दो बहिनें कूड़ा बीनने के काम में लगी हुई हैं. माता-पिता काम करते हैं मगर अपना कमाया हुआ पीने में, जुए में लुटा देते हैं. उससे उसके पढ़ने-लिखने के बारे में पूछने पर मिले जवाब से कुछ समझ न आया कि क्या कहा जाये. साहब, पढ़ाई की नहीं रोज कुछ खाने की व्यवस्था करवा दो. पढ़-लिख कर भी तो खाने की जुगाड़ करनी पड़ेगी. पेट भरा रहेगा तो पढ़ाई का भी सोच लेंगे. इसके बाद दोनों हाथ नमस्कार की मुद्रा में जोड़कर वह आगे बढ़ चला. आखिर सड़क पर हम शिक्षित लोगों के द्वारा फेंकी गई गन्दगी उसी का इंतजार कर रही थी, जो उसके लिए एक समय के भोजन का प्रबंध करेगी.

No comments: