25 सितंबर 2018

कठिन डगर से एकात्म मानववाद तक का सफ़र


दीनदयाल उपाध्याय, जिनका आज जन्मदिवस है, एक प्रखर विचारक, उत्कृष्ट संगठनकर्ता तथा ऐसे नेता थे जिन्होंने जीवनपर्यंन्त व्यक्तिगत ईमानदारी और सत्यनिष्ठा को महत्त्व दिया. वे भारतीय जनता पार्टी के लिए वैचारिक मार्गदर्शन और नैतिक प्रेरणा के स्रोत हैं. उनकी पुस्तक एकात्म मानववाद (इंटीगरल ह्यूमेनिज्म) है, जिसमें साम्यवाद और पूंजीवाद की समालोचना की गई है.


उनका जन्म 25 सितंबर 1916 को मथुरा के गाँव नगला चंद्रभान में हुआ था. उनके पिता का नाम भगवती प्रसाद उपाध्याय तथा माता का नाम रामप्यारी था. रेलवे की नौकरी में व्यस्तता के कारण उनके पिता ने उनको और उनकी माता जी को ननिहाल भेज दिया. तीन वर्ष की उम्र में उनके पिता का देहांत हो गया. विपत्ति ने यहाँ ही पीछा न छोड़ा. सात वर्ष की उम्र में उनकी माँ का भी निधन हो गया. कुछ समय बाद बीमारी के कारण उनके भाई का भी देहान्त हो गया. अपने मामा के सहयोग से उनकी शिक्षा होती रही. सन 1937 में इण्टरमीडिएट की परीक्षा में उन्होंने सर्वाधिक अंक प्राप्त कर कीर्तिमान स्थापित किया. बिड़ला कॉलेज में इससे पूर्व किसी भी छात्र के इतने अंक नहीं आए थे. दीनदयाल जी को स्वर्ण पदक प्रदान करते हुए बिड़ला जी ने उन्हें छात्रवृत्ति प्रदान की. इसके बाद दीनदयाल जी बी०ए० करने के लिए कानपुर आ गए. यहाँ उनमें राष्ट्रसेवा का बीज अंकुरित हुआ. दीनदयाल जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रमों में रुचि लेने लगे. सन 1939 में प्रथम श्रेणी में बी०ए० उत्तीर्ण करने के बाद वे एम०ए० करने के लिए आगरा चले गये. यहाँ नानाजी देशमुख और भाऊ जुगाडे के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे. इसी बीच उनकी चचेरी बहन का बीमारी से निधन हो गया. इस घटना से वे बहुत उदास रहने लगे और एम०ए० की परीक्षा नहीं दे सके.

आगरा से वे लखनऊ आये और यहाँ से राष्ट्रधर्म प्रकाशन संस्थान की स्थापना की. यहीं से एक मासिक पत्रिका राष्ट्रधर्म सहित पांचजन्य (साप्ताहिक) तथा स्वदेश (दैनिक) का प्रकाशन शुरु किया. दीनदयाल जी ने 21 सितम्बर 1951 को उत्तर प्रदेश में एक राजनीतिक सम्मेलन आयोजित करके भारतीय जनसंघ की नींव डाली. सन 1968 में उन्हें अध्यक्ष बनाया गया. दीनदयाल उपाध्याय जी ने राजनीति के साथ-साथ विचारात्मक योगदान भी दिया. उन्होंने अनेक महत्त्वपूर्ण विषयों पर अपने विचार रखे. जिनमें एकात्म मानववाद, लोकमान्य तिलक की राजनीति, जनसंघ का सिद्धांत और नीति, जीवन का ध्येय राष्ट्र जीवन की समस्यायें, राष्ट्रीय अनुभूति, कश्मीर, अखंड भारत, भारतीय राष्ट्रधारा का पुनः प्रवाह, भारतीय संविधान, इनको भी आज़ादी चाहिए, अमेरिकी अनाज, भारतीय अर्थनीति, विकास की एक दिशा, बेकारी समस्या और हल, टैक्स या लूट, विश्वासघात, द ट्रू प्लान्स, डिवैलुएशन ए, ग्रेटकाल आदि प्रमुख हैं. उनके लेखन का एकमात्र लक्ष्य भारत की विश्व पटल पर पुनर्प्रतिष्ठा और विश्व विजय स्थापित करना था. विलक्षण बुद्धि, सरल व्यक्तित्व एवं नेतृत्व के अनगिनत गुणों से संपन्न दीनदयाल उपाध्याय जी की मृत्यु मात्र 52 वर्ष की उम्र में 11 फ़रवरी 1968 को मुग़लसराय के पास रेलगाड़ी में यात्रा करते समय संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी. उनका पार्थिव शरीर मुग़लसराय स्टेशन के वार्ड में मिला था. 

भारतीय राजनीतिक क्षितिज के इस प्रकाशमान सूर्य को, जिसने सभ्यतामूलक राजनीतिक विचारधारा का प्रचार एवं प्रोत्साहन करते हुए अपना सर्वस्व राष्ट्र को समर्पित किया, उनके जन्मदिवस पर सादर नमन.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें